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Wednesday, January 19, 2011

वही ओनईस सौ चउंसठ...... वही दुई हजार गियारह

       हाल ही में  मोहन राकेश की डायरी पढ़ रहा था। वही डायरी जिसके लिंक को सिद्धार्थ जी ने मोहन राकेश से संबंधित मेरी एक पोस्ट में दिया था।  कई दिलचस्प बातें पढ़ने को मिलीं। जालंधर में मोहन राकेश के बिताये दिन, उनके अध्यापकीय अनुभव, इलाहाबाद के साहित्यिक माहौल के बीच साहित्यकारों की आपसी गलबहियां,  उनके बीच स्टेशन पर एक दूसरे को विदा करते समय की बातें, कौन कहां दिख गया, कब किसको पैसे की तंगी हो गई, निजी जीवन के कुछ तल्ख लम्हे सभी को बहुत ही महीन ढंग  से मोहन राकेश ने उकेरा है।

      साहित्यिक बातों के अलावा कई ऐसी रोजमर्रा की बातें भी दर्ज हैं उस डायरी में जिन्हें पढ़ने पर लगता है कि ये तो अभी हाल फिलहाल की हमारे आसपास किसी के द्वारा कही गई बातें हैं। वही तल्खी, वही देख लेने की फितरत, राजनीतिक बहसबाजी......जबकि ये बातें आज नहीं,  तकरीबन पचास साल पहले की लिखी हुई हैं।

 एक बानगी देखिये कि,  मोहन राकेश अपनी डायरी में दिनांक 16-8-64 के दिन लिखते हैं कि -

टी-हाउस।

मेज़ के इर्द-गिर्द चार आदमी। चौधरी, कश्यप और दो अपरिचित। अपरिचितों में से एक आँखें आधी-आधी भींचता हुआ कह रहा है,...‘बेचकर तो दिखाएँ एक गाड़ी भी। एक दिन दो गाड़ी अनाज मँगवा लें और बेचकर दिखाएँ। मैंने कहा नन्दाजी से कि भाई हम तो हैं ही ऐसे—हमारा तो काम ही है हेरफेर करना। चोरी-चकारी हम नहीं कर सकते, डाका हम नहीं डाल सकते, किसी औरत पर ज़ोर-ज़बर्दस्ती करने का हौसला हममें नहीं—हम लोग बनिए की जात, कलम की हेरफेर ही तो कर सकते हैं। तुम लाओ अनाज...हमसे एक आना कम में बेचो, तो ग्राहक तुमसे ही खरीदेगा। उसे जो सस्ता
देगा, उसी से तो वह लेगा। आओ तुम मार्केट में हमारे कम्पीटीशन में। आते क्यों नहीं?



‘कीमत गिरेंगी—गिर सकती हैं—अगर तुम्हारे अपने आदमी करोड़ों के सौदे न कर रहे हों। तुमने कैरों को पकड़ा—वह तो छोटी-मोटी हेरफेर ही कर रहा था। सत्तर-अस्सी लाख की हेरफेर भी कोई चीज़ है और वह मारा गया अपने लडक़ों की गुंडागर्दी की वजह से। वरना तुम बिज्जू पटनायक को क्यों नहीं हाथ लगाते? उसे जिसने पचास करोड़ की हेरफेर की है? वह तो साफ कहता है कि पचास लाख खर्च करके मैं चीफ मिनिस्टर हो गया। प्राइम मिनिस्टर बनने में कितना लगेगा? ज्यादा से ज्यादा दो करोड़?


‘और कुम्भन दास (?) राजस्थान का। उसने गुड़ में पचास लाख बना लिया है और मूँछों पर हाथ फेरता बैठा है। गुंडागर्दी वह करता है, लोगों की लड़कियाँ वह उठवाता है, डाके वह डलवाता है, यहाँ तक कि चीफ मिनिस्टर के लडक़े को ही अगवा करवा दिया और तीन लाख वसूल करके वापस छोड़ा...राजस्थान की विधान सभा की चाबी उसके हाथ में है। जिसे चाहे बनाए, जिसे चाहे बिगाड़े—उसको तुम छू भी सकते हो? बनाने को कमेटियाँ तुम चाहे कितनी बना लो—स्टेटमेंट चाहे कितने दे दो—कीमतें क्या कमेटियाँ और स्टेटमेंटों से गिरती हैं? अनाज क्या काग़ज़ों और भाषणों से पैदा
होता है? हम तो कहते हैं कि हम रखते हैं अपने गोदामों में, बनिए हैं, इसलिए नफे पर बेचते हैं, तुम आओ भरे बाज़ार में बनिए बनकर और हमारे कम्पीटीशन में बेचो।




‘ये लोग चिल्लाते हैं को-आपरेटिव, को-आपरेटिव। यही साझेदारी की भावना है लोगों में जो को-आपरेटिव कामयाब होंगे? को-आपरेटिव बनते हैं दस दिन मुनाफा कमाने के लिए—उस वक़्त जब किसी चीज़ की किल्लत होती है। माल बाज़ार में आते ही को-आपरेटिव नदारद हो जाते हैं। यह है तुम्हारी को-आपरेटिव योजना। कि जो चीज़ प्राइवेट व्यापारी छ: रुपये क्विंटल ढोकर यहाँ से महाराष्ट्र पहुँचा सकते हैं, उसके लिए तुम किसी अपने गुरगे के को-आपरेटिव को ओबलाइज करने के लिए चौदह रुपये क्विंटल में ठेका दे देते हो?



‘यह मुल्क है जहाँ गन्दम और चावल तक लोगों को आसानी से मयस्सर नहीं, उस दिन एक अमरीकन कह रहा था कि चिकन को तो वे लोग रफ फूड समझते हैं। कहते हैं अंडा-मुर्गा
भी कोई खाने की चीज़ है? एक डबलरोटी के बराबर वहाँ एक मुर्गे की कीमत होती है। वे खाते हैं स्टीक जिसमें अच्छी गिज़ा की सभी खासियतें मिली रहती हैं, जो कि प्योर और मेडिकेटिड फूड होता है। वहाँ भी है को-आपरेटिव मगर किस काम के लिए? फसलों को कीड़े से, चिडिय़ों से बचाने के लिए। ज़रूरत हुई, तो हज़ारों मीलों में को-आपरेटिव से दवाइयाँ छिडक़वा लीं, बुलडोज़र मँगवाकर मीलों में जमी बर्फ तुड़वा ली कि वह पिघलकर सिंचाई के लिए पानी बन जाए। को-आपरेटिव की भी एक मोरेलिटी होती है। यहाँ है कोई भी मोरेलिटी तुम लोगों में—सिवाय इसके कि अगली
इलेक्शन के लिए जो दस-बीस-पचास लाख रुपया चाहिए, वह कैसे और किससे हासिल करो?’’


      मोहन राकेश की डायरी के इन अंशों को पढ़कर पता चलता है कि हमारे लेखकों, बुद्धिजिवियों के बीच उस वक्त की निजी बातचीत किस तरह की होती थी, उनके लेखन के लिये कच्चा मैटेरियल कहां से मिलता था, उनके सोचने समझने की दिशा किस ओर थी।

   अभी यहीं उपर लिखी इन पंक्तियों को ही देखिये कि, किस तरह बातें बढ़ती कीमतों पर चल रहीं थीं कि फिर वह राजनीतिक बहस में तब्दील होते हुए कोऑपरेटिव मूवमेंट की ओर मुड़ गयी। अचरज होता है कि 1964 में कही गई ये बातें 2011 में भी जस की तस अपने कहे को पत्थर की लकीर की तरह साबित करती हैं।  महसूस होता है कि 1964 से लेकर 2011 तक दुनिया चाहे जितनी भी बदल गई हो, पेट की भूख आज भी शाश्वत सत्य है और उसी के साथ सत्य है भ्रष्टाचार, महंगाई, जमाखोरी, जिसके कि हाल फिलहाल दूर होने की कहीं से भी सूरत नज़र नहीं आ रही।


- सतीश पंचम

स्थान -    बम्बई,    जिसके लिये मोहन राकेश अपनी डायरी में लिखते हैं कि -

बम्बई...?

बहुत उलझन होती है अपने से। सामने के आदमी का कुछ ऐसा नक्शा उतरता है दिमाग़ में कि दिमाग़ बिल्कुल उसी जैसा हो जाता है। दूसरा शराफत से बात करे, तो बहुत शरीफ़। बदमाशी से बात करे, तो बहुत बदमाश। हँसनेवाले के सामने हँसोड़। नकचढ़े के सामने नकचढ़ा। जैसे अपना तो कोई व्यक्तित्व ही नहीं। जैसे मैं आदमी नहीं, एक लेंस हूँ जिसमें सिर्फ़ दूसरों की आकृतियाँ देखी जा सकती हैं। कभी जब तीन-चार आदमी सामने होते हैं, तो डबल-ट्रिपल एक्सपोज़र होता है। अपनी हालत अच्छे-खासे मोंताज की हो जाती है।


समय - वही, जब चाय की दुकान में बैठा शख्स कहता है - बनाने को कमेटियाँ तुम चाहे कितनी बना लो—स्टेटमेंट चाहे कितने दे दो—कीमतें क्या कमेटियाँ और स्टेटमेंटों से गिरती हैं? अनाज क्या काग़ज़ों और भाषणों से पैदा होता है?

 और तभी चायवाला कहे - साब, चाय पी लिया तो खुरची खाली करो.....दूसरा गिराइक लोक को बैठना मांगता  :)

10 comments:

rashmi ravija said...

जिस दिन आपकी पोस्ट पर सिद्धार्थ जी द्वारा दिया लिंक मिला...उसी दिन खंगाल डाला सारा.
मोहन राकेश जी का लिखा...इतने दिनों बाद जो मिला था,पढने को..

डायरी पढ़ते तो सचमुच लगता है....हाल में ही घटा है सब...ज्यादा नहीं बदला कुछ.
पर डायरी में कई नाम के initials देखे....माजरा कुछ समझ नहीं आया...पर अच्छा ही है...हमलोग उनदिनों की गॉसिप नहीं जानते..वरना कई चेहरों की असलियत नज़र आ जाती.

Arvind Mishra said...

आश्चर्य है कहाँ बदला कुछ ? वैसी ही तो हैं दुरभिसंधियां और हालात

डॉ. मनोज मिश्र said...

मोहन जी नें सही चित्रण किया है.

Rahul Singh said...

कहीं एक संदर्भ आया था चीनी डायरी का, लगभग 2000 साल पुराना, जिसमें कहा गया था 'अब जमाना खराब आ गया है'.

प्रवीण पाण्डेय said...

न बदला कुछ, न बदलेगा,
रहो चुप, साँप डस लेगा।

sanjay jha said...

mohan rakesh ko padhwane ka sukriya..

आश्चर्य है कहाँ बदला कुछ ? वैसी ही तो हैं दुरभिसंधियां और हालात

ye hi sach hai.....

pranam.

सोमेश सक्सेना said...

बढ़िया चीज़ पढ़ायी आपने।
धन्यवाद। :)

ManPreet Kaur said...

bouth he aache shabad likhe hai apne ji...

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Poorviya said...

dunia gol hai
jai baba banaras---

रंजना said...

कुछ नहीं badla और न कुछ बदलने की कोई सम्भावना है...आशा रखनी भी नहीं चाहिए..क्योंकि क्या होगा रखकर...केवल और केवल दुःख !!!!

आभार आपका...अभी तक पढी नहीं,पढ़ती हूँ इस किताब को...

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