सफेद घर में आपका स्वागत है।

Sunday, December 26, 2010

कोटर वाले जीव..........सतीश पंचम

         परसों टीवी पर खबरों में बताया जा रहा था कि मुंबई में कुछ आतंकवादी घुस गये हैं। लगातार टीवी पर ब्रेकिंग न्यूज वाली पट्टी फ्लैश हो रही थी। टीवी पर एक आतंकवादी का स्केच भी बनाकर दिखाया जाने लगा था। रात तक एक दूसरे से फोन पर बतिया कर सभी लोग कुशल क्षेम तो पूछ ही रहे थे लेकिन आपस में एक दूसरे को प्रश्नवाचक निगाहों से देखे भी जा रहे थे। और देखते भी क्यों नहीं, आखिर नये साल का जश्न मनाने वाला दिन पास ही है और ऐसे में यदि आतंकवादी फातंकवादी कहीं गड़बड़ा दिये तो और मुसीबत। 

     इसी उहोपोह के बीच अभी कल शाम दादर जाना पड़ गया। बिटिया के लिये आईडल बुक डेपो पर किताब लेने। साथ में बिटिया भी थी। तभी नज़र अमूल के एक विज्ञापन वाली होर्डिंग पर पड़ी । अमूल के विज्ञापन वैसे भी अपने चुटीलेपन के कारण जाने जाते हैं। इस विज्ञापन में भी प्याज की बढ़ी कीमतों को मुद्दा बनाया गया था। अभी सुबह ही कांदा-पोहा (प्याज-च्यूड़ा) बनाने के दौरान श्रीमती जी के प्रवचन सुन चुका था कि प्याज महंगे हैं ऐसे में कांदा-पोहा बनाने का क्या तुक ? दो चार दिन बाद खाओगे तो नहीं चलेगा क्या जो कांदा-पोहा खाने के लिये अभी ही खन बहाये हो। अमूल के इस विज्ञापन देखते ही वही बात याद आ गई जिस पर लिखा था कि हम भूख मिटा सकते हैं, प्याज नहीं। उसे देखकर बिटिया भी मुस्कराने लगी और मैं भी। 

        वहां दादर पहुंचने पर देखा कि काफी पुलिस लगी है। रास्ते अमूमन खाली हैं। ज्यादा भीड़ भाड़ नहीं है। मन में आया कि कहीं वह दुकान भी बंद न हो गई हो जहां पर कि जाना है। लेकिन शुक्र था दुकान खुली थी। किताबें ली गईं। लेकिन इतना तो है कि अब हम मुंबई वाले भी अक्सर इस तरह की सुरक्षा व्यवस्था और चाक चौबंद मानसिकता में जीने के आदि हो चुके हैं। 
     एक जगह फूलों को देख मन में आया कि यहां की तस्वीर कैमरे में कैद करनी चाहिये लेकिन फिर वही बात की कहीं पुलिस कुछ और ही न समझ ले। क्योंकि अब हम मुंबई वाले चौपट मानसिकता के घेरे में आ गये हैं। जी हाँ, चौपट मानसिकता..... जहां पर कि यदि कोई प्रकृति की ओर खिंच कर उसकी तस्वीर भी उतारना चाहे तो नहीं उतार सकता, क्योंकि पुलसिया पूछताछ झेलनी पड़ सकती है कि किस लिये खिंची जा रही हैं तस्वीरे ? क्या इस्तेमाल किया जायगा इनका ?  कोई प्रूफ ?  आईडेटिटी ? अब इन सब सवालों के कौन जवाब देता फिरे। इसलिये बेहतर है, प्रकृति तो मन ही मन निहार लिया जाय और उसे अपनी नज़रों में ही कैद करा जाय। तात्पर्य,  आतंकवाद रोजाना के रहन सहन के हमारे ढर्रे पर ही असर नहीं डाल रहा, बल्कि कभी कभी कला का गला भी घोंट देता है, प्रकृति प्रेम की सहजता पर भी बंदिशें डालने पर मज़बूर करता है। आतंकवाद के इस पहलू से भी रूबरू होने का अहसास पहली बार कल शाम हुआ। साँझ ढलने लगी थी सो बिटिया और मैं, हम दोनो जने लौट चले। 

       रास्ते में फिर एक कत्थई रंग की नाटी सी पुलिसिया गाड़ी दिखी जिसके आस पास पुलिस का काफी जमावड़ा था। मन ही मन मैं सोचने लगा कि इस तरह से खुशियां मनाने में भी क्या मजा रहा अब। कि पुलिस व्यवस्था हो तो हम खुशिया मनायें वरना अपने अपने घर में एक कोटर में चुपचाप पड़े रहें। हाँ, कोटर ही कहना होगा मुंबईया घरों को। एक तो छोटे छोटे घर होते हैं, तिस पर रात दिन की भागा-दौड़ी। 

    सुबह निकलते ही प्लेटफार्म पर पहले  मुंह से ग्यारह चालीस की लोकल, आठ- दस की लोकल जैसे शब्दों की जुगाली होती है और फिर लोटती बेला नौ पन्द्रह, दस-पचास जैसे शब्दों की घुटाली। क्योंकि यहां मिनट-मिनट के हिसाब से बातें जो चलती है। लोकल ट्रेन का नाम तो पुकारा जाता ही है,साथ में उनके छूटने के समय को भी उसके साथ नत्थी किया जाता है। बेलापुर की आठ दस वाली, गोरेगाँव की सात पचास वाली। ट्रेन न हुई किसी कि बहुरिया हो गई वो फाफामऊ वाली मंझली बहू, वो सीतापुर वाली बड़की, वो बांदीपुर वाली छुटकी :) 

     खैर, जो लोग पहली बार गाँव से मुंबई आते होंगे, तो उन्हें सबसे पहली बात जो अखरती होगी वह होगी यहां के छोटे छोटे घरों की साइज। और यह अखरना स्वाभाविक भी है। गँवईं खुलेपन और शहरी कोटरपन में जो बड़ा भेद होता है वह इन्हीं घरों के आकार के कारण होता है। उसी में रहना, उसी में खाना, और जब प्रकृति प्रेम कुछ ज्यादा ही छलकने लगे तो वहीं गैलरी में एकाध गमले रख कर उसमें समूचे बगीचे को पा लेने जैसा सुख। 

    वहीं, एक चीज जो मुझे बड़ी मजइत लगती है वह यह कि गाँव वालों की अपेक्षा शहर के लोग सोचते तो खुलेपन से हैं लेकिन रहते अपने उसी तंग कोटरे में हैं जबकि गँवई आदमी ठीक इसका उल्टा करता है। वह सोचता तो तंग मानसिकता से है लेकिन रहता अपने गाँव में खुलेपन से है।  है न अजीब विडंबना।

    बहरहाल फोटोग्राफी वाली बात से याद आया कि  इस बार गाँव जाने पर मै कुछ तस्वीरें ले रहा था। फूल पत्तियों की, कीड़े मकौड़ों की, बादल, बंसवारी की। तभी मेरी नज़र नीम के एक पेड़ पर पड़ी। उस पेड़ के तने में एक कोटर था जिसमें कि एक नन्हा सा पीपल का पौधा पनप रहा था। मुझे उत्सुकता हुई। ये तो बहुत सुंदर दृश्य है। एक नीम का पेड़ अपने गर्भ में पीपल को पाल रहा है। करीब जाकर तस्वीर लेने वाला था कि तभी उस नन्हे पीपल के पौधे के पीछे एकाएक कुछ हलचल सी हुई। लगा कि कुछ था वहां पर। पेड़ के पास ही गड़े एक खुंटे पर पैर रखकर उचक कर देखा तो दो खाकी रंग वाले मेंढ़क दिखाई दिये। मेरी खुशी का ठिकाना न रहा। ऐसा दृश्य पहली बार देखा था मैंने जिसमें कि एक नीम का पेड़ हो, उसके गर्भ (कोटर) में एक पीपल का पौधा पल रहा हो और वहीं पर दो मेढ़क भी रह रहे हों। 

दोनों मेंढकों के सिर की हल्की सी झलक
    कैमरे को एडजस्ट कर, तस्वीरें लेने की तैयारी कर ही रहा था कि मेरी उपस्थिति से वे मेंढ़क अपने उसी कोटर में गहरे जा घुसे। मैं थोड़ा निराश हुआ कि यार अच्छा सीन कैप्चर कर रहा था ये कम्बख्त अंदर क्यों चले गये। एक छोटा सा कंकड़ उछाला उस कोटर की ओर लेकिन नतीजा सिफ़र। दोनों मेढक और अंदर की ओर हो लिये। उस दिन शाम हो चली थी सो वापस हो गया । 

    अब अगले दिन सुबहिये मैं फिर वहीं पहुँचा, कैमरा कुमरा लेकर। लेकिन उन दोनों मेढ़को का सिर्फ हल्का सा सिर ही दिखाई दे रहा था। और करीब जाने का मतलब था कि उन्हें फिर कल की तरह कोटर में भीतर की तरफ जाने का मौका देना। थोड़ी देर रूक कर इंतजार किया। इधर उधर और तस्वीरें खींचा लेकिन ये मेंढ़क न तब बाहर निकले न अब। मजबूरन जैसे तैसे एक दो तस्वीरें जूम करके कैप्चर किया। उसमें भी सही ढंग से नहीं आये कम्बख्त। 

      शाम के वक्त फिर से वहां पहुंचा लेकिन शायद अब उन्हें मेरे वहां आने का भान हो गया था पहले ही। वो पीपल की ओट से उपर ही नहीं दिखते थे कभी। वैसे भी मैं कौन सा वाईल्ड लाईफ फोटोग्राफर था जो ऐसे चित्र लेने के लिये तमाम नाईट विजन कैमरा, स्टैंड आदि लेकर गया था कि कैमरा सेट करके रख देता, निकलते जब निकलते। 

नेट से उपलब्ध ब्राउन ट्री फ्रॉग का चित्र 
      यदि ले गया होता तो संभवत: खाकी वर्दी ओ ओ..ओ......खाकी रंग वाला मेढ़कों का सरदार मुझसे पुलिसिया अंदाज में जरूर पूछता....क्या फोटो ले रहे हो ....किसके लिये ले रहे हो.......इन लोगों में क्या खास बात है जो फोटो ले रहे हो......ये लोग भी तो तुम शहर वालों की तरह कोटर जीवी हैं ...कोटर में रहते हैं.....देखो उनके यहां एक गैलरी भी है, बगीचा भी है पीपल वाला...... ठीक तुम लोगों की तरह ही तो रहते हैं...........फिर क्यों खीच रहे हो फोटो........कुछ  गड़बड़ तो नईं है ना...... मालूम नहीं क्या...... कि आतंकवादी लोगों की वजह से इलाका हाई अलर्ट पर है.......चलो लाईसेंस दिखाओ :)

-  जी लाइसेंस तो नहीं है। 

तो निकालो पचास ....कम से कम आज का प्याज का खर्च तो निकलेगा   :)

 -  सतीश पंचम


स्थान -  वही, जहाँ पर मेरा कोटर है।


समय - वही, जब कोटर से निकल कर एक नर मेंढ़क बाहर की ओर देखे और दूसरे से कहे, लगता है चला गया वह फोटो वाला, और तू सजती ही रह गई ।

Saturday, December 25, 2010

वेटर से डॉक्टर बनने का सफर.............सतीश पंचम

    हाल ही में बी.बी.सी के नेट संस्करण पर तफ़रीह कर रहा था कि अचानक एक खबर पर नज़र टिक गई। यह ख़बर मेरे जिले जौनपुर से थी। स्वाभाविक था कि मेरा वहां ध्यान जाता।
  खबर के अनुसार वहां पर एक होटल में वेटर का काम करने वाले एक शख्स रमेश थापा ने अपनी वेटर की नौकरी करने के साथ ही साथ अपनी पढ़ाई भी जारी रखी और एक दिन वह आया कि उसके हाथ में थी पी.एच.डी. की डिग्री। अब रमेश थापा वहां पर वेटर का काम तो कर ही रहे है, साथ ही साथ एक जगह अंशकालिक प्रवक्ता के तौर पर भी अपना योगदान दे रहे है। इस तरह से दो जगहों की नौकरी के पीछे का किस्सा भी अपने आप में रोचक लगा।
  इस खबर को पढ़ कर मुझे थोड़ा अच्छा लगा कि चलो, इस तरह की कोई तो पॉ़जिटिव खबरें अब भी छप रही हैं, वरना तो अखबारों ने इस तरह की खबरें छापना न जाने कब से बंद कर दिया है। जहां देखो वहीं मार-काट, हंगामें, चिल्ल पों वाली खबरें हैं। कहीं पर फिल्मी हिरोइनों की खबर को प्रमुखता दी जा रही है तो कहीं पर किसी के दावतनामे को लेकर कसीदे पढ़े जा रहे हैं।  
   लिजिये आप भी पढ़िये वह पूरी खबर जिसे मैंने बी.बी.सी. हिंदी की वेबसाइट पर मुकुल श्रीवास्तव के कॉलम में पढ़ा है और वहीं से साभार इसे यहां पेश कर रहा हूँ 
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      डॉक्टर रमेश थापा उत्तर प्रदेश के जौनपुर ज़िले के एक होटल में वेटर हैं पर उनके पास पीएचडी डिग्री है.
दिन में वह जौनपुर के एक महाविद्यालय में अंश कालिक प्रवक्ता के रूप में काम करते हैं और शाम को फिर वेटर बन जाते हैं.
पढ़ने का जज्बा 
पाँच भाई और एक बहन के भरे-पूरे परिवार में रमेश का जन्म नेपाल के जनकपुर ज़ोन के सिन्दुली ज़िले में हुआ.पिता भक्त बहादुर निरक्षर किसान थे लेकिन अपने बेटे को हमेशा पढ़ने के लिए प्रेरित करते थे.
गरीबी पढाई में बाधा तो बनी पर रमेश के जज़्बे के आगे कोई मुश्किल टिक नहीं पाई.
पढाई में तेज़ होने के कारण उन्हें बचपन से ही तत्कालीन नेपाल सरकार की रत्न बाल कोष छात्रवृति मिलने लगी जिससे पढाई जारी रही.
इसी बीच एक लंबी बीमारी के बाद रमेश के पिता का निधन हो गया और नेपाल की राजनीतिक परिस्थितयाँ भी बिगड़ने लगीं और नेपाल सरकार से मिलनेवाली छात्रवृत्ति बंद हो गई.
रमेश अपनी पढाई जारी रखना चाहते थे पर आर्थिक परिस्थितियों से विवश होकर उन्होंने नौकरी करने का फ़ैसला किया.
नेपाल में कोई ठीक रोज़गार नहीं मिल पाया तो रोज़गार की तलाश में वो वाराणसी आ गए .
संघर्ष
फिर शुरू हुआ संघर्ष. एक नए दौर में, नए परिवेश में, घर- परिवार से दूर और अपनी बचत घर भेजने की मजबूरी के बीच रमेश ने सबके बीच सामंजस्य बिठाया.रमेश जब भारत आए तो वह सिर्फ़ दसवीं पास थे. अपने बड़े भाई राजू की मदद से वे जौनपुर के एक होटल में वेटर हो गए.
वो जब भी अकेला होता तो उसे अपने पिता की बहुत याद आती जो उसे हमेशा पढ़ने के लिए प्रेरित किया करते थे.
वो याद करते हुए बताता है कि ये शायद उनका ही आशीर्वाद था जो वो इतनी विपरीत परिस्तिथियों के बावजूद यहाँ तक पहुँच गया.

जौनपुर में काम करने के साथ उसने व्यक्तिगत परीक्षार्थी के रूप में बारहवीं की परीक्षा पास की.
फिर तो उसके हौसलों को पंख लग गए. दिन में जब काम का दबाव कम होता तो वो पढता और शाम को पेट की आग बुझाने के लिए वेटर की वर्दी पहन लेता.
उसकी लगन को देख कर होटल के मैनेजर जितेंद्र यादव ने भी उसका हौसला बढ़ाया.
बीए और एमए करने के बाद उसने शोध छात्र के रूप में जौनपुर के ही वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय के टी डी महाविद्यालय में ग्राम्य सामाजिक विकास में उद्योगों की भूमिका विषय पर शोध छात्र के रूप में दाखिला ले लिया.
सपना
वेटर और शिक्षक के रूप मे दोहरे दायित्वों को निभाने के बारे में रमेश का नजरिया एकदम स्पष्ट है.
रमेश पिछले दो साल से अंश कालिक प्रवक्ता के रूप में काम कर रहें हैं जहाँ उन्हें तीन हज़ार रुपए मिलते हैं.
पर जब कोई छात्र होटल में खाना खाने आता है तो वह उसका सम्मान एक ग्राहक की तरह से ही करते हैं.

हाँ यह बात अलग है कि उनके छात्र होटल में भी उन्हें सम्मान देते हैं.
भविष्य की योजनाओं के बारे में रमेश बताते हैं वे जल्दी ही माँ का आशीर्वाद लेने नेपाल चले जायेंगे और फिर शिक्षण में अपना भविष्य तलाशेंगे.
रमेश के शोध निर्देशक डॉ आर एन त्रिपाठी बताते हैं कि रमेश को अपने निर्देशन में शोध कराने का एक मात्र कारण उनका पढाई के प्रति लगाव और शिक्षक बनने की चाह थी.

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  डॉक्टर रमेश थापा के इस जज़्बे और हौसले को देख कर मुझे 

गुलज़ार की लिखी एक त्रिवेणी याद आती है जिसमें वह कहते हैं कि - 



बे लगाम उड़ती हैं कुछ ख़्वाहिशें ऐसे दिल में

'मेक्सीकन' फिल्मों में कुछ दौड़ते घोड़े जैसे


थान पर बाँधी नहीं जातीं सभी ख्वाहिशें मुझसे



  उम्मीद है डॉक्टर रमेश थापा अपनी ख्वाहिशों को आगे इसी तरह से     
पूरा करेंगे । उनके उज्जवल भविष्य की कामना करता हूँ। 
 

- सतीश पंचम



    Tuesday, December 21, 2010

    राष्ट्रीय ब्लॉगर पुरस्कार अनुसंधान संस्थान...........सतीश पंचम

            'राष्ट्रीय ब्लॉगर पुरस्कार अनुसंधान संस्थान' .....एक ऐसा संस्थान ..... जिसके बारे में जितना कुछ कहा जाय, कम है। बता दूं कि ब्लॉगरों की हिंदी सेवा के लिये पुरस्कार, उनकी भावना, उनकी सद्भावना, उनके प्रति आभार आदि प्रकट करने हेतु इसकी स्थापना हुई है। यही एक एकमेव संस्थान है जिसके द्वारा जताये आभारों का भार ही इतना ज्यादा है कि संभाले नहीं संभल रहा। जैसे ही यह संस्थान अपनी ओर से किसी के प्रति आभार प्रकट करते हुए किसी का सम्मान करता है, तुरंत ही पृथ्वी करीब सवा इंच दब जाती है। इधर पृथ्वी दबी नहीं कि वैज्ञानिकों के सिस्मोग्राफ थरथराने लगते हैं। रिक्टर स्केल में रीडिंग की नाप जोख होने लगती है।

         यहां तक कि वैज्ञानिकों ने चिंता जताई है कि इस तरह के आभार प्रकटीकरण और पुरस्कार वितरण सम्मान आदि से यदि धरती दबती गई तो हो सकता है पृथ्वी, सूर्य के चारों ओर घूमने की अपनी कक्षा से ही हट जाय और बहुत संभव है उसका घूर्णन काल ही समाप्त हो जाय।

              लेकिन मानना पड़ेगा इस संस्थान के प्रबंधक श्री पुरस्कारी लाल जी 'अजोर' के हौसले को। इतना सब होने पर भी अपने पुरस्कार वितरण कार्यक्रम से जरा भी पीछे नहीं हटते। रात दिन पुरस्कारों के बारे में सोचते रहते हैं, किसको किस नाम से पुरस्कार दिया जाय यही सोच उन्हें खाये जाती हैं। और यदि कुछ नहीं भी कर रहे हों तब भी नहीं सोचने का काम तो कर ही रहे होते हैं। लेकिन ऐसा दिन कम ही आता है कि जब उन्हें खाली बैठना पड़े। अमूमन रोज ही किसी न किसी ब्लॉगर को पकड़ कर इनकी ओर से सम्मानित कर दिया जाता है। जो नहीं भी लेना चाहते उनको भी दौड़ा दौड़ा कर दिया जाता है कि ले लो यार, दे ही तो रहे हैं। कुछ तुमसे मांग तो नहीं रहे। और सामने वाला बिचारा संकोच से धन्यवाद कह कर रख लेता है। मन ही मन कहता भी है कि कम्बख्तो पुरस्कार बांट रहे हो कि आलू टमाटर। वैसे आलू टमाटर की भी कीमत तुम्हारे इन पुरस्कारों से ज्यादा है। कुछ तो शर्म करो। लेकिन पुरस्कार अनुसंधान संस्थान के कर्ता धर्ता मानें तब न। करेंगे अपने मन की ही।

         उधर  पुरस्कारों के वितरण को लेकर इतने ज्यादा बिज्जी रहते हैं श्री पुरस्कारी लाल जी 'अजोर' कि दोपहर में केवल कुछ समय के लिये ही बिचारे पॉवर नैप लेते हैं औऱ उसी दौरान उनकी हजामत भी बनाई जाती है। सुना तो यह भी है कि जो नाई उनकी हजामत बनाता है उसे भी वर्ष का सर्वश्रेष्ठ हजामतिया ब्लॉगर पुरस्कार बांट चुके हैं।

         आज इसी ' राष्ट्रीय पुरस्कार अनुसंधान संस्थान' के Annual day के मौके पर श्री बटुर चाम- लिंगम जी भाषण दे रहे हैं। बता दूँ कि श्री बटुर चाम-लिंगम जी 'राष्ट्रीय पुरस्कार अनुसंधान संस्थान' के सबसे अच्छे स्टूडेंट के रूप में जाने जाते हैं और श्री पुरस्कारी लाल जी 'अजोर' के प्रिय शिष्य भी हैं। सभी लोग उनकी बौद्धिकता का लोहा- लक्कड़ मानते हैं। यह अलग बात है कि श्री बटुर चाम-लिंगम जी की सारी बौद्धिकता उनके नाम को सार्थक करते हुए दैहिक चमड़ी और लैंगिक अनुसंधान तक ही बटुर कर रह गई है।

          तो लिजिये, आप भी पढ़िये श्री बटुर चाम-लिंगम जी का वह भाषण जिसे उन्होंने दिया था.....

         आदरणीय सभापती महोदय...अतिथि विशेष ब्लॉगर मंत्री श्री तुम तुम तारा रारा जी.....माननीया पोस्टकार और मेरे पियारे टिप्पणीपतियो.......आज अगर राष्ट्रीय पुरस्कार अनुसंधान संस्थान का नाम बुलंदियों को छू रहा है तो उसका श्रेय सिर्फ और सिर्फ एक इंसान को जाता है श्री पुरस्कारी लाल जी 'अजोर' को ....गिव हिम ए बिग हैंड......

           पिछले कुछ महिनों से इन्होंने निरंतर इस संस्थान से पुरस्कार पे पुरस्कार बांटे हैं.......अपनी विद्वता के लिये जाने जाने वाले वर्ष के सर्वश्रेष्ठ वृषभ ब्लॉगर , अपनी विनम्रता के लिये जाने वाले वर्ष के सर्वश्रेष्ठ गाय ब्लॉगर, अपनी चिलगोजई के लिये जाने जाने वाले वर्ष के सर्वश्रेष्ठ छछूंदर ब्लॉगर, कोयल , कंगारू, तीतर, बटेर ....ऑल दिस काइंड ऑफ ब्लॉगर पुरस्कार्स........ उम्मीद है आगे भी ये ऐसे ही बांटते रहेंगे.......हमें तो आश्चर्य होता है कि एक इंसान अपने जीवन काल में इतने पुरस्कार कैसे बांट सकता है।

          इन्होने कड़ी तपस्या से अपने आपको इस काबिल बनाया है .......सुबह उठते ही सबसे पहले यही सोचते हैं कि आज कौन सा पुरस्कार किसका नाम देते हुए किसको दिया जाय। वक्त का सही उपयोग....घंटे का पूरा इस्तेमाल कोई इनसे सीखे.....सीखिये इनसे सिखिये....

           आज हम छात्र यहां हैं.....कल देश विदेश मे फैल जाएंगे......वादा है आपसे जिस देश में रहेंगे वहां पुरस्कार बांटेंगे......इस संस्थान का नाम रोशन करेंगे.....दिखा देंगे सबको.....पुरस्कार प्रदान करने की क्षमता जो यहां के छात्रौं में है वो संसार के किसी छात्रों में नहीं है.....नो अदर छात्रा ....नो अदर छात्रा.....

          आदरणीय टिप्पणी मंत्री जी, नमस्कार....आपने इस संस्थान को वो चीज दी जिसकी हमें सख्त जरूरत थी.....टिप्पणी.....

         टिप्पणी होती सभी के पास है.....सब छुपा के रखते हैं.....देता कोई नहीं......आपने अपनी टिप्पणी इस पुरस्कारी पुरूष के हाथ में दिया है....अब देखिये येह कैसा इसका उपयोग करते हैं.....

     फिलहाल तो इस अवसर के लिये तैयार किये गये लाईब्रेरीयन दुबे जी का यह शेर सुनिये......
    उत्तमम् ब्लॉगम.......No one पूछतम्
    निकृष्टम ब्लॉगम....टुचुक टुचुक....
    कनिष्ठम ....थुडथुड़ीत पाखंडम....
    छद्म ब्लॉगरी....प्राण गटकम् :)

      - इति पुरस्कारी लाल जी 'अजोर' कथा :-)
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           यह पोस्ट अमरेन्द्र प्रकरण पर आधारित है। अमरेन्द्र के द्वारा उठाये गये एक वाजिब मुद्दे पर जिस तरह से पुरस्कार बांटते, और तमाम चिलगोजइयां करते हुए, टिप्पणीयाँ हटाईं और खुद अपनी भद्द पिटवाई है, उसी के आलोक में यह पोस्ट लिखी गई है।


         सुधीजनों से आशा है कि पूरा प्रकरण जानते होंगे। यदि न जानते हों तो उस पोस्ट को पढ़ लें। जिसमें कि बताया गया है कि कैसे कैसे मुखौटा लगाये हुए लोग ब्लॉगिंग की ऐसी तैसी करने में लगे हुए हैं। कैसे सम्मान देने और एक दुसरे की पीठ खुजाने के पुनीत कर्म में लगे हुए हैं।

         मैं यह पोस्ट लिखना नहीं चाहता था क्योंकि इस तरह बार बार ब्लॉगिंग को लेकर लिखी पोस्टें मुझे एक तरह की बोरियत और टैम खोटी करने का माध्यम सी लगती हैं। लेकिन जब मन में आ गया कि पुरस्कार बांटू बंदे की मौज लेनी चाहिए तो फिर तो की बोर्ड खड़खड़ाने लग गये।

      इस  पूरे प्रकरण से इतना जरूर अच्छा हुआ है कि एक और मुखौटा उतर गया है। हिंदी सेवा के नाम पर सम्मान देने, और लेने का खेल कैसे होता था यह सब लोग अमरेन्द्र के द्वारा उठाये गये एक सवाल से जान गये।

           वैसे, सब लोग तो समझ ही रहे थे लेकिन कह शायद इसलिये नहीं रहे थे कि कौन फिजूल में अपना मगज खराब करे। और यही मानसिकता मेरी भी थी। लेकिन फिर जब लगा कि थोड़ा सा  मौजायन हो जाय......तो ठेल दिया  :-)

     आशा है, अब तक मेरी इस फालतू सी पोस्ट पढ़ने की वजह से आप भी अपना अच्छा खासा टैम खोटी कर चुके होंगे   .......... हांय.....ये धरती क्यों दब गई है......मैं क्या इतना बोझ हो गया हूं ?

     ओह....लगता है एक और पुरस्कार घोषित हो गया है :-)

    Speech courtecy :  3 इडियट्स ।

    (चूंकि इस मुद्दे पर काफी बहस मुबाहिसा हो चुका है लिहाजा नाहक ही बातों को और लंबा खिंचने से बचाने के लिये कमेंट ऑप्शन बंद किया जा रहा है। )

    Saturday, December 18, 2010

    संभल कर बबुआ.....ये कटार नहीं.... देशज दराँती है......सतीश पंचम

         आज सदरू भगत बहुत मुसकिल में हैं। सुबहिये से रमदेई अपनी कुभखीया बंदूक दना दन दाग रही है, फैर करे जा रही है। देवता पितर, पुरखा-पुरनीया किसी को नहीं छोड़ रही है। कभी कहती है तुम मर जाओ, खपि जाओ कहीं घूरे में जाकर, जहन्नुम हो जाओ तो कभी कहती है कि तुम क्यों मरो, मैं  ही मर जाती हूँ .....जान तो छूटेगी बुढ़ऊ।  तुम्हारे पीछे मैं सती हो गई, जिनगी भर तुम्हारी गुलामी की तिसपर यही मुझे उपकारा मिला है। यही है तुम्हारा निसाफ.....यही तुम्हारी मरदई। अरे मर क्यों नहीं जाते....उमिर तो होय गई है बुढ़ऊ !! 

      उधर पतोहू अलग नराज है। न ठीक से खाना देती है न पानी। रूखी सूखी जो थाली में आ जाती उसी से काम चला रहे थे। क्या करें। चलाना पड़ रहा था। उस दिन अपने घर के बइठका में चउकी पर बैठे खाना खा रहे थे। खा क्या रहे थे बस यूं समझो कि मुँह जुठार रहे थे। भोजन के दौरान पीने के लिये एक गिलास पानी तक न रखा गया था बगल में, फिर भोजन का तो कहना ही क्या।  न दाल ढंग की बनी थी न चावल ढंग से पका था। और रोटियां तो ऐसी दिख रही थीं मानों बहुत देर तक खुले में रखे होने के बाद ही परोसी गई हो।  और सब्जी ?  उसका तो रंग ही अलग था। लग रहा था जैसे आँच पर रखकर उतार ली गई हों जस की तस। हल्दी नहीं पड़ने की वजह से फूलगोभी के टुकड़े ऐसे लग रहे थे जैसे आँखें फाड़ फाड़ कर थाली के बाहर देख रहे हों। 

       बहुत देर बाद जब आधे से ज्यादा भोजन हो चुका तब जाकर पतोहू ने आठ साल के बेटे के हाथ से पानी भिजवाया और वह भी एक लोटे में। लेकिन हाय रे नसीब। वह लोटा भी आते आते उसके हाथ से रास्ते में ही छूट गया। कच्चे जमीन पर पानी फैल जाने से सौंधापन महसूस तो हुआ लेकिन सदरू भगत को उससे क्या ? वह तो सोच में डूबे थे । अपने भाग्य को कोस रहे थे जब घर में नया मोबाइल खरीद कर लाये थे।  लेते बखत दुकान वाले ने सदरू भगत को कहा भी था कि दद्दा यह महंगा मोबाइल कालेज फालेज वाले इसकूलिहा लड़के लड़कियों के लिये ही ठीक है। आप सस्ता वाला ले लो। क्या करोगे महंगा लेकर। 

     और दुकानदार ने बात ही बात में एक सादा मोबाइल निकालकर देते हुए कहा - यह ठीक रहेगा दद्दा  आपके लिये, इसमें टार्च भी है। आप को अलग से टार्च रखने की जरूरत नहीं। यही लिया जाय, बुढ़वन इसे ही जियादा पसंद करते हैं। 

    बस....बात लग गई सदरू भगत को। मुझे बुढ़वा कैसे समझ लिया इस घामड़ दुकानदार ने। मैं क्या इतना गया गुजरा हूँ ? 

     बिफरते हुए बोले - अच्छा तो तनिक यह मेरे हाथ का गट्टा हिला दो तो जानूं कितने जवान हो तुम। छुड़ा दो अपनी इस दुकान का यह पटरा। आये हो बड़ा बुढ़वा कहने वाले। 

     दुकानदार सकते में। जाने क्या कह गया । सदरू भगत को कोई बूढ़ा कहे तो अच्छा नहीं लगता उन्हें। खैर, अब तो गलती हो ही गई। किसी तरह दुकानदार ने हाथ जोडा और सदरू भगत को वही नये माडल का चोकिया मोबाइल दिया जिसमें कि फोटू ओटू भी खिच सकते थे, गाना बजाना भी होता था और वो तमाम किसम की सुविधायें थी जो कि अमूमन हर स्मार्ट फोन की होती हैं। 

     सदरू भगत ने वह मोबाइल ले तो लिया लेकिन चलाना नहीं जानते थे। जब कभी फोन आता तो टुकुर टुकूर उसके स्क्रीन को ताकते और मन ही मन घबराते कि अब इसका क्या करूं...कहां ले जाउं....इसे कैसे निपटाउं और जैसे ही कॉल आने की घंटी बंद होती, इनके जी को शांति मिलती कि चलो बंद हुआ। कुछ दिन यही चला और धीरे धीरे पोते ने उन्हें किसी तरह फोन रिसिव करने की ट्रेनिंग देकर कॉल आने पर होने वाली कंपकपी से मुक्ति दिलाई। 

     लेकिन हाय रे किस्मत। कभी कभी किसी चीज का आधा ज्ञान होना भी खतरनाक होता है औऱ वही हुआ। उस दिन घर में रमदेई और पतोहू के बीच जमकर खटपट हुई थी। बर्तन और्तन उठा पठा कर फेंकउल तक की नौबत आ गई थी। रमदेई अपनी बात पर डटी है और पतोहू अपनी बात पर। बोला चाली बंद। इधर सदरू भगत बोलें भी तो किस ओर से। रमदेई की कहें तो बेटा नाराज हो जाय, हो सकता है बाहर भेजे जाने वाले मनीआर्डर में कमी कर दे कि गाली गुर्रा सुनने के लिये नहीं रख छोड़ा हूँ अपनी परम पियारी पतनी को।  इधर ज्यादा इस्स बिस्स बोले नहीं कि क्या पता पतोहू को कल ही शहर बुलवा ले। फिर भोजन पानी और तमाम घरहीया संभालने का बोझ रमदेई पर ही तो टूटेगा। 

     और यदि पतोहू की ओर से बोलें सदरू भगत तो रमदेईया नाराज हो जाय। अभी भी नाराज ही है। पता नहीं किसका मुँह देखकर उठे थे  ?  अपना ही या किसी और का ? उस दिन घर में चल रही  किचाहिन झगड़े के बारे में पड़ोस की अमरतीया काकी से जिकर कर बैठे। बात ही बात में कह दिया कि अरे पतोहू की बात और है, वह तो अभी नई है, थोड़ा बहुत खर काम करे, उलट पलट काम करे तो भी चल जायगा, छिमा किया जा सकता है लेकिन रमदेई ? उसे तो समझना चाहिये था.....वह तो आज की नहीं है। सब दिन घर को वही देखती आई है, सब दिन वही सिंचती पूरती आई है। अगर वह भी पतोहू के तरह उलटा पलटा बोलना शुरू कर दे, तिंग तड़ांग बोले,  बतकटौवल वगैरह में वह भी सामिल हो जाय तो यह ठीक बात नहीं है। 
       
      आगे बोलते बोलते यह भी कह बैठे कि पतोहू का तबर्रा बोलना एक बार सहा जा सकता है लेकिन रमदेई का उसके जवाब में बोलना बहुत अखरता है। इससे घर में और भी जियादे असांती रहने की असंका है और यह स्थिति जियादे खतरनाक है। 

     अब सदरू भगत यह सब बोल गये तो बोल गये लेकिन उन्हें क्या पता था कि नये वाले मोबाईल का कौनो बटन सटन दब गया है। जो कुछ बोले जा रहे थे सब रिकार्ड हो रहा था। और जो एक बार रिकार्ड हो गया तो हो गया। कभी न कभी तो सामने आना ही था। तो आ गया सामने। कल शाम को ही पोता उस मोबाइल को लेकर कुछ न कुछ बटन सटन टीपे जा रहा था, मना करने पर भी नहीं मान रहा था और उसी दौरान कुछ बटन सटन दब गया और वही रिकार्डिंग बजना सुरू।  

     रमदेई बाहर आंगन में झाडू लगा रही थी और पतोहू रसोई में खाना बना रही थी। इधर मोबाइल बोले जा रहा था सदरू वाणी। पतोहू तिंग तड़ांग बोले तो, तबर्रा बोले तो चलता है....रमदेई बोले तो नहीं चलता....

     बस फिर क्या था। पतोहू तो पतोहू, रमदेई तक एकदम जल भुन गईं। यही सब बोलने बतियाने जाते हो अड़ोस पड़ोस में। घर की बात बाहरे करते हो थुकौनूं....बूढ़ हो गये हो लेकिन अकिल नहीं आई। 

     और एक वह दिन है और आज का दिन कि बिचारे सदरू भगत समझ नहीं पा रहे कि कहें तो क्या कहें। ससुर नई तकनीक जो न कराये। जहां तहां की बातें लीक कर देती है। 

      विकीलीकवा से सुना है कि राहुल गाँधी भी कुछ ऐसा ही कह गये हैं। आतंकवादीयों की उठापटक और तबर्रेबाजी तो कुछ हद तक झेल भी लेंय, लेकिन स्थित तब ज्यादा खतरनाक होगी यदि हिंदु संगठन अपनी उग्रता दिखायें। 

       आखिर अब तक हिंदुए लोग ही तो थामे हुए थे सहिष्णुता, सत्यवादिता और करूणाई की गठरी। अब काहें उस गठरी को उतार रहे हैं। 

      उधर पता नहीं रमदेई कब तक सदरू भगत की ये हालत देख पाएगी। आखिर दया, सहनशीलता और तीमारदारी की एक वही तो मिसाल है, सब दिन तो इसी बुढ़ऊ के साथ बिता दिया, अब क्या इस बुढ़ौती में यही दिन दिखाने के लिये रह गया है। 

    ---------------------------------------

     
           यदि पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर 125 साल बूढ़ी पार्टी के वक्तव्यों पर ध्यान दिया जाय तो बात में दम है कि  बहुसंख्यकों का इस तरह आपे से बाहर होना देश को एक खतरनाक स्थिति पर ले जा सकता है। मेरे हिसाब से संभवत: जितना नुकसान ढेर सारे आतंकवादी मिलकर भी नहीं कर सकते हैं, उससे कहीं ज्यादा नुकसान होगा देश को गृहयुद्ध में झोंक देने पर .....जरूरत है इस तरह के किसी भी उकसावे की स्ट्रेटेजी से दूर रहकर ऐसी आतंकवादी ताकतों को जवाब दिया जाय, उनकी हालत पतली की जाय ..... न कि दिग्विजय जैसे बददिमाग नेताओं की बातों में खुद को बहकाये रखा जाय...... जो कि हेमंत करकरे जी की शहादत पर भी अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने से बाज नहीं आ रहे हैं। 
      
      जाने वक्त की नज़ाकत कब समझेंगे ऐसे नेता ? 

       कहीं भी कुछ भी बोल देना नेताई नहीं होती.....एक किस्म की चिलगोजई होती है, और तब तो और....जब देश की सुरक्षा की बात हो। वरना इस खुद को निकलते जा रहे सांप और हम में कोई फ़र्क न रहेगा। बाहर वाले तो निगलने की ताक में हैं ही। 

    - सतीश पंचम  

    Friday, December 17, 2010

    किर्रू लेवल ऑफ सियावर बाबू.......एक रॉडियॉटिक मजमा........सतीश पंचम

        हाल ही में   मनोहर श्याम जोशी जी की व्यंग्य रचना नेताजी कहिन पढ़ रहा था। उसमें एक  जगह आकर ध्यान अटक गया। लिखा था -  बिहार के एक मन्त्री सियावर बाबू के बारे में,  जिनका कि मानना था कि -  हमरा नेचुड़वा  (नेचर) ऐसा है कि जौन भी काम एनट्रस्ट किया जाता है हमें, जे हे ने से, अपना टोटल अटेंसन और फुल डिवोसन देते हैं। 

         पढ़ने पर थोड़ा सा खटका लेकिन सियावर बाबू की इस भाखा पर मुग्ध हुए बिना न रह सका। लेकिन असली मजा आया एक प्रसंग में जहां पर कि कुछ महिलाओं के भी इस विवाह यात्रा में शामिल होने का वर्णन किया गया है । बता दूं कि विवाह जयपुर में होना था और दिल्ली से यह पलटन चली थी।

        सियावर बाबू के काफिले के साथ  जोशी जी अपनी श्रीमती जी और एक नेता भतीजे  (व्यंग्य पात्र) के साथ जयपुर जा रहे थे।   किसी बात को लेकर आपस में बहस चल ही रही थी कि तभी दो आधुनिकाएँ - एक अधेड़, एक युवती - हाई कहती हुई हमारे नेताजी (भतीजे) की ओर बढ़ी।

    नेताजी ने कहा - "हाय ! हाय ! हाउ आर यू मयडम्स" !

    "फाइन, थैक्यू" । अधेड़ महिला बोली। "एण्ड हाउ डू यू डू" ? युवती चहकी।

     "अपना तो वहीयै हय,  नेताजी ने कहा , अयवरी डे, आई डू द सेम वे - न सावन सूखे, न भादों हरे। आलवेज हिप हिप हुर्रे" ।

     नेताजी ने ठहाका बलन्द किया और दोनों देवियों के पृष्ठभाग पर धौल जमाया। 

    युवती ने कहा - "डोण्ट बी फ्रेश"।

    नेताजी बोले - "सबेरे कायदे से अस्नान नहिंन करि पाये जल्दी में। बाकी अपनी फ्रयसनस में कउनो कमी नहीं",

    युवती बोली - "वही हम कह रहे हैं आप बहुत फ्रैश हैं"।

    नेताजी ने कहा, "अच्छा मजाक हय ससुर, अरे हम फ्रयस हैं तो आपको सिकायत क्यों हैं" ?

    अधेड़ बोली - "आप अंग्रेजी नहीं जानते ? डाण्ट बी फ्रेश का मतलब है कि लाइन मत मारो, चालू मत होओ, हिमाकत मत करो"।

    "इतना सारा मतलब दद्दा रे दद्दा । अउर उस दिन आप हमसे पास-फेल जइसा कुछ कही थीं, उसका का मतलब रहा" ? 

    "हमने कहा था - आर यू मेकिंग ए पास - क्या आप हम पर चालू हो रहे हैं" ? 

    नेताजी ने दोनों हाथ जोड़े और कहा , हम समझि गये, देर से पर दुरूस्त नोट किया जाय मयडम्स आपके बारे में हम अस्टेलहि रहिहैं, फेलहि रहिहैं। फिर नेताजी ने दोनों देवियों का परिचय अपने रस्पक्टफुल अंकलजी अडिटर साहब और रस्पेक्टफुल आण्टीजी लक्चरार साहिबा से करवाया । अधेड़ थी पिंकी और युवती थी पप्पी। नाम के अतिरिक्त कोई जानकारी देना भतीजाजी ने जरूरी नहीं समझा। 

    इतने में शकुन्तला जी, जो कोठी के भीतर चली गईं थीं, बाहर हम लोगों की ओर आती दिखाई दीं। पिंकीजी ने अंग्रेजी में कहा कि - "मैं इस औरत की सूरत देखना बरदाश्त नहीं कर पाती और पप्पी डारलिंग को लेकर लान की ओर चली गयी"। 

     शकुन्तलाजी ने हमारे पास पहुँचकर विजयोल्लास से कहा -" भाग गी ने चुड़ेलो दोनो मैंने देखताइ। मैं इनकी सारी इंगलिस गिटपिट की ऐसी-तैसी कर देती"।

    " ऊ आप जरूर कर दें कबहुँ फुरसत से ! अभी ई बताया जाय कि मन्त्रीजी की का खबर हाय"।

    "मन्त्री जी तो आरे थे मेरे साथ, पन वो महेन्द्र जी घासिलेट चिपक गया बीच से। कुछ न्यूज की बातां करनी हे के"। 
    ......
    "मयडम आप जाइए मन्त्रीजी अउर महेन्द्र जी को बाहर लाइये, आपहि का हुकुम टाल नहीं सकते वे"। 

    हमने लायक भतीजा जी से पूछा कि "ये कौन देवियां हैं जो हम लोगों के साथ जयपुर जा रही हैं".

    नेताजी ने कहा - "रम्भा मेनकाण्ड कम्पनी हय समझे कक्का। अप्सराएं है आपकी दया से अस्थानिक इन्दर सभा की"।

    "ये तुम्हारी शकुन्तला देवी अप्सरा हैं" ? काकी ने मुँह बनाया। 

    "अप्सरा हर मेल की रखी जाती हय इन्दर-सभा में अउर सकुन्तला , जे हे ने से मेलहि अप्सरा हय - इंगरेजीवाला मेल" ! नेताजी हुचहुचाये।

    "ये क्या  सचमुच डांस वांस करती हैं । बुकिंग की बात कर रही थीं" ।

    "ई लोग डांस-वास नहीं करती हैं। डांस करवा सकती है बीआयपीज को। इसीलिए सउदा कराने और कमीसन पाने के धन्धे में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती हय"।

       उधर सभी लोगों के जयपुर में विवाह स्थल के पास पहुंचने पर मामला गर्म हो गया।  दरअसल हुआ यह कि विवाह के स्वागत समिति के प्रवक्ता का अभिवादन और गुलदस्ता स्वीकार करने के बाद सियावर बाबू ने गाड़ी आगे बढ़वा दी क्योंकि वह कहाँ ठहरेंगे ये दिल्ली से ही तय हो गया था। गिट-पिट अंग्रेजी बोलने वाली बालाएं उनकी ही गाड़ी में शुरू से बैठी थीं, इसलिए वे भी साथ चली गयीं। रह गईं दूसरी गाड़ी में बैठी हुई गुड्डी और शकुंतला जी। 

     कौन कहाँ ठहराया जायगा इसका ब्यौरा स्वागत समिति के प्रवक्ता ने जब शकुंतला जी को बताया तो वह आपे से बाहर हो गईं। 

    " मेरे को कोन आलतू फालतू समझ राख्या है आपने जो उस होटल में ठहरा रहे हो जिसमें मूरख पत्रकार लोग ठहराये जा रहे हैं। मैं तो साफ नट गेइ थी जब आपने जयपुर चालने की बात कही थी। वो तो मन्त्री जी ने जोर दिया तो चली आई। जिब मैं मन्त्री जी के केने से आई हूँ को मन्त्री जी के साथ ठेरूंगी"। 

    "वहां जगह नहीं है मयडम" ।

    "अरे जाग्या कोई नईं तो वा चूड़ैलां जो साथ में भेज दीं आपने मन्त्री जी के साथ वां बाथरूम में सोवेगी के"

    "मयडम वहाँ दो रूम बुक थे। एक में मन्त्री जी हैं, दूसरे में पिंकी-पप्पी मयडम्स। वो मन्त्री जी के साथ ही आईं थी साथ ही रेस्ट हाउस चली गईं तो हम क्या करें"। 
    
           " मैं आपका साथ आई क्या ? मैं भी मन्त्री जी का खातिर आई। नईं तो मैने चार राज्यां के सी एम और तीन सेन्ट्रल कैबिनेट के मंन्त्रीयों को बुला राख्या था। पिन्की-पप्पी कैसे चली गी मन्त्री जी का साथ में।  रिजर-वेसन थी के।  फेर...इंग्लिस बोलती है इससे बड़ी होगी के ?  आप लोग खुद हिन्दीवाला होके हिन्दीवाला को घासलेट समझे हो के ?  पिन्की-पप्पी ज्यादा बूटीवाली लागे है के आपने" ? 

    "अब क्या बताया जाये मयडम्स, वो दोनों मयडम्स तो चली ही गईं साथ" ।

       "तो ऐ मैडम भी चली। मैने एक गाड़ी दे दो। मैं अबी हाल लौट रही हूँ दिल्ली। कल मेरी बड़कल की बुकिंग है। मेरा तो बहुत मजा रेगा वहाँ।  मेरे को क्या पड़ी जो यहां रऊँ आलतू-फालतू अखबार वालों के साथ में। टाइम खोटी करूँ, धन्धो खोटी करूँ। कल बड़कल में डील करा दूँगी तो कमीसन का बीस तीस मेरा भी हो जायगा। तुम और तुम्हारा मन्त्रीजी अचार बना के खा लो पिंकी-पप्पी का"।   

    --------------
      तो मित्रों, यह थीं शकुन्तला देवी जी.........। मनोहर श्याम  जोशी जी की इस पच्चीस साल से भी ज्यादा पहले की लिखी इस व्यंग्य रचना को पढ़ते हुए बरबस ही हालिया घपलों , घपलेवालीयों, सियारामों और भतीजों  की यादें कुनमुनाने लगती हैं। IPL, टीम मालकिन, क्रिकेट, कैबिनेट, राजा,फाजा सब ससुरे पकड़ में आ जाते हैं स्मृति के डिस्स एंटिनवा पर :)

     आप भी पढ़िये, नेताजी कहिन......अभी तो हम उचार रहे हैं इस शानदार कृति को। जब पूरी तरह उचर जायेगा तब तक हो सकता है एकाध शकुन्तला बाई का आगमन और न हो गया हो......जे हे ने से कि किर्रू लेवल ऑफ इंडियन पॉलिटी :)  


     - सतीश पंचम

    नेताजी कहिन - राजकमल प्रकाशन,

    छपित मूल्य 40/- मात्र..... असल मूल्य... 400 रू.   + +  :)

    Wednesday, December 15, 2010

    थोड़ा सा फैंटेसियाना हो जाये............सतीश पंचम

         Men love to wonder, and that is the seed of science.- Ralph Waldo Emerson

     यह उक्ति शत प्रतिशत सच लगती है जब आप किसी विज्ञान कथा को पढ़ते हैं और उससे उपजे विचारों को आसपास की चीजों से जोड़ने लगते हैं। विज्ञान कथाओं को पढ़ते हुए एक बारगी यह जरूर महसूस होता है कि - ये जो तमाम वैज्ञानिक उपलब्धियां हैं, चमत्कार हैं, उनके सामने आने से पहले जरूर कुछ न कुछ फंतासी बुनी गई होगी, ढेरों कहाँनीया गढ़ी गई होंगी। 
      अब यही देखिये कि फंतासी के रूप में पहले उड़न खटोला, उड़ती हुई जादुई कालीनें / चटाईयां अथवा पुष्पक विमान जैसी बातों को गढ़ा गया और अब देखिये ..........किंगफिशर, एयर इंडिया, इंडिगो, फिंडिगो न जाने कितने उड़नखटोले, जादुई कालीनें हवा में उड़ते दिख रहे हैं। और समानता तो इतनी है कि उड़न खटोले में जो खटमल पाये जाते थे वे जस के तस इन उड़ते विमानों में भी पाये जाते हैं, ऐसा विद्वानों का दावा है। 

      कुछ इसी तरह पहले जादुगरों के पास उपलब्ध जादुई गोलों के बारे में भी कहाँनिया गढ़ी गई हैं। उन जादुई गोलों में देखकर वह किसी भी व्यक्ति की वर्तमान स्थिति को बता सकते थे कि फलां शख्स इस समय क्या कर रहा है या क्या कर रही है। राजकुमारी खिड़की पर खड़े हो अपने बालों में कंघी कर रही है या राजकुमार के सपनों में खोई है। सब कुछ उस जादुई गोले में दिखता था।

        पता नहीं, उस जमाने में वह कौन सा सर्च इंजिन होगा जिसके बल पर जादुई गोले में देखकर किसी व्यक्ति की वास्तविक स्थिति के बारे में पता लग जाता था, कि  हां ये राजकुमार फलां जंगल में इस वक्त इस पेड़ के नीचे बैठा है। उस वक्त तो राजकुमारों के पास फेसबुक और ट्वीटर भी नहीं होते थे जहां पर कि वो अपने स्टेटस को अपडेट कर सकें कि चीड़ के पेड़ के नीचे बैठा हूँ, बरगद के पेड़ के उपर बैठा हूँ, चाय पी रहा हूँ, समोसे खा रहा हूँ । राजकुमारीयों के पास भी कोई बज़ आदि की सुविधा नहीं थी कि अपने मन की बातें बज़ या ट्वीटर पर  लिखते हुए कहें कि आज किसी का ख्याल आ रहा है। फिर वह कौन सा डेटाबेस या सर्वर होगा जहां से डेटा फेच करते हुए जादुई गोला उन लोगों की हरकतों को दिखाता होगा ? 

      लेकिन इतना तो तय है कि उस वक्त का सर्च इंजिन सचमुच काफी जबर्दस्त होगा जिसकी सटीकता का ये हाल था कि जादुई गोले में देखकर ही जादुगर को पता चल जाता था कि राजकुमारी इस वक्त अंगड़ाई ले रही है। संभवत: किसी वेब कैम का भी इस्तेमाल होता हो, जोकि सीधे तस्वीरें जादुई गोले को भेज देता होगा। 

     खैर, यह तो हुई कुछ फैंटेसी वाली बातें। लेकिन अब आता हूँ मूल मुद्दे पर जिसको लिखते हुए मैं शायद फैटेसी के चक्कर में भटक गया लगता हूँ। 
         दरअसल मैं अरविन्द मिश्र जी द्वारा लिखे गये विज्ञान कथाओं पर आधारित पुस्तक 'एक और क्रौंच वध' की समीक्षा करने जा रहा था कि तभी नेट पर देखा कि इस पुस्तक की समीक्षा पहले ही बहुत सुन्दर ढंग से लिखी गई है। गिरिराज किशोर जी द्वारा प्रस्तुत में लिखे उनके विचारों और रामदेव शुक्ल जी द्वारा लिखी गई समीक्षा से उपजे भावों का ही असर था कि मैंने 'एक और क्रौंच वध' की समीक्षा करने का फैसला बदल दिया और पुस्तक के बारे में एक पाठक के तौर पर अपना मत प्रकट करना ही उचित समझा। 

        तो मित्रों, विज्ञान कथाओं से सजी इस बेहद ही सुन्दर रचना को पढ़ते हुए सबसे पहले मन में जो बात आती है, वो यही कि,आखिर क्यों इस तरह से विज्ञान कथाओं को लेकर बहुत कम लिखा गया है ? क्यों इतने ज्यादा पाठक इस तरह की रचनाओं को नहीं मिलते जितने कि प्रेम, समाज याकि अन्य विषयों से जुड़ी कथाओ को मिलते हैं। आखिर वह क्या कारण हैं कि हम लोगों में इस तरह के लीक से हटकर सोची गई अलग किस्म की कहाँनियों को पढ़ने में रूचि घटती जा रही है, जबकि  इस तरह के अलग धारा में बह रही विज्ञानकथाओं को तो लोगों द्वारा हाथोंहाथ उठा लेना चाहिए था।

      खैर, अपनी अपनी रूचि होती है। अपना अपना मन। लेकिन एक बात तय है कि पुस्तक को पढ़ते हुए कहानी दर कहानी विस्मय की पेंग छूती सी जान पड़ती है। यूं लगता है कि अभी सोच का झूला उपर की जाते हुए सीधे नीचे आ जायगा, अचानक ही और तभी पता चलता है कि वह सोच का झूला कहीं उपर की ओर जाकर किसी डाल में फंस गया है, उंचाई पर, पत्तों के बीच। 

          येति वाली कहानी में जिस तरह से अरविन्द जी ने वर्णन किया है कि एक शख्स विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद बर्फीली गुफाओं में रहने वाले येति परिवार के साथ मजबूरन रहने लगता है और धीरे धीरे उन येति परिवारों के बारे में जानकर बाहरी संसार से उसकी तुलना करते हुए भोज पत्र पर लिखता है वह संस्मरण बेहद ही रोचक है।

      इसी तरह के मानव संवेदना और व्यवहार से जुड़ी हुई कई और कहानीयों का सम्मिश्रण है एक और क्रौंच वध। इन्हीं में से एक कहानी में बताया गया है कि मैना प्रजाति के पक्षियों के बारे में नर और मादा को लेकर चल रहे रिसर्च के दौरान एक शोध छात्र द्वारा एक नर मैना को मार दिया जाता है ताकि उसके भीतरी अंगों आदि को लेकर स्लाईड बनाई जा सके और आगे भी शोध किया जा सके कि नर मैना की संख्या कम होने के पीछे क्या कारण है। 

       वहीं,  इस तरह से एक मैना परिवार को नुकसान पहुंचाने पर उस शोध छात्र के जीवन में, उसके आपसी रिश्तों में किस तरह का असर पड़ता है, उसे अरविन्द जी ने बखूबी बयां किया है। एक तरह से भारतीयता का पुट देते हुए, भारतवर्ष के इतिहास, उसकी सामाजिकता का असर दिखाते हुए ही कहानी को शीर्षक के तौर पर 'एक और क्रौंच वध' नाम दिया है जोकि उनके इस विज्ञान कथाओं के खालिस भारतीय परिवेश में लिखे होने के ज्वलंत उदाहरण हैं।  वरना तो अब तक जितने भी विज्ञान कथाओं को मैंने पढ़ा है या फिल्मों आदि मे देखा है, ज्यादातर पर विदेशी छाप ही नज़र आती है। किसी में जॉन है तो किसी में क्रिस्टी है। और हर एक का चेहरा मोहरा अपने आप में बनावटी होने की चुगली करता लगता है। लेकिन 'एक और क्रौंच वध' को पढ़ते हुए भारतीयता के सौंधेपन की झलक मिलती है जो कि  विज्ञान कथाओं में एक बड़ी बात है। 

     - सतीश पंचम

    प्रोफेसर रामदेव शुक्लगोरखपुर विश्वविद्यालय (उ0प्र0) द्वारा की गई 'एक और क्रौंच वध' की पुस्तक समीक्षा का लिंक यह रहा

    ( एक और क्रौंचवध, प्रथम संस्करण, 1998, तृतीय नव-संस्करण, 2008, मूल्य रु0 125/- पृष्ठ 94, प्रकाशक : लोक साधना केन्द्र, वाराणसी) वितरक : विश्व हिन्दी पीठ, 3/16, आवास विकास कालोनी, कबीर नगर, वाराणसी-221005 )

    Sunday, December 12, 2010

    'द मार्स कोड'.....अर्थात.......'फलफूलाईजेशन' ऑफ इंडियन 'दिल्स' :-) .......सतीश पंचम

          कल अख़बार में एक बहुत ही रोचक खबर दिख गई। खबर कुछ इस तरह की थी, कि कुछ अंतरिक्ष विज्ञानियों के अनुसार यदि मंगल ग्रह पर किसी को भेजा जाय तो उसे वापस नहीं बुलाना चाहिये बल्कि उसे वहीं पर सेटल होने देना चाहिये। इसके पीछे उन लोगों का तर्क है कि अरबों खरबों का प्रोजेक्ट खर्च सिर्फ रिटर्न जर्नी के चलते ही कई गुना बढ़ जाता है। इसमें खर्च का ज्यादातर हिस्सा सुरक्षा के नाम पर ही होता है क्योंकि अंतरिक्ष में जिन्हें भेजा जाता है उनकी सुरक्षित वापसी भी जरूरी मानी जाती है।  

           ऐसे में यदि वापसी का विकल्प ही न रखा जाय तो खरबों रूपये लग रहे प्रोजेक्ट में से लगभग अस्सी फीसदी खर्च बचाया जा सकता है। और उस अस्सी फीसदी बच गये खर्च से और भी ज्यादा लोग वहां वन वे जर्नी कर सकते हैं और धरती पर होने वाले अंतरिक्षीय अनुसंधान आदि में सहायता कर सकते हैं। 

           इस सोच के पीछे जो तकनीकी कारण हैं, सो तो हैं ही, साथ ही उन लोगों का यह भी मानना है कि चूंकि धरती और मंगल के वातावरण में बहुत हद तक समानता है, इसलिए वहां पर भेजे गये लोगों को संसाधन उपलब्ध करवाकर मंगल पर खेती के काम में लगाया जाना चाहिये और उनसे आशा की जानी चाहिये कि वह अपना एक नया संसार बसायेंगे। नये जीवन का वहां सूत्रपात करेंगे।  इसके लिये उन्हें उम्मीद है कि ढेर सारे वालंटियर्स भी जरूर मिलेंगे जिन्हें कि दो साल के जरूरी राशन पानी के साथ वहां पर भेजा  जा सकता है।  उम्मीद है कि भेजे जाने के दो साल के भीतर ही वे लोग अपने लिये वहां पर फसलें उगाना शुरू कर देंगे। और  एक नया ही संसार रचेंगे।  

          इसके अलावा उन लोगों का यह भी मानना है कि यदि धरती से भेजे गये लोगों के द्वारा मंगल पर जीवन-यापन शुरू हो जाय तो एक तरह से मंगल को धरतीवासी 'स्प्रिंग बोर्ड' के तौर पर इस्तेमाल कर सकते हैं, अर्थात,  यदि मंगल से आगे की दुनिया में जाना हो तो आसानी से मंगल को एक 'स्प्रिंग बोर्ड' / पड़ाव के रूप में इस्तेमाल करते हुए वहां से राकेट छोड़ते हुए आगे की ओर  अंतरिक्षिय छलांग लगाई जा सकती है  जिससे कि और भी ज्यादा वैज्ञानिक अनुसंधान आदि में सहायता मिलेगी। 

            पहली नजर में यह प्रोजेक्ट सुनने पर चकित करने के साथ साथ कुछ कुछ अजीब सा तो लगता है लेकिन इसमें संभावना जरूर है। इसके अलावा एक खतरा यह भी सुनने में आ रहा है कि पृथ्वी जैसे वातावरण होने के बावजूद वहां पर रेडियेशन की मात्रा कुछ ज्यादा है और हो सकता है इसके चलते कुछ जैविक समस्या खड़ी हो जाय।  इसके विकल्प के रूप में वैज्ञानिकों का मानना है कि वहां पर 50-60 वर्ष के आयु वाले लोगों को भेजा जाय जिनकी कि प्रजनन क्षमता लगभग खत्म हो चुकी होती है ताकि कोई जीन्स वाली या गुणसूत्रीय समस्या न खड़ी होने पाये।

        खैर, यह तो हुईं वैज्ञानिकों की बातें, उनके विचार, उनके तकनीकी आयाम। लेकिन मैं इन ढेर सारे वैज्ञानिक, आर्थिक, जैविक आयामों के बीच एक और किस्म के Socio-Political आयाम देख रहा हूँ। जी हाँ, Socio-Political आयाम।   मुझे लगता है कि  इस प्रोजेक्ट के लिये सबसे उपयुक्त वालंटियर्स भारत ही उपलब्ध करा सकता है।

           विश्वास नहीं होता न ? लेकिन यह सच है।  वालंटियर्स के रूप में भारत बड़े पैमाने पर अपने नेताओं को यहां से भेज सकता है और मेरी मानिए उन लोगों को तैयार करना भी कोई मुश्किल नहीं होगा। वैसे भी 50-60 की उम्र आने के बाद भी वही लोग हैं जो आम बूढ़ों से ज्यादा सक्रिय दिखते हैं। जहां सामान्य बूढ़ों का खाट पर उठना बैठना मुहाल होता है, वहीं पर ये भारत के बूढ़े नेता अपनी पकी उम्र में भी गजब की फुर्ती से हेलीकॉप्टर के पायदानों पर पैर रख, चढ़ और उतर लेते हैं।  चुनाव के वक्त तो इतनी बार हेलीकॉप्टरों में से चढ़ते उतरते हैं कि उनकी कुल यात्रा लेंग्थ जोड़ने पर किसी बाहरी ग्रह की यात्रा भी छोटी लगती है। अत: अपने कुल उड़ान काल और 50-60 की प्रजनन विहिन पकी उम्र के  हिसाब से भारतीय नेता इस तरह के प्रोजेक्ट हेतु सबसे सही उम्मीदवार होंगे। 

           यही सब सोच कर मैने सदन में रखे जाने वाले श्वेत पत्र, याकि 'White paper' आदि की तर्ज पर  'Carrot paper' तैयार किया है। वही carrot याकि गाजर जिसे दिखा- दिखाकर अड़ियल गधे से भी गाड़ी आगे की ओर सरकवाया गया था।

        इस 'Carrot paper'  को संसद के चालू सत्र में सदन के पटल पर रखने का विचार है, लेकिन मुश्किल यह है कि सदन को चलने ही नहीं दिया जा रहा। हर रोज भ्रष्टाचार के नाम पर हंगामा होते जा रहा है, काम कुछ नहीं हो रहा। विपक्ष जुटा है कि भ्रष्टाचारी केन्द्र सरकार को उखाड़ फेंकना है,  केन्द्र सरकार को चलने नहीं देना है, भले ही राज्य सरकारों में उसी विपक्षी पार्टी के मुख्यमंत्री भ्रष्टाचारी दलदल में आकंठ ही क्यों न डूबे हों।

     जब यह 'Carrot paper' सदन के पटल पर रखा जायगा तब की तब देखी जायगी, लेकिन फिलहाल तो आप उसी 'Carrot paper'  पर एक बार नज़र जरूर डाल सकते हैं जिसे कि भ्रष्टाचार के काले कारनामों पर रखे जाने वाले 'श्वेत पत्रों' के साथ नत्थी किया जाना है।   'Carrot paper' की मुख्य बातों के अनुसार - 

    1 -  जो भी नेतागण वहां मंगल पर जायेंगे, वहां की सारी जमीने उनकी ही मानी जाएंगी। वहां पर वह चाहे जितने मंजिला आदर्श बिल्डिंगें बना सकते हैं, अनादर्श बिल्डिंगे बना सकते हैं। कोई NOC की जरूरत नहीं, कोई सरकारी टैक्स नहीं, कोई लाल फीताशाही नहीं। बल्कि जितना भी निर्माण कार्य मंगल पर ऐसे लोग करेंगे उसे नये संसार की स्थापनाक्रम में  समाज सेवा ही माना जायेगा और कोई भी उन नेताओं पर जमीनें कब्जाने जैसा घिनौना आरोप नहीं लगा पायेगा। 


      संभवत: ईश्वर जी ने भी इसी तरह के किसी सरकारी तंत्र के अभाव में ही सर्वप्रथम संसार की रचना की थी। यदि उस युग में भी सरकारी तंत्र होता, निर्माण आदि से पहले NOC आदि के झंझट होते तो बहुत संभव है कि इस सृष्टि का निर्माण ही नहीं हो पाता। वो तो गनीमत थी कि ईश्वर जी ने जहां तहां खाली प्लॉट देखा और बिना NOC लिये ही लग गये संसार के सृजन में। उम्मीद है हमारे नेतागण मंगल पर पहुंच कर ठीक ईश्वर की तरह व्यवहार करेंगे, प्लॉट कब्जाएंगे, नवसृजन करेंगे।  


    2 -  चूँकि वहां जाने वाले नेतागण अपनी उम्र के 50-60 साल वाले पड़ाव में होगें और एक तरह से अपनी प्रजनन क्षमता खो चुके होंगे, ऐसे में यदि वो चाहें तो धरती से अपनी हो चुकी संतानों को भी वहां पर बुला सकते हैं।


        इससे एक हद तक धरती पर से कुछ बोझों के हट जाने जैसा सुख महसूस होगा वहीं मंगल पर पहुंचे नेताओं को अपनी संतानों, भाई-भतीजों के बीच रहने, उनके लिये सोचने करने के लिये भरपूर समय  और संसाधन मिल पायेगा। यहां धरती पर तो एक संपत्ति अर्जित की नहीं कि विपक्ष टेंटुआ दबाने को तैयार बैठा है। लगा देता है भाई भतीजावाद का आरोप। वहां मंगल पर इस तरह के कार्यों पर कोई भाई भतीजावाद का आरोप नहीं लगेगा, बल्कि इस क्रियाकलाप को 'नव-सत्कर्मों' की श्रेणी में रखा जायगा, और बहुत संभव है मंगल के धार्मिक जीवन में इसे समावेशित भी किया जाय। 

     3  -   इसके अलावा जैविक या वातावरण के प्रभाव से यदि 50-60 साल की उम्र में भी पुन: प्रजनन क्षमता जाग्रत हो जाय और मंगल पर ही कोई वैध-अवैध संतान आदि की प्राप्ति हो, तो वहां पर होने वाली संतानों का बर्थ सर्टिफिकेट आदि बनाने को लेकर मंगलवासी स्वतंत्र होंगे। उनके यहां के सरकारी कागजों की हैसियत ठीक वैसी ही होगी जैसी कि भारत में धारा 370 के आलोक में कश्मीरी कागजों की होती है। 


         यह तो सभी जानते हैं कि  कश्मीर के कागज-पत्तर धारा 370 के चलते अपने आप में अलग ही हैसियत रखते हैं। जिस तरह से बाहरी लोग कश्मीर में अपने नाम जमीन नहीं खरीद सकते ठीक उसी तरह की कोई विशेष धारा कुछ समय बाद मंगल पर भी लागू की जायगी। अत: नेतागण वहां ऐसी किसी धारा के लागू होने से पहले निश्चिंत होकर जा सकते हैं, रह सकते हैं, संपत्ति अर्जित कर सकते हैं, खुलकर भाई भतीजावाद कर सकते हैं। 

            इसके अलावा वैध-अवैध चाहे जितनी संतानें भी उत्पन्न करें, इस बारे में कोई उनसे पूछताछ नहीं कर सकेगा न ही कोई डीएनए टेस्ट आदि के लिये अपील ही कर सकेगा। बल्कि इस तरह से संतानोत्पत्ति को मंगल गृह के फलफूलीकरण के लिये जरूरी कदम माना जायगा। और जो कोई इस पुण्य कार्य में शामिल होना चाहेगा उसे  'गृह फलफूलीकरण योजना' के तहत अलग से प्लॉट भी  आबंटित किया जायगा, जिस पर कि कोई किसी किस्म की जांच नहीं बैठाई जा सकेगी। 

    4 - नेताओं के अलावा भी यदि और कोई इंडस्ट्री आदि से जाना चाहे तो उसे भी छूट होगी। बशर्ते वह वापस आने की जिद न करे।


    5- एक संभावना यह भी है कि फिल्म इंडस्ट्री के लोग भी वहां स्पेशल पास देकर भेजे जा सकते हैं। आखिर वहां पर रहने वालों के लिये मनोरंजन आदि की सुविधा भी तो जरूरी है। बहुत संभव है मंगल पर भी एक फिल्म इंडस्ट्री स्थापित हो। ऐसे में उन लोगों को अपने गानों में मुन्नी, शीला, छुटकी, फुटकी  जो चाहे नाम रखने की छूट होगी क्योंकि विरल जनसंख्या के कारण वहां किसी मुन्नी या शीला के होने के आसार फिलहाल तो नहीं के बराबर होंगे। अत: इससे पहले कि कोई मुन्नी शीला वहां पर भी हो, फिल्म इंडस्ट्री के लोग जल्दी से जल्दी इस अवसर का लाभ उठा सकते हैं। 

       इसके अलावा भी ढेर सारे प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष लाभ हैं जिनका कि खुलासा समय आने पर किया जायगा। 
       इस योजना के लाभ उठाने के लिये लालायित नेताओं को आगाह किया जाता है कि,  इससे पहले कि उनके पार्टी अध्यक्षों के मन में भी इस स्वर्णिम योजना से लाभ उठाने की भावना आए अपने अपने पार्टी आफिस में अपना त्यागपत्र आदि देने की प्रक्रिया शुरू कर दें। तमाम नाते रिश्तेदारों के लिये सीटें बुक करवा लें। 

      लोकसभा या राज्यसभा में जाने का टिकट मिले न मिले, इस मंगलमय यात्रा का टिकट जरूर मिलेगा :-)

    - सतीश पंचम    



    (चित्र : Google दद्दा से साभार )
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    Tuesday, December 7, 2010

    ब्लॉगजगत के पलटदास..... उर्फ...... नैतिकता ठेलक ब्लॉगरों की कारगुजारियां..........सतीश पंचम

           आज कल ब्लॉगजगत में एक किस्म की सुगबुगाहट देख रहा हूँ। आप ने भी महसूस किया होगा। लोग आते हैं, नैतिकता पालन करने का प्रवचन देते हैं, आपस में प्यार मोहब्बत से रहने का उपदेश देते हैं और थोड़ा बहुत इधर उधर टाईम पास कर चले जाते हैं।  और जाते भी कहां हैं, घूम फिर कर फिर वहीं किसी महिला के ब्लॉग पर या किसी हॉट टॉपिक पर टीपते नज़र आते हैं।  

          नैतिकता परिपालन कमेटी के संभवत: ये लोग सवैतनिक सदस्य हैं।  जब देखो तब कोई न कोई आकर ब्लॉगजगत में नैतिकता का पाठ पढ़ाने लगता है। यह नैतिक है, वह अनैतिक है। महिलाओं पर ऐसा मत लिखो, पुरूषों पर वैसा मत लिखो,  फलां लिखो,  टलां लिखो। इतनी ज्यादा प्रेंम-सद्भाव,  नैतिकता, समानता, विश्व बंधुत्व, भाईचारा ठेलने लगते हैं, कि लगता है जैसे किसी देवता के अवतारी पुरूष हैं। और नारीवादीता तो जैसे इनके हाथों में विष्णु भगवान की तरह सजने वाला फूल ही समझिये। जहां कहीं इन्हें लगता है कि कोई सुन नहीं रहा, तुरंत नैतिकता का शंख फूंकना शुरू कर देंगे।  इधर उन्होंने शंख फूंका नहीं कि उसकी आवाज सुनकर तमाम उपलब्ध गण शंख ध्वनि के बाद एक साथ जय बोल देंगे।  जय सुनते ही ऐसा प्रतीत होता है मानों सत्यनारायण कथा का एक अध्याय खत्म हुआ, अब चरणामृत की बेला नजदीक है।

           खैर, इस तरह के तमाम समझाइशों वाले कमेन्ट, सत्यनारायणी वचनावली आदि पढकर ब्लॉग जनता पहले ही काफी हद तक पक चुकी है, ऐसे लोगों के बारे में जानने समझने लगी है लेकिन शायद कहने में हिचकती है। वैसे भी धर्म आदि का मामला जरा नाजुक होता है, तिस पर सत्यनारायणी कथा......कौन सवाल जवाब करे। चलने दो जो चलता है।  कहा भी गया है यत्र नार्येस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:।  इसलिये शायद ऐसे देवता लोग अपने कर्तव्यों का पालन करते ही रहते हैं.....साथ ही साथ महिलाओं की कद्र करो वाला उपदेश  बांटते भी जाते हैं, मानों ये नहीं कहेंगे तो लोग महिलाओं की कद्र करना छोड़ देंगे। वही हैं जो अब तक सब संभाले हुए हैं वरना अब तक तो दुनिया उलट पलट जाती। बाकी  साधारण पुरूष क्या जानें महिलाओं का मान सम्मान। 

         खैर, अपनी अपनी सोच, अपना अपना छद्मालय। लेकिन  इस तरह के लोगों की तमाम छद्म प्रपंचों, छद्म नारीवादिता आदि को देखते हुए तीसरी कसम फिल्म का एक कैरेक्टर पलटदास याद आता है।  पलटदास काफी सीधा और धार्मिक स्वभाव वाला शख्स है। एक बार जब हीरामन (राजकपूर) अपनी बैलगाड़ी में नौटंकी में नाचने वाली हीराबाई (वहीदा रहमान ) को लेकर जा रहा होता है तो  रात ज्यादा हो जाने से हीराबाई उस बैलगाड़ी में ही सो जाती है,नींद में अस्त व्यस्त हीराबाई के पैर बैलगाड़ी के टप्पर से  पैर बाहर की ओर निकल आते हैं। 

        उधर हीरामन अपने बैलों को चारा आदि डालकर अपने साथी गाड़ीवानों के बीच जाकर बीड़ी वगैरह पीता है, चलत मुसाफिर जैसे गीत में साथ देता है ।  

           इधर बात ही बात में हीरामन के मित्र लालमोहर, पलटदास, धन्नु वगैरह फिक्र जताते हैं कि बैलगाड़ी में हीराबाई अकेली सोई है। जनाना जात है। इस तरह अकेले नहीं छोड़ना चाहिए। हीरामन को बात ठीक लगी। मौका पाकर लालमोहर ने कहा कि मैं जाता हूँ रखवाली करने हीराबाई की। लेकिन हीरामन लालमोहर के मिजाज को समझता था। इसलिए उसने मना कर दिया लालमोहर को। उधर धन्नुक भी कुछ लटपटीया किस्म का जान पड़ा। बच गया पलटदास। उसकी सीधाई और धार्मिक विचार वाले व्यक्ति की छवि काम आई और हीरामन ने पलटदास को भेज दिया बैलगाड़ी के पास कि जा रखवाली कर।

        जाते साथ पलटदास वहां बैलगाड़ी के पास गोबर में पैर धंसा बैठता है। किसी तरह कांछ कूछ कर रगड़ धगड़ कर गोबर छुड़ाता है और वहीं हाथ जोड़ कर बैलगाड़ी के पास अपनी रामनामी चालू रखता है जय सिया राम, राम राम.....लेकिन जैसे ही नजर हीराबाई के गोरे चिट्टे पैरों पर जाती है उसे एकाएक कंपकपी छूट जाती है । उसका मन करता है कि इन पैरों को वह छू कर देखे..... और इसी क्रम में वह राम ......सिया सुकुमारी आदि जपते हुए हीराबाई के पैरों को छू देता है। इधर हीराबाई की नींद खुल जाती है तो देखती क्या है कि पलटदास कंपकपाते हुए उसके पैरों को छू रहा है, संभाल नहीं पा रहा खुद को। हीराबाई ने गुस्से में उसे डांट कर भगा दिया।  बेचारा धार्मिक बातें करने वाला, नैतिकता का परम पालक पलटदास अपने आप को संभाल न पाया। 
    पलटदास

        यही नहीं, अगले दिन जब नौटंकी देखने चारों दोस्त वहां पहुंचे तो सब लोग तो नौटंकी देख रहे थे लेकिन पलटदास अपनी धार्मिकता के चलते स्टेज पर लगे परदों में राम और सीता का वनगमन देख हाथ जोड़े भाव विभोर होता रहा। कि तभी स्टेज पर हीराबाई आती है नाचते हुए, गाते हुए कि पान खाये सईंया हमार। हीराबाई का आना था कि पलटदास सारी धार्मिकता और प्रवचनई भूल गये और लगे टुकुर टुकुर ताकने हीराबाई को। और न सिर्फ ताकते रहे बल्कि दोनों हाथ जोड़कर भक्तिभाव से नमन भी करने लगे हीराबाई को। 

         तो मित्रो, ये तो पलटदास का हाल था। उन्हीं पलटदास की तरह ही ढेर सारे पलटदास ब्लॉगधरा पर धार्मिकता और प्रेम आदि की बातें करते मिल जाते हैं। लेकिन जैसे ही मौका मिलता है महिला ब्लॉगरों की तस्वीरों को परख निरख वहां पहुंच ही जाते हैं हाथ जोडे हुए ....।  सड़ी से सड़ी कविता पर भी वाह वाही और तमाम लल्लो चप्पो के दौर के बाद नैतिक प्रचनावली भी ठेलते चले जाते हैं। दर्शाते ऐसा हैं मानों सबसे बड़े नैतिकता वाले होल सेल डीलर इसी गली है। 
    तीसरी कसम के सेट पर राजकपूर और शैलेन्द्र

        खैर, जब बात चली है तो इसी पलटदास वाले सीन के बारे में कुछ बताता चलूं  कि अपने संस्मरण में फणीश्वरनाथ रेणु जी ने लिखा है कि वह जब पूर्णिया से बंबई आए अपनी कहानी पर बन रही फिल्म  तीसरी कसम के लिए तो यहां फिल्म स्टूडियो में वही सीन चल रहा था जिसमें कि हीराबाई बैलगाड़ी में सोई हैं और नीचे जमीन पर बैठकर पलटदास हीराबाई के पैर छूने की कोशिश कर रहा होता है। 

        यहां शूटिंग के दौरान एक तकनीकी समस्या यह आई कि हीराबाई तो बैलगाडी के अंदर सो रही होती हैं लेकिन पलटदास जमीन पर ही बैठा होता हैं। इससे कैमरे के फ्रेम में दोनों नहीं आ पा रहे थे। तब डायरेक्टर ने चिल्ला कर कहा कि पलटदास के पीछे छह इंची दो। सुनकर रेणु जी थोड़ा हैरान हुए कि ये छेह इंच पलटदास के पीछे देने की क्या बात हो रही है। तब तक पता चला कि पलटदास को बैठने के लिये एक छह इंच की उंचाई वाला लकड़ी का प्लेटफार्म दिया जा रहा है जिससे कि पलटदास कैमरे में फिट हो, नजर आएं। 

         मै जब ब्लॉगजगत में नजर दौड़ाता हूँ तो यहां इसी तरह के बौने पलटदासों को विचरण करते देखता हूँ। हर एक को फिक्र होती है कि कितना ज्यादा उंचा प्लेटफार्म लेकर बतियाये, नारीवादी बने कि ब्लॉगजगत के नैतिकतावादी कैमरे में खुद को फिट कर सके।  वो भूल जाते हैं कि ब्लॉगजगत के कैमरे का विव्यू फाईंडर सिर्फ सामने वाले दृश्य को ही नहीं बल्कि आसपास के फैलाये उसके रायते को भी देखता है कि कहां किसने कब क्या स्टैंड लिया था, कहां किसने क्या टीपा था। महज छद्म नारीवादी बन कर रह गये ऐसे पलटदासों को देख कभी कभी लगता है कि यदि फिर से तीसरी कसम बने तो हीरो के रूप में हीरामन नहीं बल्कि पलटदास को ही लिया जायगा क्योंकि एक वही है जिसे कि चलत मुसाफिर गाने के दौरान हारमोनियम बजाते हुए हीरामन ने कहा था - जियो पलटदास  जियो , आखिर ब्लॉगजगत में भी तो शांति, सद्भाव, पीस - हारमनी वाला हारमोनियाबाज  चाहिये कि नहीं :)

     - सतीश पंचम

    स्थान - वही जहां पर जल संयंत्रो के जरिये इलाके में पानी ठेलने वाले पंम्पिंग स्टेशनों को उदंचन केन्द्र कहा जाता है।


    समय - वही, जब पलटदास हीराबाई के पास जाकर कहता है, देवीजी, हमारे यहां सिलाई, बुनाई, कढ़ाई केन्द्र की तर्ज पर 'नैतिकता ठिलाई केन्द्र' खुल रहा है। क्या आप हमारे   'नैतिकता ठिलाई केन्द्र'  के संचालन का कार्यभार संभालना पसंद करेंगी....रहना खाना आदि के साथ साथ टिप्पणीयां फ्री में मिलेंगी.......अगर आप राजी हों तो मैं उपर वालों से बात करूं । 


     और तभी उपरी मंजिल  से आवाज आये........अबे ओ पलटादास के बच्चे ...... कहां मर गया.....आज टन्की में पानी नहीं चालू किया अभी तक...क्या रात को पी हुई अब तक उतरी नहीं..............चल जल्दी मोटर चालू कर.......  
      
     और पलटदास दौड़ पड़ा .....यह कहते हुए ....... आया मेमसाब :-)
    (चित्र : गूगल दद्दा से साभार)

    Sunday, December 5, 2010

    आम का पेड़..... बदला सा क्षितिज.....और हवा की काट........सतीश पंचम

            इस बार जब गाँव गया था तब अचानक ही घर के उत्तर दिशा की स्काय लाईन बदली बदली सी लगी । क्षितिज कुछ अलग सा लग रहा था। छत पर जाकर हाथेलियों की ओट से नज़र दौड़ाई तो पता चला कि बड़का आम का पेड़ कट कर जमीन पर गिरा है। उसे काट दिया गया है।
      
         मन में एक टीस सी उठी। यह वही पेड़ था जिस पर मैंने बचपन में जमकर चेका (पत्थर) चलाया था, जमकर अरहर और बेहया के बने सोटों को आजमाया था। ज्यों ही अरहर की लकड़ी या बेहया के तने वाले सोटों को आम के गुच्छों पर घुमाकर चलाता, हवा के काटे जाने की एक 'वफ्फ' वाली ध्वनि होती और सोंटा सीधे आम के झोंपे पर जा लगता। 

     नतीजा.....

       ढेर सारे आमों का जमीन पर भद् भद् की ध्वनि के साथ गिर पड़ना। 

        लेकिन यह जरूरी नहीं कि हर बार निशाना लगे ही। कभी कभी फेंकी गई लकड़ी जाकर टहनीयों में फंस भी जाती। ऐसे में एक दो क्षण इंतजार करता कि तनिक हवा चले और उसके चलने से टहनीयों में फंसी लकड़ी नीचे आ जाय। लेकिन फिर भी जब लकड़ी नीचे न आती तो अपने मुँह से ही खुट्ट की आवाज निकालता,.... मानों मैं खुट्ट कहूंगा और आम का पेड़ मेरे फेंके गये डंडे को गिरा ही देगा। लेकिन फिर भी लकड़ी को न गिरते देख फिर वहां आसपास पड़े छोटे छोटे पत्थर, ढेले या खपड़ैलों के केसरीया टुकड़ों को उस फंसी हुई लकड़ी की ओर उछालता। किंतु,  नतीजा सिफर। 

      थक हार कर जब मैं आम के इस पेड़ को पीठ दिखा अपने घर की ओर वापस जाने को होता कि  अचानक ही पत्तों के बीच से सरसराने की आवाज आती और मुड़ कर देखते साथ ही टहनीयों में फंसी लकड़ी जमीन पर आ गिरती.....भद् ।  ऐसा लगता जैसे कि आम का पेड़ मुझे परेशान करने की नीयत से ही मेरी फेंकी गई लकड़ी को अपने कब्जे में लिये हुए था। हवा भी शायद आम के पेड़ की इस शरारत में शामिल रहती ।    

    गन्ने के खेतों की ओट... समृतियों में शेष वह 'आम का पेड़'     
           पूछताछ करने पर घर के लोगों से पता चला कि उस पेड़ के कई मालिक थे। जिस किसी ने वह पेड़ लगाया था वह रहा नहीं, लेकिन उसके परिवार की संख्या पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ती चली गई। घरेलू झगड़ों और तमाम बांट बखरा के बाद अब वो लोग इस आम के पेड़ को कटवा रहे हैं कि जो कुछ मिले बांट लो, जमीन जोत लो। 

     खिन्न मना मैं मन ही मन प्रश्न कर बैठा - आम का पेड़ कटवाना जरूरी था क्या ? 

     अगली सुबह जब कैमरा लिये आसपास फोटो शूट कर रहा था तब गन्ने के खेतों की ओट से वह कटा हुआ आम का पेड़ और कुछ लोग दिखे। एक शख्स पेड़ के तने के उपर खड़ा था। उस ओर जाने का मन नहीं हो रहा था। मन में तनिक भकसावन सा प्रतीत हुआ। तभी कुछ बच्चे खेतों से गन्ने तोड़ते दिखे और मैं उनकी तस्वीरें लेने लगा। 

    खेतों से गन्ना तोड़ते बच्चे
     बात ही बात में बच्चे उस कटे पेड़ की ओर चल पड़े और मैं अनमने ढंग से उस ओर बढ़ चला। पास जाकर देखने पर अजीब सा दृश्य दिखा। ऐसा लगा जैसे कोई हाथी के अंगों को यत्र तत्र छिनगाये हुए है। आम की पत्तीयां सूख कर आसपास गंजी हुई हैं।  उन आम्र पल्लवों के सूखेपन से अंदाजा लगाया कि कई दिनों से यह आम का पेड़ काटा जा रहा होगा। एक शख्स से पूछा तो उसने हाथ के इशारे से बताया कि आज पंद्रह दिन हो गया है काटते छिनगाते। अब जाकर कुछ सपरा है। वरना अभी तक तो सिर्फ गिराकर टहनीयां ही छिनगा रहे थे। 
    आम के पेड़ का शेष बचा हुआ तन

     मन ही मन अंदाजा लगाया कि कितना तो विशाल हो गया होगा यह मेरा बाल्य काल का स्मृति वृक्ष ..... कि उसे काटने में ही पंद्रह दिन लग गये। सूखी पत्तीयां, सूखी टहनीयां, और आसपास का भकसावन माहौल मुझे वहां और रूकने नहीं दे रहा था। 

        तभी मैंने प्रश्न किया एक शख्स से कि यार इसको कटने में पंद्रह दिन लग गये.....तब तो बहुत मजबूत होगा ये तो।  अभी तो कटने लायक नहीं था यह पेड। 

         तब उस शख्स ने तुरंत तने के भीतर की ओर इशारा करते बताया कि अंदर देवका (दीमक) लग गया था। खोखला हो गया था। पिछले कुछ समय से बेहद कम फल दे रहा था तो मालिक लोग ने कटवाना ही उचित समझा।
    ट्रॉली लगाकर लकड़ीयां बटोरी गईं थीं

           बात आगे चली तो वहीं पर मौजूद एक शख्स ने बताया कि देवका (दीमक) लगना स्वाभाविक है।   जमीन के भीतर अब उतनी नमी और पानी नहीं रह गया है जितना कि पहले था। आसपास देखिये, नजर दौड़ाइये तो तमाम पंम्पिंग सेट लग गये हैं पिछले तीस-पैंतीस सालों में। जमीन का पानी खींच खांचकर खत्म कर दिया गया है। ऐसे में पेड़ों में देवका लगना लाजिमी है।  नये पेड़ जो लगे हैं वो भी पहले की तरह मोटाते नहीं हैं। उनकी बढ़त सिर्फ नीचे जड़ की तरफ होती है जो कि पानी की तलाश में भीतर और भीतर फैलते चले जाते हैं। 
    धराशायी हाथी जैसे अंग प्रत्यंग 

     मैने उस शख्स की तरफ ध्यान से देखा। वह लकड़ी का व्यापारी काफी अनुभवी जान पड़ा।  पास ही जमीन पर बने एक विशेष आकार के गड्ढों को देखा तो उस लकड़ी के व्यापारी ने बताया कि यहां ट्राली लगने के लिये गढ़ा किया गया है ताकि लकड़ीयां लादने में आसानी हो। आखिर एक ही ट्रॉली तो नहीं ले जाना था.....कई चक्कर लगे इस पेड़ को हटवाने में।

       कुछ पल और वहां रूक कर, इधर उधर  देखते ताकते मैं घर की ओर वापस चल पड़ा। 

     पर अफसोस......

     अबकी  पत्तीयों की सरसराहट के साथ किसी टहनी में फंसी लकड़ी के जमीन पर गिरने की आवाज नहीं आई।


      शायद पेड़ के साथ ही वहां बहने वाली हवा भी कट चुकी थी......। 

     - सतीश पंचम

    स्थान -  मुंबई

    समय -  आठ.... तिरपन   

    ( ग्राम्य सीरीज़ चालू आहे )

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