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Friday, February 4, 2011

राप्चिक दिल्लगी

       कभी कभी हम लोग वही काम अदबदा कर करते हैं जिसे करने से दूसरा शख्स चिढ़ जाता हो। उस शख्स के चिढ़ने से एक अलग ही किस्म का आनंद मिलता है।  कुछ इसी तरह के आनंद को एक अलग अंदाज में लेकर बनी है बासु चटर्जी की 'दिल्लगी' ,जिसे कि अभी हाल ही में मैने देखा है।  
      फिल्म की स्टोरी कुछ यूं है कि एक गर्ल्स कॉलेज में संस्कृत पढ़ाने वाले लेक्चरर स्वर्णकमल बाबू यानि कि धर्मेन्द्र हैं और उसी कॉलेज में रसायन शास्त्र पढ़ाने वाली स्वभाव से सख्त लेक्चरार की भूमिका निभाने वाली हेमामालिनी। उधर स्वर्णकमल बाबू कक्षा में अक्सर लड़कीयों को अपनी उंची आवाज में कोर्स में उल्लिखित कालीदास पढ़ाते रहते हैं। उल्लेखनीय है कि कालीदास की मेघदूतम, अभिज्ञान शाकुंतलम् आदि के  कुछ अंश तनिक रोमांटिक अंदाज में लिखे गये हैं......सीधे सीधे शब्दों में कहा जाय तो थोडी सी कामुकता लिये हुए। इधर जब लड़कियों की क्लास में स्वर्णकमल वही सब जब उंची आवाज में बोल बोलकर पढ़ते हैं तो बगल के क्लास में केमिस्ट्री पढ़ा रही शिक्षिका की क्लास डिस्टर्ब होने लगती है। लड़कियां अपना ध्यान केमिस्ट्री की बजाय अभिज्ञान शाकुंतलम् पर केन्द्रित करने लगती हैं और केमिस्ट्री टीचर  इस पर एतराज जताती हैं। 


     इधर केमिस्ट्री शिक्षिका गर्ल्स हॉस्टेल की सख्त वार्डन के तौर पर भी जानी जाती हैं। क्या मजाल जो लड़कियां जरा भी उट पटांग कपड़े पहनने का साहस करें, कुछ ऐसी वैसी हरकत करने का साहस करें।  केमिस्ट्री टीचर की इसी सख्ती की वजह से सारी लड़कियां उसे पीठ पीछे 'कार्बन' कहकर बुलाती रहती हैं। उधर लगातार क्लास की लड़कियों का ध्यान जब रसायन की बजाय प्रेम रस की बातों पर बंटने लगा तो केमिस्ट्री टीचर और भी ज्यादा संस्कृत के स्वर्णकमल बाबू से ख़फा रहने लगीं।

  लेकिन संस्कृत के शिक्षक स्वर्ण कमल बाबू यानि कि धर्मेन्द्र केमिस्ट्री की शिक्षिका की बातों का बुरा नहीं मानते और अपनी ओर से दिल्लगी करते हुए प्यार की पींगे बढ़ाना शुरू करते हैं। इस बात को जानते हुए कि  कालीदास नाम से ही इस रसायन शास्त्र की लेक्चरार को नफ़रत है, वह और अदबदा कर कालीदास की तारीफ करते है। तरह तरह के बहाने बनाकर शिक्षिका से मिलने का प्रोग्राम बनाते रहते हैं। और इसी क्रम में कॉलेज की लड़कियां स्वर्ण कमल बाबू को जीजा जी कह कर बुलाने लगती हैं। और जीजाजी हैं कि जब देखो फूल लिये कॉलेज के प्रांगण में हंसते मुस्कराते जब तब उस शिक्षिका के सामने ही पड़ते रहते हैं। 

     उधर होली वाले दिन स्वर्ण कमल बाबू जान बूझकर अपने साथ कालीदास के लिखे रोमांटिक अंशों वाली किताब लाते हैं और मौका देखकर चुपके से केमिस्ट्री की शिक्षिका के टेबल पर रख कर निकल जाते हैं। उधर केमिस्ट्री की शिक्षिका को जब वह किताब मिलती है तो पहले तो वह परेशान हो जाती है कि ऐसी घटिया विषय वाली किताब उसके कमरे में कैसे आई। लेकिन फिर कुछ सोचकर किताब को  पढ़ना शुरू करती है तो उसे महसूस होता है जैसे एक बेहद अश्लील किताब को पढ़ रही है और इस बात से परेशान हो जाती है कि आखिर इतनी घटिया किताब कोर्स की किताबों में कैसे पढ़ाई जाती है। 

       उधर केमिस्ट्री की शिक्षिका के साथ ही उसी कॉलेज में एक अंग्रेजी पढ़ाने वाली शिक्षिका का अफेयर एक दूसरे शख्स के साथ चल रहा होता है। दोनों ही जल्द शादी की तैयारी करने लगते हैं। लेकिन उन दोनों का इस तरह मिलना केमिस्ट्री शिक्षिका की नज़र में एक तरह का अपराध है । उसका मानना है कि उनकी देखा देखी कॉलेज की लड़कियां भी बिगड़ सकती हैं। कुछ इन्हीं सब बातों को लेकर  उनकी आपस में बतकही भी हो जाती है। और तभी अंग्रेजी की शिक्षिका एक कटाक्ष करती है कि तुम्हें प्यार नहीं मिला इसलिये तुम चिड़चिड़ी हो गई हो। हर एक को बुरी समझ रही हो। और यहीं से जन्म होता है एक किस्म के बोध का जिसके अहसास से केमिस्ट्री टीचर अपने व्यवहार में बदलाव लाने पर मजबूर हो जाती है।
  आनंद आता है तब जब स्वर्णकमल बाबू बहाने से गर्मी की छुट्टियों में संस्कृत शिक्षिका के पैतृक घर पहुँच जाते हैं और अपनी ओर से घास डालने की कोशिश करते हैं। इसी बीच हुई  एक गफलत में संस्कृत शिक्षिका का विवाह कहीं का कहीं होते होते रह जाता है। 

 1978 में बनी बासू चटर्जी निर्देशित यह फिल्म रोचक अंदाज में बनी है, बेहद मनोरंजक है। हो सके तो आप भी इस शानदार फिल्म को देखिये....और धर्मेन्द्र - हेमा की हिट जोड़ी के अनोखे ह्यूमर का आनंद लिजिए। 

   - सतीश पंचम

स्थान - वही, जहाँ पर देवानंद की मशहूर फिल्म 'हम दोनों'  का रंगीन प्रिमियर हुआ है।

समय - वही, जब रसायनशास्त्र की शिक्षिका एक छात्रा की किताबों से अश्लील प्रेम पत्र पकड़ती हैं और उसे थप्पड़ लगा देती है और अगले दिन संस्कृत के शिक्षक कहते हैं - प्रेम रस और रसायन शास्त्र में बहुत गहरा संबंध है......कम से कम शब्द तो यही कहते हैं :)

13 comments:

Rahul Singh said...

हमने तो देखी है, तब देखकर और अब पढ़कर आनेद भी लिया.

प्रवीण पाण्डेय said...

बासु चटर्जी ने धर्मेन्द्र के सीधे साधे चेहरे का बहुत अच्छी अभिव्यक्ति दी है, इस फिल्म में।

डॉ. मनोज मिश्र said...

हमनें तो नहीं देखी थी,अब आपने प्रशंसा की है तो देखते है.

सोमेश सक्सेना said...

हमने भी नही देखी है। पर अब जरूर देखेंगे। :)

anshumala said...

आज २०० टीवी चैनल के ज़माने में एक भी फिल्म ठीक से नहीं देख पाते पहले ही अच्छा था जब एक ही चैनल था अपना दूरदर्शन उस पर ये फिल्म देखी थी मजेदार है इसी कड़ी में "चुपके चुपके" भी थी असली जीजा जी तो उसी में थे |

Suresh Chiplunkar said...

बहुत पहले देखी है, अब आपने "यादें" ताज़ा कर दीं… इस फ़िल्म में धरम-हेमा की केमिस्ट्री भी शानदार है…

Arvind Mishra said...

बासु चटर्जी निर्देशित जबरदस्त संदेशवाहक फिल्म मगर असली बाटम लाईन तो यह रही ..
तुम्हें प्यार नहीं मिला इसलिये तुम चिड़चिड़ी हो गई हो। हर एक को बुरी समझ रही हो।

रंजना said...

बहुत पहले देखी थी...आपने स्मरण करा दिया...

आभार..

आज कल की फिल्मो में

तेरे बिन लादेन

फंस गया रे ओबामा

दो दुनी चार

देख लीजिये ...आनंद आएगा...

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

देखी है! बासु चटर्जी के साथ प्रिया तेदुलकर का नाम भी जुड़ा है जब मुम्बई के सारे टैक्सी ड्राईवर उनके पीछे पड़ गये थे.. एक वर्ष में 11 फिल्में बनाने वाले बासु चटर्जी हल्के फुल्के स्वस्थ मनोरंजन के लिये जाने जाते हैं!!

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर समीक्षा की आप ने शायाद देख रखी हे, आज कल तो मुड ही नही बनता फ़िल्म देखने का. धन्यवाद

मनोज कुमार said...

बहुत ही मनोरंजक फ़िल्म ।

tapesh chauhan said...

फिल्म देखि तो नही लेकिन यहाँ पढ़ कर लग रहा रहा है कि - बहुत मस्ती भरी फिल्म होगी..........

रविकान्त said...

वाक़ई मज़ेदार फ़िल्म है। विज्ञान और साहित्य वालों की जो रूढ़ छवियाँ हैं, उनको तोड़ने की कोशिश करती है। भाषा-प्रयोग पर भी दिलचस्प व ज्ञानदा छींटाकशी है, जो हृषिदा की दूसरी फ़िल्मों में भी मिलती है। बग़ैर बाप की स्वत्तंत्र महिला प्रोफ़ेसर के किरदार में हेमा मालिनी अपने आधुनिक मध्यवर्गीय संस्कारों से लड़कर प्रेम व काम को कालिदास के माध्यम से कैसे पाती है,ये इसकी एक और ख़ासियत है। गाने दो-एक बेहतर हैं। शकुंतला नाटक का मंचन थोड़ा और काल्पनिक हो सकता था। शुक्रिया, आपका चिट्ठा, आपकी ज़बान निहायत दिलकश है।
रविकान्त

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