सफेद घर में आपका स्वागत है।

Thursday, April 22, 2010

गठरी- मोठरी..... मुलैमा... गाड़ी इस्लो.... चुल्ली गुरूजी.... मयगर महतारी ..... बिटिया....सूप..पिसान...नईहर....ऐ रिक्सा.....चाँप दूंगा...चढ़े आ.....सारे....अदहन... नॉस्टॉलिजिया

                      
             गाँव जाने के लिये तैयार हो रहा हूँ.... …..नॉस्टॉलिजिया चोंक रहा है……बस अड्डे पर खलासी का चिल्लमचिल्ल………..एक सवारी एक सवारी……रोक के.... रोक के…….चलाsss……ए भाई साईकिल उपर……अरे तनिक गठरी उहां रखिये…..हां किसका किसका बनेगा……अरे बच्चा है तो उसे गोद में लेकर बैठिए…….हां जी आप जाकर बच्चे वाली सीट पर बैठिए…….टिकस लिया है तो बच्चे का लिया है पूरे का नहीं……सीट पर आप बैठ जाईये मां जी…..हाँ…..कहां जाना है………ऐ रिक्शा……अरे तोहरी हरामी क आँख मारौं ……चाँपे चले आव सारे……..ए दाहिने कट के….थोड़ा और……. ए सारेsssss……..

         आज मुलैमा क रैली है…..मायावतीया भी कम नहीं है……लई मूरती….लई मूरती मार पाट दिया है लखनऊ को………अरे त रोजगारौ त मील रहा है……लांण रोजगार मिल रहा है……ससुर जा के देख त मालूम पड़ी……अदालती अस्टे क चक्कर में सिल्पकार लोग बदहाल …….. बकि आंबेडकर भी त सिल्पकार……हां…..संविधान…….ए भाई तनिक गाड़ी इस्लो होने दो तब थूको…….हवा ईधरै का है …….
  काल सरजू बावन बो दिया……सोनालिका भी ठीक है…..उपज ठीकै है…….…चुल्ली गुरूजी ….. चुल्ली………. चिढ़ौना नाम……एक निबंध…..विज्ञान ने हमारे जीवन में आमूल-चूल परिवर्तन किया है……..बड़ी मार पड़ी……बताओ…..आमूल तो आमूल ये चूल क्या है…….…..रोक के….. रोक के……उतरना है …….ए भाई सामान आगे करो………आप वहां बईठो……..अरे तो आधे पर ही बैठो भाई……जल्दीऐ पहुंच जाओगे……..काहे जल्दियान हो……सामान पर जोर मत डालिए…..फूटेगा नही….. अरे चिंता मत करो………
 
     बीड़ी छूआ जाएगा….हाथ उधरिये रखिये……कुर्ता बड़ा रजेस खन्ना कट लिहल बा हो……समधियाने जात हऊवा का ……..अरे तोहरी बहिन क……… काहे भीड़ है…….बारात नाराज …….चार चक्का के बजाय दू चक्का ……बडा करेर दहेजा पड़ा……..…..अरे त हां भाई स्वागत सत्कार खूब किया कि………..

      का हो नईहरे से…….अरे तबै तोहार भऊजी नाराज……कुल सामान उठा के बिटियन के दई दिया….. सूप…..पिसान…..दउरी…..लूगा……नईहर से एतना लेकर आई हो…….केतना भी हो….पर बिटिया के लिये महतारी मयागर रहती है भाई………..बेटवा लोग के न पूछी ओतना………अरे का बिलाना……..पतोहिया बहुत तबर्रा बोलती है……...रोक के…….रोक के ssss……….

   हाँ भाई…….आ जाओ…..उतरिए जल्दी………उतर रहे हैं……कहां हवाई जहाज चला रहे हो……….

- सतीश पंचम

स्थान – वही, जहां पर रहने से नॉस्टॉलिजिया अक्सर चोंकता रहता है और उसी चोंक से बचने जौनपुर की ओर निकल रहा हूँ ।

समय – वही, जब खबर चल रही हो कि यूरोप में हवाई जहाजों की आवाजाही ज्वालामुखी धूएं के कारण ठप्प है और तभी सास अपनी पतोहू से कहे….अरे उपले की आग जरा तेज कर…..काहे धूआँ धूआँ कर रखा है ……नईहर में यही सिखी थी अपने…….

Monday, April 19, 2010

इस्तिफित मंत्री करूर और उनके ड्राईवर के बीच की एक्सक्लूसिव बातचीत - सर, चिंता नको...

           मंत्री करूर अपना इस्तीफा देने के बाद जल्दी जल्दी मीडिया से नज़रें बचाते हुए अपनी गाड़ी में जा बैठे। ड्राईवर को कहा चलो जल्दी कहीं रोकना मत। मीडिया वालों के सामने तो कत्तई मत धीमे होना.....फर्राटे से निकलना।

    ड्राईवर ने इस्तिफित मंत्री करूर का कहना मान तो लिया लेकिन अपना टेपरिकार्डर चालू रखा।

- सर, आप के साथ बहुत बुरा हुआ। मुझे तो लगता है इस तरह अगर चलता रहा तो दुनिया से लोगों का नेकचलनी से विश्वास उठ जायगा।

- उठ जायगा मतलब, अरे उठ गया समझो कि.........कम्बख्तों ने कहीं का नहीं छोड़ा।

- नहीं सर जहाँ तक छोड़ने की बात है.......छोड़ा तो बहुत कुछ है आपके लिये...ये लकदक कपड़े, ये कार, ये फैशनेबल इमेज.....सब तो छोड़ दिये सिवाय आपके इस्तीफे के। अब क्या है न सर कि इस्तीफे का महत्तव तभी तक है जब तक वह हुआ न हो। अब हो गया तो उसका महत्व बढ़ गया है। अब सर इस महत्व बढ़ाने के कार्य में आपका भी तो योगदान है न सर।

- हाँ सो तो है.....वैसे तुम ड्राईवर बड़े पॉजिटिव किस्म के हो....नेगेटिव बात में भी कुछ न कुछ पॉजिटिव सोच रखते हो। अच्छा है।
- क्या अच्छा है सर, चंदा खुश्कर जी से न तो आप मिले होते, न आप क्रिकेट वालों से भिड़े होते और न आज यह हालत होती कि बिना बत़्ती वाली गाड़ी से चलना पड़ता। वैसे सर बत़्ती बुझने से याद आया कि महान कवि और समाज सुधारक श्री गोविंदा जी का कहना था कि खाओ, खुजाओ, बत़्ती बुझाओ। तो सर अब तो बत़्ती भी बुझ गई है, इसका मतलब आप पहले के दो मानदंड पूरे कर चुके हैं शायद।

- कौन से दो मानदंड।

- वही, खाने और खुजाने के.....उसके बाद ही तो आपकी गाड़ी की बत़्ती गुल हुई है ना सर।
- तुम हो तो ड्राईवर लेकिन बहूत दूर की सोचते हो। जरा गाड़ी रोकना तो।
- क्यों सर थोडी देर रोक लिजिये, बस अब घर पहुंचने ही वाले हैं।
- अरे मैं उसके लिये नहीं रोकवा रहा हूँ, दरअसल सामने कुछ बच्चे क्रिकेट खेल रहे हैं। जानना चाहता हूँ कि कहीं कुछ अवैध तो नहीं हो रहा।
- सर जाने दिजिए, अवैध-फवैध के चक्कर में पड़ेंगे तो बेबात के जूते पड़ेंगे और आजकल तो जूते भी क्लासिक वाले होते हैं, बेभाव के पड़ते हैं और स्वभाव से मिलते-जुलते हैं।
- अच्छा, यानि अगर मैं उनके खेल में कुछ पूछताछ करने जाउंगा तो वह लोग मुझे चलता-फिरता कर देंगे।
- सर, ये बच्चे आईपीएल वाले नहीं हैं जो कि आपसे सीधे सीधे भिड़ जांय, वह तो गल्ली क्रिकेटर हैं जो कि सीधे न भिड़कर इनडायरेक्टली भिड़ते हैं । कार के शीशे तोड़ने में और टायर से हवा निकलवाने में ये उस्ताद होते हैं।
- अच्छा, तो यहीं कैटल क्लास हैं शायद.....
       अभी ड्राईवर और इस्तिफित मंत्री करूर जी के बीच बातचीत चल ही रही थी कि एक गेंद करूर जी के कार को आ लगी और शीशा चकनाचूर हो गया। गुस्से में करूर जी कार रूकवाकर बाहर आये, सौम्य और खुशमिज़ाज सा चेहरा कठोरता की तरूणाई गाने लगा। लगे डांटने उन बच्चों को जो क्रिकेट खेल रहे थे। अभी डांटा-डांटी चल ही रही थी कि कार के सभी टायरों से सूँ सूँ की आवाज निकलनी भी शुरू हो गई। अब, ड्राईवर ने करूर जी से कहा, सर लगता है आपके डांटने से बच्चे बिदक गये हैं और उन्होंने खुन्नस में सभी टायरों को पंक्चर कर दिए है। आप किसी और साधन से चलिए तब तक मैं कार ठीक करवा कर ले आता हूँ।

      करूर जी को विश्वास नहीं हो रहा था कि यह भी दिन आ सकता है। मन मारकर करूर जी चल पड़े टैक्सी ढूँढ़ने। कोई टैक्सी वाला तैयार नहीं था, इन्कम टैक्स के छापे अभी जारी थे, मीडिया वैसे भी इस्तिफित मंत्री को कवर करने के लिए हर वक्त कैमरे सटाये रखती थी। यही सब कारण थे जो कि टैक्सी वालों द्वारा करूर जी को इन्कार में जवाब मिल रहा था। मजबूरन करूर जी को बस स्टॉप पर आना पड़ा। बगल में खड़े एक बस का इंतजार करने वाले से अक्षय कुमार की स्टाईल में पूछा

- ये छब्बीस नंबर की बस यहीं से जाती है
- सामने वाले ने कहा, क्यों क्या किसी लड़की के बटन खुले हैं यह देखने जा रहे हो ? या देख ताक कर अंत में फिट्ट है बॉस कहोगे ?
- अरे नहीं, तुम मुझे गलत समझ रहे हो.......मैं तो बस अपने घर जाना चाहता हूँ।
- तो ग्यारह नंबर की बस पकड़ लो।
- ग्यारह नंबर की बस मेरे घर के यहाँ जाती है।
- करूर जी, ग्यारह नंबर की बस वह बस है जो पूरी दुनिया में कहीं भी कैसे भी जाती है। यह यूनिवर्सल बस है।
- मतलब ?
- मतलब ये कि दो टांगों से पैदल जाने को ही ग्यारह नंबर की बस कहा जाता है। अब आप और किसी बस से तो जाएंगे नहीं, क्योंकि आपकी नज़रों में इस तरह की सवारियां कैटल क्लास की होती हैं। इसलिये आप से कह रहा हूँ कि ग्यारह नंबर पकड़िये, आपके लिए वही ठीक रहेगा।
- नहीं नहीं, मैं इतनी गर्मी में चल नहीं पाउंगा, हाँफ जाउंगा...... दरअसल मैं अपनी ज्यादातर ज़िंदगी कोल्ड प्लेसेस में गुज़ारता रहा हूँ...कोल्ड एसी, कोल्ड कार, कोल्ड रूम, कोल्ड पीना, आई मीन कोल्ड ठंडा वगैरह वगैरह....
- वह कुकुर भी ठंडक की तलाश में ही गीली जमीन पर दुबका हुआ है करूर जी। और देखिए जीभ बाहर निकाल कर हाँफ भी रहा है ताकि शीतलता ग्रहण कर सके। बताईये, यही पैमाना रहा तो इंसान और जानवर में फर्क क्या रह जाएगा। आप तो क्लास पीपल में से आते हैं... आई लाईक दिस क्लासिक फ्लेवर, आई लाईक क्लास शैंपेन, आई लाईक हाई क्लास लाईफ़स्टाईल। क्लास ढोने में ही आप लोगों की ज़िंदगी निकल जाती है। इसलिए इस तरह की बातें कहने से पहले थोड़ा सा सोच समझ लिया किजिए करूर जी। इतना भी गरूर ठीक नहीं है।

     अभी यह बातें चल ही रही थी कि करूर जी का ड्राईवर कार लेकर आ गया.......सर कार ठीक हो गई है, चलिए.....। उपर  वाले का शुक्र मनाते हुए करूर जी अपनी कार के अंदर जा समाये और लैपटॉप खोलते हुए जल्दी से ट्वीट किया –

Cattle Class is the ‘Class of the people’, who hate the ‘class’ people.


- सतीश पंचम

स्थान - वही, जहाँ पर बत़्तीयाँ बुझने को तरसती हैं।

समय - वही, जब कोई मंत्री अपना इस्तीफ़ा किसी खास नज़दीकी के कारण देकर लौट रहा हो और उसी वक्त कार में गाईड फिल्म का यह गीत बज रहा हो.......क्या से क्या हो गया....बेवफ़ा तेरे प्यार में..........

( चित्र - पिछले साल मैंने यह तस्वीरें खींची थी।  मेरे ही गाँव के कुछ बच्चे हैं जो गन्ने के खेत में रखवाली करने के साथ उन गन्नों पर हाथ भी साफ कर रहे थे,  वह तो ठहरे बच्चे...पर उनका क्या जो हमारे कर्णधार हैं)

------------------------------------------------

Saturday, April 17, 2010

सड़क....बैनर....देखो गधा मू........टन्न्....कच्चा आम...औरत का मन....शर्तिया....खट्टा......एक 'मन्नाद'....

         

     सड़क पर चला जा रहा हूँ.............सारिका साड़ी सेन्टर............महमूद गैरेज.......इंडियाना जोन्स रेस्टोरेण्ट.......सामान बेचते दुकानदार...... कोई सब्जीवाला ......... कोई फ़ल वाला........कोई पान वाला......एक मोची दिख रहा है.......कीलें ज़मीन पर गिराकर सही कील ढूँढ़ रहा है........एक गुटके का रैपर गिरा है........गोवा गुटका.......टन्न्........ मंदिर में किसी ने घंटी बजाई है........गन्ने के जूस वाले ने अपनी जूस मशीन में घुंघरू बांधे हैं.......... वही बज रहे हैं शायद..........कोई ग्राहक जूस पीने आया होगा.........बर्फ मत डालना.............ये अख़बारों की सजी धजी कतारें...........हेडलाईन में थरूर.........कोई अहम खबर है शायद............ग्लैंमर वाली खबरे पढ़ रहा है अखबार वाला........जानता नहीं........... एक शैंपेन पर ख़बरें मुलम्मेदार हो जाती हैं......पढ़ रहा होगा शिल्पा को फलां ने किस किया..........राखी को गुस्सा आया........शाहरूख बोले..........अमिताभ ने.........

  वो कौन खड़ा है.........दीवार पर तो लिखा है देखो गधा......पिशाबी गन्ध.....फ्लैक्स बैनर......नेताओं के बड़े बड़े चेहरे लगे हैं......... देख कर डर लगता है..........इन्हें ऐसी जगह पर लगे होने में शर्म....... नहीं..............बदबू खैर क्या आती होगी.............सुलभ के ठीक उपर ही तो लगा है.... हंसता हुआ नेता  का चेहरा..................................पार्टी चिन्ह भी है..........धार मारने वाले  का फोर्स उतने  उपर  क्यों  नहीं जाता.................टन्न्.......भगवान.........मंदिर में आरती शुरू हो गई है.........ओम जय जगदीश......ह.........................नगर पालिका की गाड़ी आ गई....... चोर गाड़ी आ गई.......अवैध दुकानदारी.........भाग..................समेट ............ठेलेवाले ने भागते समय टमाटर गिरा दिया .......गाय टमाटर की ओर बढ़ रही है...........पान वाला सबसे आगे भाग रहा है......बचा ले गया...........सब्जीयां चढ़ाई जा रही हैं गाड़ी पर........अंगूरी लड़ीयां बिखर गई हैं.......गज़रा बेचती औरत जल्दी कर रही है............कर्मचारी...... फुर्तीदार हैं.......... ........आईस्क्रीम वाले का खोमचा पकड़ा गया.........डिलाईट कुल्फ़ी.......गाड़ी में ठेले के चार पहिये उपर की ओर ............केले जमीन पर गिर पड़े ......... बच्चे उठा रहे हैं............सेब वाला हाथ जोड़ रहा है............लोहे की अंगुठी.......एक शनि के लिए..........एक गुरू के लिए...........मंगल फेर................सारिका साड़ी सेन्टर........दुकानदार चाय पी रहा है........अरे खीरे की टोकरी लेकर दुकान में कहाँ आ रहा है .......टोकरी ज्यादा अंदर मत रख..........उधर रखेगा तो भी चलेगा...........नहीं पकड़ेगा.........बोलो बहनजी..........कुँवर अजय वाली साड़ी कल ही आई है......दिखाऊँ...खटाउ........ पहनने में नरम रहती है.............चिंगुरेगी नहीं...........
चिंगुरेगी नहीं........नहीं नहीं.........

   ऊँ..........शांति शांति............शांति.......

( यह हैं मेरे मनकी कुछ 'मन्नादें'........यानि मन की आवाज़ें जो अक्सर चलती रहती हैं......कहती रहती हैं........कह कर भूल जाती हैं....और कभी कभी तो गूँगी भी हो जाती हैं)


- सतीश पंचम


स्थान – वही, जहाँ अक्सर नगरपालिका की गाड़ियाँ सड़क किनारे सामान बेचते खोमचे वालों, ठेलेवालों की धड़कनें बढ़ा देती हैं.......

समय – वही, जब कोई नगर पालिका की गाड़ी रेड कर रही हो और ठेले पर बिक रहा कच्चा आम कहे ......आज तो नगर पालिका के कर्मचारी के घर बेगार लिखा है..............उसकी घरवाली का मन है......... खट्टा खाने का.........

( चित्र - कबीर जी के स्थान लहरतारा ( बनारस) में बनी एक इमारत का भीतरी दृश्य है जिसे मैंने पिछले साल अपने कैमरे  में कैद किया था )

**********************

Sunday, April 11, 2010

और मेरे मित्र ने मुंबई को हमेशा के लिए छोड़ दिया...............सतीश पंचम

  

        वैधानिक चेतावनी : इस पोस्ट में कुछ शब्द अश्लील हैं इसलिए उन्हें तारांकित कर पेश कर रहा हूँ। यार दोस्तों के बीच ऐसी ही बातें होती हैं इसलिये शाब्दिक पवित्रता के आग्रही, इस पोस्ट में किसी अश्लीलता के आने पर थोड़ा बख़्श दें :)
    
       कल शाम जब अभय तिवारी जी के यहाँ से लौट रहा था तो ट्रेन में ही मेरी पिछली कंपनी में काम कर चुका मेरा एक पुराना साथी 'बापी'  मिल गया। हाय हैलो होने के बाद हम दोनों में बतकौवल शुरू हुई। कहाँ कैसे से बात शुरू हुई और बातें खुलती गईं। फिलहाल बापी के ही शब्द मैं उसकी ही स्टाईल में लिख रहा हूँ। यार दोस्तों के बीच जो बेतक्कल्लुफ हो कर बातें होती हैं कुछ वही अंदाज है………. बंबईया बोली………बंबईया मिजाज :) 

- मैं तो बॉम्बे छोड़ रहा हूँ यार। कल ओड़ीसा जा रहा हूँ हमेशा के वास्ते।

- क्यों, क्या बात है ?
- बात कुछ नई रे, बस सोच लिया कि नई रेहने का तो  नई रहने का।

- अरे, तो कुछ तो हुआ होगा कि ऐसे ही निकल रहा है।

- अरे वो क्या है कि मेरा माँ पिताजी गाँव में है, अबी वो लोग का उमर भी हो रहेला है, तो क्या कोई उधर भी देखने को मांगता कि नईं।

- लेकिन तू करेगा क्या उधर जा के।

- करने को तो सोच लिया कि अबी खुद का कुछ करना मांगता…..बेहनचो* बोत तेल लगा लिया……..बस्स ।

- अबे, लेकिन करेगा मतलब………….. क्या करेगा। कुछ कैलकुलेशन तो किया होगा। कुछ तो सोचा होगा।

- देख, सोचने का क्या है कि पिछला मेना (महिना) से मैं सोच रहा था कि मैं इदर बांबे में किसके लिये इतना सुबे से शाम तक मरवा रहा हूँ…….साला अकेला के लिये तो अपना ओड़ीसा में बी उतना ही कमा के रेह सकता हूँ। फिर काएको दूसरे के लव* को तेल बील लगाते बैठने का।

-हाँ लेकिन कुछ आगे पीछे सोच के ही डिसिजन लिया है ना।

- हा रे, वो क्या - कि मैं सोचा ये प्राईवेट नौकरी करके कितना तक कमा सकता हूँ…..साला एक तारीक को जेब फुल्ल तीस तारीक को खाली…….इसकी मां की कितना भी करो, दोडो बीडो……..तेल लगाओ……बैंचो* वही उदर का उदर। इदर साला साठ क्रॉस होएंगा तो बेनचो* गाँ* पे लात मार के निकालेगा…….औऱ अपना प्राईबेट बिरबेट में पेंशन बिंशन भी नई है। जो है वो कितना है, साला नाम का वास्ते है। है कि नहीं ?

- हाँ वो तो है। लेकिन बिजनेस कर पाएगा क्या ?

- अरे करने का क्या है। इदर साला दूसरे के लिए काम करता था उदर जाके खुद के लिए काम करेगा……किसी का आगे हाथ बांद के तो खड़ा नहीं रहेगा ना। और अबी क्या है अबी मेरा मा पिताजी का हाथ पैर चलता है, थोडा बहुत हेल्प बिल्प लेकरके अपना एक छोटा बिसनेस ट्रेडिंग का करेगा…….ईधर एक्सपोर्ट इम्पोर्ट करता था उदर ओड़ीसा में जाके लोकल लेवल पे करेगा……अपना कुछ पुराना एक्सिपिरिएंस पे अक्कल बिक्कल लगाके चालू करने का सोचा है। क्या होगा ज्यादा से ज्यादा…..एक साल….दो साल लगेगा जमने में लेकिन धीरे धीरे खुद का तो कुछ कर लेगा कि नईं।

hmm..........

-अबी क्या है कि गाँव में मैं साठ साल के बाद अगर जाएगा तो कोई साला पैचानेगा बी नईं। अरे अबी गाँव जाता हूँ तो सबके बताना पड़ता है कि अरे मैं उनका लड़का हूँ। साठ के बाद जाएगा तो क्या कोई घण्टा पैचानेगा। और फिर बिजनेस में क्या है कि तू मैला कपड़ा बी पहन के बैठ, तेरे पास पैसा है तो चार लोग सलाम ठोक के जाएगा…..इदर साला नौकरी मैं टाई बीई लगा के रहता है पन जेब में देखेगा तो पूरा फुक्कस, एकदम एम्टी ।

-  हां नौकरी में  तो यही हाल है, साला कितना भी करो…….पूरा ही नहीं पड़ता।

- अबी उदर मेरा मां पिताजी तीन-एक साल से बोल रहेला था कि इदर आ के रैह, हमारे को भी हेल्प हो जाएगा और तू भी कुछ सेटल हो जाएगा…..लेकिन मेरा गां*मस्ती………नईं इदरइच रहने का है। इदरइच सब करने का है। अरे क्या उखाड़ लिया मैं इदर रै के…….। उदर गाँव में देखता हूँ तो साला मेरा दोस लोग जो किसी  का लाइक नईं वो लोग फोर वीलर रखता है और आराम से कम ज्यादा कुछ ना कुछ कमा बी रहा है और इदर मैं साला रोज ट्रेन ब्रिन में चढ बिढ के लटक बिटक के जा रहा है……साला मेरे से जास्ती तो वो लोग का लाईफ हैप्पी है। फिर इदर काएको मरवाने का।…………. यई सब सोच के ये डिसिजन लिया अउर पिछला बोत दिन से दिमाग में ये चल रहा था………… अबी सोच लिया कि थोडा ही लगाउंगा पहले, थोडा जम जाउंगा तो आगे हाथ बढ़ाउंगा….।   अबी इस एज में कुछ कर लिया तो ठीक है हमेशा का वास्ते अच्छा हो जाएगा……बाद में उमर बीतने पे ये सब नईं हो सकता……..और खाली सोचते बैठेगा कि एक दिन मेरे पास पइसा आएगा तब मैं कुछ करेगा तो अइसा तो नईं होने वाला……बेंनचो*  कितना भी मरवाते रहो। हइ कि नईं। और नौकरी का क्या है दो साल चार साल बाद बी अगर नईं चला तो अपना एक्सपिरियंस पे फिर से लग सकता है लेकिन अबी अगर ये एज में कुछ खुद का नईं किया तो बेनचो* किदर का नईं रहेगा…….ना गाँव वाला पैचानेगा ना बेन भाई……… अउर माँ पिताजी तो कबसे बोल रहेला था कि क्या इदर ओड़ीसा में सब भूखा मर रहेला है क्या…….अरे मटन चिकन नईं तो नईं कम से कम घास तो मिलेगा………उस्से ही काम चलाने का………थोडा कम कमाएगा लेकिन बेनचो* जिंदगी तो हैप्पी होएगा………..लाईफ तो सेटल होएगा…….…हई कि नईं।

 अबी कल सुबे का ट्रेन है जाता हूँ पैकिग बिकिंग करने का है………….

*************************************************************

          मैं बापी की बातों से थोड़ा हतप्रभ हूँ, थोड़ा रोमांचित भी…….सोच रहा हूँ कि बापी ने कितना सही डिसीज़न लिया है या  कितना गलत। बहुत संभव है कि बापी अब मुंबई न आए । सोचता हूँ कि शायद हर माईग्रेटेड की यही स्थिति है। उसके मन में भी यह बातें आती होंगी कि अपने गाँव, घर के आसपास ही अपनी जिंदगी की चहल पहल  बनाये रखे। विदेशों में काम करने वाले को लगता होगा कि वह भारत आ जाय…….यहीं कुछ कर ले, और यहाँ भारत के किसी शहरी को लगता होगा कि वह गृहजिले या गाँव लौट जाय, वहीं कुछ कर ले, और गाँव में रह रहे लोगों को लगता है कि जरा शहर चला जाय। कुछ पैसे कमाये जांय। हो सके तो दिल्ली कलकत्ता चला जाय……वहां से विदेश……….यह चक्र तो चलता ही रहता है ।
    
       लेकिन एक रिवर्स माईग्रेशन को अपनी आँखों से देखने का सूकून कुछ अलग ही ताज़गी दे रहा है मुझे। बापी के लिये मेरी शुभकामनाएं है।  आज सुबह पोस्ट लिखते वक्त शायद बापी प्लेटफॉर्म पर पहुँच चुका होगा। बापी की सोच और उसके जज्बे को सलाम। न जाने बापी जैसी हिम्मत मुझमें कब आएगी………..शायद न भी आए………..अकेले होने और परिवार वाला होने पर डिसीजन मेकिंग में फर्क जो होता है।

-  सतीश पंचम

स्थान – वही, जहाँ से बापी लौट कर वापस उड़ीसा जा रहा है हमेशा के लिए।

समय – वही, जब बापी ट्रेन में चढ चुका हो, ट्रेन चलने को हो और तभी बापी को  अपने मोबाईल के डिस्प्ले  पर कॉल आता दिखे………CUTTACK   CALLING………….

************************************************

Saturday, April 10, 2010

ख़बरों में आज का यह दौर है कि.........ज़रा रूको भी.......मुंह उस तरफ़ फेर लेने दो.........सतीश पंचम



'ख़बरनवीसी' का है ये आलम,
शहीदों के घर था मातम
रो रही थी संगिनी,
रो रहे थे बच्चे
मईया बिलख रही थी,
गईया भी चुप खडी थी
थी देहरी भी सूनी-सूनी,
रस्ते भी चुप पडे थे

और

ख़बरें चल रही थीं
बहुत तेज़ चल रही थीं
कुछ दौड़ रही थीं
कुछ हाँफ रही थी

सेहरा कब बँधेगा,
डोली कब उठेगी,
शहनाई कब बजेगी
मिठाई कब बँटेगी,
अहा सानिया, आहा शोएब,
आहा जि़दगी

पूछा जो हमने उनसे कि
'यह' कैसा 'दस्तूर' है
सदमें में है सारा आलम
और ख़बरों में 'फितूर' है

कहने लगे पलटकर
अरे 'यह',
 
'यह' तो 'ग़ज़क़' है ।

 
ख़बरनवीसी = ख़बरें देना, रिपोर्टिंग
          ग़ज़क़ = वह चीज जो शराब पीने के बाद मुँह का स्वाद बदलने के लिये खाई जाती है।
 

- सतीश पंचम

स्थान – वही, जहाँ पर कहते हैं कि सितारे जमीं पर रोज़ उतरते हैं।

समय– वही, जब रात में जमीं पर उतरे सितारे सुबह देर तक मुँह ढँपे रहने पर अखरते हैं।

********************

Wednesday, April 7, 2010

तरकश के पन्ने - जावेद अख्तर जी की जुबानी ( पार्ट - 2)...........सतीश पंचम

 जावेद अख्तर जी की रचना  'तरकश' में उन्होंने खुद की जो जीवनी लिखी है उसका पहला भाग आपने मेरी पिछली पोस्ट में पढा होगा ।  पेश है  तरकश के उन्हीं पन्नों का शेष भाग जावेद जी की ही जुबानी................ - सतीश पंचम)

*****************************************



.........रात के शायद दो बजे होंगे। बंबई की बरसात, लगता है आसमान से समंदर बरस रहा है। मैं खार स्टेशन के पोर्टिको की सीढियों पर एक कमजोर से बल्ब की कमजोर सी रौशनी में बैठा हूँ। पास ही जमीन पर इस आँधी-तूफान से बेखबर तीन आदमी सो रहे हैं। दूर कोने में एक भीगा हुआ कुत्ता ठिठुर रहा है। बारिश लगता है अब कभी नहीं रूकेगी। दूर तक खाली अँधेरी सडकों पर मूसलाधार पानी बरस रहा है। खामोश बिल्डिंगों की रौशनियां कब की बुझ चुकी हैं। लोग अपने अपने घरों में सो रहे होंगे। इसी शहर में मेरे बाप का भी घर है। बंबई कितना बडा शहर है और मैं कितना छोटा हूँ, जैसे कुछ भी नहीं हूँ। आदमी कितनी भी हिम्मत रखे, कभी-कभी बहुत डर लगता है।

             ......मैं अब साल भर से कमाल स्टूडियो ( जो कि अब नटराज स्टूडियो है) में रहता हूँ। कम्पाउंड में कहीं भी सो जाता हूँ। कभी किसी बरामदे में, कभी किसी पेड के नीचे, कभी किसी बेंच पर, कभी किसी कॉरिडोर में। यहाँ मेरे जैसे और कई बेघर और बेरोजगार इसी तरह रहते हैं। उन्हीं में से एक जगदीश है, जिससे मेरी अच्छी दोस्ती हो जाती है। वो रोज एक नई तरकीब सोचता कि आज खाना कहाँ से और कैसे मिल सकता है, आज दारू कौन और क्यों पिला सकता है। जगदीश ने बुरे हालात में जिंदा रहने को एक आर्ट बना लिया है।

            
         मेरी जान पहचान अँधेरी स्टेशन के पास फुटपाथ पर एक सेकंड हैंड किताब बेचने वाले से हो गई है। इसलिये किताबों की कोई कमी नहीं है। रात-रात भर कम्पाउंड में जहाँ भी थोडी रौशनी होती है, वहीं बैठकर पढता रहता हूँ। दोस्त मजाक करते हैं कि मैं इतनी कम रौशनी में अगर इतना ज्यादा पढता रहा तो कुछ दिनों में अंधा हो जाउंगा.....आजकल एक कमरे में सोने का मौका मिल गया है। स्टूडियो के इस कमरे में चारों तरफ दीवारों से लगी बडी-बडी अलमारियाँ हैं जिनमें फिल्म पाकीजा की दर्जनों कस्ट्यूम रखे हैं। मीना कुमारी कमाल साहब से अलग हो गई हैं इसलिए इन दिनों फिल्म की शूटिंग बंद है। एक दिन मैं अल्मारी का खाना खोलता हूँ, इसमें फिल्म में इस्तेमाल होनेवाले पुरानी तरह के जूते-चप्पल और सैंडिल भरे हैं और उन्हीं में मीना कुमारी के तीन फिल्मफेयर अवार्ड भी पडे हैं। मैं उन्हें झाड-पोंछकर अलग रख देता हूँ। मैंने जिंदगी में पहली बार किसी फिल्म अवार्ड को छुआ है। रोज रात को कमरा अंदर से बंद करके, वो ट्रॉफी अपने हाथ में लेकर आईने के सामने खडा होता हूँ और सोचता हूँ कि जब ये ट्रॉफी मुझे मिलेगी तो तालियों से गूँजते हुए हाल में बैठे हुए लोगों की तरफ देखकर मैं किस तरह मुस्कराउँगा और कैसे हाथ हिलाउँगा। इसके पहले कि इस बारे में कोई फैसला कर सकूँ स्टूडियो के बोर्ड पर नोटिस लगा है कि जो लोग स्टूडियो में काम नहीं करते वो कम्पाउंड में नहीं रह सकते। जगदीश मुझे फिर एक तरकीब बताता है कि जब तक कोई और इंतजाम नहीं होता हम लोग महाकाली की गुफाओं में रहेंगे (महाकाली अँधेरी से आगे एक इलाका है जहाँ अब एक घनी आबादी और कमालिस्तान स्टूडियो है।

              उस जमाने में वहाँ सिर्फ एक सडक थी, जंगल था और छोटी-छोटी पहाडियाँ जिनमें बौद्ध भिक्षुओं की बनाई पुरानी गुफाएँ थीं, जो आज भी हैं। उन दिनों उनमें कुछ चरस गाँजा पीनेवाले साधु पडे रहते थे)। महाकाली की गुफाओं में मच्छर इतने बडे हैं कि उन्हें काटने की जरूरत ही नहीं, आपके तन पर सिर्फ बैठ जांय तो आँख खुल जाती है। एक ही रात में यह बात समझ में आ गई कि वहाँ चरस पीए बिना कोई सो ही नहीं सकता। तीन दिन जैसे-तैसे गुजारता हूँ। बांदरा में एक दोस्त कुछ दिनों के लिए अपने साथ रहने के लिए बुला लेता है। मैं बांदरा जा रहा हूँ। जगदीश कहता है दो एक रोज में वो भी कहीं चला जाएगा ( ये जगदीश से मेरी आखिरी मुलाकात थी। आनेवाले बरसों में जिंदगी मुझे कहाँ से कहाँ ले गई मगर वो ग्यारह बरस बाद वहीं, उन्हीं गुफाओं में चरस और कच्ची दारू पी-पीकर मर गया और वहाँ रहने वाले साधुओं और आसपास के झोपडपट्टी वालों ने चंदा करके उसका क्रिया-कर्म कर दिया। किस्सा –खतम। मुझे और उसके दूसरे दोस्तों को उसके मरने की खबर भी बाद में मिली। मैं अकसर सोचता हूँ कि मुझमें कौन से लाल टँके हैं और जगदीश में ऐसी क्या खराबी थी। ये भी तो हो सकता था कि तीन दिन बाद जगदीश के किसी दोस्त ने उसे बांदरा बुला लिया होता और मैं पीछे उन गुफाओं में रह जाता। कभी-कभी सब इत्तिफ़ाक लगता है। हम लोग किस बात पर घमंड करते हैं)।

                 मैं बांदरा में जिस दोस्त के साथ एक कमरे में आकर रहा हूँ वो पेशावर जुआरी है। वो और उसके दो साथी जुए में पत्ते लगाना जानते हैं। मुझे भी सिखा देते हैं। कुछ दिनों उनके साथ ताश के पत्तों पर गुज़ारा होता है फिर वो लोग बंबई से चले जाते हैं और मैं फिर वहीं का वहीं – अब अगले महीने इस कमरे का किराया कौन देगा। एक मशहूर और कामयाब राइटर मुझे बुलाके ऑफर देते हैं कि अगर मैं उनके डॉयलॉग लिख दिया करूँ ( जिन पर जाहिर है मेरा नहीं उनका ही नाम जाएगा) तो वो मुझे छह सौ रूपये महीना देंगे। सोचता हूँ यह छह सौ रूपये मेरे लिए इस वक्त छह करोड के बराबर है, ये नौकरी कर लूँ, फिर सोचता हूँ कि नौकरी कर ली तो कभी छोडने की हिम्मत नहीं होगी, ज़िंदगी भर यही करता रह जाउँगा, फिर सोचता हूँ अगले महीने का किराया देना है, फिर सोचता हूँ देखा जाएगा। तीन दिन सोचने के बाद इनकार कर देता हूँ। दिन, हफ्ते,महीने,साल गुजरते हैं। बंबई में पांच बरस होने को आए, रोटी एक चाँद है हालात बादल, चाँद कभी दिखाई देता है, कभी छुप जाता है। ये पाँच बरस मुझ पर बहुत भारी थे मगर मेरा सर नहीं झुका सके। मैं नाउम्मीद नहीं हूँ। मुझे यकीन है, कुछ होगा, कुछ जरूर होगा, मैं यूँ ही मर जाने के लिए नहीं पैदा हुआ हूँ – और आखिर नवम्बर 1969 में मुझे वो काम मिलता है जिसे फ़िल्मवालों की ज़बान में सही ‘ब्रेक’ कहा जाता है।

              कामयाबी भी जैसे अलादीन का चिराग़ है। अचानक देखता हूँ कि दुनिया ख़ूबसूरत है और लोग मेहरबान। साल-डेढ साल में बहुत कुछ मिल गया है और बहुत कुछ मिलने को है। हाथ लगते ही मिट्टी सोना हो रही है और मैं देख रहा हूँ- अपना पहला घर, अपनी पहली कार। तमन्नाएँ पूरी होने के दिन आ गए हैं मगर ज़िंदगी में एक तनहाई तो अब भी है। सीता और गीता के सैट पर मेरी मुलाक़ात हनी ईरानीसे होती है। वो एक खुले दिल की, ख़री ज़बान की मगर बहुत हँसमुख स्वाभाव की लडकी है। मिलने के चार महीने बाद हमारी शादी हो जाती है। मैंने शादी में अपने बाप के कई दोस्तों को बुलाया है मगर अपने बाप को नहीं ( कुछ जख़्मों को भरना अलादीन के चिराग़ के देव के बस की बात नहीं)- वे काम सिर्फ़ वक़्त ही कर सकता है)। दो साल में एक बेटी और एक बेटा, जोया और फ़रहान होते हैं।

          अगले छह वर्षों में एक के बाद एक लगातार बारह सुपर हिट फ़िल्में, पुरस्कार, तारीफें, अखबारों और मैगज़ीनों में इंटरव्यू, तस्वीरें, पैसा और पार्टियाँ, दुनिया के सफ़र, चमकीले दिन, जगमगाती रातें- जिंदगी एक टेक्नीकलर ख़्वाब है, मगर हर ख़्वाब की तरह यह ख़्वाब भी टूटता है। पहली बार एक फिल्म की नाकामी- ( फिल्में तो उसके बाद नाकाम भी हुईं और कामयाब भी मगर कामयाबी की वो खुशी और ख़ुशी की वो मासूमियत जाती रही)।

            18 अगस्त 1976 को मेरे बाप की मृत्यु होती है ( मरने से नौ दिन पहले उन्होंने मुझे अपनी आखिरी किताब ऑटोग्राफ करके दी थी, उसपर लिखा था – ‘जब हम न रहेंगे तो बहुत याद करोगे’। उन्होंने ठीक लिखा था)। अब तक तो मैं अपने आपको एक बाग़ी और नाराज़ बेटे के रूप में पहचानता था मगर अब मैं कौन हूँ। मैं अपने-आपको और फिर अपने चारों तरफ़, नई नजरों से देखता हूँ कि क्या बस यही चाहिए था मुझे ज़िंदगी से। इसका पता अभी दूसरों को नहीं है मगर वो तमाम चीज़ें जो कल तक मुझे ख़ुशी देती थीं झूठी और नुमाइशी लगने लगी हैं। अब मेरा दिल उन बातों में ज़्यादा लगता है जिनसे दुनिया की ज़बान में कहा जाए तो, कोई फ़ायदा नहीं। शायरी से मेरा रिश्ता पैदाइशी और दिलचस्पी हमेशा से है।

              लड़कपन से जानता हूँ कि चाहूँ तो शायरी कर सकता हूँ मगर आज तक की नहीं है। ये भी मेरी नाराज़गी और बग़ावत का एक प्रतीक है। 1979 में पहली बार शे’र कहता हूँ और ये शे’र लिखकर मैंने अपनी विरासत और अपने बाप से सुलह कर ली है। इसी दौरान मेरी मुलाकात शबाना आज़मी से होती है। कैफ़ी आज़मी की बेटी शबाना भी शायद अपनी जड़ों की तरफ़ लौट रही है। उसे भी ऐसे हज़ारों सवाल सताने लगे हैं जिनके बारे में उसने पहले कभी सोचा नहीं था। कोई हैरत नहीं कि हम क़रीब आने लगते हैं। धीरे-धीरे मेरे अंदर बहुत कुछ बदल रहा है। फ़िल्मी दुनिया मे जो मेरी पार्टनरशिप थी टूट जाती है। मेरे आसपास के लोग मेरे अंदर होनेवाली इन तब्दीलियों को परेशानी से देख रहे हैं। 1983 में मैं और हनी अलग हो जाते हैं।  ( हनी से मेरी शादी ज़रूर टूट गई मगर तलाक़ भी हमारी दोस्ती का कुछ नहीं बिगाड़ सकी। और अगर माँ-बाप के अलग होने से बच्चों में कोई ऐसी कड़वाहट नहीं आई तो इसमें मेरा कमाल बहुत कम और हनी की तारीफ़ बहुत ज्यादा है। हनी आज एक बहुत कामयाब फ़िल्म राइटर है और मेरी बहुत अच्छी दोस्त। मैं दुनिया मे कम लोगों की इतनी इज़्ज़त करता हूँ जितनी इज़्ज़त मेरे दिल में हनी के लिए है)।

                 मैंने एक कदम उठा तो लिया था मगर घर से निकल के कई बरसों के लिए मेरी ज़िंदगी ‘कटी उम्र होटलों में मरे अस्पताल जाकर’ जैसी हो गई। शराब पहले भी बहुत पीता था मगर फिर बहुत ज़्यादा पीने लगा। ये मेरी ज़िंदगी का एक दौर है जिस पर मैं शर्मिंदा हूँ। इन चंद बरसों में अगर दूसरों ने मुझे बर्दाश्त कर लिया तो ये उनका एहसान है। बहुत मुमकिन था कि मैं यूँ ही शराब पीते-पीते मर जाता मगर एक सबेरे किसी की बात ने ऐसा छू लिया कि उस दिन से मैंने शराब को हाथ नहीं लगाया और न कभी लगाउँगा।

             आज इतने बरसों बाद अपनी ज़िंदगी को देखता हूँ तो लगता है कि पहाडों से झरने की तरह उतरती, चटानों से टकराती, पत्थरों में अपना रास्ता ढूँढती, उमड़ती, बलखाती, अनगिनत भँवर बनाती, तेज़ चलती और अपने ही किनारों को काटती हुई ये नदी अब मैदानों में आकर शांत और गहरी हो गई है।

          मेरे बच्चे ज़ोया और फ़रहान बड़े हो गए हैं और बाहर की दुनिया में अपना पहला क़दम रखने को हैं। उनकी चमकती हुई आँखों में आनेवाले कल के हसीन ख़्वाब हैं। सलमान, मेरा छोटा भाई, अमेरिका में एक कामयाब साइकोएनालिस्ट, बहुत-सी किताबों का लेखक, बहुत अच्छा शायर, एक मोहब्बत करने वाली बीवी का पति और दो बहुत ज़हीन बच्चों का बाप है। ज़िंदगी के रास्ते उसके लिए कुछ कम कठिन नहीं थे मगर उसनें अपनी अनथक मेहनत और लगन से अपनी हर मंज़िल पा ली है और आज भी आगे बढ रहा है। मैं खुश हूँ और शबाना भी, जो सिर्फ मेरी बीवी नहीं मेरी महबूबा भी है। जो एक खूबसूरत दिल भी है और एक क़ीमती ज़हन भी। “मैं जिस दुनिया में रहता हूँ वो उस दुनिया की औरत है” – ये पंक़्ति अगर बरसों पहले ‘मज़ाज़’ ने किसी के लिए न लिखी होती तो मैं शबाना के लिए लिखता।

              आज यूँ तो ज़िंदगी मुझ पर हर तरह से मेहरबान है मगर बचपन का वो एक दिन, 18 जनवरी 1953 अब भी याद आता है। जगह, लखनऊ, मेरे नाना का घर- रोती हुई मेरी खाला, मेरे छोटे भाई सलमान को, जिसकी उम्र साढ़े छह बरस है और मुझे हाथ पकड़ के घर के उस बड़े कमरे में ले जाती है जहाँ फ़र्श पर बहुत सी औरतें बैठी हैं। तख़्त पर सफ़ेद कफ़न में लेटी मेरी माँ का चेहरा खुला है। सिरहाने बैठी मेरी बूढ़ी नानी थकी-थकी सी हौले-हौले रो रही हैं। दो औरतें उन्हें संभाल रही हैं। मेरी ख़ाला हम दोनों बच्चों को उस तख़्त के पास ले जाती हैं और कहती हैं, अपनी माँ को आखिरी बार देख लो। मैं कल ही आठ बरस का हुआ था। समझदार हूँ। जानता हूँ मौत क्या होती है। मैं अपनी माँ के चेहरे को बहुत ग़ौर से देखता हूँ कि अच्छी तरह याद हो जाए। मेरी ख़ाला कह रही हैं – इनसे वादा करो कि तुम ज़िंदगी में कुछ बनोगे, इनसे वादा करो कि तुम ज़िंदगी में कुछ करोगे। मैं कुछ कह नहीं पाता, बस देखता रहता हूँ और फ़िर कोई औरत मेरी माँ के चेहरे पर कफ़न ओढ़ा देती है –

            ऐसा तो नहीं है कि मैंने ज़िंदगी में कुछ किया ही नहीं है लेकिन फिर ये ख़्याल आता है कि मैं जितना कर सकता हूँ उसका तो एक चौथाई भी अब तक नहीं किया और इस ख़्याल की दी हुई बेचैनी जाती नहीं।


                     - जावेद अख़्तर

************************************

तरकश के अंश


भूख



मेरे घर में चूल्हा था

रोज खाना पकता था

माँ अजीब थी मेरी

रोज़ अपने हाथों से

मुझको वो खिलाती थी

कौन सर्द हाथों से

छू रहा है चेहरे को

इक निवाला हाथी का

इक निवाला घोडे का

इक निवाला भालू का.....


************************************

उँची इमारतों से मकाँ मेरा घिर गया

कुछ लोग मेरे हिस्से का सूरज भी खा गये

************************************




  तो यह रही जावेद अख्तर जी की जीवनी उन्हीं की जुबानी।  पुन: एक बार जावेद जी को धन्यवाद कहूँगा कि उन्होंने अपनी किताब तरकश के कुछ हिस्से प्रकाशित करने के लिये अनुमति दी। जावेद जी की जीवनी पढ़ पता चलता है कि कोई इंसान कितने कठिन रास्तों से जूझता हुआ, लडता हुआ, झगडता हुआ किस तरह अपनी म़जिल को पा लेता है और उनका जीवन वृत यह चीख चीख कर कह रहा है कि जीवन मे कभी हार न मानों ......कभी भी........कभी भी...........।


प्रस्तुतिसतीश पंचम

स्थान - वही, जिसे कभी अंग्रेजों के ज़माने में दहेज के रूप में दिया गया था ।
समय - वही, जब महाकाली गुफाओं में दो साधू बतिया रहे हों, कि कोई मशहूर राइटर यहाँ आकर गया है, तुमने देखा क्या ?
और दूसरा तपाक से कहे.....पूछो उस बडे वाले मच्छर से जो उड रहा है........ शायद उसके बाप दादाओं  ने उसकी रगों को छुआ हो ...........।

Sunday, April 4, 2010

'तरकश' के पन्ने.......जावेद अख्तर जी की अनुमति से यह पोस्ट प्रकाशित

          जब मैंने जावेद अख्तर जी की लिखी किताब ‘तरकश’ के यह पन्ने पढे तो लगा कि आप लोगों से इसे साझा किया जाय।  यही सोचकर मैंने जावेद जी से बात की और इसे अपने ब्लॉग पर देने की ख्वाहिश जताई और जावेद जी ने सहर्ष इसकी अनुमति दे दी।

 पेश है तरकश के वही पन्ने श्री जावेद अख्तर जी की जुबानी - सतीश पंचम

*******************************************


        लोग जब अपने बारे में लिखते हैं तो सबसे पहले यह बताते हैं कि वो किस शहर के रहने वाले हैं – मैं किस शहर को अपना शहर कहूँ ?  पैदा होने का जुर्म ग्वालियर में किया लेकिन होश सँभाला लखनऊ में, पहली बार होश खोया अलीगढ में, फिर भोपाल में रहकर कुछ होशियार हुआ लेकिन बम्बई आकर काफी दिनों तक होश ठिकाने रहे, तो आइए ऐसा करते हैं कि मैं अपनी जिन्दगी का छोटा सा फ्लैश बैक बना लेता हूँ। इस तरह आपका काम यानी पढना भी आसान हो जाएगा और मेरा काम भी, यानी लिखना।

        शहर लखनऊ….किरदार – मेरे नाना, नानी दूसरे घरवाले और मैं ….मेरी उम्र आठ बरस  है। बाप बम्बई में है, माँ कब्र में। दिन भर घर के आँगन में अपने छोटे भाई के साथ क्रिकेट खेलता हूँ। शाम को ट्यूशन पढाने के लिए एक डरावने से मास्टर साहब आते हैं। उन्हें पन्दरह रूपये महीना दिया जाता है ( यह बात बहुत अच्छी तरह याद है इसलिए कि रोज बताई जाती थी)। सुबह खर्च करने के लिए एक अधन्ना और शाम को एक इकन्नी दी जाती है, इसलिए  पैसे की कोई समस्या नहीं है। सुबह रामजी लाल बनिए की दुकान से रंगीन गोलियाँ खरीदता हूँ और शाम को सामने फुटपाथ पर खोमचा लगाने वाले भगवती की चाट पर इकन्नी लुटाता हूँ। ऐश ही ऐश है। स्कूल खुल गए हैं। मेरा दाखिला लखनऊ के मशहूर स्कूल कॉल्विन ताल्लुकेदार कॉलेज में छटी क्लास में करा दिया जाता है। पहले यहाँ सिर्फ ताल्लुकेदारों के बेटे पढ सकते थे, अब मेरे जैसे कमजातों को भी दाखिला मिल जाता है। अब भी बहुत महँगा है…मेरी फीस सत्रह रूपये महीना है ( यह बात बहुत अच्छी तरह याद है, इसलिए क्योंकि………जाने दिजिए)। मेरी क्लास में कई बच्चे घडी बाँधते हैं।     वो सब बहुत अमीर घरों के हैं। उनके पास कितने अच्छे – अच्छे स्वेटर हैं। एक के पास तो फाउन्टेन पेन भी है। यह बच्चे इन्टरवल में स्कूल की कैन्टीन से आठ आने की चॉकलेट खरीदते हैं ( अब भगवती की चाट अच्छी नहीं लगती)। कल क्लास में राकेश कह रहा था कि उसके डैडी ने कहा है कि वो उसे पढने के लिए इंग्लैड भेजेंगे। कल मेरे नाना कह रहे थे…..अरे कम्बख्त । मैट्रिक पास कर ले तो किसी डाकखाने में मोहर लगाने की नौकरी तो मिल जाएगी। इस उम्र में जब बच्चे इंजन ड्राईवर बनने का ख्वाब देखते हैं, मैंने फैसला कर लिया कि मैं बडा होकर अमीर बनूंगा…….

           शहर अलीगढ…..किरदार – मेरी खाला , दूसरे घरवाले और मैं……मेरे छोटे भाई को लखनऊ में नाना के घर में ही रख लिया गया है और मैं अपनी खाला के हिस्से में आया हूँ जो अब अलीगढ आ गई हैं। ठीक ही तो है। दो अनाथ बच्चों को कोई एक परिवार तो नहीं रख सकता। मेरी खाला के घर के सामने दूर जहाँ तक नजर जाती है मैदान है। उस मैदान के बाद मेरा स्कूल है….नवीं क्लास में हूँ, उम्र चौदह बरस है। अलीगढ में जब सर्दी होती है तो झूठमूठ नहीं होती। पहला घंटा सात बजे होता है। मैं स्कूल जा रहा हूँ। सामने से चाकू की धार की जैसी ठंडी और नुकीली हवा आ रही है। छूकर भी पता नहीं चलता कि चेहरा अपनी जगह है या हवा ने नाक कान काट डाले हैं। वैसे पढाई में तो नाक कटती ही रहती है। पता नहीं कैसे, बस, पास हो जाता हूँ। इस स्कूल में जिसका नाम मिंटो सर्किल है, मेरा दाखिला कराते हुए मेरे मौसा ने टीचर से कहा है……ख्याल रखियेगा इनका, दिल पढाई में कम फिल्मी गानों में ज्यादा लगता है।

  दिलीप कुमार की उडन खटोला, राजकपूर की श्री चार सौ बीस देख चुका हूँ। बहुत से फिल्मी गाने याद हैं, लेकिन घर में ये फिल्मी गाने गाना तो क्या, सुनना भी मना है इसलिए स्कूल से वापस आते हुए रास्ते में जोर जोर से गाता हूँ। ( माफ किजिएगा, जाते वक्त तो इतनी सर्दी होती थी कि सिर्फ पक्के राग ही गाए जा सकते थे)। मेरा स्कूल यूनिवर्सिटी एरिया में ही है। मेरी दोस्ती स्कूल के दो चार लडकों के अलावा ज्यादातर यूनिवर्सिटी के लडकों से है। मुझे बडे लडकों की तरह होटलों में बैठना अच्छा लगता है। अक्सर स्कूल से भाग जाता हूँ। स्कूल से शिकायतें आती हैं । कई बार घर वालों से काफी पिटा भी, लेकिन कोई फर्क नहीं पडा, कोर्स की किताबों में दिल नहीं लगा तो  नहीं लगा। लेकिन नॉवलें बहुत पढता हूँ। डाँट पडती है लेकिन फिर भी पढता हूँ। मुझे शेर बहुत याद हैं। यूनिवर्सिटी में जब उर्दू शेरों की अंताक्षरी होती है, मैं अपने स्कूल की तरफ से जाता हूँ  और हर बार मुझे बहुत से इनाम मिलते हैं। यूनिवर्सिटी के सारे लडके लडकियां मुझे पहचानते हैं। लडके मुझे पहचानते हैं मुझे इसकी खुशी है, लडकियां मुझे पहचानती हैं इसकी थोडी ज्यादा खुशी है।……

      …. अब मैं कुछ बडा हो चला हूँ……मैं पदरह साल का हूँ औऱ जिन्दगी में पहली बार एक लडकी को खत लिख रहा हूँ, मेरा दोस्त बीलू मेरी मदद करता है। हम दोनों मिलकर यह खत तैयार करते हैं। दूसरे दिन एक खाली बैडमिंटन कोर्ट में वो लडकी मुझे मिलती है और हिम्मत करके मैं यह खत उसे दे देता हूँ। यह मेरी जिन्दगी का पहला और आखिरी प्रेम पत्र है। ( उस खत में क्या लिखा था, यह भूल गया लेकिन वो लडकी आज तक याद है)।

     मैट्रिक के बाद अलीगढ छोड रहा हूँ। मेरी खाला बहुत रो रही हैं और मेरे मौसा उन्हें चुप कराने के लिए कह रहे हैं कि तुम तो इस तरह रो रही हो जैसे यह भोपाल नहीं वार फ्रंट पर जा रहा हो( उस वक्त न वो जानते थे और न मैं जानता था कि सचमुच war front पर ही जा रहा था )।

       शहर भोपाल……किरदार – अनगिनत मेहरबान, बहुत से दोस्त और मैं…….अलीगढ से बम्बई जाते हुए मेरे बाप ने मुझे भोपाल या यूँ कहिए आधे रास्ते में छोड दिया है। कुछ दिनों अपनी सौतेली माँ के घर में रहा हूँ। फिर वो भी छूट गया। सैफिया कॉलेज में पढता हूँ और दोस्तों के सहारे रहता हूँ। दोस्त जिनकी लिस्ट बनाने बैठूँ तो टेलीफोन डायरेक्टरी से मोटी किताब बन जाएगी। आजकल मैं बी ए सैकेन्ड इयर में हूँ। अपने दोस्त एजाज के साथ रहता हूँ। किराया वो देता है। मैं तो बस रहता हूँ। वो पढता है और ट्यूशन करके गुजर करता है। सब दोस्त उसे मास्टर कहते हैं………मास्टर से किसी बात पर झगडा हो गया है। बातचीत बंद है इसलिए मैं आजकल उससे पैसे नहीं माँगता, सामने दीवार पर टँगी हुई उसकी पैंट में से निकाल लेता हूँ या वो बगैर मुझसे बात किए मेरे सिरहाने दो-एक रूपये रखकर चला जाता है।

     मैं बी ए फाईनल में हूँ, यह इस कॉलेज में मेरा चौथा बरस है। कभी फीस नहीं दी……कॉलेज वालों ने माँगी भी नहीं, यह शायद सिर्फ भोपाल में ही हो सकता है।

      कॉलेज के कम्पाउंड में एक खाली कमरा, वो भी मुझे मुफ्त दे दिया गया है, जब क्लास खत्म हो जाती है तो मैं किसी क्लास रूम से दो बेंच उठाकर इस कमरे में रख लेता हूँ और उन पर अपना बिस्तर बिछा लेता हूँ। बाकी सब आराम है बस बैंचो में खटमल बहुत हैं। जिस होटल में उधार खाता था वो मेरे जैसे मुफ्तखोरों को उधार खिला खिलाकर बंद हो गया है। उसकी जगह जूतों की दुकान खुल गई है। अब क्या खाऊँ। बीमार हूँ, अकेला हूँ, बुखार काफी है, भूख उससे भी ज्यादा है। कॉलेज के दो लडके, जिनसे मेरी मामूली जान पहचान है मेरे लिए टिफिन में खाना लेकर आते हैं…..मेरी दोनों से कोई दोस्ती नहीं है, फिर भी……अजीब बेवकूफ हैं, लेकिन मैं बहुत चालाक हूँ, उन्हें पता भी नहीं लगने देता कि इन दोनों के जाने के बाद मैं रोउंगा। मैं अच्छा हो जाता हूँ। वो दोनों मेरे बहुत अच्छे दोस्त हो जाते हैं …….मुझे कॉलेज में डिबेट बोलने का शौक हो गया है। पिछले तीन बरस से भोपाल रोटरी क्लब की डिबेट का इनाम जीत रहा हूँ। इंटर कॉलेज डिबेट की बहुत सी ट्रॉफियां मैंने जीती हैं। विक्रम यूनिवर्सिटी की तरफ से दिल्ली यूथ फेस्टिवल में भी हिस्सा लिया है। कॉलेज में दो पार्टीयां हैं और एलेक्शन में दोनों पार्टियाँ मुझे अपनी तरफ से बोलने को कहती हैं….मुझे एलेक्शन से नहीं, सिर्फ बोलने से मतलब है इसलिए मैं दोनों तरफ से तकरीर कर देता हूँ।

      कॉलेज का यह कमरा भी जाता रहा। अब मैं मुश्ताक सिंह के साथ हूँ। मुश्ताक सिंह नौकरी करता है औऱ पढता है। वो कॉलेज की उर्दू असोसिएशन का सद्र है। मैं बहुत अच्छी उर्दू जानता हूँ। वो मुझसे भी बेहतर जानता है। मुझे अनगिनत शेर याद हैं। उसे मुझसे ज्यादा याद है। मैं अपने घर वालों से अलग हूँ। उसके घर वाले हैं ही नहीं।………..देखिए हर काम में वो मुझसे बेहतर है। साल भर से वो मुझसे दोस्ती खाने कपडे पर निभा रहा है यानी खाना भी वही खिलाता है औऱ कपडे भी वही सिलवाता है – पक्का सरदार है – लेकिन मेरे लिए सिग्रेट खरीदना उसकी जिम्मेदारी है।

     अब मैं कभी कभी शराब भी पीने लगा हूँ – हम दोनों रात को बैठे शराब पी रहे हैं – वो मुझे पारटीशन और उस जमाने के दंगों के किस्से सुना रहा है  - वो बहुत छोटा था लेकिन उसे याद है – कैसे दिल्ली के करोल बाग में दो मुसलमान लडकियों को जलते हुए तारकोल के ड्रम में डाल दिया गया था औऱ कैसे एक मुसलमान लडके को……मैं कहता हूँ , “मुश्ताक सिंह । तू क्या चाहता है जो एक घंटे से मुझे ऐसे किस्से सुना सुनाकर मुस्लिम लीगी बनाने की कोशिश कर रहा है – जुल्म की ये ताली तो दोनों हाथों से बजी थी – अब जरा दूसरी तरफ की भी तो कोई वारदात सुना।”

     मुश्ताक सिंह हँसने लगता है……"चलो सुना देता हूँ – जग बीती सुनाऊँ या आप बीती” मैं कहता हूँ “आपबीती” और वो जवाब देता है, “मेरा ग्यारह आदमियों का खानदान था – दस मेरी आँखों के सामने कत्ल किए गए हैं……”

    मुश्ताक सिंह को उर्दू के बहुत से शेर याद हैं – मैं मुश्ताक सिंह के कमरे में एक साल से रहता हूँ। बस एक बात समझ में नहीं आती - “मुश्ताक सिंह तुझे उन लोगों ने क्यों छोड दिया ? तेरे जैसे भले लोग चाहे किसी जात किसी मजहब में पैदा हों, हमेशा सूली पर चढाये जाते हैं – तू कैसे बच गया ?”………….आजकल वो ग्लासगो में हैं। जब हम दोनों अलग हो रहे थे तो मैंने उसका कडा उससे लेकर पहन लिया था और वह आज तक मेरे हाथ में है और जब भी उसके बारे में सोचता हूँ ऐसा लगता है कि वो मेरे सामने है और कह रहा है -

 बहुत नाकामियों पर आप अपनी नाज करते हैं
 अभी देखी कहाँ है,   आपने   नाकामियाँ    मेरी


      शहर बंबई……..किरदार – फिल्म इंडस्ट्री , दोस्त, दुश्मन और मैं……….4 अक्टूबर 1964, मैं बम्बई सेंट्रल स्टेशन पर उतरा हूँ। अब इस अदालत में मेरी जिंदगी का फैसला होना है। बम्बई आने के छह दिन बाद बाप का घर छोडना पडता है। जेब में सत्ताईस नए पैसे हैं। मैं खुश हूँ कि जिंदगी में कभी अट्ठाईस नए पैसे भी जेब में आ गए तो मैं फायदे में रहूँगा और दुनिया घाटे में।

      बम्बई में दो बरस होने को आए, न रहने का ठिकाना है न खाने का। यूँ तो एक छोटी सी फिल्म में सौ रूपये महीने पर डॉयलॉग लिख चुका हूँ। कभी कहीं असिस्टेंट हो जाता हूँ, कभी एकाध छोटा-मोटा काम मिल जाता है, अक्सर वो भी नहीं मिलता। दादर एक प्रोडयूसर के ऑफिस अपने पैसे माँगने आया हूँ, जिसने मुझसे अपनी पिक्चर के कॉमेडी सीन लिखवाए थे। ये सीन उस मशहूर राइटर के नाम से ही फिल्म में आएंगे जो ये फिल्म लिख रहा है। ऑफिस बंद है। वापस बांदरा जाना है जो काफी दूर है। पैसे बस इतने हैं कि या तो बस का टिकट ले लूँ  या कुछ खा लूँ, मगर फिर पैदल वापस जाना पडेगा। चने खरीदकर जेब में भरता हूँ और पैदल सफर शुरू करता हूँ। कोहेनूर मिल्स के गेट के सामने से गुजरते हुए सोचता हूँ कि शायद सब बदल जाए लेकिन यह गेट तो रहेगा। एक दिन इसी के सामने से अपनी कार से गुजरूँगा।

     एक फिल्म में डॉयलॉग लिखने का काम मिला है। कुछ सीन लिखकर डायरेक्टर के घर जाता हूँ। वो बैठा नाश्ते में अनानास खा रहा है, सीन लेकर पढता है और सारे कागज मेरे मुँह पर फेंक देता है और फिल्म से निकालते हुए मुझे बताता है कि मैं जिंदगी में कभी राइटर नहीं बन सकता । तपती धूप में एक सडक पर चलते हुए मैं अपनी आँख के कोने में आया एक आँसू पोछता  हूँ और सोचता हूँ कि मैं एक दिन इस डायरेक्टर को दिखाउंगा कि मैं ……..फिर जाने   क्यों ख्याल आता है कि क्या ये डायरेक्टर नाश्ते में रोज अनानास खाता होगा।

 - जावेद अख्तर

(जारी…………. शेष अगली पोस्ट में…………..)


प्रस्तुति - सतीश पंचम


स्थान – वही, जिसके बारे में जावेद अख्तर जी ‘तरकश’ में लिखते हैं कि –


 इस शहर में जीने के अंदाज निराले हैं…….होठों पे लतीफे हैं आवाज में छाले हैं।


समय – वही, जब जावेद साहब सोच रहे हों कि……… एक दिन इसी कोहेनूर गेट के सामने से अपनी कार लेकर गुजरूँगा और तभी गेट चरचराता हुआ खुद ब खुद खुल जाय।


 लेकिन नहीं,  गेट इतनी आसानी से नहीं खुलते..........जावेद अख्तर जी ने अपनी लेखनी के जादू से कैसे अपने किस्मत का गेट खोला, कैसे वह फिल्म- लेखन के एक के बाद एक नये प्रतिमान स्थापित करते गये,  इस पर बाकी बातें अगली पोस्ट में। 

Friday, April 2, 2010

देसी मोरनी की शादी विदेशी मुर्गे से तय क्या हुई कुकड खाँ 'हुल्ल' की ट्रैक टू डिप्लोमेसी परवान चढने लगी है........सतीश पंचम

          इधर  मोरनी की शादी एक विदेशी मुर्गे से तय होते ही दोनों पक्षों में गजब की खदबदाहट चल रही है।  मुर्गा पक्ष के लोग खुश हैं कि इसी बहाने हम मोरनी पा गये वहीं मोरनी पक्ष के लोग इसलिये खुश हैं कि उन्हें एक इंटरनेशनल कोलेबरेशन का हिस्सा बनने का मौका मिल रहा है। लेकिन मोर पक्ष के कुछ तथाकथित महान शुभचिंतकों का  कहना है कि हमारी बिरादरी के लोग क्या मर गये हैं जो मोरनी की शादी एक विदेशी मुर्गे से करवाई जा रही है। हम यह हरगिज नहीं होने देंगे। यह देश के स्वाभिमान का प्रश्न है। 

      आज जाकर पता चला कि देश का स्वाभिमान एक मोरनी की शादी वाले खूँटे से बंधा था और हम उसे महान वीरों, सपूतो और कर्णधारों  के आस पास ढूँढ रहे थे। स्वाभिमान मिले तो कैसे।

     
    उधर मुर्गा पक्ष के लोग मोरनी से शादी तय होने की बात पर ऐसे उछल रहे हैं मानों जग जीत लिया हो। उन्हें पहले तो विश्वास ही नहीं हो रहा कि उनका फाजिल मुर्गा कभी किसी मोरनी को भी फांस सकता है। मुर्गे के चचा कुकड खाँ ‘हुल्ल’ का कहना था कि जिस दिन मेरे मुर्गे का मोरनी से निकाह हुआ, उस दिन मैं मारे खुशफहमी के बांग देना ही भूल गया। इस चक्कर में कुछ कौवे जो कि बर्फ पिघलने के बाद एकदम तडके ही बार्डर क्रास करने वाले थे, वह लोग मेरी बांग न देने के कारण उठ नहीं पाये और उजाला हो गया। दो कौवे तो मोरनी के गाँव वालों के हत्थे चढ गये।
  
     बचे हुए कौवे वापस आ कर उसी इलाके में फिर छुप-छुपा गये। थोडी देर में जब मैं वहां से गुजरा तो एक ने मुझ पर अपनी  चप्पल फेंक दी। बताओ यह भी कोई बात हुई। अरे मुझे क्या पता था कि कश्मीर की एक हजार साला जंग मेरी बांग के भरोसे लडी जा रही है।  बांग न हुआ बिगुल हो गया……..
   
    कुकड खाँ ‘हुल्ल’ की बातें सुन पडोस में रहने वाली कुकडी बेगम ‘सिटका’ बोल पडीं – अरे तुम बांग देने की बात करते हो, मैं तो उस दिन मारे खुशफहमी के अंडा देना ही भूल गई। जब याद आई,  तो मैं चल पडी अपने दडबे में अंडा देने……जाकर क्या देखती हूँ मेरे मिंयां अपने पिछवाडे पर झाडू फैलाकर बांध रहे हैं। बताओ, इसके आगे भी कोई खुशफैल हो सकता है भला।
   
      बहुत देर से चुप बैठा मुर्गा ‘मशकी’ खाँ भी बहस में शामिल होते हुए बोला – लेकिन एक बात है बेगम ‘सिटका’। मोरनी जब ब्याह कर आएगी तो अपनी आदत के मुताबिक पंख फैला कर नाचेगी जरूर। और किसीका पंख उठाकर नाचना हम लोगों की बिरादरी में ठीक नहीं माना जाता। पैर का ज्यादातर हिस्सा दिखता है। तुम क्या कहती हो इस बारे में।
     
     कुकडी बेगम ‘सिटका’ को मशकी मुर्गे की बात से कुछ खटका हुआ। समझ गईं कि जब मोरनी मुर्गा मोहल्ले में आकर पंख उठाकर नाचना शुरू करेगी तो सारा बदन दिखेगा। ऐसे में लश्कर-ए-कौवा तो उसकी जान लेने पर तुल जाएंगा।
   
     उधर मोरनी ने अपने मुहल्ले में विवाह का विरोध करने वालों के लिये सांत्वना देने वाला बयान दिया कि वह भले ही विदेशी मुर्गे से ब्याही जा रही है, लेकिन जब बारिश का मौसम आएगा तो वह जरूर अपने मोर प्रजाति का प्रतिनिधित्व करेगी और पंख उठाकर नाचेगी। मोरनी की इस बात पर कई लोगों को विश्वास नहीं हो रहा था। उनका कहना था कि यह कैसे हो सकता है। जब बारिश आती है तो मुर्गे हमेशा अपने दडबों में रहते हैं और मोरनी बारिश में नाचती है। यह विपरीत ध्रुवों का मिलन है। नहीं, यह शादी नहीं हो सकती।  इसमें जरूर कोई अंतरर्राष्ट्रीय साजिश है।
    
      उधर कई और लोग थे जोकि मोरनी के इस विवाह से कुछ ज्यादा ही आहत महसूस कर रहे थे।  मोरनी के पोस्टर वगैरह बनाकर उसे जला रहे थे। उनका कहना था कि क्या हमारे मुहल्ले के लोग मर गये हैं जो मुर्गे और कौवों से यारी गाँठी जा रही है।  और हमने तो यह तक सुना है कि मुर्गा पहले से ही शादीशुदा है।  हम यह शादी नहीं होने देंगे। यह रवायत के खिलाफ है।  
      
     अभी यह सब नाटक चल ही रहा था कि तब तक दोनों ओर से वीजा के आवेदन आने शुरू हो गये। मोर मुहल्ला और मुर्गमोहल्ला के बीच वीजा लेन वाले लोगों की संख्या बढ जाने से शामियाने तान कर सरकारी अफसर दिन रात इसी काम में लगे थे कि सबको समय पर वीजा मिल जाय। उन अफसरों के  हिसाब से यह दोस्ती की एक ट्रैक टू डिप्लोमैसी है जिसे दोनों मुल्कों के बीच खुशहाली और अमन के लिये बिछाया जा रहा है। और वैसे भी शादियों में जब तक कोई रूठे ना, कोई मनाए ना, तब तक वह शादी अधूरी अधूरी सी लगती है। आखिर यह विरोध करने वाले तो उसी रस्म की अदायगी कर रहे हैं। 

     इधर मोरनी और मुर्गा आपस में गीत गाए जा रहे थे -

अब चाहे सर फूटे या माथा मैने तेरी बांह पकड ली
अब चाहे घर छूटे या सखियां
अब चाहे रब रूठे या दुनिया यारा मैंने तो हां कर दी……

- सतीश पंचम

 स्थान – वही, जहाँ असल मोरनी देखने के लिये चिडियाघर जाना पडता है।

समय – वही, जब बर्फ पिघलने के कारण कौवे बार्डर क्रॉस करने को हों और कौवों का सरगना कहे …… अपन तो रह गये कौवे के कौवे,  मोरनी को तो मुर्गा ले उडा और हम साले रॉ और ISI मार्क रॉकेट लांचर कंधे पर रख   बर्फ पिघलवा रहे हैं............थू है ऐसी जिंदगी पर  :)




फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'
A Photo from - Thoughts of a Lens

ढूँढ ढाँढ (Search)

© इस ब्लॉग की सभी पोस्टें, कुछ छायाचित्र सतीश पंचम की सम्पत्ति है और बिना पूर्व स्वीकृति के उसका पुन: प्रयोग या कॉपी करना वर्जित है। फिर भी; उपयुक्त ब्लॉग/ब्लॉग पोस्ट को हापइर लिंक/लिंक देते हुये छोटे संदर्भ किये जा सकते हैं।




© All posts, some of the pictures, appearing on this blog is property of Satish Pancham and must not be reproduced or copied without his prior approval. Small references may however be made giving appropriate hyperlinks/links to the blog/blog post.