सफेद घर में आपका स्वागत है।

Tuesday, November 30, 2010

सरपतों के बीच दस मिनट........सतीश पंचम

     न जाने क्यों हमारे देसी फिल्मकार विदेशी लोकेशन की ललक में बेहिसाब पैसे खर्च करते हुए मारे मारे फिरते हैं, विदेशी लोकेशनों को फिल्माने हेतु लालायित से रहते हैं। हजार तरह की तकलीफें, हिरो - हिरोइनों के नखरे उठाते हुए  कभी हांगकांग तो कभी होनोलुलु जाते रहते हैं। लेकिन कभी अपने आसपास भी देखें तो हमारे देश में ही न जाने कितनी ऐसी जगहें मिल जाएंगी  जो कि विदेशी लोकेशनों के टक्कर की हैं।

       अभी जब गाँव गया था तो  घर से करीब सौ डेढ़ सौ मीटर की दूरी पर स्थित एक सूनसान इलाके  की ओर कैमरा उठाये चल पड़ा। ठंडे ठंडे माहौल में, खूबसूरत इस इलाके में जहां तक देखो सरपत ही सरपत थे। सरपतों में लगी बालियां सूर्य की बनती बिगड़ती रोशनी में अपना रंग अदल बदल रही थीं। कभी एकदम सुनहरी हो जातीं तो कभी चाँदी के रंग की तो कभी एकदम से तांबे सरीखी। मैं कुछ समय तो उस माहौल को देखता ही रह गया फिर तुरत फुरत कैमरे से तस्वीरें खींच डाली। यहां लगी सभी तस्वीरें मात्र दस मिनट के भीतर ही भीतर खिंची गई हैं।  सरपतों के बदलते रंगों से शायद आप अंदाजा लगा सकें कि वहां माहौल कितना रूमानी था ।

 रंगरेज बहूत मूड़ में था शायद........



 आते हुए बादल .......।

चांदी वाली बालियां...........

ये नज़ारे.....ईश्वरीय हैं प्यारे..........

लहकती चाँदी.....बहकती हवाएं......

आसमान छूने की जिद्द...............


उचकती  हरियाली
   इन सरपतों के बीच रहते करीब दस मिनट हुए होंगे कि तभी मुझे बुलावा आ गया घर से कि कोई मेहमान आए हैं.............मैं ठहरा ऐसा हतभागी कि, ढंग से प्रकृति का रसपान भी नहीं कर पाया  :(

 - सतीश पंचम

स्थान - वही, जहां पर 'सरपत' फिल्म बनाने वाली शख्सियत रहती है :)

समय - वही, जब मैं कैमरा ऑन किये हुए, आस्तीनों को खोलते हुए, सरपतों की तेज धार से बचते बचाते गुजर रहा था कि तभी झाड़ियों की ओट से एक खरगोश निकला और तेजी से दूसरे सरपत की ओट में जाकर ओझल हो गया..........आस्तीनें अब भी अधखुली थीं।

( ग्राम्य सीरीज़ चालू आहे ) 





Sunday, November 28, 2010

लाईव यात्रा पोस्ट ...... इति 'इंडियन रेल्वे शौचालय गाथा' ........सतीश पंचम

     लौटानी यात्रा के दौरान सेकंड क्लास के स्लीपर डब्बे में सबसे उपरी सीट पर बैठे बैठे यह पोस्ट जब लिख रहा हूँ तो सबसे पहले मेरे जेहन में जो चीज आ रही है है यहां स्लीपर कोच का शौचालय। अंदर जाते ही एक से एक चित्रकारी देखने को मिली है। कुछ तो एम एफ हुसैन से भी आगे के हैं। लगता है जैसे कि जुलोजी, बॉटनी के साथ ही साथ समाजशास्त्र भी उकेरा गया है। ज्यादातर साईंस के डायसेक्शनल अंदाज में।


   चित्र बना कर उसके विभिन्न भागों को एक तीर वाली लाईन के जरिये नामांकित भी किया गया है। फलां अंग....टलां अंग। मानो यदि नामांकित न किया जाता तो जनता को पता ही नहीं चलता कि शरीर के किस अंग को क्या कहा जाता है।

    अपनी बोगी के शौचालय के खाली न होने पर जब दूसरी बोगी के शौचालय में पहुंचा तो वहां खजुराहो गुलज़ार था। मानव रेखाचित्रों के जरिये एक विभिन्न कामसूत्रीय अंदाज में चित्र उकेरा गया था। उस पर भी किसी बंदे ने नामांकन कर रखा था।

   इन सब चीजों को देखकर मन में सवाल उठता है कि वह कौन लोग होते हैं जो इस तरह की भयंकर कलाकारी करते हैं। बिना टिकट वाले, टिकट वाले याकि कोई और। वैसे एक जगह मैने पढ़ा है कि मुगल बादशाह जहाँगीर ने कहा था कि वह एक ही चित्र में ढेर सारे चित्रकारों के द्वारा चलाई गई कूंचियो की रेखाओं याकि उनके बनाये चित्रों की भाव भंगिमा देखकर बता सकता था कि फलां अंग किस चित्रकार ने बनाया है और फलां अंग किस चित्रकार ने। मन में अब यही आ रहा है कि मुगल बादशाह जहाँगीर को भारतीय रेल्वे का सफर कराऊं और पूछूँ कि बताओ यह इतनी सारी कलाकृतियां जो भारतीय रेल्वे के शौचालयों में बिखरी पड़ी हैं वह किसकी है। कौन है वह चित्रकार जो अपना समय इस तरह के नग्न और चुलबुले टाइप के चित्रों को बनाने के बावजूद अपने आप को गुमनाम रखना चाहता है।

     वैसे मन में तो यह भी आ रहा है कि भारतीय रेल्वे को इन कलाकृतियों को शौचालय की दीवारों सहित उखाड़ कर एक जगह प्रदर्शित करना चाहिए। इससे न सिर्फ रेल्वे को मुनाफा होगा बल्कि देश विदेश के लोग जानने लगेंगे कि भारत को अभी तक मुगलों, हुणों, यवनों आदि ने पूरी तरह लूट कर खाली नहीं किया है बल्कि अब भी समूचे भारतवर्ष में यत्र तत्र एक से एक उम्दा कलाकार फैले हुए हैं जो अपनी मूक कला साधना में लीन हैं। उन्हें न किसी पुरस्कार की चाह है न किसी महल अटारीयों की ललक। वह केवल अपनी शौचालय, मुत्रालय टाइप की कलाकारी में जी जान से जुटे रहते हैं इतने कि वे भूल जात हैं कि वह शौचालय या मुत्रालय किस लिये आये थे। भला इस तरह से भूख प्यास और तमाम शारिरिक जरूरतों को भूलकर कलाकारी करने वाला शख़्स कैसे साधारण हो सकता है।

   मन में आ रहा है कि इन गुमनाम कलाकारों की कलाकारी को उनकी गुमनामियत वाले अंदाज में ही सम्मानित किया जाय। पुरस्कार के तौर पर उन्हीं के बनाये चित्रों के बगल में रेल्वे के सूचना पट्ट की तर्ज पर प्रशस्ति पत्र वाला पत्रा ठोंक ठाक कर जताया जाय कि भारत की जनता इन गुमनाम कलाकारों की कलाकारी का कितना सम्मान करती है :)

सतीश पंचम

स्थान –  ट्रेन की सबसे उपरी बर्थ।

समय – वही, जब एम एफ हुसैन भारतीय रेल के स्लीपर कोच के शौचालय में पहुँचें और वहां की कलाकारींया देख स्वत: ही बोल पड़ें - पच्चास लाख एक......पच्चास लाख दो......पच्चास लाख तीन...... एण्ड …... सोल्ड।  

( Train नासिक पहुंच चुकी है संभवत: दुपहरीया मुंबई दर्शन हो ही जाय :)

Friday, November 26, 2010

ब्लॉगिंग में एक कन्फेशनल टच भी है प्यारे............सतीश पंचम

     अमूमन कुछ बातें, केवल कहने और सुनने में अच्छी लगती है लेकिन जब उनके अमल में लाने की बात आती है तो हम बगले झांकने लगते हैं, अवायडात्मक होने लगते हैं। कुछ इसी तरह के अनुभवों से मुझे दो चार होना पड़ा जब गाँव में एक विवाह कार्यक्रम के चलते ढेर सारी थर्माकोल की बनीं प्लेटें और प्लास्टिक के बने गिलास यहां वहां खेतों में बिखरे मिले।

      वैसे भी आजकल किसी भी पब्लिक फंक्शन में जहां बड़े पैमाने पर भोजन आदि का कार्यक्रम होता है, तो इन थर्माकोल की बनीं प्लेटों और प्लास्टिक के गिलासों का ही ज्यादा चलन है, वर्ना तो अब तक मिट्टी के बने कुल्हड़ और पेड़ के पत्तों से बने पत्तल ही मुख्यतया प्रयोग में लाये जाते थे। मुझे भी थर्माकोल की बजाय मिट्टी के कुल्हड़ों और पत्तलों पर भोजन करना अच्छा लगता है, एक तरह का सोंधापन महसूस होता है, लेकिन एक तो जमाने के चलन ने और दूजे पेड़ के पत्तों की अनुपल्बधता ने दोना-पत्तल जैसे कुटीर-उद्योग पर नकारात्मक असर डाला है। अब बाजार में जो दोने पत्तल वगैरह मिलते हैं वो सुखाये हुए और मशीनी प्रेशर से बने खांचे आदि के जरिये ही मिलते हैं जिनमें वो खास सोंधापन जो हरे पत्तों पर भोजन करने से मिलता है, वह नहीं मिल पाता।

     जहां तक कि बात उपयोगिता, व्यवहारिकता आदि की है तो विभिन्न आकार प्रकार के थर्माकोल के बनी प्लेंटें, रखने, उपयोग करने, बरतने में आसान हैं तो दूजी ओर उनकी शेल्फ लाइफ भी दोना पत्तलों के मुकाबले ज्यादा है। रखे रहो थर्माकोल वाले उत्पादों को सालों-साल, खराब होने का सवाल ही नहीं। न सड़ने का डर न फफूंद, कीड़े आदि लगने का डर। यदि इस एक कार्यक्रम होने के बाद बच गये तो दूसरे किसी कार्यक्रम में उपयोग में आ जायेंगे। लेकिन इनकी यही खूबी उनका सबसे बड़ा नेगेटिव प्वॉइंट है, सबसे बड़ी कमी है। मसलन, ये थर्माकोल की प्लेटें और प्लास्टिक के गिलास अपने न सड़ने की खूबियों के चलते जहां एक ओर खेतों में, उपजाउ जमीन मे पड़ जाने पर उनकी उत्पादकता पर असर डालते हैं तो दूजी ओर पशु आदि के आहार में यदि गलती से चले जांय तो उनके स्वास्थ्य पर असर डालते हैं। प्लास्टिक की पन्नियों की बात तो जगजाहिर है। कम्बख्त, सड़ने का नाम ही नहीं लेते।

       ऐसे में सरकार भी कई बार रेडियो टीवी आदि के जरिये प्रचार करती है कि प्लास्टिक का कम उपयोग करो, कचरा सुरक्षित ढंग से डिस्पोस करो, ये करो वो करो। अभी रेडियो पर सुन रहा था कि दो जानकार लोग बतिया रहे थे पर्यावरण को लेकर। अच्छी अच्छी बातें कह रहे थे। उनका कहना था कि गाँवों में या शहरों में जो कउड़ा बारते हैं, आग जलाते हैं ठंड से बचने के लिये, तो उसमें कभी भी प्लास्टिक से बनी चीजें आदि मत डालें उससे हमारे पर्यावरण को तो नुकसान होता ही है, हमारा स्वास्थ्य भी प्रभावित होता है। बात तो ठीक कह रहे थे बंधु। लोग अक्सर गाँव में अलाव आदि जलाकर जो सेंकते हैं, घेरा बनाकर जो बैठते हैं तो उसमें अक्सर लकड़ी, पुआल के साथ साथ आस पास पड़ी प्लास्टिक की चीजें भी डालते जाते हैं जो कि उचित नहीं है। आगे दोनों जानकार बंधुजनों ने कहा कि ऐसे प्लास्टिक के कचरों को जलाने से हवा प्रदूषित होती है, अच्छा है कि ऐसे प्लास्टिक के कचरे को जमीन में गाड़ दो, न कि जलाओ। सुनकर मैं सोच में पड़ गया कि यार इतने सारे प्लास्टिक जो रोज ही यहां वहां दिखते हैं, जमा होते जाते हैं उन्हें जमीन में दबाने के लिये इतनी सारी जमीनें कहां से आएंगी। वैसे भी वह प्लास्टिक सड़ेगा तो नहीं केवल जमीन में दबा ही रहेगा फॉर द टाइम बिंग.. यहां तो इंसानों के लिये घर तक बनाने के लिये जमीने नहीं मिल पा रहीं, तो कचरे को दबाने के लिये कहां से जमीन का जुगाड़ किया जाय ? कमलेश्वर के लिखे 'कितने पाकिस्तान' की तर्ज पर यदि कहूं तो हम 'कितने प्लास्टिकतान' बना सकने में सक्षम हैं ? कितनी जमीनें इस कार्य हेतु देने में उत्साहित हैं ? यानि कि सब बकबकई, सारा ज्ञान केवल स्टूडियो तक ही। बाहर तो वही घी वाला हाल कि 'खाओ गगन रहो मगन'

      और वैसे भी जब कभी पर्यावरण आदि को लेकर जो विचार गोष्ठी आदि होती है तो उस दौरान बिसलेरी की पानी वाली प्लास्टिक बोतलें और थर्माकोल की नमकीन वाली प्लेटें ही ज्यादातर यत्र तत्र दिखाई देते हैं। लोग उन्हीं प्लास्टिक और थर्माकोल की बनी प्लेटों से निकाल निकाल कर नमकीन आदि टूंघते रहेंगे और थर्माकोल के बने कपों में चाय पीते रहेंगे और साथ ही साथ जमकर पर्यावरण को लेकर चिंता भी जताएंगे। ऐसे में अगर किसी ने उस वक्त उन प्लास्टिक की बोतलों और कपों को लेकर चिंता जताई तो समझ लो कि उससे बड़ा दुश्मन आसपास के लोगों का कोई नहीं होगा। सब एक ओर से उसे इस तरह ताकेंगे मानों कोई अहमक इंसान, कोई बकलंठ हमारे बीच आ बैठा है और चाय और नमकीन का स्वाद बिगाड़ रहा है। हां माइक से जताई जा रही चिंता में अवश्य एक दो पल के लिये व्यवधान आ सकता है लेकिन फिर वही एक दो इंची मुस्कराहटों के साथ पर्यावरण चिंतन जारी हो जाता है। नमकीन और चाय का रसास्वादन जारी रहता है। जीभ के टेस्ट बड्स अपने अपने काम में लगे रहते है। आगे के अंग अवयव भी अपनी-अपनी क्षमता कुक्षमता के हिसाब से काम करते रहते हैं। रूमाल से मुँह पोंछने और हाथ साफ करने की क्रिया रह रह कर होती रहती है। किसी को उसी वक्त बाथरूम जाना होता है तो किसी को टिश्यू पेपर की जरूरत पड़ जाती है। और सबसे अंत में कागज की बनी स्मारिका और पम्फलेट्स वगैरह दे दिये जाते हैं ताकि कन्फर्म हो जाय कि हां, हमने पर्यावरण चिंतन जमकर किया था। केवल नमकीन और चाय तक ही सीमित नहीं रह गये थे।

        उधर खबर आ रही है कि करोड़ों की लागत से बने अंबानी के घर की बिजली का बिल सत्तर लाख रूपये आया है। न जाने कितने टन नेचुरल गैसों याकि कोयलों को इस घर के उजाले आदि के लिये खत्म हो जाना पड़ा होगा, कितनी वायवीय प्रदूषणों में पाव किलो और सौ ग्राम कि अभिवृद्धि हुई होगी। लेकिन इस तरह से बिजली के उपयोग करने की कीमत भी तो दी जा रही है कोई फोकट में तो नहीं न ले रहे हैं बिजली। पर्यावरण और सोशल लायेबिलिटी गई चूल्हे में।
तेरा तुझको अर्पण.....क्या लागत है मोल

     हां तो आउं अपनी बात पर, कि जब मेरे यहां खेतों में ढेर सारे थर्माकोल और प्लास्टिक के अवशेष जमा हो गये तो मैंने भी उन्हें ठिकाने लगाने से पहले एक दो पल के लिये सोचा कि इन्हें जलाना ठीक होगा क्या, याकि गाड़ना। लेकिन गाड़ने के लिये जमीन की गुंजाइश न देख, प्रैक्टिकलगंज का रास्ता पकड़ते हुए माचिस दिखा ही दिया। पर्यावरण की चिंता गई तेल लेने। रही सही चिंता ब्लॉग पोस्ट के हवाले कर दिया कि इसी बहाने मैं भी थोड़ा सा चिंतित हो लूंगा वरना तो वायु देवता को कष्ट देने का 'थिंकनभाव' सालता रहेगा।

    


     वैसे भी मैंने ब्लॉगिंग को एक तरह का कन्फेशन बाक्स ही माना है। गलती करते जाओ और उस पर कहते जाओ......आप की आंतरिक पीड़ा आपकी अभिव्यक्ति का टचटोन लिये हुए हुए आप को राहत ही पहुंचाएगी :)

    साथ ही साथ आप अपनी ब्लॉग पोस्टों के कन्फेशन बॉक्स के जरिये तमाम छोटे बड़े हरिश्चंद्रों को मात करते नज़र आएंगे, चाहे वो सत्यवादी राजा वाले हरिश्चंद्र हो या हिंदी सेवा करने वाले पुरोधा भारतेन्दु वाले हरिश्चंद्र :) 

     दोनों ही से आगे आप माने जाएंगे। वरना तो आज के जमाने में कौन भला इस तरह कन्फेस्स करता है कि उसने किसी को माचिस दिखाया है। 


    ब्लॉगिंग के उबलते, पिघलते, खदबदाते, टिटियाते ढेरों नये आयामों में से एक आयाम यह भी सही :)

-  सतीश पंचम

स्थान – वही, जहां की गायें मेरी गौसेवा से प्रसन्न हैं बजरिये 'प्लॉस्टिक मुक्तांगन'

समय – वही, जब पर्यावरण पर जताई जा रही चिंतन गोष्ठी में अध्यक्ष महोदय जी को पर्यावरण की सेवा एंव चिंतन आदि हेतु मोमेंटो दिया जा रहा हो और सभागार से बाहर खड़ा बरगद का पेड़ मन ही मन हंसते हुए कह रहा हो, ...मोमेंटो की दीवारें प्लास्टिक की हैं बच्चा।     

Sunday, November 21, 2010

इंडिया मार्का हैंडपंप बजरिए हू तू तू........सतीश पंचम

 'इंडिया मार्का' वाकई में पूरी तरह से इंडिया मार्का है  

         मेरे घर के बाहर लगा इंडिया मार्का नल एकदम से सरकारी हो गया है। एकदम सरकार की तरह काम करता है। जिस तरह किसी सरकारी काम को करवाने में, दबी फाइल को उपर लाने में एक ही बिल्डिंग में दस बार उपर नीचे करना पड़ता है, पचीसों चक्कर लग जाते हैं, ठीक उसी तरह मेरे इस इंडिया मार्का नल के हैंडल को पन्नरह-बीस बार उपर नीचे करो तब जाकर कहीं वह जमीन में दबे पानी को उपर लाकर उड़ेलता है, वरना क्या मजाल है जो एक दो बार के हैंडलाइजेशन में ही पानी दे दे।
 
     गाँव में लगे इस इंडिया मार्का नल को रिपेयर करवाने के लिये हाल ही में एक इंजिनियर (मिस्त्री) को बुलाया गया । इंजिनियर मिस्त्री भाई साहब ने पहले तो उसे इस तरह देखा मानो बहुत देर कर दी गई बुलाने में। अब कुच्छो नहीं हो सकता शैली में। पहले बताना चाहिये था। समझ में नहीं आ रहा था कि वह मेरे इंडिया मार्का नल की बात कर रहे हैं या किसी मरीज की बात कर रहे हैं। बिल्कुल फिल्मी डाक्टरों वाला अंदाज।

       खैर, किसी तरह काम में जुटे जनाब। पहले तो उसका हैंडल खोलने में भाई साहब ने बीस पच्चीस मिनट ले लिया। हैंडल खुल ही नहीं रहा था। उनके औजारों पर नज़र गई तो सब एवन ग्रे़ड के घिसे हुए। लग रहा था कि जहां कहीं कोई नट-बोल्ट इनसे नहीं खुल रहा होगा, वहां आसपास मौजूद लोगों ने जबरदस्ती पब्लिक इंटरेस्ट में कोशिश की होगी और नतीजतन अदलतीहा औजार PLR की तरह इसे भी भोथरा कर दिया। अब तो अदालतें भी समझने लगी हैं कि कोई भी PLR पब्लिक इंटरेस्ट में कम, बल्कि निजी इंटरेस्ट में ज्यादा डाला जाता है। सो, चाहे कानून का औजार हो, या नल बनाने का ही औजार क्यों न हो, भोथरई सब जगह काबिज है।

       उधर हैंडपंप का हैंडल खुलने के बाद उसकी पाइपों को उपर हवा में उठा कर रखना था, ताकि इंजिनियर मिस्त्री साहब उसका निरीक्षण परीक्षण कर सकें। बड़ा वजनी काम था। आठ-दस लोगों की जरूरत पड़ी। सब लोग एक ओर से जोर लगा कर पंप को एक बाँस के जरिये बाँध कर हवा में कुछ देर के लिए थामे थे। समझ में नहीं आता कि गदर फिल्म में सन्नी देओल ने हैंडपंप कैसे उखाड़ा होगा। इधर तो आठ आठ लोग लग गये केवल हैंडपंप को उपर करने में, उखाड़ने की तो बात ही छोड़िए। एक बार तो मन किया कि गदर के सन्नी देओल को ही बुला लूं , लेकिन फिर सोचा., जाण दो, महीन काम है, कही आकर पूरा हैंडपंप ही उखाड़ दिया तो खर्चा बढ़ जायगा।

      किसी तरह इंजिनियर मिस्त्री साहब ने परीक्षण करते हुए बताया कि पाइप की चूड़ी घिस गई है, इसी से हवा ले रहा है पंप। इसे चूड़ी पहनाना पड़ेगा। पहले तो समझा ही नहीं कि ये चूड़ी पहनाना क्या होता है, फिर जब पाइप पर नज़र गई तो देखा आंटा घिस गया है, Threading करवाने की जरूरत है। मैं मन ही मन अपने कॉलेजयीन प्रोफेसरों पर झुझलाया कि कम्बख्तों ने बेकार ही मुझसे फीस ली, आज तक कभी मैकेनिकल इंजिनियरी के क्लास में पाइपों को चूड़ी कैसे पहनाई जाती है, नहीं सिखाया। सिखा दिये होते तो शायद आज काम दे जाता।

खैर, आगे और गहरे वाले पाइपों को खोलने की मंशा जताई गई कि क्या पता और नीचे के पाइपों को भी चूड़ी पहनाने की जरूरत हो। हवा वहां से भी लीक कर रही होगी भीतर की ओर। बात ही बात में फिर वही उठापटक। अबकी और ज्यादा लोग लग गये क्योंकि पाइप को हवा में लटाकाये रखने के साथ साथ उसके भीतरी रॉड को भी निकालना था जो कि काफी मेहनत मांगता था। किसी तरह दूसरा पाइप भी निकाला गया। पता चला कि उसे भी वही बीमारी है। चूड़ी पहनाने यानि की Threading करवाने की जरूरत है। इसी तरह कुछ और पाइप निकाले गये। सब में वही मर्ज। इंजिनियर मिस्त्री भाई साहब ने कहा कि उपर से लेकर नीचे तक की चूड़ियां सड़ गई है, ऐसे में लीकेज तो होना ही है।
मैं मन ही मन सोचने लगा यार, ये चूड़ियां तो सरकार की भी सड़ गई हैं, कहीं 2G स्पैक्ट्रम तो कहीं आदर्श घोटाला तो कहीं कॉमनवेल्थ तो कहीं कर्नाटक की जमीन हथियाई.....सब जगह तो व्यवस्था में लीकेज ही लीकेज है। उपर से जब सुप्रीम कोर्ट का डंडा पड़ा तब सरकार की ओर से अदालत में हलफनामा भी दिया जा रहा है कि हम ने भी कोई चूड़ियां नहीं पहनी हैं, जो भी 2G स्पैक्ट्रम आदि में बातें सामने आईं है वह पूरी तरह से एक प्रक्रिया के तहत निपटाई गई हैं और जहां भी अनियमितता दिखी वहां कार्रवाई की गई है।

मेरी समझ में नहीं आ रहा कि ऐसे में सरकारी धन के लीकेज को रोकने के लिए सरकार को चूड़ी पहने रहना चाहिए या कि उतार कर साईड में रख देना चाहिए। बड़ा गड्डम गड्ड है।

खैर, इंडिया मार्का हैंडपंप बन गया है, लीकेज रूक गया है और पानी फिर से मिलने लगा है, गंदला ही सही, धीरे धीरे चलाते चलाते साफ होने लगेगा। उधर चूड़िहार, यानि कि चूड़ी पहनाने वाला इंजिनियर भी जा चुका है।

- सतीश पंचम

स्थान – वही, जहां के हैडपंप हेतु आठ दस सन्नी देओल लगे थे।

समय – सर्द मौसम में धूप सिंकाई वाला।

Saturday, November 20, 2010

आओ सूरज, तनिक चाय पीयो......सतीश पंचम

आओ सूरज,
तनिक चाय पीयो

देखो
सर्दियों की चहक
कोहरे की धमक
ओस की बूंद
उसकी चमक

सुबह का दृश्य
ऐसे में,
क्या होगा उग कर
अभी से यूं
जग कर

सोने दो,
जो सोना चाहें
ओढ़ने दो
जो ओढ़ना चाहें
नींद की चादर

आओ सूरज,
तनिक चाय पीयो

अब
करने भी दो
ठंड का आदर।

- सतीश पंचम



स्थान - वहीं, अपने गाँव घर में, जहां पर कि हफ्ते भर पहले बोए गये गेहूँ की हरी-हरी सूईयां जमीन से निकलने लगी हैं।

समय – वही, जब नवम्बर की इस दिलक़श गुलाबी ठंड के बीच चादर ओढ़े हुए छत पर गरम पकौड़े और चाय की चुस्की का आनंद ले रहा हूं और घास पर ठहरी हुई ओस कह रही है, - क्या....... अकेले - अकेले।





( Mobile से खिंचा गया चित्र, आज सुबह का है। कमबख्त 'घोंघा गति नेट कनेक्टिविटी'  20 KB के चित्र को अपलोड करने में भी 'नक्सा मार रहा है'  :)

Tuesday, November 16, 2010

छत वाली पोस्ट....... बजरिये घोंघा गति नेट कनेक्टिविटी ......सतीश पंचम


      इस वक्त अध- अंजोरिया रात में चांद की रोशनाई वाले माहौल में छत पर कुर्सी लगाये बैठा हूँ। अकेला। हल्की ठंड है, एक चादर जितनी। छत पर इसलिए आना पड़ा क्योंकि नीचे नेटवर्क नहीं सध रहा था। यहां छत पर आया तो नेटवर्क तो मिला लेकिन नेट की स्पीड किसी घोंघे की स्पीड से भी कम है। इस घोंघा-गति वाले नेट से कुछ ब्लॉग्स देखे। हर ब्लॉग खुलने में समय ले रहा है। इस घोंघा ब्रांड के चलते टिप्पणी करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया।

      वैसे कल से ही मैं कुछ रिश्तेदारियों में घूम रहा हूं, कभी आजमगढ़ तो कभी जौनपुर तो कभी कहां तो कभी कहां। अभी अगले कुछ दिन दौड़ धूप के हैं। एक ब्याह पड़ा है सो न्योतने के लिये हर नाते रिश्तेदारी मे जा रहा हूं और यह एक तरह से मेरे लिए अच्छा ही है वरना तो गाँव आकर केवल गाँव में ही रह जाता था, बहुत हुआ तो शहर का चक्कर मार आया।

इसी घुमक्कड़ी के बहाने पता चला कि किसी रिश्तेदार के यहां न्योता न पहुंचे तो वह कितना बुरा मान सकता है। किसी के यहां यदि पहले एक न्यौता जाता था तो अब दो दिया जाय क्योंकि दोनों भाई अलग हो गये है। इन न्योतहरीयों के देने लेने में एक विचार मन में जरूर आया कि आजकल के SMS और E-mail के युग में क्या जरूरी है कि हर किसी के यहां जाकर ही न्यौता दिया जाय। इन साधनों का प्रयोग करके भी तो न्यौता दिया जा सकता है।

लेकिन फिर तुरंत ही मन ने कहा कि नहीं, यह SMS E-MAIL अपनी जगह जरूर ठीक होगे लेकिन जहां रिश्तों की गरमाहट की बात है, आपसी मेल जोल की बात है, वो इन्ही पेपर वाले कार्डो और निमंत्रण पत्रों के जरिये ही कुछ हद तक जीवंत बनी रहती है। इसमें और sms वाले तकनीकी निमंत्रणों में बहुत फर्क है। हम लाख टेक्नीक में आगे बढ़ जांय, लाख दर्जे अच्छी गुणवत्ता के वॉलपेपर्स वाले निमंत्रण पत्र कम्प्यूटर से बना कर उन्हें ई-मेल कर दें, लेकिन उनमें वो सत्व नहीं आ पाता, वह बानगी नहीं आ पाती जो इन कागज के निमंत्रणों में हैं।

इस यात्रा के दौरान मैंने यह भी महसूस किया कि जब खुद इस तरह से हर रिश्तेदार के यहां जाना होता है तो एक प्रकार का टू वे कम्यूनिकेशन होता है, आपसी सौहार्द और रिश्तों की गरमाहट को ताजा करता है। बात ही बात में पता चलता है कि अभी इनके यहां लड़की ब्याहने लायक हो गई है, लड़का ब्याहने लायक हो गया है, गाय ली गई,  कोई खेत लिखाया गया या किसी का कहां एडमिशन हुआ किसी की नौकरी कहां लगी वगैरह वगैरह। बाकि तो कुछ बातें आपसी समझ बूझ पर भी आधारित होती हैं, आपसी पुन्ने बात ब्यहार पर भी होती हैं वरना तो निमंत्रण चाहे कागज के उपर दो या एस एम एस के जरिये, ठंड तो ठंड, उन रिश्तों को गरमाने में किसी भी तरह की बातें कामयाब न हो पाएंगी। कुछ समय का बदलाव कुछ जमाने की मिमिक्री :)

     इन तमाम बातो के अलावा एक बात यह भी नोटिस की मैने कि जब आप इस तरह के रिश्तेदारियों में जाते हैं तो कुछ विशेष खानपान का व्यवहार होता है जिन्हें आप खुद ब खुद पालन करना सीख लेते हैं। कुछ बातें तो इतनी मजेदार होती हैं कि उन पर सोच कर हंसी आती है।

मसलन, जब आप नानी-नाना के यहां जाते हैं तो खाते वक्त जी भर कर मांग सकते हैं, खत्म हो गया तो खुद ही बटलोई के पास थाली लिये पहुच गये और लेने। वहीं जब आप किसी ऐसी रिश्तेदारी में होते हैं जहां पर कि आप की नई नई रिश्तेदारी जुड़ी हो, नया नया कोई जुड़ाव हुआ हो तो आप थोड़ा लजाते हैं, सकुचाते हैं। जब सामने और रोटी आती है तो कहना पड़ता है कि नहीं बस...औऱ नहीं। मन में खाने की इच्छा हो तो भी।

इन्हीं में से एक रिश्तेदारी की बात याद आती जब हम कुछ समय पहले गये थे आजमगढ़। वहां पर भोजन एक थाली में परोस कर हम चार पांच लोगों के सामने आ गया। खाना खाते समय एक बार गृहस्वामी ने पूछा कि और कुछ लेंगे आप लोग तो एक तरह से सकुचाते हुए सभी ने नहिकार दिया कि नहीं और नहीं चाहिये, जबकि लंबी यात्रा से हम लोग वहां गये थे, भूख तो लगी थी लेकिन लिहाजन कह गये तो कह गये। उन महाशय ने दुबारा नहीं पूछा आकर कि और कुछ लेंगे या न ही कोई जबरी किये कि लो और लो।  हम लोग जो कुछ था थाली खा पीकर हटे।

बाद में पता चला कि उस इलाके की ओर यही रीत है कि एक बार यदि किसी ने भोजन के वक्त नहिकार दिया कि नहीं और नहीं लेंगे तो उससे दुबारा नहीं पूछा जाता। तबसे जब कभी उस ओर जाना होता है तो संभलकर ही जाते हैं :)

इसी तरह से एक जगह जाने की तैयारी कर रहा था जहां पर कि रात रूकनी थी, तो अपनी लुन्गी वगैरह रखने लगा। तब चचेरे भाई ने कहा कि पहले होता था कि लोग लुन्गी वगैरह लेकर चलते थे, वो जमाना और था, अब लोग जहां जाते हैं, वहां ज्यादातर खुद ही थ्री फोर्थ या लुन्गी ऑफर करते हैं, इस तरह से किसी के यहां लुन्गी ले जाकर क्या अपनी बेईज्जती कराओगे

तो, भई अब इतना ही, शेष फिर....अभी तो देख रहा हूं लैपटाप के स्क्रीन पर कुछ देशज कीड़े मंडरा रहे हैं, थोड़ा थोड़ा नेटवर्कवा का टावर भी ललछहूँ हो गया है.....इसी वक्त पोस्ट को दाग देता हूं, क्या पता अगले पल नेटवर्क खिसक न जाय कहीं :)
 रिश्तों की गर्माहट........ अलाव और आदमी....

-  सतीश पंचम

स्थान – गाँव-घर की छत

समय - यही कोई दस ओस बजे होंगे। 

( अलाव और आदमी........ यह एक चुनाव चिन्ह है जिसे कि एक प्रत्याक्षी को आबंटित किया गया था,  पहली बार जाना कि ऐसा भी कोई रोचक चुनाव चिन्ह भी होता है) 

Monday, November 15, 2010

गाँव की बिग बॉस 'झगड़ू बो' ..... चुनावी चिलगोंजई ऑफ इंडियन ढेमोकरेसी...........सतीश पंचम

लो जी,

       आ पहुँचा हूँ अपने गाँव। नवंबर की इस गुलाबी ठंड के बीच। खेतों में धान की कटाई हो जाने के बाद कहीं कहीं खेत हेन्गाये गये हैं, तो कहीं कहीं पर अब भी धान के जड़ीय गुच्छे अब भी निहुरे निहुरे ताक रहे हैं, मानों कह रहे हैं कि पुनुई सहित धान तो काट ले गये, हम लोगों को क्या सीत घाम बेराम हो जाने के लिये बिसेवा छोड़े हो ?

    उधर, सटक उठे धान के पुआल वाले गजहर जहां तहां खेतों में गंजे हैं।

     इधर ग्राम प्रधान के अभी अभी हुए इलेक्शन के निशान अब भी यहां वहां दिख जा रहे है। तमाम दिवारों पर, पेड़ो के तनों आदि पर अब भी कई पोस्टर चिपके हैं, कुछ फटे कुछ साबूत। गाँव में ही एक करीबी के ही घर की दीवार पर सात-आठ विभिन्न प्रत्याक्षियों के पोस्टर देख जिज्ञासा वश मैंने पूछा कि अरे यार मना क्यों नहीं किये पोस्टर लगाने से देख रहे हो गंदा हो गई है दीवार। तो कहने लगे कि किसको मना करते। एक ने लगा दिया प्रेम-ब्योहार वश तो उसकी देखादेखी और लोग भी पोस्टर चफनाने चले आये। अब एक को चफनाने दिया तो दूसरे को मना करना भी तो ठीक नहीं, भई गाँव देस की बात है। क्यों बेमतलब रार ठानना। मैं मन ही मन इस प्रेम-ब्योहरई पर मुग्ध हो रहा था कि तभी एक और बात पता चली।

      किसी ने बात ही बात में बताया कि 'फलाने बो' कह रहीं थी कि हम ओनके वोट कैसे दूँ उन्होंने तो हमको अपने बेटवा के बियाहे में तो न्योता ही नहीं दिया। मैं दंग। भला यह भी कोई बात हुई कि न्योता न मिला तो वोट न दिया जाय। आगे जाकर बात खुली कि हाल ही में इनके घर अलगौजी हुई हैं, बाँट- बखरा हुआ है। बाहर वालों की नज़र में ये अब भी एक परिवार की ईकाई के रूप में माने जाते हैं, अत: न्योता बांटने वाले नाऊ ने एक ही न्योता परिवार के सबसे बड़े भाई को दे दिया और नये नये मालिक - जालिक बने दूसरे भाई को नहीं दिया। बात वहीं फंस गई।

    बैठकी - चर्चा के दौरान उन्हें कोई मजाकिया ढंग से समझा रहा था कि अरे माना कि न्योता हंकारी ही गाँव के रिसते नाते का चीन्ह पहचान होता है लेकिन इसका क्या तुक कि न्योता नहीं मिला तो वोट ही नहीं दिया। भौजी, इसमें सरासर तुम्हारी ही गलती है। तुम्हें अलगौजी के बाद गाँव वालों को न्योतना चाहिये था कि अब हम अलगाय गये हैं आओ पूड़ी कचौड़ी खाओ। तब तो सब जानते, अब छूच्छे तो कोई किसी को नहीं पहचानता।

   भौजी मुस्कराती हुई बोलीं - अच्छा, आये हो बड़का पूड़ी कचउड़ी खाने, तोहरे बापौ आजा कभौं दिये रहे अलगौजी के दावत ?
   
      बंदे ने छूटते ही कहा - अरे क्या मेरे आजा पोरखा ने जो नहीं किया तो क्या जरूरी है कि हम लोग भी न करें। भौजी आप देखती रहो, मैं अलगौजी होते ही सबसे पहले आप ही को न्योतूंगा...... हां।

  बाकि अपनी ओर से पूड़ी कचौड़ी खिया दो तब ।

    इन्हीं हल्के फुलके क्षणों के बीच कुछ पोस्टरों पर नज़र दौड़ाया तो एक से एक मजेदार बातें पढ़ने को मिलीं। लोग अपने ऑफिशियल नाम लिखने के साथ साथ ब्रेकेट में प्रचलित नाम भी लिखते, मसलन रामअधार यादव ( बुल्लूर ), रमापति मौर्या ( नेता ) , अजोरी लाल ( नन्हे ) । महिला प्रत्याशियों के पोस्टर पर महिलाओं के तस्वीर के बगल में ही हाथ जोड़े उनके पति का भी चित्र था। एक पोस्टर को देख कर ऐसा लग रहा था मानों पतिदेव अपनी पत्नी को हाथ जोड़कर नमस्ते कर रहे हों याकि माफी ओफी मांग रहे हों।

     तभी एक ऐसे पोस्टर पर नज़र गई जिसमें केवल चुनाव चिन्ह था, चुनावी वायदे थे लेकिन प्रत्त्याक्षी का न नाम था न ही कोई पता। आसपास लगे पोस्टरों में महिलाएं ही थीं। अंदाजा लगाया कि ये कोई महिला सीट होगी। लेकिन ध्यान बार बार उस बिना नाम पते वाले पोस्टर की ओर जा रहा था। थोड़ा करीब जाकर देखा तो चुनाव निशान था चारपाई।

हैय......ई का।

     कहीं........मन ही मन कुछ सोच कर मुस्करा दिया। चचेरे समवय भाई की ओर देखा तो वह भी मुस्की मारने लगा। मन ही मन सोचा कि शायद कोई महिला प्रत्त्याक्षी होगी जिसे कि चुनाव चिन्ह के रूप में चारपाई मिली हो। लाजन उसने या उसके परिवार वालों ने उस पर नाम आदि न लिख कर केवल मुंहजबानी लोगों से मिल मिलकर बताया हो कि फलांने चुनाव चिन्ह चारपाई पर वोट दिजिएगा। अब गाँव में कोई महिला इस तरह चारपाई पर वोट मांगने की बात कहे तो जाहिर है चुहल शुरू हो जायगी।

     मर्दों की कौन कहे, महिलाएं ही आपस में घास करते हुए बहसिया जांय। मेरे गांव की बिग बॉस मानी जाने वाली झगड़ू बो तो इन सब मामलों में आगे हैं। उनके बारे में कहा जाता है कि जितना झमक के ये झगड़ा करती हैं, उतना ही बमक के ये चुहल भी करती हैं। गाँव भर की दुलहिनें इनकी बात का बुरा नहीं मानतीं।


     मैं कल्पना करने लगा कि यदि कोई चारपाई निशान वाली महिला प्रत्त्याक्षी उनसे वोट मांगने जाय और कहे कि चारपाई पर ही वोट दिजिएगा तो गाँव की बिग बॉस झगड़ू बो जरूर कहेंगी – अरे, क्या चारपाई पर ही लोगी तभी क्या ?

    अरे भौजाई जब सरकारे कहे है चारपाई पर लो.... तो हम का करें....आप जियादे मजाक नहीं करो अभी और लोगों से कहने जा रही हूं हां....

अरे तो क्या पूरे गाँव भर से लोगी ? वैसे भी ये भी कोई कहने की बात है चारपाई पर ही दो......तभी :)

खैर, मैं अभी इस फैटेसी पर सोच ही रहा था कि भाई ने बताया ये पोस्टर छपा छपान टाईप का है। मैंने पूछा कि छपा छपान का क्या मतलब ?

      बताया गया कि यदि कोई प्रत्त्याक्षी अपना नाम, मोबाईल नंबर फोटो वगैरह लगाकर कस्टमाईज्ड तरीके से पोस्टर छपवाता है तो उसे ज्यादा खर्च पड़ेगा। खर्च कम करने के लिये छापाखाने वालों ने इसका एक तोड़ यह निकाला कि हर चुनाव चिन्ह के साथ ढेर सारे पोस्टर एक साथ छाप दिये। उन चुनाव चिन्ह वाले पोस्टरों पर वादे भी एक जैसे ही रखे मसलन गाँव में बिजली, पानी, सड़क, रास्ते वगैरह ठीक करवाउंगा, ये करवाउंगा वो करवाउंगा। अब जिसे खर्च कम करते हुए पोस्टर बनवाना होता है वह अपने लिये चुनाव कार्यालय से आबंटित चुनाव चिन्ह वाला पोस्टर थोक के भाव खरीद लेता है और केवल अपना नाम और मोबाइल नंबर स्केच से लिखकर दरवाजे जरवाजें बांट आता है। इस तरह से उसका खर्च भी कम होता है और उसके पोस्टरों की संख्या भी बाकी प्रत्याक्षियों से ज्यादा होती है।

    यह बिना नाम गाम वाला यह चारपाई वाला पोस्टर भी उसी थोक खरीद का हिस्सा था। इसमें केवल वायदे थे और एक चुनाव चिन्ह। पूछने पर बताया गया कि पोस्टर लगे महीना हो गया है। जिसने पोस्टर लगाया था उसने पोस्टर पर अपना नाम, नंबर स्केच पेन से लिखा था लेकिन, धूप ठंड खाकर वह स्केच की लिखावट वाला हिस्सा हल्का पड़ते पड़ते उड़ गया और रह गया है केवल यह चुनाव चिन्ह और उस पर लिखे वायदे।

मैने झट् से उस चारपाई वाले 'वादाई पोस्टर' को अपने कैमरे में तस्वीर बद्ध कर लिया।

और करता भी क्यों न, आखिर यह पोस्टर हमारे आजादी के पैंसठ साला लोकतांत्रिक इतिहास का जीता जागता उदाहरण जो है। आखिर हम भी तो आदि हो चुके हैं, इसी तरह के तमाम रेडिमेड वायदों, घोषणाओं, चुनावी चिन्हावलीयों के और आदि हो चुके हैं गुम होते नेता नामावलियों के।

भारतीय लोकतंत्र के 'चिर- स्थायित्व' का जीता जागता उदाहरण है यह 'वादाई पोस्टर'

- सतीश पंचम

स्थान - वही जहाँ की दीवारें झगड़ू बो के आते ही सकपका जाती हैं क्योंकि सुना है झगड़ू बो दीवार से भी झगड़ा करती हैं।

समय - वही, जब सूरज की बांस बराबर उगवाई हो रही हो। 

Saturday, November 13, 2010

लाइव यात्रा पोस्ट......कटनी हाल्टायन........सतीश पंचम

आज रास्ते भर आर के नाराणन की लिखी गाई़ड पढ़ता रहा, वही गाईड जिस पर देवानंद ने फिल्म बनाई थी। यह गाईड हिंदी में एक अनुदित किताब थी मूल पुस्तक की, स्वाभाविक रूप से इसमें कई खामियां दिखी। पहले कुछ समय तक तो अनुवादक ने इस किताब में राजू के मुंह से अपने पिता को बाप कह कर ही परिचय दिलाया है, कि मेरा बाप का दुकान था, मेरा बाप मुझे पढ़ने भेजा। इस तरह पढ़ने से आजिज आकर मैंने मन ही मन बाप की जगह पिता पढ़ना शुरू किया और अगले अध्याय तक अनुवादक ने जैसे अपनी गलती मान, अपनी जिद छोड़, बाप की जगह पिता शब्द का इस्तेमाल शुरू कर दिया।

     खैर, वैसे तो मैं गाइड फिल्म कई बार देख चुका हूं, लेकिन जब इस उपन्यास को पढ़ रहा था तो महसूस हुआ कि देवानंद ने बड़ी ही समझदारी से अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए मूल प्लॉट में तब्दीली करते हुए फिल्म का कथानक लिखा। यदि ऐसा नहीं करते तो फिल्म हिट होने की बजाय फ्ल़ॉप होने की संभावना ज्यादा थी, जिसकी एक एक बहुत बड़ी वजह भी है।

वजह यह कि उपन्यास में लिखा गया है कि राजू का मामा दक्षिण भारतीय प्रथा के अनुसार अपनी बेटी यानि कि राजू की ममेरी बहन का विवाह राजू से करना चाहता है । चूंकि यह फिल्म हिंदी में है और हिंदीपट्टी में इस तरह से ममेरी या चचेरी बहन से रिश्ता करना एक तरह से अपराध माना जाता है, देवानंद ने यहां तब्दीली करते हुए राजू की ममेरी बहन का जिक्र ही नही किया फिल्म में और मामा को इसलिए नाराज दिखाया क्योकि वह रोज़ी उर्फ नलिनी जैसी नाचने वाली के फेर में पड़ा है। यदि देवानंद ज्यों का त्यों इस कहानी को उठाकर ममेरी बहन और राजू के रिश्ते की बात कहकर फिल्म बनाते तो गाईड का फ्लॉप होना तय था। ऐसे ही वक्त यह महसूस होता है कि एक फिल्मकार का अपना नज़रिया होता है, अपनी समझ और सोच होती है और उसी के चलते उसे उपन्यास या किसी कहानी पर फिल्म बनाते समय एक हद तक छूट देनी चाहिए, न कि केवल यह जिद कि उपन्यास से क्यों छेड़छाड़ किया। देवानंद की इस समझदारी को देखकर अच्छा लगा।

अब थोड़ा सा सफर के बारे में बता दूं। कटनी पार कर चुका हूं, अभी तक अप्पर बर्थ से उतर कर नीचे की लोअर बर्थ पर जाकर बैठने की हिम्मत नहीं जुटा पाया हूँ। पहले ही नीचे गचड़ी है। लोग एक दूसरे से सटे फटे बैठे हैं। सोचा था ठंड होगी, लेकिन बकौल एक यात्री जहां गोरू (भैंस, पशू वगैरह ) और मनुख होते हैं वहां गर्मी लगती ही है। यह यात्री कुछ पुरनिया टाइप है, धोती पहनें सुरती खाते दिख रहे हैं। इनकी इस गोरूता  के क्या कहने । 

   एक दूसरे यात्री कह रहे हैं कि आर भोडाफोनवा का नेटवरकै नहीं है, कहां से फोनवा करे।

   इधर  बाथरूम जाते समय पता लगता है कि लोगों के रास्ते में बिछे होने पर उनसे पार पाना कितना मुश्किल होता है। राजू गाईड कैसे पार पाता होगा ऐसे लोगों से चरण छूने से बचने के वक्त। 

   फिलहाल बाथरूम वगैरह जाने के लिये जब अपनी अप्पर बर्थ से उतरता हूं तो वहां जाते समय लोगों से बचते बचाते पैर रखने के लिये जब लंबे लंबे डग ढूंढ कर रखने पड़ते हैं तो लगता है जैसे जमीन पर कि लैंड माइन बिछी हैं और मैं उनसे बचते हुए चल रहा हूं।

 नेटबुक की बैट्री खत्म होने को है। घर पहुंचने तक आगे न लिख पाउंगा यह लग रहा है।

फिलहाल इतना ही.... .  वो क्या कहते हैं........हां.......... शब्बा खैर :)

- सतीश पंचम

लाइव यात्रा पोस्ट...........सतीश पंचम

        रात के साढ़े बारह बज रहे हैं......गाड़ी चल चुकी है......लेकिन चलने के पहले का जो आगाज है वह कुछ ऐसा है कि मेरे सामने की दो सीटों( अप्पर बर्थ और मिडिल बर्थ ) पर कुल मिलाकर सात लोग जा रहे हैं। अभी नीचे की बर्थ वाला आना बाकी है, शायद आगे के किसी स्टेशन में चढ़े।

   
    दो सीटों पर सात लोगों का अनुपात जब बैठेगा बैठेगा, अभी तो उनके सामानों को देख कर सोच रहा हूं कि ये लोग सोयेंगे कैसे, पूरा उपरी बर्थ तो सामान से पटा है, सीट के नीचे भी बोरा वगैरह रखा है। पूछने पर कि आप लोग बम्मई से बोरा ले जा रहे हो - इन्हीं में से एक ने बताया कि सब गांव वालन क हौ। जब दे रहे हैं लेई जाके घरे देये खातिर त मना कैसे करें.....भाई हमहूं के न जरूरत पड़थ। केहू के एक गठरी, केहू क दूई गठरी। अब पेटी बाकस तो हौ नाही....एही बदे बोरा में लेहल जाता।

सामान गजे गज्ज, सोयेंगे कहां :)
बातचीत में किसी 'सेवा बो' का नाम लिया जा रहा है। अरे बड़ी चाप्टर औरत हइन सेवा बो। ओनकर मनई रेलवे में रहलें, टीटी आय के टिकस मंगलेस त सोये सोये कहिन कि टिकस नहीं पास है, पास। टिकस्स का होता है।

बतावss

अभी सेवा बो के बारे में सोच ही रहा हूं कि उन्हीं में से एक ने बताया कि ई त गनीमत है। एक बार हम एक टिकस पे नौ लोग गये रहेंन।

सुनकर ही आश्चर्य हुआ....कैसे गये होंगे। बंदे ने बताय़ा कि - चालू टिकट लेई लेई के कुछ लोग उहीं 'बोगदवा' में चल गइलें त कुछ लोग भूईं (जमीन) हो गइलें।

बोगदवा के बारे में पता चला कि पहले जो बाथरूम के पास खाने बने होते थे सामान रखने के लिए, उन्हें रेल्वे ने जब हटाया तो वहां कुछ समय तक खाली स्थान रहा था।

वही था बोगदा।

फिलहाल एक किन्नर और एक यात्री में कहासुनी भी हो चुकी है। किन्नर जी कह रहे हैं कि दस दो, जबकि बंदा अड़ा है कि नहीं पांच लो। मेरा पांच..... ये बाजू वाले का पांच ….हम लोग एक ही है।

तू झूठ बोलेन्गा तो तेरे को आमरा जइसा अउलाद होंगा...... ये सोच के ले।

अरे क्या सोच के ले, मेरा सब आपरेसन फापरेसन हो गया है, बच्चा कच्चा जो होना था सब हो गया...अबी तुम्हारा स्राप ब्रीप नई लगने वाला। लेने का है तो लो, नहीं तो जाओ।
किन्नर ने वो पैसे पकड़े, जाते जाते हाथ से यौनिक इशारा करते कहा - वो ग्रांट रोड में जाता ना ** ने को.....उदर इच आमरा बात तेरे को लगेंन्गा.....भड़वा :)


 लो,  पोस्ट खतम होते होते कल्याण आ गया और वो लोवर बर्थ वाला आदमी भी , मय बोरा सहित। 

  यानि की तीन बर्थ पर आठ आदमी : )
 फिलहाल तो मुझे चिंता है, मेरी बर्थ न कब्जिया जाय.....अरे गांव देश के मनई हो.....तनिक सरका हो :)

 सतीश पंचम

(गाँव जाते हुए चलती ट्रेन से पता नहीं ये पोस्ट सही सलामत पहुंचेगी कि नहीं,....... नेट कनेक्टिविटी ......अर्र..र्र.....   :)

Thursday, November 11, 2010

तौलिया लपेटे शब्दों के बीच रेलवई वाली मजलिस............. सतीश पंचम

  
     दो हफ़्ते के लिए गाँव की ओर रवाना होने से पहले पेश है यह रेलियही-रीठेल पोस्ट   

  Disclaimer  : कुछ शब्द तारांकित अवस्था में तौलिया लपेटे हैं, अत:  पाठकों से निवेदन है कि शब्दों को अपनी-अपनी कल्पना शक्ति के अनुरूप समझें-बूझें,  किसी गलतफहमी के उत्पन्न होने पर दोष आप का ही माना जायगा ........लेखक या लेखक का लैपटाप इसके लिए कत्तई जिम्मेदार नहीं है :)


 - Satish Pancham 

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        मुंबई.........रात के बारह बज कर पन्द्रह मिनट ………गाँव लौटने का समय…….. गाड़ी प्लेटफार्म पर आ रही है…… सरकती हुई………कहीं कहीं से रह रह कर……..खट……खुट…..खट…..खट की आवाजें देती….…….. ..बिना रिजर्वेशन यानि  चालू वालों की लाईन में अचानक अउन पउन होने लगा है……थोड़ी हलचल सी मच गई है…….एक पुलिस वाला लोहे के गाडर पर लाठी पटक कर खन्न् सी आवाजों की धमक से लोगों को परेशान कर रहा है…….चालू वाले…….बिना रिजर्वेशन…….पुलिस वाले…….रिजर्वेशन…….……मैं प्लेटफॉर्म और उसके आसपास की हलचल देख रहा हूँ....देख रहा हूँ.......पुलिस वाला लोहे का गार्डर ठनठना रहा है........और भीड़........वह तो भीड़ ही तो है.....एकाध लाठी खा ली तो कौन बड़ी बात............कमअक्ल पुलिसिया साला........

       बोगी में घुसता हूँ……बोगी…….अजीब शब्द है। अँधेरा है । थोडी देर में लाईट आ जाएगी……लोगों का सामान के साथ आना शुरू हो गया है.......…..सूटकेस…..बोरा……चटाई……क्या गाँव में नहीं मिलती जो लिए जा रहे हैं………हां भाई…….बम्मई से लाए हैं……चटाई और बोरा न हो तो पता कैसे चलेगा……….बोरे में पत्थर ओत्थर भरे हैं क्या……काफी कड़क है……पैर में जरा सा लगा था अंधेरे में ……….……मोबाईल के टार्च अब काम आ रहे हैं……नोकिया वाले मोबाईल मे टार्च नहीं सटाते …….सीटें ढूँढने में दिखते हैं ज्यादातर चाईना मोबाईल….लगता है नोकिया बैठ जाएगा...... नोकिया बैठे या उठे...... लेकिन पहले से ये कौन बैठा है मेरी सीट पर.....उठो यार.........चालू टिकट है भई तो मुझे तो मत हलकान करो.....


ममता दी.....ओ ममता दी....तनि देखा हो....
    आप का कितना है जी……..सत्तावन……हमारा अट्ठावन…..ओनसठ……एकहत्तर है………..एक सीट लम्मे दे दिया है……कहां लम्मे है…..इधरईए तो है…….अरे भाई रास्ता छोडो……सामान साईड में कर लो……आने जाने तो दो……..ए बिजई……….अरे  उहां कहां लटका हउआ……इंहां आवा आर………पच्चीस….छब्बीस इहां हउए………..एक तो लईटिए नहीं जलाए अबहिन मादरचो*….रेलवई वाले……..सामान तो हटाईए भाई साहब….रास्ता तो किलियर करिए……..ए पुसपा……..बिट्टी के ले के हिंया आव……….रजिंन्दर……..हे रजिन्दर…….अरे इहां हौ सीट आर….उहां कहां लां* चाटत हउआ……….अरे  ई एस सीक्स है भाई ………..आपका टिकट एस सेवन का है……..जाईए…..अरे तो सामान हटाएंगे तब नूं आगे बढेंगे……..ए बोरा उधर करो भाई…….सादी का सामान है….……….सूट उधर उपर देखों एक  खिल्ला……टांगों न उधरै……..नहीं खराब नहीं होगा…..लटका रहने दो……देखा इहै……सादी पड़ी है तो केतना खियाल रख रहा है लईका कि मुड़े मड़े नहीं………..ल्ल……लाईट आय गई…..जय बम्मा माई………पंखवा चला द हो………ए मर्दे वो लाईट का बटन है…..वो देखो पंखा का निसान ओहपे है……….

    
    बुढ़िया माई को उहां बईठा दो……माई…..ए माई…….चलत हईं………पैलागी…..जियत रहा बचवा………गाड़ी चल पड़ी है…….. .हम्म…….बुढ़िया माई के पैरों में महावर लगी है……पतोहू ने रचि रचि कर लगाया होगा…….पैरों पर आढ़ी टेढ़ी लकीरें डिजाईन बना कर लगी हैं…..जरूर पतली सींक से लकीर बनाई गई होगी……..लेकिन बुढ़िया माई के तर्जनी में लाल रंग लगा है…….तो क्या खुद से रंग लगाया होगा पैरों में……पतोहू कौनो काम की नहीं………ए भाई साहब आप सामान वहां रख दिजिए तो बैठने में आसानी होगी……..अरे आप भी कमाल करते हैं…..टिकट हमारा यहां का है…….अरे तो दो जन का है…….एक ही पर बनाया है…..आर ए सी वालों का यही होता है…….. एक पर दो लोग जा सकते हैं……..तब क्या अईसे ही रेलवई लाभ ले रहा  है………..


ममता दी.....ए ममता दी......तनिक सुनिए तो.............
  बगल में मोबाईल पर कोई गाना सुन रहा है.....नो हेडफोन......नो रोक टोक.......ओनली हेडेक.......और गाना......क्या कहा जाय.............

जातारा परदेस बलमूआ…….
छोड़ के आपन देस बलमुआ……
का देखईब पंडित जी से…..
खोल के पोथी पतरा………. .
एगो चुम्मा ले ल राजाजी….
बन जाई जतरा…..
जातारा परदेस बलमुआ……..

    हम्म तो पंडितों का पोथी पतरा देखना इसलिए कम हो गया क्योंकि चुम्मा आड़े आ गया………गाना भी तो खूब गाया है……चलिए टिकट बताईए……..आप का……आप का…….पैन कार्ड…….नहीं तो कुछ तो होगा……ड्राईविंग लाईसेंस……..नहीं तो केवल झेराक्स मान्य नहीं है….. आप कोई प्रूफ दो तब ही आपका टिकट मान्य होगा…..चलिए आप दिखाईए……..आप का…….अरे भई बोला न कुच्छो नहीं हो सकता………


ममता दी......ए ममता दी.........अरे तनिक .......सुनू रे.......
  मैं अपनी सीट पर इत्मीनान से बैठ जाता हूँ.......स्लीपर क्लास........पूरे रास्ते स्लीपर पर स्लीपते हुए जाना चाहता हूँ.......रफी की तरह गाते हुए......वफा कर रहा हूँ वफा चाहता हूँ..........पैसे भर चुका हूँ.....अब मजा चाहता हूँ.......लेकिन मजा.........स्लीपर क्लास में नींद का मजा..........क्या मजाक है :)

  का हो.....कौन गाँव.....जिल्ला...... आप कहाँ तक जाएंगे....... आप गए हैं वहाँ पर....... नहीं.....वहां कभी गए तो नहीं पर सुने जरूर हैं.......त  ...सुनिए...... गोसांई जी कहिन हैं कि....बड़े भाग मानस तन पावा............उफ् ये गर्मी...........और ये गोसांई जी.......लगता है पकाए बिना न रहेंगे...........पकाओ गुरू......बड़े भाग मानुस तन पावा..........

 नींद का झोंका आ रहा है......गोंसाईं जी जारी है...... त कहें हैं गोसाईं जी रमायन में ......।


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      उम्मीद करता हूं इस बार वह पकाऊ यात्री नहीं मिलेगा........वैसे भी..... बस उम्मीद ही कर सकता हूँ........क्योंकि मिलना न मिलना तो सीट नंबर  पर निर्भर है.....पता चले उससे भी ज्यादा पकाऊ मिल जाय और रमायन की जगह  फिल्मी महाभारत  पाठ करे -   सलमनवा बहुत मस्त डांस करता है......अभिसेकवा को कुच्छो नहीं आता है.....कटरीनवा बहुत भली लगती है......असवरिया तो अब बूढ़ाय गई है......औ अच्छे कुमार.......

  चुप्प साले.........

 इससे अच्छा तो वो गोंसाई जी वाला यात्री था....कम से कम पकाता तो विधि से था   :)


- सतीश पंचम

स्थान –  वहीं जहां पर कि 'पुराना दो नया लो' का 'चव्हाण एक्सचेंज ऑफर' चल रहा है।

समय   गाँव जाने से एक दिन पहले वाला अटपटीया टाइम.....न कुछ धरते बनता है न उसरते........ कपड़े प्रेस प्रूस करके रखना है....... .गमलों को पड़ोसी के हवाले करना है.......कुंजी ताला ढूँढ ढाँढ कर रखना है......और सबसे बढ़कर..... अभी बर्तन मांजना है  :)

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Wednesday, November 10, 2010

नेट पर सर्फ करते हुए हाथ लगीं कुछ चुनिंदा कविताएं......सतीश पंचम

       हाल ही में नेट पर सर्फ करते हुए एक साइट  का पता चला जहां पर कि कविताएं ही कविताएं हैं और हर एक बेहद चुनिंदा किस्म की । किसी में धर्मवीर भारती जी गुनगुना रहे हैं तो किसी में सर्वेश्वर दयाल सक्सेना। एक जगह गुलजार भी दिखे । उन ढेरों कविताओं के बीच से कुछ यहां रख रहा हूं। आशा है आप लोगों को भी पसंद आएंगी  -



 दीदी के धूल भरे पाँव -  धर्मवीर भारती





         दीदी के धूल भरे पांव


- धर्मवीर भारती

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 - हे साँझ मइया - ----



- शलभ श्रीराम सिंह

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मैं बल्ब और तू ट्यूब सखी 




-  बाल कृष्ण गर्ग

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हरी मिर्च - 




 - सत्यनारायण शर्मा 'कमल'

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-पुत्रवधु से-


 -  प्रतिभा सक्सेना


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 ऐसी ही ढेरों कविताएं हैं वहां और ज्यादातर बेहद चुनिंदा किस्म की। अच्छी कविताओं के गुणग्राहक वहां जा सकते हैं।


   लिंक ये रहा - गीता-कविता


प्रस्तुति -  सतीश पंचम

Sunday, November 7, 2010

बर्तन माँजना भी एक कला है.....द ब्लैक आर्ट ऑफ..........सतीश पंचम

     बर्तन माँजना भी एक कला है.... अब यह बखूबी जानने लगा हूँ , क्योंकि आजकल घर के बर्तन मुझे खुद जो माँजने पड़ रहे हैं।

        पहले होता था कि खा लिया, सरका दिया। बहुत हुआ तो जूठे बर्तन उठा कर सिंक में रख आया। बाकी काम श्रीमती जी के पल्ले। लेकिन अब, जबकि घर के ज्यादातर लोग बाहर हैं, ऐसे में सारे काम मुझे खुद करने पड़ रहे हैं, तो हर काम में मुझे एक तरह की कला दिखाई पड़ रही है। एक तरह की क्रिएटिविटी नज़र आ रही है। 

     अब इसे ही देखिए कि जब मैं बर्तन धोने बैठता हूँ तो एक ओर कड़ाही दिख रही है जो किसी पाषाण काल के हेलमेट का प्रतिरूप दिखती है तो दूजी ओर अलसाया सा एक पतीला है, जिसे मानों अपने धोये जाने की कोई  जल्दी नहीं है। शायद कहना चाहता है कि जब तुम्हारा मन करे तो धो देना नहीं तो ऐसे ही रखोगे तो भी चलेगा। कहां मुझे गोरा होना है।  बाकी के चम्मच, कटोरी तो खैर है ही। थाली, लोटा कलसी.....और वो कलछुल। कम्बख्त हर वक्त कम्युनिस्टों सा कटकटाया-कर्राया रहता है, मानों कह रहा हो कि यदि मैं न होता तो तुम भूखे रह जाओ। 

      वैसे भी जब अपने पर पड़ती है तो बर्तनों का कैसे कम से कम उपयोग किया जाय यह कला खुद ब खुद आ जाती है। पहले तो ऐसी डिश ही नहीं बनाता जिसमें कि ज्यादा बर्तन 'चहँटियाये' याकि ज्यादा बर्तन फंसे।  तेल वाले पदार्थ यथासंभव कम से कम बनाता हूँ ताकि तेलियान बर्तन माँजने में कम मशक्कत करनी पड़े और साथ ही साथ हृदय को भी आराम रहे....'रक्त-फ्लो बिन सफोला जिन्दाबाद' । 

    एक और शार्टकट ये सीखा कि खाने के बाद बर्तन तुरत फुरत धो देने से वह जल्दी साफ हो जाते हैं और पानी भी कम लगता है। बर्तन बिना ओसकन लगाये ही केवल खंगाल पर देने भर से फरचा हो जाते हैं, नये से हो जाते हैं। अगर बाद में धोने के लिये रख दिये या देर कर दिये तो कटकटा जाते हैं, कर्रा जाते हैं। ऐसे में बाद में उन्हें खूब रगड़ना पड़ता है। 

   वहीं, बर्तन माँजते समय एकाध बर्तन जले हुए भी रहते हैं। ऐसा होना लाज़िमी भी है। मैं अक्सर दूध रख कर टीवी देखने लगता हूँ.....कहीं पर मनमोहन सिंह  गंभीर विचार विमर्श कर रहे होते हैं तो कहीं पर मुन्नी बदनाम हो रही होती है, तो कहीं पर गीत चल रहा होता है - ताकते रहते  तुमको... साँझ सवेरे।  इस ताकाताकी में गैस पर दूध रखा था ये भूल जाता हूँ।  उसका असर ये होता है कि गर्म हो रहा दूध धीरे धीरे पतीला पकड़ लेता है और समय बीतने के साथ पेश करता है एक अलग किस्म का आर्ट - 'द ब्लैक आर्ट ऑफ दूधिज्म'

     और उस 'ब्लैक आर्ट ऑफ दूधिज्म' का ही कमाल होता है कि जल कर काला पड़े बर्तन को थोड़ी देर के लिए अलग रखना पड़ता है ताकि पहले साधारण बर्तनों को साफ कर लिया जाय, बाद में इस जले बर्तन को धोया जाय।  उधर जला बर्तन खुद को कश्मीर की तरह उपेक्षित सा महसूस करने लगता है। उसे लगता है कि उस पर जान बूझकर तवज्जो नहीं दी जा रही। और जब उस जले बर्तन को चम्मचों से छुड़ाया जाने लगता है तो किर्र कुर्र की आवाजें आने लगती हैं, ऐसे में डर लगा रहता है कि कोई अरूंधती न आ जाय जो कि बर्तनों को हो रही पीड़ा को मुद्दा बना ले और कहे कि यह बर्तन तो आपके हैं ही नहीं। शुरू से आपने इसे अलग रखा है। अब उन्हें कौन समझाये कि बात यहां बेध्यानी की ही है। चाहे कश्मीर हो या बर्तन, यदि समय रहते ध्यान देकर आँच से हटा लिया गया होता तो ये जलते नहीं। अब जब जल ही गये हैं तो उन्हें साफ करने के लिए रगड़मपट्टी जरूरी है और इस प्रक्रिया में चूँ...चाँ...किर्र...कुर्र....आवाजें आएंगी ही। उन्हें आप बर्तनों की पीड़ा समझें तो यह आपकी प्रॉब्लम है।   

         खैर, जैसे तैसे बर्तनों को धोता हूँ.......भले ही मांजते वक्त छोटे बर्तनों से शुरूवात करूं  लेकिन धोते समय पहले बड़े बर्तन...फिर उससे कम  बड़े बर्तन....औऱ फिर सबसे कम बड़े बर्तन। अर्थात मैं एकदम सरकार की तरह काम करता हूँ, पहले बड़े इंडस्ट्रीज पर तवज्जो देता हूँ फिर मध्यम आकार के उद्योगों पर और अंत में लघु उद्योगों पर। इस तरह से पहले ही चौड़े बर्तनों के धोने का एक लाभ ये होता है कि उनमें बाद में धोये जाने वाले छोटे बर्तनों को रखने में आसानी रहती है जिसके चलते बर्तन धोवन कार्यक्रम निपटने पर उन्हें एक साथ उठाकर यथोचित स्थान पर रखा जा सकता है। वरना तो यदि पहले छोटे बर्तन अर्थात लघु उद्योंगों पर ध्यान देता तो उन्हें समाहित करने के लिए आसपास जगह ढूँढनी पड़ती और आप तो जानते हैं कि बात चाहे छोटे बर्तन धोकर रखने वाली जगह की हो याकि देश में लघु उद्योग वाली जगह की, समस्या बनी ही रहती है। जगह की शॉर्टेज तो है ही।  फिर बड़े बर्तनों अर्थात बड़े उद्योंगो के लिए सिंगूर, दादरी जैसा विवाद हो जाय तो आश्चर्य कैसा। छोटू बर्तन मांजने के क्रम में संभव है कि बार बार उठकर  बर्तनालय तक दौड़ लगानी पड़े। इसमें समय और उर्जा की बरबादी है। 
   
        ऐसे में मेरे घर के लघु उद्योग यानि कि छोटे बर्तन कटोरी, चम्मच, गिलास तक मेरी इस फितरत को समझने लगे हैं। एक तरह से उन्होंने अपने आप को भाग्य के भरोसे छोड़ रखा है कि जब बड़े बर्तन यानि कि बृहद उद्योग साफ सुथरी अवस्था में बर्तनालय की ओर प्रस्थान करेंगे तो उनके भीतर समाहित ये छोटे बर्तन एक तरह से शैडो इंडस्ट्री के तौर पर खुद ब खुद समाहित हो जाएंगे। ऐसे में क्या जल्दीयाना। जो होगा देखा जायगा।



     लघु उद्योगों पर सरकार क्यों इतना तवज्जो नहीं दे रही यह मुझे बर्तन धोने की प्रक्रिया से ही पता चल सका है। फिलहाल तो देख रहा हूँ सरकारें अलग अलग बैठकर बर्तन मांज रही है, राज्य सरकार..... केन्द्र सरकार...... मिलीजुली सरकार.....अच्छी सरकार......बुरी सरकार ...... टिकटिम्मा सरकार। सभी लोगों के अलग अलग बर्तन हैं........अलग अलग मांजनालय हैं, लेकिन सबके बर्तन मांजने का तरीका एक ही है.......शुरआत में मांजने कि लिए भले ही लघु बर्तन लिये जायें पर धोते समय, चमकाते समय.......पहले बड़े बर्तन......फिर छोटे बर्तन.... फिर....फिर  :)

     


 - सतीश पंचम

स्थान - वही, जहां पर गाँधी जी से संबंधित एक एतिहासिक स्थल मणिभवन के आसपास के नारियल के पेड़ो से नारियल इस आशंका में काट कर गिरा दिये गये कि कहीं ओबामा के वहां विजिट के दौरान कोई नारियल उपर से गिर न जाय और किसी को घायल नही कर दे। 

समय - वही, जब ओबामा गाँधी जी से जुड़े किसी एतिहासिक स्थल को जाकर भेंट दे रहे हों और उसी वक्त टीवी पर मुन्नाभाई की गाँधीगीरी वाली फिल्म चल रही हो, जिसके लाइब्रेरी वाले दृश्य में चायवाला बच्चा कहे -  "सब येड़े आते हैं इधर" :) 

( 'थिंकर' और लाइब्रेरी का  चित्र - नेट से साभार )

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