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Wednesday, January 26, 2011

ये जो है न....सो कभी था....अब भी है......है न.

       अब वे दिन सपने हुए हैं कि जब सुबह पहर दिन चढे तक किनारे पर बैठ निश्चिंत भाव से घरों की औरतें मोटी मोटी दातून करती और गाँव भर की बातें करती। उनसे कभी कभी हूं-टूं होते होते गरजा गरजी, गोत्रोच्चार और फिर उघटा-पुरान होने लगता। नदी तीर की राजनीति, गाँव की राजनीति। लडकियां घर के सारे बर्तन-भांडे कपार पर लादकर लातीं और रच-रचकर माँजती। उनका तेलउंस करिखा पानी में तैरता रहता। काम से अधिक कचहरी । छन भर का काम, पहर-भर में। कैसा मयगर मंगई नदी का यह छोटा तट है, जो आता है, वो इस तट से सट जाता है।

    ये लाईनें हैं श्री विवेकी राय जी के एक लेख की जो उन्होंने एक नदी मंगई के बारे में लिखी हैं।  इसे पढते हुए गाँव घाट की जीवंत तस्वीर नजर आ जाती है। ये अनुभव उन्होंने तब लिया था जब देश अभी हाल ही में आजाद हुआ था। गुलामी की जंजीरों से मुक्त हुआ था और चारों ओर मन हिलोर जीवन था। मंगई तब एक भरी पूरी नदी थी।  विवेकी राय जी मंगई नदी को गांव की मां कहते हैं और लिखते हैं कि -

      हम थके मांदे बाहर से आते, यह निर्मल नीर लिये राह-घाट छेंक सदा हाजिर, घुटने तक, कभी जांघ तक पैर धो देती, शीतल आँचल से पोंछ देती, तरो ताजा कर देती। हम खिल जाते। मुंह धोते, कुल्ला करते, हडबड-हडबड हेलते, उंगली से धार काटते और कुटकुर किनारे पर पनही गोड में डालकर भींगे पैरों की सनसनाहट के साथ धोती हाथ से टांगे अरार पर चढते तो एक अनकही-अबूझी आनंदानुभूति होती थी ….

      गरमी के दिन में लडके छपक छपक कर नहा रहे हैं। सेवार और काई के फुटके छत्ते धार के साथ बह रहे हैं। लडके उन्हें उठा-उठाकर एक दूसरे पर उछाल रहे हैं। झांव- झांव झाबर।   एक दूसरे पर हाथो –हांथ पानी उबिछ रहे हैं, हंस रहे हैं, किलकारी भर रहे हैं। हाथ पैर पटक कर अगिनबोट बन तैर रहे हैं। हाडुक-बाडुक। नहाते नहाते ठुड्डी और मूंछ वाले स्थान पर हलकी काई जम गयी। कोई बुडुआ बनकर दूसरे का पैर खींच रहा है। कोई पानी में आँखें खोलकर तैरता है। अच्छा देखें कौन देर तक पानी में सांस रोककर डूबता है। खेल शुरू। एक पट्ठा रिगानी (चालाकी)  कर जाता है। सिर काढ कर साँस ले रहा है और तब तक उपर उठने के लिये कोई सिर मुलकाता है, तब तक डम्भ। साँस ले रहा लडका पानी में घुस जाता है। दिन भर नहान। न जाने किस पुण्य प्रताप से यह नियामत मिली। आज कल के लडके तो अभागे निकले। चुल्लू भर पानी के लिये छिछियाते फिरें। कुएं पर खडे खडे लोटे से देह खंघार लें बस।

        उधर दादा दोनों हाथों से मार-मार फच्च फच्च धोती फींच रहे हैं। कहते हैं कि उनके कपडे कभी धोबी के घर नहीं जाते। परंतु क्या मजाल कि कोई कहीं धब्बा मैल या चित्ती देख ले। एक जिंदा दृश्य। मानों यह मंगई का तट ही गाँव के लिये सिनेमा, थियेटर, मनोरंजन पार्क, क्लब, क्रीडागार स्थान है।

      लेकिन अब वो बात नहीं रही। स्वतंत्रता के समय जो मंगई नदी कल कल बहती थी, अब सूख गई है। गाँव में घुसने से पहले उसी का महाभकसावन सूखा, गहरा, लेटा हुआ कंकाल लांघना पडता है। मिजाज सन्न हो जाता है। बंसवारि खडी है, पेड खडे हैं। घर खडे हैं। मगर वह रौनक कहां है। अखर गया है।

     एक वह भी समय था जब चैत रामनौमी के दिन अछत कलश भरने का काम शुरू होता। किसी कलश को घी से टीककर, तो किसी कलश को घी से ही राम-नाम लिखकर अंवासा गया है। माता मईया की गज्जी कचारने, सिरजना और पीढा धोने का काम रात भर चलता है।

      मंगई के तट पर नहान उतरा है। जिनको माता मईया की पूजा करनी है, जिन्हें कडाही पर बैठना है, वे नहा रही हैं। पहले दौर में सोझारू औरतों ने और लडकियों ने स्नान किया। जब रात भीन गयी और राह-घाट सूनी हो गयी, तब लजारू बहुरीया लोग निकलीं।

     अब वह बात कहां रही। नहान की बेला में अबकी बार सियार फेंकरते रहे। फटे दरारों की शतरंजी पर भूत-प्रेत बैठकर सत्यानाशी खेल खेलते रहे। मनुष्य का स्वभाव माहुर हो गया है, देवता उन्हें दंड दें, लेकिन उसके लिये जीव जंतुओं और मवेशियों को क्यों दंड दिया जाय। अब भैंसे कहां घंटों पानी में बैठकर बोह लेंगी। अब दंवरी से खुलकर आये बैल कहां पानी पियेंगे। कहां उनकी गरमाई हुई अददी खुरों को जुडवाने के लिये पाक में हेलाया जाएगा। खेह से भठी हुई उनकी देह कहां धोयी जाएगी। दिन में चरने वाले जानवर और रात-बिरात दूर-दूर से टोह लगाते आये सियार-हिरन आदि अब कहां पानी पियेंगे। कुछ समझ नहीं आ रहा।

     जेठ-बैसाख में जिनकी शादी होगी, उनका कक्कन कहां छूटेगा । मौर कहां पर सिरवाया जाएगा। कहां पर
खडी होकर औरतें गाएंगी -

अंगने में बहे दरिअइया
हमारे जान नौंसे नहा लो
कोठे उपर दुल्हा मौरी संवारे,
सेहरा संवारे ओकर मईया
हमारे जान नौंसे नहा लो…….

      अब हालत यह है कि खेतों के लिये दौडो, पंपिंग सेट जुटाओ,ट्यूबवेल धंसाओ….मगर मंगई के लिये क्या करोगे। ऐसे लुरगिर कमासुत लोग जनमें कि आपस में वैर, विद्वेष, रगरा-झगरा से फुरसत नहीं । बरमाग्नि उठी कि आकाश धधक उठा। दुख दाह से नदी का करेजा दरक गया है।

     मंगई का करेजा तो देर से फटा है, क्या गांव का करेजा बहुत पहले नहीं फट गया। चुनाव आया एक गांव के कई गांव हो गये। सुख शांति में आग लग गई है। गोल-गिरोह और पार्टीयां बन गई हैं। राजनीतिक पार्टीयों ने वह सत्यानाशी बीज बोया कि गाँव गाँव दरकते चले गये। जूझ गये एक दूसरे से लोग, खून के प्यासे, स्वार्थी-लोलुप और एक विचित्र किस्म के कामकाजी हो गये। उनका सारा ध्यान सरकार पर और अँखमुद्दी लूट पर लग गया। यह लूट उसी प्रकार सत्य रही जिस प्रकार सूरज। मंगई का पानी इसी में सूख गया। कितना सहे। नदी सत्त से बहती है। आसमान सत्त से बरसता है। आदमी का सत्त चला गया। जो किसी युग में नहीं हुआ वह इस युग में हो गया।

      मंगई का पानी था तो आधा पेट खाकर भी गांव में तरी थी। वह तरी पुरानी थी, परंपरागत और सांसकृतिक थी। सो इस कनपटी पर विद्रोही काल ने ऐस थप्पड मारा है कि चटक गयी है। अब इसका खाली पेट जनता के खाली पेट का प्रतीक हो गया है। चहल  पहल माटी हो गयी है। माटी दरार हो गई और इस तिकोनी चौकोनी कटी दरारों के बीच की बरफी पर गदहे घूम रहे हैं, बकरीयां उछल-कूद कर रही हैं। दरारों में मुंह चिआरकर सीपियां पडी हैं, जिनमें से अपना खाना ढूँढते कौए आतुर हैं।

      लोग जूता फटकारते आ-जा रहे हैं। बैलगाडियां बे रोकटोक पार हो जा रही हैं। अरार पर से उतरने वाले संस्कारवश एक बार घूरकर देखते हैं कि कहीं जूता तो नहीं उतारना है। लेकिन अब जूता क्यों उतारा जाय, मंगई तो सूख गई है।

*********************

      आजादी के समय जो मंगई कल कल बह रही थी, विवेकी राय जी के अनुसार उनके जीवन काल में ही वह नदी सूख गई है। इससे बडा अचंभा क्या होगा। आज देश गणतंत्र दिवस भले ही मना रहा हो, लेकिन लगता है मंगई नदी और देश की हालत एक सी है। दादा अब भी फच्च फच्च धोती फटकारते हैं लेकिन उनकी धोती अब लॉड्री में धोकर आती है। उस पर दाग ही दाग हैं। कहीं नारायण दत्त तिवारी नुमा तो कहीं कोडा के फोडे का मवाद लगा है। कहीं पर प्रांत और भाषा के नाम पर कौए अपना खाद्य पदार्थ सीपियों में ढूँढ रहे हैं तो कहीं राज्यों के विभाजन के नाम देश की सूख चुकी माटी की फटी दरारों वाली बरफी पर देश के गदहे और बकरीयां उछल कूद मचाये हुए हैं। बंसवारी को काट कर टॉवर और कॉम्पलेक्स बनाये तो बनाये गये हैं लेकिन मंगई का वह आनंद कहीं बिला गया है, गुम हो गया है। देश और मगई एक ही अवस्था से गुजर रहे हैं। लोग मंगई के लिये जूता तो अब भी उतारते हैं पर उसे पार करने के लिये नहीं, बल्कि मंगई के प्रति श्रद्धा जताने में कौन पीछे रह गया है उस पर जूता फेंकने के लिये, आपसी सिर फुटौवल के लिये। न जाने यह जूता उतरौवल कब तक चलेगा। देश और मंगई की हालत एक सी हो गई है।



-  पिछले साल आज ही के दिन पब्लिश की गई थी यह  पोस्ट....स्थितियां आज भी वही हैं.... उम्मीद है आगे भी कुछ काल ऐसे ही चलता रहेगा.


ये जो है न....सो कभी था....अब भी है......है  न......




- सतीश पंचम


स्थान - वही, जिसे अंग्रेजों ने कभी दहेज के रूप में दे दिया था।


समय - वही, जब माउंटबेटन सत्ता हस्तांतरण के मुद्दे पर बुलाई गई मीटिंग में चाय पी रहे हों और नेहरू उनसे कहें - हुजूर, ये बाघ-बकरी चाय है..... बांट-बखरा तनिक ढंग से करिएगा :)

13 comments:

Vivek Rastogi said...

हाय मंगई और हमारा गणतंत्र...

लगता है वाघ बकरी वालों ने ये पोस्ट स्पॉन्सर की है :)

Rahul Singh said...

नदी की सांस्‍कृतिक पारस्थितिकी का सुंदर चित्र.

प्रवीण पाण्डेय said...

पहले था काम से अधिक कचहरी, अब है या तो काम या कचहरी।

rashmi ravija said...

मंगई नदी और देश का हाल एक सा ही हो गया है...
और सालो साल कुछ नहीं बदल रहा...इस साल भी बिलकुल सामयिक है पोस्ट.

अनूप शुक्ल said...

लगता है मंगई नदी और देश की हालत एक सी है।
क्या बात है। नदी गायब अब क्या देश भी होगा?

Arvind Mishra said...

मंगई ही नहीं लोगों का तक का पानी उतर चुका है -इस गणतंत्र दिवस ने यही दिखा दिया है !

मनोज कुमार said...

@ लडकियां घर के सारे बर्तन-भांडे कपार पर लादकर लातीं और रच-रचकर माँजती। उनका तेलउंस करिखा पानी में तैरता रहता। काम से अधिक कचहरी । छन भर का काम, पहर-भर में।
आहाहाहा मन एक दम से महो-महो हो गया। का दिरिस पकरे हैं। एकदम्मे से गांवे में पहुंचा दिए। एतना पर रुक कर मन का उदगार रोकिए नहीं पाए इसलिए पहिला काम त करिए लेते हैं बाकी का बाद में पढा जाएगा।

मनोज कुमार said...

भाई जी हम कुच्छो नहीं बोलेंगे। ऊप्पर में जो गंवाई दिरिस का आनंद उठा रहे थी, नीचे आते-आते उठाकर पटक दिए हैं और हम चारो खाने चित्त। बस हमको तो माणिक वर्मा का दू गो लाइन इयाद आ गया ... आपसे शेयर कर लेते हैं ...

चिथड़े चिथड़े लिबास बाक़ी है
और कितना विकास बाक़ी है।
हमको स्वामी का बोध कैसे हो
अपने देहों में दास बाक़ी है।
 माणिक वर्मा

Mithilesh dubey said...

भईया आपके पोस्टवां में गांव की महक बहुत तेज आती है, और हा हम भी देखे हई ई पंचायत वाली बात, तऊने पर कहेती की बहुत काम रहा । बढ़िया लिखे है भईया, हमेशा की तरह ।

sanjay jha said...

ye leo ..... panchm-amrit.....din ma
tin baar .... aur pahunch ja-o 'wahin' jahan post lekhak le jana chahat hain.....ekdum---rapchikatmak


parnam.

Meenu Khare said...

बहुत अच्छा ग्राम्य चित्रण. सामयिक पोस्ट के लिए बधाई.

रंजना said...

नहान की बेला में अबकी बार सियार फेंकरते रहे। फटे दरारों की शतरंजी पर भूत-प्रेत बैठकर सत्यानाशी खेल खेलते रहे। मनुष्य का स्वभाव माहुर हो गया है, देवता उन्हें दंड दें, लेकिन उसके लिये जीव जंतुओं और मवेशियों को क्यों दंड दिया जाय। अब भैंसे कहां घंटों पानी में बैठकर बोह लेंगी। अब दंवरी से खुलकर आये बैल कहां पानी पियेंगे। कहां उनकी गरमाई हुई अददी खुरों को जुडवाने के लिये पाक में हेलाया जाएगा। खेह से भठी हुई उनकी देह कहां धोयी जाएगी। दिन में चरने वाले जानवर और रात-बिरात दूर-दूर से टोह लगाते आये सियार-हिरन आदि अब कहां पानी पियेंगे। कुछ समझ नहीं आ रहा।
..........

नदी सत्त से बहती है। आसमान सत्त से बरसता है। आदमी का सत्त चला गया। जो किसी युग में नहीं हुआ वह इस युग में हो गया।
....

लोरे झोरे आँख से पढने में कितनी दिक्कत हुई, क्या बताएं....

रंजना said...

आपका ह्रदय से आभार....

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