सफेद घर में आपका स्वागत है।

Monday, January 17, 2011

अरे, तुम भी ?

      शायद आप सबने दुष्यंत कुमार की इस कविता मत कहो आकाश में ..... पहले भी पढ़ा हो। लेकिन मुझे महसूस हो रहा है कि आज इसे सफ़ेद घर पर प्रस्तुत करना जरूरी है।  अभी जो हाल ही में बमचक मची, छीछालेदर हुई चाहे वह मानसिक रूप से हो, वैचारिक स्तर पर हो या किसी मतभिन्नता की वजह से, यह कविता अपने आप में वह बात रखती है जिसे मेरा मन कहना चाहता है। जिसे मैं दिली तौर पर महसूस कर रहा हूं। 

    क्योंकि मुझे लग रहा है कि शायद नरम झूठ सुनने की इतनी आदत पड़ गई है कि कठोर सच सुनते ही आश्चर्य व्यक्त किया जाता है कि -  अरे, तुम भी  ? 

    सो मैं अपनी ओर से और ज्यादा कुछ नहीं कहूंगा, कोई स्पष्टीकरण नहीं, कोई मत-विमत नहीं.....सिर्फ और सिर्फ दुष्यंत  -   


मत कहो आकाश में कोहरा घना है।
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है ।

सूर्य हमने भी नहीं देखा सुबह से ।
क्या करोगे सूर्य का,  क्या देखना है ।

इस सड़क पर इस कदर कीचड़ बिछी है ।
हर किसी का पाँव घुटनों तक सना है ।

पक्ष औ प्रतिपक्ष संसद में मुखर है ।
बात इतनी है कि कोई पुल बना है ।

रक्त वर्षों से नसों में खौलता है ।
आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है ।

हो गई हर घाट पर पूरी व्यवस्था।
शौक से डूबे जिसे भी डूबना है ।

दोस्तो अब मंच पर सुविधा नहीं है ।
आजकल नैपथ्य में संभावना है ।

- दुष्यंत कुमार


18 comments:

Minakshi Pant said...

हर सवाल का जवाब खुद देती रचना !

बहुत सुन्दर !

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

बहुत शानदार ढंग से आपने अपनी बात रख दी। दुष्यंत कुमार के शब्दों ने प्रभाव कई गुना बढ़ा दिया।

दुष्यंत जी की कुछ और रचनाएं यहाँ पढ़िए।
http://www.hindisamay.com/kavita/Dushyant%20kumar.htm#top

संजय भास्कर said...

हमेशा की तरह उम्दा रचना..बधाई.

सतीश पंचम said...

सिद्धार्थ जी,

आप जो भी लिंक देते हैं वो बेहद उपयोगी होते हैं।

बहुत बहुत धन्यवाद इस लिंक के लिये।

संजय भास्कर जी, ये रचना दुष्यंत कुमार की है मैने तो केवल इसे यहां प्रस्तुत किया है :)

: केवल राम : said...

दुष्यंत कुमार जी हिंदी गजल के सशक्त हस्ताक्षर थे .....उनका लेखन प्रयोगधर्मिता का लेखन था किसी बात को एक अलग और मौलिक अंदाज में काना उनके रचना कर्म कि विशेषता है ....आपका आभार सतीश पंचम जी ...दुष्यंत जी कि रचना को यहाँ प्रस्तुत करने के लिए ....शुक्रिया

"चलते -चलते" कभी http://mohallachalte-chalte.blogspot.com/
अपनी निगाह से "देख लीजिये "....स्वागत है आपका ....

ajit gupta said...

दुष्‍यंतजी की रचना पढ़वाने के लिए आभार।

Rahul Singh said...

आपने नेपथ्‍य में ही रखा है, खुद को.

rashmi ravija said...

रक्त वर्षों से नसों में खौलता है ।
आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है ।

एक शाश्वत सच...
आभार इस कविता को पढवाने का...हर बार पढ़कर जैसे इक आइना दिखा जाती है

सोमेश सक्सेना said...

आपने दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल के माध्यम से अपनी बात कही है तो मैं भी उन्ही के दो अलग अलग शेरों के माध्यम से अपनी टिप्पणी कर रहा हूँ-

मैं बहुत कुछ सोचता रहता हूँ पर कहता नहीं
बोलना भी है मना सच बोलना तो दरकिनार

और...

लोग कहते थे कि ये बात नहीं कहने की
तुमने कह दी है तो कहने की सज़ा लो यारो

pragya said...

"रक्त वर्षों से नसों में खौलता है
आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है"
गज़ब की पंक्ति है....

Arvind Mishra said...

लोग कहते थे कि ये बात नहीं कहने की
तुमने कह दी है तो कहने की सज़ा लो यारो

ravikumarswarnkar said...

दोस्तो अब मंच पर सुविधा नहीं है ।
आजकल नैपथ्य में संभावना है ।

दुष्यंत लाजवाब हैं...आभार...

डॉ. मनोज मिश्र said...

मत कहो आकाश में कोहरा घना है।
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है ।
इस सड़क पर इस कदर कीचड़ बिछी है ।
हर किसी का पाँव घुटनों तक सना है ।.............................???????

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत जगह, ऊपर नीचे वार करती हैं ये पंक्तियाँ।

संजय @ मो सम कौन ? said...

गुरू, कब बड़े होवोगे तुम? :))

मनोज कुमार said...

दुष्यंत जी की ग़ज़ल के माध्यम से आपने जो अपनी बात रखी वो बिल्कुल स्पष्ट है।
अब देखिए न ये दो शे’र
१. जो भी है सूरते हालात कहो, चुप न रहो,
रात अगर है तो उसे रात कहो, चुप न रहो।

२. बात अच्छी है, तो उसकी हर जगह चर्चा करो,
है बुरी तो दिल में रक्खो, फिर उसे अच्छा करो। --डा कुंवर बेचैन

sanjay jha said...

apka sawal bajriye...dushyant kumar..
achha hai....aur jabab manoj kumar ke
bajriye...kuwan baechain....bahut hi
achha laga.....

aur haan....manch pe kalakar hote hain....to nepathya me nirdeshak....

pranam.

रंजना said...

असंख्य हृदयों की भावना है यह...

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