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Thursday, December 29, 2011

हे सखी.......मांग ले मांगटीका :)

- मेरे पति तो लोकपाल होने जा रहे हैं सखी, अबकी मैं तो उनसे झुमका लूंगी।


- अभी हुए तो नहीं न, जब हो जांय तब जरूर लेना....और  मेरे पति भी कहां लेखपाल होने जा रहे हैं, वो भी तो बड़े.....

- तो तुम क्या लोगी उनसे झुमका कि कंगना ?

- सखी, न तो मैं झुमका लूंगी न कंगना, मैं लूंगी कम्पनी में हिस्सेदारी ।

- सो तो मैं पहले ही ले चुकी हूँ, मेरे पति को मुझ पर इतना विश्वास है कि उन्होंने न सिर्फ अपनी कम्पनी में मुझे हिस्सेदार बनाया बल्कि मेरे रिश्तेदारों की कम्पनी का हिस्सेदार बना दिया सखी।

- तब तो तुम बड़े आनंद से रहती होगी सखी, किसी बात की कमी न होती होगी ?

- अरे कहां, कोई कम्पनी में हिस्सा हो तो चल भी जाय, जब सोलह सत्रह कम्पनीयों में हिस्सेदारी हो तो मुश्किल हो जाती है सखी ।

- हां, सो तो है।

- अच्छा सखी, क्या तुम्हारे पति ने अब तक तुम्हें कहीं कम्पनी में हिस्सेदार नहीं बनाया ?

- कैसे बनाते, पहले इमानदार जो थे ।

- तो क्या वे अब बेईमान हो गये हैं ?

- नहीं, अब उन्हें तुम्हारे लोकपाल पति का डर सताने लगा है सखी ।

- तो क्या हुआ, मैं अपने पति से कहकर तुम्हारे पति को भी लोकपाल बनवा दूंगी ।

- नहीं, अब वे बुढ़ौती में और किसी चीज की चाह नहीं रखते, कह रहे थे कहीं से जुगाड़ लगाकर राज्यपाल बन जाऊं तो बुढ़ौती आराम से राजभवन में कटे। तुम बगइचे में फुलवारी निहारना, मैं गार्डन में छतरी लगाकर उसके नीचे आराम कुरसी पर अखबार पढ़ूंगा, सामने ही प्लेट में अंगूरों के गुच्छे पड़े होंगे, और....

- तो क्या राज्यपाल हो जाने से आराम ही आराम हो जाता है सखी ?

- हां, कुछ ऐसा ही समझो।

- ऐसी सुविधा मेरे लोकपाल पति को क्यों नहीं मिली सखी ?

- वो इसलिये कि तुम्हारे पति का ओहदा संवैधानिक नहीं है सखी जबकि मेरे पति का ओहदा संवैधानिक है

- आग लगे उस कमलहे पार्टी वालन को जो लोकपाल संवैधानिक नहीं होने दिया, हाथ वाले तो जी जान से लगे थे लोकपाल को संवैधानिक करने में, एक बार संवैधानिक हो जाता तो......

- वो देखो तुम्हारे पति आ रहे हैं, अंगूर के गुच्छे लिये हुए..... मैं चलती हूँ।

- कहां हैं अंगूरों के गुच्छे, वो तो फाइलें हैं।

- ध्यान से देखो.....वो फाइलें नहीं, अंगूरों के गुच्छे ही है, आज उनसे तुम कंगना, झुमका, नौलखा हार चाहे जो मांगोगी दे देंगे।

- ऐसा क्यों ?

- क्योंकि अब तक उनकी स्थिति उहापोह वाली थी.....लेकिन अब वे आधिकारिक रूप से असंवैधानिक हो चुके हैं......अंगूरों के गुच्छे भले ही टेबल पर रखी प्लेटों में फबते हों लेकिन फलते हमेशा ऐसे ही 'कलमी ओहदों' पर हैं......आज भले लोग इमानदारी की पकौड़ी छान रहे हों......लेकिन जब चारों ओर से यह बिल उल पास हो जायगा, तब  हरियाली छा जायेगी सखी....आज नहीं तो कल जब  कलमी अंगूरों का मौसम आयेगा  तो देखना यही लोग 'बाड़ फाँद' जाएंगे........और हां,...........आज अपने मन की साध पूरी कर लेना.......झुमका, कंगना, बिछुआ, मांगटीका  : )

- सतीश पंचम

Sunday, December 25, 2011

साहित्यिक सौगात.....

राग दरबारी.... राग केदार...राग मल्हार.....राग... 
         नहीं जानता था कि जिस फेसबुक को मैं इतना सशंकित नज़रों से ताकता था वह कभी ऐसा भी खूबसूरत उपहार दे जायगा। जी हां, मैं अपने लिये इसे उपहार ही कहूंगा। हुआ यूं कि अभी इसी हफ्ते फेसबुक पर था कि जाने माने साहित्यकार सूरज प्रकाश जी का स्टेटस अपडेट देखा जिसमें उन्होंने अपनी इच्छा जाहिर की थी कि वे अपने चार हजार किताबों के संग्रह को लोगों के बीच बांटना चाहते हैं, उन पाठकों के हाथों में समर्पित करना चाहते हैं जो कि साहित्य में रूचि रखते हैं, या जिन्हें पठन पाठन अच्छा लगता है। बस फिर क्या था मुझे तो जैसे मुंह मांगी मुराद मिल गई। किताबें.....किताबें.....किताबें... ओह मैं तो सोच कर ही रोमांचित हो उठा। कहीं धर्मवीर भारती, कहीं निर्गुण, कहीं गोविंद, कहीं रेणु, कहीं राजेन्द्र यादव, तो कहीं विवेकी राय.......कितना तो दिलचस्प......कितना तो सुखकर। लेकिन तभी सूरज प्रकाश जी के स्टेटस पर आगे नजर पड़ी, लिखा था - किताबें लेने वाले अपने यहां से थैलीयां लेकर आएं। पढ़ते ही सूरज जी से चुहल करने का मन हुआ और मैंने लिखा - बोरा चलेगा क्या ? तात्पर्य - हम जैसे 'किकी' ( किताबी कीड़े) को थैली भर किताबों से कहां संतोष होने वाला है, हमें तो बोरा भर किताबें चाहिये :)

       खैर, प्लान बना डाला। 24-25 दिसंबर की तारीख तय की थी सूरज प्रकाश जी ने किताबें पाठकों के हाथ सौपने हेतु। बात ही बात में रश्मि रविजा जी को भी सूरज प्रकाश जी की उस पोस्ट का लिंक थमा दिया जिसमें उन्होंने अपने द्वारा संग्रहित किताबें पाठकों को देने की इच्छा जाहिर की थी। नियत समय पर सूरज प्रकाश जी के घर की ओर चल दिया। उनके सोसायटी में पहुंचने पर गेटकीपर के रजिस्टर में अपना नाम-फोन नंबर आदि दर्ज किया और लिफ्ट की ओर बढ़ा। पता चला कि वे फर्स्ट फ्लोर पर ही रहते हैं। सो सीढ़ियों से ही चल पड़ा।

       दरवाजे पर पहुंचते ही बेल बजाई, दरवाजा सूरज प्रकाश जी ने ही खोला। दुआ-सलाम हुई और तभी नज़र भीतर की ओर गई। कई लोग दिखे जो किताबों का बंडल बांध रहे थे, समेट रहे थे, गिन रहे थे। कोई कह रहा था - "अरे तेवारी, इहौ लेय ल्य हो" ! मन में कहीं हूक उठी कि शायद मुझसे पहले ही ढेर सारे 'किकी' पहुँच कर किताबें समेंट चुके हैं, लेकिन नहीं, ....मैं गलत था। वे लोग किताबें लेने जरूर आये थे लेकिन एक सीमा तक ही ले जा सकते थे और वही बांध बूंधकर ले जा रहे थे। असल भंडार तो अंदर खाने में था जहां सोफा से लेकर अलगनी, जमीन और ताखे तक किताबों से अटे पड़े थे।

       अंदर रश्मि रविजा जी दिखीं किताबें चुनते हुए। उनसे यात्रा के दौरान सम्पर्क में था तो पता ही था कि वे वहां पहुंच गई हैं। हाय हैलो के बाद मैं भी लग गया किताबें चुनने में। कहीं बिमल मित्रा की किताब दिखी कहीं कृष्णा सोबती, कहीं कमलेश्वर तो कहीं धर्मवीर भारती। एक ओर सोफे पर विश्वप्रसिद्ध कृतियों के अनुवाद करीने से सजे थे तो अलगनी पर परसाईं सजे थे। फर्श पर भी किताबें कुछ इस तरह से सजाकर रखीं गईं थी कि लेखकों के नाम पढ़ने और किताबें चुनने में आसानी हो। मैं जोरशोर से जुट गया। हर किताब लगती कि इसे भी ले लूं....उसे भी ले लूं लेकिन सब तो नहीं ले सकते थे। औरों को भी तो मिलनी चाहिये। यही तो ध्येय था सूरज प्रकाश जी का कि उनकी पढ़ी किताबें, औरों को भी मिलें, औरों तक वह ज्ञान, वह आनंद पहुंचे। सो किताबों का चयन बेहद कठिन हो गया। कुछ पन्ने पलटते, पढ़ते, फिर किताब रखते, सरकाते।

सोफे पर हिमालय.....
       दूसरी ओर सूरज प्रकाश जी बेहद व्यस्त थे। वे किताबें चुनने वालों को उनकी इच्छानुसार यथाशक्ति सहायता कर रहे थे। कोई कुछ किताब मांगता कोई कुछ। कई बार किताबें होने के बावजूद नहीं मिलतीं,ऐसे में सूरज प्रकाश जी भी कुछ परेशान दिखे। उनका परेशान होना लाजिमी था क्योंकि पिछले कई दिनों से वे अपने बदन पर लगे दर्द निवारक पट्टे के बावजूद किताबें तरतीब से सजा रहे थे ताकि पाठकों को ज्यादा ढूँढना न पड़े। लेकिन वहां इतना अंबार था कि जब चाहो तब किताबें मिलती ही नहीं थीं। पाठक के चले जाने के बाद न जाने कहां से प्रकट हो जातीं मानों कहना चाहती हों मैं यहीं तो थीं, याकि वे किताबें खुद ही सूरज जी के घर से न जाना चाहतीं थीं। इसी तरह किताबों की छुपम छुपाई बड़ी देर तक चलती रही।

      इन तमाम किताबी सेलेक्शन्स के बीच कुछ अलहदा चीजें भी देखने में आईं। एक सज्जन किताबें यह कह कर चुन रहे थे कि स्कूली बच्चों के लिये ले रहे हैं। सूरज जी की नजर पड़ी तो वह किताब मुक्तिबोध की थी। भला बच्चे कब से मुक्तिबोध पढ़ने लगे ? ऐसे में सूरज जी का झुंझलाना स्वाभाविक था कि ऐसे कैसे लोग हैं जिन्हें बच्चों की किताबें और बड़ों की किताबों में फर्क ही न मालूम पड़े। दरअसल व्यक्तिगत तौर पर किताबों के लेने की संख्या सीमित थी लेकिन लाइब्रेरी के तौर पर लेने पर संख्या दस गुना थी और इसी का लाभ उठाते हुए सज्जन जी दिखे। जो भी हाथ आया उठाते चलें। ऐसे ही वक्त पर वहां सुनी उस आवाज का अर्थ समझ आता है जिसमें बोला गया था - "अरे तेवारी, इहौ लेय ल्य हो" !

सूरज प्रकाश

          खैर, अभी किताबों का चयन चल ही रहा था कि एक पाठक ने अलगनी पर रखी भगवद्गीता भी लेनी चाही। मुझे चुहल सूझी - हां ले लिजिए...इससे पहले की बैन हो जाय....भगवद्गीता ले ही लिजिए :) और भी ढेरों किताबें ली गईं। रह रहकर सूरज प्रकाश जी से पाठकों की बातचीत भी सुनने में आती जिससे पता चलता था कि किताबों के बारे में, साहित्य के बारे में लोग अब भी कितनी रूचि रखते हैं। तभी बात राहुल सांकृत्यायन जी पर चली जिनके बारे में सूरज जी ने बताया कि वे अपने दिमाग का आम इंसान के मुकाबले कई गुना बेहतर इस्तेमाल करते थे, उनकी बातें सुनना अच्छा लग रहा था। इस बीच काफी समय बीतता जा रहा था। हमारी चुनी हुई किताबें तय व्यक्तिगत संख्या से उपर जा रहीं थी। हर किताब लगती कि इसे अपना होना चाहिये लेकिन क्या करें। उधर रश्मि जी भी कई किताबें बटोर चुकीं थीं और उनकी संख्या भी तय संख्या से ज्यादा जा रही थी। सूरज प्रकाश जी से हमने इसकी चर्चा की तो उन्होंने कहा कोई बात नहीं - आप 'रून्गा' के तौर पर ले लिजिए....रून्गा यानि 'घेलुआ' जिसका अर्थ है कि खरीदी गई वस्तुओं के साथ एकाध वस्तु ग्राहक की मांग पर या दुकानदार द्वारा अपनी ओर से डाल देना। तो इस तरह 'घेलूआ' के समानार्थी शब्द 'रून्गा' से परिचय हुआ।
सूरज प्रकाश जी के साथ मैं, सतीश पंचम.... :)

        उधर समय तेजी से बीता जा रहा था, लोग आते रहे, किताबें चुनते रहे। सूरज जी बड़ी शिद्दत से उनकी सहायता करते रहे। मन में आया कि सूरज जी से पूछूं कि आपकी इन किताबों को हम लोग लिये जा रहे हैं तो आप को कुछ तकलीफ तो नहीं हो रही लेकिन यह सवाल कुछ वैसा ही लगा जैसा कि न्यूज चैनलों पर रिपोर्टर लोग किसी को दुख में देख पूछते हैं कि आपको कैसा लग रहा है। सो मन की बात मन में ही रखा। जानता हूं कि किताबों से भावनात्मक लगाव सभी में कुछ न कुछ रहता ही है, फिर सूरज जी के संग्रह को देख समझा जा सकता है कि वे कितने बड़े 'पुस्तक प्रेमी' हैं।
  

ये साथ गुजारे हुए लमहात की दौलत

             अभी कुछ समय पहले ज्ञान जी के ब्लॉग पर भी इसी बात को लेकर चर्चा उठी थी कि हिन्दी वाले अंग्रेजी वालों के मुकाबले अपनी हिन्दी किताबों से कुछ ज्यादा ही भावनात्मक लगाव रखते हैं। उन्हें रद्दी में जल्दी नहीं देते जबकि अंग्रेजी की किताबें रद्दी की दुकानों पर आसानी से देखी जा सकती हैं। यहां भी सूरज जी का वही भावनात्मक लगाव झलक रहा था। उन्होंने किताबें रद्दी में देने की बजाय उन्हें साहित्य रसिकों के बीच बांट देना उचित समझा। हां, इस बात का ध्यान जरूर रखा कि जो कोई भी किताबें ले जाय वह उन किताबों का नाम, विवरण, अपना फोन नंबर वहां रखी डायरी में जरूर दर्ज करे ताकि भविष्य में जब कभी उन्हें रेफरेंस के लिये या कभी पढ़ने की जरूरत महसूस हो तो उस पुस्तक प्रेमी से संपर्क कर सकें।

हल्कू....झूरी.....महतो...धनिया....हामीद....चिमटा...
         वहीं एक और बात देखने में आई कि हर किताब पर सूरज जी एक विशेष स्टैम्प लगाने को कह रहे थे जिस पर सूरज प्रकाश जी के नाम, ईृमेल आई डी, फोन नंबर के साथ नीचे लिखा था कि - 'ये किताब पढ़ कर किसी और पुस्तक प्रेमी को दे दें' । इस स्टैम्प से सूरज जी के इस अनूठे प्रयास का महत्व पता चलता है जिसके जरिये उन्होंने अपनी किताबों के प्रति मोह-माया का त्याग करते हुए उन्हें पाठकों के बीच आगे भी फैलाने की चाहना रखी है । सूरज जी द्वारा किताबों के पठन-पाठन, किताबों के फैलाव, किताबों से भावुकता भरा बिलगाव देख मुझे महेन्द्र कपूर द्वारा गाया वह गीत बहुत शिद्दत से याद आ रहा है जिसे सुनते हुए लगता है कि यह गीत शायद ऐसे ही किसी लम्हे के लिये लिखा गया होगा जब कोई किसी से वक्ती तौर पर अलविदा होने को हो, बिछडा जा रहा हो और आगे कभी मिलने की उम्मीद भी रक्खे। यहां जिस अंदाज में किताबों से बिलगाव हो रहा है, उनसे फिर से कहीं नये सौगात के रूप में मिलने की उम्मीद रखी जा रही है, उनकी महक, उनके कशिश को पाने की इच्छा रखी जा रही है वह शब्दश: महेन्द्र कपूर के गाये उस गीत की याद दिला जाते है जिसमें वे कहते हैं -
हम जायें कहीं इनकी महक साथ तो होगी


अभी अलविदा मत कहो  दोस्तो
न जाने फिर कहाँ मुलाक़ात हो.....

        सचमुच, ये किताबें इसी तरह आगे भी एक दूसरे के यहां संचरित हों, पठन-पाठन हेतु फैलें तो कहीं न कहीं आपस में फिर से मिल ही जायेंगी। साथ ही इन किताबों से लिये हुए अनुभव, उनकी कशिश भी जुड़ती चली जायगी। आगे की पंक्तियां और भी बहुत कुछ कहती हैं जिनमें - चेहरे दर चेहरे से गुजरने की रवायत और महक को बखूबी उकेरा गया है.......।

ये चेहरे, ये नज़रें, ये जवां रूत ये हवायें
हम जायें कहीं इनकी महक साथ तो होगी


ख्वाबों में ही हो चाहे मुलाकात तो होगी

और अंत में गीत के बोल जैसे इन किताबों की सौगात के बारे में ही कह रहे हैं कि....
कुछ पास न हो पास ये सौगात तो होगी

ये साथ गुजारे हुए लमहात की दौलत
जजबात की दौलत, ये खयालात की दौलत
कुछ पास न हो पास ये सौगात तो होगी


बीते हुए लम्हों की कसक साथ तो होगी.....


         सूरज प्रकाश जी के इस अनूठे प्रयास की जितनी प्रशंसा की जाय कम है। उम्मीद करता हूँ कि जो लोग हिन्दी सेवा का रात-दिन दम भरते हैं, साहित्य सेवा की भावना को निरंतर भुनवाते रहते हैं, डांय-डांय सम्मेलनों, कचर-सम्मेलनों में थोथे सम्मान, बजर-सम्मान ले-देकर  'दंतिल मुस्कराहटें' बिखेरते नजर आते हैं  वे भी सूरज प्रकाश जी के इस अनूठी पहल से प्रेरणा लेंगे और अपनी साहित्यिक सेवा को एक नये नजरिये से देखने का प्रयास करेंगे।


- सतीश पंचम

स्थान - वही, जिसके सोसायटी के रजिस्टर में मैंने In-Time तो दर्ज किया लेकिन बाहर जाते वक्त पुलकित मन और किताबों के ओज़ में Out Time दर्ज करना भूल गया...... कागजी तौर पर मैं अब भी सूरज प्रकाश जी के घर में ही हूँ....उन किताबों के संग....बिनती....होरी....झुनिया....हल्कू जैसे पात्रों के बीच । ( जी हां, मैं सचमुच सूरज प्रकाश जी के सोसायटी रजिस्टर में आउट टाइम डालना भूल आया हूं :)

समय -   मिथिलेश्वर रचित 'बैराडीह की चंद्रावती' पढ़ने जैसा !

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Thursday, December 15, 2011

रागदरबारी का लंगड़ और अन्ना हजारे का 'एतिहासिक विपर्यय'

    श्रीलाल शुक्ल रचित रागदरबारी में एक बेहद दिलचस्प पात्र है ‘लंगड़’, जिसके बारे में लोगों का मानना है कि वह बड़ा झक्की आदमी है, उसकी बुद्धि बालकों सी है...फलां है, ढेकां है। बात ही बात में एक दिन लंगड़ के बारे में एक युवक रंगनाथ जानना चाहता है तो उसे गाँव वाले बताते है कि लंगड़ पास ही के गाँव का रहनेवाला है। घर-परिवार से बेपरवाह लंगड़ भगत आदमी है, भजन ओजन गाता रहता है।


          एक बार लंगड़ को तहसील से किसी मुकदमें के लिए एक पुराने फ़ैसले की नक़ल चाहिए थी। उसके लिए पहले तहसील में दरख्वास्त दी थी। दरख्वास्त में कुछ कमी रह गयी, इसलिए वह ख़ारिज हो गयी। इस पर इसने दूसरी दरख्वास्त दी। तहसील में जब लंगड़ नक़ल लेने गया तो नकलनवीस ने उससे पाँच रूपये माँगे। लंगड़ बोला कि रेट दो रूपये का है। इसी पर बहस हो गयी, लंगड़ और नक़ल-बाबू में बड़ी हुज्जत हुई। लंगड़ को भी गुस्सा आ गया। उसने अपनी कण्ठी छूकर कहा कि “जाओ बाबू, तुम क़ायदे से ही काम करोगे तो हम भी क़ायदे से ही काम करेंगे। अब तुमको एक कानी कौड़ी न मिलेगी। हमने दरख्वास्त लगा दी है, कभी-न-कभी तो नम्बर आयेगा ही। मैं बिना रिश्वत दिये ही नकल लूंगा”। उधर नक़ल बाबू ने कसम खायी है कि “रिश्वत न लूँगा और क़ायदे से ही नक़ल दूँगा”। इसी बात पर दोनों में ठन गई थी।

         दोनों की इस लड़ाई को गाँव का युवक रंगनाथ समझ नहीं पाया कि – ये क्या बात हुई। अब तक इतिहास में यही देखने में आया है कि एक पक्ष कहता था नहीं दूंगा दूसरा कहता था जरूर लूंगा। न जाने कितनी लड़ाईयां इसी वजह से हुईं। सिकन्दर ने भारत पर कब्ज़ा करने के लिए आक्रमण किया था; पुरू ने, उसका कब्ज़ा न होने पाये, इसलिए प्रतिरोध किया और लड़ाई हुई थी। अलाउद्दीन ने कहा था कि मैं पद्मिनी को लूँगा, राणा ने कहा कि मैं पद्मिनी को नहीं दूँगा। इसलिए लड़ाई हुई थी। सभी लड़ाईयों की जड़ में यही बात थी। एक पक्ष कहता था, लूँगा; दूसरा कहता था, नहीं दूँगा। इसी पर लड़ भिड़ जाते थे। पर यहाँ लंगड कहता था, धरम से नक़ल लूँगा। नक़ल बाबू कहता था, धरम से नक़ल दूँगा। फिर भी दोनों में लड़ाई चल रही थी। युवक रंगनाथ को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर यह ‘एतिहासिक विपर्यय’ क्योंकर है ?

         उधर नकलनवीस, पेशकार सभी की ओर से लंगड़ की अर्जी में कुछ न कुछ नुक्स निकाल लंगड़ की अर्जी लटका दी जाती। कभी मुकदमें की फीस वाला टिकट कम लगा बताया जाता तो कभी मिसिल का पता ग़लत लिखा है तो कोई ख़ाना अधूरा पड़ा है-ऐसी ही कोई बात बताकर नोटिस-बोर्ड पर लिख दिया जाता। यदि उसे दी गयी तारीख़ तक ठीक न किया जाये तो लंगड़ की दरख्वस्त खारिज कर दी जाती।

            इसीलिए लंगड़ अब पूरी-पूरी तैयारी के साथ मोर्चा संभालता है, अपने गाँव छोड़कर तहसील में ही बराबर नोटिस-बोर्ड के आसपास चक्कर काटा करता है। उसके द्वारा नकल लेने के सारे कायदे रट लिये जाते हैं। उसकी तमाम तैयारी आदि को देख पेशकार उसे झक्की और न जाने क्या क्या कह देता हैं, कुछ कुछ वैसे ही जैसे कि लोकपाल मसौदे को संसद में पेश करने को लेकर कुछ सांसदों द्वारा अन्ना हजारे पर छींटाकशी की गई थी। यहां भी मामला लंगड़ और सरकारी मुलाजिम की लड़ाई सरीखा ही है। उन्हीं की तरह यहां भी एक पक्ष कहता है कि हम लोकपाल कानूनी प्रक्रिया से लेकर रहेंगे तो सरकार भी कह रही है कि हां, हम भी लोकपाल कानूनी प्रक्रिया देकर ही रहेंगे। दोनों अपनी ओर से दे ही रहे हैं, फिर भी लड़ाई चल रही है। फिर वही एतिहासिक विपर्यय। ऐसे में जनता उस युवक रंगनाथ की तरह मन ही मन भावुक हुई जा रही है। रंगनाथ पर भी लंगड़ के इतिहास का गहरा प्रभाव पड़ा और वह भावुक हो गया। भावुक होते ही ‘कुछ करना चाहिए’ की भावना उसके मन को मथने लगी, पर ‘क्या करना चाहिए’ इसका जवाब उसके पास नहीं था। क्यों नहीं था इस बात को यदि आज के संदर्भ में देखा जाय तो समझा जा सकता है क्योंकि जनता भी उसी उहापोह से गुजर रही है। किस पार्टी को वह शुचित मानें, किस पार्टी को अपवित्र यह उसे समझ नहीं आ रहा। जो लोग लोकपाल को लेकर जोर शोर से समर्थन कर रहे हैं उन्हें जब ध्यान से देखती है जनता तो पाती है कि यही वे लोग हैं जिन्होंने खनन प्रक्रिया में रिश्वतखोरी के दम पर खान के खान उलट दिये हैं, तो दूसरे पक्ष पर नज़र पड़ते ही उसे टू जी स्पेक्ट्रम की बंटाई याद हो आती है कि फलां के इतने बिगहे स्पेक्रट्रम बंटे तो ढेकां के इतने बिगहे। जहां औरों पर भी नज़र जाती है तो सब कुछ गड्डम-गड्ड ही नज़र आ रहा है।
 
        ऐसे में जनता केवल यही कर पा रही है कि रंगनाथ की तरह भावुकता भरी बोली बोल रही है – "कुछ करना चाहिये",  लेकिन क्या करना चाहिये इसे न वह समझ पा रही है न दूसरों को समझा पा रही है, बस ‘भरमजाल’ में पड़ी है। देखें कब तक जनता इस ‘भरमजाल’ से निकल पाती है।
 
- सतीश पंचम

अपडेट: 30/12/2011 - @ नकलनवीस, पेशकार सभी की ओर से लंगड़ की अर्जी में कुछ न कुछ नुक्स निकाल लंगड़ की अर्जी लटका दी जाती। कभी मुकदमें की फीस वाला टिकट कम लगा बताया जाता तो कभी मिसिल का पता ग़लत लिखा है तो कोई ख़ाना अधूरा पड़ा है-ऐसी ही कोई बात बताकर नोटिस-बोर्ड पर लिख दिया जाता। यदि उसे दी गयी तारीख़ तक ठीक न किया जाये तो लंगड़ की दरख्वस्त खारिज कर दी जाती।

.............
कल रात दिये गये समय में नुक्स ठीक न करने की वजह से सांसदों द्वारा लंगड़ की दरख्वास्त फिर खारिज हो गई। लंगड़ को मिसिल अब तक नहीं मिल पाई है, अभी इंतजार और लंबा लगता है।

Sunday, December 11, 2011

हे अमात्य......हे लोकपाल.....हे द्वारपाल....

- द्वारपाल..... हमें सम्राट से मिलना है .....

- आपका परिचय  ?

- हम हैं सोलह महाजनपदों के 'महा-लोकपाल' ...

- प्रणाम स्वीकारें अमात्य.....खेद है कि आप सम्राट से नहीं मिल सकते....वो सीवीसी अफसरों की मीटिंग में व्यस्त हैं।

- शाम को तो मिलेंगे ?

- शाम को लिच्छवी नरेश से भिड़न्त के सिलसिले में सीबीआई से समन आया है.....उसी की इन्क्वायरी में जायेंगे।

- लेकिन लिच्छवी नरेश तो उनके करीबी हैं, आखिर उनसे कैसे भिड़न्त हो गई।

- कोई स्पेक्ट्रम की बंटाई में कुछ उंच नीच हो गई थी सो भिड़ गये।

- कितने बिगहे का स्पेक्ट्रम था ?

- यही कोई बावन बिगहा दस डिसमिल !

- लेकिन उसके लिये सम्राट को भिड़ने की क्या जरूरत थी, दण्डपाल को भेज दिये होते।

- दण्डपाल को आप लोग कुछ करने दो तब न.....

- हमने क्या किया ?

- महाजनपदों में हुई सैनिक भर्ती को लेकर आप लोग ही तो इन्क्वायरी कर रहे हैं

- तो महादण्डपाल या क्षेत्रपाल को भेज दिये होते...

- वो भी किसी भूमि अधिग्रहण के सिलसिले में फंसे हैं.......अवन्ति की जनता ने धांधली का आरोप लगाया है...

- कैसी धांधली ?

- सैनिक फार्म की जमीन को गांधार के वणिक विश्वशर्मन के हाथों औने पौने दामों में अलॉट करने के कारण।

- तो वह वणिक गांधार का विश्वशर्मन ही था ?

- हां, लेकिन आप क्यों पूछ रहे हैं लोकपाल जी ?

- हमारे लोकपाल भवन बनाने का ठेका भी उसी वणिक विश्वशर्मन को मिला है .

- तो क्या आपको गांधार के उस वणिक विश्वशर्मन की पृष्ठभूमि नहीं पता थी ?

- नहीं, हमारे पास ऐसी कोई सूचना प्रणाली नहीं है जिसके जरिये हम किसी की पृष्ठभूमि की जांच कर सकें.

- तब किस बूते आप लोग सोलहो महाजनपदों की लोकपाली करे जा रहे हैं ?

-किस बूते कर रहे हैं, अब कैसे बतायें द्वारपाल........अच्छा....ये बताओ कि सम्राट मिलेंगे कब

- सूखे सूखे बता दूँ ?

- ओह...समझा.....तो तुम्हें तर माल चाहिये ?

- अब आप लोगों से क्या छुपाना...सब कुछ तो जानते ही हैं.

- आपको भय नहीं लगता.....लोकपाल से ही रिश्वत मांगते ?

- भय कैसा लोकपाल जी, आप लोकपाल...मैं द्वारपाल.....और किसी नाते से न सही....कम से कम नामों की साम्यता के नाते ही इतना तो हक बनता है.

- तो ऐसे न बताओगे ?

- नहीं.

- तो जाओ हमें सम्राट से नहीं मिलना....हम ऐसे ही चले जाते हैं.....लेकिन याद रखो....हम सम्राट से तुम्हारी शिकायत जरूर करेंगे.

- तो जाओ कर लो......सम्राट खुद तुम से नहीं मिलना चाहते.....कह रहे थे उनके तमाम अमात्य, दण्डपाल, क्षेत्रपाल अपना काम धाम छोड़ तरह तरह की जाँच में फंसे हैं न कहीं नये पोखर खुद रहे हैं न राजप्रासाद....न कोई विजय-स्तम्भ गड़ रहे हैं न कुछ....औरों की छोड़िये, खुद राजमहल के नाबदान का निर्माण इन तमाम जांच प्रिक्रियाओं से बाधित हो रहा है.....और लोगों को लोकपाल के दायरे में लाते तो चलता, आपने सम्राट तक को लोकपाल के अधीन ला दिया......

- क्या करें, पारदर्शिता जरूरी है द्वारपाल

- पारदर्शिता माय फुट .... उधर शकों द्वारा सीमांत प्रदेश में लूटपाट की खबरें आ रही हैं....उन पर अंकुश करने की रणनिति बनाने की बजाय हमारे सम्राट राजमहल के नाबदान में उलझे हैं।

- शुक्र मनाओ कि नाबदान में ही उलझे हैं, कभी लोकपाल से उलझें तो पता चलेगा, बावन बिगहे का स्पेक्ट्रम, मात्र 'पगहे' भर में सिमटा देने का क्या अंजाम होता है.

- वो देखिये सम्राट यहीं चले आ रहे हैं......

- लेकिन वे रूककर मुझसे मिले क्यों नहीं

- लगता है नाबदान चोक होने से पानी फैल गया है.....अबके संभाले नहीं संभल रहा :)


- सतीश पंचम

Thursday, December 8, 2011

'ब्रिजायन'.....बजरिये मुम्बईया चौताल :)

          खबर सुनने में आई है कि राज्यसभा के स्टैंडिंग कमेटी की मीटिंग के दौरान भाजपा के सांसद अहलूवालिया और कांग्रेस के राशिद अल्वी के बीच कुछ धक्का धुक्की हुई। एक ने आरोप लगाया कि उसने मुझे धक्का मारा तो दूसरा कहता है कि मैंने नईं किता। खैर, इन दोनों की धक्कम धुक्की का मसला इतना बड़ा हो गया कि दोनों ही प्रेस में आकर बयान देने लगे। .च्च...च्च..च्च.। अब इन लोगों को क्या कहूं।


        मन करता है कि ऐसे लोगों को लाकर मुंबई के तमाम रेल्वे ब्रिजों में से किसी एक पर खड़ा कर दूं...ठीक वैसे समय जब प्लेटफार्म पर कोई गाड़ी आने वाली हो। न न मैं कोई उन्हें ब्रिज से नीचे धक्का देने की नहीं सोच रहा न कूदने के लिये प्रोत्साहित ही कर रहा हूं....बस उन्हें किसी ब्रिज पर खड़ा होने को कह रहा हूं। जो लोग मुंबई की लोकल से यात्रा करते हैं वह समझ गये होंगे कि मेरा इशारा किस ओर है। दरअसल ब्रिज पर खड़े होने वालों का अपना अपना उद्देश्य होता है, अपनी अपनी सुविधा होती है। होता यह है कि मुंबई की जीवनरेखा कही जाने वाली लोकल ट्रेनें कुछ स्लो होती हैं कुछ फास्ट। स्लो से तात्पर्य ऐसी लोकल ट्रेनें जो हर स्टेशन पर रूकते जांय और फास्ट का मतलब ऐसी लोकल ट्रेनें जो कुछ बड़े स्टेशनों पर ही रूकते हुए जांय। अब मुंबई ठहरी मिनट मिनट का हिसाब रखने वाली। सो हर किसी को जल्दी होती है। हर कोई चाहता है कि घर या ऑफिस जल्दी पहुंचे और इसी दौरान उन्हें चुनाव करना होता है कि स्लो ट्रेन पकड़े या फास्ट। चूंकि दोनों ही किस्म के ट्रेनों के आने जाने का प्लेटफार्म अलग अलग होता है तो लोग दोनों प्लेटफार्मों के बीच यानि ब्रिज पर खड़े हो जाते हैं कि जो भी ट्रेन आये उसे पकड़ा जाय।

            ऐसे में होता यह है कि ब्रिज पर खड़े अनावश्यक लोगों की संख्या बढ़ जाती है। लोग वहीं ब्रिज के उपर खड़े होकर ताकते हैं कि देखें पहले कौन सी ट्रेन आती है....जो ट्रेन पहले आती दिखे लोग उसी प्लेटफार्म की ओर लपक लेते हैं। उधर ट्रेन के आते ही उसमें से उतरने वाले यात्री भी ब्रिज की ओर लपकते हैं और बड़ी तेजी से क्योंकि देर करते ही पीछे से आने वाले यात्रीयों की भीड़ बढ़ जायेगी और ब्रिज पर चढ़ना मुश्किल हो जायगा।

 उसी बीच कोई मछली बेचने वाली अपना टोकरा लेकर आ गई तो हो गई मुसीबत। फिर तो उस भीड़ भड़क्के में आप हैं, आपकी घुटती हुई सांस है और है उपर से टपकता मछली वाला गन्धाता पानी। एक दो बूंदें पड़ने की देर है कि फिर सारा दिन आप ऑफिस में गन्धाते फिरेंगे। बहुत संभव है अमिताभ बच्चन जो पोलियो ड्राप पिलाते वक्त कहते हैं - 'दो बूंद जिन्दगी के' वाली पंचलाइन किसी ऐसे ही वक्त पर लिखी गई हो जब लेखक ऐसे ही किसी ब्रिज पर चढ़ने उतरने के दौरान अंटा पड़ा हो और पीछे खड़े मछलीवाले की टोकरी से दो बूंद उस पर टपक पड़े हों। वहीं से उसे अपनी जिन्दगी की ये दो भयंकर बूंदें याद रह गई हों और वही लिख मारा हो - दो बूंद जिन्दगी के। सच मानिये वे दो बूंदे किसी को भी जिन्दगी भर याद रहेंगी ऐसी तीखी गंध होती है मछलीवाली टोकरी से रिसते पानी का। अक्सर देखा गया है कि उन्हीं महिलाओं को ज्यादा अखरता है ये मछलीवाला पानी जो बहुत पावडर आदि लगा लूगू कर जाती हैं ऑफिस या फिर ऐसे टाईदार फस्स क्लास वाले यात्रीयों को जो कि नाक पर रूमाल रख चलने को मजबूर होते हैं।

ऐसे में मछलीवाले भी यह असहजता समझते हैं और बोलते हुए चलते हैं कि मच्छी का पानी...मच्छी का पानी ताकि सामने वाला थोड़ा रास्ता देकर चले अन्यथा दो बूंद टपक गया तो पूरा दिन ऑफिस में गन्धाते फिरेंगे। इसलिये लोग जैसे ही सुनते हैं - मच्छी पानी वैसे ही बगल हटने लगते हैं और मछली वाले को रास्ता मिलता जाता है। उसी बात का कुछ यात्री फायदा भी उठाते हैं और चुहल करते हुए नाहक मुंह से मच्छी पानी...मच्छी पानी की रट लगाते हैं जिससे कि भीड़ भाड़ में से रास्ता मिले और उन्हें रास्ता मिल भी जाता है , ये अलग बात है कि रास्ता देनें वाला उन्हें देर तक घूरते रहता है या मुंह में ही बड़बड़ाकर गरिया देता है।

           अब बात यहीं तक होती तो ठीक थी लेकिन यहां आप को ब्रिज पर चलने की अपनी रफ्तार सहयात्रियों की रफ्तार के साथ बनाये रखनी होती है। जरा सा भी आप रूके या धीमे हुए तो पीछे वाले यात्री चिल्लाने लगते हैं कि अरे जरा जल्दी चलो....नहीं चलने का तो साइड में हो जाओ। इस चिल्लाहट की भी अपनी वजह है। यात्री एक प्लेटफार्म पर उतर कर दूसरी ट्रेन बदलते हैं या दूसरे प्लेटफार्म पर किसी तेज लोकल के आने के अंदेशे में वहां जल्दी पहुंचना चाहते हैं ताकि ट्रेन छूटे नहीं। ऐसे में आप यदि चल रहे हैं तो पीछे वाले को भी लगना चाहिये कि आप को भी उतनी ही जल्दी है जितना कि उसे है वरना वो आप को टोकेगा कि जल्दी चलो। आपकी भाव भंगिमा ऐसी होनी चाहिये जैसे आप इस सुस्त चाल से परेशान हैं, चुपचाप चलने का मतलब है कि आप को कोई जल्दी नहीं है और पीछे वाला आपकी इस चाल को भांपते ही टोकेगा जरूर - अरे लवकर चलो ना।

           अब जहां इतनी जल्दीबाजी मचेगी तो शॉर्ट टेम्पर्ड लोगों के बीच कहासुनी भी होने की संभावनाएं हैं और जमकर कहा सुनी होती भी है। लोग समझते हैं इस धक्कामुक्की को और बच बचाकर चलते भी हैं कि किसी से धकड़ धुकड़ को लेकर कहासुनी न हो जाय वरना सुबह सुबह मूड खराब हो जायगा। कुछ रोचक स्लैंग्स या कहें बतकही भी सुनने में आती है। एक बार अंधेरी स्टेशन के ब्रिज पर देखा कि एक युवती किसी युवक से धक्का धुक्की वाली बात पर कुछ अनाप शनाप कह रही थी। युवक भी तैश में आ गया। लगा गरियाने कि - अगर तू इज्जतवाली होती तो ऐसे सबके सामने आरडा-ओरडा नहीं करती.....गरदी का टाईम है...धक्का लग गया तो शुरू हो गई बोम्बा-बोम्ब करने कू.... तू है ही अइसी लफड़ेवाली। अब युवक की इस बात से चौंकना स्वाभाविक है। हां भी नहीं कह सकते ना भी नहीं कह सकते। हो सकता है युवक ने जान बूझकर युवती को धक्का दिया हो या अनजाने में लग गया हो लेकिन युवती द्वारा आवाज उठाना उसे 'चालू टाइप' में कैटेगराइज कर गया। ( नारीवादी पढ़न्तू जरा इस पैरे को इग्नोर करके चलें....फालतू में हम बहसबाजी में अपना मूड़ खराब करना नहीं चाहते, क्योंकि असल मामला क्या था न मैं जानता हूं न कोई और...ये उन दोनों की बतकही थी जिसे जस का तस रखा गया है )

            ओह....इस चक्कर में तो हम भूल ही गये कि बात सांसदों के आपसी धक्का मुक्की की हो रही थी :) खैर, इन मुम्बईया ब्रिजों के बारे में थोड़ा और बताता चलूं कि जब कोई भी धक्का लगने को लेकर किसी यात्री से उलझता है तो उसे बदले में और भी धक्के लगते रहते हैं जिसका उसे पता तो चलता है लेकिन वह पहले वाले धक्के को लेकर ही अड़ा होता है कि मुझे धक्का क्यूं मारा ? उधर दोनों की पूछ पूछोर चलती रहती है पीछे वाले यात्री दोनों को धक्का देकर आगे निकलते जाते हैं। उनके लिये बाकी धक्के गौण हो जाते हैं, पहला धक्का अतिमहत्व का हो जाता है। तूने धक्का क्यों मारा......लगा क्या....लग गया तो भीड़ में चलता है.....वो छोड़.....तूने धक्का क्यों मारा ?

           समझ सकते हैं कि ऐसे माहौल में जब इन धक्काबाज सांसदों को खड़ा कर दिया जायगा तो क्या होगा ? इधर उनके बीच हुई धक्कम-धुक्की को लेकर बहस चल रही होगी उधर पीछे से आ रहे नये यात्रियों का रेला उन्हें आगे की ओर ठेल देगा। देश आगे बढ़े न बढ़े सांसद जी आगे जरूर बढ़ जायेंगे। दोनों में से कोई चालाक निकल गया तो घोषणा भी कर देगा कि मेरी लोकप्रियता का पैमाना नापना हो तो मेरे अगल बगल सट कर चल रहे लोगों को देखो, मैं कितना लोकप्रिय हूं कि लोग मूझे छूने को लालायित हैं.....सट कर चलने को बेताब हैं।

उधर दूसरा सांसद यदि और चालू निकल गया तो कहेगा - इन्हें मैने ही भेजा है...... तूम्हें घेरने के लिये :)

      हांय....ये सब मैं क्या लिख गया..... सांसद कोई  आम आदमी हैं जो इस तरह उल्लेखित किये जा सकते हैं......एक सिद्धू  भाई साहब को ही देख लिजिए.......गार्ड ने आईडेंटिटी क्या पूछ ली भाई साब  उखड़ लिये :)   कल को कहीं सिब्बल चच्चा ने देख लिया कि सांसदों को 'ब्रिजायन' करवा रहा हूँ  तो डिफेमेशन और विशेषाधिकार जैसी येअ बड़ी बड़ी धाराएं लगा देंगे......:) 

 क्या करें, जमाना बड़ा खराब है मउसी..... फिर कहा भी तो है -

रामचंद्र कह गये सिया से ऐसा भी युग आएगा,
सेंसर होगा फेसबुक और ट्वीटर भी हकलायेगा

ऐअे....रामचंद्र कह गये सिया से :)


- सतीश पंचम
 
 
 
Image Courtesy : http://www.flickr.com/photos/36838887@N05/

Tuesday, December 6, 2011

चकचोन्हर बालम.....मादलेन बबुनी.........

    यह वो वक्त था जिस दिन दुपहरीये में साढ़े तीन बजे अयोध्या मसले पर फैसला आना था। चारों ओर फैले तनाव और दहशत के बीच यह शब्द कोलाज़ लिखा उठा। 'लिखा उठा' इसलिये कह रहा हूँ क्योंकि उस माहौल में यही सब 'लिखहरी' चलती है, सारे  दिमागी तंतु तब च्यवनप्राश घोंटते प्रतीत होते हैं। उस पोस्ट के पुन:प्रकाशन के बीच पेश है वही......गुले-गुलज़ार.....चकचोन्हर बालम.....मादलेन बबुनी।

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       बस में बैठा हूँ...... मोबाइल एफ एम से गाने सुनते हुए नज़रें खिड़की के बाहर .......फिज़ा में अयोध्यात्मक धुंधलका फैला है...... …मन ही मन सोच रहा हूं.......उस अँधे कुँए की तलहटी किस युग तक गई होगी ......द्वापर....त्रेता....कलि.....या फिर वर्तमान सतयुग ही उस अँधे कुएं की तलहटी है.......साठ साल के अदालती उजाले से जी नहीं भरा प्यारे.......देखना चाहोगे सतयुग ईरा...... वो देखो कहीं बसों की खिड़कियों पर जाली बंधी है...... कहीं पुलिस की वैन खड़ी है........ कहीं राजनीतिक पार्टीयों के बैनर ........हर एक में पासपोर्ट साइज फोटो से लेकर लार्जर देन लाइफ वाले मुखड़े......जिन्हें देखते ही भय होता है.......इनके घर वाले इनको कैसे झेलते होंगे........कही कोई अदनी सी अपील कर रहा है शांति बनाए रखें......कोई भर भर के मार्मिक अपील कर रहा है......तो कोई धकधका कर अपील उड़ेल रहा है ....लेकिन अपील जरूर कर रहा है .........शांति की अपील.....अमन की अपील...... लेकिन किससे......जनता से.....पब्लिक से.......अरे.....जनता तो पहले ही शांत है बे...... उससे अपील क्या करना....लफड़ा करने वाले तुम लोग.....छूरी चाकू वाले तुम लोग...... औ अपील जनता से...... जा घोड़ा के सार लोग।

           एक बैनर बोल रहा है.....हिन्दु-मुसलिम-सिक्ख-इसाई.....आपस में सब भाई-भाई.....अच्छा....तो भाई होने से आपस में लड़ाई नहीं होती ......ओ अंबानीया........पढ़ा कि नहीं रे.....सर्व शिक्षा अभियान.....सब पढ़ो...सब बढ़ो............भाई भाई में कौन लड़ाई............अच्छा छोड़ो..... मत पढ़ो..... गाना सुनो एफएम वाला .....बीड़ी जलइले जिगर से पिया.....जिगर मां बड़ी आग है.....जियो रे जिगर......साला जिगर न हुआ कंपनी का बाइलर हो गया........फक फका कर जलता है।
             उ छुटभैया बैनर कहता है - जब Diwali में Ali है और Ramzan में Ram तो क्यों लड़े हिन्दु और क्यों लड़ें मुसलमान.....धुत् सारे ......अब रोमनवा में लिख लिख कर पब्लिक को बताएगा कि देखो इसमें ए है तो उसमें उ है..... इही को कहते हैं चोरकटई चाह। अरे जहां मन चंगा तो काहे का दंगा और तुम आए हो कहने इसमें अली है औ उसमें वली है.........हटाओ अपना बैनरहा बुद्धि .....साला फ्लैक्स की तरह बुद्धि भी फ्लैक्स वाली हो गई है तुम लोगन की......


              औह.......रह रह कर जेहन में ‘इनभर्सिटी’ के प्रोफेसर काशीनाथ सिंह की लिखी ‘काशी का अस्सी’ पन्ने दर पन्ने फड़फड़ा रही है – ‘परलै राम कुक्कुर के पाले....खींच खांच के लै जाएं खाले’ ......... अब जाकर पता चल रहा है कि इहका मतलब.............अशोक पांड़े जी कहिन बजरिए काशी का अस्सी............ कहां तो भगवान राम की महिमा.......और कहां तो राजनीतिक कुकुरबाजी.....ससुरों ने ले जाकर राम जी को भी मोकदिमा-मोहर्रिरी में घसीट लिया।


            बताया है काशीनाथ सिंहवा ने लिखते हुए कि - काशी के अस्सी घाट पर रहने वाले शास्त्री की दुविधा ........ मकान को किराए पर देना है इसाई महिला मादलेन को.....लेकिन कैसे दें...... एक तो इसाई.....औ दूजे महिला..... लेकिन मोह ए किराया बड़ा भारी...... लागी छूटे नाहीं रमवा............मन मारकर तैयार हुए.........आखिर समझाने वाले कन्नी गुरू ...... समस्या आई अटैच बाथरूम की......मादलेन को अटैच बाथरूम चाहिए....करने कुरने के लिए............

          तब बोले कन्नी गुरू.......औ जम के बोले...... शास्त्री जी आप का गोत्र मेरे गोत्र से नीचे है.....मेरा गोत्र आपके गोत्र से उंचा है........ मैं बता रहा हूँ ..... वही मानिए ...... टाइलेट के लिए वही कमरा दे दो.... थोड़ा फेरबदल करने से अटैच टाइलेट बन जाय तो क्या हरज ।
             अरे वो कमरा....... उहां तो महादेव जी हैं....रास्ते में आते जाते लोग फूल माला भी चढ़ाते हैं महादेव जी पर.........कैसे उसे स्थान को टाइलेट में बदल दूं.......लेकिन जब समझाने वाले कन्नी गुरू..... तो जाता कहां है रे......अरे महादेव जी कोई रामलला हैं जो एक जगह जम गए तो जम गए.....अरे महादेव जी ठहरे नंदी बैल वाले हैं....आज इहां....तो कल उहां.....वो कौनो एक जगह टिकने वाले थोड़ी हैं......और आप हो कि महादेव जी को कैद करके कुठुली में रखे हो.....पाप....घोर पाप..... दे दो कमरा मादलेन को....बना दो टाइलेट....और......देखते देखते घर के आगे बालू.....इंट....गिरने लगी......टाइलेट जरूरी..........किराया जरूरी.......जय हो प्रभू तार लिया..........ओ काशीनाथ.....आरे वही कासिनाथ राजेस ब्रदर के सामने पेपर बिछा कर लाई रख के एक झउआ मिरचा बूकता था.....ओही कासीनाथ.................जियो रे इनभर्सिटीया बुद्धि .....का लिक्खा है........जय हो मादलेन...... जय हो कन्नी गुरू.......जय हो दालमंडी.....दालमंडी बूझते हो न कि उहो में फइल......।

        लेकिन है बतिया वही........... कि राम रहें कि महजिद ..........औ फिर उन चकचोन्हर पार्टी लोगन का क्या.....किस पर लड़ेंगे.....किस पर लड़वाएंगे ........मु्द्दा खतम......ए नेताइन......कल ......कचहरी लग रही है...........फैसला हुई जाई.....आज से नेताई वाला खरचा पानी बन्न......कहां से खिलाएंगे लइका बच्चा.......कहां से फीस उस भरेंगे..............कचहरीया बालम छिटकाने वाले हैं. ..... इल्लो.... गुलजार बीड़ी सुलगाय दिए हैं...... जलाते हुए FM पर बोल रहे हैं..........इक दिन कचहरी लगाय लियो रे....बोलाय लियो रे ....दुपहरी...............का हो पांड़े........मुकदिमा का फैसला कब है........अरे उहै आर....कहा है न कि....... पान खाए मुन्नी जरूर मिलना...... साढ़े तीन बजे....... मुन्नी जरूर मिलना .........साढ़े तीन बजे......... चलो जो भी होगा..... फइसला मनबै के परी......बकि सुपरीम कोरटो त है बाद में........


           धुत्त सारे......तूम ठीक दुपहरीया की पैदाइस हो.........जौन होगा इहीं होगा कि तुम और सुपरीम कोरट को बीच में ला रहे हो.......एकरे बाद सब बवाल फवाल बंद........... का कहते हो यादौ जी......बोलो जोर से ...........बिरिन्दाबन बिहारी लाल की जय......राम लला की जै.......भईया राम राम..... जय सिरी राम....... गुड आफ्टरनून.......... अबे साले तुम अब जैरमी करना भी छोड़ि दोगे क्या .................बोलो आँख मून्न......गुड आफ्टर नून्न.


- सतीश पंचम


स्थान - अयोध्या से पन्नरह सौ किलोमीटर दूर।


समय - वही, जब साठ साल पुराने अँधे कुँएं मे झांकते समय आँखों पर चोन्हा मारने लगे।

(इस शब्द कोलाज़ का आधार काशीनाथ सिंह की लिखी 'काशी का अस्सी' और गुलज़ार की 'बीडी़ जलइले' है.....बेहतर परिणाम हेतु काशी का अस्सी जरूर पढ़े.....दिमाग के सारे तंतु खिल उठेंगे :)

Sunday, November 27, 2011

जिन्दगी का एक एपिसोड ऐसा भी रहा......

     यूं तो हम बड़ा हउंकते-फउंकते हैं कि हम ये हैं, हम वो हैं लेकिन शरीर की एक जरा सी नस क्या खिंच जाती है, नजरिया 'तिरपन-चउअन' हो उठती है। उस वक्त शरीर के सारे अवयव धमनी, शिराएं, नील, अलय, अलिंद एक साथ सारे कपाट सामूहिक क्रंदन करते हुए लगते हैं। अभी हाल ही में कुछ इन्हीं तरह की परिस्थितियों से दो चार हुआ हूँ।


          हुआ यूं कि बेड पर बैठे-बैठे लैपटाप पर कुछ काम कर रहा था कि अचानक लगा कि बायें पैर की नस कुछ खिंच सी रही है। लैपटाप साइड में रखकर खड़ा हुआ लेकिन नस सामान्य होने की बजाय और तेजी से खिंचने लगी। अभी एक-दो सेकंड बीते थे कि यूं लगा जैसे बांए पैर की नस एंठने सी लगी है, ठीक से खड़ा होना मुश्किल। श्रीमती जी और बच्चे एकसाथ चौंके कि ये क्या हो रहा है मेरे साथ। श्रीमती जी के कंधे का सहारा लेकर खड़े होने की कोशिश की लेकिन कटे पेड़ की तरह जमीन पर मैं गिरा जा रहा था। श्रीमती जी परेशान कि अब क्या करूं। और तभी मुझे अचानक ही तमाम आवाजें सुनाई देनी बंद हो गईं। कानों में एक पतली सीटी सी बजती लगी। भयंकर गर्मी से मेरा पूरा बदन पसीने से नहा गया। करीबन तीस-पैंतीस सेकण्ड बीते होंगे कि मुझे उल्टी सी आने लगी, किसी तरह श्रीमती जी वाश बेसिन की ओर ले गईं, पहुंचते ही भड़ाक्...... जो कुछ खाया पिया था सब बाहर।

अब......

    उल्टी होते ही अगले कुछ क्षणों में महसूस हुआ कि जी हल्का हुआ है, मेरा ध्यान पैरों की ओर गया। दर्द वहां कुछ कम तो हुआ था लेकिन नसें अब भी जैसे चटक रहीं थीं, खिंच रही थीं। एक दो सेकंड बाद आवाजें भी हल्के-हल्के सुनाई देनें लगीं, मेरी श्रवण शक्ति कुछ-कुछ लौट रही थी। नसों की एंठन अब भी रूकी न थी। जरा सा पैर हिलता और नस फिर खिंच उठती। मैं लेटना चाहता था, श्रीमती जी मुझे वाश बेसिन के पास से हटा उचित जगह पर सुलाना चाहती थीं लेकिन हालत ऐसी नहीं थी कि जरा भी आगे बढ़ पाउं। जरा सा पैर इधर-उधर मुड़ते ही फिर से नसों का भयानक दर्द शुरू होना चाहता। नतीजतन वाश बेसिन के पास वहीं जमीं पर मैं धीरे से लेट गया। परिवार के लोग सकते में थे कि क्या किया जाय, किसी की कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या किया जाय। उधर मैंने धीरे से अपना एक पैर दूसरे पैर पर सहारा देते हुए रख दिया। नसों का एंठना कुछ कम हुआ। धीरे-धीरे सारा दर्द कम से कमतर होता गया और अगले दो तीन मिनट के भीतर ही मैं सामान्य सा हो गया। वाश बेसिन में मुँह धोया, पानी के छींटे मारे और बिस्तर पर पड़ गया। श्रीमती जी ने चादर ओढ़ा दी। जिद करने लगीं कि डॉक्टर के पास अभी के अभी चला जाय, भाई भी तब तक आ गये, उन्होंने भी जिद किया कि चलिये अभी के अभी डॉक्टर के पास। लेकिन मुझे उस वक्त सोना अच्छा लग रहा था। मुँह पर पड़े पानी के छींटे शीतलता प्रदान कर रहे थे। मुझे जहां तक याद आ रहा है, मैं बिल्कुल बच्चे की तरह पैरों को सिकोड़कर सोया था और बदहवास श्रीमती जी जिद कर रही थीं कि डॉक्टर के पास चलते क्यों नहीं।

       आँख खोलकर श्रीमती जी को आश्वस्त किया कि अब सब ठीक है, सुबह चलते हैं। इस वक्त इतनी रात मैं नहीं जाने वाला। उधर छोटे भाई मुझ पर गुस्सा हो रहे थे कि नाहक जिद कर रहा हूँ। लेकिन मैं था कि उठना नहीं चाहता था और अंतत: नहीं ही गया। इतना याद है कि रात भर श्रीमती जी उठ उठ मुझे देखतीं, माथे पर हाथ रखतीं, पैर दबाती और फिर सो जातीं। मेरी नींद ऐसे में कई बार खुली। अगले दिन जब उठा तो सिर भारी-भारी लगा। सुबह सुबह ही अपने कश्मीरी डॉक्टर गुप्ता जी के पास पहुँचा। उनसे पिछली रात वाली घटना का जिक्र किया तो उन्होंने तुरंत ही CT Scan की सलाह दी। जरूरी भी था क्योंकि जिस वक्त नस खिंची थी मैं क्षण भर के लिये कुछ सुन नहीं पा रहा था और उस दौरान उल्टी भी आई थी। डॉक्टर से मिलते वक्त भी सिर दर्द हो रहा था। अमूमन सिर में या ऐसे किसी हादसे के बाद उल्टी आना काफी खतरनाक माना जाता है।

      नतीजतन, अगले ही घंटे CT Scan की मशीन के सामने था। फिल्मों में कई बार देखा था कि लोगों को सुलाकर एक मशीन के भीतर खिसकाया जाता था, लेकिन यह मेरा पहला अनुभव था। ठंडे ठंडे माहौल में जब मुझे मशीन पर लिटाकर उस गोल चैम्बर में खिसकाया जा रहा था, तब कुछ अजब सा लगा। अंदर चैम्बर में जब सिर गया तो अचानक आपरेटर ने कुछ बटन-बूटन दबाया और एक हल्की रोशनी मेरे सिर के इर्द गिर्द घूमने लगी। यूं लगा जैसे सारा ब्रह्माण्ड मेरे सिर के इर्द गिर्द चक्कर लगा रहा है। तीन चार मिनट बाद वह सारा जादुई माहौल खत्म हुआ। ठंडे चैम्बर से बाहर आया। मन में एक आशंका कि क्या होगा, क्या न होगा, बदन में अब भी पिछली रात के हादसे की वजह से हरारत थी। रिसेप्शन पर पूछा तो पता चला कि रिपोर्ट अगले दिन शाम को मिलेगी।

      घर पहुंचने तक मन में तमाम उलूल-जूलूल खयाल आते रहे। न जाने रिपोर्ट में क्या आये क्या न आये। ध्यान बंटाने के लिये फेसबुक पर समय बिताया, एकाध स्टेटस अपडेट किया। ब्लॉगों पर चक्कर लगाया तो हर जगह पवार को पड़े तमाचे की गूंज थी। हरविन्दर, पवार और तमाचा सब जगह छाया था। मन में आया कि फेसबुक पर स्टेटस लिख दूं - 'जब जब सीता जैसे पवित्र लोकतांत्रिक प्रणाली का  बलशाली नेताओं द्वारा हरण होगा, हरविन्दर जैसे जटायु झपट्टा मारते रहेंगे'। लेकिन वह सब लिखने का मन भी न हो रहा था.... न ही किसी की खिंचाई कर मौज लेने जैसी बात मन में उठ रही थी। ध्यान बार-बार पिछली रात के हादसे की ओर जा रहा था कि आखिर क्या था जो मेरी हालत अचानक ही एकदम असहाय, जीर्ण, कटे पेड़ सी हो गई थी। मन कई आशंकाओं से दो चार हो रहा था। किसी तरह एक दिन बीता। फेसबुक पर स्टेटस अपडेट में अपने इस मशीनी अनुभव को चंद पंक्तियों में लिखा। इस बीच घर में मेरी बड़ी फिक्र की गई। श्रीमती जी हर घंटे डेढ़ घंटे मेरा हालचाल लेती रहतीं। बड़ा अच्छा लग रहा था। मन किया ऐसे ही हालचाल लेती रहा करो, वरना तो बाजार से भिण्डी, तोरई और पालक लाना है जैसे रोजमर्रा वाली बातें ही सुनने में आती थी :)

       होते होते वह वक्त भी आया जब CT Scan की रिपोर्ट मेरे हाथ आई। खोलने से पहले ही धुकधुकी बढ़ गई कि क्या होगा। सफ़ेद कागज पर लिखे एक शब्द पर नजर पड़ी - Normal. और मैं चहक उठा। बाकी लाइनें भी पढ़ा। सारा कुछ नॉर्मल। दिल से जैसे कोई बोझ हट गया। काले रंग की शीट निकालकर देखा तो मेरे दिमाग की स्लाइस कटिंग दिखी। मन ही मन खुश हुआ कि चलो मेरे पास अब सबूत है कि हां, मेरे पास दिमाग है। वरना तो श्रीमती जी, कई बार मेरे दिमाग के होने न होने को लेकर आशंका व्यक्त कर चुकी हैं :)

      लौटानी में डॉक्टर से मिलता आया। उन्होंने भी राहत की सांस ली। ताकीद दी कि लैपटॉप आदि लेकर ज्यादा देर एक ही पोजिशन पर न बैठूं। उनकी बात सच भी थी। जिस वक्त नस खिंची थी उस दौरान करीब तीन चार घंटे लैपटाप के साथ बैठा था। श्रीमती जी, जो मेरे लैपटाप को हारमोनियम की तर्ज पर 'पेटी-बाजा' कहती हैं, ने उस वक्त भी टोका था कि - अब अपना 'पेटी-बाजा' बंद भी किजिए। चाय पड़े पड़े ठंडी हो रही है, लेकिन न जाने क्या हुआ कि मैं काफी देर तक सामने टीवी देखते हुए लैपटाप में घुसा रहा। कभी ऑफिस का कोई काम तो कभी अपना ही कोई लेख-लूख। इसी बीच पैर की नस खिंच गई। हड़बड़ी में लैपटॉप साईड में रख तुरंत खड़ा होने से नस पर नकारात्मक असर पड़ा और फिर एंठन जो हुई तो बढ़ती चली गई।

        खैर, डॉक्टर की मीठी डांट सुन घर आया, परिजनों, मित्रों और ऑफिस के कलीग्स को इन्फार्म किया। घर में सबने राहत की सांस ली। उधर पिताजी का गाँव से फोन आया कि हरदम लैपटाप में आंख गड़ाये रहते हो, तनिक डोल-हिल लिया करो। श्रीमती जी, अलग भुनभुना रहीं थीं....और बैठो लैपटाप लेकर, .....फलां...ढेकां....और भी न जाने क्या-क्या। चुपचाप सब कुछ सुनता रहा। कर भी क्या सकता था। बाद में दोपहर में फेसबुक ओपन किया, थोड़ा रवीश कुमार के स्टेटस पढ़ा, थोड़ी मौज ली, थोड़ा ज्ञान जी के जवाहिरलाल से मौज ली। मन थोड़ा हल्लुक हुआ तो सोचा इस अनुभव को भी ब्लॉग पर शेयर किया जाय। आखिर ऐसे मौके बार बार थोड़े ही आते हैं कि सारा ब्रह्माण्ड अपने चारों तरफ घूमता लगे। जब मैंने यह बात फेसबुक पर लिखा तो प्रशांत प्रियदर्शी का कहना था कि - वह तो इस टेस्ट के दौरान सो गये थे :-)   विवेक सिंह जी का कहना था कि बिना मशीन में गये हुए ही उन्हें ब्रह्माण्ड अपने सिर के चारों ओर घूमता लगता है :)

         Anyway, अब अपनी तबियत बिल्कुल चंगी है। 'पेटी-बाजा' अब भी इस्तेमाल करता हूँ लेकिन संभलकर। लेकिन जिंदगी के इस भयानक एपिसोड से गुजरने के बाद अब महसूस हो रहा है कि उम्र के इस अड़तीसवें साल में डेंजर जोन आन पहुंचा है। गिरिजेश बाबू एक बार पहले भी ताकीद कर चुके हैं कि अब संभलना होगा, फुल बॉडी चेकअप होना मांगता। देखें कब उस फुल बॉडी चेकअप से दो-चार हो पाता हूं :) 

- सतीश पंचम

Tuesday, November 15, 2011

पूंजीवादी पोल-डांस v / s मेहनतकश भिखमंगे ........

       'किन्न-पिसर को बेलआउट चहिये...वही 'किन्न-पिसर' जिसके कैलेण्डरों में 'मलाई टांगों' वाली बालाएं अठखेलीयां करती नजर आती हैं जिन्हें देख देख मदेरनहे बूढ़े 'बाईग्रा टून्टी फोर' औ 'सिक्सटी प्लस' गुलखोंस की चाहना करने लगते हैं। जियो रे मदेरनहे बूढ़ो...जियो..।  उधर लाल घोड़ी जी कह रही हैं कि यह तो अमीरों, राजाओं का शौक है, जो हुआ उसमें कत्तई आपत्तिजनक नहीं है। वाह री लल्लन टाप छौंड़ी....जिती रह।

       बदे की बात है, वरना यही भंवरजाल वाली कहीं मदेरन के घर आकर लाली सिन्दूर पहन बैठ जाती, तो देखना था कि इन मोहतरमा का क्या रियेक्शन होता। क्या पता कोई बैठी भी हो लेकिन जतलाना न चाहती हों। भई राजाओं की पटरानी फटरानी जैसा भी तो कुछ होता है न, बस वही समझ लो। मैं इसीलिये इस तरह के लोगों के लिये 'खंभेबाज बुद्धिजीवी' शब्द इस्तेमाल करता हूं क्योंकि ये जानते हैं कि देश का समूचा सिस्टम डेमोक्रेसी के चार खंभों के इर्द गिर्द सिमटा है जिससे सटकर वह बेखटके पोल डांस कर सकते हैं, टांग उठाकर उसे नम कर सकते हैं, फ्लाइंग किस का आदान प्रदान कर बहस की जुगाली कर सकते हैं और तो और खुले आम ललकार कर कह सकते हैं कि जो करना है कर लो, हम तो ऐसे ही जीतकर आए हैं, और आगे भी आएंगे।

        उधर युवराज पर दिग्गी गुरू की संगत खूब गुल खिला रही है, खूब रंगत बिखेर रही है। कमाने धमाने, गरीबी को पीछे छोड़ विकास की अलख जगाने अपना गाँव-देश छोड़ कर बाहर गये लोग उन्हें भिखारी नज़र आते हैं। वाह रे सोच। गजब की सोचैती है। लेकिन क्या युवराज को यह नहीं दिखता कि हर प्रदेश में कहीं न कहीं से लोग माइग्रेट करके भिखमंगे बने हुए हैं, मेहनत से, पसीना बहाकर
किसी तरह जी खा रहे हैं। उन्हीं के लहजे में कहा जाय तो एक तरह से पूरा देश ही भिखमंगा है.... और ग्लोबल स्तर पर वे सारे देश जहां इस तरह की माइग्रेटरी परिस्थितियां मौजूद हैं। अमेरिका में तो अमूमन  ज्यादातर लोग भारत से भीख मांगने ही गये हैं, बाकायदा ग्रीन कार्ड और अला फला रंग के कार्ड लेकर।

        वैसे भी  जिस पंजाब के बारे में बड़ा गुमान से बतिया रहे हैं, क्या उन्हें नही पता कि पंजाब के भिखारी ( युवराज की जुबान में)  भारत के हर प्रदेश में स्पेयर पार्ट बेच रहे हैं, दूर दराज के इलाकों में भी ढाबा खोले हुए हैं। क्या उन्हें नहीं दिखता कि राजस्थान के मारवाड़ी भिखारी कलकत्ता में जमें हुए हैं, फल फूल रहे हैं। नहीं, उन्हें कैसे दिखेगा, उन्हें तो वही दिखेगा जो उन्हें दिखाया जायगा, पढ़ाया जाएगा। उन्हें किन्नफिसर की मंगैती में भिखमंगापन नजर नहीं आता, उस तरह के भिखमंगेपन में भी एक तरह की एलीटनैस नजर आती है। 'बेलआउट' जैसे शब्द ऐसे ही एलीट भिखमंगेपन को खूबसूरती से ढंकने वाले शब्द हैं।

        बहरहाल जो कुछ कहना था, ऐसी तैसी करनी थी युवराज ने कह दिया। अब दूसरे लोग खेलें 'हिंगोट'..... वही 'हिंगोट' जिसमें दो गाँवों के लोग जलते हुए गोलों को एक दूसरे पर फेंक खुश होते हैं, ठहाका लगाते हैं, हल्ला मचाते हैं और मौके पर परंपरानुसार पहुंचे बड़े गणमान्य लोग लोहे के जाल की ओट में बैठ खेल और उससे जुड़े सरोकार से जुड़ते हुए खेल का आनंद लेते हैं। यहां भी वही 'राजनीतिक हिंगोट' खेली जा रही है। एक पक्ष ने पहले जो कुछ कहना था कह दिया, अब दूसरा पक्ष अपने हिंगोट तौल रहा है, मिट्टी के तेल में भिगो रहा है। वह भी कुछ न कुछ करतब दिखायेगा ही वरना इस हिंगोटपन्ती का आनंद अधूरा रहेगा।

      इधर देखने में आया कि एक प्रदेश के लोग दूसरे प्रदेश के लोगों को भिखारी का तमगा दिये जाने से मगन हैं, साफ है कि उन्हें अपने विकसित होने पर गर्व है। उन्हें लगने लगा है कि औरों के मुकाबले हम विकास की दौड़ में आगे हैं। यह वह राजनीतिक जादूगरी है जो बिरले लोग ही कर पाते हैं। विकास को लेकर कुछ ठोस भले न किया हो, कम से कम एक प्रदेश को दूसरे का दाता बताकर जरूर उनमें विकसित होने का दंभ तो भरा जा सकता है। भले ही उस विकसित राज्य का फटा सीने में भिखारी राज्यों का खून-पसीना ही क्यूं न लगा हो। अभी कुछ दिनों पहले आंध्र प्रदेश में चलने वाले आंदोलन से के चलते रेल सेवाएं बाधित हुई, वहां से आने वाले कोयले की आवक पर असर पड़ने लगा और देखते ही देखते विकसित कहलाने वाले राज्य के हाथ पैर फूल गये कि इतने दिन का ही कोयला बचा है, बताओ कैसे चलेगा। न्यूक्लियर भट्टी लगाने का माद्दा है नहीं, जापानी विनाश को देख हिम्मत नहीं हो रही औ जुबान दस गज़ की, ......हम प्रभु प्रदेश हैं। हुंह......थू है ऐसी प्रभुताई पर जो गरीब गुरबों की पसीने की कीमत को एक झटके में भिखमंगा कहकर नकार दे।

       यदि बात भीख मांगने पर ही होनी है तो ठीक है, हम भिखमंगे ही सही, कहीं न कहीं कुछ कर खा लेंगे, जीयेंगे लेकिन इतना जरूर पता है कि युवराज और उन जैसे लाल घोड़ा छाप नेताओं को जिस दिन आम आदमी की तरह खटना पड़ेगा, सब्जी की भारी भरकम टोकरी सिर पर रख गली कूचे चलना पड़ेगा, ट्रक से बोरा उतार सड़क पार कर दुकान में रखने जैसा काम करना पड़ेगा उस दिन वे ईश्वर से जरूर मनायेंगे कि इससे अच्छा तो भगवान उन्हे मौत दे दे...कम से कम इस जीते जी नरक जैसा जीवन तो न जीना पड़ेगा.... तिल तिल कर मरना तो न होगा....कोई उनके मेहनत को हिकारत से देख अपने वोटों की ललक में भिखारी तो न बतायेगा।

    उफ्........अभी और कितना पतन बाकी है पूंजीवादियो.....और कितना.........मानव श्रम का ऐसा मान-मर्दन ?

घृणा आती है मुझे तुम जैसे राजनेताओं से सिर्फ घृणा...।


- सतीश पंचम

Saturday, November 12, 2011

गूँगा जहाज.......

     फेसबुक पर रवीश जी ने चील गाड़ी (विमान)  को इंगित करते हुए स्टेटस लिखा जिसे पढ़ते ही मुझे विवेकी राय का गूँगा जहाज वाला लेख याद आ गया। बेहद दिलचस्प ढंग से विवेकी राय जी ने उस गँवई माहौल के कोलाज को रचा है। प्रस्तुत है उनके उसी लेख का  अंश ......  

                                        गूँगा जहाज   -  डॉ. विवेकी राय

          मेरे विचारों के सिलसिले को सामने से आती हुई बैलगाड़ी के चरचर-मरमर शब्द ने खंडित कर दिया। सबसे पहले मैंने रास्ता छोड़कर एक बगल हट जाना उचित समझा। मैं दोनों लीकों के बीच में चल रहा था। वास्तव में चलने लायक नहीं रास्ता है। इधर-उधर दोनों बगल तो बैलगाड़ी के पहियों से घुटने भर धूल हो गयी है। यह धूल की मोटी तह खूब फैलकर जमी हुई है। पैदल चलने वाले का जूता डूब जाय, साइकिल पर चलने वाले को उतर कर खींचना पड़े और नंगे पैर चलने वाले के लिए यह जमी तरावट खूब रही। मरदाना गाड़ी है यह बैलगाड़ी। धीरे धीरे चलती है तो भी धूल उड़ाती है। जोर से या तेजी से इससे चला नहीं जाता। इसी प्रकार हचकती मचकती कोस-दो-कोस और चार-छ: कोस तक इधर-उधर जमीन पर बिछी इस धूलवाली छवर को धाँगती रहती है।


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       बैलगाड़ी पर बड़े बड़े बोरों में धान लदा है। मुँह पुआल से बन्द कर सी दिया गया है। कुछ कपड़े में बन्द छोटी गठरियाँ भी हैं। धान तो बन्द है, पर गठरी पर, बोरे पर और उसके मुँह पर कहीं से झाँक-झाँक कर बताता है कि मैं धान हूँ। सुनहरा धान, धरती के अंचल को धानी करने वाली शान हूँ, परम पवित्र प्रिय खुरखुरा चान हूँ और साक्षात ब्रम्ह हूँ। भला सोना कही छिपाया जा सकता है ? यही सब बात थी कि बिना पूछे मुझे ज्ञात हो गया कि बोरों में धान है। किसी सेठ साहुकार का माल होता तो शायद इतनी तेजी से उधर ध्यान नहीं जाता, पर यह धान गाड़ी के पीछे पीछे चुपचाप मैली लुगरी में आती चली उन अन्नपूर्णाओं का था, जिनके हाथों ने इस धान के एक एक पौधों को छुआ है, एक-एक बालियों का सत्कार किया है और एक-एक दाने को सँभाला-सहेजा है। वे लगभग एक दर्जन जीवात्माएँ।


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   अचानक गाड़ी रूक गयी। मैंने जाना कि हल्ला करके पीछे आती स्त्रियों ने उसे रोकवाया था। मैं भी रूक गया। किसी कारण वहाँ एक बोरा एक जगह कुछ खुल गया और धान झड़ने लगा था। झपट कर एक स्त्री ने बोरे का मुँह बन्द किया और धूसर धूल पर गिरे सुनहरे धान को बटोरने लगी। धूल का प्रयत्न यह था कि अधिक से अधिक अन्न को अपने भीतर छिपा ले और स्त्री का प्रयत्न था, यदि धूल उसके अन्न को नहीं छोड़ती है तो वह धूल सहित उसे उठा लेगी। उसने आँचल पसार कर धूल सहित धान बटोर लिया। धूल-धान का यह विचित्र संयोग रहा। वह अंचल-आश्रय पाकर धन्य हुई। जब वह खड़ी हुई तो उसकी पाँच वर्षीय लड़की ने ध्यान दिलाया कि धान पीछे कुछ दूर से गिरता आया है। वह लड़की एक फ्रॉक पहने थी, परन्तु वह किस कपड़े का था, कहा नहीं जा सकता। उसके गरदन के पास फट जाने पर गाँठ दी गयी थी, जिससे पीछे की ओर से वह टँग गया था। वह अधिक मैला था या फटा-पुराना अधिक था, कहा नहीं जा सकता, परन्तु उस फ्रॉक की इज्जत धूल बचा रही थी।
      यह धूल ऐसी है कि जहाँ जम जाती है, वहाँ एक ऐसी पवित्रता आ जाती है कि और किसी बात की ओर ध्यान नहीं जाता।


      बड़े मनोयोग से एक-एक गिरे दाने को माँ-बेटी ने बीन-बीन कर इकट्ठा किया। साथ ही स्त्रियों ने भी उनके इस कार्य में सहायता की। इस बीच फुरसत पाकर गाड़ीवान ने सुर्ती मल कर ठोंक ली। वह भी एक लोहे का आदमी था। काठ-बाँस की गाड़ी पर उसी प्रकार काठ बना बैठा था। शरीर काला था या हो गया था, कहा नहीं जा सकता। एक काले जीर्ण कम्बल के ऊपर वह बैठा था। शरीर में बिना बटन का एक ऐसा कुर्ता था जिसकी बाँहें आधे पर से उड़ गयी थीं। उसकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी और सिर के बालों पर धूल छायी हुई थी। यह इसी प्रकार रात-दिन गाड़ी हांकता है। उसके लिये जाड़ा-गरमी सब बराबर। उसे बरसात की परवाह नहीं। खडे़ खड़े खा लेता है। बैठे-बैठे सो लेता है। बिना खाये-सोये भी उसके काम में कोई बाधा नहीं आती। हाँ, उसके बैल उसे प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं।


     गाड़ीवान ने यह जानना चाहा कि किसके बोरे से धान झड़ रहा था, परन्तु बिना बताये आँचर में धूल-दान देखकर उसने समझ लिया कि किसका बोरा बढ़ रहा था। बेचारी माँ-बेटी ने एक महीना में एक बोरा धान कमाया है। उसने खूब जोर से कहा - "देखते चलना जी, नहीं तो बैलगाड़ी पर माल बढ़ जाता है। सब लोग अपनी-अपनी गठरी-मोटरी देख लो। अब गाड़ी चलती है।"


और उसने गाड़ी आगे बढ़ा दी।


       मैं उस बैलगाड़ी को देख रहा था। उस पर लदे माल को देख रहा था और देख रहा था उसकी मालकिन लोगों को। एकदम मामूली और साधारण दृश्य था, परन्तु एक गजब की आकर्षण बात थी जो कथन की पकड़ में नहीं आ रही है।


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......


   तभी सड़क पर खेलते कुछ लड़के चिल्ला उठे - "गूँगी जहाज ! गूँगी जहाज !! गूँगी जहाज !!! "


   मैने देखा उत्तर पश्चिम में के कोने वाले क्षितिज पर एक चाँदी की सुनहरी मोटी लकीर उठी है और नि:शब्द आगे बढ़ रही है। अभी उसकी कुल लम्बाई एक लट्ठा के करीब है।


ओह ! यह तो जेट विमान था। परन्तु लड़के क्या चिल्ला रहे हैं ? गँगी जहाज ! एकदम सार्थक बात !

    गाड़ी के पीछे वाली स्त्रियों ने चिहा-चिहाकर देखा और बहुत आसानी से देख रही थीं। भला वह छिपने वाली चीज है ?


"देख रही है रे ? यह क्या 'बढ़निया' की तरह रोज उग जाता है ?"


गाँवों में 'बाढ़न' पुच्छल तारों को कहते हैं। बाढ़न का अर्थ है झाडू और उसकी शकल झाडू की तरह होती है।

"बढ़निया नहीं है, सखी" दूसरी स्त्री ने उत्तर दिया, "यह तो सगरे बदरी घड़ियाल की पूँछ की तरह छेंक लेती है।"


"मत टोको," एक अँधेड़ स्त्री बोली, "यह हरसू ब्रम्ह है। अपने संगी भैरवा के ब्रम्ह के पास मिलने जा रहे हैं।"


"जै हो बरम-बाबा," एक स्त्री ने गुहराया।


"अरे बाबा-साबा नहीं जी। रेलगाड़ी है। अब ऊपरे-उपर चलेगी।" एक ने कहा। इस कथन के बाद एक दूसरी स्त्री ने हँसकर कुछ लयात्मक ढंग से एक गीत-कड़ी उठाया -


छपरा के बाबू धरमचन रसिया -
धुआँ पर गाड़ी चलवले बा ।


अरे बाबा ! धुआँ की सड़क पर गाड़ी ! एक ने आश्चर्य प्रकट किया।


अकिल में रंगरेज (अंग्रेज) को कोई नहीं जीत सकता, एक अन्य स्त्री ने कहा।


हमारी बात सुना, एक स्त्री आगे बढ़कर बोली - एक अच्छा आदमी बता रहा था कि यह रावन का हुक्का है।


यह सुनकर गाड़ीवान का ज्ञान गरज उठा -


अरे मूर्खों यह रावन का हुक्का नहीं है। यह हनुमान की पूँछ है।


और बैलों को टिटकारी देकर गाड़ी तेज करते हुए उसने कहा - अब लंका दहन होगा।


इसके बाद गाड़ीवान ने निम्नलिखित चौपाई को खूब जोर से गाया -


रहा न नगर बसन घृत तेला,
बाढ़ि पूँछ कीन्ह कपि खेला ।


    और लड़के उसी प्रकार चिल्ला रहे थे - गूँगी जहाज...गूँगी जहाज। और विमान के पीछे बनी वह धुएँ की सड़क चूपचाप बीच आसमान में दक्षिण पूरब की ओर बढ़ती चली जा रही थी।


     मैंने मन में प्रश्न किया कि वास्तव में कौन गूँगी जहाज है ? और क्या इतिहास वास्तव में यहाँ रूक नहीं गया है ?

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 पुस्तक अंश - गूँगा जहाज
अनुराग प्रकाशन
चौक, वाराणसी - 221 001
मूल्य - 120/-
 
 प्रस्तुति - सतीश पंचम  

Tuesday, November 8, 2011

चल सन्यासी मन्दिर में.......

- कौन बोला.....कौन बोला.... जरा सामने तो बोले.......बहक गया हूं....सिहक रहा हूँ.....अहक रहा हूं....कौन बोल रहा है सब.......देखूं तो


- नहीं मैं न तो अहका सहका हूँ न कोई मुझमें ऐसी कोई चहक है कि ललनाओं के बीच जाकर रहूँ....

- किसने कहा....मेरे सामने कहे तो.....जरा कहके तो देखे.......बड़े आये मुझे ढोंगी कहने वाले...

- भगवा पहना है तो उससे क्या......क्या यह कहीं लिखा हुआ है कि भगवा पहन कर महिलाओं के बीच नहीं जा सकते.....

- सही कहा है मैंने......वहां माईक उठाकर फेकेंगे.....गाली धक्कड़ देंगे उससे तो अच्छा है बिग बास.....

- वो लोग खराब लोग नहीं है.....आप लोग अपने मन से कह रहे हैं.....

- मेरा सीधा मानना है कि वहां बिग बास में जो लोग हैं वे सारे लोग सन्यासी हैं.....और उनके बीच मुझे जाने में कोई परहेज नही......

- हां, मैं खम ठोंककर कहता हूँ कि वो लोग भी सन्यासी हैं.....इतने दिनों से अपना घर परिवार छोड़कर एक घर में टिके हुए है....मजाक है क्या.....यह सन्यास ही हुआ कि और कुछ......

- यह आपका काम है....आप जाइये और सन्यासी की परिभाषा शास्त्रों में ढूँढिये......

- यह कहीं भी लिखित में नहीं मिलेगा.....वह सब जनश्रुति है....यानि लिखित में न होकर सुनाने वाला ज्ञान विज्ञान....

- शक्ति कपूर गये अपनी गलती से गये.....

- मैं वह गलतीयां नहीं दोहराउंगा.......

- हां, क्या....नहीं छवि की चिंता उनको होती है जिनके मन में कुछ पाप होता है.....मैं भला क्यों डरूं.....

- नहीं कत्तई नहीं......अनैतिकता का मापदंड यदि आपके पास हो तो लाइये....मैं नपवाने के लिये तैयार हूं......

- जी ?

-वो आप जानिये....आप को क्या करना है....आप लोग जब नैतिक और अनैतिक की बात उठाते हो तो क्या साथ में नैतिकता नापने हेतु 'नपनी' लेकर नहीं चल सकते.....

- देखिये नैतिकता दो किलो की भी हो सकती है......दो टन की भी हो सकती है....यह तो व्यक्ति विशेष पर आधारित है....

- .........

- मैं इस पर कुछ कहना नहीं चाहता......

- देखिये अन्ना कहते थे कि मुझपर कोई सौ रूपये का भी भ्रष्टाचार साबित कर दे तो आंदोलन से हट जाउंगा और अब केजरीवाल बोले कि मेरा दस रूपये का भी साबित कर दो तो.....

-इस से पता चलता है कि इमानदारी का अवमूल्यन किस तेजी से हुआ है .....सौ से सीधे दस पर.......यानि इमानदारी का तो जमाना ही नहीं रहा वाला जुमला साक्षात देखिये.....

- तो इतने सारे संत कहां से लायेंगे जोकि लोकपाल चलायें......हम आलरेडी एक्सपिरियेन्स्ड हैं.......हमें पहला हक है तमाम कमिटियों में......

- मैं इस पर कुछ कहना नहीं चाहता......

- यह मेरे अधिकार क्षेत्र से बाहर की वस्तु है.....मैं इस पर कुछ भी कहना ठीक नहीं समझता.....

- जी.....बिग बास....हां पूछिये जो पूछना हो....

- नहीं.....हम तो सन्यासी आदमी ठहरे.....हमें कैसा डर.....

- अब वहां भी देखिये ज्यादे कुछ होता जाता नहीं है.......एकदम अवकाश ही समझिये....तो हम कुछ दिन बिग बास में ही रह लें तो कौन बुरा .....

- हैं.....ई गाना कौन लगाया जी......बंद कराओ.....चल सन्यासी मन्दिर में......तोरा चिमटा मेरी चूड़ियां दोनों साथ खनकायेंगे......गलत बात...

- और क्या....बिग बास का देबी लोग चूड़ी पहनती ही नहीं तो .........

- चिमटा हम नहीं रखते......एक बार रखा था.....लोग हमसे छीनकर हमीं पर पिल पडे.....तब से....

- आंय....बुलावा आ गया.....ठीक है ...राम राम....जंगली कार्ड आ गया है अब जाता हूं वाईल्ड कार्ड से एंटरी करने......

- अरे भई कहा न, वहां सब लोग सन्यासी ही हैं....अपना घर दुआर इतने दिन से छोड़े हुए हैं तो........

- सतीश पंचम

Monday, November 7, 2011

आमी रोल रोल ......

 - बहुत आच्छा दीदी बहुत सेयि बोला.....पेटरोल दाम बहुत जेयादा .........ना गारीब आदमी जिये ना मरे ..... मुझे भी भर भर के गुस्सा आया दीदी .... भर भर के।

- ये सरकार एकदम फालतू , आमि सपोर्ट नेयि करता तो अच्छा था दीदी ....

- ऐ तुमको बोला ना चुप अन चाप हो जाओ...... अभी आमार दीदी भाशन चालू .... तुमी चुप .....

- ए भौमिक.....की रे.....दीदी बोलन आसुन सुन तो की बोलछी.....

- की रे बोक्का....बीड़ी खेंच.....अउर खेंच......छाती मे सिल होशुन तो  मालूम होशुन .......

- की विपिन दा.....दीदी भाशन भीषन सत्ये.......पेटरोल में रोलबेक ......

- एय फीलू दा.....तुमको दीदी का भाशन नई सुनना ......तुम कभी नेई सुधरेगा.....जाओ कौमिनिश्ट भिन्ग का पास ....जाओ .....जाओ

- धिमान दादा.....दीदी भाशन..........

- अरे मारता क्यूं है दा.....अरे मत मारो.....

- क्यूँ मारा धिमान दा....तुम हमको क्यूं मारा.....हम कुछ लिया ना दिया.....फिर.....

- दीदी का नाम लेने से आप को गुस्सा आता है......फेर आप गलत आदमी हय..... तुमी कितना मारो लेकिन आमी गलत आदमी का साथ नेयि देगा...

- एय लगता है दादा..... अरे तो दीदी आमार ......ये गलत है धिमान दा.....मारो मत.......हम दीदी को इनफोम .....

- अरे दादा तुम कौमनिस्ट भिन्ग में रहो हमको क्या है....लेकिन हम गलत का साथ नेयि देगा......

- जोर से लगता है दादा.....उधर फोड़ी है दादा......पक्का फोड़ी....भीशन दर्द.....दादा....दादा..

........

.......

- दादा आराम हो गया दादा......पूरा कचड़ा एक झटका में फोड़ी से बाहर आ गेया............येइ हमको नेयि करने होता था ......दस दिन से फोड़ी दुखता आशुन .....अमी हिम्मत नेयि होता चीरा लगाने के लिये........

- आमार दीदी का नाम लिया तो दरद चला गया...........पेटरोल रेट भी कम करके रएगी दीदी...देखना तुम.............

- पेटरोल से पेट में रोल-रोल.....रोल रोल पेटरोल.......अइक स्साला .....आमी तो सेरी करता है......गालिब अबी तुमारा क्या होगा .........

- तनमूल पार्टी वाला गालिब....आमी काल इश्तीफा दीदी को दे के सेरी करेगा.....गालिब जैसा काफिया पढ़ेगा.....अंतरा पर  दीदी साईन करेगा.....फिर इस्तीफा वापिस  ...ऐज यूजल आमी  पुराना रोल....

- रोल रोल पेटरोल.....रोल  :-)

- Satish Pancham

Friday, November 4, 2011

PUC वैन.......

            मैं सड़क के किनारे खड़ी PUC वैनों को जब भी देखता हूँ मुझे यूँ प्रतीत होता है जैसे यह PUC Van डिट्टो हमारी भारत सरकार ही है। चार बेहद पुराने घिसे पहियों पर टिकी वह वैन एकदम भारत सरकार का प्रतिरूप नजर आती है, जिसके पहियों को देख कुछ 'खंभेबाज बुद्धिजीवी' इन्हें लोकतंत्र के चार स्तम्भ बताने का शौक पालते हैं। यदि ध्यान से इस PUC Van को देखा जाय तो पता चलेगा कि पिछले डेढ-दो साल से यह PUC Van एक ही जगह खड़ी है, उस पर धूल की मोटी परत चढ़ी है, टायरों के पास छोटे-छोटे पौधे उग आये हैं, झाड़ झंखाड, चींटियां-तिलचट्टे रेंगने लगे हैं, चेसिस के नीचे एकाध कुत्ते जीभ बाहर निकाले ठंडक ले रहे हैं और ऐसे ही दिव्य माहौल में यह PUC Van बेफिक्र होकर शहर भर की महंगी-सस्ती, अच्छी-बुरी सभी गाड़ियों को लाइसेंस बांटे जा रही है। पचास रूपये टिकाओ, पंप सटाओ और पप्पू पास। अब ले जाइये इस 'पास' को शान से लहराते हुए।


          ठीक यही हाल हमारी सरकार का भी है। सालों से एक ही जगह टिकी उसकी छांह में भी दलाल टाइप श्वान प्रजाति छंहाती नजर आती हैं, छोटे छोटे पौधे, तिलचट्टे, चीटियों के मानिंद दलाल लोग रेंगते नजर आते हैं। कुटीर- बृहद...अल्प-बहुल सभी टाइप के लाभार्थी नजर आते हैं सरकारी छांह में। एकाध बार तो देखा गया गोजर टाइप की प्रजाति भी उसके टायरों में आश्रय पाने में सफल होती है जिसके चलते समय उसके पैरों का सिंक्रोनाइजेशन भ्रष्टाचारी हथेलीयों का समरूप नजर आता है। पहले इस विभाग में कुछ टिकाओ....फिर अगले....और अगले.....और.....तब आप की फाइल आगे बढेगी। मजे की बात तो ये कि सारे के सारे गोजर प्रजाति के जीव इन टायरों पर ही ज्यादा नजर आते हैं जिसे खंभेबाज बुद्धिजीवी लोकतंत्र के चार स्तम्भ बताते नहीं थकते। कुछ कविता भाव में कहूं तो - एक टायर कार्यपालिका का.....एक टायर न्यायपालिका का.....एक टायर विधायिका का....और एक टायर पत्रकारिता का। इन तमाम टायरों पर चिपके गोजर, फफूंद, तिलचटटे आदि मिलजुलकर एसा सटायर क्रियेट करते हैं मानों वे बने ही एक दूसरे के लिये हों। इसी बीच एकाध कुत्ता कहीं से आकर टायरों को नम कर जाता है तो उन टायरों में और नमी आ जाती है।

      बहरहाल, अगली बार आप जब भी किसी PUC वैन को देखें तो एक बार उसकी बॉडी लैंग्वेज, उसकी नाप-जोख, उसकी भाव भंगिमा पर थोड़ा ध्यान दें। बच्चों को यदि नागरिक शास्त्र पढ़ाना चाहें या दिखाना चाहें कि सरकार किसे कहा जाता है, वह दिखने में कैसी होती है, काम कैसे करती है तो बेखटके किसी PUC वैन के पास उन्हें लेकर जाइये और बताइये.......सरकार ऐसी होती है :-)



- सतीश पंचम

Friday, October 28, 2011

ये भी इंडियै में होना था ? ........धुत्त..

        इस देश के कुत्ते तक फरारी से तेज भागते हैं। कम से कम इस वक्त समाचारों को देख कर तो यही महसूस हो रहा है।  फरारी के टेस्ट ड्राईव के दौरान कुछ कुत्ते न जाने किस ओर से आये और ट्रैक की ओर दौड़ लगा बैठे। बहुत संभव है माईकल शूमाकर ये सब देख हीनभावना से ग्रस्त न हो गये हों कि सारा जहां जीतकर मैं हारा तो इसी देश में जहां के कुत्तों तक ने मुझे चैलेंज दे दिया, हाय रे हतभागी।

        उधर इन कुत्तों के जज्बे को देख कुत्ता कम्यूनिटी ने आश्चर्यमिश्रित खुशी व्यक्त करते आज पार्टी करने का मन बनाया है। सुना है कि चेकोस्लोवाकिया से विदेशी नस्ल की एक श्वान नर्तकी को भी बुलाया गया है जिसके बारे में प्रसिद्ध है कि उसके  सड़क पर निकलते ही ट्रैफिक जाम हो जाता है, सारे के सारे कुत्ते वहां इकट्ठे हो जाते हैं। वैसे अंदर की खबर तो ये है कि रेस के आयोजकों ने ही उस श्वान नर्तकी को डबल पेमेंट देकर बुलाया है ताकि सारे कुत्ते इसके आस पास बने रहें और फरारी की रेस शांतिपूर्वक निपट जाय।

      खैर, कुछ कचहरीबाज  कुत्तो ने बाकायदा जानकारी लेने हेतु आवेदन देकर  पूछा है कि आखिर वह क्या कारण था कि बिहैवियरल साइंस के प्रतिपादक Mr. Pavlov ने कुत्ते को ही अपने Classical Conditiong  प्रयोगों के लिये चुना। आप लोगों की जानकारी के लिये बता दूं कि मनोविज्ञान के एक  प्रयोग के दौरान व्यवहार का अध्ययन करने के लिये  एक कुत्ते को बांध कर रखा जाता था और एक घंटी समयानुसार बजाई जाती। घंटी बजने के तुरंत बाद प्लेट में भोजन परोसा जाता। इस क्रिया के दौरान देखा गया कि भोजन देखते ही कुत्ते के लार चूने लगता और उसे माप लिया जाता। धीरे धीरे उस कुत्ते की ये हालत हो गई कि वो बिना भोजन देखे केवल घंटी की आवाज सुनते ही लार चूआने लगता। बस यूं मान लिजिये कि उसकी हालत बिल्कुल हमारे भ्रष्ट राजनेताओं की तरह हो गई। एकदम पावलोव के कुत्ते की तरह हमारे राजनेता भी बिहेव करते हैं।

       मसलन पहले के समय सड़क बनने का प्रस्ताव बनता था, फिर बाकायदा टेंडर निकलता था और फिर सड़क बनाने के बाद जो कुछ ग्राह्य अग्राह्य होता था नेताओं तक पहुंचता था। नेताओं की लार तब सड़क बनने के दौरान ही टपकती थी कि इसमें से देखें कितना माल मसाला मिल जाता है। होते होते अब ये समय आ गया कि प्रस्ताव पास होने की कौन कहे, केवल सुनाई भर दे जाय घंटी की तरह....हमारे नेताओं की लार टपकने लगती है, सड़क फड़क जब बनेगी तब बनेगी, ये बताओ हमारा हिस्सा कितना। कुछ तो सड़क होने पर भी दुबारा उसे खन बहाने से नहीं चूकते। एक तरह से देखा जाय तो pavlov के कुत्ते से ज्यादा कुत्तई हमारे इस वर्ग में बेखटके देखी जा सकती है। एक बार कुत्तों का Saliva मापक यंत्र खाली रह सकता है लेकिन नेता वर्ग का Saliva ? लाओ न कितना मपनी लाना है, गैलन के गैलन भर देंगे फिर ले जाइये जहां भी अध्ययन आदि के लिये ले जाना है।

       उधर सुनने में आया है कि अब गहन जांच की जा रही है कि फार्मूला वन के ट्रैक पर कुत्ते कैसे आ गये। अच्छा तो यह होगा कि श्री धर्मेन्द्र जी से गुजारिश की जाय कि जब तक फार्मूला वन की रेसिंग चले तब तक कृपा करके ट्रैक के आस पास बने रहें।

 वो क्या है कि उनके डॉयलॉग - "कुत्ते मैं तेरा खून पी जाउंगा" की दहशत कुत्ता जमात में  कुछ ज्यादा ही है :)


- सतीश पंचम

Thursday, October 27, 2011

प्रेमी जोड़ों का लोकपाल.....

......
.....

- जानूं तुम मुझे बहुत अच्छे लगते हो...


- और तुम मुझे अच्छी लगती हो...

- लेकिन तुममें एक कमी है

- कैसी कमी...

- तुम कंजूस बहुत हो....

- इसमें सरकार का दोष है...

- सरकार ?

- हाँ सरकार, वो लोकपाल नहीं ला रही....

- उसका तुम्हारी कंजूसी से क्या रिश्ता...

- लोकपाल होता तो सारे भ्रष्टाचारी अंदर होते....जमाखोर जेलों में होते....

- तो

- तो क्या...नेचुरल है कि चीजों के दाम तब कम होते.....और मुझे कंजूस न होना पड़ता...

- लेकिन प्रियवर मुझे आपकी ये कंजूसी जरा भी अच्छी नहीं लग रही....ऐसे में हम लोगों का मिलन होना मुश्किल है...

- नहीं प्रिये...ऐसा न कहो....मैं जी न पाउंगा.... हम दोनों के बीच लोकपाल की दीवार ही तो है....

- ये दीवार हटानी होगी प्रियवर...अन्ना से कहिये लोकपाल के लिये थोड़ा और जोर लगायें

- अकेले अन्ना क्या क्या करें प्रिये....उनकी टीम के लोग विभिन्न प्लान के तहत भोथरे किये जा रहे हैं...

- मतलब...

- किसी को प्लान 'ए' के तहत तो किसी को प्लान 'बी' के तहत तो किसी को 'सी'.....

- ये भोथरई बंद नहीं हो सकती क्या...

- कैसे बंद होगी प्रिये.....धार लगाने वाली मशीनों का लाइसेंस सरकार के पास है.....

- फिर सरकार...

- हां प्रिये....इसलिये मैंने शुरू में ही कह दिया था कि सब सरकार का दोष है...

- तो क्या हमारा मिलन न होगा....

- होगा क्यों नहीं प्रिये...बस थोड़ा चुनावों तक इंतजार करो.....

- तो क्या चुनावों से हमारा मिलन हो जायगा...

- उम्मीद रखी जा सकती है कि लोकपाल समर्थक सरकार चुन कर आएगी...

- और यदि लोकपाल समर्थक सरकार न आई तो.....

- तो हम फिर इसी तरह बाग बगईचा में, पार्क-बस इस्टैंण्ड में मिलते रहेंगे.....इन्टरनेट पर.... फेसबुक पर.........

- तब तो हमें लोकपाल के लिये उठ खड़े होना होगा.....पूरा  जोर लगाना होगा.....
......

......

- ए चलो उठो यहां से.....चल रे ए छोकरी....चलो अपना-अपना घर जाओ.....

- तुम लोग कॉलेज छोड़ के इधर क्या मज्जा कर रेला है क्या..... चल ए चिकने.......

- चल बोला तो....चल निकल.... ए शाणें....तेरे को अलग से बोलना पड़ेगा क्या.....चल फुट इदर से....

- ए लाल दुपट्टा..... तेरे को क्या लिख के देना पड़ेगा क्या.....चल निकल....

- आईला आशिकी स्टाइल....चल रे ए कोट वाले ....ओ मैडम.....तुम लोग को क्या नोटिस-बिटिस देना पड़ेगा क्या ..चलो निकलो....

- ईधर दस दिन हो गया अउरत का ठीक से मुँह नहीं देखा.....रोज कुछ न कुछ खिटखिट.....कभी ये त्योहार...कभी वो रैली....कभी वो बंद ये बंद.....छुट्टी नईं....कुछ नहीं......उपर से ये छोकरा-छोकरी लोग का खिटखिट.....

- चल रे ए शाणें उठ.....

.....


- सतीश पंचम

Tuesday, October 25, 2011

तुम जाता कि नईं रे......

...........

- आमरा बेटी को जेल से छुड़ा के लाना.....खाली हाथ वापस आएंगा तो ये झाडू तेरा पिच्छू करके मोर जइसा बना देन्गा

- अइयो रामा....उधर वो जज लोग मेरा वकील का नई सुनता......दिल्ली वाला मैडम भी दूर दूर रेता .....पी यम भी नई सुनना मांगता.........तुम भी मेरा नई सुनना मांगता....बोलो मय क्या करना....

-ए डेय....तुम क्या करना वो तुमको मालूम.....मेरे कू मेरा बेटी दीवाली का टाईम घर में मांगता.....

- हलवा नई जी..... जज लोग बोलेन्गा तबिच तुमारा बेटी छूटेन्गा जेल से.....नईं तो कइसा लाएन्गा तुमिच सोचो....

- वो आमको कुच नईं मालूम.....आमको आम्रा बेटी मांगता......दीवाली टाइम लेके आना नई तो याद रखना....

- अइयो तुम आमको क्या समजा जी....आय एम पास्ट सी यम्म ....अइसा उंगली दिखा के मेरा से बात मत करना....

- आ रे सी यम्म.....येक बेटी को जेल से छुड़ा के लाना नईं होने को सकता.....सी यम्म....येन्ड रासकला...

- डेय....अन्गा डेय.....

- जा रे.....बड़वा.....

- इंगा पो......झाडू नईं मारना.....झाडू नईं मारना....अइयो कल्ला....अइयो...दया...

- चिल्ला अउर किसको बुलाना तू सबको बुला......आम नईं रूकेन्गा.....आमको आम्रा बेटी मांगता...

- झाड़ू मारने से तुम्रा बेटी आएन्गा क्या....

- वो आमको नई मालूम......आम्रा बेटी मांगता.....तुम जाज लोग का नईं सांबाल सकता तो पोलिस, बीलीस को तो संबाल सकता ना......क्यो वो बी मइच बताना.....

- बोले तो...

- बोले तो पोलीस बिलीस पानी पिलाना....तोड़ा मक्कन लगाना.....कइसा बी करके अपील नईं करना.....आमरा बेटी छूटता तो छूटने दो.....अपील नईं करना....

- लेकिन...

- तुम जाता क्या नईं रे...

- आम जाता....लेकिन ....

- .रासकला....सब गड़बड़ घोटल तुम लोग करेन्गा अउर फसायेन्गा आम्रा बेटी को.....इडियटा....डेय

- डेय....डेय.....

- ये झाड़ू देखता ना....एकदम मोर बना देन्गा...मोर  :-)


- सतीश पंचम

Saturday, October 22, 2011

अखिल भारतीय 'बाबा-बाबी' शैक्षिक अनुसन्धान संस्थान

    बेहद अय्याश माने जाने वाले  लिबिया के  तानाशाह गद्दाफी के मारे जाने के बाद बहुत संभव है उसकी ढेर सारी महिला बॉडीगॉर्ड्स अब रोजगार हेतु 'बाबा-बाबी स्पेशिलिटी कोर्स' करके कहीं प्रवचन आदि देने की तैयारी कर रही होंगी ......नाम भी गजब......सुश्री गद्दाफी देवी 'गॉर्जियस' .......सुश्री ब्लैक बेल्टहीया जी 'पटाखा'......सुश्री चमको 'फुलौरी'.......


         सोचता हूं मैं भी एकाध ऐसा ही आश्रम खोल लूं जहां कि ऐसे हालात के मारे बेरोजगारों को रोजगार उपलब्ध हो सके, कुछ खा कमा सकें। नाम हो - अखिल भारतीय बाबा-बाबी शैक्षिक अनुसन्धान केन्द्र। जहां तक मुझे लगता है कि आज रोजगार उपलब्ध करवाना प्राथमिकी है, भ्रष्टाचार तो कल भी मिट सकता है। यदि लोग बेरोजगार रहेंगे तो कल को लोग चोरी, राहजनी, लूटमार पर उतर आएंगे जो कि भ्रष्टाचार से कहीं ज्यादा घातक साबित हो सकता है।

        इसी बात पर सरकार को एक प्रस्ताव भेजने का मन कर रहा है जिसमें कि मुख्य बातें बिंदुवार ढंग से रखी जांय, मसलन -

  • बाबा-बाबी स्पेशिलिटी कोर्सेस से रोजगार सृजन में सहायता मिलेगी।
  • इसमें जीरो इन्वेस्टमेंट है, बोलबचन और स्नेहवचन से काम चल जाता है। बैंकों से लोन लेने की जरूरत नहीं पड़ेगी, कर्ज के चुकते आदि का झंझट भी नहीं।
  • ऐसी शिक्षा व्यवस्था रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट आदि के जंजालों से मुक्त होगी।
  • आये दिन होने वाले मनरेगा आदि के भ्रष्टाचार से छुटकारा मिलने में आसानी होगी। आखिर कितनी सड़कें कागजों पर बनाई-बिगाड़ी जाएंगी और कब तक ?
  • शिक्षा पर सरकारों को बजट का कम हिस्सा खर्च करना पड़ेगा। देखा गया है कि हमारे बजट का ढेर सारा पैसा आई आई टी आदि तकनीकी संस्थानों पर खर्च होता है लेकिन वहां से इंजिनियर बनने के बाद वे बच्चे विदेशों में चले जाते हैं। उन पर सब्सिडाइज्ड शिक्षा वाला पैसा फिजूल चला जाता है, विदेशी नागरिक उनकी प्रतिभा का उपयोग कर लेते हैं। बाबा-बाबी स्पेशिलिटी कोर्स से निकले लोग इसका उल्टा करेंगे। वे विदेशी नागरिकों को भारत में बुला प्रवचन देंगे जिससे कि विदेशी मुद्रा की आवक बढ़ेगी, पर्यटन का विकास होगा। इस प्रकार से बाबा-बाबी इंस्टिट्यूटस ब्रेन ड्रेन की समस्या यानि प्रतिभा पलायन रोकने में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से सहायक होंगे ।
  • इस तरह की शिक्षा व्यवस्था हेतु ज्यादा जमीनों के अधिगृहण की जरूरत नहीं पड़ेगी और न ही नोयडा एक्सटेंशन आदि जैसा टेंशन पनपेगा। जिसे जहां सुभीता होगा वहीं पेड़ के नीचे अपनी प्रवचन की दुकान खोल सकता है।
  • इन क्रियाकलापों से विश्व मानचित्र पर भारत अपने वही पुराने अतीत 'गुरूओं वाला देश' जैसा स्टेटस पा सकता है। ए एल बाशम जैसे इतिहासकार अपनी किताबों का नाम Wonder that was india लिखने की बजाय 'Wonder that is india' रख सकते हैं।
  • हमारे नीति नियंताओं का शुरू से मानना रहा है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था सर्वसुलभ हो, हर किसी को शिक्षा उसकी अभिरूचि के अनुसार मिले, जीवन यापन में सहायक हो। इस बात में बाबा-बाबी इंस्टिटयूट्स पूरी तरह सहायक प्रतीत होते हैं। वैसे भी माना जाता है कि लोगों को अपने से ज्यादा दूसरों को समझाने में रूचि होती है, और यह गुण बाबा-बाबी प्रशिक्षुओं के लिये प्लस प्वाइंट है। बहुत संभव है भारतीय इस मामले में शेष विश्व से बीस ही ठहरें।  
         इन तमाम बातों को देख मुझे लग रहा है कि जब तक विदेशी लोग पेटेंट आदि के चक्कर में घुसें हमें अखिल भारतीय बाबा-बाबी शैक्षिक अनुसंन्धान केन्द्र खोलने में तनिक भी देरी न करनी चाहिये। वरना कल को ये हो सकता है कि हम केवल ताकते रह जांय और गद्दाफी की कोई महिला अंगरक्षक भारत में आकर प्रवचन देते देते कहीं 'Gaddafian Thoughts and Philosophy' न पढ़ाने लग जाय  :)


 - सतीश पंचम

Wednesday, October 19, 2011

कुरसी ले आओ आर....काहे खड़े खड़े ताक रहे हो......

.......

- कृपया आप लोग सांत हो जाइये.....अरे भाई शांत हो जाओ आप लोग...... क्यों बात नहीं मान रहे...सांत हो जाइये.....

- अरे तो चप्पल ही तो फेका है, इसमें इतना उतेजित न होइये.....उतेजना में काम सही नहीं होता....

- अब आप लोग उनको मारेंगे तो ई तो हि्ंसा हो जाएगी....फिर उनमें और हममे फर्क क्या होगा...

- नहीं देखिये आप लोग गलत कर रहे हैं..... छोड़ दिजिए, वह भी इंसान है.... गलती हो जाती है....

- अ त चप्पल फेक दिया तो उसी में कट गये कि एकदम बेहोस हो गये....बात करते हैं....

- त मारियेगाsss .....हैं...ई कौन बात हुई कि चप्पल फेंका तो आप भी मारेंगे ?

- ए जैबरधन जी, तनिक हटाइये उन लोगों को...

- नहीं, बिचार बिचार में भिनता आ जाती है, लेकिन इसका ए मतलब थोड़ी है कि उसने चप्पल फेका तो आप लगेंगे थपड़ियाने....

- अरे रामनरायन जी को कहिये थोड़ा पंखा चला दें....हां...टेबुलै वाला कह रहा हूं तब क्या एतना जल्दी सीलींग वाला फिट करोगे तब हवा चलाओगे....

- नहीं, हमारे कहने का मतलब ए है कि सामने वाला यदि अचेत है, नासमझ है तो क्या आप भी नासमझी दिखाओगे.....

- तो आप जाकर उनसे पूछिए न, उनकी पिटाई हुई तो उसके लिये वो जवाबदार हैं हम नहीं, अरे यार पंखा अब तक नहीं चालू किये...

- अरे भाई, दस आदमी जुटे हैं, किसी बात पर मतभेद हो जाता है, कोई उखड़ जाता है, कोई पखड़ जाता है....ऐसे में सबको न संभालकर एक साथ लेकर चलना पड़ेगा......

- नहीं हम ओ नहीं कह रहे, हमारा कहनाम ये है कि मानलिजिए जिस आदमी के पास दो ही पैर था तो चल लेता था, दौड़ता था, तमाम दुनियावी काम करता था। अब जैसे ही उसके पास मान लो पचास पैर और आ जांय तो सुरूवात में लड़खड़ईबै करेगा, कभी एक गोड़ दूसरे में बझेगा त कभी दूसरा गोड़ आठवें दसवें पैर में बझेगा, लन्गी लगायेगा.... समझे कि नहीं समजे...

- त वईसे ही है, सब को एक साथ लेकर चलने में, संभलने में थोड़ा समै लगता है....

- हां, बिलकुल, आप की बात से बिलकुल सहमत हूं भाई....ए त देखिये राजनीति है ये तो आप जानते ही है

- त राजनीति जो है सो कुल आपसे करवाएगी, आपको समय आने पर गदहा भी बनना पड़ेगा, समय आने पर चोर भी बनना पड़ेगा औ समय आने पर सदपुरूस भी बनना पड़ेगा

- नहीं, त आप ....हां लाइये....पान लेंगे रमणीक जी.....लिजिए...चूना अलग से है...

- हां त वही बात कि सब टैम पर सब राजनीति के अनुसार बनना होना पड़ता है, एकदम से टैट होने से नहीं चलेगा, आप को झुकना भी पड़ेगा, चार बात सुनना भी पड़ेगा, औ जरूरत पड़ने पर लातौ घूंसा खाना पड़ेगा...

- न त हम कहां मना कर रहे हैं.....लात घूंसा चलाना भी पड़ता है लेकिन ये कोई अच्छी राजनेति नहीं है....बाकि तो....लिजिये चाहौ आ गई...

- एक कप और लाइये....बिन्देस्वरी जी आप चाय पियेन्गे कि काफी.....त काफीये लाइये...चाय रोक दिजिए.....

- तो वही बात कि.....अ देखिये पंखा भी चल पड़ा हरहरा कर.....नहीं तीन पर किजिए 'फास' एकदम.....हाँ  'नोबवा' घुमा दिजिए जौने चारू ओर घूमे.....

- तो वही बात कि........नहीं जियादे नहीं, अइसे बिचारधारा वाले बहुत कमै हैं लेकिन हैं.....
 
- अरे यार बात समझा करो........ तो हम कहां कह रहे हैं कि कसमीर दे दो......हम कत्तई न कहेंगे कि कसमीर दे दो....उन लोगों की आजादी की मांग पूरी करो....कभी नहीं कहेंगे......... 
 
- अरे ई  कौनो साहरूख खान वाला फिलिमया थोड़े है ओ का कहते थे दिल वाले दुलहिनिया ले जायेंगे  जिसमें अमरीस पुरीओ था,  कौनो हिरोइन थी ओ यार वो जो कमर ओमर बड़ा नीक डोलाती थी....हां......ओही.....

- अ देखिये रमकैलास जी को लक्क से हिरोइन का नाम बता दिये.....अरे बहुत पुराना खिलाड़ी हैं कि.....
 
- तो जैसे  दिल वाले दुलहनीया में कहता है  - जा बेटी जी ले अपनी जिनगी.....जा तुझे साहरूखवा के जइसन चाहने वाला नहीं मिलेगा....तुझे आजाद किये......त ई बात कसमीर पर थोड़े लागू होगी.....न.....कत्तई नहीं.......न तो  कसमीर साहरूख है न सिमरन.....कसमीर कसमीर है.....
 
- हां,.... पुलिस वाले आ गये.....तब ठीक है..... उसी के हाथ में सौंप दिजिए उस चप्पलमार को बाकि अब का कहें....ससुर बड़ा नरक है राजनीति....
 
 
- सतीश पंचम

Tuesday, October 18, 2011

भदेस बतकूचन

- ई आडवाणीया भी रथ लेकर आ रहा है, देखिये कैसे इसवागत के लिये लोग ठाड़ हैं


- जिसको कुछ काम नहीं होता वही ठाड़ हो ऐसे काम में लगा रहता है

- तो अभी कौन सा आप खट रहे हो, मन हो तो आप भी ठाड़ हो जाइये

- वो लिफाफा मिले तो ठाड़ होउं, लेकिन मिले तब न

- कौन सा लिफाफा

- वही जो पत्रकार लोग को मिला था जिसमें हजार हजार का नोट था, अखबारों में फेवर में लिखने की इलतिजा करते हुए

- तब क्या खाकर कैश फार वोट मामले में भजपाई हलकान हैं, सुना है जेदुरप्पौ नाम का चमचमाता मेडल इनके सीने पर टंगा है

- औ कंगरेसी कौन से झुल्ले मुल्ल हैं, उनके पास कोई तमगन की कमी है, एक से एक घोटालेबाज चलित्तर

- कौन नहीं हैं, सपै को देख लिजिये, मायावतीयै को देख लिजिये....हर कोई एक से एक जबरजंग

- तो किसको वोट दिजिएगा

- अब जही तो यच्छ प्रश्न है

- तब जाकर यच्छै से पूछिये उसका उत्तर

- उनको भी न मालूम होगा

- तब किससे पूछियेगा

- यह दूसरा प्रश्न है

- करोड़पति करोड़पति नहीं खेल रहा हूं, वाकई पूछ रहा हूं

- यह तीसरा प्रश्न हो गया

- लांण.......... तुम यहीं प्रश्न गिनते रहो, हम चलते हैं

- कहां

- चउथा प्रश्न पूछने

- प्रश्न का नाम गाम कुछ होगा

- "वोटवा केंहर पड़ी"  ?   

:-)

****************
 
              -  Satish Pancham
.

Sunday, October 16, 2011

दर्द का सरकारी रिश्ता......

         हाल ही में एक भूतपूर्व मुख्यमंत्री को जेल में डालते ही उनके सीने में दर्द उठा। बेचारे जेल से अस्पताल ले जाये गये। ऐसे ही कई और भी राजनेता हैं जिन्हें जेल जाते ही सीने में, कमर में, अगल में बगल में दर्द उठने लगता है। समझ नहीं आता कि यह दर्द अदालती फैसले के आलोक में है या वास्तविक दर्द है। ऐसे लोगों की डॉक्टरी रिपोर्टें भी गजब अंदाज में आती हैं। सीधे सीधे गणित के विलोमानुपाती अंदाज में। मसलन, यदि सरकारें अनूकल हुई तो मेडिकल रिपोर्ट खराब आती है, शुगर, बीपी सब बढ़ जाता है, सरकार चिंता प्रकट करती है। और यदि सरकार प्रतिकूल हुई तो मेडिकल रिपोर्ट सब ठीक ठाक आता है। बीपी नॉर्मल होगा, शुगर लेवल सीमांत प्रदेश पर गुलछर्रे उड़ा रहा होगा और तो और डॉक्टर खुद ही कह देगा कि इन्हें कोई बीमारी नहीं है, वापस जेल ले जाया जा सकता है। ऐसे में उन मरीजों का दिल और बैठ जाता है, हांलाकि तब भी शिकायत होती है कि दिल ठीक से बैठ नहीं पा रहा, संभवत: उसे गठिया न हो गया हो। डॉक् साब जरा देख लेंगे तो अच्छा रहेगा, आपके बच्चे जियेंगे, पत्नी होगी तो खुश रहेगी और गर्ल फ्रेण्ड होगी तो सस्ते रेस्टोरेण्ट में भी निबाह लेगी। डॉक् साब.....डॉक् साब....


           अब ऐसे में उन डॉक्टरों की स्थिति समझी जा सकती है जिन्हें ऐसी रिपोरटें बनाने के लिये कहा जाता होगा। मसलन, जो डॉक्टर अपनी पांच साल की मेडिकल पढ़ाई और तमाम अनुभव आदि के जरिये पहली ही नजर में समझ जायेगा कि बंदा नाटक कर रहा है सीने में दर्द होने का वह पहले देखेगा कि दर्द सरकारी है या प्राइवेट। बंदा सरकार फ्रेण्डली है या एण्टी सरकारी। इसे ठीक ठाक बताने पर क्या प्रतिक्रिया हो सकती है, कहीं गाँव में पोस्टिंग न कर दी जाय। इन तमाम प्रश्नों के बीच उसे समझ आता है कि उसकी मेडिकल पढ़ाई में एक सब्जेक्ट जान बूझकर छोड़ दिया गया जिसमें इस तरह के लोगों के हैण्डल करने की विधि बतानी चाहिये थी। तमाम फिजूल की बातें पढ़ा दी जाती हैं - ये पैंक्रिया वाली बीमारी है, इसे ऐसे ठीक करना चाहिये, ये नसों की गड़बड़ी है, इसे फलां तरह से दवा देकर सक्रिय करना चाहिये लेकिन कहीं यह नहीं पढ़ाया जाता कि ऐसे हाई प्रोफाइल मरीजों के नकली दर्द को कैसे हैण्डल किया जाय। कैसे उनके चेले चपाटों से अपना गिरेबान बचा कर रखा जाय।

          उधर वार्ड ब्वॉय अलग परेशान होगा कि ऐसे नेता को कैसे वह संभाल कर बाथरूम ओथरूम ले जाय, कैसे उसकी सेवा टहल करे जबकि वह अच्छी तरह चल फिर सकता है, अच्छी तरह घूम नाच सकता है। नर्सें अलग परेशान कि ऐसे नाटक करने वाले मरीजों को कैसे दवा दे जोकि भले चंगे हैं। कुछ तो अपने पुराने अनुभव से जानती हैं कि ऐसे मरीजों के जाने के बाद सफाई करते वक्त फूलदान, बुके आदि की तलहटी में टेब्लैट्स जस के तस फेंके पाये जाते हैं, न उन्हें खाया जाता है न कुछ लेकिन मरीज भला-चंगा होकर जाता है। ये अलग बात है कि उनके स्वस्थ होने में जो समय लगता है वह न्यायिक हिरासत या पुलिस हिरासत के बीतने पर निर्भर करता है। इधर अदालत के द्वारा तय न्यायिक हिरासत की समय सीमा बीती उधर मरीज अपने आप भला चंगा हो जाता है।

         खैर, अब तो अस्पतालों में भी एलर्ट कर दिया जाना चाहिये कि जैसे ही किसी वी आई पी के गिरफ्तार करने की खबर आये तुरंत ही एम्बुलेंस, बिस्तर, आपरेशन थियेटर आदि तैयार रखें क्योंकि अभी उसके सीने में दर्द उठेगा और वह उठा पठाकर यहीं लाया जायेगा। सुना है अस्पतालों के सामने बैठते पानवाले भी अपनी त्वरित बुद्धि का इस्तेमाल करते हैं और मण्डी से पान का तिगुना चौगुना स्टॉक लाकर रख देते हैं क्योंकि माना जाता है कि वहां जमा होने वाले नेता के चेले चपाटों का सर्वप्रिय खाद्य पदार्थ पान ही होता है। दूसरी कोई चीज उन्हें ऐसे में अच्छी नहीं लगती सिवाय पान के। और भला लग भी कैसे सकती है जब उनका नेता अन्दर जिन्दगी और मौत से जूझ रहा हो। यह अलग बात है कि अन्दर उनका नेता मजे से एसी कमरे में बैठ भांति भांति के व्यंजन भकोस रहा होता है।  सिर हिला-हिला कर कहता है....

- और दो रोटी रखो, चावल जरा सा रखना और सब्जी भी थोड़ा सा ही रखना...

- अरे थोड़ा बोला था ज्यादा रख दिया.....

- अच्छा रख दिया तो रखो अभी क्या बोलूं ...

- वो रसगुल्ला बोला था.........

- तो रखो ना

- अरे रखो यार...... रिपोर्ट की चिंता तुम काहे करते हो

- नहीं वो अचार मत रखना.... बहुत तीखा है, मत रखो...सुबह तफलीक होता है

- नहीं, उसका रिपोर्ट पब्लिक नहीं करना.....

- अरे यार समझा करो....कल को पब्लिक में खराब इमेज बनेगा ....अप्पोजीशन बवासीर-भगन्दर के नाम पर मजाक बनायेगा.......सो कीप इट प्राइवेट   :-)


- सतीश पंचम

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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