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Thursday, January 6, 2011

जब मैं सोनिया गाँधी के लिये भाषण लिखने की कवायद से रूबरू हुआ ............सतीश पंचम

       हाल ही में मुझे सोनिया गाँधी के लिये भाषण लिखना पड़ गया। अरे भई वही सोनिया गाँधी जिनके नाम पर काँग्रेस पार्टी का रूक्का चलता है :)

     दरअसल हुआ यूं कि मेरी बिटिया पूजा के स्कूल में हाल ही में एक फंक्शन था। जिसमें कुछ लड़कियों को राजनेताओं की भूमिका निभानी थी। उन्हीं की तरह बोलना था, उन्हीं की तरह बतियाना था। कोई प्रतियोगिता नहीं, बस एक 'फन एन फेयर टाइप एक्टिवीटी' । सो, स्कूल वालों ने सभी से कुछ न कुछ करने धरने को बांट दिया। किसी को कुछ रोल मिला तो किसी को कुछ।  मेरी बिटिया को सोनिया गाँधी का रोल मिला। उसकी सहेलियों को मायावती, तो किसी को ममता बनर्जी, कोई अहिल्याबाई होल्कर तो किसी को इंद्रा गाँधी । 

    अब  समस्या आई कि भाषण क्या लिखा जाय।  शर्त यह थी कि वह भाषण  तीन-चार पंक्तियों का ही हो ताकि बच्चियों को याद करने में मुश्किल न हो।  स्कूल वालों ने कह तो दिया लेकिन यह नहीं सोचा कि इस तरह तो तीन-चार पंक्तियों में केवल स्वागत  सत्कार टाईप भाषण ही हो पाता है। 

     खैर, मुसीबत मेरी हो गई।  सोनिया गाँधी का भाषण मुझे ही जो लिखना था। इधर सोनिया गाँधी के Snippets कभी कभार न्यूज में तो देखा था लेकिन कभी पूरा भाषण नहीं सुना था कि कैसे शुरूवात करती हैं और कैसे अंत। फिर थोड़ी देर बाद नेट पर सर्च करना शुरू किया तो मिला हाल ही में कांग्रेस के 125 वर्ष पूरे करने पर सोनिया गाँधी द्वारा दिया गया भाषण। लेकिन उस भाषण से लेकर कुछ लिखने की हिम्मत नहीं हुई।  कहीं कोई भाव नहीं, कहीं कोई मन को छूने लायक वक्तव्य नहीं। सब कुछ जैसे प्लास्टिक के पेपर शीट में लपेट कर कहा गया था।  वही घिसे पिटे जुमले जैसे आम आदमी, गरीब, हमारी सरकारी, तुम्हारी सरकार....ब्ला ब्ला ब्ला। 

     मन मारकर  कीबोर्ड पर टाइप करना शुरू किया तो समझ ही नहीं आया कि ऐसा क्या लिखा जाय जिसे सोनिया गाँधी स्टाईल कहा जाय, टिपिकल अंदाज कहा जाय..... मसलन राजीव गाँधी की टिपिकल स्टाईल..... हमें देखना है, हम देखेंगे, हमने देखा......या फिर अतीत में खोया हुआ आडवाणी स्टाईल.....मैं जब उपप्रधानमंत्री था.....मैं जब वहां गया था ...मैंने ऐसा देखा था.........तब मैंने ऐसा कहा था.......वगैरह वगैरह। 

       इस लिहाज से देखा जाय तो सोनिया जी की कोई टिपिकल स्टाईल नहीं है सिवाय बोलने के इतालवी लहजे को छोड़ कर। सो, अब काम और भी मुश्किल हो गया। कुछ पुराने भाषण फिर से नेट पर खंगाले, कुछ यू- टूब , मी- बल्ब तब जाकर एक साग स्टाईल वाला भाषण चंद पंक्तियों का बन पाया। साग स्टाईल माने जिसमें कहीं कोई लटके झटके की गुंजाईश नहीं , न आरोप प्रत्यारोप की चिर्र पिर्र....केवल स्वागत, सत्कार....मिलना जुलना टाईप।  तो मैंने लिखा......साग टाईप भाषण......जिसके बोल थे.....

    मैं सोनिया गाँधी आप सभी लोगों का हार्दिक स्वागत करती हूँ। मैं आप लोगों से ये कहना चाहती हूँ कि हमारी सरकार आम आदमी के लिये है। वह आम आदमी के लिये काम करती थी, करती है, और आगे भी उनके लिये ही काम करती रहेगी। हमारी सरकार ने देश के किसानों और मजदूरों के लिये लाभ के लिये ढेर सारी योजनाएं बनाई हैं। हम चाहते हैं कि वे उनका समुचित लाभ उठायें। हम चाहते हैं कि हमारा देश विज्ञान और तकनीक के मामले में आगे रहे, ताकि लोग सुखी और खुशहाल बनें। 

     अब इस 'साग भाषण' को लिख तो दिया लेकिन असली मुश्किल तब हुई जब बिटिया पूजा के लिये सोनिया गाँधी की तरह दिखने वाली 'बार्डर साड़ी' की जरूरत महसूस हुई। श्रीमती जी से पूछा तो मुझ पर ही त्यौरियां कस उठीं .....लाकर दिये हो कि सिर्फ पूछ ही रहे हो........।

हांय......ये क्या बात हुई। आखिर मैने चुहल करते हुए पूछ ही लिया ...... मतलब अब तक लाई साड़ियां कोई और लाकर दे रहा था क्या ? अजीब बात है, एक तो लाकर दिये जाओ और उपर से बात भी सुनो।  

 वैसे भी साड़ी वगैरह के मामले में मेरा मानना है कि महिलाओं के पास चाहे जितनी साड़ी हो, उन्हें कम ही लगती है। संभवत: पुरूष बिरादरी मेरी इस बात से इत्तफाक भी रखती हों :)

 इधर श्रीमती जी कहने लगीं -  क्या मैं आपको सोनिया गाँधी लगती हूँ जो उन्हीं की तरह की महंगी साड़ी रखूंगी ?

 मैने कहा  हाँ ये भी सही है - सोनिया गाँधी होती तो इस तरह भला तुम किचन में सब्जी काट रही होती ? 
तब ? 

तब क्या अब आस पास ढूँढना पड़ेगा कि किसके घर में सोनिया गाँधी की साड़ी  है। 

        इसके बाद आस पडोस में ढूँढाई शुरू हुई।  साडियां तो खूब मिली पर हर किसी में कोई न कोई पै निकल आता। कोई साड़ी कुछ ज्यादा ही चटक होती तो किसी का बार्डर पतला होता तो कुछ ज्यादा ही फूलदार होती। 
  
      ढूँढते ढूँढते जब थक गये तो श्रीमती जी कहने लगी कि अच्छा होता सोनिया गाँधी की बजाय मायावती का रोल इसे मिला होता। कम से कम साड़ी के लिये तो इतना हम लोगों को ये परेशान नहीं उठानी पड़ती। एक पंजाबी सूट पहनाया, दुपट्टा डाला, हैंडबैग पकड़ाया बस। 
  
   मैंने कहा - वाह, भला ये भी कोई बात हुई कि एक साड़ी न होने की वजह से केन्द्र को छोड़कर राज्य लेवल पर संतुष्ट हो लिया जाय। इतनी गिरावट तो राजनीति में नहीं देखी कभी। और मान लो मायावती का रोल मिल ही गया होता तो वो नोटों का हार कहां से लाओगी जिसे कि उनके गले में पहनाने के बाद ही उनका ड्रेस कोड पूरा होता है ? 

     अभी घर में यह बमचक चल ही रही थी कि तभी बगल से एक आंटी जी के पास उसी तरह की साड़ी मिल गई।  उन्होंने सहर्ष साड़ी और उसी से मैच करता ब्लाउज दे दिया।
     उधर बिटिया ने भाषण रटना छोड़ साड़ी पहनने की कवायद शुरू की। सिर्फ तैयारी होती तो और बात थी, लेकिन यह तो एक तरह का स्पेशल इवेंट सा हो गया। आस पड़ोस की बिटिया के उम्र वाली सखी सहेलियां भी आ पहुँची उसे सोनिया गाँधी बनाने के लिये। इधर चहल पहल के बीच  मैं  चल पड़ा बाजार की ओर कुछ खरीददारी करने।
      लौट कर आया तो देखा बिटिया वही साड़ी पहने हुए सामने शीशे में खुद को देख रही है, सोनिया की तरह दिखने बोलने की एक्टिंग कर रही है। उसे चुपचाप एक नजर कनखियों से देख मैं अंदर किचन की ओर बढ़ लिया, सब्जी वगैरह वहीं किचन के प्लेटफार्म पर रखते हुए लगा कि मेरी उम्र अचानक ही कुछ बढ़ सी गई है। बालों में सफ़ेदी भी कुछ ज्यादा ही हो आई है।
   
     उधर किचन से श्रीमती जी भी बिटिया को देखे जा रहीं थी, मैं भी। अचानक मेरी और श्रीमती जी की नज़रें आपस में मिली और एक तरह का भुनभनाहट वाली 'चुप्पी बतकही' शुरू । किचन के प्लेटफार्म पर रखी सब्जीयों की ओर देखते हुए श्रीमती जी ने कहा -   

  -  सब दिन साठ रूपइया किलो वाला पियाज ही खाते रहोगे कि कुछ जोड़ ओड़ के पइसा-कउड़ी भी जमा रखोगे ?  देख नहीं रहे ...... कांधे से उपर कान तक तो आ पहुँची है बिटिया ।  कुछ साल बाद जिसके दरवाजे देखुआरी करने जाओगे तो वह यह नहीं पूछेगा कि कितना रूपया किलो वाला पियाज खिलाये थे.....पढ़ाई लिखाई के साथ साथ वो यह भी पूछेगा कि कितना गिन कर रखोगे.....तब याद करना अपनी इन महंगी सब्जियों को।

  मैं सुन तो रहा था लेकिन मन कहीं और टंगा था  - ये बेटियां बेटों की बजाय इतनी जल्दी बड़ी कैसे हो जाती हैं ? वही खाना तो लड़के भी खाते हैं वही लड़कियां भी। 
फिर  ?  
  
   उधर बाहर की ओर नज़र दौड़ाया तो बिटिया आईने के सामने खड़ी होकर सोनिया गाँधी के रूखे नकली भाषण की तैयारी कर रही थी जिसमें न रस था न भाव न दुख न खेद।  इधर किचन में मैं सोनिया गाँधी की मम्मी का असली भाषण सुन रहा था - जब किसी के दुआरे जाओगे लड़का देखने......जब पड़ेंगे नोट गिनने.....जब पड़ेंगे फेरे .......। 

 और  मुझे सोनिया गाँधी की मम्मी के इस असल भाषण में वह सब कुछ  मिल रहा था जो कि मेरे लिखे उस नकली भाषण में नहीं था........भाव, सोच, विचार, मनन और कुछ अलहदा किस्म की चिन्ताएं जिनकी कि अक्सर जरूरत पड़ती रहती है  :) 

- सतीश पंचम

स्थान - वही, जिसे कभी अंग्रेजों ने दहेज में दे दिया था।

समय - वही, जब सोनिया जी बाजार से प्याज खरीद रही हों और कृषि मंत्री अपनी ठेला गाड़ी से कहें -  मैडम ज्यादा प्याज खरिदियेगा....अभी कुछ दिन और प्याज का दाम तेज रहने की आशंका है। 

 सुनते ही मनमोहन जी कहें - आज अवैध दुकानों, ठेलों को हटवाने वाले नगर निगम के कर्मचारी नहीं दिख रहे मैडम...... नहीं तो अब तक इसका पूरा ठेला ही उठवा लेता :) 

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 इस पोस्ट को लिखते हुए मुझे  घूघूती जी की एक टिप्पणी याद आ रही है जिसे उन्होंने मेरी एक पोस्ट जिसमें मैंने गाँव देहात की बारात का वर्णन किया था और एक पिता के तौर पर बेटियों की शादी में आने वाली समस्याओं की ओर इशारा किया था, उस पोस्ट पर उन्होंने  टिप्पणी करते हुए लिखा था.....आपने अपने बिटिया के पिता होने पर थोड़ी सी चिन्ता व्यक्त की है। यदि मेरी राय का कोई मूल्य हो तो मैं दो बेटियों की माँ हूँ। न तो चिन्ता की न ही उनके विवाह में कोई समस्या आई, न ही किसी के नखरे सहे। यदि बेटियों को स्वाभिमानी बनाएँगे और उनकी पसन्द के व्यक्ति से विवाह करेंगे तो ऐसी समस्या कम ही सामने आती है।  

  - घुघूती बासूती

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गिरिजेश जी ने एक कविता  सयानी होती बिटिया और एक पिता के मुद्दे पर बहुत सटीक लिखी है। सुधी पाठकों हेतु उस कविता को यहां पेश कर रहा हूँ।  ....... मैं बूढ़ा हो गया 


सुबह सुबह आज 
दाढ़ी बना रहा था। 
थोड़ा सा एकांत देख 
बीवी ने कहा 
सुनते हो, बिटिया सयानी हो गई है 
कहीं बातचीत तो करो ! 

उसी पल 
शीशे में कनपटी के बाल सफेद हो गए। 
चेहरे की झुर्रियाँ उभर कर चिढ़ाने लगी मुँह । 
आँखें धुँधली हो गईं। 
उसी पल 
मैं बूढ़ा हो गया। 
... मेरे भीतर कुछ टूट गया। 
       -   गिरिजेश राव 

17 comments:

Mired Mirage said...

सतीश,आज भी वही कहूँगी.यदि अपना मन खुला रखोगे,बच्चियों की पसंद को अपनी पसंद मान उनका साथ दोगे तो कभी किसी के द्वारे नहीं जाना पड़ेगा.
'मैं सुन तो रहा था लेकिन मन कहीं और टंगा था - ये बेटियां बेटों की बजाय इतनी जल्दी बड़ी कैसे हो जाती हैं ? वही खाना तो लड़के भी खाते हैं वही लड़कियां भी।
फिर ?' ...... इसका उत्तर एक पोस्ट में दूंगी.
घुघूती बासूती

दीपक बाबा said...

वाह जी आज तो बहुत विस्तृत पोस्ट बना दी........... आचार्य की कविता का बुढ़ापा भी दिखा दिया........ और १२५ साल की जवानी भी.

जय हो.........

rashmi ravija said...

भाषण तो अपने 'साग' की तरह ही लिखा...पर बिटिया के पढने में जरूर इटैलियन पास्ता का फ्लेवर आया होगा.

हर माता-पिता के मन में यह ख़याल आ ही जाता है...या शायद बिटिया के जन्म के साथ ही मन में पलता रहता है...कि बड़ी होकर दूसरे घर चली जायेगी .

समय के साथ दुनियावी चिंताएं भी शुरू हो ही जाती हैं...पर घुघूती जी की बात ही आज का सच है.

सतीश पंचम said...

घुघुती जी,

आपकी बात मुझे लगभग डेढ़ साल पहले वाली पोस्ट में भी बहुत दिल के करीब लगी थी, आज भी बहुत निजी लग रही है। इसिलिये शायद आपकी उस टिप्पणी को नहीं भूला हूँ।

कुछ टिप्पणियां भूलने के लिये नहीं होती, वह राह दिखाती हैं :)

रूप said...

satishji fir kabhi na kehna ki betiyan itni jaldi badi kaise ho jaati hain .sach to ye hai ki betiyon ke bina pariwar ki kalpana bhi vyarth hai ............waise post pathniy hai

सतीश पंचम said...

रूप जी,

यहां मैने बेटियों के जल्दी बड़े होने के पीछे एक तरह की सोच की ओर इशारा किया है। हम लोग अक्सर बच्चों को छोट हंसते खेलते ही देखना पसंद करते हैं। जैसे जैसे वह बड़े होते जाते हैं वैसे वैसे उनकी जरूरतें, उनके शिक्षा आदि के बारे में औऱ भी कई बातों पर सोचना पड़ता है।

बेटियों का मामला मुझे कुछ इस प्रकार का लगता है कि उनके शादी ब्याह के बारे में उनके छुटपन से ही सोचा जाता है जबकि लड़कों के लिये 'टू बी टेकन ग्रांटेड' वाली अवस्था होती है। थोड़ा देर सबेर भी करेंगे उनका विवाह तो चल जायगा वाली मानसिकता।

सो इसी उधेड़ बुन और चौहद्दी की तरफ इशारा करती हैं मेरी यह पंक्तियां - कि बेटियां बेटों की बजाय इतनी जल्दी बड़ी कैसे हो जाती हैं ? वही खाना तो लड़के भी खाते हैं वही लड़कियां भी।

फिर ?

ajit gupta said...

बेटियां जल्‍दी बड़ी हो जाती हैं और बेटे जल्‍दी जवान। कोई चिन्‍ता ना करें, हम सब बेटियों के भाग्‍य से ही बंधे हैं। आजकल बेटियां चिन्‍ता का विषय नहीं है, वे तो हमारी चिन्‍ताएं हर लेती हैं। जितनी बेटियां उतना ही सुख। बस यह और लिख देते कि उसने कैसे निभाया सोनिया गाँधी का रोल तो मजा आता।

PADMSINGH said...

सतीश जी ... सामाजिक ढाँचे के निरंतर खुलते जाने के बावजूद भी अभी माध्यम वर्गीय परिवारों में बच्चियों के विवाह को ले कर बातें बहुत कुछ नहीं बदली हैं.

दूसरी बात... बच्चियों को बड़ी होते देख मन में जो अंतर्द्वंद्व उठता है... वो कहीं न कहीं अपने मन की कचोट ही है जो अपने बच्ची को दूसरे के हाथ में देने की कल्पना मात्र से उसके प्रति ममत्व की वजह से होती है...

anshumala said...

पूरा लेख बहुत ही अच्छा लगा पढने में काफी आन्नद आया | आप ने अपनी पत्नी के लिए जो लाईने लिखी है वो बहुत ही वास्तविक और सही लगी | अक्सर यही होता है की पिता के पहले माँ कहना शुरू करती है की बेटी बड़ी हो गई है और ज्यादा चिंता भी वही करती है पैसे बचाने के लिए कहना उसी चिंता का एक हिस्सा होती है उसे मालूम है की एक अच्छा वर और घर बेटी को कितना सुखी बना सकता है और आज उसकी कीमत काफी है वो उन पैसो से अपनी बेटी के सारे जीवन के लिए खुशिया खरीदना चाहती है | मुझे लगता है की यदि हम सभी थोड़ी हिम्मत करे और जात पात वर्ग की जकड़न से खुद ही ऊपर उठा कर बेटा या बेटी दोनों के विवाह के बारे में सोचे तो शायद हमारी आधी से ज्यादा समस्या ही समाप्त हो जाये और बच्चो के लिए ज्यादा योग्य वर और घर पा सकेंगे | बस हमें समाज के सामने थोडा हिम्मत से खड़ा होना है |

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर बात कही आप ने....सब्जी वगैरह वहीं किचन के प्लेटफार्म पर रखते हुए लगा कि मेरी उम्र अचानक ही कुछ बढ़ सी गई है। बालों में सफ़ेदी भी कुछ ज्यादा ही हो आई है।
बस यही एहसास हमे अच्छा भी लगता हे, धन्यवद

Rahul Singh said...

पदुमलाल पुन्‍नालाल बख्‍शी जी का गंभीर ब्‍लॉगरी जैसा निबंध 'क्‍या लिखूं' याद आया. कहां से शुरू होकर, कहां-कहां से होते हिां पहुच गए.

VICHAAR SHOONYA said...

पोस्ट हमेशा की तरह मजेदार है. अंत तक आते आते पोस्ट का अंदाज तो सुप्रीम कोर्ट के जजों वाला हो गया लेकिन क्या किया जाय वास्तविकता भी यही है. अब किसी पोस्ट पर बिटिया की सोनिया रूपेण तस्वीरें जुरूर लगाइयेगा.

Arvind Mishra said...

ठंडी हवाएं हैं बेटिया -बाप रे बड़ी कडकडाती ठण्ड है !

डॉ. मनोज मिश्र said...

सतीश भाई ,यह तो काफी कठिन दौर रहा होगा क्योंकि आप तो किसी और राजनेता के फैन जो ठहरे .

प्रवीण पाण्डेय said...

अब आपको पता चल गया होगा कि किसी की नकल करने में कितना कष्ट होता है।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

वाह ! आनंद आ गया। जो सुख अपने बच्चों के लिए छोटी-छोटी खुशियाँ जुटाने में है वह और कहीं नहीं मिल सकता। गृह्स्थ जीवन के अपने मजे हैं। हम तो इसी लिए अपने को तरोताजा और जिंदा महसूस करते हैं।

घुघूती जी की बात गौर करने लायक है। अब माँ-बाप को बेटी के लिए अन्जाना वर ढूढकर थोपने की जरूरत नहीं है। अब बेटियाँ समझदारी की उम्र पा लेने के बाद ब्याही जाती हैं। उन्हें अच्छी शिक्षा और संस्कार देने पर जो खर्च करना पड़े उसे करना चाहिए। यह ठीक रहा तो शादी अच्छी हो ही जाती है। फिर भी भाग्य का अपना रोल तो होता ही है।

anitakumar said...

बिटिया को सोनिया गांधी बने हुए तो दिखाना था।
घुघुती जी की बात आंशिक रुप से सही है। हम अजित जी की बात से सहमत्। आज कल बेटियों की शादी होना कोई मुश्किल नहीं

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