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Sunday, June 27, 2010

नदी तीरे का रास्ता....कोलतार वाली सड़क.....गँवई पूछ-पछोरन.....घिरती बदरी.....और मनोज मिश्र जी संग हुई एक गँवई ब्लॉगर बैठकी........सतीश पंचम

          जौनपुर के एक गाँव में.........गोमती नदी के  किनारे एक नाव में खडा होकर नाव खुलने का इंतजार कर रहा हूँ........ सवारी लेकर नाव खुलने की तैयारी में है. .....शाम का समय .........दोपहर तक तपिश लिए लू चलने के बाद अब जाकर कुछ ठंडी हवा चल रही है..... देखते देखते .नाव वाले ने नदी किनारे से लगी रस्सी खोल दी..... कि........   तभी किसी की आवाज सुनाई दी......रोक के........हो..... ......रोक के......।

    नाव वाले ने एक नजर किनारे पर दौडाई और इत्मिनान से कहा  .........बढ़े आओ।

     और तभी नाव में सवार लोगों ने देखा कि सिर पर सफेद  गमछा रखे एक उम्रदराज शख्स सरपत की ओट से चला आ रहा था......इत्मीनान से.....धीरे धीरे। नाव में सवार एक शख्स ने चुहल करते  कहा - अरे जल्दी आओ ......धीरे धीरे आ रहे हो.....मालूम पड़ता है चौके पर बैठने जा रहे हो......चौके पर बैठना यानि विवाह करने के लिए मंडप में जाने वाली प्रक्रिया । नाव में सवार बाकी लोग मुस्करा दिए......। आने वाले शख्स की उम्र होगी करीब पचास के आसपास .........उसने पास आते आते ही जवाब दिया.....चउके पर खुद  तो नहीं....लेकिन दूसरे को बैठवाने का इंतजाम जरूर करके आ रहा हूँ.......।
  
       सुनकर नाव में बैठे उसी शख्स ने फिर चुहल की - अरे तनिक हमरौ अगुआ बन जा.....हमरौ बियाह करवाय द .......। तब तक आने वाला शख्स नाव में चढ़ आया था.....हँसते हँसते उसने कहा ......अरे तुमसे कौन बियाह करेगा.....न घर न  ठेकान......न आगे कोई..... न पीछे कोई......। ऐसे तैसे को कौन अपनी लडकी देगा....मैं तो इस तरह के ब्याह में अगुअई नहीं करूंगा.....बात बता दूँ साफ।

      पता चला कि यह जनाब शादीराम घरजोड़े टाईप जी हैं....यत्र तत्र अगुआ बने घूमते रहते हैं........लड़की का विवाह.....लड़के का विवाह......लड़की बीएड है.....लड़का बीटीसी में हो गया है.......फलानें की नौकरी लग गई है....फलांने का घर दुआर अच्छा है.......जैसे जुमलों के चलते....अगुवई के चलते कई गाँव तक प्रसिद्ध हैं जनाब  और उसी का प्रताप था कि नाव वाले शख्स उनसे चुहल कर रहे थे और वह भी इस मजाक का जमकर उत्तर दे रहे थे। एक तरह से इन्हें आप चलते फिरते मैट्रीमोनियल कह सकते हैं :)

  तो मैट्रीमोनियल जी के आते ही नाव चल पड़ी....लेकिन नाव चप्पू की सहायता से नहीं, एक लोहे के तार और एक बांस के सहारे से चल रही है । नदी को पार करने के लिए दोनों किनारों पर  आमने सामने जोड़ते हुए एक तार का इस्तेमाल किया गया .....उसी तार में लगे छल्ले और रस्सी के जरिए नाव  को नदी के इस किनारे से उस किनारे तक एक सीध में रखा जाता है और नदी की तलहटी में बाँस गोदकर आगे की ओर नाव को ठेला जाता है।

   लोहे की तार ......एक तरह का जुगाड़ .........जिसके बारे में  मनोज जी  ने बताया कि इस तरह के नदी के बीचो बीच तार बाँधने पर अदालत ने रोक लगा दी है क्योंकि इसकी वजह से कई हादसे हो चुके हैं। होता यह है कि लोहे के तार के सहारे नाव को एक किनारे से दूसरे किनारे तक एक सीध में जो़ड़ दिया जाता है,  लेकिन तेज बहाव या तेज हवा में नाव अपना स्वाभाविक फ्लोट नहीं बना पाती और ऐसे में एक ओर तार से जुड़े होने के कारण नाव के उलट जाने का खतरा रहता है। 

  तो इसी जुगाड़ वाली नाव से मैं जा रहा था नदी के उस पार एक बारात का हिस्सा बनकर......और बारात भी मेरी ससुराल के पास ही एक घर में ही जा रही थी... भतीजे का विवाह वहीं पास ही तय हुआ था ......सो जाहिर है, सुसराल विजिट भी होना था। 

   बारात वारात जो किए सो किए....अगले दिन चली चला की बेला पर मैंने मनोज जी को फोन किया......... जो कि मेरी ससुराल से करीब चार किलोमीटर की दूरी पर ही रहते हैं।  इतने करीब आकर बिना मिले कैसे चला जाता.....सो फोन घुमा दिया।  

 जब मैं बनारस में अरविंद मिश्र जी से मिला था, तब उसी समय उनके छोटे भाई मनोज जी  से भी  बात हुई  और तय हुआ कि अबकी गाँव जाकर उनसे जरूर मिलूंगा । एक छोटी सी गँवई ब्लॉगर बैठकी का आयोजन। 

   तो साथियो,  इन्ही मा पलायनम् वाले श्री मनोज मिश्र जी से मिलने निकल पड़ा जिनकी कई दिलचस्प पोस्टों से आप परिचित ही हैं.......जमैथा वाले खरबूजा वाली रिपोर्टिंग हो या अपनी टिप्पणी में चच्चा की देशज पंक्तियां  ब्लॉगजगत के सामने पेश करने की बात हो, हमेशा ही अपने अनोखे और सधे अंदाज में रिपोर्टिंग करते हैं मनोज जी,

 सरकारी नौकरी के महात्म्य को व्यंगात्मक ढंग से दर्शाती उनकी एक टिप्पणी की बानगी देखिए - 

 देश बरे की बुताय पिया - हरषाय हिया तुम होहु दरोगा ( देश जल कर राख हो जाये या बुझे; मेरा हृदय तो प्रियतम तब हर्षित होगा, जब तुम दरोगा बनोगे!)

   तो इन्हीं मनोज जी से मिलने मैं जा रहा था....सुबह -सुबह.....ठीक बारात की विदाई की बेला पर जब आंगन में दूल्हे को बिठा कर वधू पक्ष की ओर से तमाम पंखी, बेना, खिलौना, नोटों का हार वगैरह दूल्हे को पहनाया, चढ़ाया जा रहा था...दुल्हन की सखियों की ओर से दूल्हे के चेहरे पर मजाक मजाक में हल्का सा दही वगैरह चपोड़ा जा रहा था....और एक नए किस्म का मजाक देखा जिसमें स्प्रे फोम वाली बोतल के जरिए....दूल्हे पर फोम स्प्रे कियाजा रहा था.....दूल्हे के अगल बगल बैठे  दो चार लोग भी इस हंसी ठिठोली का शिकार हो रहे थे.....बार बार उन लोगों को एक तौलिए से दूल्हे का चेहरा वगैरह पोंछना पड़ रहा था..........मुरेरी गई करारी नोट....कल्ले से दूल्हे के जेबा में पहुंच रहा था.....चोरउथा.....। 

   ऐसे ही चला-चली की बेला-कार्यक्रम के दौरान मैंने अपने श्वसुर जी से कहा कि एक मित्र रहते हैं यहीं करीब, उनसे मिलकर आता हूँ....। उन्होंने एक युवक को मेरे साथ मोटर साईकिल पर भेज दिया जो कि वहीं गाँव का ही निवासी था।

          जिस वक्त मैं चला उस समय सुबह के करीब आठ ओठ बजे होंगे....गर्मियों में वैसे भी जल्दी पांच बजे ही वहां उजाला हो जाता है, फिर अब तो आठ बज रहे थे। धूप धीरे धीरे चोन्हा मारने लगी थी......लेकिन रह रह कर बदरी भी यहां वहां दिख जाती थी। रास्ते की सुंदरता पर मोहित मैं पीछे बैठा उस युवक से रह रह कर बातचीत भी करता जा रहा था......। हरियाली के बीच काली कोलतार वाली सड़क पर मोटर साईकिल से चलते हुए जाना वैसे भी मुझे बहुत अच्छा लगता है ।

  रास्ते में कहीं पर भैंस रास्ता काटती मिल जा रही थी तो कहीं गाय....कहीं कहीं कुकुर भी थे। यहां मैंने अक्सर देखा है कि जब कभी आप गाँव की सड़क पर चले जा रहे हों तो कुछ कुत्ते अक्सर आपको सड़क के आसपास विचरते मिलेंगे। उनकी भाव भंगिमा देखने पर लगता है मानों वह किसी का पता बताने के लिए खड़े हों।  अब कभी आप गाँव वगैरह जांय तो इन गंवई सड़क छाप कुकुर प्रजाति का एक बार जरूर निरीक्षण करें....उनके चेहरे और बॉडीलैंग्वेज से आपको एक किस्म की शालीनता टपकती दिखाई देगी.....जो शायद शहरी कुकुर में न मिले। शालीनता से तात्पर्य    उनके चाल- ढाल और मूक वार्ता से है....वरना अगर एक बार आप किसी को छेड़ भर दो, इससे पहले कि कुकुर कुछ बोले, समूचा गाँव जुट लेगा और आप पर ऐसे ऐसे व्यंग्य बाण छोड़े जाएंगे कि लगेगा कुकुर जी भी  कुछ बोलते तो अच्छा था :)

 कोई कहेगा - बैठे हैं मोटर साईकिल पर तो जैसे इनका रंग ही नहीं मिल रहा है....बाबू साहेब...... जंबो जट चलाय रहे हैं.....तो कोई कहेगा....अरे तनिक देख कर चलाओ.....कुकुर है तो क्या लेकिन तुमसे समझदार है....कम  से कम सड़क के एक ओर ही तो खड़ा है.....और एक तुम हो..... जो सड़क के बीचो बीच चले जा रहे हो.....पता नहीं कौन गाड़ी छूटी जा रही है।

     और गाँव की महिलाएं....उफ्....उनके व्यंग्य बाण झेलना तो ब्रम्हा को भी मंजूर न हों.....हाथ चमका बमका कर कहेंगी  - देख नहीं रही हो......फतुल्ली पहन कर , चसमा ओसमा लगाय के ससुरारी जा रहे हैं.......कहो तो असवारी भिजवाय दूं  :)

  खैर, अभी सुबह का समय था और मौसम भी कुछ खुशगवार हो चला था....आसमान में बादलों की दलबंदी होने लगी थी......। देखते ही देखते चार किलोमीटर कब खत्म हुए पता ही न चला। मनोज जी ने बताया था कि बाग के पास ही दुतल्ला मकान है..... पूछते पछोरते पहुँच गया। मनोज जी अपने बाग में ही मिल गए। मस्त पुरूवा हवा चल ही रही थी, लेकिन पुरूवा का चलना और बिच्छू का डंक याद आना अब स्वाभाविक सी बात हो गई है मेरे लिए।

   इधर  मुझे हाल ही में बिच्छू ने डंक मारा है यह बात मनोज जी जानते थे, सो पहुंचते ही पूछे कि अब पैर का हाल क्या है। मैंने बताया कि अब तो ठीक हूँ... कोई दिक्कत नहीं है.....अभी बातचीत चल ही रही थी कि सामने ही एक बेहद उम्रदराज शख्स दिखा जो वहीं बाग में काम कर रहा था। मनोज जी ने उस शख्स की तरफ इशारा करते हुए बताया कि इन्हें कम से कम बीस बार बिच्छू ने डंक मारा होगा.....मुझे तो सुनकर ही झुरझुरी होने लगी कि अभी हाल ही में एक बिच्छू के डंक से मेरी हालत पतली हो गई और इस इंसान को बीस बार....।

  उस मजदूर को मनोज जी ने आवाज देकर बुलाया......। पूछने पर कि कैसा लगता है तुम्हें बिच्छी मारने पर तो   बंदे ने कहा कि  ऐसा लगता है जैसे करेंण्ट मारा हो बस......इससे ज्यादा कुछ नहीं.....वही थोड़ा दरद ओरद होता है बसस्।  सुनकर मेरा हैरान होना लाजिमी था....थोड़ा सा दरद.....उफ्....कैसा करेर है ये बंदा।

  इसी बीच बाग में ही पेड़ों की लहलह के बीच मिठाई और पानी मंगाया गया। जलपान कर तृप्त हुआ ही था कि मनोज जी ने कहा, चलिए घर पर चला जाय वहां इत्मिनान से बातें हों।

 हम लोग बतियाते हुए बाग से घर में जा बैठे और शुरू हुई ब्लॉगिंग पर चर्चा।  तमाम ब्लॉगों की चर्चा आदि के दौरान मैंने एक बात नोटिस की कि मनोज जी भी ब्लॉगजगत की जूतमपैजार से क्षुब्ध हैं .....एक तरह की बेसिर पैर और लफ्फाज टाईप ब्लॉगिंग से वह व्यथित नजर आ रहे थे .....गुटबाजी....अनामी...सुनामी...तमाम तरह के वाद उन्हें भी बेहद नापसंद हैं।  

  अभी यह बातचीत चल ही रही थी कि पानी में डुबोए हुए बाल्टी भर आम सामने रख दिए गए।

 अब....

           एक एक कर हम लोग आम चिचोरते रहे और ब्लॉगिंग पर बातें करते रहे।   इसी बीच जिक्र हुआ अरविंद जी का कि वह अक्सर किसी मुद्दे पर बिना किसी लाग लपेट के सीधे अपनी बात रखते  हैं और नतीजतन लोगों के कोपभाजन का शिकार हो जाते हैं .....जबकि कई लोग सीधे सीधे टक्कर न लेकर जाने दो यार....छोड़ो....वाली शैली अपनाते हैं और इसी वजह से कई लोगों की गुडी गुडी छवि बनी रहती है जबकि अरविंद जी अपनी स्पष्टवादिता के चलते छवि-फवि की चिंता ही नहीं करते....... जो है जैसा है....कह दो।

         यहाँ मुझे लगा कि..... हाँ.....हम  ब्लॉगर भी ब्लॉगजगत में अपनी छवि को लेकर चिंतित रहते हैं.....यह बात सच है। और सिर्फ ब्लॉगजगत ही क्यों.....हम अपने घर, पास पड़ोस में भी एक छवि के दायरे में रहना पसंद करते हैं। मैं अपनी बात कहूँ तो मुझे FM  वगैरह सुनना पसंद है....रास्ते में जाते हुए या सफर करते हुए मैं कानों में इयर फोन डाले रहता हूँ....संगीत के मजे उठाता रहता हूँ। लेकिन जब भी अपने बिल्डिंग की सीढ़ियां चढने लगता हूँ....मैं अपने इयरफोन आदि निकाल कर अपनी जेब में रख लेता हूँ........ यदि बच्चे मुझे देखेंगे कि पापा गाना सुन रहे हैं......टाईम पास कर रहे हैं तो हो सकता है कि वह मेरी  देखा-देखी  पढ़ाई की तरफ ध्यान न देकर गाना वगैरह सुनने में कुछ ज्यादा समय लगाएं......मेरे गाना सुनने की आदत से मुझे अगंभीर मानें जो कि मैं नहीं चाहता..... बच्चों के सामने एक किस्म की गंभीरता ओढ़ना मैं अपनी मजबूरी समझता हूँ....हो सकता है कई लोग मुझसे सहमत न हों.....लेकिन यह मैं करता हूँ......।

   अभी आम का दौर चला ही था कि फिर दही में डुबोए और एक तरह से उतप्पा टाईप एकदम मस्त डिश आई। उसका भी मजा लिया गया। चाय पी गई...... बातें तो खैर चल ही रही थीं। तभी मनोज जी ने अपनी माताजी से, श्रीमती जी से भेंट मुलाकात करवाई.......माताजी पास आकर बैठीं........ पैलगी हुई....कुछ चीन्ह पहचान वाली बातें हुईं और उन्होंने बताया कि वह भी पहले मुंबई में रह चुकी हैं। बातचीत के दौरान ही पता चला कि उनकी रिश्तेदारी मेरे गाँव के पास ही है और मेरे इलाके  से अच्छी तरह वह परिचित भी हैं।

 इसी बीच मनोज जी ने यादगार के तौर पर एक सुंदर कलम भेंट की।  उधर  मुझे रह रह कर कई फोन आ रहे थे.....बारात वापसी के लिए निकल चुकी थी.....नदी पर लोग जमा हो रहे थे उस पार जाने के लिए .........उधर भाई साहब पूछ रहे थे कि कहां हो......कब तक आ रहे हो ........... यह कहने पर कि जल्दी ही बस थोड़ी देर में निकल रहा हूँ...... मुझे वापस लेने के लिए एक दो जन मेरी ससुराल में ही रूक  गए। 
  
  दरअसल मैं गाँव के टेढ़े मेढ़े रास्तों पर बहुत जल्दी भटक जाता हूँ और गाँव वालों से पूछने पर कि फलां जगह  जाना है कैसे जाउं तो उनका सीधा जवाब होता है कि बस इधर ही तो है...चले जाईए गाते गाते.....और उनका इधर ही तो है..... इतना लंबा रस्ता होता है कि खत्म ही नहीं होता.....। 

     इधर लौटानी के समय मनोज जी ने मुझे पहुँचाने के लिए अपनी गाड़ी निकाली.......उनकी गाड़ी का नंबर 7200 बड़ा आकर्षक लगा.....बाद में चर्चा के दौरान मनोज जी ने बताया कि उनकी सभी गाड़ियों के नंबर में नौ अंक की प्रमुखता है....किसी की 9090 है तो किसी का कुछ.....लेकिन जोड़ने घटाने पर 9 का ही अंक आता है ।  

         मैं सोच रहा हूँ किसी दिन अगर मनोज जी अपनी गाड़ी से किसी गँवई कुकुर वगैरह को थोड़ा सा धक्का आदि देकर निकल लिए तो ...... अगली बार जब कभी यह गाड़ी उस कुकुर के सामने पड़ेगी तो किसी और की गाड़ी पहचाने या नहीं..... मनोज जी के इस 7200 वाले आसान  और याद रखने लायक नंबर देख कर जरूर पहचान जाएगा कि यही गाड़ी है जिसने उसे धक्का मारा था....संभवत मनोज जी को वह  दौड़ा भी ले :)   

    तो इसी गाडी से मैं और मनोज जी निकल पड़े थे.....तभी संजोग देखिए कि  अचानक ही गिरिजेश जी का लखनऊ से फोन आया.......कहां हो.....कैसे.....और बात चल पड़ी.....। इसी बीच बातचीत के दौरान हम लोग गलत सड़क पर चले गए .....वहीं.....एक गांव वाले से पूछा कि यह रास्ता वहां जाता है क्या तो उसने भी हामी भरी कि हां जाता है......लेकिन मनोज जी को थोड़ा आगे जाने पर अंदेशा हुआ कि शायद यह गलत रास्ता है.... उन्होंने किसी से फोन पर कन्फर्म किया और गाड़ी मोड़ दी गई......दूसरा रास्ता पकडा गया.......अब मेरा पक्का विश्वास हो गया है कि किसी गाँव वाले से रास्ता पूछने पर अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए.....जो रस्ता गाँव वाले के लिए सीधे सीधे हो....वह समझ जाना चाहिए कि उस रास्ते का  टेढ़ा होना निश्चित है  :)


  आगे जाकर मुझे वह सड़क के दोनों ओर स्थित बेहया वाला रास्ता दिखाई दिया जहां पर कि पिछली रात में द्वारपूजा के दौरान फूहड़ और बेहयाई वाले गाने डीजे पर जोर शोर से बजाए जा रहे थे....कभी कोई गाने में जीन्स ढीला करने की बात की जा रही थी तो किसी में..... किस्स देबू का हो..... की बात की जा रही थी।  मैंने जोड़ मिलाया कि यही वह रास्ता है जिस पर रात में बेहयाई वाले गीत बज रहे थे और सड़क के दोनों किनारो पर बेहया के पौधे हिलोर मार रहे थे।   

  इधर  देखते देखते मेरी ससुराल आ गई। गाडी सडक पर खड़ी कर हम लोग बात कर ही रहे थे कि तभी मेरे श्वसुर जी आते दिखे....उन्हें देख मनोज जी ने कहा -  अरे, इन्हें तो मैं पहचानता हूँ.......। 

 क्या ? 

 हां इन्हें तो मैं अच्छी तरह से पहचानता हूँ। 

 मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं ...........वाह रे इंटरनेट.....तेरी छवि न्यारी......संबंधों के अथाह सागर को अभी यह इंटरनेट न जाने अभी और कितने परिचय से जोड़े...... ।   बातचीत के दौरान पता चला कि मनोज जी के पिताजी से मेरे श्वसुर जी के अच्छे ताल्लुकात रहे हैं और संभंवत वह मेरे विवाह में अठारह साल पहले शामिल भी थे......संबंध...परिचय.....इंटरनेट.......अभी और भी न जाने कितने आयाम अपरिचित हैं इंटरनेट के जरिए....यह तो एक बानगी भर रही कि...... दो ब्लॉगर जो अब तक केवल नेट के जरिए एक दूसरे से जुड़े थे....उसके तार कहीं और जुड़े हुए मिले......।

     उधर हालत ये थी कि दोनों परिचित लोग आपस मे भेंट लिए.....एक दूसरे से कुशल क्षेम पूछने में लग गए और इधर मैं ही अपरिचित सा हो गया  ...... मनोज जी ने इस ओर मुझे इशारा भी किया कि.......

 देखिए.... !!! -   हम लोग तो परिचित हो गए और आप सतीश जी...... अपरिचित :) 

  और देखते देखते.....समय घूम सा गया.........बातचीत हुई......कुशल क्षेम हुई.....घरेलू यादों को ताजा किया गया ......और...... होते होते विदा होने का वक्त हो आया......

    थोड़ी देर बाद मनोज जी विदा लिए.....मैंने भी विदा हो लिया..... और जा पहुँचा उसी नदी तीरे.....मल्लाह को आवाज देते.....रोक के .....हो......रोक के.........।


- सतीश पंचम

स्थान - वही, जहाँ  के आसमान में बादलों की दलबंदी हो रही है और समुद्र हिलोरें मार रहा है 

समय - वही, जब आसमान से गिरती बूंदो को देख समुद्र मुस्कराते हुए कहे......ठहरो....जरा रेनकोट तो  पहन लूँ  :)

( मेरी हाल ही में हुई ग्राम्य यात्रा से संबंधित  ग्राम्य सीरिज........ चालू आहे )

Tuesday, June 22, 2010

अबकी बार गाँव जाने पर जब बिच्छू ने मुझे डंक मारा..........सतीश पंचम

      इस बार गाँव जाने पर मुझे एक  बिच्छू ने डंक मार दिया....सनसनाता....फनफनाता डंक......। बिच्छू का डंक क्या होता है यह पहली बार जाना....पहली बार उस दर्द को महसूस किया और उस छटपटाहट से गुजरा।

      हुआ यूँ कि रात का समय था....करीब आठ ओठ बजे होंगे........पूरूवा हवा चल रही थी........कि किसी बात पर मैं खाट से नंगे पैर नीचे उतर गया। दो चार कदम ही चला होउंगा कि लगा किसी की जलती बीड़ी मेरे तलवों के नीचे आ गई है। तुरंत दिमाग ने किसी अंदेशे की ओर इशारा किया और मुँह से इतना भर निकला कि - कुछ काट लिया है। बस....फिर क्या था.......आस पास एक तरह की खदबदाहट शुरू हो गई........ तुरंत ही पास खड़ी अम्मा ने टॉर्च जलाकर देखा तो जमीन पर एक बिच्छू था।

 अब...।

 उस बिच्छू को तो तुरंत ही चप्पल से पट पटा कर मार दिया गया.......वैसे भी सुना है कि पुरूवा हवा चलने पर जमीन पर रेंगने वाले जीव जंतु जैसे सांप- बिच्छू वगैरह ज्यादा निकलते हैं........इधर मेरी हालत खराब होने लगी। लग रहा था कोई अब भी जलती बीड़ी लगातार मेरे तलवों में रगड़ रहा है। उधर नजर घुमाई तो मोटर साईकिल स्टार्ट की जा चुकी थी। सब समझ गए थे कि अब बिच्छू का डंक मुझे रात भर तड़पाएगा.....लोग कर भी क्या सकते थे......आनन फानन में भतीजे ने कसकर पैर में एक दुपट्टा बाँध दिया।

  अगले ही पल मोटर साईकिल गाँव की कच्ची पगडंडियों, कोलतार की सड़कों और खडंजा से होते हुए सरपट अँधेरे को अपने हेडलाईट से चीरती भागी जा रही थी............मोटर साईकिल भतीजा चला रहा था...बीच में मैं बैठा था और पीछे छोटा भाई।

       यूँ तो कभी बाजार आना हो तो बिना पैंट या पाजामे के नहीं आता....लेकिन आज पोजिशन दूसरी थी। लुंगी पहने पहने ही बाजार में जाना पड़ रहा था और वह भी एक पैर में दुपट्टा बाँधे :)

    गनीमत थी की रात का अँधेरा था......ज्यादा परिचित नहीं मिले रास्ते में और जो मिले भी वह हादसे की हकीकत जान कर ज्यादा पूछताछ न किए ......मामला समझ गए थे वह भी लेकिन डॉक्टरी जल्दी के चलते ज्यादा पूछे ओछे नहीं।

     गाँव में अमूमन आठ बजते ही ज्यादातर दुकान वगैरह बंद हो जाते हैं...शहरों की तरह देर रात तक दुकाने आदि कोई नहीं खोले रखता। एक डॉक्टर के यहाँ  पहुँचने पर पता चला कि उसके पास वह दवा ही नहीं है जो इस तरह के बिच्छू काटे विष का शमन कर सके......उसी ने दूसरे डॉक्टर का नाम लिया कि फलाने के पास चले जाओ....काम हो जाएगा....वह रखते हैं उस तरह की दवा और अच्छा खासा इस मामले में उनका नाम भी है।

  लो भई...चलो अब लुंगी पहने पहने नामी डॉक्टर के यहां। उस डॉक्टर के यहां जाने पर पता चला कि अभी अभी वह क्लिनिक बंद कर घर चले गए हैं। थोड़ी दूरी पर ही उनका घर है...हो आईए। मरता क्या न करता। लुंगी पहने पहने ही मोटर साईकिल की दिशा डॉक्टर साहब के घर की ओर मोड़ दी गई....। डॉक्टर साहब को देखते ही मैं सन्न.....मैं अपने आप को लुंगी पर होने के कारण लजा रहा था और देखा तो डॉक्टर साहब नीले रंग की पट्टेदार नाड़ेवाली चड्ढी पहने घर के आगे बैठे हवा ले रहे हैं।

 अपना दर्द भूल थोड़ी देर तो डॉक्टर साहब की भाव भंगिमा देखता रहा..........सोच रहा था कि एक मेरे मुंबई शहर के डॉक्टर हैं........रात दिन लगता है सूट पहन कर ही रहते हैं....... .और इधर इन डॉक् साहब को देखो.....पट्टेदार चड्ढा पहन कर बाहर हवाबाजी कर  रहे हैं।  इधर बिच्छूराम के दंश के कारण फिर से अपनी दुनिया में लौट आया...... पैर में जहां पर दुपट्टा बँधा था उसके नीचे का हिस्सा जैसे आग हो गया था....एकदम गर्म।

  डॉक्टर साहब के पास मोटर साईकिल से उतार कर ले जाया गया........उन्होंने थोड़ी बहुत पूछ ताछ की और लगे मेरे मुँह में दो चार बूँदे एक दवा की गिराने। समझते देर न लगी कि यह होमियोपैथिक डॉक्टर हैं और अब होमियोपैथ वाले तरीके से ही मेरा इलाज करेंगे। इधर मेरी चिंता दूसरी थी कि होमियोपैथिक में तो काफी समय लग जाता है किसी दवा के असर करने में..... तो क्या मैं तब तक यूँ ही तड़पता रहूँगा.....लेकिन डॉक  साहब ने ज्यादा सोचने न दिया.....फिर तीन चार मिनट बाद मुँह खोलवा कर तीन चार बूँदे मेरे हलक में टपकाया........।

  बगल में ही एक डब्बा पड़ा था जिसमें पानी भर कर उसमें मेरा पैर रख दिया गया। अब दवा तो डॉक्टर साहब ने मेरे मुँह में डाल दिया लेकिन उस दवा को तो पैर के उस हिस्से तक पहुँचना भी चाहिए  था जहाँ बिच्छू ने डंक मारा था.....लेकिन वहां तक पहुँचे कैसे.....बीच में तो दुपट्टे ने रास्ता रोक लिया था.......सो, दुपट्टा खोलने को कहा गया.....पर दुपट्टा खुले तब न............बाँधने वाले ने इतना जबरदस्त बाँधा था कि क्या  बताउं........किसी तरह दुपट्टा खुला और जो जलन पैर के निचले हिस्से में अब तक थी, वह एकाएक कसा दुपट्टा हट जाने से सीधे जाँघ तक आ गई। लगा कि किसी ने मेरे बाँए पैर को तेजाब से नहला दिया है। 

 थोड़ी देर के लिए डॉक्टर साहब की खटिया पर ही सो रहा......इस बीच डॉक् साहब रह रह कर हर तीन चार मिनट पर मेरे मुँह में दवा टपकाते जा रहे थे...लेकिन दर्द था कि कम ही नहीं हो रहा था। तब डॉक्टर साहब ने अपने क्लिनिक पर ले चलने को कहा....अंदेशा था कि कोई लापरवाही न हो जाय। क्लिनिक में पहुंचने पर अब दो तीन और बोतलें पास रखीं देखा। सभी से दो - तीन बूंद हर तीन चार मिनट पर मेरी जीभ पर टपकाया जाता रहा.....दर्द थोडा कम होना शुरू तो हुआ लेकिन बंद नहीं हुआ।  आखिरकार लगभग आधे घंटे की सेवा टहल के बाद मैं अपने पैरों पर खड़ा हुआ लेकिन पैर में दर्द अभी भी काफी बना रहा। 
 डॉक्टर साहब ने कुछ साबुदाना टाईप गोलियां दी और हिदायत के साथ रूखसत हुए। फीस लिए मात्र पच्चीस रूपए। मैं हैरान था कि एक तो डॉक्टर को घर से उठा कर लाया गया....... पूरा एक घंटा इनका मुझ पर खर्च हुआ लेकिन फीस लिया केवल पच्चीस रूपए ?  मुझे ज्यादा सोचना न पड़ा क्योंकि पैर का दर्द बार बार कुछ और सोचने से मना कर देता और बार बार अपनी ओर ध्यान आकर्षित कर लेता। 

 वहाँ से दवा आदि लेकर सोचा गया कि चलो उस झाड़ फूंक वाले के यहां भी हो आया जाय जो गाँव में बिच्छू आदि के जहर को उतारता है। मुझे भी कुछ रूचि थी उसे ऐसा करते हुए देखने में......थोड़ा मौज ही सही.... सो मोटर साईकिल अबकी कच्ची पगडंडियों पर दौड़ रही थी। वहाँ पहुंचने पर माहौल कुछ दूसरा ही था। पता चला कि यहीं की एक महिला को करैत सांप ने काट लिया है और उस महिला ने जानते बूझते हुए भी किसी से इस घटना का जिक्र तक नहीं किया... कि सांप ने काटा है.....केवल इतना कह रही थी कि वहां एक सांप बैठा है उसे मारो......लेकिन किसी ने सांप को बिना वजह मारना ठीक नहीं समझा......कारण भी महिला ने अब तक नहीं बताया था ताकि लोग तुरंत हरकत में आते..........वह महिला आराम से आई....रोटी बनाई......थोडी देर में जब बेहोशी छाने लगी तब लोगों का ध्यान उसकी ओर गया और लोगो को तब समझ आया कि यह करैत को मारने के लिए क्यों कह रही थी। 

  महिला के बेहोश हो जाने पर उसके परिजन उसे शहर की ओर लेकर भागे थे.......अब हम लोग भी वहां रूक कर क्या करते.....लेकिन तभी वहीं की एक लड़की ने मेरे डंक को देख कर घर से एक तरह की दवा ले आई और उस डंक वाली जगह पर लगा दिया। पूछने पर कि उस महिला को क्या आप लोग इलाज वगैरह नहीं कर सकते थे तो उसने बताया कि हम कर तो सकते थे लेकिन काफी देर से उसने बताया और ऐसे में खतरा लेना ठीक नहीं, सो उसे सीधे अस्पताल ले जाया गया है शहर में। 

  वापस में अंधेरे में लौटते समय मोटर साईकिल की हेडलाईट के उजाले में देखा कि कुछ और लोग गाँव के ही शहर की तरफ जा रहे थे उस महिला को देखने। 

 इधर घर लौट कर मेरे लिए चिंतातुर लोगों की संख्या ज्यादा दिखी। सब लोग एक ही बात कह रहे थे, अब चौबीस घंटा तक दर्द रहेगा.......सो किसी तरह  सह लो......बाकि अब क्या किया जा सकता है। चौबीस घंटा सुनकर तो मैं और पगला गया कि यार ये कैसे लोग हैं.....एक दो घंटा न बताकर सीधे चौबीस घंटो का दर्द कह रहे हैं......लेकिन यह उनका भोगा हुआ अनुभव था जो उन्हें यह कहने पर बाध्य कर रहा था....सभी लोग जानते थे कि चौबीस घंटों तक यह रह रह कर परेशान करता है। 

  उधर मैं खाट पर सो नहीं पा रहा था....सोते ही लगता था जैसे दर्द पैर से उपर की तरफ आ रहा है.....मजबूरन उठ कर खडा हो गया.......और यहां वहां डोलता रहा। हां इतना जरूर किया कि अब टॉर्च की रोशनी और चप्पल पहन कर डोल रहा था।  रात भर कभी इस ओर जाता कभी उस ओर जाता......बीच बीच में खाट पर बैठ भी जाता लेकिन दर्द बराबर बना रहा।   

 धीरे धीरे जो लोग आस  पास आंगन में खडे थे सब सोने चले गए।  चाचा जी  बाहर बरामदे में रखी टीवी पर पुरानी फिल्म देख रहे थे.....बीच बीच में पूछ भी ले रहे थे......का हो.....का हाल बा.......मैं भी  हां ठीक बा कह रह जाता ........असल हालत तो मैं जानता ही था........  इधर श्रीमती जी भी चली गईं सोने....... जाहिर हैं वह भी काफी परेशान रही  थी यह सब देखकर.......। करीब एक डेढ़ बजे रात में अचानक फिर से दर्द तेज हो गया.....एक लहर सी उठ रही थी पूरे बदन में........ भतीजे ने तुरंत मेरी हालत देख उपले रख कर आग जलाया। उन उपलों की आँच में मैंने अपना पैर सेंकना शुरू किया तो कुछ राहत मिली। पहले तो डंक वाला ही पैर सेंक रहा था लेकिन आँच से मजा इतना मिला कि बिना डंक वाला पैर भी सेंकने लगा :)   जून महीने की गर्मी में आग से सिंकाई......भला कोई सुनेगा तो क्या कहेगा......ठंडी का सीजन होता तो बात ही कुछ और थी.....लेकिन जून की तपिश में आग से सिंकाई.......बड़ी वाहियात गल्ल है जी :)

    इसी बीच जब आग से थोड़ी राहत मिली तो मुझे राते के डेढ़ बजे टाईम पास करने की सूझी......भतीजे से पूछा कि वह बिच्छू कहां है जिसे मारा गया तो उसने टार्च की रोशनी में ढूँढ निकाला.....वहीं कहीं पास ही एक कोने में उसे मार कर फेंका गया था। तुरंत मैंने उसे खाट की पाटी पर रख उसका मरणोपरांत फोटो खींच डाला। भतीजा हंस रहा था कि यह इतनी रात गए मुझे क्या सूझी........उसको क्या पता था कि यह बिच्छू... बिच्छू न होकर मेरी एक पोस्ट है......आखिर ब्लॉगर जो ठहरा :)  

 


पूरी रात इसी तरह गुजारी और धीरे धीरे सुबह होने को आई.......इसी बीच श्रीमती जी से चाय बनाने के लिए कहने गया......वह भी जाग ही रही थीं......नींद उन्हें भी नहीं आई थी.........।



 चाय पीने के आधे पौने घंटे बाद मुझे कुछ नींद आई लेकिन तब तक तो उजाला हो गया था......और मैं उजाला होते होते न जाने कब सो गया। उठा तो करीब आठ बज रहे थे। देखा तो घर के  बच्चे उस बिच्छू को देख रहे थे जिसे रात में ही फोटो सेशन के बाद एक ओर फेंक दिया गया था...... .....देखते देखते एक ने ईंट को खड़े ख़ड ही बिच्छू पर दे मारा.......बिच्छूराम का तो मरने के बावजूद एक बार फिर काम तंमाम.......। 

 इधर मैं सोच में पड़ गया कि .....मैं बिच्छू के पाले पड़ गया  तो उसने केवल एक डंक ही मारा था और तिस पर भी मैं जिंदा रहा.....लेकिन जब बिच्छू इंसान के पाले पड़ा तो उसे तो सीधे मौत ही नसीब हुई। 

 ज्यादा खतरनाक कौन ...... बिच्छू या इंसान :) 

-  सतीश पंचम
  
  

Saturday, June 19, 2010

एक अमियही टिप्पणी........बनारस ब्लॉगर बैठकी..........अरविंद मिश्र जी संग आम खाने की चुहलात्मक प्रतियोगिता..........और लमही यात्मक भेंट मुलाकात ......सतीश पंचम


   दादर- वाराणसी स्पेशल ट्रेन का डिब्बा......डिब्बे में मैं विंडो सीट से सटा हुआ बाहर अंधेरे में ताक रहा हूँ........चाय....चाय.....बढ़िया इलायची चाय..........  ए चाय  ..............अरे भई..... एक चाय  देना......अरे यार ये तो काली पड़ गई चाय है ........लाओ अब ले  लिया है तो चख ही लिया जाय.......उं...हूं.... चाय है कि...... बकरी का मूत.....पांच रूपया भेस्ट गया.......

     हा हा.... बकरी का मूत.....क्या कम्पेरिजन है.......लोग अक्सर पनैली- फीकी चाय को इसी एक जानवर के मूत्र से क्यों कम्पेयर करते हैं.....गधे...घोड़े....खच्चर....बैल आदि के मूत्र से कम्पेयर क्यों नहीं करते....सवाल कई हैं...........वन वे सवाल.....नो वे जवाब........ बाहर अँधेरा....भीतर उजास.........भागती ट्रेन........दूर कहीं कहीं बिजली के बल्ब जलते दिख रहे थे.....पता चलता था कि वहीं कहीं एक घर होगा.....पतंगे और तमाम रात्रिकालीन कीड़े मकौड़े जरूर उस लट्टू को घेर रहे होंगे.......आस पास के जंगलों में सियार...........तीतर....बटेर....न जाने कितने प्राणी होंगे जो लगातार छूटे जा रहे हैं.........


              ऐसे में ही अरविंद मिश्र जी को फोन करता हूँ......इससे पहले की नंबर सर्च करूं.......बगल के ट्रैक पर से एक ट्रेन तेजी से गुजरी ....धड़ धड़....धड़ धड़......बगल से जाती ट्रेन...... इतनी ज्यादा आवाज......और देखते ही देखते....धड धड अचानक धीमे होते  होते एकदम से खत्म..... स्कूली दिनों के सवाल याद आ गए..... ट्रेन की लंबाई.....प्रति सेकंड...... गति .....समय........नंबर मिलाता हूँ......बात हो रही है अरविंद जी से........गाडी सुबह करीब पांच बजे बनारस पहुंचेगी.....संकोच हो रहा है कि उन्हें इतने सबेरे कैसे बुलाउं स्टेशन पर.....लेकिन अरविंद जी मानें....तब न.....जोर दे रहे हैं कि मैं आ जाउंगा स्टेशन पर लेने......बगल में नजर दौड़ाता हूँ.....चाय वाला अब दुसरी ओर पलट कर जा रहा है......लगता है आगे रास्ता जाम है......लोगों ने बाथरूम के पास ही सामान रख छोड़ा है.....नो वे.....धड़ धड़.....धड़ धड़......।

 सुबह के तीन पचास हो रहे हैं...........पांच बजे का अनुमान गलत निकला...........गाड़ी बनारस स्टेशन पर समय से पहुंच चुकी है........बनारस स्टेशन से बाहर निकल कर ठीक स्टेशन के  सामने  खुले स्थान पर सामान रख खड़ा हूँ। सोच रहा हूँ....अरविंद जी को इस वक्त डिस्टर्ब करना ठीक होगा क्या ?  थोडा रूक जाता हूँ....इसी बहाने बनारस स्टेशन के आसपास का सौदर्य निहार लूँ....वरना तो जब कभी आया हूँ बनारस...हमेशा ही गाड़ी पकडने की जल्दी रही है.....कभी ठीक से बनारस स्टेशन के वास्तुशिल्प को ठीक से नहीं देख पाता हूँ। आज मौका मिला है......सुंदर .....मंदिर जैसा लगता है बनारस स्टेशन की संरचना......हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू में लिखा वाराणसी........बीच में एक घड़ी.....। 

 आस पास नजर दौड़ाता हूँ.....लोगों का हूजम इस बनारस स्टेशन को सुबह के इस प्रहर में गुलजार किए है.....कुछ लोग बाहर ही बैठे हैं....गाडी का इंतजार कर रहे हैं....कुछ महिलाएं हैं.....कुछ बच्चे हैं......कुछ लोगों के ट्रेन के आने का अनाउंसमेंट हो गया है....अब वह उठकर चलने की तैयारी कर रहे हैं......महिलाएं....अपनी साड़ी ठीक कर रही हैं....कुछ अपनी साड़ी की प्लेटें तह कर रही हैं....फुख्ती को पेट में खोंस रही हैं........एक बोतल से एक शख्स पानी उड़ेल रहे हैं और बच्चे मुंह धो रहे हैं......और लो.....ठीक से मुँह धो लो.....ए बाबू उठो.....गाडी आने वाली है.....चलो....समान ओमान ठीक से रखना होगा....चलो उठो......वो अपना बैट भी रख लो.....एक शख्स आसाराम बापू  की मैगजीन पढ़ रहा है....पूरे श्रद्धा भाव से........मेरे जहन में आसाराम से संबंधित पिछली कई बातें कौंध जाती हैं......जमीन घोटाला.....तंत्र मंत्र......काला जादू................आहि रे.... अंध भक्ति........ ..

       दैनिक जागरण.....पेपर...पेपर.........एक  देना......पेपर लेकर पढ़ता हूँ.....समय सुबह के चार बजे हैं.... अभी थोडी देर और इंतजार करता हूँ....बाद में फोन लगाता हूँ.......चाय देना......कुल्हड़ नहीं है क्या......चलो दे दो.....हुंम्म............चाय तो ठीक है......खबरों पर नजर दौड़ाता हूँ........वही खबरें हैं.....एंडरसन को किसने भगाया.....फुटबाल का विश्वकप शुरू हो रहा है..... एक पेपर जमीन पर बिछा बैठ जाता हूँ........नजरें खबरों पर.......वातावरण में .हल्की शीतलता का अहसास हो रहा है ........आस पास  एक नजर डालता हूँ...........अरे ....ये मंदिर कब बन गया......सामने ही एक बिना प्लास्टर लगा केवल इंटों से बना एक मंदिर दिखाई दे रहा है....काफी पहले से इस मंदिर से वास्ता पडता रहा है.....इसे तो तोड़ दिया गया था विस्तारीकरण के चलते.....अब फिर यह बन गया....जय हो हनुमान गुसाईं......गिरिजेश ने भी एक बार इस मंदिर का जिक्र अपनी  रोवे देवकी रनिया जेहल खनवा वाली पोस्ट  में किया था.....और तब मुझे बताना पड़ा था कि यह मंदिर अब वहां नहीं है....टूट चुका है....भजन कीर्तन नहीं होता....लेकिन अब देखो............. पीपल के पेड का सहारा लेकर तैयार है मंदिर....प्लॉस्टर नहीं चढ़ा है......अबकी गिरिजेश को इसकी सूचना पोस्ट में देनी होगी....... भीतर किन किन भगवान की मूर्तियां हैं यह स्पष्ट नहीं हो रहा। फिलहाल इस मंदिर का नाम भी नहीं मालूम है, इसलिए सुविधानुसार इसे   गिरिजेशिया मंदिर  ही कह रहा हूँ   :).......वैसे मजाक में ही सही, पर अब यही नाम फब रहा है :) 





    मंदिर के अंदर एक बल्ब जल रहा है और गेट की तरफ बोरे का परदा लगा है। भीतर से पीले-लाल रंग की रोशनी बाहर झांक रही है।

       यह साथ में लगा जो  अंधेरे में खिंचा गया चित्र है, यह उसी    गिरिजेशिया मंदिर  का चित्र है ।




      समय चार पंदरह.......थोडा और सोने देता हूँ अरविंद जी को.......चलो इसी बीच एकाध फोटो सेशन हो जाय इस बनारस स्टेशन का.......औऱ साथ ही इस गिरिजिशिया मंदिर का भी......
आस पास  पुलिस वाले खड़े हैं.....फोटो लेना ठीक होगा क्या....कम्बख्त बेमतलब पूछौअल न करने लग जांय......होगा जो होगा....चलो खींच ही लूं तस्वीरें......तस्वीरें खींच रहा हूँ कि तभी एक बंदा पास आकर कहता है....टैक्सी.......लेंगे.......कहां चलेंगे.....नहीं कहीं नहीं जाना है..........बंदा चला गया.........मन ही मन हंसते हुए कहता हूँ......तुम क्या जानों......मैं यहां रूक कर एक जन को सुला रहा हूँ :) 

        फोटो खींच रहा हूँ....पूरा स्टेशन एक फ्रेम में नहीं आ रहा......काफी विशाल आकार है वाराणसी स्टेशन  का .....थोडा़ थोड़ा उजाला होने लगा है......साढे चार बजने वाले हैं....अब अरविंद जी को उठा ही देना चाहिए......एक फोन करता हूँ.....सामने से तुरंत अरविंद मिश्र जी की आवाज आई .....बस पंदरह मिनट में पहुँचता  हूँ.......आश्चर्य......अरविंद जी जगे हुए हैं.........


          स्टेशन के बाहर एक खुले हिस्से में जाकर खड़ा हो जाता हूँ......हवा थोड़ी थोड़ी चलने लगी है......उजाला होते ही एकाध और फोटो लेता हूँ.......तभी सामने एक जीप पर नजर पड़ी.....कहीं अरविंद जी ही तो नहीं हैं.... हां वही तो हैं...........जीप थोड़ा आगे जाकर खड़ी हुई......अरविंद जी ने उतरते ही मुझे फोन मिलाना शुरू किया....साथ ही साथ आगे स्टेशन की ओर बढ़ने लगे......मेरी जेब में रखा मोबाईल बजने लगा.....बिना मोबाईल उठाए....मैं अरविंद जी के पीछे जा पहुंचा और उनके  कंधे पर उंगलियों से एक बार स्पर्श भर किया कि वह घूम पड़े......अरे....सतीश जी !



          और अगले ही पल जीप बनारस की सडकों पर दौड़ी जा रही थी......इस सडक से उस सडक.......उस सडक से .इस सडक.......और गलियां......वह भी परस्पर एक दूसरे का काटती....गले मिलती......अगल बगल से निकलती जा रहीं थी.......बनारस की गलियां ऐसे ही मशहूर नहीं हैं.......देखते ही देखते जीप अपने गंतव्य स्थान पर पहुँची......।  अरविंद जी के निवास स्थान पर पहुँचते ही सफेद रंग की  डेजी से मुलाकात हुई.....अरविंद जी ने बताया कि जो कोई घर में आता है उसे यह पहले परखती है और अपना मेहमान समझ बिहेव करती है......इधर देख रहा था  अरविंद जी  के हर आदेश का वह बखूबी पालन कर रही थी....एकदम सधे अंदाज में.....। अभी बैठ कर हम लोगों में परिचयात्मक बातचीत चल ही रही थी कि टेबल पर चाय और नाश्ते की लाईन लगनी शुरू हुई......मैं ठहरा एक नंबर का पेटू.....बिना संकोच के शुरू हो गया......साथ ही साथ बातचीत भी चालू रही।


 बातचीत के दौरान अरविंद जी से ही मुझे पता चला कि कुछ ब्लॉगर ऐसे भी हैं जो किसी बीमारी या  पारिवारिक दिक्कतो आदि के चलते काफी चुनौती झेल रहे हैं और फिर भी ब्लॉगिंग से जुडे रहकर एक से उम्दा और सार्थक किस्म की टिप्पणी या पोस्ट के माध्यम से अपना योगदान दे रहे हैं।

      इन सक्रिय  ब्लॉगरों के बारे में अरविंद जी से जानकर और उनकी बातें सुनकर  मुझे ऐसे उन तमाम ब्लॉगरों पर तरस आने लगा जो आए दिन ब्लॉगिंग से दूर होने की बेमतलब घोषणाएं करते रहते हैं......ब्लॉगजगत छोड़ देने जैसे शीर्षक लगा भीड़ जुटाते रहते हैं। औऱ दो चार दिन की हा हा....हू हू......लूलू   आवन करवा कर फिर लौटने की घोषणा कर देते हैं....यह कहते कि आप लोगों का स्नेह खींच लाया वगैरह वगैरह....।    

          इधर बीच बीच में चाय नाश्ता जारी रहा। अरविंद जी की कुछ पोस्टों पर चर्चा हुई कुछ मेरी पोस्टों पर। इसी बीच अरविंद जी ने विषय छेड़ा कि आपने अपने प्रोफाईल में इलाहाबादी खरबूजों के बारे में लिखा है जबकि खरबूजे जमैथा के प्रसिद्ध  हैं ....... इलाहाबद के तो तरबूज बहुत प्रसिद्ध हैं। तब मैंने बताया कि मनोज मिश्र जी के पोस्ट से पहले मुझे पता ही नहीं था कि जमैथा के खरबूजे ही इलाहाबाद के स्टेशनों पर मिलते हैं........जब  मैंने यह कविता लिखी थी तब मैंने अपने जहन में इलाहाबाद के प्लेटफार्म पर दिखे खरबूजों को रखा था और उसी के चलते अपनी कविता में इलाहाबादी खरबूजों का जिक्र किया है ।

       तब तक अरविंद जी के पुत्र मिकी ( कौस्तुभ)  भी आ गए.....इनके बारे में जानकारी मुझे अरविंद जी के ही एक पोस्ट से मिली थी जब वह बैंगलोर में एडमिशन के सिलसिले मे गए थे। ज्यादा अनचिन्हार नहीं लगा......लगा कि हम लोग जैसे परिचित ही हैं  कोई हिच नहीं। तभी भोजन आदि का भी इंतजाम हो गया। एक ओर जायकेदार भोजन.....दूसरी ओर बातचीत का क्रम। 
    
     भोजन करते हुए ही फोटो सेशन भी हुआ और देखते ही देखते टेबल पर बनारसी लंगडा आम भी सट लिया चुपके से। वही लंगडा आम जिसे खाने को लेकर अरविंद जी और मेरे बीच चित्रलेखा वाली पोस्ट पर एक दूसरे से ज्यादा आम खाने की प्रतियोगिता की बात चली थी....दाँत कोठ हो जाने की हद तक आम खाने की बात चली थी......  हंसी ठिठोली हुई थी.... और देखते ही देखते इस आम खवाई की दावत का प्लान बन गया.....। दरअसल इस मुलाकात के  मूल में आराधना चतुर्वेदी मु्क्ति जी की  आम से संबंधित एक  टिप्पणी थी।  यह उस अमियही  टिप्पणी का ही कारण था कि हम लोग आज मिल रहे थे।

   सचमुच,  टिप्पणीयां कभी कभी सर्वर से उतर कर निजी जीवन में  भी आ धमकती हैं और न सिर्फ आती  हैं बल्कि, देखते ही देखते बनारस की गलियों  में भी मिल-जुल लेती हैं। 

     इधर  भोजन के बाद आम खाना था... हम दोनों जन आम खाने में व्यस्त हो गए.....बातें हो ही रही थीं। मैं आम रस पी रहा था....इधर मिकी फोटो खींच रहे थे कि तभी अरविंद जी ने कहा कि अब आप एक आम और खा लिजिए तो आप मुझसे जीत जाएंगे।


  हुंम्म.....तो  यह हैं अरविंद मिश्र जी......  केवल इसलिए मुझसे हारने को तैयार , कि मेरा मान रह जाए......जबकि पचपन आम तक खाने का इनका रिकॉर्ड रहा है..... हारने को तैयार..... ऐसी सहजता......ऐसी निश्छलता.....याद आता है मुंशी प्रेमचंद की  बचपन में पढ़ी  गिल्ली डंडा वाली कहानी जिसमें  एक मित्र सक्षम और  हावी होते हुए भी केवल इसलिए हारना चाहता है ताकि दूसरे का मान रह जाए..... .लगता है कि प्रेमचंद का बनारस अब भी लमही के रंग में सराबोर है।  निश्छलता  परोसने की आदत बनारस ने अब तक नहीं छोड़ी है और वह यहां अरविंद मिश्र जी के आग्रह में साफ झलक रहा है।

    इधर समय बीत रहा था और उधर घर से फोन आ रहा था कि अब तक गाँव पहुंचे क्यों नहीं....इंतजार हो रहा है.....। अरविंद जी का मन था थोडा बनारस घूमा जाय......भोले बाबा के मंदिर काशी विश्वनाथ तक  हो आया जाय.......लेकिन....वक्त का तकाजा था कि मुझे घर लौटना था... ... घर में ही  एक भतीजे के विवाह की तैयारी भी करनी थी....... इधर दोपहर तक लू चलने से दो घंटे का रास्ता मुश्किल होने की आशंका थी........। 

  करीब सुबह के साढे नौ बजे के आसपास अरविंद जी से विदा लिया......भोले बाबा के मंदिर न जाने की कसक मन में रह गई और शायद उसीका मुझे दंड भी मिला ......तब......जबकि रात में भोले बाबा के ही एक सिपाही से मेरा सामना हुआ............( जारी.......)

- सतीश पंचम

( ग्राम्य सीरिज चालू आहे.......)   
   

Friday, June 18, 2010

यात्रा.....मुंबई टू गाँव.....वाया बनारस..... ग्रेट इंडियन पेनिनसुलर रेलवे की बमचक ..............सतीश पंचम


   मुंबई.........रात के बारह बज कर पन्द्रह मिनट ………गाँव लौटने का समय……..केवल… दो चार दिनों के लिए…….……गर्मी की छुट्टीयां खत्म होने को हैं……… बच्चों के स्कूल खुलने वाले हैं……….. गाड़ी प्लेटफार्म पर आ रही है…… सरकती हुई………कहीं कहीं से रह रह कर……..खट……खुट…..खट…..खट की आवाजें देती….…….. ..बिना रिजर्वेशन यानि  चालू वालों की लाईन में अचानक अउन पउन होने लगा है……थोड़ी हलचल सी मच गई है…….एक पुलिस वाला लोहे के गाडर पर लाठी पटक कर खन्न् सी आवाजों की धमक से लोगों को परेशान कर रहा है…….चालू वाले…….बिना रिजर्वेशन…….पुलिस वाले…….रिजर्वेशन…….……मैं प्लेटफॉर्म और उसके आसपास की हलचल देख रहा हूँ....देख रहा हूँ.......पुलिस वाला लोहे का गार्डर ठनठना रहा है........और भीड़........वह तो भीड़ ही तो है.....एकाध लाठी खा ली तो कौन बड़ी बात............कमअक्ल पुलिसिया साला........

       बोगी में घुसता हूँ……बोगी…….अजीब शब्द है। अँधेरा है । थोडी देर में लाईट आ जाएगी……लोगों का सामान के साथ आना शुरू हो गया है.......…..सूटकेस…..बोरा……चटाई……क्या गाँव में नहीं मिलती जो लिए जा रहे हैं………हां भाई…….बम्मई से लाए हैं……चटाई और बोरा न हो तो पता कैसे चलेगा……….बोरे में पत्थर ओत्थर भरे हैं क्या……काफी कड़क है……पैर में जरा सा लगा था अंधेरे में ……….……मोबाईल के टार्च अब काम आ रहे हैं……नोकिया वाले मोबाईल मे टार्च नहीं सटाते …….सीटें ढूँढने में दिखते हैं ज्यादातर चाईना मोबाईल….लगता है नोकिया बैठ जाएगा...... नोकिया बैठे या उठे...... लेकिन पहले से ये कौन बैठा है मेरी सीट पर.....उठो यार.........चालू टिकट है भई तो मुझे तो मत हलकान करो.....


ममता दी.....ओ ममता दी....तनि देखा हो....





    आप का कितना है जी……..सत्तावन……हमारा अट्ठावन…..ओनसठ……एकहत्तर है………..एक सीट लम्मे दे दिया है……कहां लम्मे है…..इधरईए तो है…….अरे भाई रास्ता छोडो……सामान साईड में कर लो……आने जाने तो दो……..ए बिजई……….अरे  उहां कहां लटका हउआ……इंहां आवा आर………पच्चीस….छब्बीस इहां हउए………..एक तो लईटिए नहीं जलाए अबहिन मादरचो……….रेलवई वाले……..सामान तो हटाईए भाई साहब….रास्ता तो किलियर करिए……..ए पुसपा……..बिट्टी के ले के हिंया आव……….रजिंन्दर……..हे रजिन्दर…….अरे इहां हौ सीट आर….उहां कहां लां* चाटत हउआ……….अरे  ई एस सीक्स है भाई ………..आपका टिकट एस सेवन का है……..जाईए…..अरे तो सामान हटाएंगे तब नूं आगे बढेंगे……..ए बोरा उधर करो भाई…….सादी का सामान है….……….सूट उधर उपर देखों एक  खिल्ला……टांगों न उधरै……..नहीं खराब नहीं होगा…..लटका रहने दो……देखा इहै……सादी पड़ी है तो केतना खियाल रख रहा है लईका कि मुड़े मड़े नहीं………..ल्ल……लाईट आय गई…..जय बम्मा माई………पंखवा चला द हो………ए मर्दे वो लाईट का बटन है…..वो देखो पंखा का निसान ओहपे है……….

    
    बुढ़िया माई को उहां बईठा दो……माई…..ए माई…….चलत हईं………पैलागी…..जियत रहा बचवा………गाड़ी चल पड़ी है…….. .हम्म…….बुढ़िया माई के पैरों में महावर लगी है……पतोहू ने रचि रचि कर लगाया होगा…….पैरों पर आढ़ी टेढ़ी लकीरें डिजाईन बना कर लगी हैं…..जरूर पतली सींक से लकीर बनाई गई होगी……..लेकिन बुढ़िया माई के तर्जनी में लाल रंग लगा है…….तो क्या खुद से रंग लगाया होगा पैरों में……पतोहू कौनो काम की नहीं………ए भाई साहब आप सामान वहां रख दिजिए तो बैठने में आसानी होगी……..अरे आप भी कमाल करते हैं…..टिकट हमारा यहां का है…….अरे तो दो जन का है…….एक ही पर बनाया है…..आर ए सी वालों का यही होता है…….. एक पर दो लोग जा सकते हैं……..तब क्या अईसे ही रेलवई लाभ ले रहा  है………..


ममता दी.....ए ममता दी......तनिक सुनिए तो.............

  बगल में मोबाईल पर कोई गाना सुन रहा है.....नो हेडफोन......नो रोक टोक.......ओनली हेडेक.......और गाना......क्या कहा जाय.............

जातारा परदेस बलमूआ…….
छोड़ के आपन देस बलमुआ……
का देखईब पंडित जी से…..
खोल के पोथी पतरा………. .
एगो चुम्मा ले ल राजाजी….
बन जाई जतरा…..
जातार परदेस बलमुआ……..

    हम्म तो पंडितों का पोथी पतरा देखना इसलिए कम हो गया क्योंकि चुम्मा आड़े आ गया………गाना भी तो खूब गाया है……चलिए टिकट बताईए……..आप का……आप का…….पैन कार्ड…….नहीं तो कुछ तो होगा……ड्राईविंग लाईसेंस……..नहीं तो केवल झेराक्स मान्य नहीं है….. आप कोई प्रूफ दो तब ही आपका टिकट मान्य होगा…..चलिए आप दिखाईए……..आप का…….अरे भई बोला न कुच्छो नहीं हो सकता………


ममता दी......ए ममता दी.........अरे तनिक .......सुनू रे.......

  मैं अपनी सीट पर इत्मीनान से बैठ जाता हूँ.......स्लीपर क्लास........पूरे रास्ते स्लीपर पर स्लीपते हुए जाना चाहता हूँ.......रफी की तरह गाते हुए......वफा कर रहा हूँ वफा चाहता हूँ..........पैसे भर चुका हूँ.....अब मजा चाहता हूँ.......लेकिन मजा.........स्लीपर क्लास में नींद का मजा..........क्या मजाक है :)

  का हो.....कौन गाँव.....जिल्ला...... आप कहाँ तक जाएंगे....... आप गए हैं वहाँ पर....... नहीं.....वहां कभी गए तो नहीं पर सुने जरूर हैं.......त  ...सुनिए...... गोसांई जी कहिन हैं कि....बड़े भाग मानस तन पावा............उफ् ये गर्मी...........और ये गोसांई जी.......लगता है पकाए बिना न रहेंगे...........पकाओ गुरू......बड़े भाग मानुस तन पावा..........

 नींद का झोंका आ रहा है......गोंसाईं जी जारी है......अरे त कहें हैं गोसाईं जी..............

 कौन टेसन आवा है..........जंगल है.......अरे त पता कैसे चलेगा कि जंगल जंगल रेल चली है...........



जारी..........




- सतीश पंचम

स्थान – रेल के डिब्बे में,........ खिड़की के पास वाली सीट पर……. एक पकाते हुए सहयात्री  के सामने ।

समय – पिछले हफ्ते मुंबई से गाँव जाते समय......फिलहाल........मुंबई में लौट चुका हूँ..... और जैसा कि पकाऊ यात्री का कहना था......बड़े भाग मानुस तन पावा..........मैं इसमें जोड़ता हूँ....

हाँ,
बड़े भाग मानुस तन पावा
यही तन ले हर ओर पटकावा
कबहुं मुंबई त कबहूँ गाँव 
पुनि पुनि यही  तन बने रेल चढ़ावा
बड़े भाग मानुस तन पावा

( ग्राम्य सीरिज चालू आहे )

Sunday, June 6, 2010

कैसी जुल्मी बनायी तैने नारी.......कि...... मारा गया ब्रह्मचारी..........सतीश पंचम.

        मेरे यहां आज दुपहरीया आसमान में काले काले बादल जमा हो रहे थे। कुछ काले, कुछ श्यामल, कुछ उजले तो कुछ बेहद मटमैले। कुछ का आकार दैत्यों जैसा था तो कुछ पहाडों के होने का भ्रम दे रहे थे। एकाध को देख लग रहा था मानों कहीं आसमान में कोई आग जलाई गई है और उससे उठता धुआँ , उससे उठते गुबार ने समूचे आसमान को ढँक लिया है।
   
            अभी थोडी ही देर हुई थी कि बारिश झमाझम होने लगी। लोग जो यहाँ वहाँ आ जा रहे थे तपाक से किसी दुकान की शेड आदि में जाकर खड़े हो गए। बाईक से जाने वाले बाईक साईड में लगा वहीं कहीं किसी छत के नीचे खड़े हो गए। कुछ लोग उपर से गुजरते पुल के नीचे बाईक खड़ी कर बारिश से बचने लगे। धीरे-धीरे वातावरण में ठंडक आ गई। और आज यही वक्त था जब मैं अपने घर में फिल्म चित्रलेखा देख रहा था।
       
       चित्रलेखा....एक ऐसी फिल्म जो अपने आप में बेजोड़ है..अपने कथानक के कारण, अपने सुमधुर संगीत के कारण, अपने संवादों के गहरे भाव के कारण। और कॉस्ट्यूम............वो तो बस देखते ही रह जांय। सामंत बीजगुप्त का रंगभवन, नर्तकी चित्रलेखा का साज श्रृंगार, उसके बालों में शिवजी की तरह लगा आधे चाँद की आकृति,फूलों और बेलबूटों से सजे बाग. ....किस किस की तारीफ की जाय। हर एक फ्रेम अपने आप में बेजोड़।देखते ही लगता है कि राजा रवि वर्मा के बनाई तस्वीरें चल-फिर रही हैं।

          भगवती चरण वर्मा जी की कहानी पर आधारित यह फिल्म एक नर्तकी चित्रलेखा के इर्द-गिर्द घूम रही है जो मदिरा पान कर रही है, सज धज,..... साज-श्रृंगार में डूबी रहती है और सामंत बीजगुप्त से प्रेम कर बैठी है।
  
         इधर बीजगुप्त का विवाह किसी और से तय है लेकिन वह खुद चित्रलेखा के प्रेमपाश में हैं। इसी दौरान एक ब्रह्मचारी श्वेतांक का आगमन हुआ जिसे कि उसके गुरू ने सामंत बीजगुप्त के पास पाप और पुण्य का भेद जानने भेजा है। श्वेतांक को अपने ब्रह्मचर्य पर बड़ा घमण्ड है। रह रह कर वह महल की स्त्रियों को याद दिलाते रहते है कि मैं बाल ब्रह्मचारी हूँ। मुझे मत छूओ। ब्रहमचर्य नष्ट न करो।

       तब उसके गुरू भाई सामंत बीजगुप्त समझाते हुए कहते हैं कि - ब्रह्मचारी श्वेतांक, तुम्हें किसी स्त्री को नहीं छूना चाहिए। ऐसे ही एक बार श्वेतांक रूपसी चित्रलेखा के सामने पड़ जाने पर उसका रूप देखते ही रह गए मुँह खुला का खुला। तब, सामंत चित्रगुप्त चित्रलेखा से उसका परिचय कराते हुए कहते हैं कि - ये हैं ब्रह्मचारी श्वेतांक, मेरे गुरू भाई।

  श्वेतांक ने सुधारा - ब्रह्मचारी नहीं........बाल ब्रह्मचारी।

 चित्रलेखा ने कटाक्ष करते हुए कहा - मेरा तोता भी ब्रह्मचारी है, बाल ब्रह्मचारी।

    अभी पाप और पुण्य को समझने का यह खेल चल ही रहा है कि चित्रलेखा ने एक दिन अकेले में अपने कोमल कोमल और नरम बतियों में श्वेतांक को उलझा कर उससे मदिरा पान का आग्रह किया....बावले श्वेतांक ने हिचकते हुए ही सही मदिरा पी ली ।  उसी वक्त सामंत बीजगुप्त का आगमन हुआ...श्वेतांक लज्जित.....ब्रह्मचर्य पर आँच.....अब क्या करें।

 आहत श्वेतांक सामंत बीजगुप्त से कहते है - स्वामी, मैंने पाप किया है। आज मैंने मदिरापान किया है। सामंत बीजगुप्त ने समझाते हुए कहा कि मदिरापान में कोई पाप नहीं। मैं तो रोज मदिरा पीता हूँ। लेकिन श्वेतांक का यह कहना कि मैं मदिरापान के बाद खुद को अपराधी महसूस कर रहा हूँ - सामंत बीजगुप्त को यह कहने पर बाध्य किया कि - यदि तुम किसी काम को करने के बाद अपराध महसूस करते हो तो वह कार्य अवश्य पाप है।
जाओ प्रायश्चित करो।

   और उसी वक्त पास बैठी चित्रलेखा के चेहरे के भाव बदल गए ....वह भी तो नर्तकी बन, अपने रूप जाल में फांस कर जो कुछ कर रही है कहीं न कहीं उसमें अपराध है। सामंत बीजगुप्त का यह कहना कि जिस काम को करने से मन में अपराध बोध हो वह पाप है.....चित्रलेखा को गहरे तक भेद गया।
  
      ऐसे में ही सन्यासी कुमारगिरी का आगमन हुआ जो चित्रलेखा को समझाने के लिए आए कि वह सामंत बीजगुप्त का पीछा छोड़ दे और यशोधरा से उनका विवाह हो जाने दे। फिल्म में सन्यासी और एक पतित नर्तकी के बीच पाप और पुण्य को लेकर हुए संवाद बहुत गूढ़ अर्थ लिए हैं और उन बातों को देख सुनकर पता चलता है कि कितनी मेहनत की गई है संवादों के लेखन में और तब तो गजब ही असर आता है फिल्म में जब चित्रलेखा अपने विरोध में खड़े सन्यासी कुमारगिरी को पाप और पुण्य का भेद समझाते यह गीत गाती है कि -

 सन्सार से भागे फिरते हो
भगवान को तुम क्या पाओगे
इस लोक को भी अपना ना सके
उस लोक में भी पछताओगे


ये पाप है क्या ये पुण्य है क्या
रीतों पर धर्म की मोहरें हैं
हर युग में बदलते धर्मों को
कैसे आदर्श बनाओगे


ये भोग भी एक तपस्या है
तुम त्याग के मारे क्या जानो
अपमान रचेता का होगा
रचना को अगर ठुकराओगे
सन्सार से भागे फिरते हो


हम कहते हैं ये जग अपना है
तुम कहते हो झूठा सपना है
हम जनम बिता कर जायेंगे
तुम जनम गँवा कर जाओगे

       पूरे गीत को सुनते हुए महसूस हुआ कि गीतकार साहिर लुधियानवी जी ने कितनी गहराई से सांसारिक जीवन और व्यवहारिक जीवन के द्वंद्व को अपने गीतों के जरिए पेश किया है।

     उधर दिन बीतते गए और राज-रंग में डूबी, सामंत बीजगुप्त के प्रेम में गोते लगाती चित्रलेखा का मन धीरे धीरे अपराध बोध से ग्रस्त होने लगा। उसे लगने लगा कि यशोधरा जिससे सामंत बीजगुप्त का विवाह तय हुआ है उसके प्रति वह अन्याय कर रही है। सन्यासी कुमारगिरी की कही बातें उसे अब भी मथ रही होती हैं कि वह पाप कर रही है...। और एक समय आता है कि चित्रलेखा सब कुछ छोड़ छाड़ कर कुमारगिरी के गुफा में जा पहुँचती है। सांसारिक जीवन का त्याग कर देती है।
    
     कुमारगिरी पहले तो अपने मठ पर किसी महिला साधक के होने पर ही आपत्ति जताई और कहा कि वह उन्हें अपनी शिष्या नहीं बना सकते। लोग सुनेंगे तो क्या कहेंगे। महान साधक और तपस्वी कुमारगिरी के यहाँ एक स्त्री ?
   
   लेकिन चित्रलेखा ने तब सन्यासी कुमारगिरी को चुनौती देते कहा -  क्या इसी तपस्या और ध्यान के बल आप मुझे पतिता मानने लग गए थे जिसमें इतनी भी सामर्थ्य नहीं कि एक स्त्री को अपने यहाँ आश्रय दे सके। मजबूरन कुछ सोच कर सन्यासी कुमारगिरी नर्तकी से सन्यासन बनी चित्रलेखा को अपने यहाँ रहने देने का अनुरोध स्वीकार कर लिया।

       लेकिन, चित्रलेखा ने सन्यास भले धारण कर लिया हो....रूप तो उसका वही था,लावण्य तो उसका वही था। कुमारगिरी का ध्यान भटकने लगा.....तप, जप सब उन्हें अपना मन एकाग्र करने में सहायक न रहे। ईश्वर भक्ति से ध्यान बार बार चित्रलेखा के सौंदर्य की ओर भागता था। और एक दिन सन्यासी कुमारगिरी अपने आप पर काबू नहीं रख पाए और चित्रलेखा के मानमर्दन पर तुल गए।

    वह उसे बताते हैं कि आज सामंत बीजगुप्त का विवाह यशोधरा से हो गया है.....अब वह वापस नहीं लौट सकती....चित्रलेखा ने प्रतिरोध जताया लेकिन सन्यासी कुमारगिरी पर तो वासना ने अपना कब्जा कर लिया था...... चित्रलेखा को बलात् अपने शयनागार में ले जाकर पटक दिया...वासना की आग में रतिक्रीडा को आतुर कुमारगिरी के तप और सन्यास का चोला तार तार होने को उद्दत हो उठा। ऐसे में ही कुमारगिरी के एक शिष्य ने संदेश पहुँचाया कि सामंत बीजगुप्त ने भी राजपाट छोड दिया है और यशोधरा का विवाह श्वेतांक से हो रहा है जो कि अब बीजगुप्त के कहने से नया सामंत बनाये गये है।

     वस्तुस्थिति को जानकर सन्यासी कुमारगिरी को धिक्कारते हुए चित्रलेखा अपने बीजगुप्त से मिलने चल पड़ी और इधर सन्यासी कुमारगिरी की चेतना वापस लौटी.....वह क्या करने जा रहे थे....इसी झूठे जप और तप का बहुत मान था उन्हें......। अपने साथ हुए इस घटना से कुमारगिरी आहत हो आत्महत्या की ओर अग्रसर हुए तो उधर चित्रलेखा और बीजगुप्त का सुखद मिलन हुआ।

     फिल्म की जान है इसके गीत जो गहरे भाव लिये हैं। महमूद के रोल में श्वेतांक बहुत आकर्षित करते हैं तो सामंत बीजगुप्त के रोल में प्रदीप कुमार। चित्रलेखा के रूप में मीना कुमारी ने बहुत ही ज्यादा असरदार भूमिका अदा की है। भव्य चित्रण और क्लासिक फिल्मों के नजरिए से देखा जाय तो चित्रलेखा एक उत्कृष्ट फिल्म है।
 
  एक गीत जो बहुत ही ज्यादा सुमधुर और मन्नाडे की आवाज में गाया गया, वह है ब्रह्मचारी श्वेतांक के जरिए यशोधरा के प्रेम पाश में पड़ने पर गाया गीत -



लागी मनवा के बीच कटारी
कि मारा गया ब्रह्मचारी
कैसी ज़ुल्मी बनायी तैने नारी
कि मारा गया ब्रह्मचारी


ऐसा घुँघरू पायलिया का छनका
मोरी माला में अटक गया मनका
मैं तो भूल प्रभू सुध-बुध सारी
कि मारा गया ब्रह्मचारी ...


कोई चंचल कोई मतवाली है
कोई नटखट, कोई भोली-भाली है
कभी देखी न थी,
 ऐसी फुलवारी कि मारा गया ...


 बड़ी जतनों साध बनायी थी
मेरी बरसों की पुण्य कमायी थी
तैने पल में, भसम कर डारी कि
मारा गया ब्रह्मचारी ...


 मोहे बावला बना गयी वाकी बतियाँ
मोसे कटती नहीं हैं अब रतियाँ
पड़ी सर पे बिपत अति भारी
कि मारा गया ब्रह्मचारी...


मोहे उन बिन कछू न सुहाये रे
मोरे अखियों के आगे लहराये रे
गोरे मुखड़े पे लट कारी-कारी
कि मारा गया ब्रह्मचारी...

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तो यह रही मेरी आज की दुपहरीया की समयावली.............आसमान मे दलबंदी करते काले काले बादलों की घटाटोप के बीच फिल्म चित्रलेखा की देखवाई।

- सतीश पंचम

Saturday, June 5, 2010

बिन-गौना हुए पर्स में रखी पत्नी की तस्वीर, घाटकोपर स्टेशन, रापचीक अल्हड़पन और गुदगुदाती यादें.............सतीश पंचम

        क्या कभी आपका कोई चोरी हुआ सामान वापस चोर ने लाकर रख दिया है ?  कुछ भी….चोरी हुआ  सामान जैसे…. मोबाईल, घडी, उस्तरा, छेनी, हथौडी……कुछ भी ?

   क्या कहा ? संभावना ही  नहीं इस बात की……हां बात आपकी भी सही है।

    भला कोई चोर……. चोरी का समान लौटा दे तो वह चोर कैसे कहलाए। चोरी करना ही उसकी यूएसपी है। इस यूएसपी के साथ हर पेशे में कुछ न कुछ इंडिकेटिव तत्व जुडा रहता है। इंडिकेटिव तत्व से तात्पर्य है  जैसे कि, नाई के पेशे में शेविंग करते हुए बातें करते रहना, हलवाई की दुकान में किसी मोटे आदमी का गल्ले पर बैठना , किसी योगी के कक्ष में पद्मासन मुद्रा चित्र लगे होना,  डॉक्टर के कमरे में शरीर विज्ञान को दर्शाती मांस पेशियों का चित्र लगे होना वगैरह वगैरह।

 एसा ही कुछ ब्रिटेन के साथ भी जुडा है।

ढिठाई….।

   हाँ जी , ढिठाई ही वह इंडिकेटिव तत्व है जो फिलहाल इंग्लैंड के साथ जुड़  सा गया है। पहले तो जम कर देश को लूट पाट कर ले गये…कहते गये कि हम तो आपको समृद्ध कर रहे थे। ब्रिटिश भारत में लोग सुखी थे…..हम न होते तो तुम ये होते ….वो होते…..वगैरह वगैरह। अब हालत ये है कि हम अपने चोरी चले गये कोहिनूर को मांग रहे हैं तो फिर वह अपनी वही पुरानी ढिठाई को तौलते हुए कह रहा है – ब्रिटिश कानून के हिसाब से वह इस तरह की किसी पुरातात्विक या ऐतिहासिक चीज को वापस या मूव नहीं कर  सकता। गजब ढिठाई है…..पहले तो चोरी की और अब उस चोरी पर कानूनी दांव पेंचों का कवर भी चढ़ा रहे हैं। 

    वैसे हमारे राजा वगैरह लोग भी बड़े  थोबड़हा टाईप थे। कम्बख्तों को एक दूसरे का थोबड़ा देख-देख आपस में लड़ने भिड़ने से फुरसत ही नहीं मिलती थी। पता चला कि महाराज कहीं बाग वगैरह में खड़े होकर अपने थोबडे़ का पोर्टरेट बनवा रहे हैं ……किसी रानी के थोबड़े को गुलाब से सहला रहे हैं…… फलां देश की राजकुमारी का थोबड़ा इतना पसंद आता कि पूरी सेना लेकर वहीं पिल पड़ते……...……..कुछ कुछ की नवाबी यहां तक चलती थी कि उसे फर्क ही नहीं पड़ता था कि किसी पुरूष से मेलमिलाप कर रहा है कि महिला से। नवाबी शौक । सालों ने आर्टिकल 377 का  पता ठिकाना ढूँढ निकाला था उस जमाने में।

    खैर, बात हो रही थी चोरी की, कि  कभी कोई चोरी हुई चीज वापस जल्दी नहीं मिलती। लेकिन एक वाकया ऐसा है जहां न सिर्फ चोरी की चीज मिली बल्कि  इस बात पर  अफसोस भी हुआ कि यार यह वापस ही क्यों मिली।

    बात दरअसल मेरे कॉलेज के जमाने की है। हम तीन दोस्त मुंबई के सत्यम सिनेमा में ‘बोल राधा बोल’ फिल्म देखने गए थे। वही जिसमें तू तू तू तारा रारा वाला गाना था…..स्वेटर पहने ऋषि कपूर……। वाह, क्या फिल्म थी। मजे में पॉपकॉर्न खाए….पेप्सी वगैरह पी……हंसी पडक्का किए। लौटानी में मेरे मित्र का पॉकेट किसी ने मार लिया। अच्छे खासे पैसे थे उसमें। पैसों के साथ कुछ एक प्रेम पत्र, एक किसी खास की फोटो…….और थोडे बहुत चिल्लर वगैरह।

    अब जरा मित्र के बारे में बताउं कि तब उस समय उनका विवाह तो हो गया था लेकिन गौना नहीं हुआ था। गौना यानि लड़की की विदाई नहीं हुई थी। घरवालों का कहना था कि पढ़ाई खत्म कर लो….कुछ काम धाम पर लग जाओ तो विदाई करवा लाना। यह गौने वाला दौर भी कभी चलता था। अब तो विवाह-विदाई सब साथ ही होता है।

      तो पर्स में जो प्रेम पत्र वगैरह थे, फोटो वगैरह थे…..सो  इन्हीं भाभी जी के लिखे हलफनामें थे….. जिनका कि गौना अभी नहीं हुआ था। दोनों ही मुंबई में रहते थे। उस वक्त सेलफोन आया भी नहीं था…सो प्रेमपत्र ही एक दूसरे से संपर्क का माध्यम थे और फोन…… जो कि किसी एसटीडी बूथ वगैरह से किए जाते थे।

          खास बात यह थी कि  इनके मिलने मिलाने का स्थान भी फिक्स था। घाटकोपर स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर एक के इंडिकेटर के नीचे। भाभीजी का कॉलेज भी नजदीक ही था…..सो उनकी सुविधानुसार यह स्थान चुना गया था। प्लेटफॉर्म पर खडे़ खड़े किसे पता चलता है कि ट्रेन पकड़ने खड़े हो या किसी का इंतजार करते।   उस समय यह ‘प्लेटफार्म नंबर एक और इंडिकेटर के नीचे’ वाला जुमला हम लोग इतनी बार सुन चुके थे कि महाशय को इसी की याद दिलाते छेडा जाता था। घाटकोपर स्टेशन से यह लोग किसी रेस्टोरेंट वगैरह में जाते या फिर सर्वोदय वाले गार्डन वगैरह में।

तो बात हो रही थी पर्स चोरी की।

     अभी एक हफ्ते ही बीते होंगे कि मित्र के घर पर एक कुरियर आया। खोलने पर उसमें वही पर्स, भाभीजी की तस्वीर और प्रेम पत्र थे। जिस वक्त घर में कुरियर आया था उस वक्त तो महाशय कॉलेज में मेरे साथ क्लास में बैठे थे…..घर पहुंचने पर पता चला कि उस कुरियर को खोल-खाल कर उसका बाकायदा पोस्टमार्टम किया गया है। घर के सभी लोगों ने पढ़कर बाकायदा उसका पंचनामा किया है।

     मित्र के पिताजी भभक रहे थे कि एही कारन बबुआ के पढ़ाई खराब हो रहल बा …….जा रहे हैं ज्ञान लेने  और पता चला कि घाटके उपर इस्टेसन के नीचे…… पलेटफार्म नम्मर एक पर ज्ञान बाँट रहे हैं। क्या पढाई करेंगे….कैसे पढ़ाई करेंगे रामजाने।

     शाम तक घर पहुंचने पर घर के  सभी लोग एक भेदक नजरों से मित्र को देख रहे थे। मामला समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या है….आखिर किस बात को लेकर लोग तंज हैं। खाने पीने के बाद जब महाशय सुस्ताने बैठे तो बमबार्डिंग शुरू हो गई।

    यही सब करने कालेज जाते हो…..सादी बियाह कर दिया कि एक न एक दिन यह होना ही है…..फिर नात रिसतेदार का जोर पड़ा तो बियाह कर दिया…….लेकिन हम क्या जाने बबुआ पढ़ने नहीं अपनी मौगी को मिलने जा रहे हैं।

    समझ लो बबुआ की महतारी…..अब लईका का कुछो नहीं हो सकता….जाओ विदा करवा कर ले आओ लईकी को……कम से कम घाट के उपर औ प्लेटफार्म नम्मर एक के नीचे तो शांति रहेगी। इसी लिए मैं लड़के का विवाह में जल्दबाजी नहीं कर रहा था लेकिन तुम ही थी जो अपने नात रिसतेदार का दबाव औ टेढगईली गाने लगी।

    मित्र जी शर्म से लाल…..लाल। समझ नहीं आ रहा था कि कहें तो क्या कहें। इधर बमबार्डिंग चालू थी  और उधर उस पॉकेटमार को कोस  रहे थे जिसने पैसे तो सारे ले लिए लेकिन पर्स और तमाम मटेरियल जस का तस पर्स में रखे कार्ड के आधार पर पार्सल कर दिया था। महाशय  खूब- खरी खोटी सुने। भाभी जी को भी  रिमोटली  सुनना पडा कि अब बबुआ को फांस लिया है….अब क्या हम लोगों के काबू में रहेगा वगैरह वगैरह।

    बाद में तो आखिर भाभीजी की कुछ दिन बाद विदाई भी हुई, धीरे धीरे घर गुलजार हुआ, बच्चे कच्चे भी हुए……..और घाटकोपर स्टेशन का प्लेटफार्म नंबर एक कुछ  शांत हुआ।

   यह सब देख कर मन कहता है कि भगवान….चोरी हो…..चोरी जमकर हो……लेकिन ऐसे चोर का किसी के पाला कभी न पडे कि   उसकी वजह से शर्मिंदगी झेलनी पड़े , बमबार्डिंग झेलनी पड़े :)

     हाल ही में अपने उसी मित्र से मिलकर आया हूँ……हम लोगों के बीच कई मजाकिया बातों में यह बात भी हुई कि भाई साहब……. अब विवाह के इतने सालों बाद कम से कम  घाटकोपर स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर एक पर  फूल वगैरह रख  अगरबत्ती तो जला दो ……. आखिर वह तुम दोनों के लिए मिलनस्थली जो ठहरी :)

सचमुच, कुछ यादें बड़ी गुदगुदाहट लिए होती हैं.....अल्हड़पन की लाली लिए हुए  :)

 - सतीश पंचम

स्थान – वही, जहां पहले कभी प्लेटफार्म पर एक ही इंडिकेटर लगता था लेकिन लोकल के डिब्बों के ज्यादा जुडने से अब दो दो इंडिकेटर  प्लेटफॉर्म पर लगते हैं।
  
समय – वही, जब महिला मित्र के साथ रेस्टोरेंट में इडली-सांभर चाँपने के बाद पता चले कि जेब कट गई है और महिला मित्र खिलखिला कर कहे……अब तो चाय आनी चाहिए…..क्यूँ क्या ख्याल है। और महाशय तपाक से कहें……बर्तन यहां के कुछ ज्यादा ही काले लग रहे हैं……माँजते माँजते शाम हो जाएगी :)

( चित्र : इंटरनेट से साभार)

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