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Saturday, July 31, 2010

चाशनी के टुकड़े बनाती जिनगी........ गोमती वाला चित्र........और हम......सतीश पंचम


     कहा गया है कि हमेशा अपनों से उंचो की तरफ ही सोचते रहोगे तो हमेशा दुखी रहोगे, कभी अपनों से पीछे वालों के बार में सोचो तो तुम्हें एहसास होगा कि तुम कितने सुखी हो। 

यहां इस पोस्ट में एक पति अपनी पत्नी को चाशनी के टुकडों में अपनी बात समझा रहा है। अपनी कमी, अपनी नाकामी वह खुद जानता है लेकिन जो उसके बस में नहीं है वह चाशनी के टुकडों में लपेट कर बता रहा है।

  चाशनी के टुकड़े.....जिसके बारे में मेरा मानना है कि हर किसी इंसान में इस तरह की चाशनी अक्सर बनती बिगडती रहती है। समय और परिस्थितियों के अनुसार यह कभी गाढ़ी तो कभी पतली होती रहती है।

 जीवन के इन्ही सुख – दुख की बातों को बयां करती पोस्ट है - चाशनी के टुकड़े । 

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निखिल और अनिता दिख नहीं रहे।

   अरे ये क्या ? अब तो आयुश बडा हो गया है। दुसरी कक्षा में जाने लगा है लेकिन तुम हो कि अब तक उसे अपना  दुध पिला रही हो। अरे अब तो रोक दो अपना दुध पिलाना। बाहर से जब आता हूँ तो ये वहां लटका मिलता है।

    तुम ही बताओ अब मैं क्या करूँ ? न पिलाउं तो लगेगा उधम मचाने। कल रोते रोते सारा बदन जमीन पर लोटकर गंदा कर लिया था इसने। वो तो मैंने रोक लिया नहीं तो नारियल तेल की पूरी शीशी पानी में उडेलने पर तुला था।

बहुत बदमाश हो गया है। कुछ उपाय क्यों नहीं करती ?

कैसा उपाय ?

अरे वही जो मिसेज पुरी ने अपनाया था, मिर्ची वाला।

मतलब ?

अरे उनका लडका बंटी भी मिसेज पुरी का दूध काफी बडे होने तक पीता रहा था। बहुत उपाय किया, लेकिन मजाल है जो बंटी अपनी मां की छाती चिचोरना छोड दे ?

तब ?

तब क्या ? मिसेज पुरी ने अपने निप्पल्स पर मिर्ची वगैरह रगड लिया। और जब भी बंटी पीने आता उसे तीखा लगता।
धीरे धीरे उसने खुद ही छाती का दूध पीना छोड दिया।

तुम्हे कैसे पता ?

अरे मिस्टर पुरी ही तो बता रहे थे।

अच्छा तो ऑफिस में आजकल यही सब बोलते बतियाते टाईम पास हो रहा है।

अरे टाईम पास कैसा, वो तो ऐसे ही बातों बातों में मैने अपने आयुष की अब तक छाती का दूध पीने वाली बात छेड दी तो मिस्टर पुरी ने खुद ही अपने बंटी का हवाला दिया।

तो, तुम क्या चाहते हो हम भी अपने आयुष के लिये मिर्ची का लेप लगा लें।

हम नहीं सिर्फ तुम।

अच्छा हुआ जो बता दिये नहीं तो मैं तो तुम्हें भी गिनने वाली थी।

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अरे क्या आज तुमने वो नुस्खा अपनाया ।

तुम्हारे नुस्खे सिर्फ तुम्हारे दोस्तों के यहां ही कामयाब होंगे।
क्यों क्या हुआ

होना क्या था। मैंने मिर्ची को तोडकर जैसे ही अपनी छाती में लगाया जलन से जैसे जान निकल गई।
तब।

तब क्या, जैसे तैसे सह कर मैं मिर्ची लगी छाती लिये बैठी थी कि तुम्हारे लाट साहब जिद करने लगे कि दुद्धू पीना है।

तब।

मैंने भी सोचा, लो पी लो, इसी बहाने मेरे इस नये तरीके का असर भी देखूँगी।

तब क्या हुआ ।

होना क्या था, जैसे ही मेरी छाती आयुष ने अपने मुंह से लगाई सीसी करके दूर हट गया।

अरे वाह। फिर।

फिर क्या, कहने लगा मम्मी दुद्धू तीता है.....धो कर आओ।

क्या।

हां और क्या। आये बडे नुस्खे वाले।

मतलब ये उपाय भी फेल हुआ समझो।

इसमें समझना क्या है, फेल हो गया कि ।

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अरे सुनो, आज आयुष ने मेरा दूध नहीं पिया ।

क्यों, क्या हुआ।

अरे, वो अठारह नंबर का पोलियो वाला लडका है न, निखिल।
हां हा तो।

तो वही आज हमारे बिल्डिंग के नीचे से जा रहा था। उसे लंगडाता जाता देख आयुष पूछ बैठा कि वो लंगडा कर क्यों चल रहा है।

तब।

तब मुझे न जाने अचानक क्या सूझा मैंने फट से कह दिया कि वह अपनी माँ का दूध स्कूल जाने के लायक उम्र होने तक
पीता था, इसलिये भगवान ने उसे पोलियो दे दिया।

अरे वाह, फिर।

फिर क्या......आज शाम के सात बज गये अब तक उसने दूध पीने की जिद नहीं की।

चलो अच्छा है। यही सही। मालूम होता कि पोलियो के डर के कारण ये छाती का दूध पीना छोड देगा तो कब का इस उपाय को अपना लेता।

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सुनो, घर में चावल नहीं है, राशन नहीं है......कुछ भी तो नहीं है। न जाने कौन सी कमाई करते हो कि पूरा ही नहीं पडता।

अरे तो कमा तो रहा हूँ, जितना हो सकता है कोशिश तो कर ही रहा हूँ। ये तो है नहीं कि बैठा हूँ।
आग लगे तुम्हारी कमाई में। न खुद का घर है न ढंग का सूकून। हर ग्यारहवें महीने देखो तो घर बदलना पड रहा है। आखिर तुम्हारे साथ के सब लोगों का अपना मकान हो गया है। एक तुम हो कि अब तक किरायेदार बने घूम रहे हो।
आखिर वो सब भी तो तुम्हारी तरह ही काम करते हैं।

अरे यार तुम्हारा तो हमेशा का रोना है। ये नहीं है, वो नहीं है। अभी एक हफ्ते हुए पाँच हजार दिये थे। इतनी जल्दी स्वाहा हो गये।

पांच हजार दिये थे तो क्या दबा कर बैठ गई हूँ। घर में खर्चे नहीं हैं, मुन्ने की फीस नहीं भरनी है कि घर में खाना राशन पानी बिना कुछ लगे ही आ जाता है। आये हो बडे हिसाब करने। मुंह देखो जरा।

अब तुम बात को बढा रही हो।

मैं बढा रही हूँ कि तुम बढा रहे हो। पाँच हजार रूपल्ली क्या दे देंगे लगेंगे हिसाब करने। आग लगे ऐसी कमाई में।

मैं कहता हूँ चुप रहो।

नहीं चुप रहूँगी। चुप रहो चुप रहो कह कह कर ही तो अब तक मनमर्जी करते आये हो। कह रही थी कि चैताली नगर में प्लॉट मिल रहा है ले लो न दाम बढ जायगा, लेकिन मेरी सुनो तब न। आज वहीं पर शुक्ला जी ने लिया है कि नहीं। ठाट से रह भी रहे हैं और मलकियत की मलकियत बन गई है। औऱ यहाँ देखो तो हर ग्यारहवें महीने गमला दूसरों को देते चलो। थू है तुम्हारी कमाई पर।

मैं अब भी कहता हूँ चुप रहती हो या नहीं।

और वो तुम्हारा चपरासी कनौजीलाल को ही देख लो। रह रहा है न अपने खुद के घर में। भले ही झुग्गी ही सही पर खुद का तो है। और वो सिन्हा, कैसे अपने गैलेक्सी टावर में शान से रह रहा है। काम तो तुम्हारे ही साथ करता है पर ठाट देखो।

अच्छा अब तुम मेरा मुँह न खुलवाओ।

मुँह न खुलवाओ मतलब। कुछ बाकी करम रखे हो अभी जो कह रहे हो कि मुँह न खुलवाओ.......।

ओफ्फो......बैठो.......पहले बैठो। शांत हो जाओ। मेरी बात सुनो।

नहीं सुनूँगी। यही सब कहते कहते.....।

अरे सुन तो लो

कहो, क्या कहना चाहते हो।

तुम जो कह रही हो कि शुक्ला जी ठाट से हैं तो मुझसे पूछो कि वो कितने ठाट से हैं। तीन लडकियाँ हैं उनके। हर एक की शादी कराते कराते उनकी कमर टूट जाएगी। और उसमें भी जो दूसरे नंबर की लडकी है उसे तो तुम जानती है कि चल फिर नहीं सकती। अब उसका टेन्शन अलग झेलना पडता होगा शुक्लाजी को। इसकी शादी होगी कि नही, होगी तो कितना लेना देना पडेगा। दुल्हा कैसा होगा, कहाँ का होगा। तीनों के घर अच्छे मिलेंगे कि नहीं वगैरह...वगैरह। अब तुम ही बताओ, उन लोगों से हम ठीक हैं कि नहीं। हमारे तो दो बेटे और एक बेटी है। भगवान की दया से सब तंदुरूस्त हैं। आखिर सोचो, हम ज्यादा खुशहाल हैं कि वह शुक्ला।

और वो कनौजिया की जो बात करती हो कि उसके पास खुद का घर है, मानता हूँ। कभी देखा है तुमने कि कैसा घर है उसके पास। झुग्गी झोपडीयों से अब तक शायद तुम्हारा पाला नहीं पडा। वहाँ तो दिन में ही कोई जाने ,को तैयार नहीं होता औऱ तुम वहां रहने की बात करती हो। सोचो, सारे अपराध , सारी गंदी चीजें वहीं से तो निकलती हैं और तुम वहां रहने की बात कह रही हो। क्या हो गया है तुम्हें। अरे ऐसी जगह घर लेकर रहने से तो अच्छा है बिना घर लिये रहें।

और जो सिन्हा की बात करती हो तो उसके तो बच्चा ही नहीं हो रहा। हर हफ्ते छुट्टी लेता है कि वाईफ को डॉक्टर के पास ले जाना है दिखलाने। अब तक पचासों हजार रूपये तो फूँक दिये है उसने लेकिन मजाल है जो बच्चा हो जाय़ ।

अब तुम बताओ, तुम्हें ये इतने सारे बच्चे पैदा करने में कितना खर्चा करना पडा। बताओ तो।

हटो, बडे आये समझाने वाले।

अरे मैं मजाक नहीं कर रहा। सच कह रहा हूँ। उन लोगों से अपने आपको तुलना करना छोड दो। वो हमारे सामने कहीं नहीं ठहरते।

तो क्या अब दूसरो के दुख देखकर खुद को खुश होना सीखना पडेगा।

मैं वो तो नहीं कह रहा।

पर मतलब तो वही है।

अरे तुम तो खामखां , राई का पहाड बनाने पर तुली हो। चलो छोडो, चाय बनी हो तो एक कप पिला दो। जब से आया हूँ, तुम्हारे ही पचडें में पडा हूँ।

देती हूँ चाय.........वो तुम क्या कह रहे थे सिन्हा जी के बारे में, पचासों हजार फूँक दिये हैं बच्चा पैदा करवाने में।

मम्मी...मम्मी.......भईया मुझे मारता है।
क्यों मारते हो निखिल.....खेलो बेटा खेलो आं........अनिता बेटी आयुष के साथ खेलो.....निखिल , बेटा तुम भी  खेलो....झगडा मत करो आपस में। सुनिये......चाय दूसरी बना दूँ....ये चाय काफी देर पहले की है।

क्या बात है, अब तो बडा प्यार आ रहा है मुझपर.........।

अब हटो भी!

- सतीश पंचम


 ( यह आखरी वाला चित्र मैंने नाव से गोमती नदी पार करते समय खींचा था.....नाव के इस चित्र मे मल्लाह सहित चार लोग हैं..........हर एक शख्स अलग अलग दिशा में देखते हुए कुछ न कुछ सोच रहा हैं........जीवन नैया में हम लोग भी  अक्सर इसी दौर से गुजरते हैं ........हम सभी लोग इस संसार रूपी नाव में एक साथ हैं....चुप हैं.....हमारे मन में भी अक्सर कुछ न कुछ चल रहा होता हैं.....चुप चाप......और चाशनी के टुकड़े भी बन रहे होते हैं........चुप चाप  )   

Friday, July 30, 2010

उत्प्रेरक...Catalyst......जबरही बोली......ओह.....अपना इंडिया.....एकदम मुंबई माफिक..... सतीश पंचम

      सुबह का समय......  एक बस स्टॉप पर खड़ा हूँ............बस का इंतजार लंबा होता जा रहा है...... एक बस आती दिखाई दी.......करीब और करीब.......यार ये भी अपने नंबर वाली नहीं .......आएंगी तो सब एक ही नंबर की एक साथ आएंगी......बस वाले भी चाय पानी पीकर एक साथ निकलते होंगे......भाईचारा ठहरा...... एक बस आकर रूकी ही थी  कि तभी बस का इंतजार करता एक सोलह- सत्रह साल का लड़का पास आया और पूछने लगा कि यह बस कुर्ला जाती है ?  ....मैंने हाँ में सिर हिला दिया। उसने बस स्टॉप के शेड के भीतर खड़ी अपनी माँ को आवाज लगाई कि चल...चल....लेकिन उसकी माँ सुनने को तैयार ही नहीं....कहने लगी कि नहीं.....ये बस नईं जाता......मेरे को मालूम....।  इसी पूछ-पूछौवल में.....बस निकल गई।

    ओठो के उपर हल्की हल्की मुंछों के रेख वाला अब  वह कुछ  आवारा सा लगता लड़का लगा अपनी माँ को भला बुरा कहने...........लगा भुनभुनाने..... तेरे को बोला मैं.....फिर भी तू सुनतीच नईं......अबी खड़े रै आरधा कलाक ।  काफी देर तक वह बडबड़ाता रहा। मैंने ध्यान से देखा लड़के को......हल्की हल्की मुँछों के रोएं अब जड़ जमा रहे थे उसके.......हाथ में एक झोला लिए.....कानों में छोटी बाली पहने वह साँवला सा लड़का......कुछ कुछ उखड़ा सा लग रहा था....... अगली बस आई और वह दोनो माँ बेटे चले गए।

       इधर मेरी बस अब तक नहीं आई थी....... बाकीयों की बस आती और लोग निकल लेते......। धीरे धीरे  बस स्टॉप खाली हो गया........तब तक बस स्टॉप के पास ही एक टैक्सी आकर रूकी.....टैक्सी के भीतर बैठे एक पैसेंजर और टैक्सी  वाले के बीच किराए को लेकर चिकिचिक हो रही थी।  टैक्सी वाला मीटर कार्ड दिखा रहा था.....पैसेंजर अपनी ही कहे जा रहा था.....थोड़ी देर तक यह चिकचिक चली और  अंत में पैसेंजर ने कहा कि मैं.... भाड़ा नहीं दूँगा.........यह कह कर पैसेंजर टैक्सी से निकल कर मेरे बगल में आकर खड़ा हो गया। टैक्सी वाले ने भी ताव में कहा कि मत दो किराया।

   मैंने सोचा चलो....शांति हुई.... लेकिन  टैक्सी वाले ने एक क्षण रूक कर थोड़ी सी टैक्सी पीछे की और  ठीक मेरे सामने टैक्सी खड़ी कर दिया और लगा उस पैंसेंजर को गरियाने..........ए भड़वा....ए माद***.........ए....तेरा अऊरत को......तेरा .....।  उधर पैसेंजर भी मोहड़ा थामे था.... अच्छा खासा टाई वाई लगाया प्रोफेशनल.....पीछे काला पैगपैक लटकाए.....केवल इतना कहता....चल निकल ....चल.....चल ....चल। बेचारा गाली नहीं दे पा रहा था। उधर टैक्सी वाला मुझे माध्यम पा कर  उस शख्स को गाली दे रहा था....देखो ना....ये चू**....ल***  भाड़ा देने को ना बोलता.....भाड़ा नईं तो टैक्सी में काए को बैठता रे....तेरी.....।   एकाध मिनट तक  टैक्सी वाले का गालीयों वाला वन वे  ट्रैफिक चालू रहा....तब तक दूसरी कोई बस आ गई....मजबूरन टैक्सी वाले को टैक्सी बस स्टॉप से आगे बढ़ानी पड़ी और जैसे तैसे मामला शांत हो गया।

 थोड़ी देर बाद उस शख्स की भी बस आ गई और वह भी निकल लिया। उसके जाने के थोड़ी देर बाद मेरी भी बस आई एकदम कसी हुई। किसी तरह अंदर हुआ।

     बस में खड़े खड़े ही मेरी विचार धारा अभी अभी हुए इन दो वाकयों की ओर चल निकली...... सोच रहा था.....कि   पैसेंजर को बेइज्जत करने के उद्देश्य से ही वह टैक्सी वाला टैक्सी पीछे लाया और बस स्टॉप पर किसी पैसेंजर को नहीं पा ...... ठीक मेरे सामने ही टैक्सी खड़ा कर उस पैसेंजर को बेइज्जत करने लगा....... गाली फक्कड़ देने लगा। उधर वह दोनों माँ बेटे भी याद आ रहे थे कि मैं वहाँ  था इसलिए तो वह लड़का मुझसे बस के बारे में पूछ बैठा.....और जवाब देते ही अपनी माँ पर झल्लाहट निकालने लगा।

  उसी दौरान मुझे साइंस में पढ़ा उत्प्रेरक catalyst की परिभाषा याद आ गई कि उत्प्रेरक किसी क्रिया में हिस्सा नहीं लेता लेकिन अपनी उपस्थिति मात्र से किसी क्रिया की स्पीड बढ़ा देता है। इन दोनों घटनाओं में मैने कोई हिस्सा नहीं लिया था या हिस्सा लिया भी तो उस पहली वाले माँ बेटे की पूछ ताछ में केवल हाँ....नाँ कहा था.....लेकिन इस हाँ कहने से ही दोनों के बीच झगड़ा हो गया। उधर दूसरे केस में तो मैंने कुछ कहा भी नहीं....... लेकिन मेरी उपस्थिति मात्र से दो लोगों का झगड़ा लंबा चला...। यदि वह पैसेंजर अकेला खड़ा होता तो क्या वह टैक्सी वाला फिर भी उसे उतनी देर तक सुना पाता ? मैं वहां  था इसिलिए टैक्सीवाला मुझे माध्यम पा उस पैसेंजर पर चढ़ बैठा।

 यानि कि मैं साईंस की भाषा में एक तरह से उत्पेरक सा बन गया......उत्प्रेरक...... The Catalyst जो किसी प्रक्रिया में हिस्सा तो नहीं लेता लेकिन अपनी उपस्थिति मात्र से किसी  प्रक्रिया को तेज कर देता है :)

    अब जब पोस्ट लिखने बैठा हूँ तो सोच रहा हूँ कि हमारा पाला  कभी न कभी.... किसी  केटालिस्ट से जरूर पड़ता है ......इस दौरान कुछ प्रक्रियाएं पॉजिटिव होती हैं तो कुछ नेगेटिव। मेरे मामले में दोनों घटनाएं नेगेटिव किस्म की थी।  गुस्सा....झल्लाहट......और चिल्लमचिल्ली वाली घटना। लेकिन कई जगह पॉजिटिव किस्म का असर भी होता है...जैसे कि कक्षा में या हॉस्टेल में किसी अच्छे स्टूंडेंट को देख....उसके मार्क्स को देख किसी कमजोर बच्चे पर होने वाला असर......। अच्छे नंबरों वाला बच्चा उस प्रक्रिया में हिस्सा नहीं लेता लेकिन उसे देख कर .....उसकी अपने बीच उपस्थिति देख कर कमजोर बच्चे की पढ़ने की  इच्छा का बढ़ जाना अपने आप में उत्प्रेरक सा ही है.....वहीं यह भी हो सकता है कि बच्चा उसके इतने अच्छे नंबरों को देख हतोत्साहित भी हो जाय....यानि कि एक नेगेटिव असर।

     इस प्रक्रिया में एक चीज तो छूटी जा रही है.....मेरी चुप्पी।   इन दोनों वाकयों के दौरान संभव है मेरे टोकाटाकी से टैक्सीवाले का बड़बड़ाना कम हो जाता.....उस लड़के का भुनभुनाना कम हो जाता.....लेकिन थोड़ा मौजे साक़िन के अंदाज में कहूँ तो साला अपना इंडिया इदरइच मार खा जाता है :)

    जास्ती नईं बोलन मांगता.....जास्ती भंकस बी नईं..... ...बस इतना कहूँगा कि जो मुंबई में रहते हैं.....जो मुंबई को अच्छी तरह से जानते हैं......जो मुंबई की पब्लिक को अच्छी तरह से समझते हैं..... उनसे पूछिए कि क्या वह इन दोनों के फालतू लफड़ों में पड़ना चाहेंगे.....वह भी तब जब आप ऑफिस के लिए लेट हो रहे हों.......कस्टमर कॉल आ रहा हो....घड़ी की सूई भन्नाती हुई निकली जा रही हो.......शायद आप औऱ किसी शहर में हों तो बोल भी देते...लेकिन यहाँ की भागती दौड़ती जिनगी में......दो बोल चहकते हुए अगर बोलना भी चाहेंगे तो नहीं बोल पाएंगे........ये अपना इंडिया.....साला इदरइच मार खा जाता है.....एकदम मुंबई का माफिक :)


 - सतीश पंचम


( चित्र : साभार नेट से )

Wednesday, July 28, 2010

शब्दों के लुप्तीकरण पर चवनीया छाप चिंतन ........गिद्धों पर अठनीया छाप...... तो कुछ मुद्दों पर झोला-झक्कड़ सहित.......पसेरी भर का औना-पौना चिंतन..........सतीश पंचम

      
           एक समय था कि भारत में स्मगलर शब्द बहुत प्रचलित था। आम बोलचाल में भी लोग एक दूसरे को स्मगलर तक कह डालते थे…..कोई कहता कि अरे उसकी क्या कहते हो….वह तो स्मगलर ठहरा…..आर पार करके ही तो इतना बड़ा मकान बना लिया है ……ये कर लिया वो कर लिया। कहीं कुछ अनोखी या विदेशी टाइप चीज देख लेते तो तड़ से कहते स्मगलिंग का माल है। दूकानदार भी अपनी चीजों के दाम बढ़ाने के लिए पास आकर कान में मंत्र कह देते थे कि….साहब स्मगल का माल है….आसपास की दुकानों में मिलेगा भी नहीं। यह स्मगल शब्द का ही चमत्कार होता था कि खरीददार एक नजर आस पास मारता और धीरे से कहता……गुरू बड़े पहुँचे हुए हो ..इसीलिए तो मैं और दुकाने छोड़ तुम्हारी ओर स्मगल माल के लिए लपका आता हूँ।   अब देखता हूँ कि यह स्मगल शब्द लुप्तप्राय शब्दों की लिस्ट में आ गया है ठीक वैसे ही जैसे कि गिद्ध आ गये हैं लुप्तप्राय जीवों की श्रेणी में।
   
     गिद्धों से याद आया कि जब उनके लुप्तप्राय हो जाने पर एक जाँच कमेटी बन रही थी तब किसी नेता टाइप शख्स ने कहा था कि हमें गिद्धों को लौटाने का, उनके प्रजनन आदि का विचार त्याग देना चाहिए क्योंकि उनके लौटने से सीमित संसाधनों का बँटवारा करना पड़ेगा। सुनकर बगल में बैठे  एक नेता जो कि बेहद  उम्रदराज थे और जिन्हें दराज खोलने में भी सहायक की आवश्यकता पड़ती थी…….. ने काँखते हुए कहा कि गिद्ध आएंगे तो वह मरे हुए लोगों को नोंच कर खाएंगे…..यह एक तरह से पर्यावरण के लिए सहायक है लेकिन हम नेता बिरादरी इन गिद्धों से भी श्रेष्ठ हैं जो कि लोगों के मरने की कौन कहे उन्हें जीते जी ही नोंच कर खा जाते हैं और एक तरह से पर्यावरण की बहुत ज्यादा सहायता करते हैं ताकि सीमित संसाधन……के बीच असीमित जनसंख्या पर लगाम लगाई जा सके। इसी का नतीजा है कि हम अनाज भले गोदामों में सड़ा दें लेकिन मजाल है जो जनता तक उसे पहुँचने दें। जहाँ खाने पीने की चीजें इफरात में मिलने लगें तो जाहिर है लोग खा पीकर अघाए होंगे और तब काम धंदा छोड़कर जनसंख्या बढ़ाने के लिए उद्दत हो जाते हैं। सो हम उस जनसंख्या को गिद्धों के मुकाबले अच्छी तरह से काबू में किए हुए हैं।
  
     यह बात सुनकर पिलपिले मुँह वाले एक और बुढ़ऊ नेता जिनके कि खुद के  सात- आठ बच्चे थे….  ने कहा…..सीमित संसाधनों के चलते जनसंख्या को सीमित करने का काम गर्भ निरोधक चीजें जैसे कि कंडोम आदि का होता है और वह काम अगर हमें करना पड़े तो इससे बढ़कर लानत की बात और कोई नहीं हो सकती। 

       बुढ़ऊ नेता जी का इतना कहना था कि कई समर्थक उनके एकदम गदगद हो गए....क्या बात कही है दादा ने......एकदम पते की बात। उधर विरोधी गुट जो कि पिछले अध्यक्षीय चुनाव में बुढ़ऊ  के गुट से मात खा चुका था वह भी ताव में आ गया कि बुढ़ऊ ने हमें कंडोंम की उपमा कैसे दी......हम क्या जनसंख्या नियंत्रण वाले लोग हैं......  हंगामा बढ़ता गया…….एक दूसरे को कंडोम……पतवार …….आदि न जाने क्या क्या कहा जाने लगा …..…और देखते ही देखते कुर्सीयां तोड़ी जाने लगी......खट्......खुट्.....पट्ट......पुट्टटट....जाहिर है गिद्ध जाँच समिति गिद्धाचार्यों की भेंट चढ़ गई ।
 
     मैं अब  सोच रहा हूँ  कि पर्यावरण हेतु दिया जाने वाला सर्वोच्च पुरस्कार किसे दिया जाना चाहिए……..गिद्धों को या गिद्धाचार्यों को :)

 - सतीश पंचम

स्थान – वही, जहाँ पर गिद्ध अब पारसीयों के Tower of Silence से भी पलायन कर गए हैं।

समय – वही, जब एक गिद्ध शहर की ओर लौटने को हो और दूसरा कहे…..ठहरो…..वहाँ अब  tower ही tower हैं…..किस पर बैठोगे तय करो।

( चित्र - साभार नेट से)

Monday, July 26, 2010

ये मुंबई आमा हल्दी..............सतीश पंचम

 
मुंबई अक्सर ही तमाम हादसों का शिकार होते रही है....कभी लोकल ट्रेन में बम विस्फोट वाले आतंकवादी हमलों के कारण तो कभी राजनीतिक सरगर्मियों के कारण तो कभी 26 जुलाई सरीखी बाढ़ के कारण। वही बाढ़ जिसे याद कर मुंबई वाले आज भी सिहर उठते हैं......वही बाढ़ जिसने न जाने कितने लोगों को मौत के आगोश में समाने को मजबूर किया था.......  आज फिर 26 जुलाई है। वही बाढ़ वाला दिन। 

और फिर 26/11 के हमलों की याद भला किसे नहीं होगी जब पूरी मुंबई एक तरह से बंधक की तरह थी...मात्र दस आतंकवादियों ने पूरे मुंबई में कहर बरपा दिया था। हर ओर लाशें ही लाशें......चीख....पुकार....हाहाकार मच गया था। कसाब जैसे हत्यारों के कहर ढाने के बावजूद मुंबई ठहरी नहीं....रूकी नहीं.....औऱ फिर  अगले दिन चल पड़ी। उसी जज्बे को देख मैंने उस दौरान एक कविता लिखी थी....ये मुंबई आमा हल्दी।

 आमा हल्दी......जिसे कि घाव लगने पर मरहम की तरह लगाया जाता है....... मेरी यह कविता उसी  मुंबई के लिए समर्पित है जो रूकना नहीं जानती, ठहरना नहीं जानती......





ये मुंबई आमा हल्दी
ये मुंबई आमा हल्दी

इक ठेस लगी, रूक सी गई
रूक कर फिर से चल दी

ये मुंबई आमा हल्दी

पलते सपने सबके यहाँ
सब पाते हैं थोडा थोडा
हाथगाडी के बगल खडी
होती है कारें  स्कोडा

एसे सपने हैं यहाँ पर कि
है  सपनों पर ही पल्दी

ये मुंबई आमा हल्दी
ये मुंबई आमा हल्दी

कंधे से कंधा है छिलता
भीड ये भागती चलती
हाँफने पर भी हाँफ न पाए
साँसें ऐसी हैं चलतीं

हो स्टेशन या पार्क खुशनुमा
हर जगह का रेलम-पेला
हो शाम गोधूलि सुबह लपकती
हर ओर  रहे है बवेला

ये मुंबई आमा हल्दी
ये मुंबई आमा हल्दी


यहाँ वक्त नहीं मिलता खुद से
 और वक्त को भी होती जल्दी
जाने कितनें जख्मों पर
ये अक्सर  मलती हल्दी


जख्म भरे..... फिर से उठे
उठ कर  फिर से चल दी


ये मुंबई आमा हल्दी
ये मुंबई आमा हल्दी


- सतीश पंचम

स्थान - वही, जिसे अंगरेजों ने कभी दहेज के रूप में दिया था।

समय - ठीक वही, 26 जुलाई वाला... जब समूची मुंबई में पानी ही पानी था और चारों ओर हाहाकार मचा था। 

( चित्र :  साभार नेट से )

Sunday, July 25, 2010

संडे के दिन पत्नी के बजाय जब मैंने डोसा बनाया... कुछ रोचक राजनीतिक अनुभव हुए .....जाना कि डोसा बनाना भी एक कला है....आखिर देश एक तवा जो ठहरा.........सतीश पंचम

   आज sunday वाली छुट्टी के दिन जब घर में डोसा बनाया जा रहा था तब उसी वक्त पीने का पानी भी आ गया। अब या तो डोसा बनाया जाय या पानी भरा जाय। ऐसे में पत्नी को मैंने कहा कि चलो आज तुम पानी भरो और मैं डोसा बनाता हूँ।  वैसे पहले कभी मैंने डोसा नहीं बनाया था....हाँ खाया खूब है।

  तो, मैं कूद गया डोसा बनाओ अभियान में। पहले पैन में तेल की परत लगाने हेतु आधे कटे प्याज को तेल में डुबोकर उसे रगड़ा। सीं सीं की सनसनाहट हुई। लगा कि हाँ बर्तन गरम हो गया है। तुरंत एक कलछुल डोसा पेस्ट डाला। अब उसे फैलाना भी जरूरी है। सो उसी कलछुल से फैलाने भी लगा....लेकिन  वह पेस्ट न जाने कौन सा आकर्षण बल लिए था कि गर्मी में फैलने की बजाय वह थोड़ा कड़ा होकर कलछुल से ही लिपट गया। जितना ही फैलाने की कोशिश करूँ.....उतना ही चिपका जाय।  अब क्या तो तवे पर फैलाउं और क्या तो डोसा बनाउँ।  लग रहा था जैसे कि मेरा कलछुल बंगाल है और सफेद डोसा पेस्ट ..... ममता बनरजी...जितना ही पूरे देश के तवे में रेल फैलाने की कोशिश करूँ ............ममता उतनी ही सख्ती से बंगाल से चिपकी रहें ।    
   
   खैर, किसी तरह से खराब-खुरूब बना कर रख दिया।  अब सोचा कि अबकी तेल की परत थोड़ा मोटा रहना चाहिए ताकि चिपके नहीं.....इसलिए ज्यादा तेल डाल दिया। अब जैसे ही डोसा पेस्ट को तवे में डाला तो किनारे पर कुछ पेस्ट का हिस्सा चला गया। तवे के उसी किनारे पर सारा तेल जाकर पहले से इकट्ठा हो गया था।  अब क्या...एक ओर सफेद डोसा पेस्ट.....दूसरी ओर तेलीहर क्षेत्र.........दोनों के मिलन स्थल पर सनसनाहट सी दिखने लगी.....पतले किनारे तो तेल की परत से हल्के हल्के फड़फड़ाने लगे।  लग रहा था जैसे कि सीमा विवाद उत्पन्न हो गया हो। डोसा कहे यह मेरा क्षेत्र है....तेल कहे यह मेरा.....अब नीचे से आग तो नेताओं की तरह मैंने ही लगाई थी.....सो जाहिर है दोनों के मिलन स्थल पर हलचल होगी ही। लेकिन यह माजरा ज्यादा देर तक न चला। आग से कुछ ही देर में डोसा की वह गीली  परत सूख गई और तेल भी समझ गया कि अब लड़ने झगड़ने से कोई फायदा नहीं है.....अब समय काफी बीत चुका है.... सो ठीक हमारी जनता की अन्य समस्याओं की तरह खुद- ब - खुद मामला सुलट गया......समय बड़ा बलवान होता है यह फिर साबित हो गया। 

   लेकिन अभी कहां....अभी तो मुझे और डोसा बनाना था। सो फिर एक बार डोसा पेस्ट डाला। अबकी डोसा पेस्ट  तवे पर  डालते समय उसके कुछ हिस्से डोसा के मूल बड़े भाग से अलग गिर गए हांलाकि वह गिरे तवे पर ही थे। जब मैंने ध्यान दिया तो लगा कि अरे यार यह वाला हिस्सा तो श्रीलंका की तरह अलग थलग द्वीप सा लग रहा है।  इसे भी मूल डोसा का हिस्सा होना चाहिए। इसलिए मैंने मूल डोसा के गीले हिस्से को कलछुल से खींच खांच कर इस छोटे द्वीप से मिलाने की कोशिश की लेकिन मूल डोसे का उपरी हिस्सा तब तक आँच से  सख्त हो गया था। भारत की तरह। मानों कह रहा हो...श्रीलंका की समस्या उसकी अपनी है। वह अलग थलग पड़ा तो तुम क्यों उसे मिलाने पर तुले हो। लेकिन डोसे का तमिलनाडु वाला हिस्सा कह रहा था कि नहीं...आखिर वहां के लोग भी तो हमारे डोसा पेस्ट वाले ही है। उन्हें यूँ नहीं छोड़ा जाना चाहिए। इसी जद्दोजहद  में समय बीतता गया और डोसा कड़क हो गया। जो जहां था वहीं का रहा। डोसे का मूल हिस्सा भारत की तरह अपनी जगह....श्रीलंका का छोटा हिस्सा अपनी जगह। समय फिर बलवान साबित हुआ। 

     अब फिर मैने पहले वाले डोसे को तवे से अलग कर तेल की परत जमाना शुरू किया। लेकिन तेल लगाते समय जो आधा कटा प्याज था वह अचानक खलरा छोड़ने लगा.... उसका छिलका उतरने लगा....मानों कह रहा हो कि क्या मैं ही बचा हूँ सीआरपीएफ की तरह हमेशा नक्सलियों से आफत मोल लेने के लिए। चमचों का इस्तेमाल क्यों नहीं करते इस तेल लगाउ अभियान में। अगर तुम्हारे चम्मचों ने सही से काम किया होता.....विकास की परत हर ओर बराबर फैलाई होती तो क्या मजाल जो नक्सली आँच का सामना करना पड़ता। लेकिन तुम अपने चम्मचों को तो शोकेस में सजाए हो और तेज आँच के बीच तेल लगाने मुझे भेज रहे हो...यह कहाँ का न्याय है। चलो हटो....अब मेरी परतें झड़ने लगी हैं। 
 मजबूरन मुझे चम्मच का सहारा लेना पड़ा और जब उससे तेल फैलाने लगा तवे पर.... तब आदतन तेल एक विशेष क्षेत्र की ओर जा कर टिक जाता....ठीक वैसे ही जैसे आरामपसंद राजनीतिज्ञ अपनी राजनीति की मलाईएक विशेष कोने में रखे हुए होते हैं।  चूँकि पहला वाला आधा प्याज काफी घायल हो चुका था  इसलिए मैने प्याज के बाकी बचे दूसरे टुकड़े वाले हिस्से को उपयोग में लाना शुरू किया। लेकिन वह प्याज चूँकि नया था सो तेल की परत लगाते समय ज्यादा सनसना रहा था। सीआरपीएफ की पुरानी टुकड़ी के मुकाबले उसे अनुभव कम था....जाहिर है....प्याज बयानबाजी कर रहा था। अनदेखे इलाके में आँच लगना स्वाभाविक था नये प्याज को।  
  
 इधर मैं अपनी पत्नी को एक से एक बहाने गढ़ कर बता रहा था कि आँच तेज थी...प्याज जल उठा.... इसलिए डोसा काला पड़ गया.... वगैरह वगैरह....ठीक चिदंबरम जैसी हर हमले के बाद वाली बातें .... बहाने वगैरह वगैरह। 

 थोड़ी देर बाद फिर वही हाल.....डोसा अब जल कर बहुत काला पड़ गया।  मैंने पत्नी से कहा कि आसपास जरूर कोई  रेडिओएक्टिव तत्व है जिसकी वजह से डोसे काले पड़ रहे हैं।

  यह सिलसिला काफी देर चला।  राम राम कर किसी तरह डोसे बन गए। 

 मैं अब सोचता हूँ कि यह देश एक डोसा मेकिंग एक्टिविटी  की तरह है....नीचे से आँच तो नेता लोग लगाते ही रहते हैं.....लेकिन हर मसला समय बीतने के साथ या तो खुद ब खुद सुलझ जाता है या सख्त होकर कभी न सुलझने के लिए काला पड़ जाता है । इसी बीच रह रह कर  काला पड़ने के लिए किसी बाहरी तत्व यानि की रेडियोएक्टिव तत्व की दलील जरूर दी जाती है :) 

    इन सारी बतियों में समय का बड़ा महत्व होता है। जब तक गीला है तब तक तेज आँच के बीच भी मामला सुलझ सकता है...समय बीतने पर .......दंतेवाडा़ और कश्मीर बनते देर नहीं लगती। 

- सतीश पंचम

( thinker का चित्र नेट से साभार......बाकी सभी चित्र मेरे मोबाईल कैमरे से लिए गए हैं.... आज सुबह जब मैं डोसा बना रहा था तभी डोसा बनाते वक्त आने वाली इन तमाम  मुश्किलों को देख मेरे मन में व्यंग्यात्मक खुराफातों ने जन्म लेना शुरू किया और बदले में बनी यह पोस्ट  :)

Saturday, July 24, 2010

रिक्शेवाले की तपिश.......बस वाले की आराधना.....संसद की चिचियाहट.........लालीपाप-ए-लपूझन्ना.......तुम्हारी बकलंठई.......और मैं...सतीश पंचम


    तेज कड़कती धूप के बीच शहर जा रहा हूँ........ड्राईवर की सीट के आसपास कई देवताओं की तस्वीरें लगी हैं....हनुमान जी हैं .....गणेश जी भी हैं......... लोग एक एक कर  आ रहे हैं..........दौरी - झपिया लिए हुए......लगन बियाह का मौसम ठहरा............एक जगह नजर पड़ती है...... ड्राईवर सीट के एकदम पीछे लिखी पंक्तियों पर-  50 % सीट महिलाओं के लिए आरक्षित।   एकाएक मेरी आँखों के सामने संसद घूम उठी है....महिलाओं के आरक्षण के नाम पर  बेवजह की लफ्फाज राजनीति का ठिकान........हम महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए बिल लाएंगे.....हम ये करेंगे....हम वो करेंगे...........आरोप प्रत्यारोप.......अनुनय.....विनय .....के बीच इतनी धारदार....जोरदार  बहसे............. इतनी ....कि.. संसद के पलस्तर तक झड़ने लगे । लेकिन महिला आरक्षण......ले देकर......मिला भी तो....... लालीपाप-ए-लपूझन्ना.......कहने वाले कहते रहें......मोर बलम सुतवईया.....मैं ही आखिर कितना झनखूँ........। 

  रोज हजारों लाखों के वारे न्यारे करने वाले महानुभावो...... . यहां देखो....एक गाँव की बस में आरक्षण हो चुका है.....महिलाओं के लिए पच्चास प्रतिशत.....तुम्हारी बकलंठई से कोसों आगे है मेरा देहात......।  
 ...............
...............
    
 बस शहर आ चुकी है......उतरते हुए नजरें घूमती हैं......सामने ढेर सारे रिक्शा वाले.......ट्रिन ट्रिन घंटी बजाते .......कहिए.....कहाँ चलेंगें........।  इतनी तगड़ी धूप  में सड़क पर पैदल चलना मुश्किल है.......लोग बिना गमछा बाँधे  कम ही दिख रहे हैं.....इस तपिश में कौन जान दे...... एक रिक्शा कर ही लिया जाय...........। 

 एक नौजवान रिक्शा वाले से बात चीत करता हूँ.....

कितना लोगे....

पच्चीस !!!

अकेला हूँ.....फिर भी पच्चीस ? 

धूप भी तो देखिए.....रस्ता भी तो लंबा है....खींचान पड़ेगा ....।

खींचान.......क्या शब्द दे गया रिक्शेवाला.........

     मैं अक्सर इस तरह के  रिक्शे वालों से मोलभाव बिल्कुल नहीं करता....उनकी मेहनत.......उनका पसीना देख अपनी वातानूकूलित कमाई पर शर्म सी आने लगती है.......लेकिन एक बार टोकता जरूर हूँ कि कितना ज्यादा ले रहे हो.........बकलोलई वाले ये पूछ-पछोर करते शब्द खुद- ब- खुद जबान पर आ जाते हैं!

 मुंह पर गमछा लपेट.... रिक्शे का शेड उपर की ओर खींच उसकी छाँह में बैठते हुए कहता हूँ - चलो

 तेज  लू के थपेड़ो के बीच आसमान से आग उगलते माहौल में रिक्शे वाला चल पड़ा .....चेन की आवाज आ रही है....किर्ररर.......किर्ररररररर!!!!

       तभी नजर पड़ी.......  रिक्शे वाले नें इतनी तेज धूप के बीच कोई गमछा नहीं लपेटा है.....कोई टोपी या लू से बचाव का उपाय नहीं किया है। एक ओर मैं रिक्शे के शेड की छाँह में बैठा हूँ.....उधर दूसरी ओर सामने  ही पीठ है रिक्शे वाले की.....पसीने से तर बतर......तपिश मुझे महसूस होने लगी है।

 कोई गमछा-ओमछा नहीं रखे हो क्या ?

है गमछा....

लपेटते क्यों नहीं.......इतनी गर्मी है.....यार संभाल कर रहो.....काहें जिउ दे रहे हो।

किर्रररर किर्ररर की आवाज थम गई....रिक्शे को साईड में लगा रिक्शे वाला उतर गया...मेरी ओर मुड़ते हुए  बोला - तनिक उठिए तो....

क्यों.....क्या हुआ ? 

यही सीटीया उठानी है जरा....

ओह.....तो जिस पटरेनुमा सीट पर बैठा हूँ उसी के भीतर बने इस बक्से के भीतर इसका गमछा रखा है.......

एक नीला चौकड़ीदार गमछा निकाल कर रिक्शे वाला फिर अपनी सीट पर जा बैठा......किररररर.....किरररर

अब .... गमछा बाँधे रिक्शे वाले को देख कुछ सहज महसूस कर रहा हूँ ।

 रिक्शे पर बैठे-बैठे..... रास्ते की दुकानों पर भी देखता जा रहा हूँ...........डोरा अंडरवियर......सलीम टेलर......बुद्धू मिस्त्री.....हमारे यहाँ फटे पुराने नोट लिए जाते हैं.......अबे ए रिक्शा......अरे तोहरी बहिन क......किर्ररर.......किर्रर....

  दुकानों पर देखता हूँ कहीं विवाह हेतु मौर सजे हैं......कहीं साड़ियाँ..........कहीं मिठाईयां.......। 

विवाह......एक अर्थतंत्र...... जाने कहाँ से कहाँ रूपया घूमता फिरता है......शादी वाले घर से निकलकर....... बाहर से आने वाले नाते रिश्तेदारों की जेब से........ बाजे वाले की जेब से..........बीडी़ वाले की दुकान............पान वाला........मौर वाला......मिठाई वाला.....पटाखे वाला.......कपड़े वाला........रूपया रे रूपया...........किर्ररर.... किर्रररर.....

ओह.....  रिक्शे वाले का पैडल रूक गया है..........चलूँ..... उतरूँ.......... शहर आ गया है......रिक्शेवाला चला जा रहा है......किर्ररररर..........किर्रररररररर !!!

- सतीश पंचम


स्थान - वही, जहां पर इस तरह के रिक्शे नहीं चलते।


समय - वही, जब मेरा रिक्शेवाला एक जगह कार वाले से सट सा गया और कार के भीतर बैठे किसी लौंन्डे ने गरियाया..........ए रिक्शा...........तोहरी बहिन......क.....। 


 संभवत: कार के डैशबोर्ड पर किसी देवता का चित्र लगा था.....देवता का !!!

[ यह संस्मरण.....मेरी ग्राम्य यात्रा के दौरान के है....... सभी चित्र मैंने उसी दौरान हिंचे थे]


ग्राम्य सीरीज चालू आहे.........

Sunday, July 18, 2010

अमवा की डार पतरानी....सुगन फिर आना तो जानी.....गँवई ब्याह......हरियर राह......लकड़ी वाले सुग्गे.. .मिठउ आम.......सतीश पंचम

 
        गाँव की पगडंडियों के बीच से चला जा रहा हूँ...........पूरूआ बयार चल रही है...... आम के पेड़ झूम रहे हैं......    अमराई की  महक उठ रही  हैं......ऐसे में नजर जाती है मौर छुड़ाने जा रही है महिलाओं के झुंड पर.....मौर छुड़ाई....विवाह बाद की एक रस्म।

 गीत सुन  रहा हूँ......

अमवा की डार पतरानी
सुगन फिर आवा त जानी...

मन हिलोर गीत की पंक्तियाँ सुन एक तरह का सूकून पाता हूँ......मन ही मन दोहराता हूँ....क्या गाया जा रहा है..........सुगन फिर आना तो जानूं.....वाह ....कितनी सुंदर पंक्तियाँ हैं ।

अमवा की डार पतरानी 
सुगन फिर आवा त जानीं

उड़ी के सुगन हमरी मंगीया पर बैठा
लै गया टीकवा निसानी
सुगन फिर आवा त जानी


अमवा की डार........











  गीत सुनते हुए सूप में रखे मौर के हिस्से  पर नजर पड़ती है........कितना तो सुंदर होता है मौर......सफेद ....पीले चमकते लट्टूओं से सजा मौर......विवाह के बाद उसी मौर के एक छोटे हिस्से को लेकर....एक सूप में रख आगे आगे दूल्हा.....पीछे पीछे महिलाओं की गवाई.......कितना मोहक दृश्य है वो.....।


उड़ी के सुगन मोरे कमर पर बैठा
लै गया करधन निसानी
सुगन फिर आवा त जानी
अमवा की डार पतरानी.......

       दूल्हे के सिर पर सजे मौर का भी एक जीवनकाल .....मौर सिर पर बाँध जब दूल्हा मंडप में खड़ा होता है तो लोग मंड़वा नापने लगते हैं..... मन ही मन................याद आता है बगल के गाँव की शादी......दूल्हा लंबा तंबा है इसलिए मौर की उंचाई और दूल्हे की उंचाई जोड़कर मड़वे की उंचाई ज्यादा रखी गई थी.......इतनी.... कि... विवाह बाद जब लकड़ी के बने सुग्गे   की लूट ( एक रस्म) हुई तब ज्यादा सुग्गे लूटने की होड़ में.... कितनों के तो हाथों पर मड़वे में लगे सरपत ने अपनी धारदार निशानी छोड़ दी थी..........लकड़ी के सुग्गे .....माने ....लकड़ी के बने तोतों का सेट - देखें चित्र। इन लकड़ी के तोते लूटने मे भी गजब का आनन्द..... लोग हास परिहास से भी  नहीं चूकते.......।  लड़के वाले इन सुग्गों को लूट कर अपने अपने घर ले जाते हैं......बच्चे अक्सर इस तरह के सुग्गे पा जाने पर मन ही मन मुदित होते हैं......एक निशानी.....सुगन फिर आवा त जानी....... ।

 अब जब यह लेख लिखने बैठा हूँ तो मन ही मन सोच रहा हूँ कि क्या कारण है  कि गाँव में आम और सुग्गे को साथ-साथ बहुत याद किया जाता है.....महिलाओं के गीत में भी सुगन था....आम की डार थी..........। उधर विवाह हेतु जो कलश सजा था उसमें भी आम की पत्तियाँ सजी थीं....बाँस से सटा कर लकड़ी वाला सुग्गा बाँधा गया था......। 


उड़ी के सुगन मोरे गले पर बैठा

लै गया हरवा निसानी
सुगन फिर आवा त जानी



 याद आता है कि बचपन में आम के पेड़ के नीचे जा खड़ा होने पर जब कभी कोई आम पक्षीयों द्वारा काट कर गिराया जाता तो लपक कर उसे उठा लेता था......साथीयों ने बताया था .... सुग्गा- कटवा आम यानि कि तोते द्वारा आधा खाया हुआ आम मीठा होता है .......मिठऊ होता है।

पुन: आम और सुग्गे का जोड़......।  

 सोचता हूँ कि इस गँवई जीवन......आम की मिठास.......और हरे तोतों के बीच जरूर कोई रिश्ता है......तभी तो हर ओर दोनों का संदर्भ साथ साथ ही है......। 


उड़ी के सुगन मोरे हाथे पर बैठा
लै गया कंगना निसानी
सुगन फिर आवा त जानी

अमवा की डार पतरानी.....
सुगन फिर आवा त जानी


अहा ग्राम्य गीत.....
   
- सतीश पंचम

स्थान - वही, जहाँ पर सुग्गे ( तोते ) यदा कदा दिखते तो हैं पर वह बोलते नहीं......न जाने शहर ने क्या कर दिया है उन पर।

समय - वही, जब एक परदेशी अपनी पत्नी को घर छोड़ शहर चला जा रहा हो और पत्नी कह रही हो  -
 सुगन फिरि आना....... । 

[ सभी चित्र मेरे निजी कलेक्शन से ........  ग्राम्य सीरीज को समाप्त करने की सोच रहा था लेकिन न जाने कहां से एक एक यादें हिलोर मारने लगती हैं कि ग्राम्य सीरीज आगे ही आगे बढ़ती जा रही है ]
ग्राम्य सीरीज चालू आहे......


Wednesday, July 14, 2010

मड़ैया-ए-हिन्द......पानी ठेलउवल .....खेतिहर देहात......मुस्की मारते प्रधानमंत्री......समर सेबुल........स्टेबलाइजर.... और मैं.........सतीश पंचम

    

         गाँव में अक्सर खेतों की रखवाली करने के लिए खेतों के पास ही मड़ैया आदि डालने का चलन है। छोटी सी मड़ई......एकाध बँसखट.....लालटेन। बस यही होता है ऐसी गँवई पाही के तहत। अब तो समर सेबुल ( एक तरह का पंपिंग सेट) का भी चलन आ गया है जिसमें कि मेन मोटर जमीन के भीतर गाड़ी जाती है और जमीन के उपर सिर्फ एक वोल्टेज कंट्रोलर के रूप में स्टेबलाईजर रखा होता है। आधुनिक पाही का एक जरूरी कल-पुर्जा।

  
      इन्हीं जरूरी कल-पुर्जों में से एक है प्लास्टिक की फोल्ड  पाइप.....जो कि खेतों में पानी पहुंचाने का काम करती हैं। जब इन पाइपों से पानी गुजरता है तो फूली पाइपें एकदम अजगर की तरह लगती हैं। लोग अब बरहा (पानी हेतु जमीनी नाली ) का उपयोग कम करने लगे हैं....क्योंकि उससे पानी का वेस्टेज बहुत होता है और जब तक पूरा बरहा भरने के बाद पानी आगे खेत की ओर बढे तब तक लाईट कट हो जाती थी.....चलो फिर से पानी ठेलने का इंतजाम करो....। इन प्लास्टिक की पाइपों को एक बार फैलाने की देर है.....उसके बाद तो सर्र से पानी यथास्थान पहुँच जाता है।  और कई कई बार तो किसी पाइप को यूँ ही दस बारह दिन तक फैलाए रखा जाता है.......खेती किसानी का काम है ही ऐसा। अब इसमें एक नुक्स यह है कि जहाँ जहाँ से यह पाईप गुजरती है वहां की फसल दब जाती है और जमीन पर एक लकीर सी बन जाती है। वहां कुछ उग नहीं पाता थोडे समय के लिए  और हरी भरी फसल के बीच पतली लकीर वाली पगडंडी को देख अजीब सा लगता है।  एक खेत का नाम तो मैंने ही गजनी खेत रख दिया है क्योंकि आमिर खान के गजनी फिल्म में सिर के उपर जिस तरह का कट मार्क है....ठीक उसी तरह का लकीर मार्क मेरे खेत में भी पाइप बिछी होने के कारण बन आया था।  सो गंवईं जीवन....चीजें यत्र तत्र फैली रहती हैं। कभी कभार चोरी-चकारी भी हो जाती है...पता चला किसी का पाईप कम पड़ रहा था तो यहीं से काट ले गया है.......।

 हाँ...तो बात हो रही थी पाही की....मड़ैया की........  चूँकि ऐसे स्थान घर से थोड़ी दूरी पर होते हैं तो ऐसे में इस तरह के स्थान अक्सर किसी न किसी किस्म के हल्के-फुल्के लम्हों को गुलजार करने के उपयुक्त स्थान हो उठते हैं। ऐसी ही गुलजार करती बतकही की गवाह है यह मड़ैया। इसीमें काशी का अस्सी किताब भी खोंसी हुई है। एक ऐसी किताब जिसका सस्वर पाठ केवल इसी तरह के एकांत स्थान पर किया जा सकता है। कुछ शब्द हैं ही इतने अश्लील कि उन्हें बोल-बोल कर पढ़ना बड़ी शर्मिंदगी दे जाता है।

  एक दिन इसी मड़ैया में हँसी-मजाक.....गोपन-गाथा...... गाँव में कहाँ क्या हुआ जैसी  बातों को अपने हमउम्र सखा......चचेरे भाई के साथ बैठ बतिया रहा था।  दुपहरीया में इसी मड़ैया में बैठ काशी का अस्सी का  सस्वर पाठ भी कर रहा था......बोल बोल कर .....थोड़ा मजे लेकर....। चचेरा भाई भी एक एक शब्द पर हंसी मजाक के बीच  थपोड़ी पीट रहा था हँस हँस कर......मैं भी मगन......क्या लिखा है काशीनाथ सिंह ने........एकदम गँड़उ गदर......

 किताब की एक बानगी देखिए कि..... बनारस के बेफिक्र अंदाज को बताते हुए काशीनाथ सिंह लिखते है  -

- जमाने को लौ* पर रख मस्ती से घूमने की मुद्रा आईडेंटिटी कार्ड है इसका...


- खड़ाउँ पहन कर पाँव लटकाए पान की दुकान में बैठे तन्नी गुरू से एक आदमी बोला- 


किस दुनिया में हो गुरू। अमरीका रोज रोज चाँद पर आदमी भेज रहा है और तुम हो कि  घंटे भर से पान घुलाए जा रहे हो।


 मोरी में पच् से पान की पीक थूक कर तन्नी गुरू बोले - देखौ...एक बात नोट कर लो। चन्द्रमा हो या सूरज...भोंसड़ी के जिसको गरज होगी, खुदै यहाँ आएगा। 


  तो ऐसी और तमाम साहित्यिक-असाहित्यिक टिटकारीयों का ठिकान रही है यह हरे भरे खेतों के बीच खड़ी मेरी  छोटी सी मड़ैया-ए-हिंद ।

 मेरी  इसी मड़ैया-ए-हिंद में रखा गया था लगभग आठ हजार की लागत का स्टेबलाईजर.....एकदम खुले में........कोई ताला नहीं......कोई रोक छेंक नहीं......कौन साला चुराएगा......। बेफिक्र.....जैसे हम वैसे ही वह स्टेबलाईजर।

  कल शाम जब गाँव में हाल-चाल लेने के लिए घर फोन किया तब पता चला कि परसों रात जब झमक कर बरसात हो रही थी.... तब खेत के बीचो बीच खुले में मड़ैया के नीचे रखे इस स्टेबलाईजर को कोई चुरा ले गया है। आठ हजार का फटका । गुस्सा तो बहुत आया। बारिश में पैरौं के निशान खोजने की कोशिश हुई लेकिन वह निशान सड़क पर पहुँच गायब हो गए हैं। वैसे भी रात भर बारिश हुई थी।

अब.....

     गाँव में खोज-खबर ली गई....किसी रामभरोसे नाम के युवक पर शक भी किया गया है कि इसी मे चुराया होगा.....पहले भी साईकिलें वगैरह चुराने का उसका रिकार्ड रहा है। क्या पता किसी और ने ही चुराया हो....। अब यह तो जाँच ओंच के बाद ही पता चल सकता है कि भई क्या गुल खिला है ।
 
   अब तो आठ हजार का फटका लग ही गया है। और इस फटके ने मुझे रात दिन न जाने किस चिंता में डाल दिया कि मैं सपने में भी स्टेबलाईजर देखता हूँ।

 अभी कल ही एक मौज को देख-सोच रहा था.......

 मैं देखता हूँ कि अपनी उसी मड़ैया-ए-हिंद में बैठा  हूँ ...... कुछ लिख-उख रहा हूँ..... कि अचानक  प्रधानमंत्री जी आ गए।.....प्रधानमंत्री..... इतनी बड़ी हस्ती .....मेरी मड़ैया में.....हैरत होना स्वाभाविक है। पूछने पर प्रधानमंत्री जी ने बताया कि भई  जिस तरह से पुराने जमाने में राजा लोग भेष बदल कर प्रजा का हाल जानने जाते थे तो मैं भी कुछ उसी तरह का काम कर रहा हूँ। बताओ.....तुम्हारा क्या हालचाल है....।

सुनकर मैं तो खुश हो लिया कि चलो......आज इस मड़ैया-ए-हिन्द के भाग भी जाग उठे.....कल को कोई मीडिया वाला चीखता हुआ कहेगा...... ध्यान से देखिए.... यही है वह मड़ैया.....मैं फिर से कहूँगा कि यही है वो मड़ैया जिसमें प्रधानमंत्री ने सतीश पंचम का हालचाल जाना......सतीश पंचम जी.....आप को कैसा लगा जब प्रधानमंत्री ने आपसे हालचाल पूछा.......।

 मैं बता ही रहा था कि प्रधानमंत्री जी ने मेरी तंद्रा भंग करते हुए कहा - अरे कहाँ खो गए.....हालचाल सुनाओ।

 मैं भी वापस लौटा......उफ्....क्या क्या सोचने लगा.....। प्रधानमंत्री जी सामने खडे हैं और मैं उनसे बात करने की बजाय मुंगेरी लाल की तरह सपने देखने लगा।

 खैर, प्रधानमंत्री को मैंने अपनी बंसखट पर बैठने का इशारा किया.......उसी बंसखट पर जो झूल कर इतनी ढीली हो गई थी कि लग रहा था मानों वह जमीन छूने को लालायित है.....कई रस्सीयां तो जमीन छू कर मानों कह रहीं थी कि हम अपनी खाद पानी यहीं से सोखती  हैं.....।

  बातों ही बातों में प्रधानमंत्री जी से मैं बताने लगा....यहां पर ही रखा था मेरा स्टेबलाईजर......बारिश की रात चोरी हो गया। अब आप ही बताइए कि..... क्या  यही है आपके कानून व्यवस्था की स्थिति। क्या इसी के दम पर भारत विकसित राष्ट्र की श्रेणी में आ जायगा।

    प्रधानमंत्री जी ने पहले तो मेरी बात ध्यान से सुना  फिर तनिक रूक कर  कहने लगे कि - देखो.....जहाँ तक कानून व्यवस्था की बात है तो यह संवैधानिक तौर पर राज्य का मामला है। इसमें केन्द्र दखल नहीं दे सकता। और जो विकास की बात कर रहे हो कि क्या यही है भारत का विकास....तो मेरा मानना है कि हाँ....इसे विकास ही कहना चाहिए कि पहले जहाँ दस बीस रूपये की खुरपी, सौ- सवा सौ का  कुदाल, झौआ, खाँची, हल वगैरह चोरी चले जाते थे अब उसकी जगह पर आठ हजार का स्टेबलाईजर चोरी हो रहा है.....यह एक तरह से विकास की ही निशानी है। 

 मैं चुप......सुन रहा था प्रधानमंत्री जी को....मेरे पूछे गए दोनों प्रश्नों का उन्होंने अच्छा जवाब दिया । अभी उस सोच से निकल भी नहीं पाया था कि प्रधानमंत्री जी ने मेरी ओर मुखातिब होते कहा - लेकिन यह बताओ कि तुमने अपना आठ हजार का स्टेबलाईजर ऐसे खुल्ले में क्यों रख छोड़ा था.....गलती तो तुम्हारी है।

 हाँ प्रधानमंत्री जी गलती तो मेरी है ही....लेकिन जब आपके कृषि मंत्री हमारे देश के हजारों टन गेहूँ को  खुले में रख उसे सड़ा रहे होते हैं तब तो आप को उनकी गलती नहीं दिखती। बंदरगाहों पर जगह नहीं मिल पा रही नई फसल  को रखने के लिए.....वहीं पर क्लियरेंस के चक्कर में तमाम अनाज खुले में सड़ रहा है....आप की भी तो इसमें गलती है।

 प्रधानमंत्री जी मेरी बात सुन कुछ और गंभीर से हो गए......। उनकी गंभीरता देख मैंने फिर अपने मन की बात उभारी। प्रधानमंत्री जी......मेरे यहाँ गाँव में एक छोटी सी दुकान है। मैं देखता हूँ कि उसका मालिक अपनी उस छोटी सी दुकान को संभालने में ही थेथरा जाता है....बिचारा सुबह से शाम उसी में लगा रहता है......कभी दुकान में सामान भरवाने की चिंता में वह शहर की ओर भागा जा रहा है तो कभी बाजार भाव जानने के लिए यहाँ वहाँ पूछ-पछोर लगाए हुए है।  मेरी समझ में यह नहीं आ रहा कि जब एक छोटी सी दुकान वाला आदमी एक दुकान को संभालने में इतना व्यस्त रहता है तो पूरे देश के कृषि मंत्रालय को संभालने वाला मंत्री कहां से इतना समय पा जाता है कि वह क्रिकेट को भी संभाल ले जा रहा है.....। 

- बात तो तु्म्हारी ठीक है....लेकिन क्या करें...गठबंधन की मजबूरियां हैं जो हमें कुछ करने से रोक रही हैं।

- हाँ...मुझे भी यही लग रहा है.....वरना आपके रेड्ड़ीज बंधूओं के द्वारा अवैध खनन मामले में तो अब तक आप एक्शन ले चुके होते......देश भी आपकी मजबूरियों को समझ रहा है।

- सच कहूँ तो इस देश के लोग ही असल मालिक हैं......वही हमारे सर्वे सर्वा हैं...यदि वह न समझें तो कौन समझेगा......।

- तो ऐसा कहिए न कि वह जनता ही है जो एक तरह से सजन के तरह है और सरकार सजनी की तरह......जो पल पल रंग बदल रही है।

- अब तो सजन कहो चाहे सजनी.......हालात तो मजबूरियों वाले ही हैं। सरकार भी मजबूर.....जनता भी मजबूर।

 प्रधानमंत्री जी की हताशा भरे स्वर को सुन मुझे लगा कि प्रधानमंत्री जी बहुत चिंतित हैं.....मजबूरी वाली चिंता।  अभी यह बातचीत और चली होती लेकिन किसी के रेडियो से आती आवाज से मेरी नींद खुल गई....। देखता हूँ कि कोई रेडियो बजाते हुए धीरे धीरे मड़ैया की ओर मुझसे मिलने चला आ रहा है......औऱ गाना बज रहा है -

 मेरे हाथों में नौ नौं चूड़ियाँ हैं.....थोड़ा ठहरो सजन मजबूरियाँ हैं :)

- सतीश पंचम

स्थान - लिखने का आज मूड़ नहीं है

समय- कुछ ठीक नहीं चल रहा....नहीं तो क्या मेरा स्टेबलाइजर चोरी होता...... ऐसे में क्या तो लिखूँ और क्या तो बताउं :)

( स्टेबलाईजर का पता आज चौथे दिन तक भी नहीं चल सका है......मिस्टर रामभरोसे पर शक तो जताया जा रहा है पर देखिए.....रामभरोसे जी कब भरोसा दिला पाते हैं...... मेरी 'मड़ैया-ए-हिन्द' सहित सभी चित्र मेरी ग्राम्य यात्रा के दौरान लिए गए हैं....स्टेबलाईजर का चित्र नेट से साभार )

( ग्राम्य सीरीज चालू आहे....)

Saturday, July 10, 2010

नील गोदाम.....सलामी......पत्रकार-फत्रकार.....भंभ ररती कोठी.... ललकारता देहात......सतीश पंचम


    फणीश्वरनाथ रेणू जी ने 'मैंला आँचल' में एक जगह पूर्णिया के नील गोदाम का जिक्र करते हुए लिखा है कि - जब भी  गाँव का कोई नौजवान बियाह के बाद गौना करवा कर अपनी दुलहिन लेकर लौटता था तो रास्ते में पड़ने वाले नील गोदाम के पास पहुँचते ही कहता था कि गाड़ीवान....गाड़ी को जरा धीरे हाँको....दुलहिन नील गोदाम का हौज और साहब की कोठी देखना चाहती है । सुनते ही दुलहिन थोड़ा सा घूँघट सरका कर ........ओहार हटा कर देखती ..... यहाँ तो इंटो का ढेर है...........कोठी कहाँ है......।

नौजवान कहता  - देखो, वह है नील महने ( मथने ) का हौज....।

  वही हौज जिसमें कि अंगरेजी राज ने भारतीय किसानों के लाल रक्त को नीले रंग में बदल डालने की जैसे कसम खाई थी। ......  अबकी गाँव जाने पर उसी नील महने के हौज के बगल से गुजरते समय नील गोदाम की तस्वीर खींच रहा था कि तभी एक शख्स पास आ कर खड़े हो गए।  पूछ बैठे......आप पत्रकार हो क्या ? 

 नहीं भई....पत्रकार फत्रकार कुछ नहीं हूँ.......बस गाँव आया हूँ.......यहीं बगल में आया था...... घूम घामते इस नील गोदाम के करीब आ गया......सो.... तस्वीरें इसलिए ले रहा हूँ.......।

 लेकिन मेरी समझ में यह नहीं आ रहा कि खंड़हर की तस्वीर में कौन चीज है जो आप इसे हींच रहे हैं। 

 बस ऐसे ही हींच रहा हूँ ......अच्छा लगता है.....। 

वो तो ठीक है.....लेकिन देख रहे हैं सब गाँव वाले हग-मूत कर खराब कर दिए हैं.........। सुबह आइए तो देखिए कि कैसे अंगरेज लोग को भारत वाले उनके ही नील गोदाम पर बैठ सलामी देते हैं। 


सलामी........ क्या बात कही......बातों ही बातों में नील गोदाम की तस्वीर खींचने लगता हूँ।  याद आता है कहीं कुछ पढ़ा हुआ कि ...... नील बनाने की प्रक्रिया के तहत नील की पत्तियों को इस पानी भरे हौज में डालकर सडाया जाता था......सड़ाने के बाद मथा जाता था और उसी दौर में निकलता था नील.......वही नील जिससे उठी ललकार ने भारत को पराधीन तंत्र से स्वाधीन तंत्र की ओर चलने हेतु अधीर कर दिया  ।

  तस्वीरें लेते समय मैंने ध्यान दिया कि नील गोदाम से ही सटा  है एक कुँआ........ जिससे कि पानी खींचकर नील मथने वाले हौज को भरा जाता होगा.......। कुँएं के मोटे-मोटे छूही ( घिरनी- स्तंभ ) को देख अंदाजा लगाता हूँ कि कितना सारा पानी इस कुँए से रोज खींचा जाता होगा । 

 नील गोदाम के बगल से सटी सड़क देख पता चलता है कि नील व्यापार के लिए  ही इस सड़क यातायात का समुचित प्रबंध किया गया होगा ताकि नील की फसल लिए बैलगाड़ीयों को नील गोदाम तक पहुँचने में आसानी हो और यहाँ से नील बाहर भेजी जा सके।
  
 उधर नील गोदाम का परनाला पहली ही नजर में कुछ  विशिष्ट किस्म का लग रहा है.....तीन मुहाने और तीनों अलग अलग आकार के.......  आस पास सटे हुए। 

  चंपारण में सन् 1917 में गाँधी जी ने नीलहे अंग्रेज अफसरों द्वारा किसानों से जबर्दस्ती तीन कठिया प्रणाली के तहत नील उगवाने का जमकर विरोध किया था .......तीन कठिया प्रणाली.....यानि कि  हर किसान को अपनी जमीन के 3/20 हिस्से पर नील उगाना जरूरी।

    इस प्रणाली को बनाए रखने के लिए..... नील  उगाने के लिए..... किसानों को नीलहे अंग्रेज अफसरों ने महंगे ब्याज पर कर्ज दिया........एक ओर अनाज की बजाय.......जबरी नील उत्पादन करवा कर शोषण.....दूसरी ओर   लिया हुआ कर्ज...... हालत यह थी कि एक बार लिया हुआ कर्ज गले की फांस बन कसता जाता.....कसता जाता....... ठीक हमारे वर्तमान में विदर्भ क्षेत्र के कपास उगाने वाले किसानों की तरह नील किसान भी छटपटाते रहते  । आज, फिर हालात वही है...... हमारे इन कपास उत्पादक किसानों को भी सरकार अच्छा खासा कर्ज दे रही है....खुलकर.....लेकिन यह कर्ज कब और कैसे लौटा पाएंगे किसान...... इसकी किसी को फिक्र नहीं है। फिक्र है तो उन सरकारी आँकड़ो की कि, जो सहायता राशि के नाम पर कागजों में चुप्पे से उतर आती है और रजिस्टरों में आराम फरमाती है.....यह कहते कि हमने तो गरीब किसानों की सहायता ही की है.......अब कोई और किसान आत्महत्या करे तो हम क्या करें............ सहायता राशि..........मरणोपरांत  कागज के फूलों में बदल जाती है।

   वैसे, नील युग का अवसान होने के कारणों में जहाँ एक ओर जर्मनी द्वारा नये किस्म के रासायनिक रंगों का अविष्कार था तो दूसरी ओर  1917 में चंपारण में गाँधीजी द्वारा चलाया गया नील आंदोलन........विरोध इतना तगड़ा था कि अंग्रेज पीछे हटने पर मजबूर हुए। बीरभूम, पाबना, खुलना आदि इलाके नील विरोध के मुखर क्षेत्र थे।   उधर जर्मनी के सस्ते और विविध रंगों ने भारतीय प्रणीली से बनने वाले नील के बाजार को ध्वस्त करना शुरू कर दिया दिया था .....धीरे धीरे नीलहे अंग्रेज साहबों की कोठियों पर भंभ ररने लगा........और एक वह भी समय आया कि नीलहे किसानों ने अपनी विजय पताका फहरा दी.............भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक सफल युद्ध। 

  परंतु  वर्तमान में विदर्भ के कपास उत्पादक  किसानों की  जो हालत है...... कभी वही हालत नील की फसल उगाते किसानों की भी रही थी। उस समय संगठित विरोध का स्वर विदेशीयों के प्रति था........ अब .......अब किसका तो विरोध किया जाय और किसका समर्थन......कुछ समझ नहीं आता......। परिस्थितियां गड्डम गड्ड हैं........हमारी ही सरकार.....हमारे ही लोग.....लेकिन फिर भी किसानों की आत्महत्या रूकने का नाम नहीं ले रही। गरीबी, सहायता, मौत, मुआवजा......इस सब का कुचक्र चल ही रहा है......जो चीज पहले हो रही थी....अब भी वही हो रही है.....बस रंग बदल गया है......पैकिंग वही है.....।


 तनिक इन दो चित्रों को देखिए....एक में नील है......दूसरे में कपास ..... दोनों ही चीजों के बाँधने का तरीका एक समान ही है.......।  अगर हालात कुछ नहीं बयां करते हैं तो कोई बात नहीं.....लेकिन यह जालीदार पैकिंग तो बहुत कुछ बयां कर रही  है । नील भी उसी तरह पैक की जाती थी.....कपास भी।    

  अब चंपारण केवल बिहार में ही नहीं है.....भारत के हर राज्य में है.....। अफसोस, भारत में फैले इन तमाम  चंपारणों को चेताने के लिए......ललकारने के लिए कोई राजकुमार शुक्ल जैसा किसान नहीं है .......कोई गाँधी नहीं है....कोई ललकारता देहात नहीं है।


- सतीश पंचम


( ग्राम्य सीरीज चालू आहे......)

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