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Friday, January 7, 2011

जब अपनी दबंगई भूल कर मुझे भागना पड़ा था......सतीश पंचम

         हमारे जीवन में कई बार ऐसी घटनाएं हो जाती है कि हम अपनी सारी दबंगई भूल कर भाग खड़े होते हैं। मैं भी भाग खड़ा हुआ था अबकी, जब गाँव गया था। हुआ यूँ कि गाँव में मेरी एक भैंस है जिसे कि हमेशा पिताजी ही चारा, सानी-पानी देते हैं। दूसरे किसी को अपने करीब आने नहीं देती।  कोई उसके करीब जाय तो सिंगों के जरिए मारने का इशारा करती है। 

     उसके नखरे देखकर मैं भी उसके पास जाने से बचता  हूँ ।  नांद में पानी वगैरह डालने के लिये बाल्टी भर पानी जरूर लेकर जाता था। नांद से कुछ  दूर पानी भरी बाल्टी रख देता, पिताजी उस बाल्टी को उठाकर वही नांद में पलट देते। साथ ही चोकर या दर्रा आदि भी भूसे में मिला देते। बता दूं कि दर्रा से तात्पर्य दालों की दराई से बने दरदरे अन्न से है जिसमें कि दाल का छिलका और उसके अंश मिलकर पशुओं के लिये एक तरह का ललचहा भोजन का काम करते है। 
 
      इसा बात को ऐसे समझा जा सकता है कि केवल भूसे और पानी से बना भोजन पशु भी नहीं पसंद करते। उन्हें भी हम मनुष्यों की तरह किसी घी जैसी चीज मिले तो ही वह मन से भोजन करते हैं अन्यथा पशु भी बगावत कर देते हैं। कुछ पशु तो दर्रा आदि न मिलने पर पूरी नांद को ही उलट पलट देते हैं, फोड़ देते हैं और कुछ पगहा तुड़ाकर इधर उधर हरियर खेत में मुँह मारने चले जाते हैं। फसलों का नुकसान होता है सो अलग। ऐसे में अक्सर गाँव के लोगो के मुँह से जो पहली भावनात्मक शब्द निकलते हैं वह होते हैं -  ई छिनरिया अउरौ ........यानि कि यह छिनाल तो और..... शुचितावादी पाठकगण,  यहां छिनाल शब्द पढ़कर धीर गंभीर न हों, क्योंकि गँवईं बोलचाल में इस शब्द का प्रचलन आम बात है, और संभवत: ठीक भी है। जो पशु अपने नांद को छोड़ इधर उधर मुँह मारे उसे और किस शब्द से नवाजा जाय भला  :)  

        हाँ,  तो नवंबर की गुनगुनी धूप का छत पर बैठा मैं आनंद ले रहा था कि किसी ने बताया कि मेरी भैंस ने खूँटा उखाड़ लिया है और फलाने के खेत में मुँह मार रही है। मैं थोड़ा आशंकित हुआ। एक तो पिताजी भी घर में नहीं थे, दूसरे किसी और को वो करीब आने नहीं देती थी। हुई मुसीबत।  भैंस के पास जाकर उसकी जंजीर को सावधानी से पकड़ कर नांद की ओर खींचना चाहा लेकिन वह टस से मस नहीं हो रही थी। चर्र...चर्र सामने खेतों में उगी बरसीम को लगातार चरे जा रही थी। अब भला उस हरे बरसीम के बजाय वह मेरे सूखे भूसे को याद करती ? सो चरती रही। मैं समझ नहीं पा रहा था कि इसे कैसे काबू में करूं। 
मउनी   

      तभी मैने एक उपाय सोचा। दर्रे से भरी एक छोटी मउनी  (सरपत से बना  Bowl ) को लेकर  भैस के सामने थोड़ी दूरी पर जा खड़ा हुआ। भैंस अब भी हरी हरी बरसीम चरे जा रही थी। उसे उपर देखने की फुरसत ही नहीं थी। इधर मेरा द्वारा उत्पन्न की जा रही ध्वनि....हुई....का  उस पर असर ही नहीं पड़ रहा था। तब हिम्मत करके उसके गले की सिकड़ी को थोड़ा सा खींचा तो उसने सिंग उठा लिया और हुमक कर मेरी ओर जो लपकी तो मैं पल भर को समझ ही नहीं पाया कि क्या हो गया । और अगले ही पल नजारा कुछ ऐसा था कि मैं आगे आगे भैंस मेरे पीछे पीछे.। बहुत तेज भागा था मैं। मुझे याद नहीं पड़ता कि इससे पहले जिंदगी में मैने कभी इतनी तेज दौड़ लगाई होगी। भैस मेरे पीछे भागी हुई आ रही थी और मैं अब भी सरपट दौड़ा जा रहा था। बेइंतहा रपट उठा था।  भागते हुए  चप्पल कहां छूटी, खूंटा कहां गड़ा कुछ खबर नहीं। भैस मुझे लगातार रपटे हुए थी।  और एक समय वह भी आय़ा कि हाथ में रखा दर्रा भी छूट कर गिर गया। जब जान पर बन आई हो तो क्या दर्रा और क्या फर्रा। 
मुझे दौड़ा देने वाली भैस अपने पाड़ा के साथ
 

     काफी आगे भागने पर लगा कि भैंस शायद अब पीछा नहीं कर रही है। हिम्मत करके भागते भागते भागते ही गर्दन घुमा कर पीछे देखा तो भैस मेरे द्वारा फेंके गये उस दर्रे को खा रही है, जीभ निकाल कर चाट चूट रही है और आसपास के घरों से लोग निकल निकल कर मेरे इस दौड़म भाग का मजा उठा रहे हैं। मेरी साँसे अब भी उखड़ी हुई थीं, हाँफा छूट गया था। एक पेड़ के पास खडा हो सुस्ताने लगा तब तक चाचाजी मेरी हालत पर हंसते हुए करीब आए और बोले - बहुत जीउ गाढ़े में पड़ होए हो कि अब का होगा। 

    मैने भी उखड़ी सांसो से मुस्कराते हुए कहा - ससुरी रपट लिहेस। 

         तब तक और दो चार लोग आ गये। एक ने कहा अरे वो तो तुम्हारे हाथ में रखे उस दर्रे के लिये लपकी थी और तुम समझे कि तुम्हें ही रपट रही है। बताओ, ये भी कोई बात हुई। ऐसा ही होगा तो कर चुके किसानी।  

    मैं मन ही मन सोच रहा था एक तो कम्बख्त ने पचास साठ गज़ की नाहक दौड़ लगवा दी सुबह सुबह और ये लोग हैं कि इनको हंसी ठट्ठा सूझ रही है। फिर खींस निपोरते हुए मैंने अपनी साँसों के नॉरमलीकरण पर ध्यान दिया जो कि अब भी उखड़ी हुई थीं। उधर भैंस थी कि आराम से जुटी हुई थी दर्रा खाने में। 

      अब जब यह संस्मरण लिख रहा हूँ तो सोचता हूँ कि हम बुद्धिजीवी कितना तो सांसारिक विषयों पर अपने ज्वलंत विचार रखते हैं, विनायक सेन, कश्मीर, आतंकवाद पर गरमा गरम बहस करते हैं। कभी कभी बुद्धिजीवी होने का स्वांग रचते हुए एक दूसरे के प्रति हौंकते- फौंकते हैं, एक दूसरे के प्रति विषवमन करते हैं, मैं ये कर दूंगा, मैं वो कर दूंगा और उधर एक भैंस के द्वारा थोड़ा सा भी हड़काने से भाग खड़े होते हैं।  

      इस लिहाज से तो 'अकल बड़ी कि भैंस' वाली उक्ति अपने आप में एक नवीन भाष्य चाहती है.....संभवत: दर्रा दुर्री सहित :)

 
- सतीश पंचम

स्थान - वही जहां पर कि जीविका हेतु  खूँटे से बंधा हूँ :)

समय - वही,  जब टीवी पर बाबा रामदेव अनुलोम विलोम प्राणायाम सिखा रहे हों और तभी खबर फ्लैश हो कि सर्वाधिक ताकतवर माने जाने वाले  भूतपूर्व अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश अपने गले में बिस्कुट फंस जाने से बेहोश हो गये हैं  :) 
 

12 comments:

rashmi ravija said...

कितनी कैलोरी गंवाई इस दौड़ में??....:)
अच्छी एक्सरसाइज़ हो गयी...थैंक्स कहिए उस भैंस को...बिना गिल्ट के माँ के हाथ का घी में तर हलवा खा सके होंगे.:)

दर्रा तो नहीं मालूम पर' मउनी' ने कुछ याद दिला दिया...मेरी दादी रंग-बिरंगे सींक से (इसे सरपत कहते हैं....ये भी भूल गयी थी या शायद हमारे गाँव में कुछ और कहते हों..) बहुत ही ख़ूबसूरत मउनी बुना करती थी...ये कला अब शायद गाँव में भी नहीं रही....बाद के वर्षों में किसी को देखा नहीं, बुनते.

सोमेश सक्सेना said...

हम तो इमेजिन कर रहे हैं कि कैसा सीन रहा होगा। इसे देखने का अलग ही लुत्फ़ है। :-)
पर ये भी सही है कि जिस पे गुजरती है वही समझ समझ सकता है।
एक बार एक सांड ने मुझे भी दौड़ाया था पर वो मेरे बचपन की बात है।

रंजना said...

बुद्धिजीवी ...हा हा हा हा...

किसानी का विलोम शब्द बुद्धिजीवी ही होना चाहिए ...नहीं ??

वैसे एकदम सही कहा आपने...दर्रा सहित भैंस अकल से बहुत बड़ी होती है...

आनंद आ गया पढ़कर...

ढेर ढेर आभार !!!

रंजना said...

कभी कभी मन खूब जोशियाता है किसानी के लिए...लेकिन इस रास्ते पर चलने से पहले भैंस से बचने की तैयारी कर के चलनी होगी नहीं...खाली किताब पढ़कर किसानी नहीं किया जा सकता...

Rahul Singh said...

ये आए आप असली रंगत में, इसी का इंतजार था. ऐसी बढि़या पोस्‍ट सैकड़ों में एक मुश्किल से निकलती है. ऐसा कुछ चलाए रखिए, अगर संख्‍या बल में आपका विश्‍वास हो तो टिप्‍पणी तो एक ही कर पाउंगा लेकिन पढाउंगा दसियों को, पक्‍का वादा.

दीपक बाबा said...

राम जी,

अबके गाँव जाना तो हमरी तरफ से उ भेंस को प्रणाम कहना....... का है ऐसे ही भेंसों की जरूरत है जो बुद्धिजीविओं को भगा भगा कर पस्त कर दे कि अपनी उनको बोलना पड़े....... हमरी अक्ल छोटी है....
:)

प्रवीण पाण्डेय said...

जब गाय या भैंस दौड़ाती है तो कुछ समझ नहीं आता है। घर में गायें होने के कारण कई बार अनुभव किया।

डॉ. मनोज मिश्र said...

अब जब यह संस्मरण लिख रहा हूँ तो सोचता हूँ कि हम बुद्धिजीवी कितना तो सांसारिक विषयों पर अपने ज्वलंत विचार रखते हैं, विनायक सेन, कश्मीर, आतंकवाद पर गरमा गरम बहस करते हैं। कभी कभी बुद्धिजीवी होने का स्वांग रचते हुए एक दूसरे के प्रति हौंकते- फौंकते हैं, एक दूसरे के प्रति विषवमन करते हैं, मैं ये कर दूंगा, मैं वो कर दूंगा और उधर एक भैंस के द्वारा थोड़ा सा भी हड़काने से भाग खड़े होते हैं..............
भइया इहई है असली बात.वैसे परदेसीन के इ नाद-वांद से दूरे रहे का चाही.
जय राम जी की.

अभिषेक ओझा said...

बड़ी तो भैन्सिये है :)
कल सोनिया गाँधी पढ़ा और आज ये. और आना ही पड़ा टिपियाने. लगे रहिये.

मो सम कौन ? said...

सतीश भाई, हमारी व्यथा-कथा इससे एकदम अलग है। दिल्ली जैसे शहर में रहते हुये भी अब से तीन साल पहले तक घर में एक दुधारू पशु(बहुधा गाय) जरूर बंधा रहता था और महीने में सिर्फ़ एक दिन उसे मजबूरी में खोल कर बाहर ले जाना प़ड़ता था। ज्यादा क्या इखूं, आप समझ रहे होंगे, क्या हालत होती होगी अपनी:)
आखिरी दो पैराग्राफ़ ने ऊपर की सारी पोस्ट को प्रस्तावना बना दिया है, गजब।

Stuti Pandey said...

अरे हम तो कब्बे से कह रहे हैं की भईंस बड़ी है...कम से कम देखाई तो देती है...ई ससुरी अकलिया काम पड़ने पर तो निकल लेती है

मनोज कुमार said...

भैंस तो फिर भी बुद्धिजीवी की बुद्धि से बड़ी होती है, इन्हें तो तिलचट्टा (कॉकरोच) धूल चटा दे और चूहा .. बिल में पटक दे ...!! बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
फ़ुरसत में आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री के साथ

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