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Monday, May 31, 2010

ये ओढ़निया ब्लॉगिंग का दौर है गुरू......ओढ़निया ब्लॉगिंग.....समझे कि नहीं........सतीश पंचम

       आज कल ओढ़निया ब्लॉगिंग की बहार है। ओढ़निया ब्लॉगिंग नहीं समझे ? तो पहले समझ लो कि ओढ़निया ब्लॉगिंग आखिर चीज क्या है ?

   कभी आपने गाँव में हो रहे नाच या नौटंकी  देखा हो तो पाएंगे कि नचनीया नाचते नाचते अचानक ही किसी के पास जाएगी और भीड़ में से ही किसी एक को अपनी ओढ़नी या घूँघट ओढ़ा देगी। आसपास के लोग तब ताली बजाएंगे और लहालोट हो जाएंगे। कुछ के तो कमेंट भी मिलने लगेंगे जिया राजा, करेजा काट, एकदम विलाइती।

      और जो ओढ़नी के भीतर ओढ़ा दिया होगा वह अंदर ही अंदर नचनीया पर मुस्की मार रहा होगा और मुस्की मारते हुए जेब से पांच दस रूपए अपना नाम बताते हुए दे देगा। एकाध बार ओढ़नी के भीतर ही भीतर गाल-ओल भी सहला देगा। नचनीया फिर नाचते नाचते अपने स्टेज पर पहुंचेगी, हारमोनियम मास्टर तान पर तान छेडे रहेगा और इसी बीच वह घोषणा करेगी कि – ढेलूराम टेलर, केराकत चौराहा वाले की ओर से दस रूपईया इनाम और एही के लिए मैं अगला गीत उन्हें समर्पित करती हूँ कि – गर्मी के महीना, बाली उमरिया...... टप्प टप्प चुए पसीना बलम तनि पंखा चलाय द हो.......इतना कहना होगा कि भीड़ एकदम लहालोट.....सीटी बजने लगेगी, पानी की पिचकारी भीड पर फुहार कर रही होगी और जिसका नाम स्टेज पर से घोषित होगा और जिसके नाम पर गीत समर्पित होगा वह ढेलूराम टेलर अंदर ही अंदर मगन होगा कि चलो इसी बहाने मेरी दुकान का प्रचार हो रहा है।

       कुछ यही हाल ब्लॉगिंग में भी चल रहा है। नाच शुरू होने से पहले होठों की तस्वीर के साथ  घर घर जाकर ब्लॉग का पर्चा थमाया जाएगा कि – बदन का उभार देखो, ये देखो वो देखो और जाने पर पहले पता चलेगा कि किसी नारी का अधनंगी तस्वीर लगी है। एक दो जन एतराज करेंगे तो तस्वीर हटा ली जाएगी और तब कविता के नाम पर नारीवादी गीत पेश होगा कि आँखें है और पाँखे हैं और बांके हैं वगैरह वगैरह। उपर से एक एक कविता ब्लॉगरजन के नाम समर्पित भी की जाएगी कि मेरी यह कविता फलां सर के नाम, अगली कविता ढेकाने सर के नाम। 

अब,

बडे बूढे गमछा हिलोरते हुए ऐसे वक्त सबसे आगे स्टेज पर बैठे मिलेंगे। ढेरो कमेंट देते। कहीं हमारे नाम से भी एकाध कवित्त हो जाय चाहते हुए।  ऐसे वक्त गमछों की उछाल ब्लॉगिंग में आती हिलोरों से ज्यादा उंची हो जाती है। तरह तरह के कमेंट वाह वाह, क्या बात कही, सुंदर कविता कही वगैरह वगैरह। ढेर सारे फॉलोअर के रूप में पिछलगुआ भी मिल जाएंगे। साईकिल की घंटी भी कुछ ज्यादा ही घनघनाने लगेगी...... पूरे शामियाने में हलचल सी मची रहेगी। वाह वाह, क्या खूब के कहकहों के बीच।

     तो भई, ये ओढ़निया ब्लॉगिंग का दौर चल रहा है। जैसे सारे दौर चले वैसे यह भी दौर चलेगा....अब देखिए कब तक चलता है।

- सतीश पंचम


पहले तीन चित्र : साभार  इंद्र गोपाल फोटोग्राफी और नेट से,  आखरी चित्र मैंने मोटर साईकिल से जाते हुए एक बाजार के बीच से गुजरते समय खींचा था।।

Saturday, May 29, 2010

मुलैमा, टीवी, महतो, माओ, उखाड पटरी, राजनीति वाली मुनिया......और अबूझा मन.....सतीश पंचम


 टीवी देखते, समाचार सुनते और उमडते घुमडते सवालों के बीच टीवी पर बताया जा रहा है कि लाईनमैंन को गनपॉईंट पर अपहरण कर रेल ट्रैक में गडबडी की गई.....कहा गया कि करो नहीं तो तुम्हें और परिवार वालों को मार देंगे......एक ओर सिंदूर.......एक ओर लाल संघर्ष......इन्हीं सब से दो चार होता.......एक कोलाज। 

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    दिल की ये आरजू थी कोई दिलरूबा मिले……सितार वाले…   राजबब्बर.…….महेंद्र कपूर…….……चाय पी लो ठंडी हो रही है…..सी टी सी चाय ……..……गर्म हैंडल…..ए घुम ले ........ए घूम ले..... ये दुनिया बड़ी मजेदार….अमेरिकन टूरिस्टर…..गोरा आदमी……..श्वेत विला बन रहा है दोस्त…….पवई इलाके में ही तो……….अपना ख्याल रखना गारनियर…….जाते हो परदेस पिया तुम जाते ही ………..स्माईली ओढ़ाती पत्नी…….एम डी एच मसाले…….पान खाए सरीखा दिल…….बिछड़ता सैनिक…..उबलती चाय…….गर्म तवा……एक बूंद…….सनननन

     राईट टाईम……..बोल कि लब आजाद हैं तोरे….……..विकलांग राजनीति का शिकार………अमिताभ बच्चन…..बोले तो…….हाईट ऑफ फैशन ……छह फुट दो इंच ………अमर सिंह………बोले रे पपीहरा……पपीहरा…….इत उत डोले………मुलैमा चूडीबाज………कौन दिसा में लेके चला रे ……..माया संस्कृति…..डिस्कवरी चैनल फेल हो रहा है दोस्त…….…

    जेल …… कैदी…….जेलर…..सलाखें……..एक जगह क्यूं बैठा रहता है बे……..खिड़कियों से देखने का मन……नीला आसमान….सफेद बादल…….उड़ती चि़ड़िया……..……चलो टाईम हो गया….मिलने का टाईम खतम……..मन में दूसरा लड्डू फूटा।

  बंद होते गेट…..खट खुट…..सब ठीक है……..पीला पिशाब…….गर्मी का मौसम  ……..बहुत मारा…….सफेद पिशाब……गर्मी निकल गई …….खाने में कंकड़ ……. थूक मत ………नक्सल समस्या पीलापन लिये हुए है……….पिशाब सफेद करवाना पडेगा........साले नक्सली..... …….…कुत्ते की तरह पीटो .......एक कंकड़ कम …..कंकड़ कंकड़ जोड़ के…..मसजिद लिया चुनाय……..का बात कर रहे हो गुरू........…. सिंदूरी राजनीति चल रही है मित्र……..कल पटरी उखडी…….आज पटरी बैठी…… सीबीआई जांच की मांग …….. ठंडा बस्ता तैयार…….......नक्सल महतो.....उमाकांत महतो.....लाईनमैन .......गनपॉईंट पर रेल ट्रैक.......फिश प्लेट........उखाड़ साले ……सिंदूर लगाती सींक……..लाली कम है री…………...दोख होता है…..पति मुस्किल में पड जायगा.......दयाराम महतो...... …….उमाकांत महतो.........बापी महतो........पीसीपीए ........माओवादी.…..आहि रे ज्ञानेश्वरी.....सर्वे भवन्तु सुखम्........लाल सिंदूर.....एक मांग की लाली......बचा लेना राम.........सैंकडों सूनी हुई.........जंगल.....सन्नाटा.....धांय....धांय......धांय.......

ऐ मुक्ति बाबू......इधर किधर......... पार्टनर.......... तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है

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कोलाज के बारे में - थोडा सा कोलाज के अमूर्त तत्वों का खुलासा कर दूं क्योंकि कहीं कहीं लग रहा है कि कुछ ज्यादा ही Abstractism आ गया है पोस्ट में।  कमेंट देख कर भी यही महसूस  कर रहा हूँ। 

 यहां शुरूवात में राजबब्बर पर फिल्माए और महेन्द्र कपूर द्वारा गाए गीत से हो रही है जिसके बोल हैं दिल की आरजू थी कोई दिलरूबा मिले जिसका तात्पर्य आगे जाकर खुलता है कि एक अच्छा सा शांति दायक सूकूनदेह रहने लायक देश की इच्छा थी। इसी बीच आजकल अमेरिकन टूरिस्टर वाला ऐड की ओर इशारा किया गया है कि कैसे सारा देश अमेरीकी चादर ओढते जा रहा है।  


 अभी हाल ही में मुंबई के पवई इलाके मे एक श्वेत विला नामक बिल्डिंग का ऐड देखा जिसमें रहने वाले श्वेत विदेशी मेंम की तस्वीरे हैं। उसमें रहने वालो के ठाठ विदेशीयों जैसे बताए गए हैं। नाम भी श्वेत विला रखा गया है। अर्थात देश अब भी उसी विदेशी मानसिकता से गुजर रहा है। 


 आगे मैने लिखा है कि अपना ख्याल रखना गारनियर....जो कि टीवी पर आते गार्नियर से प्रेरित है जिसमें पंचलाईन है कि अपना ख्याल रखना। इस पर एक तरह से घर से व्यंग्य और हास्य का पुट मिलाते हुए कहा भदेस शब्दों में बात कहने के लिये शुद्ध गार्नियर न लिख गारनियर लिखा है यानि कि जब घर से विदा हो रहा है कोई तो घर की महिला कहती है अपना खयाल रखना गारनियर। स्माईली ओढाती से तात्पर्य मुस्काती पत्नी से है जो अपने पिया को जाते हो परदेस पिया जाते ही खत लिखना गाने के आलोक में विदा कर रही है। 


 इसी बिछड़ाव के दौरान तिक्तता भी बढ़ती है कि वह उसे क्यो न ले जा रहा है मसाले की उपमा और पान खाए सरीखा दिल उसी की ओर इशारा कर रहा है। 


 एक सैनिक की विदाई भी उसी अंदाज में हो रही है, चाय उबल रही है, पत्नी रो रही है और उसके आंसूओं के बूंद सैनिक के दिल में गर्म तवे पर पडे  बूंद से सनसना रहे हैं और लुप्त भी हो जा रहे हैं तुरंत। आखिर उसे अपनी टुकडी से जाकर मिलना भी तो है, वही टुकडी जो दंतेवाडा और तमाम इस तरह के आपरेशन को अंजाम देती रही है। 


 आगे टीवी पर अक्सर दिखते राजनीतिक माहौल की ओर इशारा किया गया है। हरिशंकर परसाई जी के लिखे विकलांग राजनीति के शिकार वाली कहानी अमिताभ बच्चन पर लागू हो रही है और उसी ओर यह कोलाज इशारा कर रहा है। 

 अमर सिंह के नई पार्टी गठन और यहां वहा मिलते बयानो के मद्देनजर पपीहरा के रूपक मे बोले रे पपीहरा गीत का अंश लिखा गया है।


 मुलैमा चूडीबाज से तात्पर्य हाल ही मुलायम सिंह द्वारा अपने विरोधियों पर काबू पाने के लिये राज्यसभा टिकट के ऑफर से है और यह प्रक्रिया एक तरह से विरोधियों की चूडी कसने की तरह थी और यह लाईनें इसी ओर इशारा कर रही हैं।    


 वहीं  डिस्कवरी चैनल पर सूदूर माया संस्कृति के बारे में बताया जा रहा था कि किस तरह से वहां को लोग रहते थे, उनके संकेत क्या थे वह एक दूसरे पर कैसे भरोसा करते थे और उनके जीवनयापन के क्या साधन थे।


 लेकिन यहां पैसों की ऐसी माया दिख रही है कि सारा सिस्टम कैसे चल रहा है जनता कैसे रह रही है और कैसे इस तरह की बातों पर जी मर रही है उसको जानने के लिए यदि डिस्कवरी वाले आएं तो  फेल हो जाएंगे....इसलिए लिखा है कि डिस्कवरी चैनल फेल हो रहा है दोस्त...

 आगे जेल के माहौल का नजारा है जिसमें नक्सली बंद हैं और उनकी खूब तुडाई हो रही है। समय समाप्त हुआ जैसे बातें भी हैं। इसी देस के नागरिकों का किया धरा सब कंकड की तरह है जो पैरों में चुभता जा रहा है। 


 आगे लिखा गया है कि कैसे गनपॉईंट पर लाईनमैन को अपहृत किया जा रहा है कि चल कर रेलवे लाईन डैमेज करे और उधर उसकी पत्नी मांग में एक सींक से सिंदूर भर रही है कि उसका पति सुरक्षित रहे।


 लाल संघर्ष और सिंदूर के रूप में यहां एक तरह की दुविधा और नैराश्य का वर्णन है। 


 अंत में मुक्तिबोध की फेमस टैगलाईन है जो कह रही है कि आखिर हमारी पॉलिटिक्स किस ओर जा रही है, अपने ही लोगों को मारा जा रहा है, पीटा जा रहा है, लोगों को सरेआम दंतेवाडा सरीखे माहोल में हलाक किया जा रहा है और हम हैं कि कुछ भी करने में लाचार से हैं। 


 इसलिये कह रहे हैं मुक्तिबोध कि - पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है ? 


 संजय जी,बैचैन जी और तारकेश्वर जी के कमेंट के बाद लगा कि थोडा डिटेल जरूरी है।

उम्मीद है कोलाज का इतना विश्लेषण पर्याप्त होगा। 

  - सतीश पंचम

चित्र : दोनों चित्र मेरे गाँव से हैं जिन्हें अबकी जाने पर मैंने खींचे थे। दूसरे नंबर पर चरवाहे वाला चित्र राह चलते- चलते खींचा था......कैमरा ठीक से सेट करने का मौका नहीं मिल पाया और अंदाजिया क्लिक कर दिया था..... जस का तस वही चित्र पेश  है।

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सूचना - अपने ब्लॉग पर सर्च इंजिन से ट्रैफिक बढ़ाने हेतु पोस्ट से संबंधित  keywords इंग्लिश में लिखना शुरू कर रहा हूँ।  अच्छा तो यह होता कि इन शब्दों को मूल पोस्ट में अंग्रेजी में ही लिखता लेकिन इससे पोस्ट में फ्लो नहीं बन पाता और सरसता में बाधा आती। सो, अलग से कीवर्ड लिख रहा हूँ।

 ट्रैफिक सर्च इंजिनों से डायवर्ट करने का इस तरह का विचार मेरे मन में कई दिनों से था लेकिन आज  रतन सिंह शेखावत जी के ब्लॉग की एक पोस्ट ने मेरी उस सोच को कुरेदना शुरू  कर दिया और आज से मैंने यह युक्ति लागू करने का मन बना लिया है।

   आशा है बाकि ब्लॉगर जन भी यह युक्ति अपनाएंगे। रतन सिंह शेखावत जी को इस कुरेदनात्मक पोस्ट के लिए धन्यवाद देता हूँ।

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Keyword ref. ( for serach engines) - Colaj,Politics,Indian,Naxalite area,blast,Train accident,lineman,Amar singh, Mulayam singh, gyaneshwari Train Accident, Maoist,Jail,jail scenes, killer,kidnapping,Fish plates,Television News,forest,India,Naxalites,Naxal,Chattisgarh.

Friday, May 28, 2010

ब्लॉगिंग ऐसी हीर है कि बस्स...... की दस्सां............सतीश पंचम

       कभी मुझे अपने लेखन पर इतना कॉन्फिडेंस था कि जब पोस्ट लिखने के कुछ देर बाद तक यदि कोई टिप्पणी नहीं आती थी........ तब एक टेस्ट कमेंट लिख चेक करता था कि कहीं टिप्पणी आदि के बारे में कोई तकनीकी रूकावट तो नहीं है :)

 हंस रहे हो.......हंस  लो यार..... लेकिन यह भी एक किस्म की चिलगोजई थी........एक मौज था......  सो होता था ऐसा भी कभी........  वो तो बहुत बाद में पता चला कि टिप्पणीयां मल्टीफैक्टोरल होती हैं। कई कई फैक्टर होते हैं टिप्पणियों के आने या  न आने के लिए।

   इन्हीं दो सालों के दौरान कई ब्लॉगरों से मिलना मिलाना हुआ.....कई लोगों के यहां जाना-आना भी हुआ.... .किसी से जान पहचान बढ़ी तो चैटियाना भी हुआ और होते होते ये भी हुआ कि कभी जिसे आप कह कर संबोधित करता था, धीरे धीरे घनिष्ठता बढ़ने पर तूम से संबोधित करने लगा।

   गिरिजेश के नाम के आगे अब जी नहीं लगाता.....हम लोगों में अब अमाँ यार.....तमाँ यार चलती है  :)

इस तू तड़ाक से याद आया कि स्कूली दिनों में एक बार मेरे प्रिंसिपल साहब और एक साथी शिक्षक के बीच कोई बात चीत चल रही थी। दोनों ही सिक्ख, और आपस में मित्र भी गहरे। साथ में एक और शिक्षक थे।  बातचीत करते करते  शिक्षक महोदय कह बैठे - तैनुं नईं पता ते गल्ला नां किया कर......मैं जाणदा हां सच की है।  शिक्षक महोदय की बात सुनकर प्रिंसिपल साहब ने साथ चल रहे एक दूसरे शिक्षक को कोहनिया कर कहा - वेख ऐनु, तूं तडाक नाल गल्लां करदा ए।

 प्रिंसिपल साहब की बात सुनकर शिक्षक महोदय ने कहा कि - तुस्सी अपणे आप नूं रब्ब तो वड्डा मन्नदे हो।
दोनों की समझ में न आया तब शिक्षक महोदय ने कहा कि - असी अरदास करन वेले कैंदे ने , एक  तू ही रब राखा। जे असी रब नू तू कै सकदें हां ता तुहानूं क्यूं नहीं ?

 इस घटना से याद आया कि हम भी अपने ईंश्वर को तू तड़ाक से ही संबोधित करते हैं। अमिताभ जैसे बंदे तो शंकर जी से सीधे संवाद करते हुए कहते हैं - खुश तो बहुत होगे तुम......

  चलिए, इस तू तड़ाक से विषय का भटकाव सा हो गया है। तो मैं कह रहा था कि अब मेरे और गिरिजेश में अमाँ यार, तमाँ यार चलती है। औपचारिकता अब मायने नहीं रखती। कई और लोगो से चैटिंग होती रहती है जिन्हें कि कभी मैं जानता तक न था, उनके ब्लॉग पढ़ कर देख ताक कर बेहिचक बातचीत हो लेती है।

 ऐसे ही मैं कभी कभी  अनूप जी को भी जब तब छेड देता हूँ। एक दिन ऑफलाईन थे महाशय।

मैंने एक चैट लिखा - टेस्ट।

मुझे लगा ऑफलाईन हैं, तो उनको क्या पता क्या लिख कर छोड़ गया हूँ.....यूं ही टाईम पास कर बैठा। अभी दो मिनट हुए कि जनाब अवतरित हुए....काहे का टेस्ट।

 मैं तो सकपका गया। जिसे मैं ऑफलाईन समझ रहा था वह तो ऑनलाईन है। मुझे याद आया मुंबई का बैंण्ड स्टैंड इलाका । वहाँ भी समुद्र किनारे खडे होकर देखने पर पत्थर ही पत्थर और समुद्र की लहरें दिखती हैं।  मौज लेने के लिए एक ढेला  आपने पत्थरों पर फेंका नहीं कि वहीं किसी पत्थर के पीछे से एक लडका खड़ा हो जाएगा......क्या है ......दिखता नहीं क्या ?   लग जाता तो ?

 हम केवल सॉरी सॉरी कह कर रह जाते हैं। और वह लडका फिर वहीं पत्थरों की ओट में गुम हो जाता है अपने किसी प्रेयसी के संग।

 तो ये तो हाल है हमारे ऑनलाईन - ऑफलाईन का......अनूप जी उम्मीद है बुरा नहीं मानेंगे। और हां,   प्रेयसी बोले तो सचमुच की प्रेयसी नहीं ओए........तुस्सी लोक वी नां.......मेरे कैण दा मतलब ऐ है कि अपना काम भी एक ऑफिशियली अलाटेड प्रेयसी की तरह ही है....उसे नाराज कर दें तो घर में महाभारत मच जाय । काम काम होता है, ऐसे वक्त किसी को चैट आदि कर डिस्टर्ब नहीं करना चाहिए। अनूप जी आप को जो टेस्ट चैट लिखा था उसे वापस लेता हूँ :)

    इसी दौरान कई बार मजाकिया या कोई इन्फार्मेटिव मेल वगैरह कहीं से फॉरवरड होकर आता तो उसे अपने मेल लिस्ट में रहे कई ब्लागरों को भी फॉरवरड करता रहा। अब जब आप टिप्पणीयां कर सकते हैं तो मेलबाजी भी तो कर ही सकते हैं। सो यह भी होता रहा। अब तो कम या नहीं के बराबर मेल फॉरवार्डिंग करता हूँ :)

 कई लोगों को पढ़ता हूँ........कई अन्य लोगों को पढ़ना चाहा लेकिन विचार पता नहीं कब कैसे गोल हो गए कि पढ़ने  से बिदक जाता हूँ। कभी कभी किताबों की ओर  मोहित हुआ तो कभी विचारों की ओर। सब ओर अभिव्यक्ति ही अभिव्यक्ति है।

 अभी आज विनीत जी के गाहे बगाहे में पढा कि उन्हें अब लिखने की कम इच्छा हो रही है। पढ़ते जरूर हैं। यह स्थिति अपने साथ भी होती रहती है अक्सर। लेकिन फिलहाल तो अपना मन लिखने और पढने दोनों ओर लगा है और हो भी क्यों न। श्रीमती जी गांव में हैं। न सब्जी लाना है और न दूध - दही। टिचन्न होकर पढता लिखता हूँ।

और हाँ, एक और बात -

          इन दो सालों में ब्लॉगिंग के बहुत सारे रंग देखे। कभी तुनुक तुनुक तुन तारा रा तो कभी ढेन टें ढेन वाले मिजाज भी देखे। अनामी फनामी, सुनामी, पनामी जैसों से ब्लॉगजगत अब भी दो चार हो रहा है। यह ब्लॉगजगत का खर पतवार कब ठहरेगा, कब बंद होगा..... कोई नहीं कह सकता।

   लेकिन इस बीच टंकी पर चढ़ने वाले भी देखे, टंकी पर से उतरने वाले भी देखे......कुछ लोग देर तक चढ़े रहने के बाद अचानक सरपट उतरे.....तो कुछ लोग रूक रूक कर उतरे.....इसी दौरान  कुछ लोग बगल में  'आप लोगों का  स्नेह'  नाम का थैला लटकाए हुए भी उतर आए तो  :)

सो......

इतने लोगों का आना जाना दो सालों में पढ़-देख चुका हूँ कि मुझे ब्लॉगिंग पर अहसास फिल्म का गाना एकदम फिट लग रहा है -



कितने राँझे देख के तुझे बैरागी बन गए......... 
बैरागी देख के तुझे....... अनुरागी बन गए।







ब्लॉगिंग.......द सोशल फिनामिना.....  




इसी मई महीने में पूरी हुई अपनी  दो साला ब्लॉगरीय सफर को  याद करते हुए मैं  - सतीश पंचम

स्थान - वही, जिसे कभी दहेज में दे दिया गया था।

समय - वही, जब हीर और राँझा  मुंबई के समुद्र किनारे के बैण्ड स्टैंड पर साथ साथ बैठे हों, उधर  राँझा अपनी हीर से प्रेम जताते हुए कभी आसमान से तारे तोड लाने का वायदा कर रहा हो, कभी  समुद्र सुखा देने की बातें कर रहा हो .........कि तभी समुद्र के गंध मारते, काई लगे पत्थरों के बीच से कोई केकड़ा निकल कर राँझे को काट ले और हीर कहे - झूठ बोले कौवा काटे तो सुणिया सी मेरे राँझड़े......... केकड़ा कट्टण दा हाल पैली वार वेखदी हां :)
   

( दूसरा और तीसरा चित्र - इंटरनेट से साभार )

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Sunday, May 23, 2010

तोर रूप गजब...... धान के कटोरे की महक पहुँचाती एक अनुपम कृति

     कुछ उपन्यास ऐसे होते हैं जो कि कथा-कहानी की मान्य लकीरों को लगभग काटते हुए  सनसनाते हुए  निकल लेते हैं और जब तक कि आप समझें कि क्या हुआ, वह उपन्यास आगे किसी खेत में खड़ा मिलता है, हंसते हुए, अपने पीछे बुलाते हुए और इस बात का लालच देते हुए कि अभी तुमने देखा ही क्या है……आओ मेरे पीछे-पीछे……और एक चीज दिखाता हूँ। पुन्नी सिंह रचित तोर रूप गजब इसी तरह की रचना है जो धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ की पृष्ठभूमि पर अपना धानी रंग बिखेरती चली जाती है।

      कहानी की शुरूवात होती है मूलत: शिकोहाबाद, उ.प्र.  के रहने वाले शिक्षक पुनीत से जो कि छत्तीसगढ़ ( तब संयुक्त  म. प्र)  के एक कॉलेज में अर्थशास्त्र पढ़ाने के लिए नियुक्त किया जाता है। तालाब और हरियाली के बीच बसे उस कॉलेज में उसकी नियुक्ति संस्थान के निदेशक महोदय करते हैं। यहां पुनीत को कई नए किस्म की बातों से दो चार होना  पड़ता है। ज्वाईनिंग कागजात पर उसके बांए हाथ की पांचों उगलियों के निशान लिए जाते हैं। इस सर्वथा नये किस्म के कागजी कामकाज से पुनीत को आश्चर्य होता है।

       साथी शिक्षकों से धीरे धीरे पुनीत का मेलजोल बढ़ता है। कई नए किस्म के वाद उसे  कॉलेज कैंपस में दिखाई पड़ते हैं। कुछ शिक्षकों की गुटबाजी चलती है। कुछ शिक्षक निदेशक महोदय के हां में हां मिलाते अक्सर पाए जाते हैं और निदेशक महोदय इस बात में मगन रहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा शिक्षक उनसे जुड़े रहें और जब कभी खेमेबाजी आदि की कोई बात हो तो वह बीस पड़ें। इसी बीच निदेशक महोदय के केबिन के बारे में भी पुनीत जानने लगता है कि महाशय की खिड़की जनानाघाट की ओर खुलती है और अक्सर नहाती, कपड़े बदलती महिलाओं को जनाब घूरते भी हैं।

      इस बीच शहर में कहीं एक कवि सम्मेलन का आयोजन हुआ । पवन शर्मा नाम के शिक्षक के साथ पुनीत भी वहा जा पहुँचा। वहां पहले से ही निदेशक महोदय और कई शिक्षक तीसरे रो में बैठे थे । भीड काफी थी और पुनीत का मानना था कि बेकार ही आना हुआ । न खडे होने की जगह न बैठने की। उधर कवि सम्मेलन मे पुनीत की क्लास के कुछ स्टूडेंट भी थे जो कि कवि सम्मेलन की देख रेख कर रहे थे। उन्हीं में से एक लड़के ने पुनीत को पहचान लिया और पवन शर्मा सहित पुनीत को सबसे आगे की रो में बैठा दिया। ना नुकूर करते हुए आखिर पुनीत को पहली लाईन में बैठना पडा और उधर तीसरी लाईन में बैठे निदेशक महोदय और चाटुकार शिक्षकों को कुछ अबूझा सा जान पड़ा।

     इधर पवन शर्मा और लाल साहब के साथ स्टाफ क्वार्टर में ही चुप्पे से तीन लोगों का पीने पिलाने का एक छोटा कार्यक्रम हुआ। अभी यह सब खतम हुआ ही कि अगले दिन निदेशक महोदय की ओर से बुलावा आ गया। शंकित मन लिए वह निदेशक के कमरे में गया जहां पहले से ही तीन शिक्षक निदेशक गुट के बैठे थे। तभी निदेशक महोदय ने बात करते करते और जनाना घाट की ओर ताकते हुए ताकीद दी कि  शिक्षक लाल साहब से चौकन्ना रहो । बाद में दूसरे स्त्रोतों से  वजह जानने पर पता चलता है कि लाल साहब का चक्कर  इसी संस्थान की एक पंजाबन शिक्षिका मोनिका से चल रहा था। दोनों ही एक दूसरे को चाहते हैं लेकिन मोनिका के घर वाले जबर्दस्ती उसे अपने साथ ले गए। अब लाल साहब अकेले रह गए हैं। 

     इधर पुनीत को लाल साहब में कोई ऐब नहीं दिखा, बल्कि भले आदमी मालूम पड़े । उन  लोगों की गहरे छनने लगी। और तभी एक दिन लाल साहब एक खत को लेकर परेशान हो उठे जिसमें उनकी प्रेमिका द्वारा जबलपुर से लिवा ले जाने का आग्रह था। लाल साहब का आग्रह था कि पुनीत जबलपुर जाकर उसके घरवालों से बात कर मामला सुलझाए, उन्हें समझाए……… और बाबू साहब तैयार भी हो गए।    

     जबलपुर पहुंचने पर पुनीत किसी तरह मोनिका का घर तलाश कर पाया। लेकिन असली मुसीबत शुरू हुई जब मोनिका के पिता ने बातों बातों में बंदूक की नली पुनीत के सीने से सटा दी। इसी दौरान एक घूंसा पुनीत को पड़ा और वह कसमसा कर रह गया। साथी शिक्षक की जिंदगी की बात थी सो वह शांत रहा। बाद में किसी तरह लाल साहब और मोनिका के रिश्ते की मंजूरी मिली और अब मोनिका ने फिर अपनी नौकरी पकड ली।  दोनों ही उस संस्थान में कमाने लगे।

    इधर पुनीत को अकेलापन महसूस हो रहा था। उसकी पत्नी और तीन बच्चे गाँव में संयुक्त परिवार में रह रहे थे। भरा पूरा घर था।  पुनीत ने अपने बड़े भाई को लिखा कि अबकी वह दिवाली में घर आकर अपने बीवी बच्चों को लिवा आएगा लेकिन  उसके बड़े भाई का कहना था कि पहले वह स्थाई तौर पर नियुक्त हो ले तब ले जाय बीवी बच्चों को । लेकिन एक साथी शिक्षक दुबे ने पुनीत को ज्ञान देते हुए समझाया कि वह खुद भी यू पी से हैं और वहां के लोगों कि एक पृवत्ति होती है कि जब घर का बेटा परदेश कमाने चला जाय तो उसके परिवार को यहीं गाँव में ही रोके रखा जाय ताकि बेटा कमाकर परिवार को दिया करे।

     ज्ञान प्राप्ति का असर कहें या पुनीत की मनस्थिति, वह अपनी गाँव की अनपढ़ पत्नी को लिवा आया। दो बेटे एक बिटिया भी साथ थी। कैंपस में जहां अन्य शिक्षकों की पत्नियां बढ़ चढ़ कर आधुनिक घरेलु, सामयिक चहल पहल पर बातें करती वहां पुनीत की पत्नी उन्हें बस टुकुर टुकुर ताका करती। धीरे धीरे पुनीत की पत्नी के मन में हीन भावना ने जड़ जमाना शुरू किया। उसे लगता कि वह लोग कितने बड़े हैं जो बड़ी बड़ी चीजों के बारे में बात करते हैं, सोफा -  ओफा , मेज – कुर्सी, रोज ही सेब खाना वगैरह वगैरह। इधर पुनीत चाहता था कि उसकी पत्नी भी और शिक्षकों की पत्नीयों की तरह बोला डोला करे। अपने मन में हीन भावना न लाए। बच्चे भी ढंग से रहें । लेकिन मामला था कि फिसलता जा रहा था। एक दिन पुनीत की पत्नी ने अपनी हीन भावना का जिक्र पुनीत से किया तब पुनीत ने एक तरह से उसे समझाते हुए कहा कि वह औरतें जो कुछ कहती हैं सब सच नहीं होता। वह लोग भी हमारे जैसे ही हैं बस बातें बड़ी बड़ी करती हैं। तुम चाहो तो वह चीजें तुम्हे भी हासिल हो सकती हैं। सोचने में क्या जाता है। वह लोग भी केवल अपनी हीन भावना को छिपाने के लिए सोच सोच कर निहाल होती हैं और वही बक देती हैं। इसमें तुम्हें परेशान होने की जरूरत नहीं। बल्कि अगर तुम चाहो तो अपने पिता के बारे में बताओ जो कि सचमुच के औसत दर्जे के जमींदार थे । उनकी बड़ाई किया करो।

      और यह युक्ति काम कर गई। पुनीत की पत्नी ने धीरे धीरे अपनी बतकौवल से सब पर प्रभाव सा जमाना शुरू किया। उसने अपने पिता के साथ साथ अपने ससुर यानि पुनीत के पिता को भी एक छोटा मोटा जमीदार बताया और उनकी उदारता आदि का बखान किया। जबकि पुनीत के पिता एक औसत दर्जे के काश्तकार से ज्यादा कुछ न थे।

    यहां लेखक ने पुनीत की पत्नी की मनोभावनाओ को ज्यादा विस्तार नहीं दिया है जबकि यहां रोचकता और एक ठेठ देहात को दर्शाने का यहां काफी स्पेस बनता था। उसके मायके वालो के उदारता के सिलसिले में एक दो उदाहरण बताते समय बाकी शिक्षकों की पत्नियां  जमींदारी की बात से जिस प्रकार रिएक्ट करतीं वह भी अपने आप दिलचस्प  होता। यहां लेखक ने इस मामले में थोडी कंजूसी बरती है यह स्पष्ट दिखता है।

      इस बीच कॉलेज पॉलिटिक्स जोरों पर चलती है। शिक्षकों की बातचीत इस ओर ज्यादा रहती कि किस बात से निदेशक महोदय के करीब होने का एहसास हो, उन्हें खुश कैसे किया जाय। वर्तमान निदेशक से पहले जो निदेशक थे वह अब मंत्री बन गए थे। उधर गर्मी की छुट्टी बिता कर पुनीत जब दो महीने बाद संस्थान वापस आता है तो उसे एक चपरासी लिफाफा थमाता है जिसमें कि लिखा गया है कि उसका कार्य ठीक नहीं है और उसका प्रोबेशन पिरियड एक साल और बढ़ाया जा रहा है। पढ़ते ही सन्न। क्योंकि छुट्टी के पहले ही निदेशक महोदय ने कहा  था कि उसकी नियुक्ति पक्की समझे। उसके कार्य में कोई त्रुटि नहीं है। अब यह सब पढ़ वह निदेशक महोदय के कमरे मे गया तो वह कोई  रजिस्टर पढने में मशगूल थे। पूछने पर खिंसे निपोर कर कहने लगे कि यह तो केवल कागजी फारमेलिटी है बाकि अगर कुछ हो होवा गया तो वह तो हैं ही यहां पर संभाल लेंगे।

       अब पुनीत एक दूसरे शिक्षक के साथ संस्थान के एक बोर्ड मेंबर से जाकर मिलता है। वहां जाकर पता चलता है कि उसकी नियुक्ति तो स्थाई की जा चुकी है और प्रोबेशन जैसी कोई बात नहीं है। इधर बोर्ड मेंबर खुद इसमें हस्तक्षेप करते हैं और पुनीत को कन्फर्म होने का लेटर मिलता है। निदेशक और पुनीत के बीच अब शीत युद्ध शुरू हो गया। जहां सभी चा़टूकार शिक्षक रोज शाम कैंपस में निदेशक के आसपास कुर्सी डालकर बाहर बैठे रहते वहीं पुनीत अपने क्वार्टर में अपनी कहांनिया लिखता नाटक लिखता। यहां विशेष बात यह भी है कि पुनीत को अपनी इस विधा के बारे में साथी शिक्षकों को बताते हुए संकोच होता है क्योंकि ऐसा ही कोई और भी लिखता पढ़ता था और उसका नाम कथागुरू रख दिया गया ।
  
      समय बीतता गया और उधर पुनीत ने आसपास के छत्तीसगढी समाज के बारे में गहरी दिलचस्पी लेना शुरू किया। वहां की आदतें, वहां के लोक व्यवहार, वहां के रीति रिवाज। यहां से उसे अपनी कहांनियों के लिए ढेर सारी सामग्री मिल जाती थी।

     अब यहां पुन्नी सिंह ने अपनी लेखनी का असल जादू दिखाना शुरू किया। ग्राम्य इलाके का सजीव वर्णन । अक्सर बारिश होने और उससे उपजी उमस और गर्मी का सशक्त चित्रण, धान के खेतों के बीच से गुजरते हुए आसपास के घरों और लिपे पुते द्वारों का बखूबी  
रेखांकन किया है लेखक ने।

     अपने स्टूडेंट्स के गाँव घरों तक भी पुनीत का आना जाना होने लगा। उनके दुख सुख से वह धीरे धीरे गहराई तक परिचित होता गया। इसी बीच एक कैंप लगा और उसी सिलसिले में उसे जंगली इलाकों में जाकर लोगों से संपर्क करने का मौका मिला। इसी सब के दौरान एक स्टूडेंट मिला जो कि अपनी सिलाई की दुकान का उद्घाटन पुनीत से करवाना चाहता था। पुनीत तैयार भी हुआ और बातचीत में पता चला कि यह दरअसल एक किस्म की बैंक और सरकार से रूपए झटकने का जरिया है। सिलाई काम के नाम पर फोटो आदि खिंचवा कर बैंक आदि मे लोग इसी तरह पैसे लेते हैं और उससे अपना काम निकालते हैं। लोभी बैंक वाले भी खुश, सरकारी अधिकारी भी खुश कि विकास हो रहा है और जो पैसे ऐठ रहा मूल निवासी है वह भी खुश  कि चलो पैसा तो मिल रहा है।

       उधर सरकारी अधिकारीयों, पुलिस वालों द्वारा बैगा जनजाति के एक शख्स की पिटाई की जाती है यह कहकर कि उसके द्वारा जो लकडी, पत्ते वगैरह तोडे जा रहे हैं, इकट्ठे किये जा रहे हैं वह जंगल का विनाश कर रहे हैं। इस दृश्य को पुनीत को छुप कर देखना पड़ता है क्योंकि उसके साथ चल रहा स्थानीय निवासी जो मार्गदर्शक का काम कर रहा है, किसी मुसीबत में नहीं पडना चाहता।

      यहां लेखक की तारीफ करनी होगी कि कई चीजें जो उपरी तौर पर नहीं दिखती उन्हें लेखक ने छू दिया है। बैगा जनजाति के लोगों और दूसरे लोगों के बीच पनपे वैर हो या सरकारी अधिकारीयों की हिकारत भरी नजरें…….. नक्सलवाद का बीज ऐसी  ही किसी प्रक्रिया से अंकुरित हुआ होगा।         

      पुनीत जंगल में घूमते हुए कई चीजों से रूबरू होता है। एक झोपडे में जाने पर बहुत स्वागत सत्कार मिलता है, भूख मिटती है, आदिवासी की आँखो में खुशी और स्नेह का भाव मिलता है । ऐसे ही कई अनुभवों को लेते हुए पुनीत के मन में भाव आता है कि इतनी लहलह धान की फसल यहां होती है, धान का कटोरा कहा जाता है यह फिर भी लोग भूखे क्यों रहते हैं……ऐसे ही तमाम प्रश्नों के बीच कहानी आगे बढ़ती है।

     इधर संस्थान को सरकारी स्वामित्व में लेने की कोशिशें चल रही होती हैं। दुर्गम राजनीति का एक अलहदा किस्म का  जीता जागता उदाहरण। दरअसल इस संस्थान के पूर्व निदेशक जो कि अब मंत्री बन जाते हैं चाहते हैं कि अब भी संस्थान की नकेल उनके हाथ में रहे। और उसी को लेकर राजनीति खेली जाती है। वर्तमान निदेशक के चाटुकार अब निदेशक से दूर होने लगते हैं और सरकारीकरण का पक्ष लेने लगते हैं। एक झटके में निदेशक अकेले पड जाते हैं।

       लोग अपने अपने नफा नुकसान के बारे में सोचने लगते हैं। सब के मन में यह भाव आता है कि एक बार सरकारी स्वामित्व में आ जाने पर सभी लोग खुद ब खुद सरकारी कर्मचारी हो जाएंगे।  नौकरी की चिंता खतम। पेंशन मिले सो अलग।  कुछ लोग यह सोचने लगते हैं कि एक बार सरकारी घोषित होते ही अपने ही जिले में कहीं ट्रांसफर ले लेंगे।  पुनीत भी इसी उधेड बून में रहता है। लेकिन उसकी चिंता अलग किस्म की रहती है। रहते रहते पुनीत लेखक संघों का अध्यक्ष बन गया होता है और उसके द्वारा लिखे नाटक लोगों के बीच जनजागृति का एक अहम हिस्सा बनते जा रहे होते हैं। उसी में कई लेख जो मुर्गीवाला आदि बहुत चर्चित हो उठते हैं और पुनित धीरे धीरे एक इलाके का जाना माना नाम हो जाता है। लोगों से उसकी घनिष्ठता बढ़ती जाती है। अक्सर वह  गांवो की ओर जाकर कई कई दिन बिता चुका है और लोगों से उसकी गहरी छनती है।

      इस सब को एकाएक छोडकर जाना कुछ अजीब सा लगता है उसे। इधर संस्थान के वर्तमान निदेशक द्वारा टालमटोल किया जाता है हस्तांतरण में और उधर राजनीति का पांसा ऐसा फेंका जाता है कि निदेशक महोदय का ट्रांसफर बस्तर कर दिया जाता है जहां पर कि अच्छे अच्छों के तेवर ढीले पड जाते हैं।

     यहां लेखक ने कैंपस राजनीति को लगता है गहरे से देखा है और उसी कारण इस मुद्दे को करीने से हर एक स्टेप के बाद समझाते और बताते चले गए है।

     अब हालत यह है कि सरकारी घोषित होते ही सभी वर्तमान कर्मचारी तो सरकारी मान लिए जाते हैं लेकिन कुछ ऐसे भी थे जोकि न्यूनतम मान्य योग्यताओ को पूरा नहीं करते थे, बस केवल जैसे तैसे रख लिए गए थे। अब सरकार उन्हें कर्मचारी मानने से इनकार कर रही थी। इन्हीं में से एक होते है संस्कृत पढ़ाने वाले   रामनिहोरन शास्त्री। बी ए को संस्कृत पढ़ाते थे लेकिन उनका चुनाव बड़े अजीब ढंग से हुआ था।

    दरअसल रामनिहोरन शास्त्री अपना देश छोडकर इस शहर में आ गए थे और किसी होटल में रोटी बनाने का काम मिला था। तब उन्हें संस्कृत पढ़ने और शास्त्रार्थ करने का बड़ा शौक था। इसी कारण वह कुछ कुछ विद्वान माने जाते थे। एक दिन किसी गाहक ने तरस खाकर उन्हें एक टुटपुंजिया मंदिर में पुजारी का काम दिला दिया। किसा तरह दिन चल रहे थे।

   अब हुआ यह कि एक दिन मंदिर के पिछवाडे मोरी में एक गंदी सी लंगोटी बांधे और उपर से एक फटा लाल रंग का अंगोछा लपेटे बर्तन माज रहे थे। काली तली वाली बटलोई के तले को पत्थर से रगड रहे थे कि तभी एक चपरासी सामने आ खड़ा हुआ। तब संस्थान नया नया था। चपरासी को देख बटलोई पर पत्थर रगड़ना भूल गए।

   चपरासी पहले तो उनकी हालत देखकर सकुचा गया और बाद में बोला – महाराज, कॉलेज में नौकरी करने का मन है क्या ? जो मन हो तो फौरन हमारे साथ चलो। वहाँ हाई स्कूल में साहब बैठे हैं। संस्कृत वाले कौनो आचार्य की तलाश है।

   उसने कहा तो फौरन हाथ धोकर उठ खडे हुए और बोले – चलो भाई, लगता है भोले बाबा ने सुन ली।

     जब वह उसके साथ चलने को तैयार हुए तो चपरासी का ध्यान एक साथ उनकी कई बातों पर गया। उसने देखा कि उनकी कमर पर लपेटा अंगोछा बहुत मुश्किल से उनके गंदे लंगोट को ढँक पा रहा है, उनका जनेऊ और भी मैला था जिसमें किसी टुटपुंजिया ताले की चाबी लटक रही थी…..मैल से पैर भी कुछ ज्यादा ही काले पड़ गए थे। वे लगभग नग्न अवस्था में संस्थान में प्राध्यापक पद की नौकरी के लिए लुभियाते हुए से आगे बढ़े जा रहे थे और देख देख कर चपरासी को हंसी आ रही थी। एक बार तो उसके मन में आया कि उन्हें ऐसी हालत में लेकर वहां न जाए क्या पता साहब बिगड़ जांय।

वे इस संस्थान के बिल्कुल प्रारंभिक दिन थे।

     उस हालत में साहब ने जब उन्हें देखा तो पहले उनकी त्यौरियां चढ़ गईं। और फिर कुछ सोचकर हंसने लगे।
 कहो, कहाँ के रहने वाले हो ? सकुचाओ मत, हम सब समझते हैं। अपने देश से जो इधर आता है उसकी यही हालत रहती है।

रामनिहोरन शास्त्री ने खींसे निपोर दीं।

 कोयों पर पान की पीक टपकने को हुई, इसलिए उँगलियों पर लेकर कमर में लिपटे अंगोछे से पौंछ ली। वे कुछ कहना चाहते थे लेकिन कह न पाए।

बी ए में संसकृत पढ़ानी पड़ेगी महाराज।

हाँ साहब पढ़ा लूँगा।

तो फिर जाओ, आज से तुम इस संस्थान के संस्कृत विभाग के सर्वे-सर्वा हुए। परंतु एक बात याद रहे, कल से जब घर से बाहर निकलो तो धुले हुए धोती-कुर्ता और पैर में जूता जरूर होना चाहिए…..और यह जनेऊ भी बदल लेना। ………पढ़ाई लिखाई से संबंधित जो भी प्रमाण पत्र हों उन्हें जमा कराना। वे नहीं हों तो भी चलेगा……..

  उस समय तो सब कुछ चल गया लेकिन अब आकर खाँचे में गाड़ी का पहिया अटक गया है।

 शासन से जो स्वीकृत होकर स्टाफ की सूची आई है उसमें रामनिहोरन शास्त्री का नाम नहीं है और अब वह हाथ पैर मार रहे हैं।

     इसी तरह के कई संस्थानिक बातों को लेखक ने बखूबी शब्दों के जरिए उकेरा है।  एक बात और नजर आती है कि कैंपस की हर एक चीज को अपना मान कर पहले उसका ख्याल रखने वाले रहिवासी लोग अब कैंपस की हर चीज से उतना जुडाव नहीं महसूस करते। अब वह चीज सरकारी हो गई है और आसपास के चरवाहे बेधड़क कैपस में घुस आते हैं, कोई रोकने वाला नहीं। चपरासी जो पहले चौबीसों घंटे अनकहे ही खुद ब खुद संस्थान की ओर देख रेख कर लेता था वह अब अपने घड़ी के हिसाब से काम करता है।  कहीं कोई ईंट गायब हो रही है तो कहीं कुछ। पता चल रहा था कि वाकई सरकारी संस्थान बन चुका है यह कैंपस।

     धीरे धीरे इस संस्थान के और आसपास के माहौल में आए बदलाव और प्रवाह के बीच पुनीत ट्रांसफर ले लेता है और उसका फैसला काफी उहापोह के बीच होता है। यहां लेखक ने पुनीत की मनोस्थिति और उसके आसपास के गाँवों से लगाव आदि को बखूबी  उकेरा है।

    जिस दिन पुनीत रेल्वे स्टेशन पर गाड़ी पकड़ कर रवाना होने को है उस दिन उसे विदाई देने आने वाले लोगों से पूरा स्टेशन भर गया। गाँव वाले भी हैं, संस्थान के कर्मचारी भी हैं और कुछ देखे अनदेखे चेहरे भी है। इतने लोग उसे चाहते हैं, जानते हैं……. इसकी उम्मीद पुनीत को नहीं थी।

 उसी बीच उसे छत्तीसगढ़ी गीत का वह मुखडा़ सुनाई पड़ता है कि -

 तोर रूप गजब……मोला मोह डारे…….

 छत्तीसगढ़ की धानी चादर, उसके जंगल,  विरोध के स्वर, सार्वजनिक जीवन में हो रहे तमाम सांस्थानिक कवायदें, अधिग्रहण की राजनीति और उससे उपजे तमाम प्रश्नों की ओर एक विहंगम दृष्टि है पुन्नी सिंह रचित 'तोर रूप गजब'।


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- सतीश पंचम
  
तोर रूप गजब
लेखक - पुन्नी सिंह
प्रकाशक - नेशनल पब्लिशिंग हाउस
337, चौड़ा रास्ता, जयपुर - 302 003
फोन - 0141-2575258, 2577548

प्रधान कार्यालय
23, दरियागंज, नई दिल्ली - 110002
फोन - 011-23274161,23275267

मूल्य : 300 /-

( सभी चित्र इंटरनेट से साभार)

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Saturday, May 22, 2010

देख रहे हो लॉर्ड कर्जन......तुम्हारी बात सच हो रही है....सतीश पंचम


देख रहे हो लॉर्ड कर्जन
कभी तुमने कहा था
ठीक धरती की तरह
मंथर गति से हौले-हौले
भारत में फाईलें घूमती हैं
इस टेबल से उस टेबल  
उस टेबल से इस टेबल 

वो देखो अफजल की फाईल
वह भी घूम रही है
राज्य और केन्द्र के बीच
केन्द्र और राज्य के बीच
ठीक बनारसी सांड की तरह

जब चाहे तब कहीं खडे हो जाय
जब चाहे तब कहीं बैठ जाय
और नहीं कुछ करे तो भी
विदेशीयों के कैमरों से
अपनी तस्वीर तो खिचवा ही ले
बैठे बैठे, उठे उठे, या फिर
सड़क पर घूमते हुए ही

अपने यहां वापस जाकर
विदेशी चहक कर बताते हैं
सांड़….द इंडियन बुल

इधर एक चलन और हुआ है
बुल फाईल को दबाने वाले
दिमागी तौर पर ही सही
खुद को भी बुल मान बैठे हैं

तभी तो

एक फाईल सरकाता है
दूसरा उसकी सरकन नापता है
और तीसरा आगे बढ़ कर
बुल को वापस बुलाता है

एक बुल दूसरे बुल पर  फिदा है
दूसरा बुल तीसरे पर फिदा है
बुल और बुलों की ये जुगलबंदी
अब परवान चढ़ रही है कर्जन

सुना है जमाना तीन सौ सतहत्तर का है ।


( लॉर्ड कर्जन ने कभी कहा था कि भारत में सरकारी फाईलें मंथर गति से धरती की तरह गोल गोल घूमती हुई, धीरे धीरे सरकती हुई चलती हैं। वह वस्तुस्थिति आज भी बनी हुई है जिसके कि हम सभी लोग आदि बन चुके हैं। यह कविता उसी बात को इंगित करते हुए लिखा है जिसमें कि अंत में समलैंगिकता कानून यानि कि आर्टिकल 377 का बंद अंत में लगाया है :)


- सतीश पंचम


स्थान - वही, जहां एक कैदी पर रोजाना लाखों रुपए खर्च हो रहे हैं।


समय - वही, जब  कसाब जेल में बैठे बैठे सोच रहा हो  - काश रस्सी बाजार में आग लग जाय...........हम बच जाएंगे............फांसी की रस्सी जलने की वजह जानने के लिए एक नई फाईल बनेगी......द रोप फाईल.......अटेस्टेड बाय कर्जन। 


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अपडेट : पुन्नी सिंह रचित 'तोर रूप गजब' की कहानी वहां तक  पढ़ चुका हूँ जहां तक कि  नया नया ज्वाईन हुआ शिक्षक पुनीत तमाम कालेज पॉलिटिक्स के बीच अपनी पत्नी और बच्चों को साथ लेकर रहने के लिए कैपस निवास में आ गया है और उसकी देहात में पली पढी पत्नी बाकी शिक्षकों की पत्नियों की बातें  सुन कर  खुद को कुछ हीन भावना ग्रसित पाती है कि वह लोग बहुत बडे लोग हैं उनसे मेरा क्या मुकाबला आदि...आदि।


  तो मित्रों, जैसे ही किताब खत्म होगी.....उसकी समीक्षा, विवेचना के साथ यहां फिर तैयार मिलूँगा।
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(सभी चित्र इंटरनेट से साभार )

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Thursday, May 20, 2010

किताबे पढ रहा हूँ ....फिलहाल ब्लॉगजगत ठेलायमान है.....सतीश पंचम

  किताबों पर वक्त लगा  रहा हूँ....फिलहाल तो मुझपर पुन्नी सिंह रचित 'तोर रूप गजब'  किताब अपने जलवे बिखेर रही है ....एक सूकून मिलता है ऐसी किताबों को पढने से।

      छत्तीसगढ की पृष्ठभूमि पर एक कस्बाई  कॉलेज में नए नए ज्वाईन हुए एक शिक्षक की बातों को, उसके अनुभवों को पढ़ते हुए मन हिलोर हो उठता है। एक जगह हास्य बिखेरते लिखा है कि फलां शिक्षक चलते तो अकड कर हैं लेकिन संस्थान निदेशक से दोनों हाथ जोड कर प्रणाम करते हैं, दूसरे शिक्षक एक हाथ से सलामी भर  करते हैं और तीसरे तो बस मुस्करा कर निकल जाते हैं...न सलाम न दुआ....। पहले वाले A ग्रेड के, दूसरे बी ग्रेड के और तीसरे सी ग्रेड के :)

 ऐसी ही ढेरों रोचक और मजेदार बातों से लबरेज एक सहज कथा है 'तोर रूप गजब'।  अभी  कुछ समय तक अपना टेम पास ऐसे ही करने का इरादा है।

      बेसिर पैर कि एक दूसरे पर बेमतलब आक्षेप लगाती पोस्टे, कानूनी नोटिस थमाती पोस्टें, जलजला, पिलपिला, ढपोर, चपोर, हल्ला गुल्ला टाईप तमाम पोस्टों की झडी पढने से बेहतर है कुछ समय तक किताबों को पढ़ा जाय।

फिलहाल ब्लॉगिंग करते हुए बहुत कुछ चुनना पडता है कि इसे पढूं या नहीं, पता नहीं क्या आंय बांय लिखा होगा बंदे ने।  और एक ही नहीं झडी की झडी चलती है ऐसे पोस्टों की।

      अभी एक मजेदार बात अदालत ब्लॉग की  पोस्ट पर पढा कि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश ने किसी बहस के दौरान कहा यदि आप अपने पूरे दिन को तरोताजा रखना चाहते हैं तो सुबह तडके कम से कम दो घंटे तक अखबार न पढ़ें।


 इस पर गिरिजेश जी ने  मजेदार टिप्पणी लिखी कि - कुछ दिनों में ब्लॉगों का भी यही हाल होने वाला है। 


   तो बंधुवर, अब अपन भी ब्लॉगिंग से  साईलेंट मोड पर चलने का मन बना रहे हैं। थोडा थोडा पढना....ज्यादा नहीं ( वैसे भी कौन सा ज्यादा पढ रहा था, शीर्षक देख कर..... कैचे पढकर ही कई जगह से खिसक लेता था :) 


 फिलहाल तो थोडे दिन तक छत्तीसगढी़ गीत की तर्ज पर साहित्य के बारे में यही कहूँगा कि .......तोर रूप गजब...मोला मोह डारे  :) 

 - सतीश पंचम

स्थान - वही, जहां से टोला, चेहरे दर चेहरे, तोर रूप गजब, सलामी जैसी किताबें बटोर लाया हूँ।

समय - यही कोई सात-ओत बजे होंगे :)

 सूचना :  लगता है ब्लॉगर पर कोई समस्या चल रही है, कमेंट पब्लिश करने में काफी समय ले रहा है या कमेंट दिखाता भी है तो रूक रूक कर। उधर कमेंट करने के तुरंत बाद  जीमेल पर कमेंट  आ तो रहा है पर ब्लॉग पर दिखने में समय ले रहा है......यानि ब्लॉगस्पॉट कहीं सचमुच ठेलायमान तो नहीं हो चला :)

 ( चित्र :  इंटरनेट से साभार )

Sunday, May 16, 2010

डिस्कवरी के Man v/s Wild कार्यक्रम से कई बातें सीखी जा सकती हैं....जरा ध्यान से देखें अबकी बार.....सतीश पंचम

      टीवी पर तमाम बेतुके, गैर जरूरी और नासमझी भरे तमाम कार्यक्रमों के बीच ही डिस्कवरी चैनल पर एक बहुत ही रोचक और एडवेंचर से लबरेज, इंसानी जज्बे को दिखाता  एक कार्यक्रम आता है Man v/s Wild. ( इसे Born Survivor: Bear Grylls  or Ultimate Survival के नाम से भी जाना जाता है)   उसके किरदार हैं Bear Grylls.  कभी वह रेगिस्तान में दिखते हैं, कभी बर्फ के पहाड़ चढ़ते दिखते हैं तो कभी किसी घने जंगल में किसी जानवर का शिकार कर रहे होते हैं। इतना ही नहीं, जरूरत पडने पर जंगली झाडी और पेड की छाल का काढ़ा बनाकर भी पी लेते हैं।

       टीवी की तमाम उटपटांग हरकतों के बीच यह कार्यक्रम मेरा सबसे पसंदीदा कार्यक्रम है। इसकी वजह भी है। इस कार्यक्रम की वजह से मुझे कुछ अप्रत्यक्ष फायदे भी हुए हैं। जी हाँ फायदे।  अब आप कहेंगे कि आज के जमाने में टीवी को देख कोई फायदा कैसे ले सकता है ?  और वह भी जंगल झाडी, बर्फ, रेत, सांप, कच्चा मांस आदि देखकर  फायदा  ? और इन बातों का हमारे रोजमर्रा की बातों से क्या सरोकार....  इधर किसी को घर से आफिस, आफिस से घर इतने में ही फुरसत नहीं मिल पाती तो भला कोई क्योकर जायगा ऐसे जंगलों में, ऐसी जगहों पर ?  और क्योंकर देखेगा इस तरह के जंगल झाडियों वाले प्रोग्राम ? 
  
        बात आपकी वाजिब हो सकती है कि ऐसे कार्यक्रम भला कोई क्योंकर देखे जिसका रोजमर्रा की जिंदगी से कोई वास्ता न हो, कोई सरोकार न हो।  लेकिन यहां मेरा मानना है कि जरूरी नहीं कि हमारा वास्ता जीवन  में जंगल झाडियों से ही पड़े, यह भी जरूरी नहीं कि हमे इस हद तक भुखमरी घेर ले कि जंगलों में चूहे, खरगोश, साँप आदि मारकर खाया जाय।  लेकिन इतना जरूर है कि हमें हर रोज बढ़ते तनाव, बढ़ती भाग दौड और तमाम प्रतिस्पर्धा के चलते ऐसे वाकयों से दो चार होना पड़ता है जब बहुत हिम्मत की जरूरत पड़ती है, हौसला बनाए रखना पडता है, किसी प्रिय का निधन, किसी की बीमारी, किसी के कहे दुर्वचन और ऐसी तमाम बातें जो हमारे हौसलों को तोड़ती जान पड़ती हैं वह किसी भी हालत में Bear Grylls के जंगल के हालात से कम नहीं हैं। 

            वहां भी इंसानी हौंसलों को तोड़ती उमस रहती है, गर्मी रहती है, बियांबान भांय भांय करता माहौल रहता है, सांप, बिच्छू..... विभिन्न प्रकार के जीव जंतु रहते हैं जो हर ओर से अच्छे भले इंसान को पागल कर दे। अमूमन यही हाल आफिस गोअर की भी रहती है, समय पर काम पूरा करना है,  बॉस की झिडकी है, मेल है, काँट्रैक्ट है, टेंडर है, पास न हुआ तो क्या होगा, रिसेशन है, नौकरी है तमाम खर्चे हैं, समय पर यह सब न हुआ तो क्या होगा....। 
  
   औऱ ऐसे में ही Bear Grylls अपनी जीवटता का परिचय देते हैं। वह बिना अपना हौसला खोए कुछ न कुछ उपाय करते नजर आते हैं ताकि जहां वह फंसे हैं वहां से निकल सकें।  कभी वह भूख से बचने के लिए  सांप खाते हैं, कभी जंगली झाडियां, कभी पहाड पर चढते हैं तो कभी बरफीली नदी पार करते हैं।  वह अपना हौसला नहीं खोते। कैमरा क्रू के साथ वह जंगल में अपने सीमित साधनों से वहां से सकुशल निकलने के लिए भिड़े रहते हैं। उनके पास भी आफिस गोअर की तरह वक्त की पाबंदी होती है....शाम होने से पहले निकल जाना है.....न निकल पाए तो जंगल में ही रात बिताने का उपाय करना है....जंगली जानवरों से बचाव करना है वही जंगली जानवर जो भेस बदल कर शहरों में तमाम हौसलों को पस्त करने में लगे रहते हैं कभी रिसेशन के रूप में, कभी कम्पटीशन के रूप में तो कभी बेतहाशा आगे बने रहने की अबूझी दौड के रूप में। 

 कई बार Bear Grylls को गलीज से गलीज चीज खाते देखा है, कभी वह याक की आँख निकालकर खा रहे हैं , कभी किसी जानवर के अंडकोष, तो कभी किसी कीडे को सीधे ही निगल रहे हैं। हमारे रोजमर्रा के जीवन में भी कभी न कभी किसी न किसी रूप में गलीज से गलीज इंसानों से पाला पडता होगा....जानते हैं कि यह इंसान बहूत बेहूदा है...बहुत ही गंदा है लेकिन चूँकि हमें किसी तरह सर्वाईव करना है, सो हम उसको Bear Grylls की तरह झेल जाते हैं। यदि न झेलें तो कभी वह आफिस में हमारे खिलाफ कुछ गलत सलत बातें फैला देगा या फिर पारिवारिक जीवन दुश्वार कर देगा या ऐसा ही कुछ अनाप शनाप कर देगा। ऐसे में जरूरत होती है ऐसे गलीज चीजों से बिना डरे हुए उनका अपने लिए इस्तेमाल करने की।  ठंड औऱ भूख से बचना है इसलिए याक मारकर खा सकते हैं, उसके अंग अंग का इस्तेमाल अपने जीवित रहने के लिए कर सकते हैं, यदि जिवित बच गए तो वही गलीज चीज हमारे लिए अमृत के समान है...इसलिए हर एक चीज का सही समय पर उपयोग करने का संदेश यह कार्यक्रम देता है।  

 यहां मैंने देखा कि रेगिस्तान में दिन में जहां पारा पचास तक पहुंच जाता है. उमस और बेबसी की इंतहा होती है, ऐसे में Bear Grylls एक उंट मार देते हैं। उसके मांस को कच्चा खाते हैं, उसके भीतर के पानी को अपने पीने के लिए इस्तेमाल करते हैं और जब शाम हो जाती है , रात हो जाती है...ठंड कंपकपा देती है तो उसी मरे हुए उंट के पेट में जा सोते हैं मांस, मज्जा और अंतडियों के बीच। लेकिन वह ठंड से बच जाते हैं और अगले दिन फिर अपनी यात्रा पर चल पडते हैं। हममे से कितने लोग हैं जो ऐसी विपरीत परिस्थितियों से दो चार होते हैं ?  लेकिन यहा Bear Grylls का काम देखिए। उनकी नौकरी को देखिए। वह भी हम और आप जैसों की तरह ही एक इंसान हैं। उन्हें भी अपने घर को चलाने के लिए यह सब शो आदि करना पडता है। उन्हें भी परिवार की जटिलताओं को सुलझाना पडता है और ऐसे में हमारी और आपकी यह शिकायत कि हमें अपनी नौकरी मे बहुत काम करना होता है, श्रम का उचित मूल्य नहीं मिलता, काम का माहौल सही नहीं है वगैरह वगैरह....यह सब बातें धरी की धरी रह जाती हैं। 
  
  उनसे मुझे प्रेरणा मिलती है कि गलीज से गलीज इंसान के साथ काम करते हुए, उसका सामना करते हुए जरा भी नहीं घबराना चाहिए और न तो अपना हौंसला खोना चाहिए । संक्षेप में कहूं तो मुझे अप्रत्यक्ष रूप से कुछ  फायदे भी हए हैं इस कार्यक्रम को देख कर - 

1- जहाँ तक मैं महसूस कर सकता हूँ कि अपने काम के प्रति उपेक्षा या हीनभावना अब नहीं रखता, या कम रखता हूँ। जब भी हीन भावना आने लगती है तो Bear Grylls को याद करता हूँ कि उनके काम से तो अच्छा ही है जहां जंगल-जंगल, तूफान, गर्मी, बर्फ और रेगिस्तान के बीच चलना पडता है। सांप, बिच्छू खाना पड़ता है। 

2- दूसरी ओर यह लगता है कि किसी विपरीत परिस्थिति के आने पर मैं शायद अपना हौसला पहले की अपेक्षा अब शायद कुछ ज्यादा देर तक बनाए रख सकता  हूँ।  उमस, गर्मी, ठंडी, बारिश आदि के बीच जिस तरह Bear Grylls अपना हौसला बनाए रख जंगल से बाहर निकलने की जुगत में लगे रहते हैं वह  काबिले तारीफ है।

 हांलाकि Bear Grylls के साथ जंगल में उनका कैमरा क्रू होता है लेकिन जहां नदी, पर्वत या बर्फीली झील में कूदना होता है तो खुद Bear Grylls को ही कूदना होता है, कैमरा क्रू केवल संबल प्रदान कर सकता है, एक आश्वस्ति दे सकता है कि हां हम भी है यहां....ठीक हमारे अपनी सोसाईटी, समाज की तरह की आप जूझो...हम तो हैं न यहां :) 


3- एक अलग किस्म का फायदा यह हुआ है कि अब मैं सब्जी लेते समय दो दिन पुरानी गोभी और पिचके टमाटर देख आगे नहीं बढ़ जाता। अब मन में यह भाव आता है कि अरे इतना तो चलता है :) 

4- एक सबसे अलहदा फायदा मेरी श्रीमती जी को भी हुआ होगा कि शायद अब मेरी ओऱ से भोजन में नमक कम या ज्यादा होने जैसी शिकायतें कम से कम होती गई होगी :) 

 - सतीश पंचम

स्थान - वही, जहां कंक्रीट का एक जंगल है और मैं उसमें रहता हूँ। 

समय - वही, जब टीवी पर Bear Grylls किसी जानवर को मारकर खा रहे हों और भूख से परेशान कैमरा क्रू का कोई मेंबर कहे कि भाई साहब - थोडा मुझे भी....... ऑफ दी ट्रैक .......। 

 ( चित्र : साभार  Bear Grylls की साईट से ) 

Saturday, May 15, 2010

गाँव में छत पर सोना...पुरूआ बयार....टूटता तारा....छूटता लुक्क....चंदा मामा... आरे पारे......ग्राम्य सीरिज....और मैं सतीश पंचम

  गाँव में खुले छत पर सोने का आनंद ही कुछ और होता है। आप छत पर पडे पडे आकाश में लटके सितारों को देख रहे हैं…..चाँद दिख रहा है….उसमें किसी का चेहरा ढूँढा जा रहा है….बचपन की लोरी याद आ रही है…चंदा मामा आरे आवा…पारे आवा…नदिया किनारे आवा…दूध भात लेहले आवा…घुटूँ….. और तभी ठंडी ठंडी हवा चल पड़ी ….…नजरें अब भी खुले आकाश की तरफ ….कोई लुक्क छूटा….तारा टूटा….…….इसी वक्त कुछ मांगना चाहिए…..…सुना है टूटते तारे को देख कुछ मांगने से वह पूरी हो जाती है…..मेरे लुक्क( टूटते तारों ने)…आज तक मेरी इच्छाएं पूरी नहीं की हैं…..हो सकता है मेरे अलावा और कोई भी अपनी छत पर सोता है….उसी ने मांग ली होगी  मुरादें…….मेरा टूटता तारा फिर मन मसोस कर रह जाता होगा……

         वो देखो, कोई छोटा सा जहाज जा रहा है….बत्ती जल बुझ रही है….……और वो सात तारों का तो जैसे हमेशा का नखरा है…..हमेशा एक ही पोसिशन लिए रहेंगे…..कभी इस ओर ….कभी उस ओर….लेकिन रहेंगे उतनी ही फिक्स दूरी पर……इसी चाँद को मुंबई में भी देखता हूँ…..बिचारे की चमक खो जाती है वहां…..जलती बुझती बत्तियों के बीच कोई देखने वाला नहीं रहता उसे…..फुरसत किसे है……पिछली बार चाँद को तब देखा था जब ग्रिड में खराबी के चलते पूरी मुंबई का बड़ा इलाका अँधेरे में डूबा था……आकाश में तब चाँद था और कईयों ने न जाने कितने सालों बाद उस चाँद को देखा …..गैलरी में खड़े हो कई दिनों बाद उस पाकेट रेडियो को चलाया था….एवरेडी पेंसिल सेल रिमोट में से निकाल कर…….पाकेट रेडियो  पर कोई गाना चल रहा था….वो चाँद खिला….तारे हंसे…ये रात बड़ी मतवाली है….बड़ा अच्छा लग रहा था……।  लाईट आई और वही सेल फिर चुप्पे से रेडियो से निकल कर रिमोट में समा गये थे। काश कुछ और देर लाईट न आई होती।
 
      अगले दिन छत पर जब सोकर उठता हूँ तो बड़ी देर तक उठने का मन नहीं करता। बड़ी देर तक बिस्तर में पडे रहता हूँ …..दालान आदि में बटोर बहार कर  कहीं  बाहर सूखी पत्तियां इकट्ठी कर एक जगह करकट आदि जलाया जा रहा है .....   उधर सूरज धीरे धीरे निकलता दिख रहा है…..एक नए दिन की शुरूवात……रात मे चमकने वाला चंदा पीतल की एक थाली सा आसमान में लटक रहा है….मानों कह रहा हो…जा रहा हूँ….बड़े भाई के सामने ज्यादा देर रहने पर वह कोई काम सौंप देंगे…..उधर बडा भाई सूरज भी जैसे जान रहे हों, इसलिए खुद भी धीरे धीरे निकल रहे थे मानों चाँद को संकेत दे रहे हों कि …… चल जा…..अब मैं आ गया हूँ…..दिन भर का काम अब मेरे जिम्मे……जाता क्यों नहीं…….और चाँद….धीरे धीरे आसमान से गायब हो जाता है।

      उधर छत पर आलम यह है कि बिस्तरा वैसे ही छोड कर नीचे उतर आता हूँ…दिन भर मटरगश्ती करता हूँ….आसपास के बच्चों के फोटो खिंचता हूँ….पेड पौधों के चित्र लेता हूँ…..और दोपहर जब बडके भईया यानि सूरज अपना असली रूप दिखाते हैं तब चुपचाप एक पेड की छांह में बैठ आते जाते लोगों को देखता हूँ…..। मडैया में खोंसे हुए किसी किताब को निहारता हूँ।

   शाम जब फिर छत पर पहुँचता हूँ तो देखता हूँ…. ओह…… भूल से बिस्तरा वहीं का वहीं पड़ा रह गया है…..किसी ने उठाया नहीं क्या।

अब….

  बिस्तरा तो गर्म हो गया है……सफेद चादर जो सुबह की हल्की ठंड और सिहरन से बचाती है, वैसे ही पड़ी है जैसे रखी गई थी। चादर हटाता हूँ….अरे यह क्या…..जहा जहां चादर पड़ी थी वहां नीले रंग का निशान बन गया है…….समझा…..दिन भर तेज गर्म हवाओं और लू के थपेडों से सफेद गद्दे के खोल में लगी नील उडन छू हो गई है और जहां जहां चादर ने ढंक रखा था वह हिस्सा उस गर्मी से बचे रहने के कारण अपने हिस्से का नीलापन बचा ले गया।

     दिमाग में तुरंत स्कूली दिनों का पर्णहरिम….फोटोसिन्थेसिस…..क्लोरोफिल वाला साईंस प्रैक्टिकल घूम गया। सूरज की रोशनी से बचाते हुए पत्तियों को ढके रहने पर कुछ समय बाद ढके हिस्से का रंग पत्ती के बाकी अनढके हिस्से से अलग हो जाता है।

      पत्तियां प्रकाश के अभाव में उस जगह भोजन नहीं बना पाती…….और उस जगह का रंग अलग हो जाता है …....पत्ती में जीवन….ओह……...तो मेरे इस बिस्तरे में भी जीवन है…… हाँ तभी तो जहां-जहां चादर से ढका था वहां का रंग बदल गया :) 
  
क्या वाहियात खयाल है…….ये मन भी न जाने क्या क्या सोच लेता है :)









- सतीश पंचम

स्थान – वही, जहां छत पर सोना नहीं हो पाता

समय – वही, जब आसमान में कोई तारा टूटे और तभी जमीं पर खडा कोई बच्चा अपनी मां से कहे  – मम्मी एक झोला दो…..वो तारा यहीं कहीं गिरा होगा….ले आता हूँ।


ग्राम्य सीरिज चालू आहे ......  

  

Wednesday, May 12, 2010

मेरे पिया गये रंगून....लुंगी कौन पहनता है बे......नवाबिन से पूछो.... मूर्ति बनवा दूँ......क्या बकता है ..लछमी दासिन....सतीश पंचम


एक कोलाज :  फिल्म और साहित्य

लोग अब जहर बोते हैं बाबू...... मेरे पिया गये रंगून..... किया है टेलीफून..... तुम्हारी याद .......मोबाईल की अम्मा......अब कौन लुंगी में घूमता है रे.......पैंट पहन कर चलने में नवाबी फटकती है.....चप्पल फटकारते हुए चलोगे.......क्या प्रेमचंद के जूते याद नहीं.....फोटू भी खिचवा रहे थे तो फटे जूते के साथ......क्या कहा जाय.....लेखक लोग होते ही ऐसे हैं.......बताओ भला.....एक टेंडर की ही तो दरकार थी.....अबे मुर्ती लगवाने में पैसे फूंके जा रहे हैं......इहां तुम को नवाबी झलक रही है......जरा नवबाईन से पूछो कि उनकी भी मुर्ति लगवा दें........मैला आंचल लिए कहां जा रहे हो पंडत........धूसर देहात में पोथी पतरा........लछमी दासिन....तनिक गिनिए तो मठ में आज केतना मुर्ति लोग हैं......सब का भोजन बनवाओ............महंत रामदास के मुंह से लार चूता है......बालदेव जी तो हिंसाबाद से परहेज करते हैं....अपने नाम के साथ डंडा भी नहीं लगाते.....बालदेव जी.......चन्नपट्टी गए थे कि नहीं.......अमानुष बना के रख दिया है......सागर कितना मेरे पास है....फिर भी......ओ बंसी भईया....ही ही..ही...ही....ओ मोरे राजा बड़े जतना से सींचू रे मैं तेरी फुलवारी......आदत से बाज नहीं अईहो.....मेरे हाथ अब कट गये हैं पूनम.....मैं लाचारगी की गहरी खांई में गिर गया हूँ......हो न हो....यह वही है......बहारो फूल बरसाओ मेरा......ठाकुर साहब....आप कभी अपने घर में भी तो झांक कर देखिए.........मेरा नाम अरजुन सिंह वल्द भीम सिंह.....नमक का दारोगा......आ गया दाढ़ीजार......पिया तोसे नैना लागे रे.....लागे रे....आँख के बदले आँख......नजरिया की मारी मरी मैं तो गुईंया.....कोई जरा जाके बैदा बोलाओ...धरे मोरी नारी.......हाय राम....नजरिया की मारी......जितने के गांजी मिंयां नहीं उतने का लहबर.....क्या कहते हो घोष बाबू.....आज कल पान में हरी पत्ती नहीं पड़ती.....हां बाई की उमर भी तो हो गई है....अब हरी पत्ती बाजार में नहीं आती......क्या बकते हो......अपलम......चपलम....चप लाई रे.....मैं पिया की गली छोड़.......पनघट की मारी.......भर भर पिचकारी......रूक जाओ अभिमन्यु.......मैं कहता हूँ.....गोली चला दूंगा......है हासिल उसी को दुनिया जो...........कई रात से जाग रहा हूँ.....अब नहीं जाग सकता.......ढिबरी से कितना हाथ सेंकोगे बाबू......वो देखो कालिख दीवाल पर चढ़ती जा रही है.......मैं हर फिकर को धुएं में उड़ाता चला गया.....उड़ाता चला गया......



- सतीश पंचम

स्थान – वही, जहां साहित्य और फिल्म कभी गलबंहिया डाले घूमते थे।

समय – वही, जब फिल्म का लेखक प्रेमी प्रेमिका के बिछड़ाव का सीन लिख रहा हो और दुख का माहौल बना रहा हो, उसी वक्त फिल्म का डायरेक्टर कहे – सीन मजेदार होना चाहिए ....लड़की ट्रेन में बैठ कर चली जा रही है.....लड़का प्लेटफार्म पर हाथ हिलाता रह जाता है और एक पंजाबी रॉक गाना शुरू होता है....होय होय होय... रोक न पांवा अक्खां विच्चों गम दियां बरसातां नुं.........इश्क तेरा तड़पावे.....होय होय...होय ...इश्क तेरा तडपावे

रोना भी डिस्को की धुन पर.........होय होय

Tuesday, May 11, 2010

गेहूँ की लदवाई....कण्डाल....पर्ची... ग्राम्य सीरिज ......सतीश पंचम

     जिस काम की आदत न हो और वही काम अदबदाकर किया जाय तो  उसका कुछ न कुछ उल्टा असर, हो जाता है।

      ऐसा ही कुछ मेरी इस बार की ग्राम्य यात्रा के दौरान हुआ।...... हुआ यूँ कि घर में गेहूँ के करीब आठ-दस बोरे थे। और भी गेहूँ एक दूसरे खलिहान से आने वाला था दोपहर तक। इससे पहले कि नया गेहूँ आकर जगह छेंके…..पुराने पड़े गेहूँ को लोहे के कंडाल ( बड़े बड़े ड्रम) में पलटना था।

      अब गाँव में ऐसे फुटकर कामों के लिए काम में लिए जाने वाले हलवाहे या मजदूर कम ही मिलते हैं। नरेगा सबको खींच ले गया है। गाँव में बैठे बैठे समय व्यतीत हो रहा था.... सो मैंने सोचा कि क्यों न मैं ही इन गेहूँओं को कंडाल में पलट दूँ। और लग गया इस काम में। एक दो आस पड़ोस के युवा छोकरे जो मेरे भतीजे लगते थे उन्हें पकड़ा। एक साईकिल ली। बोरों में से आधे आध पर एक दूसरे बोरे में हिस्सा किया ताकि गेहूँ ले जाने में आसानी हो…..।

      बड़ी मशक्कत के बाद एक छोटा बोरा साईकिल के कैरियर पर रखा। अम्मा बाबू बिगड़ते रहे कि बिना आदत के मत जुटो। नरा वगैरह उखड़ जाएगा। लेकिन मुझ पर तो जवानी चढ़ी थी।  चल पड़ा बोरे को साईकिल के कैरियर पर रख। कंडाल लगभग पचास साठ मीटर की दूरी पर दूसरे घर में रखा था। इधर कैरियर पर रखे भारी बोझ की वजह से साईकिल कभी-कभार उलट कर खड़ी होने का नाटक करती रही। कभी हैंडिल दाएं घूमता तो कभी बांए……। मदद कर रहे भतीजे के साथ किसी तरह गेहूँ से लदा बोरा कंडाल के पास पहुंचाया।

      अब असली परेशानी शुरू हुई। कंडाल की हाईट मेरे कंधे तक थी और उसमें गेहूँ पलटने का मतलब था कि बोरे को कंधे तक की उंचाई तक उठाना। किसी तरह यह भी किया…… । एक दो बोरे तक तो कंधे की उंचाई  पर बोरा उठाया  ….लेकिन तीसरे चौथे बोरे में हालत खराब हो गई। ज्यों ही बोरे को कंधे तक की उंचाई पर ले जाता दम छूट जाता और बोरा फिर वहीं नीचे। इधर भतीजा हंसता,कि क्या चाचा….यही है बबंई की खवाई……।
  
      खैर, किसी तरह  आगे के सात आठ बोरे तक खींच ले गया। अम्मा अब भी बिगड़ रही थीं कि क्यों बहादुरी दिखा रहा है बिना आदत के।  हर बार आना जाना जोडकर पचास पचास करते सौ मीटर का चक्कर लगता। अब बचे दो बोरे…..लेकिन तब तक कंडाल भर गया था….बचे हुए बोरों को वहीं जमीन पर लिटा….मैं सुस्ताने लगा।

    काफी देर सुस्ताया…..पड़े पड़े नींद भी आ गई। इस बीच मट्ठा आया……पिया गया।

   लेकिन शाम तक मुझ पर इस बहादुरी का असर दिखने लगा। बदन में हरारत सी होने लगी और लगा कि अब बुखार बस चढा ही समझो। इधर अम्मा का बिगड़ना लाजिमी था। बार बार कह रही थी कि मना करने पर भी नहीं माना। अब जा दवाई करवा ।

    अगले दिन चचेरे भाई के साथ डॉक्टर के यहां पहुँचा। वहां का माहौल देखकर थोड़ा बिदका…….ग्लूकोज की बोतल एक मरीज को चढ़ाई जा रही है लेकिन बोतल किसी स्टैंण्ड में न लटकाकर मड़ैया में लगी बांस की कउंच ( शाखा) से फंसा कर लटकाया गया है। एक दो खाली बोतलें, मडैया के थून्ह से सटी लटक रही हैं। पट्टी वगैरह का डिब्बा अधखुला चौकी पर रखा है।

    किसी तरह डॉक्टर से मिलना   हुआ। रोग बताने पर उन्होंने एक पर्ची दवा की बना कर दी। कहा बगल से ले लो। मैंने ध्यान दिया कि पर्ची पर डॉक्टर साहब ने गोल निशान बनाया …… उसके बाद दवाईयों के नाम लिखे। और मरीजों की पर्चियां देखा तो उन पर भी गोल निशान बना कर तब दवाई का नाम लिखा गया। मैं सोच में पड़ गया कि डॉक्टर तो Rx लिख कर किसी दवा का नाम लिखते हैं……कभी अपने यहां कोई शुम काम होने को हो तो हम भी ऊँ या शुभ लाभ लिखकर ही आगे कुछ लिखते हैं। लेकिन यह गोल क्यों लिखा जा रहा है……..मन में सवाल उठा कि पूछूँ लेकिन उस वक्त बीमार होने की वजह से मूड में नहीं था। सो न पूछा।

        बगल की दुकान से पर्चा दिखाकर कुल चालीस रूपए की दवाई ले आया। डॉक्टर को दिखाया…..ठीक है….ऐसे ऐसे खाना…। पैसा देने लगा तो डॉक्टर ने नहीं लिया। कहा कि हो गया।

       तब मुझे लगा कि शायद वह गोल निशान कुछ एक प्रकार का संकेत हो और इस डॉक्टर को बगल की दुकान से कमीशन वगैरह भी शायद मिलता हो। खैर, दवाई ले आया….। खाया और आराम किया।

      थोड़ी देर बाद मन में एक सवाल उठा कि उस गोल निशान का कहीं कोई गूढ़ संकेत तो नहीं ठहरा। मन में फन्नी आईडियास आने लगे।

    उन्हीं में से एक संकेत कह रहा था कि क्या पता डॉक्टर गोल निशान बना कर कह रहा हो कि बच्चू…..ये दुनिया गोल है।

      तुमने मजदूर को पैसे नहीं दिए…..खुद ही काम में जुट गए……लेकिन उसी वजह से बीमार भी पड़े। अब बीमारी से ठीक होने के लिए मेरे पास आए हो। पैसे दे रहे हो….मैं अब वही पैसे अपने घर में काम कर रहे मजदूरों को दूंगा।

     यानि घूम फिर कर पैसा गोल गोल घूमने के बाद फिर मजदूर के ही हाथ पहुँचा।

 दुनिया गोल है यार……..समझा कर.....


   - सतीश पंचम

स्थान – वही, जहां पर गेहूँ पीसने के लिये जंतसार का उपयोग नहीं होता .....

समय – वही, जब यौवन और अल्हड़ता का प्रतीक गुलाब अपने बगल में बैठे श्रम के प्रतीक गेहूँ से कहता.....क्या तुम कभी किसी के जूड़े में सजे हो ?

( पहले वाले चित्र मे लुंगी और टी शर्ट पहन गेहूँ ढोकर ले जा रहा हूँ.....दूसरा और तीसरा चित्र गाँव की निराली प्राकृतिक छटा को दर्शा रहा है जिसे मैंने अपने कैमरे में कैद किया.....और अंतिम चित्र वही पर्ची है जिस पर कि गोल का निशान बना कर दवा लिखी गई थी )

Sunday, May 9, 2010

सतीश पंचम : ये देखिये खुल्ले में नहा रहा हूँ.....हरियाली के बीच....अपन तो बस ऐसे ही हैं....ग्राम्य सीरिज चालू आहे :)



         क्या कभी आपने खुले में नहाया है ? पोखर में, नलकूप पर, बाल्टी लेकर रास्ते में ही, या सींचे जा रहे खेत में  पाईप से.......कभी नहाया हो तो उसका आनंद भी पाए होंगे जरूर।

    यहाँ देखिए मैं गाँव में खुले में नहाने का आनंद उठा रहा हूँ.......धूप खिली है, आसपास हरियाली छाई है, खेतों में भी एक हरितिमा लहक रही है.......एक प्लास्टिक की बाल्टी.....एक लोटा.....लिए मैं जा पहुँचा इस नल पर.......। अभी नहाने जा ही रहा था कि एक बर्फ वाला आ गया। पास में ही एक बच्चा खड़ा था.....बर्फ वाला बुला लिया गया। चलो यार...नहाना अब बाद में होगा....पहले बरफ खाया जाय। कुछ बर्फ लिया गया.....कुछ दिया गया........हंसी ठिठोली.........। बर्फ वाला रूक कर छंहाने लगा।
              नहाने चला तो जिस बच्चे को बर्फ दिलाया उसी ने हैंडपंप से बाल्टी भर दी। लो नहाओ जितना नहाना है। अभी नहाना शुरू ही किया था कि न जाने कहां से और ढेर सारे बच्चे आ गये। बर्फ वाला खड़ा ही था। अब उन्हें भी बर्फ चाहिए। जिस बच्चे ने बर्फ खाते हुए पानी भरा था उसने कहा कि पानी भरो फिर बर्फ मिलेगी।
 फिर क्या था, एक हैंडल और तीन चलवार......बाल्टी का पानी भरा जाने लगा।  बर्फ वाले से कहा, इन्हें बर्फ दे दो.....नहाने के बाद पैसे देता हूँ...तब तक रूको।

बर्फ वाले को भी जैसे कोई जल्दी नहीं।

पहले ये लोग पानी भर के तुम्हें नहला दें, तब  मैं इन लोगों को बर्फ दूंगा....अभी नहीं। ( ऐसे मजाकिया बर्फ वाले शहरों में न मिलेंगे )

 बच्चों ने हैंडपंप और तेज चलाना शुरू किया।  बर्फ वाला मजे ले रहा था इस धींगामुश्ती का।

एक हैंडल,
तीन तीन चलवार.....
खिली खिली धूप में ठंडी ठंडी धार....
उपर से पुरवा  ठंडी बयार.............

यार ये तो कवित्त हो गया  :)

 उधर और भी ढेर सारे बच्चे जमा हो गये........जमा होते गये...........जहां चार पांच बर्फ लिया जाना था.........करीब पंदरह बीस बर्फ लिया गया.... छोटी मोटी बर्फ पार्टी..

 मैं गाँव जाने पर इस तरह के  हल्के फुल्के क्षण मस्त होकर जीता हूँ।

    यहाँ के बाजार में दो रूपये की चार पानी पूरी मिलती है, स्वाद में एकदम मस्त......चाट चटपटी भी सिर्फ तीन रूपये में, इमरती , समोसे भी सस्ते ही......और जब चाय वाले की दुकान पर आप बैठेंगे तो यह मान कर कि यह तो अपनी दुकान है.....


   .....तनिक अमर उजाला बढ़ाओ यार.........क्या लिखा है........प्रधानमंत्री वार्ता के लिए तैयार.......दोनों के बीच उच्च स्तरीय बातचीत.............धन्नो......ओ धन्नो.......अपनी तो जैसे तैसे........चल चमेली बाग में झूला झुलाएंगे..........फिरतू की कुतिया गाभिन है......भैंस का दूध मोटा होता है......बकरी पालने में ज्यादा फायदा होता है.........प्रधानमंत्री से कहो यहां मेरी इस दुकान में आकर बतियाएं....वार्ता सफल होगी

    अब यह सब एन्जॉय करने, अपनों से जुड़ने, अम्मा बाबू से मिलने के लिए गाँव न जाउं तो मुझसे बड़ा बेवकूफ शायद ही हो........


मेरे लिये मेरा गाँव ही कश्मीर है   :) 


   मैं गाँव इसी नॉस्टॉल्जिया को जीने जाता हूँ......आप भी हो आईये..........।


 - सतीश पंचम

स्थान - वही, जहाँ से यह ग्राम्य सीरिज लिख लिख आप लोगों को पका रहा हूँ....

समय - वही, जब  खुल्ले में नहा रहा होउं और उसी वक्त प्रधानमंत्री का हवाई जहाज  उपर से गुजरता हुआ जाय। अगले दिन अखबारों में सुर्खीयां हों कि - प्रधानमंत्री ने हवाई दौरा किया, खुले में नहाते लोगों को देख उन्हें दुख हुआ....अब सरकार लोगों के लिए बाथालय बनवाने जा रही है  :)

( सभी चित्र मेरे पर्सनल कलेक्शन से - डल झील सरीखा लुक देता चित्र दरअसल गोमती नदी का है ( पिछले साल ही मैंने शाम के समय खींचा था,    कुल्हड़ वाली दुकान वहीं गाँव के बाजार की है....और लोटा- बाल्टी जिससे मैं नहा  रहा हूँ.....अब मेरा इंतजार कर रहे है कि मैं फिर कब दुबारा आता हूँ  :)


ग्राम्य सीरिज चालू आहे  :)

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Saturday, May 8, 2010

सन्तों के चरण छूते हुए चिकोटी काटने का मन हो रहा है....कहीं आप का भी मन लहक रहा हो तो बढ़ आओ... देर किस बात की...सतीश पंचम

     जहँ जहँ चरण पड़े सन्तन के, तहँ तहँ बंटाढार……यह बात मेरे गाँव के पोखरे के लिए सटीक बैठती है। ठीक दो साल पहले का ये चित्र हैं और ठीक दो साल बाद के ही सूखे पोखर वाला चित्र है जिसमें बच्चे क्रिकेट खेल रहे हैं…..नरेगा का भरपूर उपयोग हुआ है…..पैसा पानी की तरह बहा है….लेकिन विडंबना यह कि पानी ही नहीं है पोखर में…….

        पहले बरसात होने पर चारों ओर से ढाल पाकर पानी इस पोखर में जमा हो जाता था…..इतना कि  पोखरे में गर्मी के समय भी थोड़ा बहुत पानी रह जाता था…….अब नरेगा के जरिए ऐसी चौहद्दी बन गई है कि  अगर जमकर बरसात हो भी गई तो पोखर के किनारे किनारे जो चहारदीवारी बनवाई गई है वह फिजूल का  पानी आने से रोक देगी…….पोखर भरे तो कैसे…….सरकारी काम भी तो रोक छेंक के बगैर नहीं होता……ये पोखर की दीवारें उसी सरकारी माहौल की याद दिला रही हैं कि जो काम खुद ब खुद ढंग से हो रहा हो…..वहां लाइसेंस लागू करो……जो पानी खुद ब खुद बहकर पोखर में जमा हो जाता था….अब उसे पोखर में पहुंचने के लिये अगल बगल खड़ी चारदीवारीयों से परमिशन लेनी पडेगी…….पानी भरे तो कैसे……अब हालत यह है कि उसमें बच्चे क्रिकेट खेल रहे हैं, धूल उड़ रही है….बैठ रही है…….छन रही है।

इस पोखरे को देख मुझे विवेकी राय जी का लिखा एक लेख बड़ी शिद्दत से याद आ रहा है…..जिसमें  विवेकी राय जी ने लिखा था कि

     अब वे दिन सपने हुए हैं कि जब सुबह पहर दिन चढे तक किनारे पर बैठ निश्चिंत भाव से घरों की औरतें मोटी मोटी दातून करती और गाँव भर की बातें करती। उनसे कभी कभी हूं-टूं होते होते गरजा गरजी, गोत्रोच्चार और फिर उघटा-पुरान होने लगता। नदी तीर की राजनीति, गाँव की राजनीति। लडकियां घर के सारे बर्तन-भांडे कपार पर लादकर लातीं और रच-रचकर माँजती। उनका तेलउंस करिखा पानी में तैरता रहता। काम से अधिक कचहरी । छन भर का काम, पहर-भर में। कैसा मयगर मंगई नदी का यह छोटा तट है, जो आता है, वो इस तट से सट जाता है।

    
       विवेकी राय जी मंगई नदी को गांव की मां कहते हैं और लिखते हैं कि -
  
       हम थके मांदे बाहर से आते, यह निर्मल नीर लिये राह-घाट छेंक सदा हाजिर, घुटने तक, कभी जांघ तक पैर धो देती, शीतल आँचल से पोंछ देती, तरो ताजा कर देती। हम खिल जाते। मुंह धोते, कुल्ला करते, हडबड-हडबड हेलते, उंगली से धार काटते और कुटकुर किनारे पर पनही गोड में डालकर भींगे पैरों की सनसनाहट के साथ धोती हाथ से टांगे अरार पर चढते तो एक अनकही-अबूझी आनंदानुभूति होती थी ….
  
      गरमी के दिन में लडके छपक छपक कर नहा रहे हैं। सेवार और काई के फुटके छत्ते धार के साथ बह रहे हैं। लडके उन्हें उठा-उठाकर एक दूसरे पर उछाल रहे हैं। झांव- झांव झाबर।   एक दूसरे पर हाथो –हांथ पानी उबिछ रहे हैं, हंस रहे हैं, किलकारी भर रहे हैं। हाथ पैर पटक कर अगिनबोट बन तैर रहे हैं। हाडुक-बाडुक। नहाते नहाते ठुड्डी और मूंछ वाले स्थान पर हलकी काई जम गयी। कोई बुडुआ बनकर दूसरे का पैर खींच रहा है। कोई पानी में आँखें खोलकर तैरता है। अच्छा देखें कौन देर तक पानी में सांस रोककर डूबता है। खेल शुरू। एक पट्ठा रिगानी (चालाकी)  कर जाता है। सिर काढ कर साँस ले रहा है और तब तक उपर उठने के लिये कोई सिर मुलकाता है, तब तक डम्भ। साँस ले रहा लडका पानी में घुस जाता है। दिन भर नहान। न जाने किस पुण्य प्रताप से यह नियामत मिली। आज कल के लडके तो अभागे निकले। चुल्लू भर पानी के लिये छिछियाते फिरें। कुएं पर खडे खडे लोटे से देह खंघार लें बस।
  
       उधर दादा दोनों हाथों से मार-मार फच्च फच्च धोती फींच रहे हैं। कहते हैं कि उनके कपडे कभी धोबी के घर नहीं जाते। परंतु क्या मजाल कि कोई कहीं धब्बा मैल या चित्ती देख ले। एक जिंदा दृश्य। मानों यह मंगई का तट ही गाँव के लिये सिनेमा, थियेटर, मनोरंजन पार्क, क्लब, क्रीडागार स्थान है।
  
      लेकिन अब वो बात नहीं रही। स्वतंत्रता के समय जो मंगई नदी कल कल बहती थी, अब सूख गई है। गाँव में घुसने से पहले उसी का महाभकसावन सूखा, गहरा, लेटा हुआ कंकाल लांघना पडता है। मिजाज सन्न हो जाता है। बंसवारि खडी है, पेड खडे हैं। घर खडे हैं। मगर वह रौनक कहां है। अखर गया है।
  
     एक वह भी समय था जब चैत रामनौमी के दिन अछत कलश भरने का काम शुरू होता। किसी कलश को घी से टीककर, तो किसी कलश को घी से ही राम-नाम लिखकर अंवासा गया है। माता मईया की गज्जी कचारने, सिरजना और पीढा धोने का काम रात भर चलता है।
  
      मंगई के तट पर नहान उतरा है। जिनको माता मईया की पूजा करनी है, जिन्हें कडाही पर बैठना है, वे नहा रही हैं। पहले दौर में सोझारू औरतों ने और लडकियों ने स्नान किया। जब रात भीन गयी और राह-घाट सूनी हो गयी, तब लजारू बहुरीया लोग निकलीं।
  
     अब वह बात कहां रही। नहान की बेला में अबकी बार सियार फेंकरते रहे। फटे दरारों की शतरंजी पर भूत-प्रेत बैठकर सत्यानाशी खेल खेलते रहे। मनुष्य का स्वभाव माहुर हो गया है, देवता उन्हें दंड दें, लेकिन उसके लिये जीव जंतुओं और मवेशियों को क्यों दंड दिया जाय। अब भैंसे कहां घंटों पानी में बैठकर बोह लेंगी। अब दंवरी से खुलकर आये बैल कहां पानी पियेंगे। कहां उनकी गरमाई हुई अददी खुरों को जुडवाने के लिये पाक में हेलाया जाएगा। खेह से भठी हुई उनकी देह कहां धोयी जाएगी। दिन में चरने वाले जानवर और रात-बिरात दूर-दूर से टोह लगाते आये सियार-हिरन आदि अब कहां पानी पियेंगे। कुछ समझ नहीं आ रहा।
  
      जेठ-बैसाख में जिनकी शादी होगी, उनका कक्कन कहां छूटेगा । मौर कहां पर सिरवाया जाएगा। कहां पर
खडी होकर औरतें गाएंगी -

 अंगने में बहे दरिअइया
हमारे जान नौंसे नहा लो
कोठे उपर दुल्हा मौरी संवारे,
सेहरा संवारे ओकर मईया
हमारे जान नौंसे नहा लो…….

        अब हालत यह है कि खेतों के लिये दौडो, पंपिंग सेट जुटाओ,ट्यूबवेल धंसाओ….मगर मंगई के लिये क्या करोगे। ऐसे लुरगिर कमासुत लोग जनमें कि आपस में वैर, विद्वेष, रगरा-झगरा से फुरसत नहीं । बरमाग्नि उठी कि आकाश धधक उठा। दुख दाह से नदी का करेजा दरक गया है।

     मंगई का करेजा तो देर से फटा है, क्या गांव का करेजा बहुत पहले नहीं फट गया। चुनाव आया एक गांव के कई गांव हो गये। सुख शांति में आग लग गई है। गोल-गिरोह और पार्टीयां बन गई हैं। राजनीतिक पार्टीयों ने वह सत्यानाशी बीज बोया कि गाँव गाँव दरकते चले गये। जूझ गये एक दूसरे से लोग, खून के प्यासे, स्वार्थी-लोलुप और एक विचित्र किस्म के कामकाजी हो गये। उनका सारा ध्यान सरकार पर और अँखमुद्दी लूट पर लग गया। यह लूट उसी प्रकार सत्य रही जिस प्रकार सूरज। मंगई का पानी इसी में सूख गया। कितना सहे। नदी सत्त से बहती है। आसमान सत्त से बरसता है। आदमी का सत्त चला गया। जो किसी युग में नहीं हुआ वह इस युग में हो गया।

      मंगई का पानी था तो आधा पेट खाकर भी गांव में तरी थी। वह तरी पुरानी थी, परंपरागत और सांसकृतिक थी। सो इस कनपटी पर विद्रोही काल ने ऐस थप्पड मारा है कि चटक गयी है। अब इसका खाली पेट जनता के खाली पेट का प्रतीक हो गया है। चहल  पहल माटी हो गयी है। माटी दरार हो गई और इस तिकोनी चौकोनी कटी दरारों के बीच की बरफी पर गदहे घूम रहे हैं, बकरीयां उछल-कूद कर रही हैं। दरारों में मुंह चिआरकर सीपियां पडी हैं, जिनमें से अपना खाना ढूँढते कौए आतुर हैं।

      लोग जूता फटकारते आ-जा रहे हैं। बैलगाडियां बे रोकटोक पार हो जा रही हैं। अरार पर से उतरने वाले संस्कारवश एक बार घूरकर देखते हैं कि कहीं जूता तो नहीं उतारना है। लेकिन अब जूता क्यों उतारा जाय, मंगई तो सूख गई है।

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    तो ये तो विवेकी राय जी ने लिखा था मंगई के बारे में, असत की काली परछाईं को चिचोरती मंगई……मुझे डर है कि  नरेगा से जो असत् की धारा बही है…..कहीं वह मेरे गाँव के पोखरे को एक और मंगई न बना दे……..क्योंकि पैसा खूब बहा है……खूब बहा है और बहुत जगह अब भी बह रहा है।

 इतना सारा पैसा बहाने वाले सन्त जन धन्य हैं  ….कहा है कि .... जहँ जहँ चरण पड़े सन्तन के, तहँ तहँ बंटाढार…  इस पोखरे को देख वही साक्षात दिख रहा है.....

 मन करता है सन्तन के पैर छूते हुए उनके चरणों में चिकोटी काटूँ ........

 
  - सतीश पंचम

स्थान – वही, जहाँ  के दो भाई बड़े धन्ना सेठ  हैं और बड़मनसाहत के तौर पर बड़ी अदालत में एक दूसरे से  फरियाने ( मामला साफ करवाने)  गये थे।

समय – वही, जब एक भाई ने कोर्ट में केस जीत लेने पर कहा – तनिक पंडित जी को कहना कल मेरे यहां भाई के खिलाफ केस जीतने के उपलक्ष्य में अखंड रामायण का पाठ है। जरूर आयें...........

 वही रामायण.....जिसमें भाई-भाई का प्रेम दर्शाया गया है.......

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Friday, May 7, 2010

आँचलिक पोस्ट - अबे तू लड़की से लभ करता है तो बोल दे उसको...... सैंडिल का नम्मर ईयाद है...... गजे-गज्ज अरहर..... ....सतीश पंचम


 ( एक चीज मैंने देखी है कस्बे-कूचों की  बोलीयों में कि यहां रफ़ बोलने के पैसे नहीं लगते और टफ़ बोलने पर पैसे नहीं मिलते.....सब को मिला-जुलाकर चला जाता है......उसी इलाके की और उसी मानसिकता को ध्यान में रख लिखी गई है यह कोलाज......एक आँचलिक पोस्ट...... )

     
     कबसे कह रहा हूँ कि टायर में हवा कम है साहेब.........फिर   भी लादे जा रहे हैं लोग त
 बताईये मैं क्या करूं...... लाईसेंस........ई ल्यो चाह पा ......ट्रैफिक हवलदार न हुए परधानमंतरी हो गये ...........सालों को कुकुरउछी लगी रहती  है......थोड़ा डराईबर सीट से फरके बैठो यार....गियर बझता है........ तुम सब इसकूली लड़का लोग अकराता हो एकदम......भागो इहां से..........लेना एक न देना दो....फिर भी दाम पूछोगे अदबदाकर...........एक ठो मीठा पान बनाना....नहीं चून्ना तनिक कम ......अबे तो बोल न उसको कि तू भी लभ करता है.....बूढ़ा हो जाएगा ऐसे ही......वो तेरे को लभ करती है कि नहीं.........लड़की के सैंडिल का नम्मर इयाद है बकि अपनी चड्ढी का नम्मर नहीं इयाद है साले को.....देखो तो......अरे ए भाई जरा बगलिया के.....टेसन तक का भाड़ा है..............पांच रूपिया में करधन बनवा ल्यो.....पां....


         जाने दो यार तुम क्यों मुंह लगते हो उसके.........लफंडू है साला.......जहां एक हाथ लगा तो आँख उज्जर हो जाएगी बच्चू की.........अपने आप ही बटुर जायगा.............देखो तो कैसे भगा पुल की ओर.....सीढ़ी चढ़ रहा है.........आगे आगे थुलथुल मोटकी औरतीया सीढ़ी चढ़ रही है.......पीछे-पीछे तेवारी .......अरे का तेवारी......जलडमरूमध्य देख रहे हो.....देखो देखो.....कहे हैं मजरूह सुलतानपुर वाले कि तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा का है..........जियो रे मजरू ......का लिक्खा है......करेजा काट......ऐ बे दो किलो बेसन.....अरे पनरह रूपिया का एतना ही उलटोगे...... लूट मची है.....चाचा हम बोल रहे हैं......भिजवा देना खियाल से.....बड़की की बिदाई है.......बाकि धोनीया तो ऐसा बल्ला घुमाता है कि हां तो इधर लगा नहीं कि गेंद तारा बनी .......

         एम् आकाशवाणी...सम्प्रति वारताह श्रुयंताम.....प्रवाचकह बलदेवानंद सागरह.....ऐ बैजू.....कल का दो बोरा धान की लदनी नहीं मिली अब तक.........अरहर तो गजे गज्ज है............भउजाई नहीं दिख रही हैं......का बात है.......बहुत उलटी ओलटी हो रहा है भऊजी के......जिया राजा...........अब तो नाऊन घड़ी पाएगी......



- सतीश पंचम

स्थान वही, जहाँ इस तरह की बोली सुनने के लिए कान तरस जाते हैं.....

समयवही, जब गार्डन में बैठे दो प्रेमी एक दूसरे से सटे प्रेमालाप में मग्न हों और तभी हवलदार आकर कहे......आज मंगलवार है।

 
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फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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