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Friday, January 14, 2011

एक बानगी ऐसी भी...... खोइया .... पुलुई ...... रस ...

    मित्रो, पहले भी सफ़ेद घर पर आप सबने डॉ. विवेकी राय जी को पढ़ा है, सराहा है। ग्रामीण लेखन के इस अद्भुत चितेरे की ही कृति है 'सर्कस' जिसमें कि उनकी एक शानदार रचना है 'तू क्यों सोया' ?

   उद्यम और आलस्य के बीच पनपे भावों को एक खेत के आसपास के माहौल से परिचय कराता उनका यह लेख जीवन के कई बिंदुओं से साक्षात्कार कराता है। 

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        निस्संदेह वह एक कुत्ता था। आराम से सोया था। किकुरकर पैरों और मुँह को इस प्रकार समेट लिया था कि गोल पत्थर के भूरे पिंड की भाँति लक्षित होता था। ऐसा कसा हुआ मांसल शरीर होना प्रमाण था कि आवारा नहीं था; लेकिन सदगृहस्थ होकर इस प्रकार बेतुके सोया क्यों था ? आधा शरीर तो खोइया में ढक गया था। अभी और भी ढक सकता था, क्योंकि ईख पेरने का काम जारी था। बिजली का कोल्हू घड़र-घर-घड़र-घर कर चल रहा था। यह आवाज इतनी कर्कश और भारी थी कि आस-पास किसी का कुछ बोलना सुनाई नहीं पड़ रहा था। लोग इशारों से अथवा चिल्लाकर बात करते थे। कभी-कभी यह चिल्लाहट तीखी चीख बन जाती। आश्चर्य ! कुत्ते की नींद तब भी नहीं टूटती। वह एकदम हिल-डुल नहीं रहा था। कभी-कभी भ्रम होता, मर तो नहीं गया है ? क्यों जैसे कहीं से साँस चलने और शरीर के किसी मध्य भाग के आहिस्ता आहिस्ता उठने गिरने के लक्षण भी नहीं मिल रहे हैं ? किंतु कुत्ता मरा नहीं था। मरे की चमक और भाँति की होती है और जीते की चमक और भाँति की। गाँव को ही हम लोग झटके में कह देते हैं - 'गाँव मर गया' । किंतु यहाँ बैठकर अनुभव किया जा सकता है कि गाँव मरा नहीं है। वह पूर्णत: जीवित है। यांत्रिक सभ्यता की संपूर्ण ग्रामीण हलचलों और उपलब्धियों के बीच, उसके शोर-शराबे के बीच वह इस कुत्ते की भाँति अभावों की खोइया पर सिर्फ सो गया है।

  चलो मिठास तोड़ें :)
  
      बेशक यहाँ शोर बहुत है। एक तो मशीन दोहरा काम कर रही है। एक ओर ईख पेरने का 'करासर' चल रहा है, दूसरी ओर अलग फीते पर धान कूटने का 'हालर' चल रहा है। इधर मीठा-मीठा रस गिर रहा है, उधर कन-भूसी में भी अपनी चमक छोड़ता उजला-उजला मंसूरी धान का चावल। भीतर घर में आटा पीसने की चक्की है, कहीं एक फीता और लगा उसे भी एक साथ चालू कर दें तो और बने। तब कितनी हलचल बढ़ जाएगी ? अभी तो चावल और ईख का मोर्चा ही कितने हाथों के सहयोग से सँभल रहा है। कठिन है ईख का मोर्चा। खेत में खड़ी ईख गुड़ की भेली आसानी से नहीं बन जाती है। तैयार होने तक परेशानी की बात छोड़ो। अभी इसी वक्त कितने प्राणी जुटे हैं। एक आदमी ईख को मशीन में लगा रहा है और एक ला-लाकर उसके पास रख रहा है। यह ईख ढोनेवाला आदमी एक साधारण निकर और सेंडो बनियान पहने है और सहज भाव से जाड़े को चुनौती दे रहा है। इधर मोटे-मोटे ऊन, कोट औऱ स्वेटर में भी हालत खराब है। शीत-लहरी के तमाचे बीस पड़ रहे हैं। बीच में धरहरी करनेवाला घाम नाकाम साबित हो रहा है। पूस का घाम फूस जैसा। तिस पर भी कुहरे की धुंध है। सबकुछ ठंडा है। गरमी बस एक चीज की है, धुआँधार चल रहे कार्य की।
मेरे गाँव के ही एक बुजुर्ग

     देखा, अस्सी के लगभग बूढ़े मालिक साहब धीरे-धीरे ठेंगुरी टेकते घर से यहाँ नलकूप तक आ गए। जहाँ मशीन चल रही है वहाँ न जाकर वे सीधे खेत में पहुँचे। उनका बड़ा पोता ताबड़तोड़ गँड़ासी चला रहा है और कटी ईख को बाएँ हाथ से एक जगह इकट्ठा करता जा रहा है। यह पास के एख इंटर कॉलेज में अध्यापक है। घड़ी हाथ में है। जब-तब उसे देख लेता है। पौने नौ बजते ही वह काम छोड़कर नहा-खा साइकिल उठा भगेगा। उससे छोटे उसके दो भाई भी स्कूल का वक्त होने तक ईख छील रहे हैं। पत्ती अलग, गेंड़ा अलग। गेंड़ा अर्थात ऊपरवाली पुलुई का रसहीन भाग घर जाएगा और उत्तम कोटि के चारे का काम करेगा। पत्ती एकत्र होकर बोझ बना खेत में छोड़ दी जाएगी। जेठ-असाढ़ में सोने के भाव बिकेगी। कहता है बुढ़वा मालिक, जितने रूपए की खाद खेत में लगी वह पैसा तो ईख की पत्ती से आ जाएगा और रस पकनेवाले कड़ाहे की आग में क्या झोंकेंगे ? उसके लिए खोइया है। हाँ, बेकार खोइया और किस काम आएगी ? खोइया माने सीठी।

     खोइया, जिसका सारा रस निचुड़ गया, जो कठिन चक्रों में चँप, अति क्षीण, लुजलुज और अशक्त हो गई, जो ढीली-ढीली होकर बे-पहचान हो गई, भरे-भरे की तगड़ी जवान चमक छोड़ जो सफेद पड़ गई, जिसका पोर-पोर छितरा गया, जो बेकार सी, उपेक्षित और धूर-कतवार जैसी नीसठ ठठरी मात्र रह गई और जिसे मशीन के पिछवारे बारंबार हटा दिया जाता है, टाल दिया जाता है। वह छितरा जाए, पसर जाए, कुचल जाए, परवाह नहीं। परवाह ईख की होगी, खोइया को कौन पूछता है। खोइया तो पूरे माल का मल है, बेकार चीज, किसी काम की नहीं। बैठे उस पर कुत्ता ! या सोए भी।

      पर बूढ़े बाबा कहते हैं, खोइया चूल्हे में झोंक उस ईख के खर-पात को बचा लेंगे जो समय पर नोट बन जाएगा तो कुछ सोचना पड़ता है। अभी-अभी देखा, बूढ़ा बाबा सीधे खेत में जा ईख छीलने में जुट गया। ठीक वैसे ही जैसे बे-काम सी खोइया चूल्हे की आग बन जाती है। ईख की खोइया और परिवार का बूढ़ा दोनों में कितनी समानता है। किसान-जीवन के कसे कर्म चक्र में कोई चीज बेकार नहीं है। बेकार अगर है तो यह परंपरित किसान जमात। सामूहिक रूप से यह ऊपर उठ नहीं पाती है। इस जमात की खोइया आग नहीं बन पाती। समय की आँधी में सबकुछ उड़ता जाता है और किसान की जड़ता नहीं टूटती है। इन भाग्यवादी जड़ परंपराभोगियों के बीच जब कोई उद्यमी परिवार उकसता है और कहीं नलकूप जैसी जगह पर जीवन जगता है तो लोग तमाशा देखते हैं। कहते हैं, विधाता ने खूब दिया है।

   हाँ, खूब दिया है। एक अदद परिवार में जो अति बूढ़ा है, वह ईख छीलने के लिए खड़ा हो जाता है। एक उत्साहप्रद वातावरण बनता है। दो-चार ईख छीलकर बोझ-दो बोझ क्या, खेत के खेत ईख छील देने की शक्ति अपने पीछे खड़ी नवछटिया कतार में भर देता है। शक्ति जहाँ खुलकर उपयोगिता बनती जाती है, कितना अच्छा लगता है। यहाँ मशीन की शक्ति आदमी की शक्ति है, जाग्रत शक्ति है, स्वत:स्फूर्त शक्ति है, पूस के हाड़-सिकोड़ प्रभात में उपटी शक्ति है। गाँव के भीतर आलसी किसान जब कि कउड़ पर गप्पों के गुच्छे तोड़ रहे होंगे, यहाँ गाँव के बाहर मशीन के साथ मशीन बना एक पूरा परिवार पिछड़ेपन के बंजर को तोड़ रहा है। यहाँ कहाँ है आलस ? यहाँ जीवन जगा है।
     
    शायद कुछ समय के लिये आलस का प्रतिनिधि बनकर यह कुत्ता खोइया पर सोया है; लेकिन जहाँ निरालस-भाव इतना सक्रिय, सक्षम, चुस्त-दुरूस्त और सजग है, क्या आलस ठहर पाएगा ? यहाँ भी यही हुआ। मैं वह घटना भी लिख लूँ ।
 
तस्वीर कहां की है नहीं पता....बस खींच लिया था ....कुछ साल पहले

    मैंने बताया न, बूढ़े का एक पोता एकदम नंगे बदन ईख ढो रहा है। सो मास्टर साहब के स्कूल चले जाने के  बाद वह दोहरे काम में जुट गया। दोहरा क्यों, तेहरा काम कि खड़े होकर ईख छील रहा है; मशीन के पास ईख कम पड़ जाती है तो झपटकर छीली गई ईख को रख आता है और फिर जब-तब मशीन के पीछे खोइया, जो एक स्थान पर अधिक एकत्र हो जाती है तो उसे पैरों से झटका देकर टार देता है। ऐसे ही एक मौके पर जब वह खोइया टारने के लिए मशीन के पीछे गया तो कुत्ते से भिड़ंत हो गई।

    क्यों भिड़ंत हुई ? क्या लड़का ईर्ष्या कर रहा है कि मेरी तरह यह क्यों जाड़े को चुनौती दे खुले में खोइया पर सोया है ? लड़के में तो परिवेश के जीवंत कर्म-प्रवाह की गरमी है, कुत्ते में क्या है ? कुत्ते में ठीक उलटे आलस है। लड़का आलस को क्यों टिकने देगा ? मन में एक मौज आ गई। पहले उसने कुत्ते के ऊपर पड़ी खोइया को हटाया, फिर धब्ब से एक धमाका हाथ से लगाकर जगाया। देखा, जगता नहीं है तो उसे उलाट दिया। कुत्ता उलटकर नई जगह पर फिर से किकुरकर वैसे ही पड़ा रहा। वाह रे आलस !
लड़का मुसकरा उठा। मुझे लगा, कुत्ता कठुआ गया है। कहीं मर तो नहीं गया है ?
मेरे खेत.... 

      अब लड़के ने उसे दोनों हाथों से आगे-पीछे मजबूत पकड़ में जकड़ उठा लिया। अरे, यह क्या करेगा ? और देखते-देखते उसने उसे जैसे हवा में उछाल दिया। फिर क्या हुआ ? बिजली जैसी तेजी से कुत्ता उछाल से उछलकर कान फटफटा मटर के खेत की ओर भगा....भगा.....भगा एकदम सरपट । और कुछ दूर जाकर तगड़ी आवाज के साथ लाइन पर आ गया - भूँ.......भूँ......भौं......भौं.....

-  विवेकी राय

पुस्तकांश – 'तू क्यों सोया' ?
साभार प्रस्तुति 'सर्कस' (कहानी संग्रह)
प्रकाशक - ग्रंथ अकादमी, दरियागंज, नई दिल्ली 
मूल्य - 125 /-          



प्रस्तुति - सतीश पंचम

स्थान - वही, जहां पर गन्ना जूस के दुकानों की खोइया, पुलुई कचरे में फेंकी जाती है।

समय - 'ईख चूसने'  वाला ।

17 comments:

अनूप शुक्ल said...

विवेकी राय जी के ग्राम्य बिंब पढ़कर आनन्दित हुये। गप्प के गुच्छे -वाह! जय हो।

यह बहुत पुण्य़ का काम किये आप इसे पढ़वाकर!

Mithilesh dubey said...

और कुछ दूर जाकर तगड़ी आवाज के साथ लाइन पर आ गया - भूँ.......भूँ......भौं......भौं.....। अच्छा लगा पढ़ना , भईया फोटू बड़ा गजब का खिंचते हो आप ।

P S Bhakuni said...

gramin jivan ko bakhubi prastut krtia uprokt prastuti evm aapka sarthak pryas hetu abhaar ......
chitron ne post ko jo juban di hai uske liye chhayakaar (Aapko)badhai or shubhkaamnayen .......

jitendra said...

SARAS

राज भाटिय़ा said...

लोहड़ी, मकर संक्रान्ति पर हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई

sanjay jha said...

dhansu cha fansu.....

pranam

rashmi ravija said...

बहुत ही जीवंत विवरण है..सारे दृश्य साकार हो उठे ... सारी आवाजें तक सुनाई देने लगीं ..ऐसा लग रहा था हम भी उस ईख के खेत के पास ही कहीं खड़े हैं
आभार शेयर करने का.

सतीश पंचम said...

मिथिलेश जी,

फोटूओं के अच्छा होने में जितना कारण फोटोग्राफी और अच्छे कैमरे का होता है उससे भी बड़ा कारण सीनरी का होता है, सीन अच्छा हो, पहाड़ हों, नदी हों तो फोटुएं अच्छी ही आती हैं :)

फिर ये तो मेरे खेत थे जिनसे कि मेरा निजी लगाव है, जाहिर है तस्वीरें अच्छी खिंच उठी :) तस्वीरों के अच्छे होने में मेरी फोटोग्राफी का कम ही हाथ है :)

डॉ. मनोज मिश्र said...

बेहतरीन.

मो सम कौन ? said...

खेत खलिहान, गाँव जवार सब आंखों के सामने आ जाता है, राय जी को पढ़ते हैं तो।

प्रवीण पाण्डेय said...

विवेकी राय जी की पुस्तक को पूरा जीमना पड़ेगा।

गिरिजेश राव said...

ग़जब भाई! टुकड़ा टुकड़ा दुपहर याद आ गई। महान लोगों की नजर अलग ही होती है ;)

@
ऐसा कसा हुआ मांसल शरीर होना प्रमाण था कि आवारा नहीं था; लेकिन सदगृहस्थ होकर इस प्रकार बेतुके सोया क्यों था ?

&
मरे की चमक और भाँति की होती है और जीते की चमक और भाँति की। गाँव को ही हम लोग झटके में कह देते हैं - 'गाँव मर गया' । किंतु यहाँ बैठकर अनुभव किया जा सकता है कि गाँव मरा नहीं है। वह पूर्णत: जीवित है। यांत्रिक सभ्यता की संपूर्ण ग्रामीण हलचलों और उपलब्धियों के बीच, उसके शोर-शराबे के बीच वह इस कुत्ते की भाँति अभावों की खोइया पर सिर्फ सो गया है।
वारे गये!

अध्यापक किसान की बात पर मुस्कुरा उठा हूँ। छुट्टी के दिन पिताजी गन्ने की छिलाई में अपना जौहर दिखाते और मैं देखता रहता। बड़े होने पर भी मुझ 'बेसऊर' को अनुमति नहीं दी गई। गेंड़हरे मजा लेते, शहरी बाबू कहते और पिताजी को करीने से गन्ने सहेजते देख मैं आश्चर्य करता - यह वही आदमी है जो Lord Byron की कविता She Walks in Beauty पढ़ाते हुए पूरी कक्षा को मंत्रमुग्ध कर देता है! ...कट गए दोस्त! हमलोग जमीन से कट गए।

sanjay jha said...

@girjesh raw

bhaiji bayvhar se kut gaye....soch se
wahin hain .... lekin ek 'tis' bani rahti hai .... aap logon ko padhne se
vich-vich me dard kam ho jata hai....

pranam.

Harman said...

bahut hi badiya...
aise hi likhte rahiye..
Please visit my blog.

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PADMSINGH said...

खोइया, जिसका सारा रस निचुड़ गया, जो कठिन चक्रों में चँप, अति क्षीण, लुजलुज और अशक्त हो गई, जो ढीली-ढीली होकर बे-पहचान हो गई, भरे-भरे की तगड़ी जवान चमक छोड़ जो सफेद पड़ गई, जिसका पोर-पोर छितरा गया, जो बेकार सी, उपेक्षित और धूर-कतवार जैसी नीसठ ठठरी मात्र रह गई और जिसे मशीन के पिछवारे बारंबार हटा दिया जाता है, टाल दिया जाता है। वह छितरा जाए, पसर जाए, कुचल जाए, परवाह नहीं। परवाह ईख की होगी, खोइया को कौन पूछता है। खोइया तो पूरे माल का मल है, बेकार चीज, किसी काम की नहीं। बैठे उस पर कुत्ता ! या सोए भी।



पूरा कथानक जैसे बचपन के गाँव में ले गया... यद्यपि उस समय कोल्हू बिजली से नहीं बैलों से चला करते थे.. दिन दिन भर ऊख कर रस और खोइया का तपता(अलाव). ऊख के रस के साथ माठा मिला कर पिए हैं कि नहीं कभी.. और कराहे में गुड़ बन जाने के बाद पानी डाल कर चीपी और राब का आनंद लिए हैं कभी पंचम जी... जरूर लिए होंगे... आज इस पोस्ट को पढ़ कर जैसे नथुनों में ताज़े गुड़ की गंध भर गयी है... ताज़ा गरम गरम और खसखसा गुड़... :)

सतीश पंचम said...

@ ऊख के रस के साथ माठा मिला कर पिए हैं कि नहीं कभी.. और कराहे में गुड़ बन जाने के बाद पानी डाल कर चीपी और राब का आनंद लिए हैं कभी पंचम जी... जरूर लिए होंगे... आज इस पोस्ट को पढ़ कर जैसे नथुनों में ताज़े गुड़ की गंध भर गयी है..

पद्मजी क्या क्या याद दिला दिये भई.....अपन तो चिरई पकड़ते थे जब पानी छोड़ा जाता था कड़ाह में। सुनहरी यादें बहुत ज्यादा खेंच लेती हैं अपनी ओर।

gyanduttpandey said...

वाह! बहुत अपने कैती का!


अब यह तय हुआ कि एक दो ठो विवेकीराय की किताबें अनपढ़ी रखी हैं घर में शायद। अब तलाशूंगा और पढ़ूंगा!

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