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Saturday, January 8, 2011

एक गँवई हकीकत यह भी............सतीश पंचम


        हाल ही में खबर पढ़ने को मिली कि केरल में चुनी गई महिला प्रधानों के पतियों के लिये प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया ताकि उन्हें अपने पत्नी के द्वारा किये जाने वाले सामाजिक कार्यों में सहुलियत हो सके, उनकी पत्नियों को खुलकर लोगों से मिलने जुलने का मौका मिल सके। इसी के साथ यह भी कोशिश की गई कि जब महिलाएं किसी सामाजिक कार्यों के दौरान बाहर हों तो उनके पति कैसे बिहेव करें, कैसे इन सब बातों का निर्वाह करें। 

  मुझे यह खबर देखकर मेरे गाँव में हुए पंचायत चुनावों का दृश्य याद आ गया जिसमें कि तमाम पोस्टरों में महिला प्रत्याक्षी के साथ ही अलग से उनके पति का भी नाम चस्पा था। यह एक तरह से जमीनी हालात की हकीकत बयां कर रहा था कि महिला आरक्षण माने क्या होता है, उसका यथार्थ क्या है। 

 मैंने जितने भी पोस्टर महिला प्रत्याक्षियों के देखे थे सब में उनके पतियों के नाम अलग से लिख दिये गये थे। कोई पोस्टर बिना पति के नाम वाला नहीं दिखा। एक पोस्टर में महिला प्रत्याक्षी के बेटे का नाम लिखा गया था। यानि कुल मिलाकर पिता और बेटे के नाम से ही महिलाओ की लाकतांत्रिक गाड़ी सरक सकती है ऐसा परिदृश्य उपस्थित होता दिखा। 

 उधर संसद  में महिलाओं के लिये आरक्षण की मांग इतनी जोर शोर से की गई कि बहस मुबाहिसों से संसद के पलस्तर तक झड़ कर गिरने लगे लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात.......वैसे अरहर के भी अक्सर तीन पात ही होते हैं, बेचारा ढाक ही क्यों बदनाम है रब्ब जाणे :)  

   आप तो इन पोस्टरों का लुत्फ उठाइये,  साथ ही कुछ अन्य तस्वीरें उसी सामाजिक ताने बाने को बताते हुए  :)



आरक्षित सीटें.....बस नाम ही काफी है......




क्या मस्त चुनाव चिन्ह है...........घुड़सवार


चुनाव चिन्ह - पेड़......hmm..... फल बेटा न खाएगा तो कौन खाएगा

चुनाव चिन्ह....... कैंची ??

'पर कातर'.....अरे नहीं  ..... 'पर दुख कातर'   :)



एक हकीकत यह भी...... कब्जे में है सुगन  और  T-Shirt पर लिखा है  Boss 



पिया तुम जाओ प्रधानी करने.....मैं चली रोटी बनाने........


       - सतीश पंचम

23 comments:

सुशील बाकलीवाल said...

लालू के बगैर राबडी... कैसे सम्भव है ?

देवेन्द्र पाण्डेय said...

मस्त ब्लॉगिंग।

संजय कुमार चौरसिया said...

achchha lekh

सोमेश सक्सेना said...

बढ़िया कलेक्शन है सतीश जी।
तस्वीरों के माध्यम से सारी बात कह दी। :)

sanjay jha said...

soundhi mitti ki khoosboo deti hai ye
gramya siries .....

pranam.

अल्पना वर्मा said...

अद्भुत!
ज़मीनी हकीकत !
एक फिल्म आयी थी 'well done abba 'उसमें भी ऐसा कुछ दिखाया गया था.

प्रवीण पाण्डेय said...

पत्नी का हाथ बटाना तो हर पति का कर्तव्य है।

rashmi ravija said...

आप ऐसे ही दो-चार ट्रिप लगाते रहें,साल में.....और हमें गाँव की हलचल के बारे में बताते रहें...मय तस्वीरों के :)

महिलाओं के चुने जाने के बाद पति की दखलंदाजी का अंदाजा तो मुझे था...पर यहाँ तो शुरू से ही उनका वर्चस्व है...interesting

रंजना said...

सही जी एकदम सही...आरक्षण में रक्षण किसका होता है,बेहतरीन नमूना है यह...

लेकिन दो पीढी बाद उम्मीद कर सकते हैं कि पोस्टर पर केवल महिला प्रत्याशी का नाम रहे...

अच्छा/आशाजनक सोचने में क्या जाता है,नहीं ???

Rahul Singh said...

कहते हैं कि महिला शिक्षित तो घर शिक्षित. क्‍या यह कहा जा सकता है कि महिला सरपंच तो घर(वाला) सरपंच. वैसे हमारे अंचल में महिला सरपंच के पति को एस.पी.(सुपरिन्‍टेन्‍डेन्‍ट आफ पुलिस की तरह सरपंच पति)कहने का चलन है.

राज भाटिय़ा said...

यह एक सचाई हे जी, लेकिन जनता क्यो मुख रहती हे जब जिसे वोट दिया हे तो उसे सामाने लाये वर्ना मिल कर उसे हटाये.

सतीश पंचम said...

रंजना जी,

एक या दो पीढ़ी के बाद आशाजनक तो है ही कि कहां तो पहले महिलाओं को घर से बाहर नहीं निकलने दिया जा रहा था और अब देखियें कि मजबूरी के चलते ही सही, उन्हें राजनीतिक महत्व तो दिया ही जाने लगा है यह बदलाव अपने आप में बड़ी चीज है।

वैसे एक बहुत दिलचस्प नजारा यहां लगे एक चित्र में है कि उपर एक चित्र में निशा राव नाम की महिला प्रत्याक्षी राजनीति से M.A. हैं और पति महोदय भी राजनीति ही पढ़ाते हैं, एक कालेज में प्रवक्ता हैं (पोस्टर में बकायदा दोनों की डिग्री और काम के बारे में लिखा भी है, चित्र पर डबल क्लिक करके देखा जा सकता है) ।

फिर भी विडंबना देखिये कि एक राजनीतिक परास्नात्क महिला को भी राजनीतिक प्रक्रिया हेतु अपने पति की फोटो अपने साथ चस्पां करनी पड़ रही है :)

डॉ. मनोज मिश्र said...

सही है,समाज का यह बदलाव केवल संविधान में ही दीखता है.हकीकत तो आप लिख ही रहे हैं.

Vivek Rastogi said...

यह तो हर गाँव की ग्राम पंचायत का हाल है, फ़िर भले ही वह केरल हो या उत्तरप्रदेश या मध्यप्रदेश।

मनोज कुमार said...

आपकी लेखनी से जो निकलता है वह दिल और दिमाग के बीच खींचतान पैदा करता है।

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

यह पूर्वी उत्तरप्रदेश एक वृहत शिवपालगंज है। शिलिर शिलिर चलता है और शिलिर शिलिर तरीके से बदलेगा भी।
अभी प्रधान-पति/प्रधान-पुत्र के टैग हैं, दस पन्द्रह साल बाद ये टैग बिला जायेंगे!
वैसे मजेदार रहेगा यह पता करना कि देश के किस किस हिस्से में ये टैग चल रहे हैं!

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

प्रधानी के सच को अपने कायदे से उघारा है। बधाई इस सार्थक लेखन के लिए।

---------
पति को वश में करने का उपाय।
मासिक धर्म और उससे जुड़ी अवधारणाएं।

Kajal Kumar said...

कोई बात नहीं ...उम्मीद करनी चाहिये कि यह दौर हमेशा नहीं चलने वाला, नया नया चलन है न अभी. महिलाएं अपने अधिकारों को शायद आगे चल कर यूं outsource न करें

अनूप शुक्ल said...

गजब की निगाह है आपकी । काजल कुमार से सहमत हूं! :)

Suresh Chiplunkar said...

चकपक-चकाचक पोस्ट है… एकदम्मे पंचम "इश्टाईल"

Mahendra said...

satish ji mai to keval poster ke bare me kahunga .saare ache hai lekin sabe niche ka jabardast

P S Bhakuni said...

मकर संक्राति ,तिल संक्रांत ,ओणम,घुगुतिया , बिहू ,लोहड़ी ,पोंगल एवं पतंग पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं........

वाणी गीत said...

बदलाव हो रहा है ..वे चुनावी पोस्टरों पर दिखने लगी है , धीरे -धीरे सिर्फ अपने नाम से भी पहचानी जाएँगी ...
वोट मांगने निकले तो रेफरेंस तो देना ही पड़ता है पहली बार ..
अच्छी तस्वीरें !

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