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Saturday, January 22, 2011

चेकायन......वासन्ती


         कुछ अनुभव रोचक होते हैं। अपने आप में अलग सी बानगी लिये हुए।  इस बार गाँव जाने पर कुछ कुछ वैसा ही अनुभव हुआ। एक विवाह समारोह के दौरान जब बारात घर से निकली तो  ढेर सारी गाड़ियों का काफिला चल पड़ा। आगे पीछे धूल उड़ाती गाड़ियां जब शहर की ओर बढ़ ही रहीं थी कि मोबाइल पर कॉल आई - फलां रूट पर चेकिंग चल रही है जिनके पास गाड़ी के पेपर न हों वो बायपास से गाड़ियां निकालें।

  मैं कुछ समझ पाता कि धड़ाधड़ साथ बैठे लोगों ने अपने साथियों को फोन घुमाना शुरू कर दिया और धीरे धीरे सब शांत। पूछने पर पता चला कि गाँव देहात में सब लोग गाड़ी का कागज लेकर नहीं चलते। यहां कौन सा हमेशा ट्रैफिक हवलदार रहता है कि गँवई सड़क पर खड़ा मिले। जब शहर की ओर निकलना होता है तो पेपर साथ ले लिया जाता है वरना जै राम जी की।

     आज चेकिंग इसलिये चल रही है क्योंकि लगन तेज है, विवाह आदि का दिन है। ढेर सारी गाड़ियों का काफिला शहर के रस्ते गुजरेगा।  किसी के पास पेपर होगा किसी के पास नहीं और  इसी के चलते पुलिस वालों को थोड़ा बहुत खाने कमाने का मौका मिल जायगा। चेकिंग तो महज बहाना है।  मैं मन ही मन अपने इन साथियों की चतुराई पर मुग्ध था। एक तरह का यूज टू वाला माहौल लगा। लोगों को इन सब की आदत पड़ गई है।

 अभी यह सब चल ही रहा था कि फिर फोन आया नचनियों के लिये ठेके पर से थोड़ा माल मसाला लेना है। गाड़ी आगे रोककर ले लेना नहीं तो ससुरे ढंग से नहीं नाचेंगे। मैंने फिर प्रश्नवाचक निगाहों से एक को देखा तो वो मुस्कराते हुए बोला चिंता मत करो समझा दूंगा। एक ने बताया कि जब गाँवों में नाच गाने और बैंड बाजे वालों का सट्टा होता है तो साथ ही एक सादे कागज पर वो लिख देते हैं कि इतने हजार का मेहनताना और पंद्रह - बीस बोतल अलग से।  यानि नचनियों के लिये शराब आदि का भी इंतजाम करना पड़ेगा। मैं मन ही मन इस गँवई डांस प्रोग्राम के कांट्रेक्ट पेपर पर मुग्ध हो रहा था कि कैसी तो अलग किस्म की अर्थव्यवस्था चलती है यहां। न वैट का चक्कर न रिटर्न फिटर्न का तामा झामा। जो है सो सादे कागजों पर ।

  अब गाड़ी आगे ही आगे बढ़ी जा रही थी और हमारी निगाहें उस बोर्ड की ओर टंगी थी जहां पर कि लिखा होता है

 जानेवाले ध्यान किधर है
 मधुशाला इधर है

  देखते देखते एक जगह वह दुकान दिख गई जिस पर कि लिखा था - सरकारी लायसेंस प्राप्त मान्य शराब की दुकान।

 गाडी़ को साइड में लगाया गया। उतर कर हाथ पैर सीधे करते हुए शराब की दुकान की ओर बढ चला। साथ में औऱ लोग भी थे। अभी कुछ दूर था कि शराब का ऐसा भभका छूटा कि आगे जाने की हिम्मत नहीं हुई। लेकिन शराब लेना तो था ही। मन मारकर आगे बढ़ा। काउंटर पर बैठे शख्स को देखकर लगा कि जरूर ये केस्टो मुखर्जी का अवतार है। रह रहकर हिचकी ले रहा था।

  मुझे कभी इस तरह से शराब वगैरह लेने का अनुभव नहीं था। न ही कभी लेना चाहूं ,  लेकिन  अब जो सामने था सो था। एक ने पूछा कितने वाला है।

 जवाब मिला -  कितने वाला लोगे....हिक्

 अब दूसरे ने कहा - वही दे दो संतरा मुसम्मी टाइप।

सादा वाला या मसाला वाला.....हिक्

मसाला दे दो।

ये लो ....हिक्.....और चाहिये.... हिक्......

 हां यार दे दो....। पूरा थैला भर दो.....ससुरे पियें जितना पीना है। नाचना चाहिये बस्।

 काउंटर पर बैठे  उस शख्स का  इस तरह हिचकी लेते हुए विशेष अंदाज में पूछना पछोरना मुझे उस गाने की
याद दिला रहा था जिसके शब्द थे

थाने मे बइठे दरोगा जी लें हिचकी
लगता है साहिब ने मारी है चुसकी

    उधर थैला भर कर शराब खरीदने के बाद वापस लौटे तो मैंने राहत की सांस ली। वहां खड़े खड़े मेरा सिर चकरा रहा था, पता नहीं पीते कैसे हैं इस तरह की शराब।  यूं तो मैंने भी एक दो बार बीयर का सेवन किया है,  लेकिन उसे चखना ही कहा जायगा, पीना नहीं। फिर ये तो देसी था। जो पियें वो जानें।
 
   गाड़ी में आकर वापस बैठा और मन ही मन सोचने लगा कि यार आजकल शायद बिना पिये पिलाये कोई शादी ब्याह नहीं हो पाता लगता है। उधर बारात की दूसरी गाड़ी दिखी जिसमें कि स्कॉच और विस्की का कैरट लादा जा रहा था। बगल में ही बोर्ड दिखा जिसपर लिखा था - यहां पर मिलती है महाठंडी बियर। संभवत : चिल्ड बियर का ही तर्जुमा है 'महाठंड' ।

 उधर अगले दिन मुझे जमीन पर गिरी हुई उसी तरह की एक खाली बोतल दिखी जिसे कि शराब के ठेके वाले के यहां से लिया गया था। खाली बोतल और उस पर लगे लेबल को देख मन हुआ कि देखूं तो क्या लिखा है इसपर। पास स्थित कैमरे से उसकी तस्वीर उतारी। तस्वीर उतारने के दौरान ही ध्यान गया कि  बोतल पर चिपका  लेबल डबल चिपकाया लगता है । एक के उपर एक ।

    लेबल पर मैन्युफैक्चरिंग डेट वगैरह लिखी थी। शंका हुई कि अंदर वाले लेबल पर कुछ और डेट वगैरह न लिखी गई हो। लेकिन बोतल को हाथ से उठाने की हिम्मत न हुई। एक तो वैसे भी गाँव के बच्चे चेकाबाजी किये रहते हैं। यहां चेकाबाजी से तात्पर्य शराब आदि की खाली बोतलों में बच्चे मूत्र विसर्जन कर उसे पेड़ से लटका देते है या पेड़ की किसी डाली पर रख देते हैं औऱ छोटे छोटे कंकड़ पत्थरों से उस बोतल पर निशाना साधते हैं। ये अपने आप में गँवई बच्चों की अलग किस्म की मौज होती है, फ्री फंड का खेल होता है जिसका अंदाजा शहर के लोग शायद न लगा पायें। शहर मे तो एस्सेल वर्ल्ड और वो तमाम मनोरंजन के साधन होते हैं। लेकिन गाँवों में इस तरह के क्रियेटिव फिरी फण्ड वाले खेल बच्चे खुद से खोज ओज कर  खेलते हैं। वहां उन्हें इसके लिये पैसा नहीं देना पड़ता।

*******    


जारी.....




- सतीश पंचम


स्थान - वही, जहां पर चेकायन हेतु Bowling Game खेला जाता है। 


समय - वही, जब गाँव में बच्चों द्वारा बोतल पेड़ से लटका कर चेकायन खेला जा रहा हो और तभी एक बच्चा  कहे - अरे वो देख जिसकी बोतल थी वो रामरजवा इधर ही आ रहा है   :)

 (ग्राम्य सीरीज़ चालू आहे.........)

15 comments:

PD said...

अरिस्स!! क्या लिखे हैं मालिक.. गर्दा उड़ा दिए.. :)

सोमेश सक्सेना said...

एकदम राप्चिक पोस्ट है सतीश जी मजा आ गया।
काफी ज्ञानवर्धन भी हुआ। चेकाबाजी जैसे नए शब्द भी सीखने को मिले। :)
अगला भाग जल्दी लाएँ।

प्रवीण पाण्डेय said...

जय हो,
गंगा जमुना का गाना याद आ गया,

ऐ बसन्ती पवन पागल, ना जा रे ना जा रोको कोई..

sanjay jha said...

ye chekabaji chalate rahen.....

pranam.

rashmi ravija said...

चिल्ड बियर का ही तर्जुमा है 'महाठंड' ।

ये तो बहुत ही रोचक रहा ...:)

आप तो एकदम ब्लॉगजगत के "विवेकी राय" बनते जा रहे हैं...या बन ही गए हैं...बहुत सारी बातें पता चल रही हैं...बचपन में ही छूट गए गाँवों की.

Arvind Mishra said...

चौचक! बसन्ती से याद आया बसंत करीब है ....एकाध घूँट लेना था न रचना में यथार्थ के पुट के लिए !

Satish Chandra Satyarthi said...

खूब रही :) :)
मजा आया पढके...

Vivek Rastogi said...

महाठंडी भी बेचने का ही एक तरीका है, बीयर ठंडी से ज्यादा ठंडी क्या होगी..

गजब ढ़ा दिये हैं... वासन्ती और मसाला की याद दिलाके...

Kajal Kumar said...

गांव के एस्सेल वर्ल्ड की यात्रा ...वाह :)
(इन्हीं एस्सेल वर्ल्डों की परिपाटी में मैं बहुत कुछ जोड़ सकता हूं पर डर के माने यहीं से वापस लौट रहा हूं कि पहले ही हिन्दी ब्लागिंग पर गलियाने के आरोपों के चलते चिल्ल-पौं हो के ही हटी है...काहे फिर किन्हीं लोगों को उंगली उठाने का मौक़ा मैं दूं...)

डॉ. मनोज मिश्र said...

जानेवाले ध्यान किधर है
मधुशाला इधर है..
----चकाचक है .

Rahul Singh said...

उम्‍मीद हो रही है कि अब जमेगा रंग.

मनोज कुमार said...

आपका यह संस्मरण सुनकर अपने एक बार गांव के प्रवास की याद हो आई। सपरिवार गए थे गांव और बच्चों को पेठिया (गांव का हाट) ले गए शौक से घुमाने कि चलो तुम्हें हम झिल्ली-मुड़्ही और कचड़ी खिलाते हैं गांव के पेठिया का। तो उस बाज़ार में पेप्सी बिक रहा था, लेज़ चिप्प्स और न जाने क्या-क्या?
और सबसे दुख और निराशा यह हुई कि विदेशी अंग्रेज़ी शराब की दुकान बड़े साइन बोर्ड के साथ चौक पर बा-इज़्ज़त विराज़मान थी, उस गांव में जहां, वृक्षों से बने नशीले पदार्थ भी छुप-छुपा कर बेचे-पिए जाते थे।
तब मैंने एक कविता लिखी थी उसका एक पद समर्पित है
सिकुड़ी आँखों झुककर
झांके झींगुर दास,
पेठिये के शोरगुल पर
मण्डी का उपहास।
कब्बार के कोने उपेक्षित
दादाजी की खड़ाउँ।
क्या करता छू आया
बस बड़ों के पांव।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

गाँव-गाँव ना रहा, अब वो भाव ना रहा।
बसंती की धार में महिया का ताव ना रहा।

महिया- गन्ने के रस से गुड़ बनाने के क्रम में प्राप्त गर्मागर्म महिया जो कोल्हुआड़ पर मिलता था।

manu said...

:)

manu said...

हर चीज के देसी कहे जाने में एक गर्व होता है..

देसी घी..देसी अंडे..देसी टमाटर..देसी चना..देसी कपड़ा..देसी खरबूजा...देसी मटर..देसी अरवी...

और न जाने क्या क्या देसी...

पर इधर..

दारू के साथ अगर ये देसी शब्द आ जुड़े कहीं से...तो मुंह छुपाने जैसी हालत हो जाती है...
कैसे कहें..
क्या कहें...

:)

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