सफेद घर में आपका स्वागत है।

Saturday, October 30, 2010

लहरदार डिप्लोमेसी के बीच टिटिहरी छर्रा............सतीश पंचम

     अरूंधति ने ये कहा...अरूंधति ने वो कहा.....अरूंधति पानी की समस्या को लेकर चिंतित ........अरूंधति ने नक्सलियों की स्थित शोचनीय बताई....... अरूंधति ने गिलानी के साथ मंच साझा किया......अरूंधति के जज्बे को सलाम.......

Create a big Wave..
Grab a board..
and start Surfing it....
         आजकल हर ओर यही चल रहा है ........यही रीत है...... शोबीज् चिंतित होते है ....खासकर तब....जब उसकी कोई नई किताब आने वाली हो.....याकि कोई फिल्म रिलीज होने वाली हो.....या कहीं शांति पुरस्कार पाने की हसरतें उछाल मार रही हों...... ऐसे लोग निश्चित ही चिंतित होते हैं। 

 ऐसे में बौद्धिक एय्याशीयों के बीच अपने आप को ही कुहनियाता सामान्य तबका यह भूल जाता है कि -  अरूंधती जैसी टिटिहिरी शख्सियतें ......बोल बोल कर ........चहकते हुए.....रिसियाते हुए....गरियाते हुए  अपने लिए एक सुविधाजनक लहर बना रही हैं....एक स्पेस बना रही हैं.....ताकि उन लहरों पर सवार हो उनका आनन्द उठा सकें.... मौज ले सकें....सर्फ कर सकें।

  लेकिन यह चलन कोई आज से नहीं है.....तकरीबन चालीस साल पहले लिखे अपने एक लेख में विवेकी राय ने शायद ऐसे ही लोगों के लिए ही कहा था - 

     धन्य हैं वे लोग जिन्हें दिन-भर बात करने के अतिरिक्त कोई काम नहीं है। और इन्हें देखकर भगवान की लीला का रहस्य खुलने लगता है। अथवा ये लोग साक्षात् भगवान या उसके पैगंबर हैं। विश्वशांति के लिए सदा बक-बक करते रहते हैं। इतनी ऊँचाई से बोलते हैं कि संसार के नामी नायक बौने-से लगने लगते हैं। ये सर्वव्यापी हैं और आश्चर्य नहीं कि हमारे जैसा संसारी आदमी भगवान के समान ही चाहकर भी इनसे दूर रहता है।


     वे बहुत अच्छे हैं, मगर दुर्भाग्यवश हमारे पास समय नहीं है। कामकाजी आदमी हूँ। उन्हें देखकर जलन होती है। मैं हूँ कि किसी घने पेड़ की छाया में घड़ी भर बैठने के लिए तरसता रहता हूँ। समय नहीं मिलता। शरीर बेकार बैठा रहता है तब भी मन की दौड़-धूप जारी रहती है। उधर एक वे हैं कि सदा पूर्ण अवकाश है। 
  नदी तट पर, कुएँ पर, बाग में, बैठकखाने में, अथवा दुकान पर गप्पों का गुलखि लाते रहते हैं। वास्तव में वे धन्य हैं। 

   -  डॉ. विवेकी राय   


     चालीस साल बाद आज भी अशरक्ष:  सत्य।

       और हम हैं कि उसी तरह के 'अरूंधात्मिक बौद्धिक तपिशों' से अपने बौद्धिक चूल्हे हेतु आग ले रहे हैं -  ताकि चूल्हा जले .....आँच मिले..... पानी खदबदाये ..... भोजन बने......कुछ मनसायन हो.....कुछ कहा सुना जाय।

क्योंकि....... आज बड़े दिन बाद आग परोसी गई है।

 - सतीश पंचम  

Image Courtesy : Mumbai paused
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Tuesday, October 26, 2010

एक शर्मिन्दगी ऐसी भी...............सतीश पंचम

   आज अल् सुबह फिल्म 'सारा आकाश' देख रहा था। राजेन्द्र यादव के लिखे उपन्यास पर आधारित इस फिल्म के एक दृश्य को देखकर मुझे मेरे कालेजीय जीवन की एक घटना याद आ गई। 

 हुआ यूँ कि,  मेरे एक मित्र का विवाह उनके स्कूली छात्र जीवन में ही हो गया था। जब हम कॉलेज में पढते थे तो उसने बताया  था कि उसका विवाह तो हो गया है लेकिन गौना अभी बाकी है। विदाई नहीं हुई है। 

   एक दिन कॉलेज का कुछ फंक्शन था और उस फंक्शन के बाद हम चार मित्रों ने प्लान बनाया कि मुंबई के कल्पना थियेटर में अमितभवा की  फिल्म देखी जाय। जाने पर पता चला कि हाउस फुल्ल है। बगल के ही कामरान वगैरह में फालतू फिल्मे लगी थीं। 

 सो लौटने की सोच ही रहे थे कि याद आया यहीं कहीं वह मित्र भी रहता है। चलो उसके घर चला जाय। 
दुपहर का समय था और हम लोग ढूँढते ढाँढते जा पहुँचे उसके घर। दस्तक देते ही एक नई उम्र की महिला ने किवाड़ खोला।

  पूछने पर उस महिला ने बताया कि, हां - सो रहे हैं। 

हम लोग अचक्के में .....कि यार ये बंदे का गौना तो नहीं हो गया ? उसकी पत्नी तो नहीं  ये ?   अभी सोच ही रहे थे कि भीतर से वह महाशय आँख मलते हुए बाहर निकले।  हम लोगों को इस तरह अचानक सामने देख खदबदा गये। 
सुहागरात के समय 'उज़बक की तरह बैठा' समर  :)
 थोड़ी देर में संभले और फिर अंदर घर में ले गये। इशारे से उस महिला को घर के भीतरी हिस्से में जाने को कहा। वह चली गईं। हम लोग एक दूसरे का मुँह देख रहे थे औऱ सोच रहे थे कि क्या बात की जाय। तभी हमारा एक साथी पूछ बैठा - कौन हैं ये ? 

 उसने तुरंत कहा - बहिन है। 

हम लोग चुप, बात ही खलास। लेकिन शुकुल महराज कुछ भाँप लिए थे। पानी वानी पीने के बाद जब चली चला कि बेला हुई तो उसके छोटे भाई को इशारे से बुलाकर कहा - जा तनि भउजी से कहा कि हम लोग जा रहे हैं। 

 जब तक मेरा मित्र उसे रोकता पकड़ता, वह लडका दौड़ता दौड़ता भीतर गया और ललकारते हुए बोला - भौजी ओ लोग जात हउएं।

बस, पोल खुल गई। मित्र महाशय एकदम शर्म से जमीन में जैसे गड़े जा रहे थे। उस समय हम लोग तो कुछ नहीं बोले, लेकिन अगले दिन बचवा की जमकर खबर ली गई। 

 ससुर....बहिनापा जोड़े हैं.....उहो अपने मेहरारू से.....अरे बता देता तो क्या बुरा हो जाता.....तू ....ये है वो है.....साथ ही साथ शुकुल महाराज को भी लपेटा गया कि  तेरे चलते इस बेचारे को शर्मिंदा होना पड़ा। तू अब अपनी लोहकारने वाली आदत से बाज आ। 

 दरअसल मेरे मित्र बताना नहीं चाहते थे कि कम उम्र में हुए विवाह के चलते अब पत्नी को साथ रखना पड़ रहा है। खर्चा आदि कहीं पार्ट टाइम जॉब से निकल तो रहा है, लेकिन फिर भी अभी तक पिताजी ही ज्यादातर खर्च पानी देख रहे हैं।
  
 कुछ अपनी कॉलेजयी जीवन और कुछ अपनी लड़कई उमर के चलते बंदे को अपनी पत्नी तक को बहन बताना पड़ गया।

     ठीक इसी तरह का सीन फिल्म राजेन्द्र यादव रचित  'सारा आकाश' फिल्म में भी था। उसमे भी एक आदर्शवादी, और समाज को बदलने के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर करने की कसमें खाने वाले एक लडके समर की शादी परिवार के दबाव के चलते जल्दी ही हो जाती है। मन मसोस कर वह विवाह करता है लेकिन फिर उसे अपने दोस्तों के बीच जाने में शर्म आने लगती है कि ये ताना मारेंगे आये थे बड़े आदर्शवादी बनने। इतनी दल्दी शादी कर ली..... अब पड़े रहो अपनी जोरू के आँचल में। 

  घर वालों के काफी दबाव देने पर एक बार फिल्म देखने के लिए जाते वक्त समर आगे आगे चलता चला जाता है और उससे काफी पीछे लगभग बीस पचीस फुट की दूरी पर उसकी नई नवेली पत्नी चलती है। रास्ते में एक मित्र मिलता है उसे और हाल चाल पूछ ही रहा होता है कि पत्नी आकर उसके बगल में खडी हो जाती है। समर कुछ समझे इससे पहले ही मित्र पूछता है कि क्या यहीं हैं आपकी श्रीमती जी ?

 समर के मुंह से निकलता है - नहीं.....नहीं। 

 मित्र पूछता है - तो क्या बहन हैं ?

समर कहता है -  हाँ.....और  इधर- उधर देखकर यकायक आगे बढ़ जाता है।

 पीछे पीछे पत्नी भी चल पड़ती है। 

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 मैं सोचता हूं कि आज यदि मैं अपने मित्र से मिलूं तो लाज के चलते पत्नी को अपनी बहन बताने वाला वह मित्र न जाने किस अंदाज में मुझसे मिले ? 

 संभवत: पहुंचते ही पुकारेगा-   सुषमा की मम्मी,...... ए सुषमा के मम्मी..... तनिक देखा..... के आयल हौ ?
  
 और तभी मित्र की बिटिया सुषमा दौड़ती हुई आएगी और कहेगी............मामा आ गये......मामा आ गये :)
  
- सतीश पंचम

 स्थान - वही, जहां की  मुंबईया बोलचाल में किसी को 'मामा बनाने' का अर्थ है  - मूर्ख बनाना होता है :)

समय - वही, जब मित्र की श्रीमती जी मेरे सामने घूँघट काढ़े हुए आए और अचानक घूँघट उठा कर कहे, -  का हो.......का हाल बा ??? 

Sunday, October 24, 2010

डिस्कलेमर: वयस्क मानसिकता वाले लोगों के लिए.....only for 18+.......सतीश पंचम

Disclaimer - यह पोस्ट वयस्कों के लिये नहीं, बल्कि वयस्क मानसिकता वाले लोगों के लिए है। जो लोग वयस्क होने के बावजूद अवयस्कता की चादर ओढ़े रहते हैं, अन्जान बनने का दिखावा करते हैं, ऐसे लोगों से निवेदन है कि कृपया इस पोस्ट को न पढ़ें।


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 - सुन बे.....अमरीकवा ने पकिसतनवा को हज्जारन करोड़न रूपिया दिया है ......एतना कि सौ गाँव तक रूपिया फइलाय के सुखाओ  तब भी एकसौ एकवां गाँव की जरूरत पडेगी   ......मुदा है बड़ा चालू .......बहिनचो एक ओर पाकिसतान को चुसनी चुसा रहा है .......औ दूजी ओर ओबामा को  भारत पठाय रहा है......साला चूतिया समझे है पबलि को ।

 - अरे पबलि चूतिया नहीं है ....अपनी नेताई चूतियागंज वाली है........बहिनचो....साफे साफ नहीं बोल सकते कि पाकिसतनवा को काहे चुसनी चुसाया ..........उ साला सब पइसा आतंकवादी बनाने में खरच करता है.....एके फोट्टी सेवन लेने में लगा रहता है......  लेकिन केहू को कहने का हिम्मते नहीं है।

- और कहेगा भी क्यों......अमरीका वाला राजा आ रहा है आखिर...........कौनो धन्नू और गन्नू नहीं न आ रहा है....देखे नहीं थे जब **'लत्ता बीनवा' बिल किंटनवा आया था तो कैसे संसद में नेता लोग उससे हाथ मिलाने खातिर गिर पड़ रहे थे एक दूसरे पर......औ हाथ मिलाने के बाद बाहर आके ससुरे बोल भी रहे थे .....हम बिल किंटवा से हाथ मिलाया हूं.....उसको छूआ हूँ............अरे जिस **'लत्ता बीनवा' मनई ने रासपति भौन में रहते हुए मोनिका लेहिसकी को छूआ छाआ था तो उसे तुम छू लिये तो कौन बड़कई.......ससुरे रहेंगे गुलाम के गुलाम ।

- लेकिन एक बात है......बिल किंटनवा अपने आप में लत्ता बीनवा हो या कुछ अउर हो.......लेकिन मीडिया के सामने मान लिया पट्ठा कि हां हम रिसता बनाये थे मोनिकवा से रासपति भौन में। 

- अरे मानता कैसे नहीं......ससुरा सब कुछ तो पा गया था रासपति भौन में रहकर......अब उसको कौन खाहिस बची थी.......स्वीकार करके सतवादी बना सो अलग.... इस्टार रिपोट नहीं पढ़े हो का...... बहिनचो जिसने भी रपट बनाया ..... एकदम खरे खर्ररररर.......।

- लेकिन एक बात है...... औबामा बहुत कुछ अपने गाँव का लगता है........वही रंग.....वही ढंग....कोट पैंट उतार के लुंगी बनियाइन पहिना दो ओबामवा को तो  लगेगा एकदम अपने गाँव का रामबहोरना.........देखे नहीं थे रामबहोरना को......अरे वही जो  डाक् साब के इहां कंपौडरी करता है.......साला कंपौडंरी भी मिलिटरी इस्टाइल.......एक गोली सुबह चाँप लेना.....दो गोली रात को लील लेना............एतना कड़क आवाज में तो डाक् साहबो नहीं बोलते।

- अरे वही रीत है......चाय से जियादे गरम पतीला ........डाक् साहब तो सहर में खोले हैं दवाईखाना......और रामबहोरना को रख छोड़े हैं गाँव में कि.......ले बचवा दवाखाना संभाल.....। वइसे रामबहोरना और ओबामवा में  एक ही दो डिपरेंस है ......रामबहोरना की  महतारी चउबेगंज की है तो ओबामवा की महतारी अमरीका गंज की। बस् यही डिफरेंस है.....काम धाम में तो दोनो एक समान ही हैं।

- लेकिन कैसे......रामबहोरना करता है कंपौंडरी.....औ औबामा करता है रासट्रपतई....दोनों में कौन जोड़।

- अरे कौनो डिफरेंस नही है दोनो में। रामबहोरना कंपौडर  भी ससुरा दवाई अईसा देता है कि लगता है लेमन चूस वाली चुसनी दिया है.....उसका दवा का कुछ फरकै नहीं पड़ता बदन पर। वो तो गाँव में कोई और बैद हकीम  नहीं है तो लोग मन मसोसकर उही के पास जाते हैं, दे दो जो देना हो। भला इसी बहाने मन सांत रहे कि हां दवा लिया है। 

- ठीक,  ओबामा भी तो पाकिसतनवा को चुसनी ही देता है, ले लो एक गोली सुबह चाँप लेना, दो गोली रात को लील लेना।  बहिनचो.....गोली खिया खिया कर पाकिसतान को आदत डलवा दिया है, रोज सबेरे जोगईराम की तरह पहुंच जाता है पाकिसतनवा...... डेरे पर......साहेब....बड़ा तबियत उड़न्त है....जी धकर धकर कर रहा है.....कौनो गोली होय तो दो। 

- जी धकर धकर नहीं करेगा जोगईया का.....ससुर गोली के नाम पर  देसी बियागरा जो पकड़ाय देता है.........रात भर ससुर पहलवानी करेगा......एके फोट्टी सेवन झोंकेगा और सुबहिये कहेगा...... साहेब जूड़ी धर लिया है........ तबियत नासाज है.....कौनो गोली होय तो दो.....।   

  - और रामबहोरना कंपाउंडर..... हंसते हुए चार लेमन चूस पकडाय देगा .....लो ....एक गोली सुबह चाँप लेना....दो गोली रात को लील लेना......पाकिस्तान को लत्ता बीनवा बनाने  का इससे अच्छा उपाय कोई नहीं है ।  
  
 -  सतीश पंचम

स्थान - वही, जहाँ पर ओबामा के आने की तैयारी के चलते गमले चमकाये जा रहे हैं। 

समय - वही, जब ओबामा भारत आएं और उन्हें रामबहोरना हाथ मिलाते हुए उनसे कहे - सर, सेम बिजनेस....मी एन यू.....कैन वी मर्ज....मेक मी बिजनेस पाटनर सर.....आई बिल हेल्प यू लाईक मिस्टर जोगई।

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**लत्ता बीनवा -  एक बहुत ही बुरी मन:स्थिति जिसमें एक पुरुष कामेच्छाओं से इतना अभिव्याप्त हो जाता है कि हमेशा स्त्रियों के अंतर्वस्त्रों और माहवारी के कपड़ों के बारे में सोचता है।

 **लत्ता बीनवा - A very bad mental condition of a person in which a person feels sexual desires to such an extent that even he is always in search of ladies undergarments and MC related clothes. 

 - शब्दकोश संदर्भ -   भदेस भाषा, पृ- 136, रहरिया प्रकाशन, दड़बागंज,  उत्तर प्रदेश

Monday, October 18, 2010

व्यंगात्मक लहजों से सनी चाशनी.......सोना लईजा रे.......सतीश पंचम

   सुप्रीम कोर्ट ने अभी हाल ही में एक फैसले के दौरान व्यंगात्मक लहज़े में कहा कि भ्रष्टाचार को आधिकारिक तौर पर सरकारों को मान्य कर देना चाहिए क्योंकि कोई भी सरकारी काम आजकल बिना भ्रष्ट गतिविधियां अपनाए नहीं हो पाता।

  बात भी सच है। भ्रष्टाचार का बोलबाला इस कदर है कि फ़र्क करना मुश्किल हो गया है कि किस कदम को इमानदार की संज्ञा दी जाय और किसे भ्रष्टाचार की। मसलन, बड़े बड़े मंदिरों में ही देखिए कि एक ओर कई कई घंटे आम भक्त लोग खड़े रहते हैं और तब जाकर उन्हें दर्शन मिल पाता है जबकि उसी मंदिर में  आधिकारिक तौर अलग से ज्यादा पैसा देकर रसीद सहित एक वी आई पी पास के जरिए तुरंत दर्शन मिल जाता है। अब इसे आप एक किस्म का भ्रष्टाचार मानें या न मानें यह आपके उपर है।

   दूसरी ओर रेल्वे में भी देखिए - एक तरह से तत्काल टिकट वाली व्यव्सथा भी कुछ इसी तरह की है। लोग तीन महीना पहले रिजर्वेशन करवाते हैं लेकिन फिर भी सही सही टिकट नहीं मिल पाता, कहीं वेटिंग है तो कही आर एसी तो कहीं NOT Available। जबकि यहीं रेल्वे खुद से ही अधिक पैसे लेकर उन्ही टिकटों को  तत्काल टिकट के रूप में देने को तैयार बैठी है। यह अलग बात है कि तत्काल के लेवैय्या भी अब बहुत  हैं और उसकी भी हालत सामान्य टिकट सी हो गई है।

     तो कहने का अर्थ यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने भले ही यह बात व्यंगात्मक लहज़े में अब जाकर कही हो, लेकिन सरकार और लोग उसे खुद ब खुद लागू करने को तत्पर हैं।

        इस मुद्दे को जब मैं लिख रहा हूँ तब मेरे जेहन में अचानक यह बात आई कि यार ये भ्रष्टाचारी होना भी कहीं एक तरह से मानव स्वभाव का हिस्सा तो नहीं है। कहीं यह भ्रष्टाचार का गुणसूत्र गहरे तो नहीं असर कर गया है ?

     इतिहास में झांकने पर  पाता हूँ कि तमाम राजे महाराजों के किस्से लूटमार और छिनैती से भरे पड़े हैं। विदेशियों ने भी भारत पर जब जब आक्रमण किये तो उन्होंने में लूट पाट और तमाम हथकंडे अपनाए इनमें चाहे हूण, कुषाण या अरब या जो भी रहे हों। सभी का मकसद लगभग एक ही था - लूटना और केवल लूटना।

        अभी कल शाम दशहरे में देखा कि रावण जलने के बाद कई लोग अधजली लकड़ियों को लूटने के लिए आपस में गुत्मगुत्था हो रहे थे। कोई चाहता था कि रावण के सिर के पास वाली लकड़ी मिले तो कोई चाहता था कि रावण के नाभि के पास वाली लकड़ी मिले।

     अपने स्कूल के मैदान में जलाये जाने वाले रावण के पुतले के अधजले हिस्से को मैंने भी बचपन में एक बार लूटा है। मेरी उम्र करीब दस-बारह साल की रही होगी।  उस समय किसी ने बताया था कि रावण की अधजली लकड़ियां घर में रखना अच्छा होता है। सो मैंने भी एक लकड़ी चुप्पे से निकाल ली। गरमा-गरम। घर पर ले गया तो डांट भी पड़ी - मरे मनई की हड्डी ले के क्यों आया ?

 नहाना पड़ा सो अलग :)

अश्मंतक
     इधर  देखता हूँ कि कई जगह रावण जलने के बाद लोग अश्मंतक के पत्ते आपस में एक दूसरे को बांटते हैं, यह कहते हुए कि-  सोना लो...सोना। जिसे दिया जाता है वह भी अपने पास से एक दो पत्ते अश्मंतक के तोड़ कर उसे देता है और गले मिलता है।  उम्र के हिसाब से आशीर्वाद भी लिया दिया जाता है।

   इस सोना बंटाई के बारे में थोड़ा बहुत जो मैंने पढ़ा है उसके अनुसार श्री राम के पूर्वज अयोध्या के रघु ने एक बार विश्वजीत यज्ञ किया। यज्ञ के बाद अपनी पूरी संपत्ति को दान कर वह एक पर्णकुटी  (पत्तो द्वारा निर्मित कुटिया) में रहने लगे। तभी वहां कौत्स आये। श्री कौत्स ने गुरुदक्षिणा हेतु १४ करोड सुवर्णमुद्राओंकी मांग की। तब रघु  ने कौत्स को 14 करोड़ स्वर्ण मुद्राएं देने हेतु  कुबेर पर आक्रमण करने की  ठानी।

   इस आसन्न युद्ध से घबराकर या कि आशंका से कुबेर जी ने  अश्मंतक  व शमी (श्वेत कीकर) के वृक्षोंपर सुवर्ण का वर्षाव किया। इतनी ढेर सारे स्वर्ण की वर्षा होने पर भी कौत्स ने केवल १४ करोड सुवर्णमुद्राएं ही लीं। शेष बते खुचे सुवर्ण को प्रजाजनों ने लूट लिया ।


  अब मेरे मन में यह प्रश्न आया कि यार श्री कौत्स ने ढेर सारी 14 करोड़ स्वर्ण मुद्राएं किस लिए मांगी। उन मुद्राओं का आखिर किया क्या होगा ?  और मान लो रघु को यदि यह 14 करोड़ स्वर्ण मुद्राएं देनी ही थी तो अपने पल्ले से दिए होते, उसके लिए उन्होंने कुबेर पर आक्रमण करने की क्यों ठानी ? दूसरे का माल लेकर दान देने में कौन बड़कई :)

   यही सब सवालों से जूझ रहा था कि तभी ध्यान जनता द्वारा की गई लूट पर गया। आखिर क्या सोच कर जनता ने उन स्वर्ण मुद्राओं को लूट लिया ? आखिर वह स्वर्ण मुद्राएं  गिराई तो कौत्स के लिए ही थीं,

फिर ?

  यानि जब सबने लूट ही लिया है तो आओ आपस में बांट कर उस लूट को वैलिडेट कर दें.....एक तरह से मान्य कर लें :)

     तो मित्रों, सुप्रीम कोर्ट का व्यंगात्मक फरमान जब लागू  होगा तब होगा.....अभी तो हम शांति से भ्रष्टाचार की देगची में पानी खौलाने को स्वतंत्र हैं, जब सरकारी रेट तय हो जायगा कि इस काम के इतने, उस काम के इतने तो देगची में मसाला डाल देंगे।

 अभी तो खौलाए जाओ.....खौलाए जाओ.....खून या पानी.........ये आप पर निर्भर  है  :)

- सतीश पंचम


( अश्मंतक का चित्र - साभार नेट से)

Saturday, October 16, 2010

मन की कुलाँच......गिलहरी सी फुदकन.....गजराज सी तरी.......लल्लन लंगोट.....और मैं.........सतीश पंचम

        घर से कुछ दूर स्थित  पहाड़ी वाला हनुमान जी का मंदिर…….  आलथी-पालथी मार कर हनुमान चालीसा पढ़ने की कोशिश कर रहा हूं…..संगमरमर की शीतलता मेरे टखने को सहला रही  है, मन ही मन कुछ चल रहा है..... थिरक रहा है......  ध्यान हनुमान चालीसा से उचटता जा रहा है ....…..आँख मूँद मन थिर करना चाहता हूँ लेकिन विचारों के थिर की बजाय   उनकी थिरकन बढ़ती जा रही है ....…  उंची पहाड़ी वाले मंदिर के इस शांत वातावरण में भी यदि मन थिर नहीं हो पा रहा तो जरूर कोई बात है.......उचट बयानी या कुछ और।

       आँखे खोल कर आस- पास ध्यान देता हूं……सामने एक भक्तों का जमघट है। तिलकधारी कथावाचक  रामायण बाँच रहे हैं….  ठेठऊ रामायण......ठेठ अंदाज में............रावणवा ने मंदोदरीया से कहा....सुन मंदोदरीया.....तैं हमसे ज्यादा चपड़ चूपड़ मत कहियो.....अबहीं हम अम्मर हैं.....राम के डर से सीता जी को लौटा दें तो हो गई लंकई।

  जियो कथावाचक जी...जियो।
 
     कथावाचक के आसपास बैठे लोग बहुत भक्ति भाव से कथा सुन रहे हैं। नो क्वेश्चन…..नो डाउटनेस्स…..सिर्फ सुनो.....'द  शून्यकाल ऑफ रिलिजियस पार्लियामेंट'........डिल्यूटेड विथ 'आस्थात्मक पिप्परमेंट'।

    मन फिर उचट रहा है।  मंदिर के शिल्प को निहारता हूं………कलात्मक स्तंभ…….. सुंदर आकर्षक शिल्पकारी…….. कहीं पेड़ पर बंदर उछल कूद रहे हैं……कहीं पर गिलहरी उचक कर जा चढ़ी है…..सूँढ़ में पानी भर गजराज जी जलीय फव्वारे से तरी ले रहे हैं तो वहीं बगल में  एक बंदरिया अपने बच्चे को पेट से सटाये हुए बैठी है.....रे मन..... यहां तो कोई उचट बयानी नहीं है, कुछ और....... ढूँढो पार्थ ढूँढो ।
  
  उद्विग्न मन: स्थिति में नज़र कंटीले तारों पर गई....... लाल लंगोट सूख रही है। किसकी है लंगोट...... जरूर यह लंगोट इन्हीं में से किसी की होगी। कथावाचक की….नहीं वो तो लंगोट के पक्के नहीं लगते……फिर किसकी.....उस छद्मी बाबा  के भक्त की……नहीं यार......गदहबेला का सोवइय्या लंगोट का पक्का हो सकता  है भला.......छोड़ो, जिसकी भी होगी, ले जायगा.... तुम क्यो लंगोट को ताक रहे हो..........वैसे भी इस मुन्नी बदनाम जमाने में भला इस  'लल्लन लंगोट' के बूते किन किनका ब्रहमचर्य सुरक्षित है......सूरमाओं की दबंगई तो बहुत पहले ही ढह गई है..... 'लल्लन लंगोट' तो 'आड़' है,  एक तिरपाल वाली घेरेबंदी..... ओट में जिसके  Work in  Progress चल रहा  हैं। 

 तभी नज़र पड़ी मंदिर के सूचना फलक पर …..ढेर सारे सुविचारों वाला बोर्ड…..….माता पिता की सेवा करना चाहिए…..….घर में तुलसी का पौधा रखना चाहिए……हर घर में एक गाय होनी चाहिए………..गाय….हर घर में……क्या ये संभव है…..उफ्...... कैसी तो लच्छेदार चिरौरी है …….हर घर में एक गाय होनी चाहिए, वो भी उस मुंबई जैसे  शहर में जहां के लोग TOPAZ ब्लेड सी धार लिए अपनी जिनगी को चाक करने के लिए अभिशप्त हैं….हुँह.....…..ये बातें.... ये सुविचार......पढ़ने के लिए ही है पार्थ......पढ़ लो.....खुश हो लो....संभव हो तो करो वरना आगे बढ़ो....... लेकिन चिन्ता नको।
  
        उधर एक और बोर्ड लगा है…….ढेर सारे निर्देशों के बीच लिखा है – यह मंदिर हनुमान जी का है, इसलिए महिलाओं से निवेदन है कि शारीरिक अशुद्धी की स्थिति में मंदिर न आएं।

  शारीरिक अशुद्धि......जेहन में एक पुराने कलीग मिस्टर शाह की यादें ताजा हो उठती है। मिस्टर शाह अपनी पत्नी के महीने के उन मुश्किल वाले दिनों में शारिरिक अशुद्धि के चलते खाना बनाने के लिए एक काम वाली बाई को बुलाते थे।  मिसेज शाह को शारीरिक अशुद्धियों के चलते  किचन से तब तक छुट्टी मिल जाती।

    स्ट्रिक्ट फॉलोअर ऑफ 'इज्म'.....द हिंदूइज्म.......।

  लेकिन इसकी क्या गारंटी कि जो महिला खाना बनाने के लिए आई है वह भी शारीरिक रूप से अशुद्ध नहीं है ?

महिला तो वो भी है।
  
  सुगन मन की टोह लेता शांत माहौल के बीच पक्षियों के कलरव को सुन रहा हूँ.....चिह चिह....चूँ ....चक्.... चिक्....चिह।  

     मन अब भी थिर नहीं हो रहा है..... अबकी मंदिर की उन्हीं दीवारों पर फिर से नज़र डालता हूँ.......ओह.....तो मेरा मन यहाँ  है....... कम्बख्त शिल्पकार ने मुझसे इजाजत तक नहीं ली , मन को मंदिर की इन दीवारों पर साकार ही तो कर दिया है उस चोरहे ने ......कभी गिलहरी जैसा उचक कर फुनगी पर जा बैठता है मन तो कभी बंदरों जैसा 'डालीबाज' हो उठता है......कभी योगी जैसा थिर, तो कभी हिरन जैसी कुलांच।

   क्या यही है मेरा मन.....। उछल कूद मचाता, भागता, कुलांचे भरता...गिरता पड़ता।  

उधर कथावाचक जी  कह  रहे हैं......रावनवा बहुत बलवान था... गियानी था.......लेकिन मन नहीं बान्ह पाया.....सीता खातिर बेकल हो उठा बाभन...... नहीं तो अब तक देवता उसे पूजते। 

रावण के मरते बखत राम जी लछिमन से बोले, जाओ लछिमन, रावण से गियान ले लो।

 लछिमन जी चक्कित.....भला इस रावणवा से कौन गियान लिया जा सकता है, जो सीता माता तक को हर लाया ?

 राम जी कहिन....अरे लछिमन,  रावण खातिर इतना मती सोचो.....वह बहुत गियानी है, प्रकाण्ड बिदबान है..... बस एक गलती कर बैठा .....अभिमानी होई गया.....मन को थिर नहीं कर पाया।

 जाओ जिनगी का गियान लो रावण से.....इसके पहले कि उसके प्राण पखेरू उड़ें।  

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  मैं  मंदिर की सीढ़ियाँ उतर रहा हूँ......बगल से पारिजात के फूलों ने हल्की सी सरग़ोशीयां  करते हुए कहा -  मन को थिर न करना पार्थ.....वरना 'जीते जी ही मृत' हो जाओगे... मन की थिरकन को यूं ही चलने दो.....लेने दो गजराज जैसी शीतल तरी.....उचकने दो फुनगीयों पर गिलहरी जैसे ..........होने दो हुड़दंगी वानर ....... भरने दो हिरनों जैसी कुलाँच......आखिर मन है..... कोई 'पाथर' तो नहीं।  

 - सतीश पंचम




(सभी चित्र मेरे घर से कुछ दूर एक पहाड़ पर बने हनुमान जी के मंदिर के हैं )

Tuesday, October 12, 2010

गुमसुम छेद वाली जुराब.....छइलाता बछड़ा......उटन्ग कपड़े..........सतीश पंचम

गर्म जलेबी और दूध के मिली जुली स्वाद वाली कुछ दुपहरिया  त्रिवेणीयाँ...........लिजिए झेलिए : )

(1)

जूते के घुप्प अंधेरे में गुमसुम   छेद वाली जुराब
शर्ट से बाहर झलकता पुन्नी बनियान वाला

पहली नौकरी का पहला दिन तो नहीं ?      


(2)

ठुँसी हुई बस में, कपड़ों की रगड़ भी अज़ब शै है    
उटन्ग से हुए तुम्हारे नायलोनी दुपट्टे की कसम।    

कपड़ो की स्टेटिक एनर्जी, जो न कराए !!


(3)

तुम्हारे मिज़ाज की पढ़ाई तो बहुत ही मुश्किल है    
कभी हां से तो कभी ना से ककहरे खुलते है

लगता है सभी मास्टर जान-पहचान कर रखे गये थे।


(4)

आज गईया ने फिर   से  दूध कम दिया
बछड़ा भी खेल- कूद कर छइलाया है        

शायद बछड़े ने ममता पी है........ चुप्पे से ।  

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     - सतीश पंचम

(चित्र : साभार नेट से)

Friday, October 8, 2010

बकरी का चुम्बन......कँटहरी बतियां ........और लौण्डियाबाजी की कला.........सतीश पंचम

       कभी-कभी लगता है कि कुछ ऐसा लिखा जाय कि मन कहे - हां आज तुम मेरी तरफ़ से चाय पीयो  :)

    लेकिन लिखूं भी तो क्या......कविताएं मुझे जल्दी समझ नहीं आती (सिवाय खाने पीने वाली कविताओं को छोड़ :-) , गद्य लिखने का मन नहीं हो रहा और फालतू  के व्यंगालापों  से मन बिदक रहा है।

 सो यूं ही बैठे बैठे कुछ अलहदा किसम की त्रिवेणीयां 'सरक-सुरूक कर' बन आई हैं। 

 लिजिए नोश फ़रमाइए -

(1)

गुँथे हुए गुड़हल के फूल, पीले पुंकेसरों के संग 
बहुत  जल्द    कुम्हला   जाते   हैं  न  देवता ?

चाय की प्याली में रख दूं , ताजगी आ जायगी ।













(2)

वो शोहदा लड़की को कबसे छेड़ रहा है
लड़की भी कबसे खुद को छेड़वाये जा रही है

कभी कभी बीमारियाँ अच्छी लगती है।

(3)

अबीर गुलाल सब खेल चुके हम दोनों
बच गया है ये  थोड़ा सा शीतल जल

आओ इसी को  आँच दे दें ।

(4)


लाल बत्ती पर गाड़ीयां कुछ नहीं रूकती 
कुछ की फ़ितरत है रूके रह जाने की



सुना है लौण्डियाबाजी भी एक कला है ।

(5)

वो करीमन की बकरी आज फिर चर गई
गुलाब की पत्तीयाँ फिर से कम हो गईं हैं

कांटों ने कहा, बकरी का चुंबन.......श्रीखंड जैसा।











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- सतीश पंचम

(चित्र: नेट से साभार)

Thursday, October 7, 2010

सकारात्मक चिलगोजई ऑफ फारेन बाबू .........सतीश पंचम

     आज ही एक खबर पढ़ा कि कॉमनवेल्थ के दौरान गेम्स विलेज के टॉयलेट कॉन्डम के इस्तेमाल के कारण ब्लॉक हो रहे हैं....चोक हुए जा रहे हैं। खबर है कि अक्षरधाम के पास बने खेलगांव में खिलाड़ी बड़ी तादाद में कॉन्डम का इस्तेमाल कर रहे हैं।


     मजे की बात तो यह रही कि राष्ट्रमंडल खेल महासंघ के प्रमुख माइक फेनेल ने इस पर कहा कि खिलाड़ी सुरक्षित सेक्स को बढावा दे रहे हैं। 'यदि टॉयलेट चोक अप होने जैसी घटनाएं हो रही हैं तो इससे साबित होता है कि कॉन्डम का इस्तेमाल हो रहा है और यह सकारात्मक बात है।'

    हम्म....यानि कि फेनेल महाशय के पास जरूर कोई दिव्य दृष्टि प्राप्त है, जरूर कोई कुकुरही नाक है जो वो चिलगोंजई वाली बातों में भी सकारात्मक बातें सूंघ लेते हैं।

     वैसे हम लोगों को तो पता ही नहीं था कि टॉयलेट का चोक हो जाना भी एक किस्म की सकारात्मक बात है। वरना अब तक तो जहां पूरा देश नकारात्मक बातों से ही हलकान था ऐसे माहौल में टायलेटों के ब्लॉक होने सरीखी कुछ सकारात्मक बातों से हम भी खुश हो लेते कि यार फिकर काहे करते हो....संजय नगर के सार्वजनिक शौचालय में सकारात्मक बात हो रही है...... सरोजिनी नगर.....हापुड़ गंज....गुड़हल गंज.....मीर गंज....हर जगह सकारात्मक बात ही बात है।

     उधर जीडीपी नीचे जा रही है.....फिकर नहीं.....गेहूं सड़ रहा है....फिकर नहीं......महंगाई बढ़ रही है.....फिकर नहीं.....क्योंकि हमारे पास सकारात्मक बातों के लिए पूरा का पूरा चोक अप तंत्र है यार। प्रधानमंत्री जी कैबिनेट मिटिंग में जब देश की नकारात्मक खबरों पर चिंता जताएंगे तो तुरंत हमारे टॉयलेट मंत्री जी अपनी रिपोर्ट कार्ड पेश कर देंगे और देखते ही देखते प्रधानमंत्री जी की नकारत्मकता आधारित चिंता, सकारात्मक बातों में बदल जाएगी।

     मुझे लगता है फेनेल महाशय को भारत के किसी झुग्गी इलाके में ले जाकर ऐसे समय वहां छोड़ देना चाहिए जब कि उन्हें जोर की लगी हो और उसी समय माइक लिए पत्रकारों को पूछना चाहिए कि बताइये फेनेल महाशय....कैसा लग रहा है....कोई सकारात्मक बात दिखी। तब शायद फेनेल महाशय का जवाब हो कि - आज मुझे समझ आ गया कि भारत की सत्तर प्रतिशत जनता खुले में शौच क्यों जाती है। लगता है आप लोगों के यहां सकारात्मकता का माहौल कुछ ज्यादा ही है :)


- सतीश पंचम

Saturday, October 2, 2010

पीपली लाइव के एक दृश्य से मेल खाता ताजा अदालती फैसला .........मुलैमा टेर.......वामपंथी मुंडे़र.......भजपइया कजरी.........सतीश पंचम

    
अपनी ढपली - अपना राग
   पीपली लाइव का एक दृश्य है जिसमें नत्था द्वारा  आत्महत्या कर लेने की धमकी के बाद सरकारी अधिकारी उसे फुसलाने के लिए एक लालबहादुर देता है…..लालबहादुर यानि कि  हैंडपंप। साथ ही हैंडपंप देते हुए नत्था को ताकीद करता है कि अब तुम आत्महत्या नहीं कर सकते क्योंकि तुम्हें लालबहादुर दिया गया है।  

      नत्था अवाक्…क्या कहे। पूछने पर कि हैंडपंप तो दे दिया…. अब उसे गाड़ने का खर्चा भी दो तो सरकारी अधिकारी कहता है – अरे कहां तो तू मरने वाला था…..शास्त्री जी ने तुझे बचा लिया…. खर्चे की बात करता है ?

     ठीक वही पीपली लाइव जैसे हालात रामजन्मभूमि के बारे में आए अदालती फैसले के बाद से है। अदालत ने जनता को अपना फैसला तो सुना दिया है लेकिन अब जनता को कहीं से लग रहा है कि यह तो न्याय नहीं हुआ बल्कि एक लालबहादुर पकड़ा कर फुसलाना  हुआ। उधर अदालत शायद मन ही मन कह रही हो…….अरे कहां तो तुम लोग मरने-मारने वाले थे। इस जजमेंट ने तुम्हें बचा लिया।  सुप्रीम कोर्ट भी तो है...जो कमी बेसी हो वहां निपटा लेना। न्याय की बात करते हो ?
 
     लेकिन अदालत का फैसला जो आया सो आया….इसको लेकर राजनेताओं की प्रतिक्रियाएं बड़ी दिलचस्प रहीं। वामपंथी अपनी बात को अदालती नु्क्ताचीनी के जरिए प्वाईंट दर प्वाइंट बता रहे है कि किस क्लॉज से क्या मतलब निकलता है…..किस पैराग्राफ से क्या कहना चाहती है अदालत। कहां मुसलमानों के हित वाली लाइनें हैं और कौन सा फुल स्टॉप हिंदुओं तक जाकर लग रहा है। यह सब बौद्धिक कवायद ज्यादातर वामपंथीयों के खेमें में हो रही है।
 
     उनकी कवायद देखकर ‘काशी का अस्सी’ में वर्णित डॉ. गया सिंह की याद आती है जिनके बारे में ख्यात था कि वह बेहद विद्वान और बौद्धिक किस्म के इंसान हैं, बैहद तीक्ष्ण बुद्धि वाले। इनकी बौद्धिकता के आतंक का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि लोग कहते हैं जब कभी डॉ. गया सिंह नौकरी के लिए दिए साक्षात्कार में छंटे हैं तो अपने बौद्धिक आतंक के कारण। अपनी मूर्खताओं से छंट जाने वाले और लोग होंगे।
 
    भारतीय राजनीति में मुझे वामपंथी ठीक उन्हीं डॉ. गया सिंह की तरह के बौद्धिक प्रतीत होते हैं जो कि भारतीय लोकतंत्र में बेचारे छंट जा रहे है केवल अपनी बौद्धिक आतंक के कारण।
  
      खैर, अदालती फैसले की बेहद तीव्र प्रतिक्रिया हुई है भारतीय राजनीति के मौलाना श्री मुलायम सिंह यादव पर। अचानक ही अदालती फैसला उन्हें नागवार और मुसलमानों के हित के विरूद्ध लगने लगा और तुरंत ही चिल्लाने लगे- ये ठीक नहीं है…..सही नहीं हुआ है। उनका चिल्लाना सुनकर यूं लगा मानों कह रहे हों…..उठो सुबह हो गई…….सुबह हो गई।

     आवाज सुनकर आसपास के लोग जो सोए थे जग गये और घड़ी की ओर देखते बोले – ए महाराज, अभी आधी रात को ही मत चिल्लाओ….. अभी सुप्रीम  कोर्ट बाकी है  भैं…भैं चिल्ला रहे हो।  सो जाओ चुप मार के।

सोओ यार।

    वहीं एक अलग किस्म की प्रतिक्रिया मायावती जी पर हुई है। अदालती फैसले से पहले और बाद तक इनकी प्रतिक्रियाएं चालू ही रहीं। वह कह रहीं थीं कि हमने सुरक्षा बल और ज्यादा संख्या में मांगे थे लेकिन मिले बहुत कम।  अगर कहीं कोई गलत सलत बात हुई तो पूरी जिम्मेदारी केनदर सरकार पर होगी।
 
       वहीं अगले ही पल जब अदालत ने जमीन के बारे में फैसला सुना दिया तो कह रहीं हैं कि अब अदालत ने जबकि फैसला दे दिया है तो अयोध्या की केन्द्र द्वारा अधिग्रहीत जमीन पर जो केन्द्रीय बल लगा है उसे वह नियंत्रित करे और उसे लागू करे……..उस जमीन की जिम्मेदारी केनदर सरकार की है न कि हमारी।

      उनकी प्रतिक्रिया देखते हुए ऐसा लग रहा है मानों कि मायावती जी के घर के आंगन में केन्द्र की कोई  पेड़ की टहनी आ गई है। मायावती जी जब चाहती हैं अपने घर के आंगन में आए उस केन्द्रीय पेड़ वाली टहनी की छाया में सुस्ता लेती हैं….छहां लेती हैं और साथ ही साथ पेड़ के मालिक केन्द्र सरकार को ताकीद भी करते जाती हैं कि देखो डाल पतली है…… उसे और छायादार और फलदार बनाओ नहीं तो  कल को आँधी पानी आने पर अगर तुम्हारी टहनी टूट गई तो सारी जिम्मेदारी तुम्हारी। तब मुझे जिम्मेदार न ठहराना। बात बता दूं साफ।
 
      इसके अलावा एक और किस्म की प्रतिक्रिया देखने को मिली भाजपाइयों पर। फैसला आते ही उनके चेहरे खिल गए। हर कोई एक दूसरे को जीत की बधाई दे रहा था मानों कहना चाह रहा हो – देखो, मैं न कहता था कि जीत हमारी ही होगी…..देख लो…..खुदैं अपनी आँख से देख लो।

कुछ के चेहरे तो ऐसे चहक रहे थे....मन ही मन ऐसे फुदक रहे थे  मानों अंदर ही अंदर.....  मदर इंडिया का गीत चल रहा हो  -

  दुख भरे दिन बीते रे भइया….अब सुख आयो रे......रंग जीवन में नया लायो रे ..

       और कांग्रेस……..उसे तो पहले सूझा ही नहीं कि वह क्या प्रतिक्रिया दे। हिंदुओं की जीत को दर्शाता फैसला  आ जाने से सारा माहौल हिंदूमय था ........ऐसे में हमेशा से मुसलमानों के पक्ष में रहने वाली काँग्रेस…….मुसलमानों को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करते रहने वाली कांग्रेस के मुँह से बोल नहीं फूट रहा था।
   मुसलमान नेता हैरान..... कि यार काग्रेस क्यों नहीं कुछ बोल रही है। प्रतिक्रिया क्यों नहीं दे रही....कहां हैं राहुल...कहां हैं सोनिया......?

 शायद ऐसे ही किसी परिस्थिति के लिए वह नज़्म लिखी गई थी कि –

वो जो मिलते  थे  हमसे कभी  दीवानों  की  तरह,
आज मिलते हैं ऐसे - जैसे पहचान न थी  कभी।

       थोड़ी बहुत शुरूवाती हिचक और सोच-सोचौवल के बाद गुणीजन श्री चिदम्बरम महाराज के बोल सुनाई पड़े कि अभी सुप्रीम कोर्ट का फैसला आना बाकी है।  चिंतित न हों। प्रधानमंत्री जी के मुखारविंद से भी कुछ इसी तरह के मिलते जुलते बोल सुनाई पड़े।
 
   ले देकर यह 'ग्रेट इंडियन पॉलिटीकल ड्रामा' किसी तरह सम पर आया। अब देखिए आगे आगे क्या होता है।

   अरे, वो कौन बोल रहा है माइक लेकर- ओह…..तो  ओबम्मा चच्चा जी हैं……वह भी प्रतिक्रिया देना चाहते हैं….दो भई….दो………जिसके जो मन में आए दो…..अपन चले…..इतना फालतू का टाइम नहीं है कि तुम्हारी प्रतिक्रियाओं पर जां निसार करें ओबामा चच्चा  :)

- सतीश पंचम

स्थान – वही, जहां पर लेटे-लेटे अपनी दुपहरीया की नींद खराब कर यह पोस्ट लिख रहा हूं।

समय – वही, जब पोस्ट पब्लिश करने जाउं और श्रीमती जी कहें – अजी, सुनते हो……. ओबामा जी का कहि रहे हैं ? तनिक सुनिए तो !! 

Friday, October 1, 2010

ब्लॉगर परिचय.....श्री गोपाल एम एस ........बेहतरीन तस्वीरें.......बेहतरीन नज़रिया..............सतीश पंचम

       दुनिया में ऐसे बहुत कम लोग होते हैं जिनके नाम की बजाय उनके काम को देख कर लोग उसकी ओर अनायास ही खिंच जाते हैं। मुझे कुछ-कुछ ऐसा ही प्रतीत हुआ श्री गोपाल एम एस के द्वारा खिंचे गए चित्रों को देख कर। उनके ब्लॉग पर जाते ही खिंची गई तस्वीरों को देख कर अंदाजा लगाया जा सकता है कि बंदे में कितनी क्रिएटिविटी है और कैसा नज़रिया है।

   कुछ चित्र तो इतने अनोखे अंदाज में लिए गए हैं कि एक बस देखते ही बनते है।

        उदाहरण के तौर पर मुंबई के आरे कालोनी को श्री गोपाल ने अपने कैमरे से इस अंदाज में तस्वीरबद्ध किया है कि देखकर लगता है मानों कोई वर्षा वन को दर्शाती कोई पेंटिंग है.....याकि कोई रूमानियत की चादर ओढ़े कोई सुनहरी सी सुबह। इस तस्वीर के बारे में जब मैंने उनसे पूछा तो उन्होंने बताया कि गोरेगांव में स्थित उनके ऑफिस की तेरहवीं मंजिल से यह तस्वीर तब ली गई जब उन्हें सर्दियों की एक सुबह जल्दी ऑफिस आना पड़ गया था।
Goregaon ( Aarey Milk Colony)

        अभी इस आकर्षक चित्र को देख ही रहा था कि बगल में ही हरियाली को ढंकते....कुम्हलाते हुए एक निर्माण कार्य की तस्वीर दिखी जिसे देख कर अंदाजा हो जाता है कि रिहायशी जरूरतें और स्थान की कमी ने पर्यावरण को किस स्तर तक नुकसान पहुंचाना शुरू किया है। पर्यावरण के नज़रिए से दोनों तस्वीरें एक साथ देखने पर हरियाली और विकास की बौड़म तस्वीर स्पष्ट तौर पर दिखती है।



       श्री गोपाल के ब्लॉग को और खंगालने पर एक जगह अंधेरे में खिंची गई लाल बोगेनवेलिया के झुरमुटों की बेहद आकर्षक तस्वीर नज़र आई। इसके बारे में पूछने पर उन्होंने बताया कि वाशी-मानखुर्द इलाके से गुजरते समय रास्ते के किनारे लगे बोगनवेलिया के झुरमुटों की फोटो रात में खिंची थी और जिस टैक्सी में बैठे थे उसके पीछे आ रही कार की रोशनी का इस्तेमाल किया था।

Mr. Gopal M S
     उनके ब्लॉग की चर्चा मैं पहले भी एक बार अपने सफ़ेद घर ब्लॉग में कर चुका हूँ जिसका कि नाम है Mumbai Paused. अपने Panasonic Lumix LX3 के साथ खड़े श्री गोपाल M S के बारे में जब मैंने और जानकारी जुटाना चाहा तो 36 वर्षीय श्री गोपाल ने बताया कि वह बेसिकली बेंगलोर से हैं और अब मुंबई रहते हैं। एक एडवर्टाईजिंग कंपनी में Copywriter का काम करते हुए शौकिया फोटोग्राफी करते हैं।


    चैट के दौरान ही नज़र दौड़ाने पर मुझे एक ऐसी तस्वीर दिखी जिसमें कि बारिश में जमा हुए पानी में उभरे अक्स को कैद किया गया था। बेहद आकर्षक इस तस्वीर को खिंचने की तकनीक रोमांचित कर गई। कहीं पर समुद्र किनारे एक चौखटे में सुस्ताते टैक्सी ड्राईवर की तस्वीर है तो कहीं पर फाइव स्टार होटल के किचन शेफ की एक आधे खुले दरवाजे में खड़ी ब्लैक-वाइट तस्वीर। कहीं मुंबई का शेयर बाजार भगवान शंकर से उंचा है तो कहीं वनदेवी की तस्वीर, कहीं रजनीकांत-अमिताभ-मिथुन की तिकड़ी वाली मंदिरनुमा आकृति है तो कहीं कुछ।

    इन सभी चित्रों के बारे में आप उनके ब्लॉग Mumbai Paused पर जाकर बेहतर जान सकते हैं। फिलहाल मैं उनकी कुछ चुनिंदा तस्वीरें यहां पेश कर रहा हूँ।


    उम्मीद है हिंदी के ब्लॉगर जो कि अक्सर अंग्रेजी भाषा के ब्लॉगों पर जाने से परहेज करते हैं, इस तस्वीरों वाले ब्लॉग पर जाने में परहेजगी नहीं बरतेंगे ...क्योंकि तस्वीरों की भाषा प्रांत,सीमा या भौगोलिक क्षेत्र में बंधी न होकर अपने आप में एक यूनिवर्सल भाषा है।

      मैं श्री गोपाल को उनकी रचनात्मकता हेतु बधाई देता हूँ और उम्मीद करता हूँ कि आगे भी इसी तरह के सुंदर-सुंदर चित्र हमें दिखाते रहेंगे।


 - सतीश पंचम







आलोक.......

अहा रात्रि......

फिल्मात्मक त्रिदेव


शांत घंटीयां


पानी र पानी तेरा रंग कैसा......

पंख होते तो उड़ आती रे........

कैमरे की धौंस......हुँह

इस्माईल प्लीज

ये दुनिया रंग बिरंगी यारा

कॉमनवेल्थ के बाउजी

कपड़ कतार

वनदेवी

ओह......

कोपचा

'पड़ोसावाली'

शंकर और शेयर

क्षितिज प्रेमी 



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The End
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source : Mumbai Paused

प्रस्तुति - सतीश पंचम


फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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