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Sunday, January 2, 2011

'नये बादल'....... बिन पिये ही धीरे धीरे सिप लेने का आनंद देती मोहक कृति...........सतीश पंचम

      कल दुपहरीया में मोहन राकेश को पढ़ रहा था। 'नये बादल' ,यही था उस कहानी संग्रह का नाम। इसे मोहन राकेश की लिखने की शैली कहूँ या अपने पढ़ने के लिये मिल पाया समय, लगा कि कहानी के साथ साथ मैं भी उस बुढ़े शख्स की पहाड़ी कोठरी में बैठा हुआ सब कुछ होते अपनी आँखों से ताक रहा हूँ। वरना तो पहाड़ी लेखन मैं जल्दी आत्मसात नहीं कर पाता, उस इलाके की कहाँनियों से एक किस्म का अलगाव प्रतीत करता हूँ।  शिवानी को मैं पढ़ते हुए इसी कारण बिदक जाता हूँ। पूर्व में मुझे कहीं न कहीं लगा है कि शिवानी के पहाड़ी लेखन को, उनकी कहानियों के पात्रों से जुड़ाव महसूस करने हेतु उस क्षेत्र विशेष से पूर्व परिचित होना बहुत जरूरी है (शायद मैं गलत भी होउं)।

     लेकिन उसी पहाड़ी इलाके की बातें मोहन राकेश जब लिखते हैं तो जरा भी नहीं लगता कि मैं वही सतीश हूं जो पहाड़ी लेखन से बिदकता हूँ। मुझे शायद मोहन राकेश  के नैरेशन की क्षमता ज्यादा मदद देती है पहाड़ी इलाके के पात्रों से जुड़ने में। 

       जैसे कि एक रिक्शे वाले के बारे में मोहन राकेश कहते हैं.... बीड़ी पीते समय बीड़ी के आगे अचानक ही तेज चमक आ जाती थी....याकि किसी पात्र के चलने के अंदाज के बारे में लिखते ......वह जब चलता था तो उसके कंधों और पैरों में एक विशेष प्रकार का खम पड़ता था। इस तरह के नेरेशन किसी कहानीकार को वातावरण के बारे में पाठक को एक तरह की सजीवता का भान होने देता है। किसी पाठक को लेखक के नजरिये से देखने में सहायता करता है। 

    यहां मैं बता दूँ कि पिछले दस दिन से इस कहानी संग्रह से एक एक कहानी को पढ़ रहा हूँ। शायद अजीब सा लगे कि जिस लेखक की कहानीयों की मैं तारीफ कर रहा हूँ उसे पढ़ने में दस दिन कैसे लग गये। दरअसल मैं इस तरह की कहांनीयों को खेप में नहीं पढ़ता। एक एक कर पढ़ता हूँ। धीरे धीरे सिप लेते हुए। और कहांनीयां है कि एक एक कर अपना नशा चढ़ाती चली जाती हैं। पचास साल पहले लिखी इन कहानियो के पुनर्नवा प्रकाशनों को पढ़ते हुए मन अनायास ही मोहन राकेश को और पढ़ने की चाहत की ओर खेंच ले जाता है। 

     हवामुर्ग, मन्दी, शिकार, छोटी सी बात, अपिरिचत, फटा हुआ जूता.....सब एक से बढ़कर एक कहानियां हैं। 
   
     इनमें से मुझे 'छोटी सी बात' कहानी में आमिर  खान की फिल्म 'तारे जमीन पर'  का अंश दिखा जब कि एक बच्चा अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में आ जाने पर छूरी कांटे के प्रति असहज हो उठता है। उसे समझ नहीं आता कि कब गुड मार्निंग कहना चाहिये कब गुड इवनिंग। वह गुड मार्निग दोपहर में भी कहता है, रात में भी । जब दूसरे बच्चों को कुछ और कहते देखता है तो गुड ऑफ्टरनून बोलना सीखता है लेकिन जब कहने की बेला आती है तो शाम हो जाती है और फिर से उसे लगता है कि वह मिसफिट है इस वातावरण में। 

     इसी तरह 'फटा हुआ जूता' कहानी भी एक बेहद सशक्त रचना है। इसमें एक शख्स की व्यथा दर्शायी गई है जिसके नाम पर तीस रूपये का पहेली हल कर देने वाला इनाम लगता है। वह तीस रूपये को जेब में लिये लिये पूरा बाजार छान मारता है ताकि अपने फटे जूतों की बजाय नया जूता खरीद सके। लेकिन वह देख ताक के बाद शाम को फिर अपने उसी गंधाते कोठरी में जा पड़ा रहता है। फटे जूते उसी तरह एक कोने से उसे ताकते प्रतीत होते हैं। वह करवट बदल कर जूतों की ओर अपनी पीठ कर लेता है। 

     वहीं 'नये बादल' कहानी में एक बूढ़े और तीन नई उम्र के लोगों की कहानी बताई गई है। अचानक ही पहाड़ी इलाके में बारिश होने के कारण सराय में रूकने के लिये ज्यादा लोग इकट्ठे हो जाते हैं। इन्ही में से एक कमरे में एक बूढ़ा पहले से चबूतरे पर कब्जा करके सो रहा होता है। ढिबरी जल रही होती है। तेल कम होने से बुझने बुझने को है। इसी बीच तीन लोग भी उसी कमरे मे आ जाते हैं। दो नवयुवक और एक नवयुवती। वह भी वहां ठहरते हैं। बूढ़ा नाराज होता है कि सराय का चौकीदार क्यों उन लौन्डों लपाडियों को उसके कमरे में ठहराया। वे तीनो लोग दरवाजे के पास ही एक जगह देखकर सो जाते हैं. उनमें से एक जागकर कागज पर कुछ लिखता जाता है फिर ढिबरी बुझ जाने से सो जाता है।  बूढ़े की आँखें नहीं लगती । उसे लगता है कि जरूर ये लोग कहीं से लड़की को भगा लाये हैं। उसके कमरे में अब ये अनेत कर रहे हैं। वह अंधेरे में अपने कमरे में हो रहे इस अनेत को बर्दाश्त नही करना चाहता। एक तीली जलाता है और उसके अंधेरे में उसे दिखता है कि तीनों अपनी अपनी जगह सो रहे हैं। 

मोहन राकेश
       उठकर वह भारी बारीश के बीच चौकीदार को जगाता है कि उसके कमरे में तीन लोग हैं जिन पर उसे शक है कि वह कुछ गडबड़ लोग हैं। चौकीदार बूढ़े को डांट कर भगा देता है कि तुम क्यों मेरी नींद खराब कर रहे हो। बूढ़ा अब किसी और की ओर लपकता है कि चलूं कुछ दूसरे लोगों से कहूं इस तरह से मेरे कमरे में तीन लोगों का इस तरह से अनेत करना ठीक नहीं। वह दूसरे कमरों की ओर बढ़ता है लेकिन सब जगह लोग भारी बारिश के चलते चुपचाप सो रहे होते हैं। कहीं से सहायता न पा कर बूढ़ा वापस अपने कमरे में आता है और अपने चबूतरे पर सो जाता है। तीनों अब भी जमीन पर सो रहे होते हैं। 

       अगले दिन सुबह जब बूढ़े की नींद खुली तो वो तीनो जा चुके होते हैं. हां वहा पर दो कागज के टुकड़े मिलते हैं जिन पर क्या लिखा था वह नहीं समझ पाता। यह वही टुकड़े थे जिन्हें कि रात में एक नवयुवक ढिबरी की रोशनी मे लिख रहा था। बाहर दातून कर रहे एक शख्स से बूढ़ा वह कागज पढ़वाता है तो उस पर किन्ही स्कूली सब्जेक्ट कि किताबों के नाम वगैरह लिखे थे।  बूढा खीझ कर लौट आता है अपने कमरे की ओर और नये बादल अलोप हो जाते हैं।  इन सभी कहांनियों में मैने पहले ही 'अपरिचित' और 'मलवे का मालिक' पढ़ा हुआ था। एक बार फिर पढ़ लिया।    
मुक्तिबोध

     

      वहीं एक और मजेदार चीज नोटिस की । मोहन राकेश की जो तस्वीर लगी थी बैककवर पर उसमें वह सिगार पीते हुए दिखे। मन में प्रश्न उठा कि ऐसे कई लेखकों ने पहले भी अपनी तस्वीरें कुछ न कुछ पीते हुए खिंचवाई हैं। मुक्तिबोध के एक चित्र में देखा था कि वो बीड़ी या सिगरेट सुलगा रहे थे। नेट पर ढूँढा तो मिल भी गई वह तस्वीर। इसी तरह से राजेन्द्र यादव को भी देखा है कि वह अक्सर पाइप सुलगाये रहते हैं। कई किताबों के उपर पाइप पीते हुए तस्वीरें देख चुका हूँ। मैं तो सिगरेट वगैरह नहीं पीता लेकिन इस तरह से बीड़ी या सिगरेट पीते हुए तस्वीरें अपनी किताबों पर छापना शायद किसी विशेष फिनोमिना को दर्शाता हो,  लेकिन  है बड़ा रोचक।
राजेन्द्र यादव


 - सतीश पंचम

स्थान - वही, जहां पर नये बादल टप्पर पर कटिंग चाय पीते दिखते हैं।

समय - वही, जब कभी तीस रूपये में मिलने वाले जूते अबकी हजार रूपयों में मिल रहे हों। 
'नये बादल' , 
लेखक - मोहन राकेश, 
भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित, 
मूल्य - 140/-

18 comments:

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

मोहन राकेश की रचनाओं का एक बड़ा संकलन हिंदीसमय.कॉम पर उपलब्ध है। नीचे दिये लिंक से जाकर देखिए, आपको बहुत आनंद आएगा।
http://www.hindisamay.com/mohan-rakesh-sanchayan/mohan-rakesh-index.htm

सतीश पंचम said...

सिद्धार्थ जी, लिंक देने के लिये धन्यवाद।

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

हाल ही में मोहन राकेश का दक्षिण का ट्रेवलॉग आखिरी चट्टान तक पढ़ा। मुरीद हो गया लेखन का!

अल्पना वर्मा said...

मोहन राकेश जी की कहानियाँ सालों पहले कभी पढ़ी थीं..
...
सिद्दार्थ जी ने तो बहुत ही अच्छा लिंक दिया है..वहाँ उनकी अन्य रचनाएँ भी पढ़ने को मिलेंगी.
आभार.

ajit gupta said...

बहुत अच्‍छी जानकारी दी आपने। सिगार, सिगरेट सभी तो आधुनिकता की निशानी हैं, ये लोग भाई प्रगतिशील हैं, मनुष्‍य को व्‍यसन मुक्‍त नहीं करना चाहते।

प्रवीण पाण्डेय said...

मोहन राकेश की कुछ और पुस्तकें लाते हैं।

Satish Chandra Satyarthi said...

ललचा दिया आपने तो...
मैंने तो बस आधे-अधूरे पढ़ा है और कुछ और कहानियाँ मोहन राकेश की.. उतना ही काफी था दीवाना बनाने को...
विनायक सेन चिट्ठाचर्चा पर काहे बोलतो?

Satish Chandra Satyarthi said...

अरे वाह! त्रिपाठी जी, ह्रदय से आभारी हूँ आपका लिंक के लिए.. भारत से बाहर रहने वालों के लिए तो यही सहारा हैं...

गिरिजेश राव said...

यही तो कसौटी है बन्धु! कि परिवेश से पूर्व परिचित हुए बिना भी पाठक तादात्म्य स्थापित कर ले। अच्छी पोस्ट और सिद्धार्थ ने दी अच्छी लिंक।
वहाँ उनके एक नाटक का शीर्षक 'आषाढ़ का दिन' दिया हुआ है। मुझे 'आषाढ़ का एक दिन' याद आ रहा है। फिर से पढ़ना पढ़ेगा।

बाकी आप की समीक्षा के क्या कहने! दो लड़कों और एक लड़की को साथ देख बुढ्ढे की दिमागी खुजली बढ़िया उकेरे होंगे मोहन राकेश। पढ़नी होगी।

कभी दो शादियों पर ध्यान दिलाते हो कभी बीड़ियों के विभिन्न प्रकारों पर। पहले बताये होते तो हमहूँ अपनी एक ठो फोटो बीड़ी पीते हुए लगा देते :)
किसी दिन करते हैं। कसम से विशेष फिनोमेना वाले प्राणी लगने लगेंगे।

सोमेश सक्सेना said...

बढ़िया समीक्षा सतीश जी। ये कहानी संग्रह मैने नहीं पढ़ी है पर अब पढ़ने की इच्छा हो रही है।

वैसे पहाड़ी लेखकों में मुझे रमेशचन्द्र शाह सबसे अधिक पसंद हैं। मैं पहाड़ का नहीं हूँ न ही कभी पहाड़ों में रहा हूँ फिर भी उनके कहानियों के पात्र मुझे अपने आसपास के लगते हैं।

त्रिपाठी जी का दिया लिँक उपयोगी है पर मैं लम्बी रचनाओं (कहानी, नाटक, उपन्यास आदि) को पढ़ने का लुत्फ़ किताबों में ही उठा पाता हूँ कंप्यूटर स्क्रीन पर इन्हे पढ़ ही नहीं पाता हूँ।

Arvind Mishra said...

निर्मल वर्मा के बाद मैंने अगर किसी और को जबरदस्त कहानीकार पाया अहै तो उसमें मोहन राकेश और उदय प्रकाश हैं -
मोहन राकेश का न आने वाला कल पढ़ा था ..एक दो ये कहानी भी पढी या दूरदर्शन पर देखी लगती हैं ..और हाँ ये नशाखोरी का पोज..बड़े मार्के की बात कही है आपने .....मैंने भी सोचा था कभी .....ये एक स्तीरियोतायिप है बस!

डॉ० डंडा लखनवी said...

नए वर्ष की आपको भी बधाई।
गरम जेब हो और मुंह में मिठाई॥

रहें आप ही टाप लंबोदरों में-
चले आपकी यूँ खिलाई - पिलाई॥

हनक आपकी होवे एस०पी० सिटी सी-
करें खूब फायर हवा में हवाई॥

बढ़ें प्याज के दाम लेकिन न इतने-
लगे छूटने आदमी को रुलाई॥

मियाँ कमसिनों को न कनसिन समझना-
इसी में है इज्जत इसी में भलाई॥

मिले कामियाबी तो बदनामी अच्छी-
सलामत रहो मुन्निओ - मुन्ना भाई॥

सद्भावी-डॉ० डंडा लखनवी

rashmi ravija said...

मोहन राकेश मेरे पसंदीदा लेखक हैं...उनकी "अँधेरे बंद कमरे" पता नहीं कितने लोगो को मैने रेकमेंड की है.
उनकी लेखनशैली बहुत ही सहज सी है...और आत्मीय सी लगती है. इतने दिनों बाद फिर से एक बार उनकी कहानियों से परिचित होना सुखद लगा.
और इस से भी अच्छी बात ये हुई कि इसी बहाने सिद्धार्थ जी ने लिंक दिया...खजाना है वहाँ तो उनके लेखन का...डबल शुक्रिया :)

डॉ. मनोज मिश्र said...

वाकई रोचक है.

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

@गिरिजेश राव
भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित संचयन में नाटक का नाम ‘आषाढ़ का दिन’ ही दिया हुआ है। विषय-सूची और अंदर के पृष्ठ में भी। इसी पुस्तक की सामग्री हिंदीसमय.कॉम पर अपलोड की गयी है।

एक और संचयन अज्ञेय की रचनाओं का भी अपलोड किया जा चुका है। इसका लिंक भी दे देता हूँ।
http://www.hindisamay.com/Ajneya-sanchayan/Ajneya-index.htm

राज भाटिय़ा said...

आप ओर आप के परिवार को नव वर्ष की शुभकामनाएं।

Rahul Singh said...

मुक्तिबोध जी का एक वक्‍तव्‍य कुछ यूं था- शाम कॉंलेज से लौटते हुए कदमों पर कम और बीड़ी पर ज्‍यादा भरोसा करता हूं.

दुधवा लाइव said...

हम तो सफ़ेद घर को गिरजाघर ही समझते थे

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