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Sunday, January 23, 2011

खेंचातानी की गलबहियाँ


     प्रधानमंत्री कह रहे हैं तिरंगे पर राजनीति न करो.......उधर भाजपा कह रही है भला अपने देश में तिरंगा फहराने में कैसी राजनीति........इसे तुम राजनीति कहो तो यही सही लेकिन ....हम फहराएंगे तिरंगा.....लाल चौक पर.......हम फहराएंगे..........इन सबमें कौन सही है...... कौन गलत.........कुछ समझ नहीं आता.....एक को तिरंगे के फहराने में राजनीति दिखती है तो दूसरे को न फहराने में.....सोचता हूं कि कांग्रेस और भाजपा दोनों को दौड़ा दूं रेस के घोड़े की तरह.......दौड़ो.......जो पहले आये उसके मन की हो.....लेकिन यह डर्बी का सीज़न भी तो नहीं है भाई.....और फिर घुड़दौड़ के लिये और घोड़े आ गये तो क्या हो.....किस किस को संभाला जायगा......घोड़े की पीठ पर बैठने के लिये किसे राजी किया जायगा.....जनता को.........नहीं उसे क्यों तकलीफ देना....वैसे भी क्या कम तकलीफें हैं उसके पास.....तिरंगा ही तो फहराना है।

     इधर क्रिकेट में भारत हार गया....ढेर सारे तिरंगे खुद ब खुद लपेट उठे.......उधर जैतापुर में न्यूक्लियर प्रोजेक्ट का बवाल चल ही रहा है.......इलाहाबाद अलग सुलगने को तैयार बैठा है.....तिस पर काले झण्डों की बहार.....बताओ तिरंगा जी....आप किस ओर हो....न....न....ये मत कहना कि मैं किसी ओर नहीं हो पा रहा हूं..........कहीं न कहीं तो ठौर ढूँढना ही होगा......मादाम कामा की ओर मत ताको टुकुर टुकुर........उन्होंने तुम्हारे लिये नर्सरी का इंतजाम किया था जब तुम बहुत छोटे थे.......अब तो तुम बहुत बड़े हो गये हो.........गाँधी........नहीं वो भी नहीं......उनके पास और काम है.........तिरंगा फहराने के लिये नोटों पर से उन्हें हटाना उचित नहीं...... फिर अदालत.......कोर्ट.....कचहरी....मर मुकदिमा.....क्या अब ये सब भी होगा.....हाँ...तुम्हें तो आदत हो गई है.........कभी लोगों ने तुम्हारे लिये जान दी थी.......यूनियन जैक को एक झटके में उतार फेंका था .......अब न वो सीने रहे न वो दीवाने रहे....... .आज तुम खुद कटघरे में हो.....बताओ किस ओर हो.....राजनीति के या अराजनीति के.........वक्त लेना चाहोगे......ठीक है...........कोई बात नहीं....आओ....हम लोग मिल कर टीवी देखें.....वो देखो रवीश की रिपोर्ट चल रही है......गलीयों के भीतर कैसे चले जा रहा है जवान....एकदम सधे अंदाज मे ......वो देखो चूने के भीतर गरीबों के वाईट हाउस से परिचय करा रहा है .......... ....देखो....देखो.....वो रिक्शे वाले के पास भी जा रहा है....वही रिक्शेवाला जिसे देखकर होंडा सिटी वाला नाक भौं सिकोड़ता है...मुंह बिचकाते हुए कहता है.....पूअर गाईस......इन लोगों को शहर के बाहर करना मांगता....सब ट्रैफिक जाम येही लोगों की वजह से होता है.........होंडा सिटी......आओ तिरंगे प्यारे यहां देखें.....सब टीवी पर 'कभी कभी' चल रही है अमिताभ की............क्या गाना है....कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है ..........अरे ये सीन तो कश्मीर का लग रहा है...........पेड़ के नीचे बैठे अमिताभ लिख रहे हैं.....ज़िंदगी तेरी जुल्फों की नर्म छांव में गुजरने पाती तो शादाब हो भी सकती थी.......ये रंजो-गम की सियाही जो दिल पे छाये है तेरी नज़र की शुवाओं में खो भी सकती थीं......मगर ये हो न सका, और अब ये आलम है.....तू नहीं....तेरा ग़म नहीं.....तेरी जुस्तजू भी नहीं......बढ़िया लिखा है न.....अरे तुम तो उदास हो गये.......अरे......डोंट बी इमोशनल प्यारे......डिप्लोमेसी में इमोशनल होना कमज़ोरी है......यूँ गुमसुम न बैठो...... वरना लोग कहेंगे.......पक्ष और प्रतिपक्ष के खेंचातानी में आज तुम उदास हो......वही जिसके लिये कभी कहा गया था.....विजयी विश्व तिरंगा प्यारा.....झंडा उंचा रहे हमारा।

- सतीश पंचम

स्थान - कश्मीर से तकरीबन सौलह-सतरह सौ किलो मीटर दूर।

समय - वही, जब टीवी पर रवीश की रिपोर्ट चल रही हो और तभी एक कश्मीरी युवक रवीश के पास आकर कहे..... ओय आशिकां नुं दरश कराया करो.... जी कदी साडी गली पूल्ल के वी आया करो जी...... कदी साड्डी गली पुल्ल के वी आया करो।    


(हाल ही में तिरंगा यात्रा को लेकर चल रही राजनीतिक पार्टियों की गंदी सियासत से व्यथित मन द्वारा गढ़ा गया 'शब्द कोलाज')

12 comments:

देवेन्द्र पाण्डेय said...

वाह ! ऐसे फुर्र-फुर्र पोस्ट निकले तो एक दिन तिरंगा सफेद घर में ही फहरायेगा।

Rahul Singh said...

आकार ले लिया है शब्‍द कोलाज ने, रंग भी खूब उभरे हैं.

डॉ. मनोज मिश्र said...

क्या करियेगा लोग कहेंगे नहीं तो भला चर्चा में कैसे रहेंगे.

सोमेश सक्सेना said...

अरे पंचम जी आप तो अपना बारात संस्मरण पूरा कीजिए, कहाँ इन चक्करों में फँस गए। ये सब तो राजनैतिक चोचलेबाजी है। :)

Arvind Mishra said...

वही नस दबाओ जहाँ ज्यादा दुखती है -फिरकापरस्तों की ऐसी की तैसी ! सालों की नस उभर गयी है ! अब बार बार बार दबेगी और वही नहीं अब टेंटुआ भी दबेगा -देखते रहिये !

नीरज जाट जी said...

तिरंगे पर भी राजनीति चल रही है।
भला अपने देश में तिरंगा फहराने में क्या बुराई??

sanjay jha said...

kahan chikoti kat li........ye mote khal ke hai ..... inka lal nahi honewala ...........

pranam.

मनोज कुमार said...

• इस व्यंग्यात्मक आलेख में आपकी मोहक शैली का ज़बरदस्‍त आकर्षण है ... साथ ही आपका लेखन समकालीन राजनीतिक परिदृश्‍य के उन सवालों से रू-ब-रूबरू कराता है, जो लंबे समय से हमारी राजनीति के केंद्र में रहा है, खास तौर से सांप्रदायिकता और अब तो इसका यह नया रूप ... तिरंगे की राजनीति ... राजनीति के तिरंगे को कितना ऊंचा ले जाएगा आने वाला समय ही बताएगा।

प्रवीण पाण्डेय said...

दाँय मची है, वह भी खाँटी,
जल जायेगी अब तो घाटी।

प्रेम सरोवर said...

यह तो सियासी मामला है -तिरंगा कोई भी कहीं भी फहराए फहरना चाहिए। अति सुंदर।

rashmi ravija said...

व्यथित मन से लिखा,शब्द कोलाज़...मन पर गहरा प्रभाव छोड़ गया.

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

विजयी विश्व तिरंगा प्यारा.....

ये लाइने पढ़ कर गांव के केवला की याद आती है। कुछ पेंच ढीले थे। सवेरे सवेरे निकल कर गांव भर में गाते थे - झण्डा बूंचा रहे हमारा।

अब झण्डा बूंचा होने जैसा ही समय लगता है। :(

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