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Wednesday, September 29, 2010

चकचोन्हर बालम....दुपहरीया कचहरी....मादलेन बबुनी...... पान खाए मुन्नी जरूर मिलना साढ़े तीन बजे.... .........सतीश पंचम

       बस में बैठा हूँ......  मोबाइल एफ एम से गाने सुनते हुए नज़रें खिड़की के बाहर  .......फिज़ा में अयोध्यात्मक धुंधलका फैला है...... …मन ही मन सोच रहा हूं.......उस अँधे कुँए की तलहटी किस युग तक गई होगी ......द्वापर....त्रेता....कलि.....या फिर वर्तमान सतयुग ही उस अँधे कुएं की तलहटी है.......साठ साल के अदालती उजाले से जी नहीं भरा प्यारे.......देखना चाहोगे सतयुग ईरा...... वो देखो कहीं बसों की खिड़कियों पर जाली बंधी है...... कहीं पुलिस की वैन खड़ी है........ कहीं राजनीतिक पार्टीयों के बैनर ........हर एक में पासपोर्ट साइज फोटो से लेकर लार्जर देन लाइफ वाले मुखड़े......जिन्हें देखते ही भय होता है.......इनके घर वाले इनको कैसे झेलते होंगे........कही कोई अदनी सी अपील कर रहा है शांति बनाए रखें......कोई भर भर के मार्मिक अपील कर रहा है......तो कोई धकधका कर अपील उड़ेल रहा है ....लेकिन अपील जरूर कर रहा है .........शांति की अपील.....अमन की अपील...... लेकिन किससे......जनता से.....पब्लिक से.......अरे.....जनता तो पहले ही शांत है बे...... उससे अपील क्या करना....लफड़ा करने वाले तुम लोग.....छूरी चाकू वाले तुम लोग...... औ अपील जनता से...... जा घोड़ा के सार लोग।   

       एक बैनर बोल रहा है.....हिन्दु-मुसलिम-सिक्ख-इसा.....आपस में सब भाई-भाई.....अच्छा....तो भाई होने से आपस में लड़ाई नहीं होती ......ओ अंबानीया........पढ़ा कि नहीं रे.....सर्व शिक्षा अभियान.....सब पढ़ो...सब बढ़ो............भाई भाई में कौन लड़ाई............अच्छा छोड़ो..... मत पढ़ो..... गाना सुनो एफएम वाला .....बीड़ी जलइले जिगर से पिया.....जिगर मां बड़ी आग है.....जियो रे जिगर......साला जिगर न हुआ कंपनी का बाइलर हो गया........फक फका कर जलता है।
      
     उ छुटभैया बैनर कहता है जब Diwali में Ali है और Ramzan में Ram तो क्यों लड़े हिन्दु और क्यों लड़ें मुसलमान.....धुत् सारे ......अब रोमनवा में लिख लिख कर पब्लिक को बताएगा कि देखो इसमें ए है तो उसमें उ है..... इही को कहते हैं चोरकटई चाह। अरे जहां मन चंगा तो काहे का दंगा और तुम आए हो कहने इसमें अली है औ उसमें वली है.........हटाओ अपना बैनरहा बुद्धि .....साला फ्लैक्स की तरह बुद्धि भी फ्लैक्स वाली हो गई है तुम लोगन की......
     
      औह.......रह रह कर जेहन में ‘इनभर्सिटी’ के प्रोफेसर काशीनाथ सिंह की लिखी ‘काशी का अस्सी’ पन्ने दर पन्ने फड़फड़ा रही है – ‘परलै राम कुक्कुर के पाले....खींच खांच के लै जाएं खाले’ ......... अब जाकर पता चल रहा है कि इहका मतलब.............अशोक पांड़े जी कहिन बजरिए काशी का अस्सी............ कहां तो भगवान राम की महिमा.......और कहां तो राजनीतिक कुकुरबाजी.....ससुरों ने ले जाकर राम जी को भी मोकदिमा-मोहर्रिरी में घसीट लिया।
    
     बताया है काशीनाथ सिंहवा ने लिखते हुए कि काशी के अस्सी घाट पर रहने वाले शास्त्री की दुविधा ........ मकान को किराए पर देना है इसाई महिला मादलेन को.....लेकिन कैसे दें...... एक तो इसाई.....औ दूजे महिला..... लेकिन मोह ए किराया बड़ा भारी...... लागी छूटे नाहीं रमवा............मन मारकर तैयार हुए.........आखिर समझाने वाले कन्नी गुरू ...... समस्या आई अटैच बाथरूम की......मादलेन को अटैच बाथरूम चाहिए....करने कुरने के लिए............
    
   तब  बोले कन्नी गुरू.......औ जम के बोले...... शास्त्री जी आप का गोत्र मेरे गोत्र से नीचे है.....मेरा गोत्र आपके गोत्र से उंचा है........ मैं बता रहा हूँ ..... वही मानिए ...... टाइलेट के लिए वही कमरा दे दो.... थोड़ा फेरबदल करने से अटैच टाइलेट बन जाय तो क्या हरज ।
    
  अरे वो कमरा....... उहां तो महादेव जी हैं....रास्ते में आते जाते लोग फूल माला भी चढ़ाते हैं महादेव जी पर.........कैसे उसे स्थान को टाइलेट में बदल दूं.......लेकिन जब समझाने वाले कन्नी गुरू..... तो जाता कहां है रे......अरे महादेव जी कोई रामलला हैं जो एक जगह जम गए तो जम गए.....अरे महादेव जी ठहरे नंदी बैल वाले हैं....आज इहां....तो कल उहां.....वो कौनो एक जगह टिकने वाले थोड़ी हैं......और आप हो कि महादेव जी को कैद करके कुठुली में रखे हो.....पाप....घोर पाप..... दे दो कमरा मादलेन को....बना दो टाइलेट....और......देखते देखते घर के आगे बालू.....इंट....गिरने लगी......टाइलेट जरूरी..........किराया जरूरी.......जय हो प्रभू तार लिया..........ओ काशीनाथ.....आरे वही कासिनाथ राजेस ब्रदर के सामने पेपर बिछा कर लाई रख के एक झउआ मिरचा बूकता था.....ओही कासीनाथ.................जियो रे इनभर्सिटीया बुद्धि .....का लिक्खा है........जय हो मादलेन...... जय हो कन्नी गुरू.......जय हो दालमंडी.....दालमंडी बूझते हो न कि उहो में फइल......

    लेकिन है बतिया वही........... कि राम रहें कि महजिद ..........औ फिर उन चकचोन्हर पार्टी लोगन का क्या.....किस पर लड़ेंगे.....किस पर लड़वाएंगे ........मु्द्दा खतम......ए नेताइन......कल ......कचहरी लग रही है...........फैसला हुई जाई.....आज से नेताई वाला खरचा पानी बन्न......कहां से खिलाएंगे लइका बच्चा.......कहां से फीस उस भरेंगे..............कचहरीया बालम छिटकाने वाले हैं. ..... इल्लो.... गुलजार बीड़ी सुलगाय दिए हैं...... जलाते हुए FM पर बोल रहे हैं..........इक दिन कचहरी लगाय लियो रे....बोलाय लियो रे ....दुपहरी...............का हो पांड़े........मुकदिमा का फैसला कब है........अरे उहै आर....कहा है न कि....... पान खाए मुन्नी जरूर मिलना...... साढ़े तीन बजे....... मुन्नी जरूर मिलना .........साढ़े तीन बजे......... चलो जो भी होगा..... फइसला मनबै के परी......बकि सुपरीम कोरटो त है बाद में........
    
     धुत्त सारे......तूम ठीक दुपहरीया की पैदाइस हो.........जौन होगा इहीं होगा कि तुम और सुपरीम कोरट को बीच में ला रहे हो.......एकरे बाद सब बवाल फवाल बंद........... का कहते हो यादौ जी......बोलो जोर से ...........बिरिन्दाबन बिहारी लाल की जय......राम लला की जै.......भईया राम राम..... जय सिरी राम....... गुड आफ्टरनून.......... अबे साले तुम अब जैरमी करना भी छोड़ि दोगे क्या .................बोलो आँख मून्न......गुड आफ्टर नून्न.

- सतीश पंचम

स्थान - अयोध्या से पन्नरह सौ किलोमीटर दूर।

समय - वही, जब साठ साल पुराने अँधे कुँएं मे झांकते समय आँखों पर चोन्हा मारने लगे।

(इस शब्द कोलाज़ का आधार काशीनाथ सिंह की लिखी 'काशी का अस्सी' और गुलज़ार की 'बीडी़ जलइले' है.....बेहतर परिणाम हेतु काशी का अस्सी जरूर पढ़े.....दिमाग के सारे तंतु खिल उठेंगे :)

Saturday, September 25, 2010

झगड़ही टंटही बारात .........हदर बदर करती मोटर साईकिलें........खड़खड़ाते पत्तल...... छुछुआती ललक......हत्त तेरे की.....धत्त तेरे की...... ...सतीश पंचम

   
    अक्सर शादी विवाह में झगड़ा टंटा होना लगा ही रहता है। कभी किसी बात पर तो कभी किसी बात पर। और जहां तक मुँह फूलौअल की बात है तो वह तो जैसे एक जरूरी रस्म की तरह है। जिस शादी-विवाह में मुंह फूला-फूली न हुई तो वह भला विवाह काहे का……फिर तो वह मरनी करनी जैसा ही कोई कार्यक्रम की तरह हो जायगा……… केवल करीबी ही  रोएगा-कलपेगा…..बाकी सब शांत…… सब कोई चुप……. ।


         यही वजह है कि  विवाह-समारोह आदि के मौके पर नाराजगी-फूलौअल  हेन तेन सब प्रकरण एक तरह से कार्यक्रम में जान डालने के लिए ही होते हैं।  कभी दूल्हे का जीजा नाराज हो जाएगा कि  हमारी ओर कोई तवज्जो नहीं दे रहा है तो कभी दूल्हे का चचा……कहां लाकर लड़के को बियाह दिए हैं भाई साहेब……और कोई रिश्ता नहीं बचा था जो यहीं उबड़ खाबड़ आंगन वाला घर मिला…….. …कम्बख्तों को इतना भी खयाल नहीं कि दरवाजे पर जहां मंडप बंधा है कम से कम वहां की जमीन तो समतल करवा दिए होते……..कुरसी पर बैठो तो एक पाया ढुकुर-ढुकुर हिलता है…….डगडगाता है…….  बराती लोग के लिए कुरसी लाकर रख दें…….मूड़ी कटवाय दीये हैं…और कुछ नहीं।
  
         ऐसे लोगों की बातों को सुनने पर लगता है कि जैसे इनके घर के बाहर का आंगन…….बैठका आदि सब बिलियर्डस के टेबल की तरह सपाट है …….कहीं उंच खाल नहीं………  कोई त्रुटि नहीं……..न खड्डा….. न खुड्डी।  और जहां तक तवज्जो न दिए जाने वाली बात से नाराज  जिजउ की बात है तो ………उन जैसे लोगों की  नाराजगी देखकर मेरे मन में आता है कि पट्ठे के बदन में बिजली का बल्ब फिट करवा देना चाहिए ठीक वैसे ही जैसे कि याराना फिल्म में अमिताभ बच्चन के बदन पर छोटे छोटे बिजली के बल्ब फिट थे। सब को पता चल जायगा कि यह कोई खास बाराती है इसका विशेष ख्याल किया जाना चाहिए। बार बार उससे पूछा जाएगा कि जीजा जी पानी पिया कि नहीं……खाना खाया कि नहीं……..कुर्सी पाया कि नहीं।
 
        कुछ और सुविधा के लिए यह भी किया जा सकता है कि हर एक बाराती के इम्पोर्टेंस के हिसाब  से अलग अलग रंग का बल्ब उनके बदन में लगा दिया जाय । जीजा हैं तो लाल रंग की बत्तीयां । चचा है तो हरे रंग की बत्ती…….मामा है तो पीले रंग की बत्ती।   हो सकता है कि समय बीतने के साथ लोग कलर को भी सामान्य बातचीत में शामिल कर लें और उससे जोड़ते हुए कहें –   क्या यार……ममेरे रंग की शर्ट पहने हो………तुम्हारे पास कोई चाचा रंग का जीन्स हो तो बताना दो दिन के लिए चहिए…….हो सकता है ऑफिस में लोग कहें कि – कल जीजा डे है सो सब लोग जीजा रंग की ड्रेस पहन कर आएं। इसी तरह महिलाएं भी आपसी बातचीत में कहेंगी – मेरे पास तो देवर रंग की चार चार साड़ी है लेकिन ननद रंग की एक भी नहीं। कोई कहेगी कि मेरी जीजा रंग की साड़ी पर फॉल लगवाने को दिया था अब तक नहीं आई……तो कोई कहेगी  भौजाई रंग की ब्लाउज मैच नहीं कर रहा।

      खैर, ये सब तो हुई विवाह में तवज्जो…..फवज्जो और नाराजगी वगैरह को लेकर मेरी ओर से रंग-रंगीली बातें।

       लेकिन मित्रो आज मुझे मेरे गाँव के ही एक  शख्स श्री एबीसीडी यादव जी की नाराजगी याद आ रही है। एबीसीडी नाम इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि कल को मेरे गाँव देस के लोग मुझपर किसी का नाम लेकर बदनामी करने की तोहमत न लगाएं। हां तो बात हो रही है श्री एबीसीडी यादवजी की………… स्वभाव से श्री एबीसीडी यादवजी एकदम लंठ……….. कब क्या कर बैठें कोई नहीं जानता। पास बैठ कर धीरे धीरे बतियाते हुए कब इनकी आवाज का डेसिबल कर्कशावस्था को छू दे किसी को अंदाजा नहीं।

        तो हुआ यह कि कई साल पहले  श्री एबीसीडी यादवजी के घर में एक लड़की की शादी पड़ी थी। तब,  बारात एक रात रूकने के बाद अगले दिन शाम ढलने के बाद ही खिचड़ी आदि की रस्म पूरा करते हुए वापस लोटती थी। सुना तो मैंने यह भी है कि पहले बड़हार होता था। बारात किसी के यहां जाने पर दस-दस दिन तक रूकती थी और पूरा गाँव उस बड़हार को सकुशल निभा ले जाता था। अब तो रात में बारात रूकी…..न्योता हकारी हुई…..भोजन ओजन के बाद ज्यादातर बाराती रात ही में अपनी-अपनी मोटर साइकिल से हड़र हड़र करते हुए रवाना हो जाते हैं। और घर पहुंच कर तान के सोते है।

      तो ऐसे ही पुन्ना जमाना था और विवाह के बाद का अगला दिन था। रात में तो बाराती कम ही थे लेकिन सुबह होते होते और बाराती जुटने शुरू हो गए। संभवत:  लगन का मौसम था और बाराती हर ओर रात में ही अपने अपने हिसाब से बारात करने हेतु  बंट चुके थे…..कोई किसी के बारात में गया था तो कोई किसी के……..और उसी दौरान रात में ही आसपास की किसी बारात में झगड़ा टंटा हुआ था ,गोली वगैरह चली थी।   गाँवों में अक्सर हर कोई एक दूसरे की चिन्ह-पहचान से रिश्तेदारी में आता है और इसी चिन्ह-पहचान के चलते  सुबह होते न होते वही झगड़ैले बाराती लौटते हुए इस बारात में आन मिले।

           तब साइकिल से चलने का रिवाज था और ज्यादातर बाराती या तो शाम हो जाने पर रवाना होते थे या एकदम सुबह सुबह ताकि ठंडे ठंडे पहुंच जांय।  लेकिन मौजूदा हालात ऐसा हो गया कि  श्री एबीसीडी यादव जी के यहां निर्धारित बाराती संख्या से दुगुनी-तिगुनी संख्या  दोपहर होते होते जा पहुंची। कोई किसी को ना नहीं कह सकता था। सब एक दूसरे को जानते मानते भी थे।

      लेकिन दूसरे बारात का झगड़ा टंटा श्री एबीसीडी यादवजी अपने सिर क्यों मोल लें। अब इतने बारातीयों को संभालने का माद्दा भी तो होना चाहिए। गाँव वाले भी परेशान कि यार अब क्या किया जाय। रसद तो इफरात है लेकिन कड़ाह चढ़ाना और फिर फिर  भोजन बनाना बड़ा मुश्किल है। मुसहरों के यहां से तय संख्या में ही पत्तल मंगाया गया था……..कुल्हड़ भी कहांरो के यहां से निर्धारित संख्या में ही मिल पाए थे…… शादी ब्याह के मौसम और तेज लगन के चलते और ज्यादा पत्तल और कुल्हड़ मिलना मुश्किल था। तब फाईबर वाले प्लेट और प्लास्टिक की गिलासों का चलन नहीं था।

     तब श्री एबीसीडी यादव जी ने तुरंत ही अपनी लंठई बुद्धि लगाई। घर में जाकर हंडा फंडा जो कुछ दहेज वगैरह में देने को रखा था उठा पठाकर फेंकने फांकने लगे। जो गेहूं चावल बोरे में रखा था यहां वहां छींट छांट दिए। लोग हां हां कर धरौअल लगे कि अरे क्या हो गया…..क्या हो गया। लेकिन श्री एबीसीडी यादव जी बोलें तब न। वह तो अपनी तोड़ फोड़ जारी रखे थे। साथ ही बड़बड़ाते जा रहे थे कि मेरे भाइयों ने मेरा सिर झुका दिया….. मैंने कहा था कि सात सौ बारती के लायक खाना बनवाओ……लेकिन नहीं…..ये लोग मेरी बदनामी करवाना चाहते थे तभी तीन सौ के लिए जान बूझकर खाना बनाए………बाकी के चार सौ लोग क्या भूखे रहेंगे। मैं यह सब बरदाश्त नहीं करूंगा।
 
     यही सब श्री एबीसीडी जी बोलते जाते और उठा उठा कर कुल्हड़ फुल्हड हंडा फंडा सब फेंकते जाते। एक तो हंडा वगैरह फेंकने से वैसे ही तेज आवाजा होता है। वही ज्यादा उठाकर पटक रहे थे। बारात में हड़कंप। अब क्या हो। अगुआ को बुलाया गया। लड़के के बाप-ददा को बुलाया गया। सब कोई दंग।

    मजे कि बात तो यह कि लड़के वाले एकदम सहम गए थे…….उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक माहौल कैसे खराब हो गया। लोगों ने तब बताया कि ये ऐसे ही हैं……सनक जाते हैं तो फिर किसी को कुछ नहीं समझते। अब गुस्सा इस बात पर हो रहे हैं कि हम लोगों ने जान बूझकर कम खाना बनाया। जान बूझकर कम पत्तल और कुल्हड़ मंगाए।
 
    बताइए…..आप ही लोग सोचिए कि भला हम अपने गाँव की इज्ज्त इस तरह जान बूझकर बिगड़ने देंगे।
 लड़के वाले भी क्या कहें। वह लोग तो अब तक इस बात पर खुश थे कि ज्यादा बाराती आने से उनका रौब दाब बढ़ा है। लोग जानने मानने लगेंगे कि अरे फलां कि बारात में इतने ज्यादा लोग पहुंचे थे। लेकिन यहां तो मामला भिण्डी हो गया है।

 हो- होवा कर लड़के वालों ने ही प्रस्ताव रखा कि एबीसीडी यादव जी आप चिंता न करें। हम लोग मात्र लड़की की विदाई करने भर से खुश हैं। स्वागत सत्कार की क्या बात…..मोहब्बत बड़ी चीज है।

       अंत में हुआ यह कि जो कुछ मजबूरी में कच्चा पक्का बना…..खिला-पिलाकर बारातीयों को रवाना किया गया। जल्दी के लिए पत्तलों के बदले कुछ केले के पत्ते काट लाए गए…..कुछ लोग कुल्हड़ पाए…..कुछ नहीं पाए……….कुछ लोग हाथ से ही चुल्लू बनाकर पानी पी लिए।
 ले देकर अंत में सब रवाना हुए।
   
      लेकिन मित्रो, आज फिर मुझे फिर से श्री एबीसीडी यादव जी की याद आ रही है। वजह है कामनवेल्थ खेल। यहां भी एक गांव है खेल गाँव। ढेरों बाराती आ रहे हैं लेकिन कुल्हड़-पत्तलों  का अब तक  इंतजाम नहीं हो पाया है। फिर उनके रहने ठहरने की तो बात ही क्या।  अब तक तैयारी चल ही रही है। लोगों के हाथ पांन फूले है कि कैसे होगा यह सब।

     हमारे प्रधानमंत्री जी अब जाकर श्री एबीसीडी यादव जी की तरह बिहेव कर रहे हैं। कभी गिल पर बरस रहे हैं तो कभी कलमाडी़ को बैठक में शामिल नहीं कर रहे हैं। और मीडिया है कि हंडे के गिरने पटकने की तरह तेज आवाज में कह रहा है वो देखिए फुटओवर ब्रिज गिर गया है….वो देखिए सीलिंग गिर गई है। अब क्या होगा…..कैसे होगा। कुछ समझ नहीं आ रहा।

     उधर कामनवेल्थ फेडरेशन के अध्यक्ष माइक फेनेल जी खुश थे कि बहुत देशों से लोग आ रहे हैं….खेल गाँव में बहुत लोग शामिल हो रहे हैं। ज्यादा लोगों के शामिल होने से  उनका रौब दाब बढ़ेगा लेकिन यहां की तैयारीयों को देखते हुए अब उन्हें महसूस हो रहा है कि पूरा  मामला तो भिण्डी हो गया है। कहीं पानी बरस रहा है…..कहीं यमुना बढ़ी हुई हैं तो कहीं मलवा अब तक नहीं हटाया गया है।
  
      लेदेकर अब जाकर फेनेल जी का बयान आया है कि हम कामनवेल्थ की तैयारीयों को ठीकठाक मानते हैं। और शायद मन ही मन कह भी रहे हों -  स्वागत सत्कार और तैयारीयों की क्या बात……. खेल बड़ी चीज है।

     हो सकता है कि कामनवेल्थ की कमनीयता के चलते किसी को रहने का ठिकाना मिले….किसी को न मिले…..कोई टेंट में रहे……कोई बेटेंट रहे।

   आखिर …….स्वागत सत्कार की क्या बात……  मोहब्बत बड़ी चीज है यारो  :)

- सतीश पंचम


Note -   मेरी पिछली पोस्टों के बाद आप लोगों में से  कई पाठकों के मेल आ रहे थे कि पाठकों को कुछ तो कहने का मौका दिजिए....बार बार मेल करने की मुसीबत क्यों......क्या यह एक किस्म की क्रूरता नहीं है ?  कुछ ऐसी ही बातें अरविंद जी ने भी अपनी पोस्टों के माध्यम से कही थीं और अब आप लोग व्यक्तिगत मेल के जरिए कहे जा रहे हैं।


     औसतन आप लोगों के पांच-छह  मेल मेरी कोई नई पोस्ट लगने के चौबीस घंटे के भीतर  तक आते हैं। चूँकि मेल व्यक्तिगत तौर पर आते हैं इसलिए उनका जवाब देना एक तरह से बाध्यकारी भी हो जाता है। 


   यहां मैंने अनुभव किया कि  टिप्पणी चालू रखने पर जवाब देने की बाध्यता नहीं रहती थी जबकि इस तरह से मेल आने पर जवाब देना पड़ता है जो कि पाठक और मेरे हम दोनों के  लिए एक तरह की दुविधा वाली और असहज स्थिति है। 


     बहरहाल, यही सब ध्यान में रखते हुए आज से मैंने http://hindiblogjagat.blogspot.com की तर्ज पर एक चैट बॉक्स प्रयोग के तौर पर साइड बार में लगाने का विचार किया ताकि पाठकों को यदि कुछ कहना हो तो उनके लिए कुछ सुविधाजनक स्थिति  रहे। 


- सतीश पंचम

Wednesday, September 22, 2010

एक बढ़िया ब्लॉग है - Mumbai Paused.......जिसकी तस्वीरें मंत्रमुग्ध सी कर देती हैं........सतीश पंचम

     हाल ही में एक ब्लॉग mumbai paused का पता चला जिसमें बहुत ही सुंदर सुंदर चित्र दिखाई पड़े। ब्लॉगर ने अपना नाम कुछ सलोगन मुरूगन रखा है। ज्यादा कुछ तो मैं उनके ब्लॉग से उनके बारे में नहीं जान पाया लेकिन चित्रों के सुंदर पॉज और उनके विविधता के कारण इस ब्लॉग पर नजर जरूर दौड़ाई जा सकती है ।


 



















स्त्रोत : http://mumbaipaused.blogspot.com

प्रस्तुति - सतीश पंचम

स्थान - वही, जहां के ये चित्र हैं।

समय - वही, जो आपकी घड़ी बता रही हो :)

Sunday, September 19, 2010

ठेंगावली फॉर भेड़चाल..... कतार कथा..........जॉन एण्ड बिप्स...... चिल्ल यार........ सतीश पंचम

      यूँ तो मैं भीड़ भाड़ वाले पूजा स्थानों से अक्सर दूर ही रहता हूँ…..न जाने क्यों ऐसे स्थल मुझे ‘आडंबर के सुसज्जित किले’ से  लगते हैं। लोगों का हूजूम देखादेखी भक्ति वाला प्रतीत होता है……’मैंने इसे पूजा…..मेरा भला हुआ…..अब तूम भी पूजो…..भला होगा’  वाली मानसिकता से रचे पगे स्थल। मैं मन ही मन ऐसे पूजा स्थलों से एक किस्म की दूरी बना लेता हूँ।  लोग जब मंगलवार के दिन किसी विशेष भगवान को पूजते हैं तो मैं मंगलवार की बजाय किसी और दिन उसे पूजता हूँ……बस यूंही….. ऐसी ही होती है मेरे ओर से 'भेड़चाल को ठेंगावली' :)
  
       लेकिन आज मुंबई के एक खास गणेश ‘लालबाग के राजा’ के दर्शन करने गया।  राजा…… यहां हर इलाके के अपने अपने गणेश राजा हैं।  कोई गणेश अंधेरी का राजा है, कोई माटुंगा का राजा है तो कोई कहीं किसी गली का ही। पर भगवान गणेश जी एक ही हैं…….भक्तों ने उन्हें टाइटल देकर एक खास इलाके से बाँध दिया है। यह मेरे गणेश वह तेरे गणेश। अपनी अपनी भक्ति अपना अपना प्यार।
 
     वैसे मैं बचपन में भी एक दो बार लालबाग के राजा के दर्शन कर आया हूँ…..अभी दो साल पहले अकेले भी गया था दर्शन करने लेकिन इस बार श्रीमती जी की जिद के चलते जाना पड़ा। लाख समझाया कि पहले की बात और थी……तब इतनी भीड़ नहीं होती थी…..अब बहुत कुछ भीड़ मीडिया के चलते भी बढ़ गई है……अपनी ओर से सब बहाने बना दिए लेकिन श्रीमती जी मानें तब न…।  जिद तो जिद।
  
    आसपास  होने वाली चर्चाएं -  मैं तो लाल बाग के दर्शन कर आई…..मुझे तो सात घंटे लगे दर्शन करने में……इतनी लंबी लाइन थी……वगैरह वगैरह जब बारंबार सुनाई पड़े तो ऐसे स्थान पर जाने की इच्छा होना लाजिमी है।

   सो, निकल पड़ा। लालबाग पहुंचते ही पता चला कि दर्शन के लिए कतार रानीबाग ( एक चिड़ियाघर) से शुरू है। वहीं जाकर खड़ा होना होगा। मैं मन ही मन भुनभुनाया……रानीबाग से लालबाग तक कतार लगी है मतलब खूब भीड़ भड़क्का है। श्रीमती जी को अब भी बरगलाया कि यार कतार बहुत लंबी है, टीवी पर बता भी रहे थे कि लोग बीस-बीस घंटे तक कतार में खड़े रहते हैं…..इतना देर मैं तो खड़ा नहीं रहूंगा। चलो दूसरे गणेश पंडाल गणेश गल्ली चलते हैं। वहां के भी गणेश जी काफी बड़े आकार के हैं और पंडाल वगैरह  काफी दर्शनीय हैं।  लेकिन नहीं।  श्रीमती जी को लालबाग के राजा को ही देखना है।

       इतने में कुछ लोग नंगे पैर आते दिखे……बदहवासी उनके चेहरे से टपक रही थी। उनसे मैंने चलते चलते ही पूछा – आप लोगों को कितना समय लगा दर्शन करने में। उन्होंने मासूमियत से कहा – नहीं हो सका दर्शन। बहुत भीड़ है। हम लोग कल फिर आएंगे।

    बस फिर क्या था, मुझे तो मौका मिल गया। श्रीमती जी से फिर ललकारते हुए कहा – देखा…..लोग वापस जा रहे हैं….दर्शन करके। और तुम हो कि लालबाग के दर्शन करने को उतावली हो। श्रीमती जी भी मायूस हो चलीं। बात ही ऐसी थी। लोगों का इस तरह से बिना दर्शन किए लौटना वाकई हिम्मत तोड़ने वाला काम था। मैं मन ही मन खुश था कि चलो इसी बहाने बाकी के गणेश पंडालों के दर्शन कर लेंगे वरना तो दस बारह घंटे यहीं खपने थे।

       तभी श्रीमती जी ने कहा कि चलो अपन एक बार कतार में खड़े तो हो जांय…..देखते हैं जब ज्यादा देर लगे तो निकल आएंगे। अब मैं  समझ गया कि खतरा अभी भी टला नहीं है। कतार में लगना ही है। मन मारकर कतार में जा लगा। कतार भी कैसी…..एकदम मेज स्टाइल की जिग जैग जूप। एक ही जगह पर बल्लियों के बने रास्तों पर चलते रहो…..घूमते रहो। यदि आपने शिर्डी संस्थान के यहां की कतार देखे हों तो समझ सकते हैं कि एक ही हॉल में कैसे घूमते रहने का खेल खेला जाता है। पहले उत्तर से दक्खिन चलो…फिर दक्खिन से उत्तर चलो… रूको मत। चलते रहो।
    
       नाक भौं सिकोड़ते हुए मैं चल पड़ा रानीबाग वाली कतार में। मन ही मन सोच भी रहा था कि न जाने हमारे इस तरह से एक ही जगह पर उत्तर – दक्खिन चलते रहने वाले हमारे क्रियाकलाप को देख चिड़ियाघर के जानवर हम लोगों के बारे में क्या सोच रहे होंगे।  रानीबाग वाली कतार से बाहर आए तो कतार आगे किसी और इलाके की ओर बढ़ चली। बीच बीच में कतार कई जगह खाली रखी जाती थी ताकि सड़क के आर पार जाने आने में गाड़ियों को बराबर रास्ता मिलता रहे।

        और जब भी इस तरह के खाली स्थान आ जाते तो अगले से जुड़ने के चक्कर में कई लोग दौड़ लगाते कि कोई बीच में न आ जाए। मजबूरन मुझे भी दौड़ लगानी पड़ी। हंसी आती थी कि यार ये क्या है बेवकूफी……दर्शन करने के लिए दौड़ो।
     
       आगे जाकर कई जगह कतार सुस्त भी पड़ जाती। आधा- पौना घंटा एक ही जगह पर। ऐसे में आसपास खड़े लोगों की बातें सुनने में मजा आता है। बगल में ही कॉलेज के छोरा छोरी ग्रुप था। कोई नील नितिन मुकेश पर बतिया रहा था तो कोई जॉन-बिप्स के बारे में गपिया रहा था। उनकी बातें भी इस तरह की होतीं मानों वह नील नितिन मुकेश, जॉन बिपाशा से रोज ही मिलते रहते हैं। फलां एक्टर  ने शादी करने में जल्दी की………But he had extra marrital affair yaar………Bips is looking cool yaar……….
  
       मैंने नजरें उठा कर उन लोगों की तरफ देखा  तो गहरा मेकअप…..स्नो लाइन……मस्कारा……. टीमटाम वाले कई चेहरे नज़र आए। शायद चेहरे पर गुलाबी रंगत के लिए कुछ और भी लगाया गया था, पर मुझे पता नहीं कि क्या कहते हैं उसे। एक तो महिलाओं के मेकअप फेकअप के बारे में वैसे भी मैं इंटरेस्ट नहीं लेता।  कुछ महिलाएं सितारों वाली चमचमाती साड़ी और गहरा सिंदूर लगाए आईं थी। कुछ लड़के थे जो ऐसी जीन्स पहने थे मानों अब गिरी की तब गिरी।
   
     कतार काफी अंदर तक गई थी और जैसे ही कालाचौकी इलाके की ओर मुड़ी सामने ही कई बंद मिलों के खंडहर दिखने लगे। यूं तो पहले भी इन खंडहरों को देख चुका हूं लेकिन  आज फुर्सत से देख रहा था। कतार में लगे लगे  करना ही क्या था। सो मिलो के काई लगे दिवारों को निहार रहा था।  दीवारों पर बनी नक्काशियों और उनके सुंदर सुंदर दृश्यों की वजह से अब मेरा भी मन रमने लगा।
 
      तभी कतार एक ऐसी बंद मिल के बगल से गुजरी जिसकी दीवारों का इस्तेमाल एक नंबर के लिए होता था। बदबू की वजह से नाक फटने लगी लेकिन कतार थी कि हिलने का नाम न ले रही थी। काफी देर बाद जब आगे बढ़ी भी तो एक और हॉल मिला जिसमें कि केवल चलने का काम था। उत्तर की ओर चलो, फिर दक्खिन की तरफ चलो। भीड़ बहुत ज्यादा थी और मैं उकता कर वापस जाने की सोच रहा था कि श्रीमती जी ने आग्रह किया जब इतना आ गए हैं तो थोड़ा और सही। मन मार कर लगा रहा। उधर कई कई लोग कतार के बल्लियों के बीच से निकल कर शॉर्टकट मारते हुए आगे बढ़ते। एक दो लोग चिल्लाते फिर चुप। ऐसा ही चलता रहा। उसी हॉल में करीब दो घंटे निकल गए केवल चलने वाला काम करते हुए। पैरों की तो हालत खराब।
  
        इसी बीच ज्यादा लोगों के होने से गर्मी होने लगी। खड़े खड़े भी पसीना आ जाता। लोग पकने लगे। एक दो लोगों पर बेहोशी छा गई। किसी ने पानी वानी पिला-पुलू कर उन्हें रास्ता दिया। उधर आयोजकों की ओर से बराबर अनाउन्समेंट किया जा रहा था कि शांति बनाए रखें।  मैं अब एकदम आपे से बाहर होने को था। कतार से निकल कर वापस जाने को था…… इस तरह के दर्शन से तो अच्छा है दर्शन न करना। श्रीमती जी मेरी मन:स्थिति को समझ रहीं थी और चुपचाप सहमीं सी खड़ीं थी।
    
        लेकिन पता नहीं क्या सोच कर मैं चुप था। एक तो शनिवार के दिन श्रीमती जी का उपवास भी था और आज जल्दी जल्दी में केवल चाय पीकर ही वह आ गईं थीं दर्शन करने। मैंने सोचा वहां पहुंच कर कुछ पेट पूजा करवा दूंगा लेकिन यहां तो दर्शन करने के चक्कर में बिना नाश्ता किए ही वह लाइन में खड़ी रहीं। रास्ते में कई जगह वड़ा पाव वगैरह के स्टॉल थे लेकिन उनके बनाने के स्थान और बाकी सब चीजें देख मन ही न होता कि खाया जाय। शायद यही सब सोचकर मैं चुप रह गया होउं।
  
         उधर कतार में उन लड़कियों पर नजर पड़ी जो सुबह खूब सज धज कर आईं थी दर्शन करने लेकिन अब तो गर्मी से उनका बुरा हाल था। मसकारा-फसकारा तो कब का छूट चुका था। लिपस्टिक-फिपस्टिक…..औडर पौडर सब पसीने की भेंट चढ़ गए थे।

        यह देख मुझे अचानक ही गाईड फिल्म का वह दृश्य याद आ गया जिसमें  एक साधू बनकर देवानंद बारिश करवाने के लिए उपवास रखते हैं और उनकी ख्याति सुन  शांति की तलाश में गहनों से लदी-फदी वहीदा रहमान उसी साधू यानि राजू गाईड से मिलने जाती है और अपने सभी गहने एक-एक कर उतारते चली जाती हैं।
 
         मैंने मोबाइल में समय चेक किया…..अब तक कतार में लगे लगे साढ़े चार घंटे हो गए थे। किसी तरह उस हॉल से बाहर को कतार हुई और फिर कहीं जाकर अगले आधे घंटे में भीड़-भाड़ के बीच लालबाग के राजा के दर्शन हुए। वह भी केवल कुछ क्षणों के लिए……ज्यादा समय खड़े नहीं होने दिया जाता। इस बीच कुछ वीआईपी लोग भी थे शायद जिनके लिए अलग से लाइन की जरूरत नहीं थी।
 
         पांच घंटे खड़े रहने के बाद बस पकड़ने की हिम्मत नहीं थी, सो दर्शन करने के बाद किसी तरह टैक्सी पकड़ जल्दी जल्दी घर आया। भोजन पानी करने के बाद बिस्तर पर पड़ते ही पैरो में नसों का खिंचाव महसूस किया। हरारत तो थी ही।

     एकाध टिकिया खाने और झण्डू बिरादरी का बाम लगा-ओगा कर थोड़ देर सोया और अब जाकर टाईम पास करते हुए ये पोस्ट लिख रहा हूँ  :)

- सतीश पंचम


स्थान – वही, जहां पर आज पांच घंटे की मैराथन लाइन लगाकर आया हूँ।

समय – वही, जब रानीबाग (चिड़ियाघर) के अहाते में हजारों लोगों की लाइन उत्तर दक्खिन होती हुई एक ही जगह आड़ी तिरछी चल रही हो और चिड़ियाघर के भीतर बैठा बंदर सोच रहा हो……इसमें कोई शक नहीं……हम लोग ही इंसानों के पूर्वज हैं।


Note : पोस्ट पढ़ने के बाद गहन अनूभूति वाली गिरिजेश जी की इस पोस्ट को जरूर पढ़ें ।

 

(सभी चित्र - नेट से साभार)

Saturday, September 11, 2010

थोड़ा खाओ थोड़ा फेंको.............चाय प्रणाली ऑफ कल्लू..............सतीश पंचम

       मेरे घर में चाय अब तक एक देसी पतीले में ही बनती थी। वही देसी पतीला जिसे कि अक्सर टोप कहा जाता है। आम घरों में अक्सर इस तरह के टोप को बहुतायत में इस्तेमाल होते देखा होगा आपने। माँजने-धोने में भी आसान, रखने वखने में भी कोई दिक्कत नहीं। एकदम धड़ल्ले से इस्तेमाल किजिए....चाहे पटकिए-पुटुकिए......कहीं थोड़ा बहुत पिचक-पुचुक जाय तो अलग बात है वरना तो न जाने कितने बार ये टोप बिरादरी के बर्तन गिरते पड़ते रहते हैं, लेकिन मजाल है जो आग पर चढ़ने से इन्कार कर दें। 

     लेकिन हाल ही में एक बर्तन वाली दुकान में चाय बनाने में इस्तेमाल होने वाला बर्तन देखा तो लगा कि इसे ले लेना चाहिए।  उसमें लगा हैंडल कुछ खास आकर्षक लगा क्योंकि अक्सर टोप में चाय बनाते समय पकड़ का इस्तेमाल करना पड़ता था फिर इसमें तो लगा - लगान हैंडल। न पकड़ ढूँढने की झंझट न जलने गिरने का डर। एक जगह किनारे पर एक तिकोना सा मुहाना भी दिया गया था, ताकि उड़ेलते समय चाय बटुर कर इसी मुहाने से गिरे। 

  इस नये नवेले बर्तन को देख अचानक ही मुझे अपने देसी पतीले में खामीयां ही खामियां नजर आने लगीं।    वह अचानक ही उन्नीस लगने लगा।  नया बर्तन टोप के मुकाबले बीस ही नहीं इक्कीस लगा। सो खरीद लिया गया। कीमत लगी साढ़े पाँच सौ रूपए, आखिर टेफ्लॉन कोटेड भी तो था।  

    यूं तो मेरे घर में और भी दो चार और बर्तन हैं टेफ्लोन कोटेड, लेकिन इसका काला रंग और हैंडल वाला बांकपन कुछ ज्यादा ही भा गया और मैंने मजाक-मजाक में इसका नामकरण करते हुए इसका नाम कल्लू  रख दिया।  लेकिन मित्रों इस कल्लू के बड़े नखरे थे। साथ में आए इंस्ट्र्क्शन मैन्युअल में लिखा था कि हमारा कल्लू चूँकि टेफ्लॉन कोटेड है तो इसे खुरदरे पदार्थ से न मांजें और स्टील या लोहे की कड़छी की बजाय लकड़ी के चलावन का उपयोग करें। 

  मैने कहा चलो, नये किसम का बर्तन है तो नया टीम टाम भी होगा, यह भी सही। कल्लू को First time use सेरिमनी के चलते (Teflon coating के कारण) तेल की परत लगा उसे गर्म किया गया और फिर धो धा कर आग पर चढ़ा दिया गया। बड़े मन से श्रीमती जी ने कल्लू के भीतर पानी रखा, शक्कर डाला, चाय पत्ती डाली, दूध डाला और चाय तैयार किया। 

     अक्सर मेरे यहां चाय को पतीले से सीधे ग्लास या कप में चाय छानी जाती है, बीच में केटली-फेटली का टीमटाम नहीं होता। सो जब हैंडल पकड़ कर चाय छानी जाने लगी तो देखा कि तिकोने मुहाने से चाय गिर तो रही है लेकिन थोड़ी चाय कप में जा रही है और थोड़ी बाहर। मैने कहा, ये क्या चक्कर है। श्रीमती जी को परे हटा मैंने खुद से चाय को छानने की कोशिश की, लेकिन इस बार भी वही हाल। थोड़ी चाय तो कप में गिर रही है, बाकी चाय कप के बाहर। उधर किचन का प्लेटफॉर्म चाय के गिरने से खराब ही हो चुका था।

    अब मैंने ध्यान दिया तो पता चला कि बर्तन के उपरी डिजाइन में थोड़ा बदलाव लग रहा है। उपरी किनारों में कहीं भी टोप की तरह बाहर को निकला हुआ फैलाव नहीं था। टोप में बर्तन का उपरी हिस्सा उपर जाकर बाहर की ओर फैल जाता है जबकि  कल्लू की सीधी खड़ी दीवारें थीं और एक कोने पर तिकोना सा मुहाना।  बस....इससे ज्यादा कुछ नहीं था। वह मुहाना भी केवल एक मन बहलाने का बहाना भर था। वहां से चाय बटुरती कम थी धड़ल्ले से  अदबदाकर गिरती ज्यादा थी। अब लगने लगा कि कल्लू जितना सीधा दिख रहा है, उससे ज्यादा टेढा है। 

   होता यह था कि जब चाय उड़ेली जाती तब गिलास या कप के आकार के हिसाब से बर्तन को धीरे धीरे तिरछा किया जाता था और उसी क्रम में चाय का धीरे धीरे गिरता हुआ अंश बर्तन का पेंदा पकड़ लेता था और पेंदे को पकड़े पकड़े निचले हिस्से से गिरना शुरू कर देता था। जबकि टोप से चाय उड़ेलते समय जो भी चाय गिरती थी वह गिरते वक्त टोप के मुहाने पर फैल भले जाती थी लेकिन टोप के बाहर को निकले हुए उभारों के कारण बटुर कर गिरती एक ही धार से थी। सो पतीले से चाय गिराते वक्त समूची चाय छोटे से कप में बिना इधर उधर गिरे समा जाती थी। लेकिन इस कल्लू की खड़ी दीवारों ने तो अजीब मुश्किल खड़ी कर दी। अब क्या हो। बर्तन वापिस भी नहीं किया जा सकता था, इस्तेमाल हो चुका था। 

      एक तो पैसा भी ज्यादा लग गया....उपर से बर्तन की कार्यप्रणाली भी अजीब सी.....। एकाध बार तो लगा कि यह बर्तन एकदम अमरीकन अभिजात्य वर्ग की तरह का है। सुना है कि वहां भी जितना खाया जाता है उतना ही वेस्ट किया जाता है। रह रह कर मुझे  'जाने भी दो यारो' फिल्म के मोटू कमिश्नर की याद हो आई जो ....थोड़ा खाओ....थोड़ा फेंको.....वाली कार्यप्रणाली अपनाता है। थोड़ा केक खाता है...थोड़ा खिड़की की तरफ बाहर फेंकता जाता है। 

 सो मन मार कर तरह तरह के प्रयोग किये गये। कप में तेजी से चाय उड़ेली गई लेकिन फिर भी कप की कैपेसिटी के हिसाब से थोड़ी ही चाय उड़ेली जा सकती थी।  एक तरीका यह हो सकता था कि बड़े मुहाने वाले बर्तन में पहले पूरी चाय एक साथ उड़ेल दी जाय और फिर हर एक कप में चाय सर्व की जाय लेकिन यह सब करने का मतलब था कि एक और बर्तन गंदा करना, जबकि यही काम पहले टोप से डायरेक्ट कप में चाय उड़ेल कर किया जाता था और उसमें मध्यस्थ के रूप में चौड़े मुंह वाला एक्स्ट्रा बर्तन भी नहीं लगता था।

 फिर एक दिन बाहर देखा चाय वाले के यहां, उसके यहां यही बर्तन था लेकिन एल्यूमिनियम का। वह पूरी चाय एक साथ उसी हैंडल वाले बर्तन में बनाकर एक टोप में छानता था और फिर सर्व करता था। बीच-बीच में कोई ग्राहक जल्दी मचाए तो एक लंबे हैंडल वाले कपनुमा बर्तन को उसमें डुबोकर चाय सर्व करता था। उस चायवाले के हैंडल वाले बर्तन और उससे जुड़ी कार्यप्रणाली को देख इतना जरूर समझ गया कि कल्लू के बिरादरी वाले बर्तनों की यह खासियत है कि बिना एक दो बर्तन और चँहटियाये...गंदा करे इस कल्लू का standard procedure पूरा नहीं होता।  

       नतीजतन इसका सरल उपाय खोजना शुरू किया गया ताकि अलग से चौड़े मुंह वाला बर्तन या केटली न फंसाना पड़े और काफी हद तक कामचलाउ उपाय ढूँढ भी लिया गया।  

    चूँकि कल्लू से कप में उड़ेलते वक्त थोड़ी चाय उसके मुहाने से गिरते हुए थोडी उसके बाहरी  दीवार को पकड़ कर पेंदे की ओर से गिरती थी, सो सभी कप एक के बाद एक सटा कर लाइन से रखे जाते और सबसे आगे वाले कप में जब चाय उड़ेली जाती तब थोड़ी चाय उससे सटा कर रखे गये पिछले कप में भी गिरती  और यही क्रम चलाते हुए अंत में मेरी फेवरेट प्लेट रखी जाती (मैं वैसे भी कप की बजाय प्लेट में चाय पीना पसंद करता हूँ  :- ) 

   सो इस तरह से चाय सर्व होने में किचन का प्लेटफॉर्म गंदा होने से बच जाता है। मुसीबत तब होती है जब घर का केवल एक सदस्य चाय पी रहा हो और ऐसे में दो कप तो सटा कर नहीं रखे जा सकते, इसलिए अंत में वहां कोई कटोरी रखी जाती है जिसमें गिरने वाली चाय पुन: कल्लू में उड़ेल दी जाती है।

  लेकिन इस सारी कवायद से इतना जरूर समझ आ गई कि जो जितना सीधा दिखता है असल में वह उतना ही टेढ़ा भी हो सकता है and vice versa  :-) 

( चाय छानने जैसी अदनही बात पर भी पोस्ट बन सकती है ये आज जाना :-)


  नोट - साथीगणों से एक बात कहना चाहूंगा कि मैं अब से टिप्पणियों को अपनी पोस्टों पर अलाउ नहीं कर रहा हूँ..... इसकी वजह है -  पोस्ट करने के बाद टिप्पणियों की आवाजाही से मेरा ध्यान बंटना......... यूं तो टिप्पणियों के आने न आने पर अब उतना नहीं सोचता.... अब फर्क भी नहीं पड़ता    (पहले जरूर पड़ता था  :-) ..... लेकिन यदाकदा अब भी कभी-कभार अपने रूटीन वर्क के दौरान ही बीच बीच में मोबाइल आदि पर टिप्पणियां चेक करता था जो कि एक तरह से डिस्टर्बेंस की तरह लग रहा है । 
  
 सो मित्रों.... बतौर स्वांत-सुखाय लेखन,  मुझे यही बेहतर तरीका लग रहा है कि - 
 पोस्ट लिखो और भूल जाओ....... शायद महाभारत काल में ब्लॉगिंग होती तो यही कहा जाता  :-)
      
     एक बात और......  'Buzz'.....वहां डिस्टर्बेंस जैसा फील नहीं होता इसलिए Buzz पर status quo बनाये रखा है :-)
     
     वैसे, अपनी पोस्टों पर डिस्टर्ब नहीं होना चाहता तो इसका मतलब यह नहीं कि आप लोगों को डिस्टर्ब न करूंगा। आप लोगों की पोस्टों पर मेरी ओर से जैसा बन पड़े, जब बन पड़े कमेंट होता रहेगा ......जब तक कि आप लोग स्वंय मेरे द्वारा डिस्टर्ब होने को तैयार बैठे हों :)  

- सतीश पंचम

(सभी चित्र नेट से साभार)

Tuesday, September 7, 2010

'वाहियात्मक खयालों' की 'चाय छानात्मक' बतकही .........सतीश पंचम

     आजकल बड़े वाहियातात्मक ख्याल उछलते कूदते मेरे मन में आ रहे हैं। वैसे, एक समय में कोई एक खयाल आए तो ठीक है, लेकिन ससुरे झड़ी बाँध कर आ रहे हैं और लगातार आए चले जा रहे हैं। 

अभी कल ही एक खयाल चाय छानते समय लटक गया,  कह रहा था  - स्टीफन हॉकिंग की ईश्वर के बारे में दी गई अवधारणा मान ली जाय तो धर्म के नाम पर खर्च होने वाले कितने तो पैसे बच जाएंगे। 
 मैंने भी सोचा हां, बात तो सच है। जब सब लोग मान लेंगे कि ईश्वर है ही नहीं, भगवान या खुदा है ही नहीं तो फिर झगड़ा किस बात का ? सभी लोग शांत होकर, शायद सोचने भी लगें कि यार मंदिर-मस्जिद पर इतना घमासान क्यों हो.....इतनी सारी माथाफोड़ी क्यों।

 उधर आतंकवादी भी कन्फ्यूजन में आ जाएंगे यार लड़ें तो किस बात पर लड़ें ?
 सबसे बुरी गत तो धर्म के नाम पर एक दूसरे को लड़ाने वाले राजनीतिक पार्टीयों की होगी। वो किससे कहें कि फलां विचारधारा भगवा रंगी है, फलां विचारधारा सब्ज़ रंग की है। मंदिर-मंस्जिद पर सारा ताकित- धिन, सारी बमचक धरी की धरी रह जाय। 

        इसके अलावा एक और नुकसान होने की संभावना है धार्मिक कर्मकांड वाले बंदों के लिए। अभी तो जिसे देखो चंदन टीका लगाकर रंगा सियार बना घूमता रहता है,  बाबाजी बना कहीं आश्रम खोल रहा है कहीं तंत्र साधना कर रहा है। मौका मिले तो कभी कभार नित्यांनंदात्मक भी हो उठता है। ऐसे लोगों की तो रोजी रोटी पर ही बन आएगी। 

     बेचारे क्या कमाएंगे, क्या खाएंगे। बोल बचन के अलावा ऐसे लोगों के पास और कोई गुण है भी नहीं, न बीटेक किए हैं, न MBA, न बी.एड., न बीपीएड..... और शायद कम्पटीशन देने की उम्र भी पार कर गए हैं ऐसे लोग। सरकारी नौकरी मिलने से रही। ये लोग करेंगे क्या आखिर। बहुत संभव है तब दया करते हुए सरकार Hawcking fund का एलान करे ताकि Stephen Hawcking के बताए नियमों के अनुसार जो लोग बेरोजगार हुए हैं, उन्हें कुछ महीने दर महीने मिलता रहे।

 वहीं साइड इफेक्ट के तौर पर यह भी हो सकता है कि तमाम चर्च, मस्जिद, मंदिर आदि सरकार द्वारा अपने कब्जे में ले लिए जांय यह कहते हुए कि  जब ईश्वर ही नहीं है तब इन स्थानों की, भवनों की आवश्कता ही नहीं रही। वहां पर जच्चा-बच्चा केन्द्र खोल दिया जाय या फिर किसी हाई-टेक नसबंदी केन्द्र की स्थापना कर दी जाय।

        ईश्वर के न होने से मामला प्रेमी जोड़ो के लिए भी थोड़ा-बहुत गड़बड़ा ही जाएगा।  जो प्रेमी अब तक अपनी प्रेयसी से बात करते वक्त बार बार कहते थे कि ईश्वर ने तुम्हे फुरसत से बनाया है..... वह अब कतराएंगे कि अब क्या कहा जाय, किस पर इस खूबसूरत बला को बनाने का आरोप मढ़ा जाय ?  और शायद कोई दिलफेंक आशिक इसी समय की ताक में हो और कह बैठे - क्या भगवान, क्या खुदा और क्या क्राईस्ट..... सब तो झूठे साबित हो गए.......अब ऐसे में कौन सा गोत्र, काहे का खाप.....काहे का बाप.....  आओ हम तुम अब एक हो जाएं.....धर्म की दीवारें तो अब अरराकर ढह चुकी हैं..... हमारे नये खुदा तो  हॉकिंग अंकल ही हैं  :) 




- सतीश पंचम


स्थान - वही, जहां के रंग ढंग देख कर Stephen Hawking द्वारा प्रतिपादित ईश्वरीय सत्ता के नकारने वाले विचारों पर सहज ही विश्वास करने को जी चाहता है। 


समय - वही, जब 'साईंस बुलेटिन' का  'ईश्वरीय अस्तित्व नहीं'  विशेषांक लेकर डाकिया स्वर्गलोक में ईश्वर के पास पहुँचे और कहे -  सर, इस Acknowledgement Card पर साईन कर दिजिए ताकि पता चल सके कि हाँ, सही जगह डिलीवरी हुई है।


( Stephen Hawking सहित अंतिम चित्र -  नेट से साभार )

Saturday, September 4, 2010

सत्या फिल्म और स्टीफन हॉकिंग के बीच विचारों की साम्यता........ईश्वरीय नाप तौल......और..... अलहदा सवाल.......सतीश पंचम

        फिल्म सत्या में एक दृश्य है जिसमें एक थुलथुला सा गुण्डा, गैंग में नये आये सत्या  को एक घर दिखाते समय भगवान की तस्वीर की ओर इशारा करते हुए  कहता है – वो देख, भगवान भी है। भगवान को मानता है क्या ?

सत्या का जवाब होता है – नहीं।

     आज फिर से ठीक वही जवाब ईश्वर के बारे में स्टीफन हॉकिंग ने दिया है – नहीं।

 इस संसार को रचने में ईश्वर का कोई योगदान नहीं है।
 
     जाहिर है, अभी उनके इस जवाब पर ढेर सारे वाद विवाद होंगे, बहुत सारे सिम्पोजियम इन मुद्दों पर आयोजित किए जाएंगे। डायस के डायस धारदार बहसों से धुँआ हो उठेंगे। न जाने कितने शोधपत्र सामने आएंगे…..यह सब तो जब होंगे तब होंगे…… लेकिन इस जवाब ने मेरे मन में थोडी हलचल बढ़ा दी है।
    
       हलचल मचने की वजह है मेरी और श्रीमती जी के बीच पूजा के दौरान अगरबत्तीयों की संख्या पर यदाकदा होने वाली झिकझिक। सुबह नहाने के बाद हल्के गीले बदन रहते पूजा करते समय अक्सर तीन अगरबत्तीयां जलाता हूँ….जबकि श्रीमती जी का कहना है जलाना है तो दो जलाओ या तीन से ज्यादा जलाओ…. तीन नहीं….दोख होता है। मैं प्रतिवाद करता हूँ कि नहीं तीन क्यों नहीं। भगवान को इससे क्या मतलब कि  दो जलाउं या तीन। और वैसे भी मैं अगरबत्तीयां अपने लिए जलाता हूँ कि मुझे वातावरण थोड़ा सा सुगंधित और अच्छा सा लगे।  भगवान के लिए अगरबत्तीयाँ भला किस काम की ?  थक हार कर श्रीमती जी भुनभुनाते हुए किचन में चली जाती हैं।
  
  उधर अगरबत्ती जलाने के लिए माचिस न मिलने पर किचन के गैस चूल्हे की ओर रूख करता हूँ….लेकिन वहां भी रोक छेंक…..अगरबत्ती लिए यहां क्यों चले आए…..यहीं पर जूठ कांठ पड़ा है और उसी में अगरबत्ती भी जलाओगे……भगवान खुस्स हो जाएंगे ऐसी जूठी पूजा पर …..।  मैं उसी तरह गीले बदन माचिस की खोजबीन करना शुरू करता हूँ और संयोग से माचिस मिल भी गई। चलो, गैस चूल्हे के जूठ कांठ वाली अग्नि की बजाय एक फ्रेश अग्नि से भगवान की पूजा करने का अवसर मिला….और मैं माचिस की डिबिया से तीली निकाल कर रगड़ देता हूँ……चिक्क्……
   
     एक हाथ में जलती तीली और दूसरे हाथ में तीन अगरबत्तीयाँ……..हवा से बचाते हुए जब उन्हें जलाया जाता है तो हाथों के अंगूठे और तर्जनी के जोड़ अनायास ही बुद्ध के हाथों की याद दिला जाते हैं…….. जब तक मैं अपने हाथों की इस मुद्रा पर ध्यान दूँ…… बिग बैंग हो चुका होता है…………..अगरबत्ती सुलग उठी होती है और मन ही मन ईश्वरीय बुदबुदाहट शुरू ।
   
     लेकिन आगे एक और बहस। भोजन में तीन रोटीयां लेने पर फिर बवाल कि तीन रोटी नहीं खानी चाहिए…..चार लिजिए।  लेकिन मेरी जिद….तीन ही खानी है।

   अच्छा तो ये लो……और उस तीसरी रोटी में से भी एक छोटा सा हि्सा कुपुट कर अलग कर दिया गया। ये लो अब तीन से कम हो गई। जब देखो तब अपने मन की ही करोगे।
 
    मैं मन ही मन भुनभुनाता हूँ…..महिलाएं इतनी धर्मभीरू क्यों होती हैं। जब देखो तब पूजा-पाठ, व्रत, उपवास, एकादशी, चतुर्दशी। इन्हें इतना ज्यादा पूजा-पाठ में संलग्न रहना पसंद है क्या ? 

  लेकिन  स्टीफन हॉकिंग  ने तो मेरी उस रोजाना की झिकझिक को दरकिनार करने का आसान सा उपाय ही बता दिया - कि ईश्वर है ही नहीं तो अगरबत्तीयां किसके लिए जलाओगे……भक्ति भाव किसके लिए और क्यों प्रदर्शित करोगे। पाप और पुण्य की फिक्र क्यों किया जाय……किसके लिए की जाय।
 
     याद आता है वह दिन जब अपने कश्मीरी पंडत  डॉक्टर गुप्ता के यहां मैं दवा लेने गया था तब वहां एक लड़की अपनी मां के साथ आई थी। बीमार….लाचार हालात में।
 
   पता चला कि इस पंजाबी लड़की का विवाह कनाडा के किसी शख्स से हुआ, जिसने कि विवाह के बाद पैसे, दान-दहेज आदि लेकर उसे यहीं भारत में छोड़ दिया है और वापस कनाडा चला गया है।  पिछली रात इस लड़की ने सुसाईड करने की कोशिश की। डॉक्टर गुप्ता ने मामला संभाल लिया और पुलिस केस बनते बनते रह गया।
  
   क्लिनिक में ही डॉक्टर गुप्ता ने उस लड़की से मुखातिब होते हुए कहा- कु़ड़िए…..किस वास्ते  तू परेशान है…….याद राखी उपर वाले दे लाठी विच वाज नहीं हुंदी……तूं फिकर ना कर असी हां…….ओ रब्ब इक दरवाजे बंद करदा ए ते दूजे दस्स दरवाजे होर खोल दिंदा ए…..तूं कोई टेंशन ना लई। 

    डॉक्टर गुप्ता,  जिनकी बातों से ही आधी बीमारी दूर हो जाती है । उनके द्वारा यह कहना कि उपर वाले की लाठी में आवाज नहीं होती…..उसी ईश्वरीय अस्तित्व को  स्वीकार करने की एक कोशिश है, एक ऐसा विश्वास है जो कहता है कि दंड देने वाला ईश्वर अभी मौजूद है। जो जैसा करेगा वैसा उसे दंड जरूर मिलेगा।
   
     संभवत: ये आस्था और विश्वास उसी ईश्वरीय अस्तित्व के होने की पुष्टि करते प्रतीत होते है….लेकिन विज्ञान तो आस्था और विश्वास से नहीं चलता न……..उसके भी नियम और कायदे हैं……..कई रूल्स और  अल्गोरिथम्स है जिन्हें यदि  नकार दिया जाय तो समूची दुनिया केवल एक जादुई मायाजाल सी लगे। सबकुछ गड्ड मड्ड।  कहां, क्या, कैसे कब…… सब कुछ धुआं-धुआं।
  
    यह तमाम भौतिकी के नियम, सूत्र और परिकल्पनाएं ही हैं जो कि दुनिया को एक मुकम्मल शक्ल देने की कूवत रखते हैं । जिज्ञासा की बगिया में  कुलांचे मारते हुए किए गये ढेरों अविष्कार, ये तमाम साजो सामान….. घड़ियां, पहिये, पैसे, आग  से लेकर आग्नेयास्त्र तक के निर्माण की क्षमता यही भौतिकी के नियम के तहत ही बन पाते हैं, एक विशेष प्रक्रिया के तहत ही संपन्न हो पाते हैं।
  
      लेकिन  इतना होने पर भी आखिर क्या वजह है कि इसरो जब कभी भारत के आसमान में उपग्रह छोड़ता है तो बड़े से बड़ा वैज्ञानिक भी प्रोजेक्ट की सही सलामती के लिए अगरबत्ती जलाने, नारियल फोड़ने, और दीप जलाने  के बाद ही उपग्रह की ओर बढ़ उसे आसमान की ओर विदा करता है। क्या वजह है कि अस्पताल में ऑपरेशन थियेटर के बाहर हाथ खुद ब खुद जुड़ जाते हैं उस अज्ञात ईश्वरीय शक्ति के प्रति जिसे कि कभी किसी ने प्रत्यक्ष देखा तक नहीं है।
 
   ये और इस तरह के  ऐसे  ढेरों सवाल लंबे समय से अनुत्तरित ही रहे हैं, मानों अनुत्तरित रहना ही उनकी नियति हो।  और सच कहूं तो जब तक इस तरह के प्रश्न अनुत्तरीत बने रहते हैं,  तब तक इस तरह के  प्रश्नों की  खूबसूरती भी बरकरार रहती है।

मेरे विचार से उन्हीं ढेरों खूबसूरत प्रश्नों में से ही एक अनुत्तरित प्रश्न यह  भी है  – ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं ?
   
फिलहाल गुलज़ार की एक नज़्म को कोट करना चाहूंगा जिसमें वह कहते हैं  -

चिपचिपे दूध से नहलाते हैं
आंगन में खड़ा कर के तुम्हें ।
शहद भी, तेल भी, हल्दी भी, ना जाने क्या क्या
घोल के सर पे लुढ़काते हैं गिलसियाँ भर के
औरतें गाती हैं जब तीव्र सुरों में मिल कर
पाँव पर पाँव लगाए खड़े रहते हो
इक पथराई सी मुस्कान लिए
बुत नहीं हो तो परेशानी तो होती होगी ।
जब धुआँ देता, लगातार पुजारी
घी जलाता है कई तरह के छौंके देकर
इक जरा छींक ही दो तुम,
तो यकीं आए कि सब देख रहे हो ।

  
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- सतीश पंचम

(सभी चित्र नेट से साभार )

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फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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A Photo from - Thoughts of a Lens

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