सफेद घर में आपका स्वागत है।

Wednesday, March 31, 2010

गिलकारी और उरियानी.......सतीश पंचम

गिलकारी


जमीं पर हो रहे
तमाम बहस मुबाहसों
तमाम तकरीरों,
तमाम तहरीरों का है ये असर
कि
आसमां के पलस्तर अब झडने लगे हैं
गिलकार* से कहो
हाथ आसमां पर दुबारा फिरा दे।



गिलकार* – छतों / दीवारों पर प्लास्टर करने वाला

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हमलिबास


उनकी उरियानी* पर
जब हमने कुछ कहना चाहा
वो हमसे ही कहने लगे,
अमां बडे यावागो* हो
फतूही* पहन हमसे गूफ्तगू करना चाहते हो
बात तो तब है
जब हमलिबास होकर बतियाओ।


उरियानी* – नग्नता, विवस्त्रता
यावागो* – उटपटांग बातें करने वाला
फतूही* – बिना आस्तीन की एक किस्म की कुरती / सदरी


- सतीश पंचम

स्थान – वही, जहां का आसमान वहां की बिल्डिंगो की उंचाई और झोपडों की नीचाई के कारण खुरदरा सा लगता है ।

समय – वही, जब अपनी उरियानी से तंग आकर एक फिल्म अभिनेत्री कपडे की मिल में अपने लिये कुछ ढंग के कपडे तलाशने पहुँची और उसे देखते ही मिल का भोंपू खुदबखुद बज उठा.......अब मिल कुछ समय और चले शायद :)

Wednesday, March 24, 2010

चहबच्ची......इसराफील........और मैं ..............सतीश पंचम



चहबच्ची                                  

वो चहबच्ची अब कहां से खोद लाउं
छिपाये जिसमें थे दिन अमनों- सूकून के
अब तो वह जमीन भी बंट चुकी है
नपी है चहबच्ची भी जमकर जरीब से


**चहबच्ची = जमीन में गड्ढा खोद कर उसमें कुछ छिपाने वाली जगह

**जरीब =  जमीन की पैमाईश हेतु  लोहे की जंजीर

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इसराफील 



सुना है मैंने
कि कयामत के दिन इसराफील इक बिगुल बजायेगा
उफ्
तुम  ये शोख अदाएं लिये क्यूँ चली आईं मेरे करीब
वो देखो
बिगुल बजने लगा है


** इसराफील = इस्लामी मान्यताओं के अनुसार इसराफील ( ईश्वरीय चरित्र ) कयामत वाले दिन एक बिगुल बजायेगा।

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 ( 'चहबच्ची' वाली लाईनें भारत पाक बंटवारे पर बनी फिल्म पिंजर देखने के बाद लिखीं थी। बहुत अच्छी लगी थी पिंजर।  'इसराफील' की  यह चंद पंक्तिया मैंने अपने कॉलेजीय जीवनकाल में लिखी थी, आज सोचा अपने चंद उर्दू आशार (देवनागरी में ही)  आप सबके सामने पेश करूँ :)


- सतीश पंचम

स्थान - वही, जहां कंक्रीट बिछने के कारण चहबच्ची नहीं खोद सकते।


समय - वही, जब इसराफील कयामत के आने का संदेश देता बिगुल बजाने को हो और उसी वक्त ईश्वर कहे, ठहरो...... कोई और भी आ रहा है, कयामत उसके बाद आएगी :)

Saturday, March 20, 2010

हरा लिहाफ ओढे हुए मेरा यह तुलसी-बिरवा और कच्ची जमीन को छूती मेरी आराधना.........सतीश पंचम

     मेरे घर में काफी  पुराना तुलसी का पौधा सूख जाने पर,  पिछले दिनों हमने तुलसी का एक नया पौधा लगाया। यह पौधा एक फेरीवाले से लिया गया था जो कि अक्सर मेरी बिल्डिंग में अपने सिर पर फूल-पौधों के छोटे छोटे पौधे एक टोकरी में रख कर बेचने आता था। जब यह तुलसी का पौधा लिया गया, तो उसी प्लास्टिक के पन्नी में ही तुलसी के पौधे के साथ  दो और छोटे तुलसी के पौधे संलग्न थे। एक साथ तीन तुलसी के पौधे सस्ते दामों में जान हमने खरीद लिये। बडे प्यार से बच्चों ने मिट्टी आदि का जुगाड कर गमले में उन पौधों को लगा दिया।

         इधर रोज सुबह पूजा करने के बाद ताम्र पात्र में रखे जल को उसी गमले में अर्पण कर दिया जाता  जिसमें कि तुलसी के पौधे लगे हुए थे। एक दिन बीता दो दिन बीता। तीसरे या चौथे दिन देखा गया कि तुलसी का मुख्य पौधा मुरझाया हुआ है । समझ में नहीं आया कि आखिर क्या बात हो गई। पांचवे दिन तो पौधे का पता ही नहीं चल रहा था कि यहां पौधा था भी या नहीं। लेकिन संतोष इसी बात का था कि बाकी के दो पौधे सही सलामत थे।
 
        दिन बीतते गये। रोज सुबह गमलों में ईश्वर को जल अर्पण किया जाता। पौधे बडे होते गये।  एक दिन मैने ध्यान दिया कि यह पौधे दिख भले तुलसी जैसे रहे हैं लेकिन इनमें तुलसी के पौधों सी गंध नहीं है। आजमाने के लिये पौधे का एक पत्ता तोड कर उसे सूंघा…….लगा कि जैसे मैं इस गंध से पहले भी कभी वाकिफ हो चुका हूँ लेकिन याद नहीं आ रहा था कि कहां। तभी याद आया कि  गाँव में जब हरी-हरी चरी या मक्के के डंठलों को चारा काटने वाली मशीन में डाला जाता है तो कटे चारे से एक विशेष प्रकार की घसियही गंध निकलती है, ठीक वैसी ही गंध इस पौधे की भी थी।
 
       अब इसमें कोई शंका न रही कि यह तुलसी के पौधे नहीं है।  अब, क्या किया जाय। जो तुलसी का पौधा था वह तो कब का साथ छोड गया। अब इन पौधों का क्या किया जाय। फेरीवाला भी पिछले कई दिनों से नहीं आ रहा था, कि उससे तुलसी का एक और पौधा खरीदा जाय। इधर गमले में लगे दोनों पौधे बडे होते जा रहे थे। उनमें  छोटी छोटी सफेद कलगी सी निकल रही थी। घर में पूजा पात्र में रखा जल और कहां अर्पण किया जाता। यहां मुंबई में  गाँव सरीखा तो खुला और कच्चा स्थान है नहीं कि जाकर कहीं धरती पर ही सूरज की ओर मुंह कर जल  अर्पण कर  दिया जाय। ले दे कर यह गमला ही था जिसमें कि ये दोनों पौधे आपस में हंसते खेलते बडे हो रहे थे।   इधर ईश्वर के नाम  अर्पित जल ने न जाने क्या असर दिखाना शुरू किया कि उन पौधों में काँटे निकलने शुरू हो गये।

                        तुलसी का नया पौधा न होने की जिस मजबूरी के तहत इन पौधों को रोज जल चढाया जा रहा था उसमें से काँटे निकलने शुरू होने पर स्वाभाविक था कि श्रीमती जी चिंतित हो । सो कहीं से भी नया पौधा लाने के लिये कहा गया। इधर मुझे अलग से एक  तुलसी का पौधा खरीदने के लिये जाना अपने आप में अजीब लग रहा था। सो टालता  रहा …..टालता  रहा । वैसे भी यह कांटेदार पौधे कोई नुकसान तो कर नहीं रहे थे। बल्कि हरियाली का एक छोटा सा कोना घर में  समेटे हुए थे।

        आज फुरसत में इन पौधों को देख रहा था और साथ ही साथ सोच भी रहा था कि इन नन्हे पौधों को तो ईश्वर के नाम पर अर्पित किये जाने वाले जल से सींचा गया है ,  इतने पर भी ये काँटेदार निकल गये। वैसे भी दोष इन पौधों का नहीं है, काँटेदार होना तो इन पौधों की प्रकृति ही है, उसमें भला बदलाव कैसे किया जा सकता था। दोषी तो मेरी उम्मीदें थीं जो कि काँटेदार पौधों से अलग किस्म के होने की उम्मीद लगाये बैठी थीं । कबीर का कहना कि - बोये पेड बबूल का तो आम कहां से पाय वाली उक्ति शायद ऐसे ही वक्त के लिये कही गई है।
  
      खैर, संतोष इसी बात का है कि यही वे काँटेदार पौधे थे जिन्होंने  ईश्वर के लिये रखे जल को नाले आदि में बहने से बचाया था और    ईश्वरोपासना का माध्यम बने थे। यही कार्य तुलसी भी करती थी। वह भी ईश्वरीय आराधना का माध्यम बन जल स्वीकार करती थी,  वह भी जल को नाले आदि में बहाने से बचाने का माध्यम बनती थी।
    
     अब,

 आज सोच रहा हूँ कि तुलसी का नया पौधा लाउं या रहने दूँ।  बिना तुलसी के भी काम तो चल ही रहा है। एक अलग किस्म के पौधों को जिलाने का सूकून मिल रहा है। हरियाली का एक कोना बना ही हुआ है। वैसे भी हम शहरी बालकनी में एक गमला रख उसमें बाग बगीचे को ताक लेते हैं ।
    
   फेरीवाले अभी कुछ दिन और न आना……..देखना चाहता हूँ कि यह काँटेदार पौधों की भक्ति मेरे ईश्वर को चुभती है या नहीं  :)

- सतीश पंचम
 


  

    

Thursday, March 11, 2010

महिला आरक्षण की वजह से पनपेंगे इमोशनल अत्याचार


        मुझे लगता है कि महिला आरक्षण से ऐसे नेताओं की मुसीबत बढने वाली है जिनके घर में राजनीतिक आकांक्षाएं लिये कई कई महिलाएं होंगी…कोई देवरानी होगी, कोई जेठानी होगी, कोई ननद होगी। पहले जब तक पुरूषों को ही लडना होता था तो ठीक था, लेकिन जब महिलाओं के लिये सीटें आरक्षित हो जाएंगी तो …अब सब सोचेंगी कि मैं क्यों नहीं इस सीट पर लडूं।
    घर में एक दूसरे के बाल पकड झोटउवल न कर लें, कपार, माथा न फोड लें इसी डर से शायद नेता आने वाली मुसीबतों को टाल रहे होंगे।
     खैर, आम जनता तो वैसे भी कहां इस आरक्षण का लाभ उठाएगी….चाहे उसके घर में एक महिला हो या दस….उसे तो अपने कपडे लत्ते, दवा दारू, इस्कुलीया – कलेजहा से फुरसत मिले तब न वह इन पचडों में पडे।
      मैं महिला आरक्षण का स्वागत करता हूँ। उन नेताओं के लिये प्रार्थना करता हूँ कि ईश्वर उन्हें महिला आरक्षण की वजह से होने वाले इमोशनल अत्याचारों से जूझने की असीम शक्ति देगा,….. और ऐसे भी कुछ नेता जोकि अब तक यहां वहां मुंह मारते होंगे अब संभल जाएंगे कि कहीं दूसरी वाली के मन में चुनाव लडने की भावना न उग आए :)
Update  :  मुझे तो जहां तक लग रहा है कि जल्द ही चतुर राजनेता अपने लिये एक सेफ पैसेज के तौर पर ‘इलेक्टोरल स्टेपनी’ रखना शुरू कर सकते हैं। जो भी सीट महिला रिजर्वेशन में जा रही हो, उस इलाके में पहले से ही एक महिला के रूप में ‘Electoral Stepney'  ढूँढ कर रख लेंगे और अपनी श्रीमती जी को भी भरमाएं रहेंगे कि – सजनी तोरे खातिर.....
 फिलहाल तो  यह 'Political Stepney' या ‘Electoral Stepney'  का फंडा कब अपना रंग दिखा दे, कुछ कहा नहीं जा सकता।

- Satish Pancham
 

Saturday, March 6, 2010

हिरन, चाँद, सूरज, तारे आदि के निशान उकेरे गये पत्थरों के कोल्हू....कहीं आपके गाँव में भी तो नहीं हैं .....सतीश पंचम

           मैंने अपने गाँव में बडे बडे आकार के गोल पत्थरों वाले कोल्हू देखे हैं। उन पर इंसानों, जानवरों, चाँद, सितारों, हिरन आदि की आकृतियां बनी हैं। मैं  हैरान होता हूँ कि इसे कैसे बनाया जाता होगा, सडक, परिवहन के अभाव में इसे कैसे गाँव में ढो कर लाया जाता होगा। क्या यह किसी की व्यक्तिगत सपंत्ति होती थी या पूरे गाँव की ? यही सब प्रश्न मेरे मन में इन पत्थरों को देख कर उठते थे।
 
               गाँव में किसी से पूछने पर बस इतना पता चलता था कि इनसे गन्ने की पेराई होती है। इसका इतिहास, भूगोल कुछ पता न था किसी को। लेकिन हाल ही में मैंने विवेकी राय जी की लिखी एक किताब कालातीत को पढते हुए इसके एक लेख में इन कोल्हुओं के बारे में कुछ जानकारी पाई है। सीवान का कोल्हू नामक इस लेख में विवेकी राय जी लिखते हैं कि -

          पथरीया माने कोल्हू।…..पुराने जमाने में आज से सौ पचास वर्ष पहले इन्हीं पत्थर के भारी भरकम कोल्हूओं से ईख पेरने का काम लिया जाता था। गाँवों में ये यत्र तत्र बिखरी बेकार पडी रहती हैं। खुरपा-गँडासा रगडकर तेज करते हैं लोग। चरवाहे बैठकर भैंस चराते हैं। लडके खेलते हैं। कोई नाच तमाशा हुआ तो उस पर बैठकर देखते हैं। जो जहां पडी हैं बस वहीं पडी हैं। कौन उन्हें इधर उधर करे।

     कोल्हूओं के गांव में लाने योग्य परिवहन के बारे में विवेकी राय लिखते हैं कि लोग हाथोंहाथ उठाकर एक गाँव से दूसरे गाँव करते डगरा लाते थे। कहीं पहाड से आती थीं यह बनकर।
  
     आगे विवेकी राय जी लिखते हैं कि जिन लोगों को पथरीया की जरूरत होती थी वे पहाड पर जाकर उसे गढवाते थे। और ऐसा भाईचारा था लोगों के बीच कि एक गाँव से दूसरे गाँव तक लोग ढकेल कर पहुँचा देते थे। जिस गाँव में पथरीया पहुँच जाती थी उस गाँव के लोगों की जिम्मेदारी हो जाती थी कि ढकेल कर अगले गाँव में पहुँचा दें। किसी का कोल्हू गाँव में रह जाना पूरे गाँव के लिये लज्जा की बात मानी जाती थी।
 
               इन पथरियों पर पहचान के लिये सूरज, चाँद, हिरन  आदि की आकृतियां बनी होती थीं। अब हर समय तो कोई इतने लंबे समय तक इन कोल्हूओं के साथ नहीं चल सकता था। सो एक गाँव से दूसरे गाँव, दूसरे से तीसरे……निशान के आधार पर कोल्हू सरका दिया जाता था। जिसका कोल्हू गाँव में पहुँचता था, वह इन निशानों को देख कर उसे ले लेता था।
      
         वैसे, बदलते समय के साथ, लोगों में आये दुराव के साथ एक मुहावरा भी बना है – ‘सीवान का कोल्हू होना’ -    माने ऐसा काम जिसमें सब लोग पूरी तरह सहयोग नहीं करते। किसी सामूहिक काम में जब कोई आधे मन से बल लगाता दिखता है तो कहा जाता है कि क्या सीवान ( गाँव) का कोल्हू टारने ( हटाने) आए हो।
फिलहाल तो यह चित्र मेरे ही गाँव के हैं जहां पर कि ये कोल्हू यूँ ही पडे हैं। इन पर कपडे सूखाये जाते हैं। इन पर बच्चे खेलते हैं तो कभी कभी इन पर खुरपा-गंडासा भी तेज किया जाता है।

- सतीश पंचम

स्थान – वही, जहां की चाय  ‘पेशल….मलाई मारके’ नाम से जानी जाती है।

समय- वही, जब पत्थर के कोल्हूओं को गाँव वाले सरकाते समय जोर लगाके……हईश्या बोलते हैं और बगल के ही किसी रेडियो पर गीत बजता है –   गीत गाया पत्थरों ने…….

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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