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Tuesday, August 31, 2010

नौटंकी-ए-कजरी ....... झिंसी.....फुहार......ऑफ्टरऑल इट्स दिलवा मांगे मोर..........सतीश पंचम


        गये इतवार की शाम जब मेरे यहां झिंसी पड़ रही थी, हल्की-हल्की फुहार पड़ रही थी ठीक उसी समय मैं घर से कुछ दूरी पर स्थित एक मंदिर जा रहा था। अक्सर शनिवार या इतवार के दिन मंदिर का रूख करता हूँ और वह भी ज्यादातर शाम के समय क्योंकि वहां बीस पच्चीस मिनट का भजन चलता है। वहां भजन गाने के समय बैठने का तरीका ठीक पीपली लाइव के महंगाई डायन वाली स्टाइल में होता है, हारमोनिया मास्टर को घेर कर, ढोल पखावज के साथ।
    ऐसे वक्त पर मैं थोड़ा पीछे ही बैठता हूँ, क्योंकि भजन वगैरह के बोल मुझे आते नहीं, और ऐसे समय उन लोगों के साथ थोड़ा देर बैठ कर आंखें मूंदे हुए आनंदित हो लेता हूँ। मंदिर के पंडित जी कई बार आग्रह किए कि आओ पास बैठ कर साथ दो लेकिन पता नहीं, कौन सा संकोच रोके रहता है कि मैं कह कर रह जाता हूँ – नहीं यहीं ठीक हूँ....आप लोग जारी रहें।

     तो उसी मंदिर के लिए निकला था कि अचानक रास्ते में पड़ने वाले एक स्कूल के हाल से कुछ गीत संगीत की आवाजें सुनाईं पड़ीं। एकाध शब्द सुने तो वह भोजपुरी के लगे। जिज्ञासा वश चल दिया उस स्कूल के हाल की तरफ। पहुंचने पर पता चला कि किसी संगठन की ओर से कजरी महोत्सव चल रहा है। हाल में काफी भीड़ भाड़ है।

      मैंने हाल के बाहर से अंदर नजर डाली। महिलाओं की कतार अलग बैठी है, पुरूषों की अलग। एक शख्स खड़ा होकर देवी वंदना गा रहा था। अच्छा लगा। सो उन लोगों के बीच जाकर सबसे आखिर में बैठ गया। मंदिर जाने का प्रोग्राम कैंसल। अब यहीं कजरी महोत्सव का आनंद लिया जाय।

      कुछ देर तो भोजपुरी भजन वगैरह चला कि तब तक किसी महिला गायिका को पुकारा गया। आते ही उन्होंने भी एक देवी गीत गाया। मैंने कहा, चलो बढ़िया है। लोग सुन भी रहे थे, कुछ मन से, कुछ यहां वहां जगर मगर देखते ताकते। जगर-मगर से तात्पर्य महिलाओं की कतार की ओर निरख लेते थे रह रह। ज्यादातर महिलाएं उत्तर भारत की थीं...सो जाहिर है घूंघट काढ़े वह भी कजरी का आनंद ले रहीं थी। सलमा सितारे वाले घूँघट। चम चम चमकते।

     अभी बैठा ही था कि बाहर बारिश तेज हो गई। जो लोग अब आ रहे थे उनकी छतरियों से पानी ढरक कर जमीन पर यहां वहां छितरा रहा था। अभी यह सब चल ही रहा था कि पुरूषों की कतार से आवाज उठने लगी - तनि जम के हो।

   बस फिर क्या – महिला जी ने अगला गीत गाया – संईंया जी दिलवा मांगे ले गमछा बिछाय के। इतना सुनना था कि पुरूषों की कतार लहालोट हो उठी। महिलाओं की कतार में हल्की फुल्की सांय-फुस शुरू हुई। क्या पता संभवत: वह भी आनंद ही ले रही होंगी इन गीतों का। आखिर सइंया जी गमछा बिछा कर दिल मांग रहे थे। एकबारगी लगा कि गाना कहीं पेप्सी का भोजपुरी संस्करण तो नहीं है क्योंकि उसमें भी तो कहा जाता है –
      ये दिल मांगे मोर। और भोजपुरी में मोर का मतलब ‘मैं’ ‘मेरा’ भी होता है। तो ये ‘दिलवा मांगे मोर विथ गमछा’ का आनंद मैंने भी लिया । लोगों ने बीच बीच में पैसे भी पकड़ाए उन महिला जी को गाते समय। गाना रोककर अनाउंसमेंट भी हुआ कि फलाने जी, और ढेकाने जी की ओर से एक सौ एक रूपइया इनाम।

    कि तभी वही शख्स दुबारा खड़ा हुआ गाने के लिए जो देवी गीत गा रहा था। भूमिका बांधते हुए बंदे ने कहा कि देखिए गाँव में अपनी पत्नी को शहर में रहने वाला पति क्या कहता है। उसका गाया गीत पूरा तो याद नहीं, पर कुछ कुछ जो याद रहा वह कुछ ऐसा था -

अबकी लेबै तोहके मोबाइल गोरिया
लाइफटाइम टाकटैम भराउब गोरिया
मारू एक्कै मिस काल
ततकालै फोन लगाउब गोरिया

     ऐसा ही था कुछ, कि अबकी बार तुम्हारे लिए मोबाइल लेकर आउंगा, उसमें लाइफटाइम टाकटाइम भराउंगा, तुम एक मिस काल करना मैं तुम्हे फोन तत्काल लगाउंगा।

   सब लोग आनंद ले रहे थे। उसके बाद बंदे ने एक और गीत गाया। उसकी भूमिका बांधते हुए उसने कहा कि इस कलजुग (इसे कलजुग ही पढ़ियेगा) में अगर केहू के फैसन वाली मैडम मिल जाय तो उसका क्या हाल होगा यह इस गीत के जरिए पता चलता है। इतना कह कर हारमोनियम मास्टर ने तान छेड़ी.....अरे तर्ज वही है.....कहते हुए बंदे ने आsssss कह गाना शुरू किया –

होइगै माटी मोर जवानी,
पाया फैसन वाली जनानी
कभी कहे मोहे पौडर लाओ
कभी कहे मोहे लाली
देते देते थक गया खर्ची
आन पड़ी बदहाली
होइगै माटी मोर जवानी,
पाया फैसन वाली जनानी

     पूरा याद नहीं। सभी लोग मजे ले रहे थे। कई लोग बीच बीच में पैसे भी पकड़ा रहे थे और गाना रोककर उनका नाम उच्चारित किया जा रहा था।

     तभी अगले पल एक नीमजवान लौन्डे को बुलाया गया गाने के लिए। उम्र उसकी होगी यही कोई बीस-बाइस की। आते ही उसने पहले सरस्वती वंदना की और कहा कि उसके गुरू यहां बैठे हैं और आज पहली बार सार्वजनिक मंच से गाने जा रहा है तो आप लोगों का आशिर्वाद चाहिए। सुनते ही लोगों ने उत्साह बढ़ाते हुए ताली बजाई।

    लेकिन यह क्या आते ही महाशय ने गाना शुरू किया। गदराइल जोबना, महकाइल जवनिया, रात में मिलबू अईसे ही......। पुरूषों की कतार में जो लोग आगे की ओर बैठे थे कुछ तो ठठा कर हंस पड़े, उधर महिलाओं की कतार में से दो चार महिलाएं उठ कर जाने लगीं। मेरे मन में सबसे पहले यही आया कि अभी अभी तो महाशय सरस्वती वंदना कर रहे थे और तुरंत ही गदराइल जोबना, महकाइल जवनिया पर टंग गए।

     खैर, यह कोई नई बात नहीं है मेरे लिए। बचपन से लेकर अब तक कई बिरहा, लोकगीत, नौटंकी आदि में यही होते देखा है। पहले सरस्वती वंदना होती है हाथ जोड़कर और फिर अगले ही पल अपना असली रंग दिखाते हुए कहेंगे

– ओ मोरी सजनी, चूम्मा दे दे।

   कुछ देर उस लौण्डे को झेलने के बाद अब मैं कुछ-कुछ उकता चुका था, इन लोगों को और झेलना माने अपना कपार खवाना था । सो, उठकर मंदिर की ओर चला। मंदिर की ओर जाते हुए सोच रहा था कि अब तो भजन वगैरह भी खत्म हो गया होगा, चल कर केवल दर्शन कर लिया जाय। लेकिन वहां जा कर देखता हूँ कि फिल्मी धुन पर - पूजा करूंगा तेरी.....दिल में तुझे बसाकर गाया जा रहा है।

    आश्चर्य.......यह किस तरह का भजन हो रहा है आज। रोज तो ऐसा भजन नहीं होता था...... लोग भी नये लग रहे हैं।

ओह,

तो ये कृष्ण जन्माष्टमी वाले लोग हैं बाकायदा प्रोफेशनल गाने वाले। तभी अब तक भक्ति गीत चल रहा है। कुछ प्रैक्टिस वगैरह का दौर चलता है तो यही मंदिर ठिकान मिलता है उन्हें। भजन का भजन, प्रैक्टिस की प्रैक्टिस।

     उनके भक्ति गीत सुनकर ईश्वर की बजाय मेरे जहन में पहले दिलीप कुमार और बैजंती माला के चित्र उभरते हैं। देवानंद और न जाने किन किन हिरोइनों के चित्र भी उभरते हैं - इक बुत बनाउंगा तेरी और पूजा करूंगा ।

ऐसे में ईश्वर क्या खाक दिखेंगे।

    उनको भी लगता होगा कि कितना तो डिवैल्यूएशन हो गया है भगवानियत का.....इंसान तक की पूजा बुत बनाकर भगवान के समकक्ष की जा रही है।

     खैर, यही सब देखते-ताकते, मेरी इतवारी शाम बीती। लौटते वक्त फोन आया कि कहाँ हो, बाहर कितनी बारिश हो रही है और आप अब तक बाहर ही हो।

मैंने कहा – आ रहा हूँ।

अच्छा आते वक्त दही लेते आना, आज दही जमी नहीं है।

     मन में तो आया कह दूँ कि तुम दही के नहीं जमने की बात कर रही हो यहां मुझे भगवान भी नहीं जमे हैं। उपर से तुर्रा यह कि गाया जा रहा है- मैं तुझको चुरा लाया हूँ तेरे घर से....कभी श्याम बन के ओ कभी राम बनके.......

    लेकिन फिर सोचा कि मुझे भगवान की आराधना जमे या न जमे, दही के बिना तो मेरा नहीं जमेगा, दही जरूरी है भोजन में।

    और मैं भगवान जी की भक्ति भावना को दरकिनार कर बढ़ चला दही वाली दुकान पर।

ए भाई, दही देना तो :)



- सतीश पंचम

स्थान – .........

समय - ..........

(आज कुछ सूझ नहीं रहा है स्थान और समय......सो इसे खाली ही रख रहा हूँ )
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प्रिपब्लिश अपडेट – जब ड्रॉफ्ट में रख कर गया कि फलां काम से आते ही भक्ति भावना के रचे पगे वाहियात गीतों के बारे में लिखी यह पोस्ट पब्लिश करूंगा.....तब तक मेरा छाता लेकर कोई चलता बना।

लगता है भगवान को मेरी बातें पसंद नहीं आईं ......शायद इसीलिए उन्होंने मेरा छाता ही गायब करवा दिया.................चुराओ चुराओ.....कभी दही चुराते थे आज छाता चुराते हो......इतना आरोही उत्थान।


(सभी चित्र नेट से साभार)

Sunday, August 29, 2010

'वही इंद्रधनुष'.....कह सकते हैं कि इस रचना में प्रस्फुटित Abstractism / अमूर्त तत्व को बेहद अनोखे ढंग से प्रस्तुत किया गया है .......सतीश पंचम

      
         कल रात फिर से मैंने एक बेहद दिलचस्प कहानी पढ़ी। फिर से इसलिए कह रहा हूं क्योंकि पहले भी इसे कई बार पढ़ चुका हूँ लेकिन हर बार उसके नये नये Absracts सामने आ जाते हैं। पढ़ने के बाद एक दो बार मन में आया कि इस कहानी ‘वही इंद्रधनुष’ के Absractism से ब्लॉगजगत को भी परिचित कराता चलूँ लेकिन कोई न कोई कारण था कि रह जा रहा था। लेकिन जब कल रात  ‘वही इंद्रधनुष’ पढ़ने बैठा तो बाहर झमक कर तेज बारिश हो रही थी, तेज बिजली कड़क रही थी और ऐसे में कहानी का आनंद दूना हो उठा।  सुबह होते न होते आप लोगों के बीच इसे बांटने, इसके अमूर्त तत्व (Abstract values) से परिचित करवाने का मन बना लिया ।

       यह कहानी लिखी है विवेकी राय जी ने। विवेकी राय, जिनके बारे में इतना बताना जरूरी है कि वे ग्राम्य जीवन के ऐसे रचेता हैं जो अपनी लेखनी के जरिए सब कुछ सामने लाकर धर देते हैं। फणीश्वरनाथ रेणु जी के काल के लेखक छियासी वर्षीय वही विवेकी राय जिनके जीते जी ही उनके नाम पर सड़क भी है, विवेकी राय मार्ग – जो शायद भारत में एक हिंदी के लेखक के लिए प्रकट किए गये सम्मान के तौर पर नोबल पुरस्कार से कम नहीं है।

     तो बात हो रही है कहानी ‘वही इंद्रधनुष’ की। इस कहानी में एक शख्स  है जिसका कि विवाह एक लड़की से पांच साल पहले होते होते रह गया……कारण जो भी रहे हों……लेकिन विवाह नहीं हुआ। बाद में उस लड़की का विवाह उसी शख्स के एक मित्र से हो गया। कुछ साल बाद किसी काम से वह शख्स अपने उसी मित्र के यहां आकर ठहरा जिससे कि उस लड़की का विवाह हुआ।
   
      अब यहां इस शख्स के मन में आस पास की चीजों को देख एक अलग ही तरह के भाव आना जाना शुरू करते हैं …..वह सोचता है कि वह लड़की, वह स्त्री कहीं न कहीं से उसे ताक रही है…….एक तरह का उल्लास  …… एक तरह का मनसायन……. कि इन्हीं से विवाह होते होते रह गया…..यही वह स्त्री थी जिससे विवाह होना था …..

इन्हीं सब बातों को बहुत खूबसूरती से दर्शाते हुए विवेकी राय जी लिखते हैं कि -
    
     पश्चिम ओर जिधर मुँह करके वह खड़ा था, ठीक उसके सामने एक बड़ा सा इन्द्रधनुष उग आया। उसे लगा, भीतर का इन्द्रधनुष बाहर कढ़कर टंग गया है। कहीं टूट नहीं, एकदम पूर्ण इन्द्रधनुष, आसमान की उंचाई को छूता हुआ, पूरे क्षितिज को घेरकर, सप्तरंगी निखार का तरल-ज्योति पथ।

    कोई सपना नहीं, कोई जादू नहीं, कल्पना नहीं, बिल्कुल ही सामने ……. नदी उस पार जिसे पकड़ा जा सकता है,ऐसा इन्द्रधनुष उग आया, बिना हल्ला गुल्ला किये।

    वह नदी भूल गया, नाव भूल गया। ……..पानी में खड़े खड़े चूड़ियों की खनखनाहट, मुक्त खिलखिलाहट और कंठवीणा के कुछ बोल गूंज गये। फिर एक बार गंगाजली प्रतिमा उसकी आँखों में लहरा गई।……………….

   भोजन के लिए पीढ़े पर बैठा तो पीछे चुहान घर में, कोठिला के ओट के पीछे कुछेक क्षणों का समारोह हो गया और वही आर-पार का संग, लेकिन कितना जोरदार।
  
      वह कल ही वहाँ गया था। जरूरी काम था। नहीं तो भदवारी की शेष बीहड़ता में वह यात्रा नहीं करता। वहां पहुँचा तो अभी दिन था। दोस्त ने खूब खातिर की। उसे मालूम था कि ‘वह’ है और एक बड़ी थाली में उदारता के साथ भरकर ढेर सारी पकौड़ी आयी। तेल-मसाले में तर आम के अचार की एक बड़ी-सी सलगी फट्ठी और उसी तरह मिरचे का भी एक भीमकाय अचार। देख कर ही मारे मिठास के उसका मन भर गया।

    वह उसके दोस्त की बीवी है। उसे वह अच्छी तरह जानता है। एकाध बार देखा भी है। खूबसूरती में जवाब नहीं, लम्बी, छरहरी, सोनगुड़िया। संयोग नहीं बैठा, कट गयी, नहीं तो उसकी शादी ‘उसी’ के साथ लगी थी। यह कोई चार-पांच साल पहले की बात है।
“थके होंगे ?" दोस्त ने पूछा था।
“बिल्कुल ही नहीं”। उसने जवाब दिया।

   वास्तव में वह बहुत सुख अनुभव कर रहा था। दोस्त का वह गांव उस दिन बहुत हंसता लगता था। मित्र के दरवाजे पर रौनक बरस रही थी। मच्छरों के डर से ढेर-सी करसी एक जगह कोने में रखकर धुँआ कर दिया गया था। मोटा कड़ा धुआं गुम्मज बांधकर पहले तो बैठक में अंड़स गया और फिर बाहर फैलने लगा। बैलों का सारीघर बैठक से लगा था। उसमें भी धुआं भरा था और उसी बीच खिला-पिलाकर हटाये गये बैल आँख मूंदकर जुगाली कर रहे थे। उधर से धुएं से मिल एक अजीब-सी गीली-गुमसाइन गोबरही गंध बैठक में आ रही थी। मगर यह धुआं और गंध जब भी उसके नथुने पर धक्का देतीं, फिसल जातीं और वह कैसे आराम से बीड़ी दगाये पड़ा था।
 
    इन सब बातों को याद करने में भी एक सुख था मगर सामने सवाल था नदी पार जाने का, नाव का। उस पार वाले आदमी ने स्वर उंचा कर पूछा, “अरे भाई, नाव का कहीं पता है ? ”
बस कहीं से आती होगी। उसने उत्तर दिया।

और कहीं नहीं आई तो ?

इस तो का उत्तर उसके पास नहीं था। …..
……
     उसके दोस्त ने रात में भोजन के लिए जगाया तो उसे रोमांच हो आया। हवेली में घुसते उसे लगा कि हर चीज पर उसके आने की छाप है, दालान में एक अतिरिक्त चिराग रखा गया है। नये सिरे से झाडू लगा है। आंगन में जिस ओर पानी गिरता है, हाथ लगा दिया गया है ( पानी निकाल दिया गया है ) और बहुत साफ लग रहा है। एक ओर आंगन में एक जोड़ी खड़ाऊँ गुनगुने पानी के साथ रखा है। अनावश्यक चीजें हटा दी गई हैं।

     पैर धोते-धोते उसका मन एक जोड़ी आँखों पर अटका रहा। किसी न किसी ओर से निशाना बांधा गया होगा। चौके में आते-आते तो वह जैसे एकदम उड़ रहा था। चौके में नयी माटी से ‘ठहर’ दी गई थी (लीपन-पोतन) जिसकी ताजी सोंधी गंध अभी गई नहीं थी। पीढ़ा भी धो-पोंछकर साफ किया गया लगता था। लोटा-गिलास चमचम।

     पीढ़े पर बैठते ही साड़ी की खरखराहट, चूड़ियों की खनक और कुछ सांय से (धीमे से) कही गयी बात की आहट पीछे कोठिले की ओट से मिली। इसी बीच परसी-गई थाली दोस्त ने सामने कर दी। सोनाचूर की सुवास से तबीयत भर गई।

“आप भी बैठ जाइये न !”  उसने कहा।

    संकोच झाड़कर अब उसके दोस्त भी एक पीढ़ा खींच बगल में कुछ उधर हटकर इस तरह बैठ गये कि आवश्यकता पड़ने पर चीजें भीतर से बाएं हाथ सरकाया करेंगे।

    लक्ष्मीनारायण हुआ और दो-दो हाथ शुरू ही हुआ था कि भीतर से ‘हाय राम’ फिर एक खिलखिलाहट और फिर ‘घी तो आग पर ही रह गया’, बहुत धीमें पर साफ सुनाई पड़ा। उसने जिन्दगी में पहली बार कोयल की आवाज सुनी थी। एक जिंदा रस।

    “तब यहां कौन तुम्हारा लजारू है, उठकर दे दो।" उसके दोस्त ने कहा। और जो आंचल से जलती-कटोरी पकड़कर दाल में घी छोड़ा गया तो वह पिड़-पिड़-पिड़ करता उसके अंतर में, गहरे अंतर में अपनी सुगंधित तरलता लिये उतरता चला गया और फैल गया। उसने देखा तो जादुई खनक की खान कलाई को और रेशमी उंगलियों को, पर अधघूँघट में अनदेखी चंचल आँखें और बिहंसते होंठ की भी देखारी हो गई।

     न हाथ-पैर बजा, न शोर-हंगामा और एक घटना घट गई। दोस्त की बीवी ने नीले पाढ़ की चेक डिजाइन वाली हलके गुलाबी रंग की रेशमी साड़ी पहन रखी थी। उसे यह रंग बहुत पसंद है। नीला और गुलाबी : विस्वास और भाव। उसने मन ही मन सोचा – अबकी धान उतरा तो ऐसी ही एक साड़ी अपनी बीवी के लिए खरीदेगा।

  भोजन समाप्त कर अंचवते-अंचवते वह एक निर्णयात्मक शब्दावली पर पहुंच चुका था – इंद्रधनुष में लिपटा चम्पा का ताजा फूल।
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    इन्हीं सब विचारों से आलोड़ित वह कब सो गया पता ही न चला।  अगले दिन कब वह दोस्त से विदा मांग बीहड़ बरसाती मंजिल तय कर वह नदी पर आ गया, यह भी पता न चल सका।

    पछिवा हवा सिसकारी दे रही थी और हल्की ठंडक गुदगुदा रही थी। सवेरे ही सवेरे देव घिर आये। झींसी पड़ने लगी। वह कपड़ो को गीला कर देने के लिए काफी थी। उसने छाता तान लिया।

      उस पार तीन स्त्रियां थीं और एक पुरूष। ये लोग भी उसी की तरह प्रतीक्षातुर थे। नदी बहुत चौड़े पाट की नहीं थी, परंतु इस पार और उस पार में अंतर तो था ही। वक्त गुजारने के लिए उस पार वालों से बातचीत करना भी कठिन था। उसने देखा उस पार वालो के पास छाता नहीं है। पुरूष बेचैनी से नाव के लिए इधर-उधर ताक-झांक कर रहा है। उसे फुहार की तनिक परवाह नहीं है। वह साधारण कुर्ते धोती में एक किसान लग रहा है।

   अचानक वह चौंक उठा। वह स्त्री किसी काम से उठ गई तो उसकी आड़ में बैठी स्त्री की झलक साफ हो गई। वही चेक-डिजाइन, वही गुलाबी रंग, वही इंद्रधनुष, इंद्रधनुष के भीतर इंद्रधनुष, लेकिन यह दूसरा (इंद्रधनुष ) गठरी की तरह क्यों सिकुड़ा, धरती में गड़ा जैसा अतिसंकुचित क्यों।  इसके भी कोमल कलाइयां होंगी, कलाइयों में चूड़ियां होंगी और चूड़ियों में खनक होगी। लेकिन वैसी खनक यहां कहां। वह तो पीछे दूर छूट गई, बहूत दूर जहाँ के धुले बागों के पत्तों में अजब सी तेज गाढ़ी हरियाली है, जहां की माटी में सुवास है।  वह एक बार फिर गहरे में डूब गया और क्षण भर बाद वापस आया तो फिर वही मनहूस पानी। 

      लेकिन अबकी बार उसे लगा कि यह नदी का पानी नहीं, सड़क है। सड़क की इस पटरी पर वह खड़ा है और उस पटरी पर एक सजीला समारोह है, जिसमें इंद्रधनुष के विशाल फाटक से होकर जाना है। रंगारंग ज्योति के ये दो सप्तरंगी खंभे गोल घेरा बनाते हुए आसमान में उठते-उठते पूरी उंचाई पर जाकर मिल गये हैं। अमरावती का फाटक, गोलोक का सिंहद्वार कि बैकुंठ की पवित्र पौर है ?

   उसने देखा इंद्रधनुष के फाटक के भीतर वह किसान बौने की तरह लग रहा है। वह बबूल का पेड़ एक मामूली झाड़ी की तरह लग रहा है। दूर-दूर के बगीचे मरकत प्राचीर की तरह लग रहे हैं। और वह नारी ? विशाल, गोल, रंगों के झिलमिल मेहराबी मंडप के बीच इंगुरौटी ( लकड़ी की पतली-लंबी सिंदूरदानी) की तरह लुढ़की है। कौन लूट रहा है कि लाज का ऐसा बचाव ? इंद्रधनुष धरती में धंस क्यों जाय ? पानी में खड़ा होकर वास्तव में उसका मछुआ मन दो पारदर्शी चंचल मछलियों की झलक के लिए छटपटा उठा।

    उसके मन में एक बात आयी मगर अपनी मूर्खता पर स्वंय हंस पड़ा। साड़ी की तरह साड़ी होती है, रंग की तरह रंग होता है और औरत की तरह औरत होती है। उस इंद्रधनुष को देखा और अब वह इसे भी देख लेगा, उसके भीतर से, उस फाटक से होकर गुजरेगा, दुनिया का एक खुशकिस्मत इंसान, लेकिन यह पानी ? इतनी देर बाद पहली बार वह क्षुब्ध हुआ।

     पानी चुपचाप बह रहा था। धरती पर सरकती यह चंचल धारा और आसमान में उभर आयी क्षणजीवी विविध रंगों की अचंचल मणि-मेखला ! उसने जोर से सोचा, उसे इसी दम उस पार जाना है। समय चूक न जाय।

    इंद्रधनुष आसमान में उसी-गम्भीर आवाज से छाया था। बल्कि उसके ठीक समानांतर उपर से एक और पतली धार की तरह हलके-हलके उभर आया । नीचे चेक डिजाइन और गुलाबी रंग का रहस्य उसी प्रकार अनखुला था।   नाव उसी प्रकार लापता  थी। अथाह पानी उसी प्रकार सामने लहरा रहा था। सब वही था, मगर कहीं कुछ जरूर बदल गया था। उसने बंडी और चादर लपेटकर सिर पर रखा। उसके उपर छाता, धोती से कसकर बांध, लंगोट पहने पानी में उतर गया और दो हाथ चलाया कि दूसरे किनारे की माटी मिल गई, लेकिन उसे सख्त अफ़सोस हुआ कि इंद्रधनुष सच्चाई नहीं है।

  - विवेकी राय

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     तो ये थी कहानी ‘वही इंद्रधनुष’ । इसमें कितना अमूर्त है, Abstract है, यह शायद हर पाठक के लिए अलग अलग पैमाने पर होगा,  लेकिन मेरे हिसाब से  प्रस्फुटित तौर  पर इस कहानी का Abstractism कहीं कहीं प्रखर हो उठा है जो शायद आप लोगों ने पढ़ते समय महसूस भी किया हो,

जैसे,

 दाल में घी छोड़ने के समय .......आंचल से जलती-कटोरी पकड़कर दाल में घी छोड़ा गया तो वह पिड़-पिड़-पिड़ करता उसके अंतर में, गहरे अंतर में अपनी सुगंधित तरलता लिये उतरता चला गया और फैल गया। उसने देखा तो जादुई खनक की खान कलाई को और रेशमी उंगलियों को, पर अधघूँघट में अनदेखी चंचल आँखें और बिहंसते होंठ की भी देखारी हो गई।

   इसी तरह एक जगह लेखक कहते हैं  - चौके में नयी माटी से ‘ठहर’ दी गई थी  जिसकी ताजी सोंधी गंध अभी गई नहीं थी।

 Abstractism का गँवई माहौल.................

- सतीश पंचम

साभार – 'कालातीत' ( पराग प्रकाशन, शाहदरा, दिल्ली)
लेखक – विवेकी राय

( सभी चित्र मेरे निजी कलेक्शन से )

Saturday, August 28, 2010

क्षेत्रीय फिल्मों के परिप्रेक्ष्य में भोजपुरी फिल्मों की चिलगोजई.......... कुछ अलहदा बातें..........सतीश पंचम

          
       एक भोजपुरी भाषी होते हुए भी मैंने अब तक उतनी भोजपुरी फिल्में नहीं देखी हैं जितनी कि मराठी फिल्में।  भोजपुरी फिल्में न देखने की सबसे बड़ी वजह उन फिल्मों का फूहड़पन है जो कि हर दूसरे तीसरे दृश्य में नजर आता है। दांत चिआरते हुए हीरो जब कहता है - का हो....कहां जात बाड़ू....या फिर राह चलती लड़की को कहता है - का हो कईसन बाड़ू......देबू की ना.....पियास लगल हौ....... तब मन में जो पहला भाव आता है वह यही कहता है कि साले को पकड़ कर पहले एक लाफ़ा लगाया जाय। उसके बाद उसे बताया जाय कि साले एक्टिंग ऐसे नहीं ऐसे की जाती है। 

       ठीक  ऐसे समय में जो बात सबसे ज्यादा अखरती है वो है भोजपुरी संवाद लिखने वालों की लतोड़ जमात की। बात ऐसे लिखेंगे कि मानों सब गाँवो में या शहराती लोगों में इसी तरह का चलन होता है, इसी तरह का बात व्यवहार होता है, जबकि यही लेखक अगर चाहें तो फिर से नदिया के पार जैसी हिट फिल्म दे सकते हैं केवल थोड़ी सी फूहड़ता और नकली भदेसपन को दूर रख कर। नकली भदेसपन से तात्पर्य दांत चिआरते हुए ही ही करना, जान बूझकर शब्दों को दुलराते हुए बोलने आदि से है। 

                मेरे द्वारा भोजपुरी के साथ- साथ मराठी फिल्मों के बारे में  लिखने  का  मूल कारण यह है कि मुंबई में राज ठाकरे के मनसे और शिवसेना के उद्धव ठाकरे द्वारा थियेटरों में मराठी फिल्में न दिखाए जाने पर कार्रवाई किए जाने की धमकी देने के बाद सिनेमा हॉलों मे मराठी फिल्में प्राइम टाईम पर तो दिखाई जाने लगी हैं लेकिन उसके लिए दर्शक ही नहीं जुट पा रहे हैं। यह हालत तब है जब  मराठी के नाम पर पिछले दो सालों से राजनीति की जा रही है। 

        वहीं मैंने देखा है कि मराठी फिल्मों की क्वालिटी, उनके कलाकारों की संवाद अदायगी, उनकी कहानी सब एक से बढ़कर एक होते हैं। मराठी फिल्मों में ही मैंने देखा कि एक बच्चे को लेकर एक बेहद संवेदनशील फिल्म श्वास बनी जबकि भोजपुरी में ऐसी फिल्मों की अब तक शायद कल्पना ही की जा सकती है। विहिर, जत्रा, एका पेक्षा एक, अशी ही बनवा बनवी, चश्मेबहाद्दर (शायद यही नाम था फिल्म का)   जैसी न जाने कितनी फिल्में मैंने देख डाली हैं लेकिन भोजपुरी के नाम पर मेरे खाते में केवल बिदेसिया, नदिया के पार, ससुरा बड़ा पैसे वाला, बलम परदेसिया जैसी गिनी चुनी फिल्में ही हैं। 

         यूँ  तो कई बार केबल में भोजपुरी फिल्में दिखाई जाती हैं.......ढेरों फिल्में इसी आशा में देखना चाहा कि देखूँ भोजपुरी में क्या क्या बनाया जा रहा है...... लेकिन पांच मिनट से उपर उन्हें देखना बोझिल लगता है, कुछ कुछ कलाकार तो ऐसे लगते हैं मानों चार पांच बच्चों के बाप हैं और कई तो ऐसे जैसे कि उन्हें चार पांच दिनों से खाना नसीब नहीं हुआ लेकिन फिर भी मार कर गिरा देंगे दस बारह को एक साथ। यहां रजनीकांत स्टाईल भी अपनाई जाती है तो भूखे नंगे हीरो पर। 

          शायद यही सब कारण रहे हैं कि न जाने अब तक कितनी मराठी फिल्मों को देख चुका हूँ संभवत: उनकी संख्या सौ से उपर ही है लेकिन भोजपुरी  के नाम पर संख्या सात आठ से उपर नहीं बढ़ पाई।  मराठी फिल्मों के कई कलाकार जैसे भरत जाधव, सिद्धार्थ, संजय नार्वेकर आदि इतने जबरदस्त ढंग से संवाद अदायगी करते हैं कि एक बारगी लगता है काश ऐसे कलाकार भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में भी होते। वहीं भोजपुरी में देखो तो रवि किशन, दिनेश लाल निरहुआ, मनोज तिवारी आदि ही नजर आते हैं लेकिन उनकी प्रतिभा को खा जाती है फूहड़ संवादों और दृश्यों के बीच बेवजह की घिचपिचई। घिचपिचई से तात्पर्य हा हा ही ही वाले बेवजह के ठूंसे दृश्यों से है।   

    यहां मैंने एक बात और नोटिस की है कि मराठी फिल्मों में भी कहीं कहीं फूहड़ता नजर आती है लेकिन बहुत कम। दादा कोंडगे वाली नाडा़ झुलाती फिल्में इसी प्रवृत्ति का नमूना रही हैं लेकिन वह भी सीमित संख्या में बनी और आगे चलकर इस तरह की नाडा़ झुलाउ फिल्में कम से कमतर होती गईं। जबकि यदा कदा चैनल सर्फ करते हुए सामने अगर कोई भोजपुरी फिल्म आती भी है तो कोई टकलू टाइप आदमी अपनी धोती लेथराते हुए चल रहा है तो कोई अपने उटपटांग कपड़ों से ही हास्य पैदा करने की कोशिश कर रहा है। ऐसा नहीं है कि धोती खुलने वाले हास्य को दर्शाने का चलन इन्हीं फूहड़ फिल्मों की देन है.....यह धोती खुलने वाला चलन कई फिल्मों में रहा है, गंगा-जमुना फिल्म में भी कुत्ते के पीछे पड़ जाने पर कन्हैयालाल की धोती खुलती है और किशोरवय  दिलीप कुमार उन्हें धोती खुल जाने की ओर इशारा करते हैं लेकिन उसके दिखाने का भी एक ढंग होता है, यह नहीं कि जब मन में आए तभी धोती खोल टाइप हास्य पैदा किया जाय।   
 वहीं, कहा यह भी जा सकता है कि ये तमाम उलूल जूलूल भोजपुरी फिल्में एक खास दर्शक वर्ग के लिए बनाई जाती हैं तो इस बात से मैं बहुत हद तक सहमत हूँ लेकिन क्या जिस दर्शक वर्ग की दुहाई दी जा रही है वाकई उसे इसी तरह की फिल्मों में रूचि है ? क्या वाकई वह यह सब देखना चाहता है ?  कहीं ऐसा तो नहीं कि कोई ऑप्शन न होने पर ही यह दर्शक वर्ग बार बार इसी तरह की मार धाड़ वाली, खींस निपोर वाली फिल्में देखने के लिए मजबूर है।

        मैंने एक बार यूँ ही कुछ पल के लिए मुंबई के कुर्ला इलाके में भोजपुरी फिल्मों के लिए लाइन लगाए दर्शकों पर निगाह डाली थी तो ज्यादातर जो लोग दिखे वह ट्रक ड्राईवर, खलासी,  फेरीवाले टाइप के लोग थे और उन लोगों को देख मुझे फिल्म नदिया के पार के लिए लाइन लगाए दर्शक भी याद आ गए जो ठीक इसी पृष्ठभूमि के थे।  यानि दर्शक वर्ग केवल कहने की बात है, अच्छी फिल्म हो तो सभी पसंद करेंगे चाहे वह किसी खास के लिए बनाई गई हो या आम के। 

         अब अंत में इतना जरूर कहूँगा कि मराठी भाषा के रसिक बहुत सौभाग्यशाली हैं जो इतने उम्दा किस्म की मराठी फिल्में उन्हें देखने मिल रही हैं। वह इसलिए भी सौभाग्यशाली हैं कि अपने पूरे परिवार के साथ मराठी फिल्में देख सकते हैं।  

         वह दिन कब आएगा जब भोजपुरी में भी उतनी ही उम्दा फिल्में बनेंगी, उतने ही उम्दा कलाकार होंगे और पूरा परिवार मिल बैठकर फिल्में देखते हुए कहेगा - आज मन जुड़ा गईल बा !!

- सतीश पंचम

स्थान - वही, जिसके बारे में कहा जाता है कि वह कभी नहीं सोती। 

समय - वही, जब केशव प्रसाद मिश्र जी की कहानी पर बनी फिल्म 'नदिया के पार' में चंदन बने नायक सचिन अपनी नायिका साधना सिंह से कहते हैं - बलिहार चलोगी गुंजा !!

 बलिहार.....नाम सुन कर ही अपनत्व की फुहार सा लगता है।

Friday, August 27, 2010

ब्लॉग महंत...........ब्लॉगिंग का ककहरा पढ़ते मिस्टर मदन.......आलू का जीजा........ढेला ढोवन.......सतीश पंचम

       पिछली गर्मियों में जब गाँव गया था तब ककड़ी के खेतों में एक दिन फोटो शूट कर रहा था। तरह तरह की ककड़ियां दिख रहीं थी। हर एक ककड़ी किसी न किसी फल या सब्जी की रिश्तेदार की तरह लग रही थी।  किसी ककड़ी की शक्ल आम जैसी थी तो किसी का आकार केले जैसा,  कोई ककड़ी शतुरमुर्ग के अंडे जैसा बड़े सफेद रंग का तो को कोई- कोई तो 'आलू का जीजा' भी लग रहा था।   

     इसी फोटो शूट के दौरान बगल में ही ककड़ी के बीजों को धो-मसलकर इकट्ठा करने का भी काम चल रहा था। लू चलने से कई ककड़ियां खराब भी हो गईं थी।   अम्मा-बाबू दोनों जन ककड़ी के बीजों को इकट्ठा कर रहे थे। बीच बीच में मैं भी पहुंच जाता था। बातचीत के दौरान जब मैंने उनसे कहा कि किसी बंदे को ठीक क्यों नहीं कर लेते जो कि खेती बाड़ी के काम में हाथ बटाए और जो पैसा वैसा लगे दे दिया जायगा।  मेरी इस बात पर अम्मा का कहना था कि अरे आदमी मिलते ही नहीं अब तो कहां से किसी को ठीक किया जायगा। ज्यादातर लोग जो हैं वो बाहर कमाने चले गए हैं, जो बचे हैं वो किसी काम के नहीं हैं, कुछ आधे मन से काम करते हैं तो कुछ काम ऐसे करते हैं मानों एहसान कर रहे हैं।

  अभी यह बातचीत चल ही रही थी कि गाँव का ही एक शख्स मदन बगल के खेतों से गुजरा। उसे  देखकर मैं एकाएक चौंक सा गया।   दरअसल  वह शख्स अपने साथ ढेर सारे ढेले लेकर जा रहा था।  कोई ढेला एक डिब्बे के भीतर रखा था तो कोई ढेला बगल में तो कोई बड़ा सा ढेला सिर पर। उसे देख कर मैंने पूछा कि ये ढेला ऐसे क्यों लेकर जा रहा है, कोई टोकरी वगैरह में क्यों नहीं लेकर जाता ? 

 मेरे इस तरह सवाल पूछने से अम्मा हंसने लगी। उन्होंने बताया कि अरे ये आज से ढेला नहीं ढो रहा हैं, धीरे धीरे दो-ढाई साल से ये ढेला ढोने का काम कर रहा है।     इसी तरह के अगलहा पगलहा लोग अब बचे हैं गाँव में जो हरवाही-चरवाही करते हैं। कहाँ से आदमी ठीक किया जाय ?

अम्मा की बातें सुनते हुए मैं हैरान भी हो रहा था कि आखिर ये ढेलों का करता क्या है ?

      पूछने पर अम्मा ने बताया कि पिछले कुछ साल से यह सनक सा गया है। ढेला ढेला ले जाकर अपना दुआर पाट रहा है। दिन भर में शौच के बहाने सात आठ बार तालाब की ओर जाता है और आते समय डब्बे में ढेला भर कर लाता है। कुछ ढेला सिर पर रख लेता है, कुछ बगल में। यही करते करते इसका समय पास होता है।

    मुझे हंसी आई कि यार ये कौन सा नया मिथकीय चरित्र है मेरे गाँव में कि ढेला ढेला ही अपना आशियाना बनाने को उद्दत्त है। कई बार किस्से कहांनियों में सुना कि फलां ने थोड़ा थोड़ा करके अपना यह स्थान बनाया, वह बनाया....फिर किसी ने सड़क तक बना डाला। लेकिन ढेला ले जाकर अपने घर का दुआर पाटना कुछ अजीब सा लगा।

        मैंने फोटो खींचना चाहा तो अम्मा ने झिड़क दिया कि क्या करेगा उसकी तस्वीर लेकर.....अभी बेमतलब अंट शंट बकने लगेगा वह....चल वापस लौट आ। लेकिन मैंने न न न करके भी एक तस्वीर पीछे से मिस्टर मदन की खींच ही ली।

         शाम के समय ऐसे ही खेतों में खड़े होकर बातचीत चल ही रही थी कि तभी मेरे भतीजे ने बताया कि अगर मदन को महंत कहो तो वो खुश हो जाता है। मै और हैरान कि यार ये कौन सा नया शौक है बंदे को कि महंत कहो तो खुश हो जाए। थोड़ी पूछ-पछोर करने पर बाकीयों ने बताया कि पहले यह खेतों में अधिया आदि जोत कर अपना जीवन यापन करता था लेकिन पता नहीं कब और किसने क्या कह दिया कि सब लोगों से कहता फिरता है कि मेरे गुरू ने कहा है कि मैं महंत बनने वाला हूँ और मेरे पास बहुत सा पैसा आने वाला है।

Really.....what a cunning hope.

           बातचीत में ये भी लोगों ने बताया कि यह अक्सर अपनी पत्नी को बुरा भला कहता रहता है कि तेरे ही कारण अब तक मैं पुजारी के पद पर हूँ न अब तक मैं किसी मठ का महंत बन गया होता।

        Hmm.....तो मिस्टर मदन को महंत बनना है। मिस्टर मदन की इच्छा और उनका ढेला प्रेम देख कर मुझे लग रहा है कि उन्हें ब्लॉगिंग में सक्रिय होना चाहिए। सारे लक्षण ब्लॉगरों वाले ही हैं।  खुद ढेला लिए रहेंगे.....उछालते रहेंगे....खेलते रहेंगे....मौका मिला तो तड़ जड़ भी देंगे :)

 इधर एक किस्म का ट्रेण्ड और चला है कि ब्लॉगर अपनी श्रीमती जी को ही अपनी मति हर लेने के लिए दोष देने लगे हैं। अक्सर कहते भी रहते हैं कि पोस्ट लिख रहा था तभी ....श्रीमती जी कह रही हैं सब्जी लानी है, दाल लाना है....बाजार जाना है वगैरह वगैरह ऐसे में महंत बनाने सरीखी पोस्टें ड्राफ्ट बनकर ही सदा सदा के लिए रह जा रही हैं। अब हालत यह हो गई है कि  उन ढेर सारे ड्राफ्टों की मिस्टर मदन की तरह पूजा करनी पड़ रही है ।

     मुझे जहां तक लग रहा है कि थोड़ा बहुत ढेला फेंकने की प्रैक्टिस हो जाय...... थोड़ा ढेला आदि लेकर चलने की आदत सी बन जाय, एक ढेला सिर पर, एक बगल में.....एक अगल में....  बस..... फिर तो ब्लॉगिंग की  महंतई धरी है...... वह कहां जाएगी...... हाँ...... थोड़ा श्रीमती जी लोग मति न हरें कि बाजार जाइए...... सब्जी वगैरह लाइए.....कि आज ब्लॉगिंग से ही पेट भरने का इरादा है    :)


  और इधर मैं देख रहा हूँ कि मिस्टर मदन ब्लॉगिंग का ककहरा पढ़ रहे हैं -

प से पोस्ट
फ से फॉलोअर
ट से टिप्पणी
ढ से ढेला
ब से बकरी....नहीं नहीं....ब से ब्लॉगिंग :)


- सतीश पंचम

स्थान - वही, जहाँ पर छह करोड़ से ज्यादा के हीरे चोरी हो गए थे।

समय - वही, जब साढ़े छह करोड़ के हीरे चुरा कर भाग रहे चोर फ्लाइट में बैठ कर खबरें सुन रहे हों कि कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान हजारों करोड़ रूपयों का घपला हुआ है और तभी उनमें से एक कहे - यार हम तो साढ़े छह करोड़ के हीरे चुरा कर भी चिंदीचोर के चिंदीचोर ही रहे.....वह दिन कब आएगा जब हमें भी ऐसा मौका मिलेगा कि सब कुछ अंदरखाने करने के बावजूद चिंदीचोर की बजाय हम इज्जतदार कहलाएं :)   

( अंतिम चित्र में वही ककड़ी है जिसे देख मेरे मुँह से बरबस यह शब्द निकल गया   -
 'आलू का जीजा'        कम्बख्त आधा जमीन में आलू की तरह धँसा है,  आधा बाहर हवा में लू से जूझ रहा है....तिस पर छांह कर रही हैं रिश्तेदार बनीं हुई पत्तीयां  :)

Saturday, August 21, 2010

जाहली जी....गाँव के मनई...........पुलिस कलट्टर.....दरोगा-सरोगा.......मुझे जीने दो........डकैत बाबू.......सतीश पंचम

जाहली जी,

 मेरे गाँव के एक बुजुर्ग शख्सियत। इनको एक बार देखने से पता नहीं लगता कि इनके अतीत में एक ऐसा भी वाकया आया था कि जिले की पुलिस तक अपने आप को अपराधी महसूस करने लगी थी।

 बात उन दिनों की है जब डकैतीयां जमकर हुआ करती थीं। अब तो ज्यादातर चोरी चकारी और वाइट कॉलर क्राईम का दौर चल रहा है वरना जिन लोगों ने सुनील दत्त की फिल्म 'मुझे जीने दो' देखी हों तो उन्हें पता चल सकता है कि डकैती क्या होती है।

 डकैत आते थे, भरे विवाह मंडप से, सैंकड़ों के जमावड़े के बीच पूरी बारात को लूट कर शान से बंदूक लहराते चले जाते थे। तब बहुधा सेंधमारी भी चलती थी,  कच्चे घर और कच्ची दीवारों का होना इस काम में शायद  सहायक होता हो। अब तो दीवालें ज्यादातर पक्की हो उठी हैं और शायद यही वजह है कि, किसी के यहां सेंधमारी होने  का अर्थ अब सीढ़ी लगाकर छत पर चढ़ जाने से लगाया जाता है।

  तो बात हो रही है जाहली जी की।  गाँव के लोग बताते हैं कि बहुत पहले इनके यहां डकैती पड़ी थी और डकैतों ने घर के सभी लोगों को हथियार का भय दिखा बंधक बना लिया था। कुछ हाथापाई भी हुई और इसी चक्कर में जाहली जी की नाक जख्मी हो गई। उधर डकैतों ने उत्पात जारी रखा और इसी बीच जाहली जी ने किसी डकैत का चेहरा वगैरह भी देख लिया। डकैत लूटपाट कर चलते बने।

       पुलिस आई, तफ्तीश हुई, कहाँ, कैसे आदि के चक्कर में जाहली जी ने बताया कि कुछ डकैतों का कपड़ा मुँह से हट गया था, उनका चेहरा उनके सामने आने पर वे  उन्हें पहचान लेंगे। बस, फिर क्या था.....जाहली जी की मुसीबतें शुरू हो गईं। जहाँ कहीं पर कोई वारदात हुई, कोई पकड़ा गया तो पुलिस सबसे पहले जाहली जी को ही पहचान परेड के दौरान बुलाती कि बताओ, ये शख्स था क्या उस दिन वारदात के समय, वो था क्या, ये नहीं था तो कैसा था........वगैरह-वगैरह। जाहिर है रोज रोज के पुलिस थाने के इस चक्कर से जाहली जी परेशान हो उठे, रोज रोज हल-कुदाल छोड़कर, काम छोड़कर थाने जाना जाहली जी को परेशान करने के लिए काफी था।  इन सबसे निजात पाना अब जाहली जी को मुश्किल लग रहा था, डकैती में जो सामान गया सो गया, अब  पुलिसिया धौंस अलग सहो। जीना मुहाल हो गया ।

     तो, अंत में जाहली जी ने एक उपाय सोचा और पहचान परेड के दौरान एक पकड़े गये कैदी की ओर इशारा कर कहा कि यही है वह डकैत जो उस दिन मेरे यहां डकैती के दौरान आया था। बस फिर क्या था, चार्जशीट बनी, कार्यवाही हुई, जिस केस के लिए वह शख्स पकड़ा गया था उसमें अलग दफा लगाई गई कि बहुत सरकस किस्म का यह आदमी है , जाहली जी के यहां डकैती में भी इसका हाथ था.....आदि-आदि।  ये तो हुई कागजी खानापूर्ति, लेकिन जाहली जी को लगा कि अपनी रोज रोज की पुलिसिया आफत से जान बचाने के लिए किसी अंजान शख्स को इस तरह फंसाना ठीक नहीं, भले ही वह किसी ताजा मामले में दोषी ही क्यों न हो। आखिर है तो इंसान ही। जाहली जी की आत्मा ने गंवारा न किया और तब जाहली जी ने एक अगली चाल चली।

        जब अदालत में मजिस्ट्रेट के सामने गवाह के तौर पर उस शख्स की कारगुजारीयों को बताने का वक्त आया तो जाहली जी लगे उटपटांग बातें बताने, ऐसी बातें जिनका मुकदमे से कोई ताल्लुक न था। अदालत में मौजूद पुलिस सकते में, कि यार ये क्या उटपटांग बके जा रहा है। उधर मजिस्ट्रेट अलग ही हलकान की ये कैसा गवाह है जो कुछ भी बके जा रहा है।  तब मजिस्ट्रेट ने जाहली जी से सीधे जानकारी लेते हुए उनसे उनका नाम, पता, उम्र वगैरह बताने का कहा। सब कुछ तो ठीक ठाक बताया जाहली जी ने लेकिन उम्र बताते समय अपने पिता की उम्र अपने से भी कम बताया। मजिस्ट्रेट ने टोका तो भी इस बात पर डटे रहे कि-  हुजूर हमार उमिर हमरे बाप से जियादे है।

 तुरंत मजिस्ट्रेट ने मौके पर मौजूद पुलिस वालों की क्लास ले ली कि कैसा आगल-पागल गवाह लाकर खड़े कर देते हो, खबरदार जो आइंदा इस तरह का गवाह लाये तो ?

  बस फिर क्या था.....मुकदमा खारिज....।  गवाह की लिस्ट और पहचान परेड वाले पुलिसिया धौस से जाहली जी का नाम गायब।

      एक वह दिन था और आज का दिन है कि फिर  कभी  पुलिस की जीप उनके दरवाजे पर नहीं दिखी।

      पिछली ग्राम्य यात्रा के दौरान जब अपने खेतों में खड़े होकर फोटो शूट कर रहा था तब अचानक ही जाहली जी आते दिखे और मैंने उनकी तस्वीर हच्च से खींच ली। तस्वीर खींचवाते वक्त जाहली जी का हावभाव बिल्कुल बेपरवाह सा था, मानों कहना चाह रहे हों कि बड़े बड़े पुलिस कलट्टर, दरोगा-इसपी,  हमसे फरके रहते हैं औ तूम आए हो  फोटू हींचने...... अए तनि जिये द भईया  :)

- सतीश पंचम

स्थान - वही, जहाँ दरोगा और दरोडा ( डकैती )  जैसे शब्दों में नामराशि एक ही होती है।

समय - वही, जब एक पुराने चुटकुल्ले के अनुसार गाँव वाले देहाती मनई से जब दरोगा ने पूछा कि जब डकैती वाला वकुआ हुआ तो घड़ी में केतना बजा था ?  तब देहाती मनई ने कहा -  जी, घड़ी पर तो एकै लट्ठ बजा था और तभी वह टूट गई....मुला  समय अब तक वही दिखा रही है लट्ठ बजनहा  :)

(     जाहली जी की प्राईवेसी को ध्यान रखते हुए कैमरे से खींची गई उनकी क्लोस शॉट तस्वीर को यहां नहीं दे रहा हूँ , वरना कहेंगे कि बाहरी तो बाहरी, ससुरे यहां गाँव वाले भी हमका जिए नहीं दे रहे हैं    : )

Thursday, August 19, 2010

विश्व फोटोग्राफी दिवस के अवसर पर पेश है मेरे द्वारा हींची गईं कुछ तस्वीरें...........सतीश पंचम

   World photography day के अवसर पर मेरे द्वारा हिंची गई कुछ तस्वीरें................



'हमको चीन्हो........ तो जानें'.........
 उत्सुक नज़रें, बहती नाक, धूलिहर देंह  और गँवईं मुस्कान........... 





'बकायी दीवार' ...........यदि बकायेदारों ने समय से बकाया चुका दिया होता, तो बैंक के सामने लगी इस बकायेदारों के लिस्ट की यह हालत न होती




पिया मोरा बिदेस...........  ऐसे में पेड़-पुनूई, गाछ-ओछ, चिरई- चुनमुन हर ओर उदासी है सखी


 'खुराक'  
     बड़े हो चुके बच्चे को अब तक दूध पिला रही है भैंस....... फिगर के बिगड़ने के अंदेशे से अपने बच्चों को दूध न पिलाने वाली मॉडर्न माँओं से कहीं बेहतर है यह देहातन माँ  :)


'चप्पू और चुप ' - गोमती नदी पार करते समय मल्लाह सहित चार लोग एक ही नाव में सवार हैं, लेकिन हर कोई अलग अलग दिशाओं में देख रहा है..... अपने आप में गुम है, चुपचाप हैं .........हम भी इसी तरह अपनी जीवन नैया में अपने आप में गुम रहते हैं, पता ही नहीं होता कि हमारे साथ नाव में और कोई भी सवार है। 



'सुदामा की मसहरी' -  चारपाई पर सूखते चावल देख बरबस ही 'कृष्ण और सुदामा' याद आ गए :)  


मोटर साईकिल से जाते हुए जल्दी में ली गई एक तस्वीर......'गँवई माणूस' 



- सतीश पंचम

स्थान - वही, जहाँ पर चित्रा और खलीजीया का मिलन हुआ।

समय - वही, जब जहाज से काले रंग का कच्चा तेल रिसकर समुद्र में जाने लगे और तलहटी में बैठी कोई विरहिणी मछली कहे.........जा रे कारे बदरा....... बलमू के गाँव.....वो तो ठहरे बुद्धू...... नहीं समझे रे.....

(सभी चित्र मेरी ग्राम्य यात्रा के दौरान लिए गए हैं)

Sunday, August 15, 2010

साहित्य में अश्लीलता की छौंक...... छिनरपन वाली 'फँसा-फँसी'........रेणु जी का बावनदास...... बौद्धिक अय्याशीयों के बीच परोसी गई साहित्यिक थाली............सतीश पंचम

        बड़ा शोर है कि विभूति नारायण ने कुछ महिला लेखिकाओं को छिनाल कहा, यह कहा वह कहा.....बड़ी छीछालेदर हो रही है विभूति नारायण की। इस बमचक और शोर-गुल्लहटी के बीच मजे की बात यह हो रही है कि इस उधेड़न-खोलन-सीयन के दौरान कई और भी चीजें बेनकाब हो रही हैं।

      मैं उद्धरण देना चाहूँगा पिछले हफ्ते डीडी न्यूज पर चली एक परिचर्चा का जिसमें कि सुधांशु रंजन जी थे, पालीवाल जी थे, और दो महिला लेखिकाएं थी जिनका नाम मुझे याद नहीं है, और साथ थे फोन पर विभूतिनारायण। तो कुल जमा पांच लोग बतिया रहे थे। बात चल रही थी कि विभूति नारायण जी के छिनाल प्रसंग पर। बात चीत के दौरान ही सुंधांशु रंजन जी ने खुलासा किया कि जब वह इस प्रोग्राम के लिए मैटर इकट्ठा कर रहे थे तो कुछ महिला लेखिकाओं ने उनसे भी इस बात को कहा कि कैसे कुछ लेखिकाएं उन्मुक्तता के नाम पर छूट लेती हैं और बात ही बात में ऐसी लेखिकाओं के लिए उन महिलाओं ने छिनाल जैसे शब्द से भी ज्यादा बुरे शब्दों का प्रयोग किया है।

    अभी यह बातचीत चल ही रही थी कि उन्हीं दो महिला लेखिकाओं में से एक ने अपना विचार व्यक्त करते हुए जो कुछ कहा उसका लब्बो-लुआब यह था कि – क्या महिला लेखिकाओं को इतनी पढ़ी लिखी होने के बाद यही एक तरीका रह गया है जिससे वह अपने लेखकीय कैरियर को दशा और दिशा दे सकें....क्या इतना पढ़े होने के बाद.... उनके पास अपनी सोच और बुद्धि नहीं है जो कि लोग इस तरह के आरोप करे जा रहे हैं।

         अब यहां उन महिला पैनलिस्ट की बातों को एकबारगी सुनने में कुछ भी अटपटा नहीं लगता, लेकिन जरा ध्यान दिया जाय तो एक छुपा अर्थ भी निकल रहा है.....महिला पैनलिस्ट का यह कहना कि महिला लेखिकाओं द्वारा इतनी पढ़ी लिखी होने के बावजूद क्या यही सब करने को रह गया है अपनी दशा और दिशा सुधारने के लिए ? ......तो उनसे मैं पूछना चाहता हूँ कि क्या जो महिलाएं पढ़ी लिखी नहीं है या कम पढ़ी लिखी है, वही छिनरपन वाला काम करती हैं.........क्या वही लोग इस सब में आगे रहती हैं ? क्या छिनरपन फानने के लिए कम पढ़ी लिखी महिलाएं ही  जिम्मेदार हैं ?

   अप्रत्यक्ष रूप से ये वही छिनाल कहे जाने जैसी बात है जिस पर कि बवाल मचा हुआ है । उस समय सुधांशु रंजन की जगह पर मुझे रहना चाहिए था और यही सवाल पूछता...- कि पढ़ा लिखा हुआ तो छिनरपन नहीं,  और अनपढ़ हुआ तो संभावनाएं अनंत !!!

     खैर, अभी इस पर न जाने कौन क्या-क्या विचार करेगा और क्या क्या कहेगा.....। लेकिन मैं रेणु रचनावली से कुछ उद्धरण देना चाहूँगा जो कि साहित्य में अश्लीलता और उससे जुड़े हुए मुद्दों पर कुछ बहुत ही रोचक बातें बता रही हैं।

 सबसे पहले मैं सुश्री गौरा जी द्वारा उद्धृत एक लेख का अंश दे रहा हूँ जिसे कि 1956 में प्रकाशित किया गया था। गौरा जी लिखती हैं कि -

    - हिंदी में ऐसे निरामिष (?) आलोचक भी हैं जो समय पड़ने पर अश्लीलता के ‘अ’ से ही सिहर पड़ते हैं और समय-असमय नैतिकता अनैतिकता का प्रश्न उठाया करते हैं।

आगे गौरा जी ने और अपनी बातों को स्पष्ट करते हुए लिखा है कि -

     मैं साहित्य में चटपटी भाषा का नहीं, बल्कि वैज्ञानिकता का महत्व मानती हूँ। अत निवेदन करूंगी कि साहित्य में अश्लीलता का प्रश्न निरर्थक है। वह सब सनातन का व्यापार है और निकट भविष्य में वह सब बदलेगा ऐसी आशा भी नहीं है। फिर प्रक्रिया भी किन्हीं दो ही अंतों के बीच कहीं स्थित होगी। चाहे नदी के द्वीप की संयत काम क्रीड़ा हो या बर्बर नोंच-खसोट.....इसे नकारने का प्रयत्न सारे मानव-मनोविज्ञान एवं पाँच-हजार वर्षों के मानवीय उपलब्धियों को झुठलाना होगा। - (सुश्री) गौरा, जनवरी 1956

( रेणु रचनावली-4, पृष्ठ संख्या - 384)

    Hmm…. गौरा जी द्वारा कही गई यह बात तो मार्के की है कि - इन सब बातों को नकारने का प्रयत्न सारे मानव-मनोविज्ञान एवं पाँच-हजार वर्षों के मानवीय उपलब्धियों को झुठलाना होगा।

       अब जरा मैला आँचल के एक खास कैरेक्टर बावनदास के बारे में जान लिया जाय जो कि मूलत: कट्टर गाँधीवादी है, खद्दर पहनता है, हाव भाव भी विचार भी वही गाँधीवादी..... लेकिन है तो आखिर इंसान ही....सो एक घटना का बयान करते बावनदास को लेकर मैला आँचल में लिखा गया है कि –

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    एक दिन चन्दनपट्टी आश्रम में, दोपहर को तारावती जी बिछावन पर आराम कर रही थीं। सामने के दरवाजे पर पर्दा पड़ा हुआ था और पर्दे के इस पार ड्यूटी पर बावनदास। फागुन की दोपहरी। आम की मंजरियों का ताजा सुवास लेकर बहती हुई हवा पर्दे को हिला-हिलाकर अन्दर पहुँच जाती थी। तारावती जी की आँखें लग गईं। बावन ने हिलते डुलते पर्दे के फाँक से यों ही जरा झाँक कर देखा था। उसका कलेजा धक् कर उठा। मानों किसी ने उसे जोर से धकेल दिया हो। पर्दे को धीरे धीरे हिलाने वाली फागुन की हवा ने बावन के दिल को भी हिलाना शुरू कर दिया। बावन ने एक बार चारों ओर झाँक कर देखा, फिर पर्दे के पास खिसक गया। झाँका। चारों ओर देखा तब देखता ही रह गया मन्त्र-मुग्ध सा। पलंग पर अलसाई सोई जवान औरत। बिखरे घुँघराले बाल, छाती पर से सरकी हुई साड़ी, खद्दर की खुली हुई अँगिया....कोकटी खादी के बटन। आश्रम की फुलवारी का अंग्रेजी फूल गमफोरना, पाँचू राउत का बकरा रोज आकर टप-टप फूलों को खा जाता है। बावन के पैर थरथराते हैं। वह आगे बढ़ना चाहता है। वह जानता है । वह इस औरत के कपड़े को फाड़ कर चित्थी-चित्थी कर देना चाहता है। वह अपने नाखूनों से उसके देह को चीर फाड़ कर डालेगा। वह एक चीख सुनना चाहता है। वह अपने जबड़ों से पकड़ कर उसे झकझोरेगा। वह मार डालेगा इस जवान गोरी औरत को। वह खून करेगा....ऐं...। सामने की खिड़की से कौन झाँकता है ? गाँधी जी की तस्वीर !!  दीवार पर गाँधीजी की तस्वीर ! हाथ जोड़ कर हंस रहे हैं बापू ! ....बाबा !!  धधकती हुई आग पर एक घड़ा पानी ! बाबा ! छिमा ! छिमा ! दो घड़े पानी ! दुहाई बापू ! पानी...पानी....शीतल ....ठंडक!!!!


    इस घटना से जुड़े बावनदास के प्रसंग और उसके द्वारा किए गए कई विशुद्ध सामाजिक क्रियाकलापों के आलोक में मैला आँचल के बावनदास की चर्चा करते हुए आगे रेणु रचनावली में गौरा जी लिखती हैं कि –

    मैला आँचल के बावनदास की चर्चा श्री लक्ष्मीनारायण भारतीय जी ने की है और श्री नरोत्तम   नागरजी ने भी । भारतीय जी के शब्दों में, यथार्थ चित्रण के और भी रास्ते हो सकते थे। मगर मेरी राय है कि उक्त प्रसंग के अंकन में लेखक ने असाधारण संयम और कौशल से काम लिया है और कुछ यौन प्रतीकों, आभाओं, दृश्य संकेतों द्वारा ही दृश्य को समाप्त कर तुरंत एक महान् सबलाइमेशन प्रस्तुत किया है। मैं नहीं समझती कि कोई दूसरा शॉर्टकट था।


    आगे गौरा जी ने लिखा है कि -

‘फँसा-फँसी’ के अतिरेक से श्री नरोत्तम नागर जी खिन्न है, श्री लक्ष्मीनारायण भारतीय जी भी । भारतीय जी सोचते हैं कि वैषयिक संबंधों के अतिरेक के कारण, पूछने की इच्छा होती है कि “हर टोला नियमित, व्यवस्थित और खुले रूप से, अनैतिकता का अड्डा ही है क्या ? ” और नागर जी का कहना है कि “गर्ज यह कि सब किसी-न-किसी से फँसे हैं ”।

     भारतीय जी से निवेदन है कि कुशल उपन्यासकार के कैमरे की आँखें बहुत सेंसिटिव होती हैं और वे यदि सामाजिक समाजिक संबंधों के सतही चित्र भी प्रस्तुत करती हैं, तो ऐसे लोग चौकते हैं कि जिन्होंने जीवन को कम-देखा समझा है। यदि सभी को माइक्रो-फोटोग्राफी द्वारा विश्लेषण किया जाय तो बड़े विचित्र फल आयेंगे, जिनसे कुछ लोगों को भयंकर शॉक लग सकता है।...... - ( सुश्री गौरा, रेणु रचनावली-4, पृष्ठ 385)

     तो यह थे रेणु जी के बारे में गौरा जी का लिखा 1956 में एक लेख का अंश जिसमें कि साहित्य के अश्लीलता वाले पहलूओं पर प्रकाश डाला गया है और बहूत बढ़िया तरीके से साहित्य में अश्लीलता वाले बातों को स्पष्ट किया गया है। अब तनिक एक मौजू अंश को भी पढ़ा जाय जिसका संदर्भ हांलाकि अलग है लेकिन बहुत कुछ बातें यह अंश कह दे रहा है....... जिसमें कि रेणु जी ने पटना में आई बाढ़ का जिक्र किया है। रेणु जी लिखते हैं -

     एक नीमजवान,नवसिखुआ लड़का कमर भर पानी में खड़ा होकर पटना में आई बा़ढ़ की तस्वीरें ले रहा है। नहानेवाले लड़के उसके सामने जाकर मुँह चिढ़ा रहे हैं। भीड़ का एक कड़ियल-जैसा आदमी तैश में आकर कैमरे वाले से कुछ कह रहा है। ब्लॉक नंबर एक के छत पर खड़े कुछ लोग भी चिल्ला-चिल्ला कर कुछ कह रहे हैं। हमारे ब्लॉक के मुँडेरे से भी कुछ आवाजें कसी जाने लगीं। यहाँ लोग कल से घिरे हुए हैं, न नाव है न रिलिफ और ये फोटो वाले लोग हैं कि केवल तस्वीरें ले रहे हैं। इसी को कहते हैं कि किसी का घर जले और कोई मौज से तापे। …..मत खींचने दो किसी फोटोवाले को फोटो...इनको पैसा कमाने का यही मौका मिला है ?

        कैमरावाला नौजवान बुद्धिमान है। उसने तुरंत उस कैमरे का रूख तमाशबीनों की ओर कर दिया । तैश में आया हुआ कड़ियल-जैसा आदमी तुरंत ठंडा हो गया और गले में लिपटा हुआ अँगोछा तुरंत ठीक कर मुँह पर हाथ फेरकर फोटो खिंचाने के पोज में खड़ा हो गया। नहानेवाले लड़कों ने वहाँ पहुँच कर पीनी उलीचना-छींटना शुरू कर दिया। भीड़ का एक दूसरा आदमी तैश में आकर उन बच्चों को डांट कर भगाने लगा। छाती भर पानी में से भागते लड़कों में से एक ड्रम के बने बेड़े पर चढ़ गया और अपने पैंट के अग्रभाग के एक विशेष स्थान की ओर संकेत करते हुए बोला – ‘इसका फोटो लो’ ...... कुछ लोग हँसे, कुछ ने मुँह फेर लिया तो कुछ ने कहा – “अरे-रे...हरमजदवा.....” कहकर चुप हो गए....छाती भर पानी में जाकर बच्चों को पकड़ने का साहस किसी में न था।

         आगे रेणु जी ने पटना में आई बाढ़ के बीच हुए इस दृश्य की तुलना करते हुए लिखा है कि - मुझे पांच –सात महीने पहले देखी हुई युगोस्लावी फिल्म ( वी आर बिविच्ड, इरिन) के एक दृश्य की याद आ गई जिसमें कि झरने में अर्धनग्न नहाती हुई इरिन को चारों ओर से छुपकर देखने वाले लड़कों को खदेड़ते हुए जब इरिन का ससुर कहता है कि अब कभी इधर देखा तो जान से मार दूंगा, विल ‘किल यू’ तो भागते हुए छोकरों में से एक ने कुछ दूर जाकर उलटकर ऐसी ही मुद्रा बनाई थी और कहा था ‘किल दिस’  !!!

  भागते छोकरे द्वारा अपने विशेष अंग की ओर संकेत कर 'किल दिस' कहना.....अपने आप में साहित्य में अश्लीलता मुद्दे पर नाक भौं सिकोंडने वाली उन प्रवृत्तियों पर एक तीखा तंज है...... जो कि  गाहे-बगाहे नैतिकता की थाली परोसने को हमेशा तैयार बैठी रहती हैं.........नैतिकता.....जिसकी दुहाई समय और  मौका देखकर ही दी जाने की एक परंपरा सी रही है।


- सतीश पंचम

स्थान – वही, जिसे अंग्रेजों ने कभी दहेज में दे दिया था।

समय – वही, जब गाँधी टोपी लगाने और खद्दर पहनने वाले एन डी तिवारी द्वारा एक शख्स को अपना बेटा नहीं मानने और उसकी पैतृक पहचान नहीं करने वाली अर्जी अदालत द्वारा खारिज हो गई हो और तभी अदालत के बाहर खड़ा बावनदास हँसते हुए कहे – पाँचू राउत की बकरी लगता है अंग्रेजी फूल फिर से खा गई :)

Thursday, August 12, 2010

बस क्या कलमाड़ी अंकल................सतीश पंचम

         आज कल अपने कलमाड़ी अंकल जी को हर कोई गाली दे रहा है। यूँ तो उनके नाम के सामने जी लगाने को मन नहीं करता लेकिन न लगाने से चलता भी नहीं। इतने बड़े महानुभाव हैं कि चार हजार का तो आइ कार्ड बनवाया है महाशय ने।

        बताओ........ जो बंदा अपनी पहचान बताने के लिए एक कार्ड पर चार हजार खर्च कर सकता है वह अपनी पहचान बनाने के लिए हजार-बारह सौ करोड यहां वहां न करे तो क्या करे। उस पर तुर्रा यह कि चीजें इतनी महंगी कैसे खरीदी गईं। अरे भई कोई मछली बाजार है कि बारगेनिंग करते.....कह दिया जो दुकान वाले ने....तो ले लिया। अब इतने बड़े भारत के मंत्री होकर किसी संत्री की तरह मोल तोल करते तो अच्छा थोड़े लगता। लोग समझते तो हैं नहीं, बस मुँह उठाए और भक्क से जो मन में आया बोल दिया। भई बारगेनिंग भी सब किसी से नहीं जमता, वह भी एक प्रकार की कला है।

    अब मेरी श्रीमती जी को ही देखिए....बाजार में जाकर आधा आधा घंटा मोल तोल करेंगी तब जाकर कोई चीज खरीदी जाएगी। भई मुझे तो औरतों के इस बारगेनिंग कला पर कभी कभी चिढ़ सी होने लगती है कि दस रूपए के अरक फरक वाली चीजों पर भी आधा आधा घंटा तक मोल तोल चलता रहेगा।

      एक मैं हूँ कि कोई चीज अगर सौ रूपए की लाया होउंगा तो उसे जान बूझ कर सत्तर- अस्सी तक बताउंगा ताकि श्रीमती जी मीन मेख न निकाल सकें और जो कभी सही सही दाम बता दिया कि इतने में लाया हूँ तो फिर सुनो लैक्चर.........दुकानदार ने कह दिया और इन्होंने ले लिया....यह नहीं की भाव ताव करके कम कराया जाय.....चाहो तो पूरा का पूरा घर ही लुटा दो....बड़े आए बजरूआ बने हुए ।

   अब बताओ, मैं इसमें क्या कर सकता हूँ....बारगेनिंग करना नहीं आता सो नहीं आता। लेकिन मैं एक बात जरूर समझने लगा हूँ कि यदि किसी महिला को कॉमनवेल्थ खेल के साजो सामान की खरीददारी करने का कहा गया होता तो अब तक तो भारत के हजार-बारह सौ करोड़ तो बचा ही लेतीं। मजाल है कि विदेशी वेंडर एक पैसा फालतू मांग ले। चार हजार का आई कार्ड जो कलमाडी एण्ड कंपनी ने खरीदवाया है, उस वेंडर की तो वाट ही लग जाती। कार्ड वेंडर के दुकान की एक बानगी देखिए -


- मैडम, स्कूल के आई कार्ड और इसमें फरक है मैडम।

- कुछ फरक नहीं है, तुम सब लोग बेवकूफ बनाता है, सौ - डेढ़ सौ का चीज को चार हजार का दाम लगाता है....देना हो तो दो नहीं तो हम दूसरा दुकान देखता है......

- ओ मैडम जाओ मत...... तीन ह्जार ओनली...... जास्ती नई मैडम....हम आप से जास्ती नईं लेगा। धंधे का टाईम है, देखो बोहनी भी नहीं हुआ है।

- बोहनी नहीं हुआ है तो क्या हमसे ही तीन-चार हजार वसूलेगा......आखरी बोलता है, दो सौ फाईनल....देने का होगा तो दो.....अबी हम जास्ती नईं बोलेगा.....

- अरे मैडम आप इतना कम बोलता है, कैसे चलेगा मैडम.....संसद में जो कार्ड चलता है वो भी ढाई हजार का होता है......दो सौ में कैसा परवडेगा मैडम ... थोड़ा तो सोच्चो.....

- वो तुम सोचो.....पाच रूपए का प्लास्टिक कार्ड, उसमें नंबर बिंबर लिख के सब बेचेगा तो भी वो पचास के उप्पर नहीं जाता है, तुम को फिर भी दो सौ देता है....कम नहीं है.....

- अरे मैडम, ये वो इस्कूल का माफिक कार्ड नहीं है मैडम, सब कमपूटर कार्ड मैडम.....चलो आपके लिए दो हज्जार ...

- तो क्या कम्प्यूटर का है तो क्या हो गया, और सस्ता होना मांगता कि और तुम महंगा करके बोलता है....देने का होगा तो दो बाबा....नहीं तो हम दूसरा दुकान को देखता है दो हज्जार बहोत ज्यादा है......तीन सौ में देने का होगा तो दो.....

- अरे मैडम, इधर दुकान लगाने के लिए हफता देना पड़ता है.....वो टोपी बीपी लगा के आता है ना मामा लोग....वो लोग को भी इसमें से देना पड़ता है.....कइसा परवडेगा मैडम

- वो तुम जानो, तुम्हारा मामा लोग जाने.... अगर पांच सौ में देने का होएंगा तो दो....नहीं तो बस बाबा अभी जाता है.....

- ओ मैडम....ओ मैडम जाओ मत....लास्ट बोलता है.... हजार ........

- नही....तुम रखो अपना कार्ड अपना पास....लास्ट टू लास्ट छै सौ देगा......

- अच्छा, सात सौ.....मैडम........ओ मैडम.... जाओ मत मैडम........ अच्छा बाबा.... लेक जाओ :)


   अगर कलमाड़ी अंकल के पास ऐसी बार्गेनिंग पावर और थोड़ा सा दिमाग होता तो महाशय को आज इतनी खरी खोटी सुनने न मिलता.......वैसे दिमाग तो था.....तभी ना इतना सब घोल-घोटाला हो गया........दामों में इतना हेर फेर और घपला देख कर तो मन कह रहा है कहने को ....

 -  बस क्या कलमाड़ी अंकल....... आई कार्ड के नाम पर चार हजार की टोपी पहनाने को हम लोग ईच मिले हैं क्या........इदर मिले तो मिले बंधु...... उप्पर नको मिलना रे...  :)


- सतीश पंचम


स्थान - वही, जहां पर हफ्ते का एक और मतलब निकाला जाता है।

समय - वही, जब मंत्री अंकल के सामने एक तिनका आकर गिरे और उसे देखकर दाढ़ी खुद ब खुद बोले.....कम से कम दस बारह लाख का तो होगा :)

(  चित्र - नेट से साभार )

Sunday, August 8, 2010

मैं फिर से विवाह करना चाहता हूँ....महानता पाने की ओर अग्रसर होना चाहता हूँ.....देश और दुनिया को बदल देना चाहता हूँ.....सतीश पंचम

          मैं फिर से विवाह करना चाहता हूँ.....फिर से विवाह हेतु सजना संवरना चाहता हूँ। यह बात मेरे मन में यूँ ही नहीं आई है….दरअसल इसके पीछे उन तमाम व्यक्तियों का इतिहास रहा है जिन्होंने कि दो- दो विवाह किए और अचानक ही महान हो उठे । अभी देख रहा हूँ शशि थरूर और सुनंदा जी महानता की ओर बढ़ रहे हैं, आमिर , अजहर, राहुल महाजन जैसे तो कई लोग पहले ही महान हो चुके हैं। साहित्य जगत में भी ज्यादातर लोगों के दो दो विवाह होने की बातें सुनी गई हैं। कई लोगों ने अपने  दूसरे विवाह को एक तरह से क्रिएटीवीटी की गंगोत्री ही माना और एक से एक रचनाएँ इस साहित्य जगत को सौंप गए और सौंप रहे हैं।

           दरअसल जब व्यक्ति दूसरा विवाह करता है तो उसे ऐसी कई दूसरी समस्याओं से दो चार होना पड़ता है जिसे कि वह सिर्फ एक विवाह कर नहीं समझ पाता। वह अगर एक ही विवाह पर सीमित रह जाए तो समझिए कि वह समस्याओं से भागना चाह रहा है और हमारे तमाम सुविचारों के लाईट हाउस यही कहते हैं कि समस्याओं से भागिए मत….उनका सामना किजिए। इसी में आपकी महानता है, इसी में आपकी विजय है।
    
     यह इसी विचारधारा का कमाल था कि मैंने पिछले कुछ दिनों से दूसरे विवाह से संबंधित मसलों पर सोचना शुरू किया। एक समस्या यह आ सकती है कि सिर पर जितने बाल बचे हुए हैं…..वह भी नोच लिए जांय, एकाध बर्तन की फेंक वेक झेलना पड़े, संभवत बेलनों की बमबार्डिंग भी झेलनी पड़ जाय और श्रीमती जी नाराज हो मायके चले जांय और जिसकी की आशंका ज्यादा है। गिरिजेश जैसे बेकार साथी तो यहां तक सलाह देते मिले कि दूसरी वाली के चक्कर में न घर के रहोगे न घाट के। तो मैंने सोचा कि एक घर अपने लिए घाट पर भी बनवा दूँ ताकि अगर घर से निकाला गया तो घाट पर रहने का ठिकान हो, बनारस में बने तमाम घाटों पर जो महल ओहल, कोठीयाँ , अटारियाँ  वगैरह बनी हैं वो सब क्या हैं, इसी महानता के नमूने हैं कि और कुछ ?

      अरे भई, पहले जब राजा लोगों के मल्टीविवाह होते थे तो बहुत संभव था कि महल में ढेर सारी महिलाओं के जमा हो जाने से उनमें खटपट की संभावनाएं ज्यादा थी। ऐसे में राजा लोगों के साथ भी यह घर के न घाट के वाली  स्थिति आई होगी और ऐसे में ही बनारस के घाटों पर उन्हें एक घर बनाने की बात सूझी होगी और जब कभी महल में रानी से खटपट होती होगी वह सीधे यह कह कर बनारस चल देते होंगे कि रहो तुम लोग अपने अपने वाक युद्ध, बाल नोचउल खटकर्म के साथ, मैं चला बनारस  और जनता समझ लेती कि कितने तो महान राजा हैं हमारे जो राज पाट छोड़ कर बनारस में घाट के किनारे जाकर रह रहे हैं, उनकी महानता का ही असर होता कि जिस जगह उनका अस्थाई घर होता उस राजा के नाम पर घाट का नाम रख उठता। आज भी बनारस में घाटों को ऐसे ही नामों से पहचाना जा सकता है।
 
     हाँ तो अपनी बात पर आता हूँ कि मेरे साथ क्या क्या संभावनाएं आ सकती हैं……संभवत जब दो पत्नीयों के वजह से खर्च बढ़ जाएगा तो मैं महंगाई का रोना रोते हुए लेख पर लेख लिखूँगा और तमाम ऐसी संस्थाओं के जरिए ज्ञापन दूँगा जो कि ऐसे खटकर्म में लगे होने का दम भरते हैं रोते रहते हैं। वैसे एक बात मैने नोटिस किया है कि भले ही बाजार में दाल क्या भाव मिल रही है उसकी जानकारी न हो लेकिन महंगाई को लेकर हो हल्ला करना चाहिए। दरअसल यह महानता के लक्षण हैं। दरअसल महानता महँगाई को लेकर उसे झेलने में उतनी नहीं है जितनी की उस पर हाय तौबा मचाने से है। दोनों ही एक दूसरे के डायरेक्ट प्रपोशनल हैं…..जितनी ही ज्यादा महँगाई को लेकर चिल्ल पों मचाया जायगा महानता उतनी ही तेजी से फैलेगी।

        हाँ, तो मैं क्या कह रहा था कि फिर से विवाह करने से  दूसरी पत्नी के आ जाने से आवास की समस्या आ सकती है और मैं इस चक्कर में उन तमाम हाउसिंग प्रोजेक्टों के लिए दौड़ धूप करने को मजबूर हो सकता हूँ जो कि सस्ते और टिकाऊ घर देने का दम भरते हैं और इसी प्रक्रिया में उनमें पनप रहे भ्रष्टाचार के घुन से लोगों को रूबरू भी करवा सकता हूँ कि देखो फलां जमीन उस मंत्री के नाम पर सस्ते में अलॉट हुआ है, फलां जमीन फॉरेस्ट लैंड घोषित हो गया था लेकिन अब देखिए कि उस पर कई तरह के अवैध नियम सरकार ने खुद बनाते हुए लागू किया है और अब हाल ये है कि मुझे उसमें से एक फ्लैट तक नहीं नसीब होने दिया जा रहा…..अरेररे…रूकिए भई…..यह क्या कह गया मैं।
  
      ये पिछली पंक्तियों के अल्फाज मैं वापस लेता हूँ, क्योंकि अपने कहे को वापस लेना भी महानता के ही लक्षण हैं, देखते नहीं कि कितने तो बड़े बड़े लोग यही सब करके महान हो उठे हैं। प्रधानमंत्री जी ने पहले कहा कि अगले दो महीने में महंगाई होगी और होते होते चार महीने होने को आए नहीं कि खुद ही स्पष्टीकरण देते हुए अपने अल्फाज वापस भी ले लेते हैं कि खरीफ की फसल हमारे अनुमान पर खरी नहीं उतरी इसलिए मैं अपनी उन पिछली बातों को, अनुमानों को गलत मानने को बाध्य हूँ…..उनका इतना कहना होता है कि देखते देखते वह और महान हो उठते हैं।  

       दूसरा विवाह करने से एक समस्या यह भी हो सकती है कि बच्चे नाराज हो जांय, अपनी दूसरी मम्मी को लेकर नाराजगी जताएं, खाना पीना छोड़ दें….ऐसे में मैं यह वक्तव्य जारी कर सकता हूँ कि मैं समाज कल्याण में इतना उलझा रहता हूँ,  बाहरी कामों का बोझ इतना ज्यादा रहता है कि उसके चलते अपने घर परिवार तक के लिए समय नहीं दे पा रहा हूँ ,  उनका ख्याल नहीं रख पा रहा हूँ और हालत यह है कि मेरे घर में लोग भूखे हैं। यह और इस तरह के वक्तव्य महान साबित करने के लिए काफी हैं, क्योंकि अक्सर महान लोगों की संतानों की बदहाली के समाचार यदा कदा प्रकाशित होते रहते हैं।

        और मान लो कि कभी मेरे घर में दोनों पत्नीयों के बीच मार-कुटाई वाले क्षण उपस्थित भी हुए तो तुरंत मीडिया वालों के बीच इस मसले को उठा दूँगा,  और ज्यादा न कुछ हो सका तो दोनों में से किसी एक पर या दोनों पर ही हाथ उठा दूँगा और देखते ही देखते मीडिया में सुर्खियां बटोर लूँगा। और यह सुर्खीयां बटोरने का ही असर होगा कि संभवत किसी रियलिटी शो में भी चुन लिया जाउं, क्योंकि आजकल सुना है ऐसे जगह हाथ उठाऊ लोगों की ज्यादा चलती है। वही लोग आजकल महानता के पैमाने हैं।
  
     पिछले कुछ समय से यही सब गुणा भाग कर रहा हूँ, कैलकुलेशन में लगा हुआ हूँ अब देखिए कब सफल हो पाता हूँ। देख रहा हूँ कि किचन में श्रीमती जी मसाला कूट रही हैं, बच्चे कार्टून देख रहे हैं, मैं लेख लिख रहा हूँ और मन ही मन हिम्मत बना रहा हूँ कि-

अजी सुनते हो…..बाजार से सब्जी लाना है। अब अपना पेटी-बाजा बंद भी करोगे कि बस उसी में लगे रहोगे…..लैपटाप न हुआ सौतन हो गई….काली कलूटी…..हुँह।

      आंय………ये औरतें भी न, सारा का सारा चिंतन खराब कर देती हैं, इधर पति महान बनने की ओर अग्रसर है कि ये टोक देंगी, घर को संसद बना कर रख दिया है….बात बात पर प्रश्नकाल, कहाँ जा रहे हो, क्या कर रहे हो....... क्या लिख रहे हो वगैरह वगैरह। और जब उनसे झगड़ पड़ो तो तपाक से बातचीत बंद कर शून्यकाल शुरू कर देती हैं। बाज आया ऐसी पत्नी से।

 अब तो दूसरा विवाह कर ही लेना चाहिए, बिना देर किए….. माना कि महान बनने में कई तकलीफें आती हैं लेकिन क्या इसी तकलीफों के डर से महानता को तज दूँ….भाग खड़ा होउँ…..नहीं….बिल्कुल नहीं। शुभस्य शीघ्रम।  

- सतीश पंचम

स्थान – विवाह का  मंडप।

समय – वही, जब नाउन मेरे पैरों में दूसरे विवाह से पूर्व रंगना लगा रही हो और पास खड़ी पहली पत्नी बगल में रखे मूसल की ओर ताक रही हो इस अंदाज में कि मेरे सिर पर अब पड़ा कि तब पड़ा :)

 ( थिंकर का चित्र नेट से साभार, शेष सभी चित्र मेरे निजी कलेक्शन से )

Friday, August 6, 2010

मुन्नी झण्डू बाम हुई ..... आईटम सांग कॉमनवेल्थ के लिए बिल्कुल सटीक बैठ रहा है......सतीश पंचम

        
             मुन्नी बदनाम हुई.......डारलिंग तेरे लिए.......ले झण्डू बाम हुई....... डारलिंग तेरे लिए............जैसे लिरिक्स के साथ धूम मचाता यह     दबंग फिल्म का गाना कॉमनवेल्थ खेलों की मौजूदा तस्वीर पर बिल्कुल फिट बैठ रहा है।

      और फिट हो भी क्यों न...... एक ओर तो कॉमनवेल्थ बाईजी आइटम डांस कर  रही हैं गाते हुए कि ....वे मैं टकसाल हुई....डारलिंग तेरे लिए......ले झण्डू बाम हुई.....डारलिंग तेरे लिए....... तो दूसरी ओर आई ओ ए अव्वा के अध्यक्ष और कॉमनवेल्थ खेलों के कर्ता धर्ता श्री दाढ़ीवाड़ी जी डांस कर रहे हैं.....चसमा लगा के।  और ये चसमा लगाना उनकी इमानदारी का सबूत भी है क्योंकि ऑल इंडिया बेवड़ा असोसिएशन के अध्यक्ष श्री बाबूराव गणपतराव आपटे के अनुसार चोर लोग चश्मा नईं लगाते। 

    हाँ तो मैं कह रहा था कि कॉमनवेल्थ वाली बाई जी गा रही हैं कि - मैं झण्डू बाम हुई डारलिंग तेरे लिए.......मैं तो बदनाम हुई डारलिंग तेरे लिए......तो इस बात में बहुत सच्चाई है। सच्चाई इसलिए  कि अब तक कई कॉमनवेल्थ गेम हो चुके हैं लेकिन यह पहली बार हुआ कि इतने बड़े पैमाने पर कॉमनवेल्थ खेलों को लेकर बदनामी हुई है...... भ्रष्टाचार का आरोप लगा है..........और लगे ही जा रहा है।  ऐसे में कॉमनवेल्थ बाई जी का यह कहना कि मैं तो बदनाम हुई डारलिंग तेरे लिए बड़ा सटीक लग रहा है।

 और झण्डू बाम ? ........... तो ऐसा है कि अब तक चाहे किसी की भी सरकार रही हो......लेकिन हमारे आई ओ ए अव्वा के अध्यक्ष पद पर लगातार रहते हुए श्री  दाढ़ीवाड़ी जी  को बराबर इस बात की पीड़ा रहती थी कि उन्हें उचित महत्व नहीं मिलता.....समय पर अनुदान नहीं मिलता.....फण्ड नहीं मिलता.......आखिर वह आई ओ ए अव्वा को चलाएं भी तो कैसे........ और ऐसे में ही आ पहुँची हमारी मुन्नी बाई के रूप में कॉमनवेल्थ बाई जी..... एकदम से  झण्डू बाम बनकर.......पीड़ाहारी .......... एक तरह से टकसाल बन कर..... उनकी बार बार की फण्ड की पीड़ा पर झण्डू बाम की तरह आराम  देते ......और ऐसे में भला हमारे दाढ़ीवाड़ी जी खुश होकर नाचें न तो क्या करें...भई दबंग ठहरे.....इसी दबंगई के चलते तो वह अब तक टिके हुए थे.....।

  लेकिन दोस्त....सब का एक न एक दिन आता है और साला टिप्प देकर चला जाता है......सुना है कि दाढ़ीवाड़ी जी ने वह झण्डू बाम कहीं गलत जगह लगा लिया और अब ऐसी जलन झेल रहे हैं  कि न  कुछ कहते बन रहा है न करते.........उपर से किसी ने टाईगर बाम बनकर एकाध जनहित याचिका भी दायर कर दी है...... हालात यह है कि पानी ओनी लेकर जितना ही चाहते हैं झण्डू बाम से पीछा छुड़ाना उतना ही वह और परेशान कर रहा है......क्योंकि हाथों में तो बाम अब भी चुपड़ा हुआ है.....इतनी जल्दी तो छूटने से रहा......और मुसीबत ये कि कई सारे दाढ़ीवाड़ी जी के दरबारी फरबारी भी हटा दिए गए हैं...........भ्रष्टाचार और चोरी-चकारी के आरोप के चलते.....ऐसे समय पर वही तो थे धोवनहार.....अब बिना उनके इस  जलन और पर्पराहट से पीछा छुड़ाएं भी तो कैसे........छुड़ाते छुड़ाते पूरी चमड़ी छिल सी गई है.....खलरा छोड़ने लगा है.....सो अलग :)

 खैर,  अब मेरी चिंता यह है कि ऑल इंडिया बेवड़ा असोसिएशन के अध्यक्ष श्री बाबूराव गणपतराव आपटे जी की उस धारणा का क्या होगा जिसके अनुसार चोर लोग चश्मा नहीं लगाते......यह उनकी इस धारणा का ही चमत्कार था कि जो लोग अब तक चश्मा नहीं लगाते थे वह लोग भी इमानदार दिखने की चाहत में चश्मा लगाने लगे  :)

 ऐसे में तो अब जोर शोर से बजने ही दिया जाय .........ले झण्डू बाम हुई...... डारलिंग तेरे लिए.....वे मैं टकसाल हुई डारलिंग तेरे लिए  :)

- सतीश पंचम

स्थान - वही, जहाँ पर बाबूराव गणपतराव आपटे का स्टार गैराज है।

समय - वही, जब हेराफेरी के आरोपों के चलते बाबूराव गणपतराव आपटे को पुलिस उठा कर ले जा रही हो और बाबूराव कहे जा रहे हों.....मैं नई रे....वो राजू हलकट ने मेरे को बोला था......मार साले को मार.....हटा उसको पद से....हटा :)

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Wednesday, August 4, 2010

इस फिल्म ने तो मन मोह लिया....शहरी.....दड़बाई.....रहन सहन की मुसीबतों के बीच अपने अनोखे ह्यूमर को दर्शाती एक बेहतरीन फिल्म है 'पिया का घर' ......सतीश पंचम

    आज  घर में सुबह-सुबह एक मजेदार फिल्म देखी 'पिया का घर' ।  मजेदार इस मायने में कि फिल्म की कहानी जरा हट कर है।  फिल्म का नायक राम ( अनिल धवन) अपनी नवविवाहिता पत्नी मालती ( जया भादुड़ी - तब तक वह जया बच्चन नहीं हुईं थी ) से विवाह कर उसे शहर में अपने घर मुंबई में ले आता है ।

    विवाह अरेंज्ड ही था.... सो जाहिर है फिल्म में प्यार व्यार का लफड़ा नहीं रखा गया। जो कुछ था एक आम रूटीन तरीके से था कि दो लोगों का विवाह बड़ों ने तय किया और गाँव की रहने वाली लड़की को शहरी लड़का ब्याह कर अपने शहर वाले छोटे से घर में लाया जहाँ कि पहले से ही उसके विवाहित बड़े भइया का परिवार और माँ-पिताजी साथ रहते हैं।

 अब असली मुसीबत शुरू होती है कि इतना बड़ा परिवार इतने छोटे घर में कैसे एडजस्ट करे। तो एक ओर केबिननुमा दड़बे वाले रूम में दूल्हे राम के बड़े भाई अपनी पत्नी के साथ सोते हैं तो दूसरी ओर किचन में नई नवेली आई दुल्हन मालती सोती है। बाहर वाले कमरे में राम के पिताजी, उसका छोटा भाई और माँ आदि सोते हैं। इधर राम की आदत थी कि वह शादी से पहले घर के बाहर गलियारे में सोता था।  अब जबकि शादी हो गई तो जाहिर है कि उसे भी किचन में सोना पड़ेगा।

  लेकिन किचन की मुसीबतें अलग थी....वहाँ सोने पर रात बिरात किसी को प्यास वगैरह लगती तो दरवाजा खटखटाया जाता......पीने का पानी आ जाने पर जल्दी उठ जाना पड़ता ताकि इससे पहले कि म्युनिस्पैलिटी का पानी चला जाए....पानी भर-भूर लो ..... और एक मुसीबत यह भी थी कि   किचन की खिड़की के कब्जे  ठीक न होने के कारण वह बंद नहीं हो पाती थी.....नतीजतन राम  वहां अपनी शर्ट टांग कर आड़ करता तो कभी चादर या लुँगी. लेकिन किचन की खिड़की थी कि वहां हवा लगते ही सब कपड़े जो टांगे जाते थे गिर जाते थे...... .और अगर मान लो सब कुछ ठीक ठाक रहता तो चूहेराम का आना जाना लगा रहता....जिससे उस नवविवाहित जोड़े के प्रेमालाप में खलल पड़ना स्वाभाविक  था।

         इसी बीच बड़े भाई के कमरे से भाभी और बड़े भाई की बातचीत वाली डिस्टर्बिंग आवाजें भी आती थीं.....जिससे नवविवाहित जोडे ने अनुमान लगाया कि उनकी आपसी बातें आदि भी वह लोग सुन  पाते होंगे... आखिर दोनों के बीच पार्टीशन भी तो केवल लकड़ी का ही था.......बड़ी मुसीबत।  चिढ़ कर राम ने फिर से गलियारे का रूख किया.....वह रोज रोज के तरह तरह के डिस्टर्बेंस से तंग आ गया था। अपने मित्र अरूण ( पेंटल) से राम अपनी इस मुसीबत की चर्चा करता है कि कैसे उसे बाहर सोना पड़ता है जबकि उसकी नवविवाहिता पत्नी किचन के अंदर।

 तो सोच विचार कर प्लान यह बनता है कि एक दिन घर के सभी लोग बाहर घूमने जांय, फिल्म वगैरह देखें और उस दिन राम ऑफिस से जल्दी आ जाय ताकि उसे अपनी पत्नी संग समय बिताने का मौका मिले। यह खटकर्म भी किया जाता है लेकिन मुसीबत फिर भी पीछा नहीं छोड़ती......घर के लोग तो बाहर जाते हैं लेकिन ऐसे में ही कोई एक पुराना मित्र पत्नी सहित आ धमकता है और नतीजा.....पूरी प्लानिंग टांय...टांय फिस्स।

 ऐसे ही हल्के फुल्के क्षणों और मुसीबतों को दर्शाती फिल्म है पिया का घर जो कि 1972 में बासु चटर्जी के निर्देशन में बनी थी।

 फिल्म के मुख्य आकर्षण हैं छोटी छोटी रोजमर्रा की चीजों में ढूँढा गया ह्यूमर.....। बाहर वाले कमरे में नवविवाहिता बहू घर के अन्य सदस्यों की जिद पर   कैरम खेलती है जबकि भीतर किचन में राम अपनी दुल्हन का इंतजार करता है कि अब आऐ.....तब आए......ऐसे में राम की भाभी दोनों को मौका देने के लिए किचन से सुपारी का डिब्बा लाने मालती को भेजती है.......लेकिन वहां जाते ही राम धर लेता है.....किसी तरह मना ओना कर मालती सुपारी का डिब्बा लिए बाहर जाती है कि लोग बाहर बैठे हैं और हम दोनों अंदर रहेंगे तो क्या सोचेंगे......।

  ऐसी ही ढेरों बातों का हल्का फुल्का सम्मिश्रण है 'पिया का घर' .

 विशेष  नोट - फिल्म में  हांलाकि कोई एडल्ट सीन नहीं है......लेकिन  इस फिल्म को हो सके तो बच्चों के साथ बैठकर न देखें क्योंकि उनकी शंकित निगाहें आपको थोडा़ सा कसमसाने पर मजबूर कर सकती हैं और मजा किरकिरा हो सकता है : )

- सतीश पंचम

स्थान - वही, जहाँ इस तरह के मुसीबतों से दो चार होना आम बात मानी जाती है।

समय - वही, जब ट्रेन में अपनी पत्नी मालती को लोअर बर्थ पर सोता देख.....अप्पर बर्थ पर सोया राम  पानी पीने के बहाने नीचे उतरता है और सुराही से पानी उड़ेलते वक्त नई दुल्हन को छूने-छाने की कोशिश करता है :)

Sunday, August 1, 2010

महिलाओं की लिखी कविताओं पर वाहवाही इतनी ज्यादा होती है कि कभी कभी अपने कविता की समझ पर भी शक होने लगता है......सतीश पंचम

      देख रहा हूँ कि ब्लॉगजगत में महिलाओं द्वारा लिखी कविताओं पर बहुत सी वाहवाही होती है......पुरूषों की लिखी कविताओं पर कम....जबकि दोनों ही के लिखे कविताओं में मुझे कोई खास अंतर नहीं नजर आता।

     दूसरी बात यह कि अगर आपको कह दिया जाय कि अच्छा याद कर बताओ कि कौन सी कविता तुम्हें याद है जो कि तुमने इसी ब्लॉगजगत में पढ़ी हो.....तो मेरा अनुंमान है कि आप सब को ढेरों कविताएं याद आ जाएंगी.....एकदम लॉट के लॉट....भई कमेंट जो इतने सारे किए होंगे।  

     लेकिन यहां कविताओं को लेकर मेरी सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि मैं उन्हें कम ही समझ पाता हूँ.....प्रेंम रस या स्नेह रस में पगी कविताएँ तो और भी समझ नहीं आती मुझे। हाँ अगर कविता में कोई खाने पीने वाली बात हो तो जरूर कविता समझ में आ जाती है ....न सिर्फ समझ ही आती है बल्कि लंबे समय तक याद भी रहती है। खाने-पीने वाली कविता के नाम पर हंसो मत यार ......ये मेरी बहुत बड़ी समस्या है।

   कविताएं याद कर बताने के मुद्दे पर मुझे ले देकर दो ही कविताएं पहले पहल मेरे जहन में आ रही हैं क्योंकि  उनमें खाने पीने की चीजों का जिक्र है।  मैंने यह कविताएं पहले पढा था ब्लॉगिंग में....लेकिन अब तक उनकी याद हैं । जबकि अब तक ब्लॉग जगत में न जाने कितनी कविताएं पढ़ चुका हूँ....फिर भी उनमें से केवल दो याद रहना मुझे कुछ अजीब सा लग रहा है।

 इनमें से एक कविता थी - वीरेन डंगवाल की लिखी  - 'चप्पल पर भात'  कविता,  जो कि कबाड़खाना पर मई 2009 में प्रकाशित हुई थी।  अब तक जस की तस याद है।  कविता यह रही  -

चप्पल पर भात

-वीरेन डंगवाल 

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क़िस्सा यों हुआ
कि खाते समय चप्पल पर भात के कुछ कण
गिर गए थे
जो जल्दबाज़ी में दिखे नहीं.

फिर तो काफ़ी देर
तलुओं पर उस चिपचिपाहट की ही भेंट
चढ़ी रहीं
तमाम महान चिन्ताएं.

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 और दूसरी कविता जो मुझे याद है वह श्री इब्बार रब्बी की लिखी कबाड़खाना पर ही प्रकाशित अरहर की दाल कविता है  ।

अरहर की दाल

कितनी स्वादिष्ट है
चावल के साथ खाओ
बासमती हो तो क्या कहना 
भर कटोरी
थाली में उड़ेलो
थोड़ा गर्म घी छोड़ो
भुनी हुई प्याज़
लहसन का तड़का
इस दाल के सामने
क्या है पंचतारा व्यंजन
उंगली चाटो
चाकू चम्मच वाले
क्या समझें इसका स्वाद!

मैं गंगा में लहर पर लहर
खाता डूबता
झपक और लोरियां
हल्की-हल्की
एक के बाद एक थाप
नींद जैसे
नरम जल
वाह रे भोजन के आनन्द
अरहर की दाल
और बासमती
और उस पर तैरता थोड़ा सा घी!

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  अब मैं जब अपने कविता सेंस को समझने की कोशिश करता हूँ और सोचता हूँ  कि यार मुझमें तो कविह़दय वाली आत्मा की बजाय किसी पेटू इंसान की आत्मा बसती  है । तभी तो  इतनी सारी कविताओं में से मुझे यही खाने पीने वाली कविताएं क्यों याद हैं।

 बाकी लोगों को देखो तो उन्हें शायद बहुत अच्छे से कविताएं वगैरह समझ आती हैं.....कितना तो लिख देते हैं कि भाव गहरे हैं.....एकदम से मन में उतर गया.....बहुत बहुत गहरे अर्थ वाला।

   और जब अपने खुद की लिखी कविताओं पर नजर डालता हूँ तो उनमें भी कहीं आमा हल्दी का जिक्र है तो कहीं कच्ची अमिया, खरबूजों की लकीरें, आम के पना आदि  का....मानों कविता न हुई किसी पंसारी की दुकान हो गई.....कोई फलवाली ठेलागाड़ी हो गई ।

   अब आप ही बताइए कि अपने में कविह़दय वाले भाव कैसे उत्पन्न करूँ कि और लोगों की तरह कुछ कविता फविता समझ सकूँ..... कुछ काव्यात्मक रच सकूँ......बड़ी मुश्किल है.....यारो :)

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 यहाँ बगल वाला चित्र मेरे भतीजे का है... जो कि अपने नन्हें पैरों से भी बड़े जूते में पैर रख खड़ा है....ठीक मेरी तरह....जैसा कि मैं बड़ी और भारी भरकम कविताओं के बीच उन्हें न समझ पाने की जद्दोजहद से गुजर रहा हूँ.....चाहता हूँ कि कहीं तो दिमाग में फिट हो जाए..... लेकिन क्या करूँ.....कम्बख्त कविताएँ मेरे भावों से ज्यादा गहरे भाव लिए हैं.....उनमें अँट जाना ठीक इस बच्चे के नन्हें  पैरों तरह  दुश्वार लग रहा  हैं मुझे  : )


- सतीश पंचम



स्थान -  वहीं, जहाँ पर लोगों के हृदय की सर्जरी का उत्तम स्थान उपलब्ध है..एकदम सस्ता और टिकाऊ।

समय - वही, जब एक कवि का दिल कसाई को लगा दिया जाय और कसाई को कवि का दिल लगा दिया जाय :)

( ऐसा नहीं है कि महिलाओं द्वारा लिखी गईं सभी कविताएं मेरे समझ से उपर की हैं....बहुत सी कविताएं हैं जो पढ़ते वक्त पसंद तो आईं......अच्छा लगा..... लेकिन फिलहाल याद नहीं हैं........ और हां.... मेरा यह लेख किसी को व्यथित करने के लिए नहीं है.........लेकिन कुछेक प्रवृत्तियों पर मन में शंका सी हुई सो यह हास्य फुहार पेश है.....take it lightly :)

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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