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Saturday, February 27, 2010

1411: गुलजार के लिखे 'दिल तो बच्चा है' वाला गीत सुन कर जब एक बाघ को बीडी जलाने की इच्छा होने लगे तो........सतीश पंचम


और भई बाघ, इस खडखडीया दोपहरी में कहां मारे मारे फिर रहे हो ?
गुलजार जी को ही ढूँढ रहा हूँ।
 
क्यों, तुम गुलजार को क्यों ढूँढ रहे हो भई।

उन्हें ढूँढ रहा हूँ क्योंकि वही हैं जो कि हमारे बाघों के  मन की बात पढ लेते हैं और न सिर्फ पढ लेते हैं बल्कि गीत भी लिखते हैं।

गुलजार तुम बाघों के मन की बात पढ लेते हैं। विश्वास नहीं होता यार। वह शहर के रहवइया, तुम जंगल के…….कहां मेल है आप लोगों के बीच।

    वह मैं नहीं जानता कि गुलजार हम बाघों की बात कैसे समझ लेते हैं लेकिन समझते हैं खूब इतना पता है, तभी तो हम लोगों से संबंधित दिल तो बच्चा है जैसा गीत लिखते हैं।

क्या – दिल तो बच्चा है वाला गीत बाघों से संबंधित है ?

हां और क्या।

कैसे ?

वो ऐसे कि गुलजार जी लिखते हैं -

ऐसी उलझी हैं नजरें कि हटती नहीं
रेशमी डोर दांतों से कटती नहीं

मतलब -

   मतलब ये कि अब हम बाघ लोग संख्या में इतने कम हो गये हैं कि बडी बडी कंपनीयां अपने प्रॉडक्ट की डायरेक्ट मार्केटिंग छोड, बाघों की संख्या पर लोगों को उलझाये हुए हैं। जहां देखो वहां बडे बडे बैनरों पर हमें दिखाया जा रहा है कि हम सिर्फ 1411 बचे हैं। बाघ बचाओ, बाघ बचाओ।  उधर हालत ये है कि  वन विभाग और शिकारीयों के बीच रिश्वत की रेशमी डोर दिन ब दिन मजबूत होती जा रही है। इसे कौन काटे। कौन से दांत लाउं कि यह रेशमी डोर कटे।  यदि सिर्फ यह रेशमी डोर भर कट जाय तो हमारी संख्या बढ जाय।

       हां, बात तो सच है। ये रिश्वत और काहिली की रेशमी डोर ही है जो वन विभाग और शिकारीयों को जोडे हुए है। सही कहा है गुलजार ने आगे क्या कहा है बाघों के बारे में …….

गुलजार जी आगे लिखते हैं कि -

उम्र कब की बरस के सुफेद हो गई 
कारी बदरी जवानी की छंटती नहीं
चेहरे की रंगत   उडने लगी है
खाओगे धोखे इस उम्र में आकर
डर लगता है तनहा सोने में जी……
दिल तो बच्चा है जी

मैंने पूछा -   इसका क्या  मतलब हुआ ?

मतलब ये कि हम लोगों की संख्या इतनी कम हो गई है कि हम अपनी तमाम उम्र बीताते हुए बूढे हो जाते हैं लेकिन अपनी बाघिन के साथ संबंध बनाने में असफल रहते हैं। जवानी की कारी बदरी बुढापे में भी हम पर छाई रहती है।  

लेकिन बाघिन के साथ तुम लोग संबंध क्यों नहीं बना पाते हो।

वो इसलिये कि हमारे समाज में भी इंसानों की कुछ बुराईयां घर कर गई हैं। हमारे यहां भी बाघ की संख्या के मुकाबले बाघिन की संख्या कम होती जा रही है। सेक्स रेशियो में हेर फेर हो रहा है। दो बाघ में एक बाघिन……अब तुम ही बताओ कैसे गुजर हो।

हाँ ये बात तो है, ऐसे में गुजर होना तो मुश्किल ही है।

अब इस उम्र में, अपने चेहरे की उडी रंगत लिये जब भी जंगल में किसी बाघिन को देख उससे संबंध बनाने जाते भी हैं तो पता चलता है उसे शिकारियों ने हमें धोखा देने के लिये रख छोडा है। बाघिन हमें झांसा देते हुए शिकारियों के इलाके तक ले जाती है और वहीं हम धर लिये जाते हैं। और तब हम खुद से ही कह उठते हैं कि अपने दिल पर हमें काबू रखना चाहिये था। ये दिल तो बच्चे की तरह है, किसी पर भी आ सकता है…..तभी तो गुलजार साहब ने दिल तो बच्चा है वाले गीत में शिकारीयों और उनके द्वारा तैयार बाघिन के प्रेम जाल से सावधान करते हुए लिखा है कि -

दिल धडकता है तो ऐसे लगता है वो
आ रहा है यहीं देखता ना हो वोह
प्रेम की मारे कटार रे……

वाह, गुलजार ने तो बिल्कुल आप लोगों के लिये ही यह गीत लिखा है। सच में। लेकिन ये बताओ कि तुम गुलजार से मिलकर कहोगे क्या।

यही, कि एक और गीत बाघ समाज को डेडिकेट करते हुए लिखें -


हम तुम एक पिंजरे में बंद हों
और पब्लिक हट जाय
बाघों  की घटती संख्या में,
और दो चार नंबर जुड जाय

धीरे धीरे ही सही पुरवैया में
हमरी भी बीडी जल जाय
रेशमी डोर दांतों से कटे ना कटे
बीडी से तो आखिर वो जल जाय

बाघों  की घटती संख्या में,
और दो चार नंबर जुड जाय
बाघों  की घटती संख्या में,
और दो चार नंबर जुड जाय

   अभी मैं बाघ के गीत सुन ही रहा था कि मोबाईल बज उठा। अरे……. लगता है ज्यादा देर सो गया था। और ये क्या सपना देख रहा था…..जंगल…….बंदूक……. बाघ…….. बीडी….उफफ्………

हलो, हां यार आ रहा हूँ, बस आँख लग गई थी।

   क्या…………बाघों की संख्या पर सेमिनार हो रहा है। अच्छा, चलो आता हूँ तो बात करते हैं। आँखें मलते हुए इधर मैं अपने चप्पलों को ढूँढने में लगा था जो कि सोने से पहले चारपाई के पास यहीं कहीं उतारे थे कि तभी एसएमएस आया – just 1411 left. Save Tigers.

    मैं तब से सोच में पड गया हूँ…..सोते में तो बाघ के लिये मैं चिंतित ही था……जागते हुए भी बाघों की चिंता करूँ…………….मेरे हाथ भगवान की ओर प्रार्थना करते खुद ब खुद जुड गये………. गुलजार जी के बीडी जलईलै वाले गीत को हकीकत में तब्दील कर दो भगवान नहीं तो न ये रेशमी डोर कटेगी और न मैं चैन से सो पाउंगा……..बीडी जलईलै जिगर से पिया, जिगर मां बडी आग है……जिगर मां बडी आग है………जय भोले भण्डारी………..………

- सतीश पंचम

चित्र : साभार इंटरनेट से

Saturday, February 20, 2010

चालीस साल बाद बडे परदे पर आराधना देखते हुए लोग अपने मोबाईल कैमरे से इन लम्हों को क्या कैद करते……लम्हों ने इन लोगों को खुद ब खुद कैद कर लिया....सतीश पंचम

     हाल ही में 1969 की फिल्म आराधना देखने मुंबई के रीगल सिनेमा हॉल में गया था। नॉस्टॉल्जिया पूरे शबाब पर था।आखिर चालीस साल बाद फिर वही फिल्म बडे पर्दे पर जो थी। रेडियो मिर्ची ने यह शो आयोजित किया था पुरानी जीन्स कार्यक्रम के तहत। आर जे अनमोल ने बेहद सधे अंदाज में शो शुरू होने से पहले एंट्री की। परदे के पीछे खडे हो जब अनमोल ने फिल्म आराधना के शुरू होने के लिये बताना शुरू किया तो बैकग्राउंड में आराधना फिल्म का टाईटल ट्रैक अपनी धुन बिखेर रहा था और लोग थे कि बस जैसे इस लम्हे को जी लेना चाहते थे, गूँथ लेना चाहते थे समय की इस माला में।

       फिल्म शुरू हुई उससे पहले अनमोल ने कहा कि चूंकि यह फिल्म 1969 यानि चालीस साल पुरानी है, लिहाजा अपना मोबाईल फोन बंद रखें ताकि हम उस समय की ओर लौट सकें जब मोबाईल फोन नहीं हुआ करता था, तब किसी ने नहीं सोचा था कि इस फिल्म में ही एक डॉयलॉग है जो उन्हें इस गुजारिश का मतलब समझायेगा।

     खैर फिल्म शुरू हुई। शर्मिला टैगोर को जेल में डाल देने वाला सीन है। खिडकी के बाहर धुआँ उठते दिखाया गया और फ्लैश बैक में फिल्म चलने लगी। पहाडी सडक का सीन शुरू हुआ, एक जीप आती दिखाई दी, बल खाती मनोरम पहाडीयों के बीच  सांप सी सरकती रेल दिखी, और अपने पूरे रवानी के साथ माउथ ऑरगेन बजता एक गीत शुरू हुआ – मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू……बस इतना सुनना था कि  लोगों ने सीटियां बजानी शुरू की…….कुछ लोग पीछे की सीटें छोड आगे की चंद खाली सीटों में जा समाये…..कुछ लोग तालीयां बजाने लगे…….कुछ लोग मंत्र मुग्ध से टकटकी लगाये देखते रहे और कुछ लोग अपनी सुनहरी यादों में खो गये।

     पूरे गाने को मैं टकटकी लगाए देखता रहा।  सब जैसे  ठहर सा गया था। गीत खत्म होने पर लोग थोडे संयत हुए। अगला सीन दिखा जब शर्मिला टैगोर किसी से खफा हो उस पर बाल्टी भर पानी फेंकती हैं और वह पानी राजेश खन्ना पर जा गिरता है। बाल्टी लिये शर्मिला टैगोर को देख राजेश खन्ना कहते हैं – इस समय बाल्टी लिये हुए  मैं तुम्हारी गजब की तस्वीर खींचता लेकिन क्या करूं मेरे पास कैमरा नहीं है।

तब…..

     तब लगा कि हां, हम 1969 में सचमुच पहुंच गये हैं। लोग इस डॉयलॉग पर वाह वाह से कर उठे….और मैं सोच में पड गया कि वाकई  इस फिल्म का पूरा मजा लेना हो तो मोबाईल बंद रखना पडेगा। वरना आज कल तो हर मोबाईल में कैमरा है। और यह दिखा भी खूब। लोग इस लम्हे को अपने कैमरे में कैद करने के लिये उतावले से हो उठे। ढेरों मोबाईल निकल आए और लोगों ने बडे परदे को  अपने छोटे कैमरे में कैद करना शुरू किया।

 सीन बदला। अब राजेश खन्ना के कपडे जो कि गीले हो चुके थे उसे बदलने का दृश्य दिखाया जा रहा था। राजेश खन्ना से शर्मिला ने कहा कि तुम्हारे कपडे गीले हो गये हैं। उन्हें बदल डालो। मैं अभी प्रेस से सुखा कर देती हूं तो अगला सीन तो जैसे आज की फिल्मों पर चालीस साल पहले लिखा एक व्यंग्य सा लगा।

        राजेश खन्ना ने बनियान पहने होने के बावजूद लडकी के सामने शर्ट उतारना ठीक नहीं समझा और दूसरी ओर पीठ फेर कर  झिझकते हुए अपना शर्ट उतार कर दूसरी ओर मुंह करके खडी शर्मिला टैगोर के हाथों में दे दिया ।

    कहां हो सलमान…….कहां हो राखी सावंत…….और कहां हो मल्लिका ए सहरावत……….यह सिहरन, यह अदाएं…….यह शोख अदाएं……..अब इतिहास  तो हो ही गये हैं।

    खैर, फिल्म आगे बढती है। और शुरू होता है एक और गीत ……..


हेss हे
हे हे ..
हेहेहे हुँ हूँ
हु हुँ हूँ हुहूँ हुहूँ s s s

कोरा कागज था s s s ये मन मेरा ss
मेरा s s मेरा ss s
लिख दिया ना ssम उस पे तेरा ss
तेरा ss तेरा s s s...


मोबाईल कैमरे फिर हवा में लहराये।

  लोग मोबाईल कैमरे से इस लम्हे को कैद क्या करते……लम्हों ने इन लोगों को खुद ब खुद कैद कर लिया।

लम्हें आज लोगों को बांध रहे थे और लोग थे कि  खुशी खुशी बंधे जा रहे थे।

  गीत खत्म हुआ और लोग फिर उस दुनिया में लौट आए जहां से अभी उठे थे। मोबाईल कैमरे अंदर हो गये। कुर्सियों के हत्थों पर थिरकती उंगलियां थम सी गयीं। एक सहलाता नॉस्टॉल्जिया गुजर सा गया।

     मैं लोगों के अंधेरे में झांकते चेहरों को पढने की कोशिश कर रहा था। किसी पर अपने पसंदीदा हीरो को देखने का सुकून था तो किसी पर अपनी पसंदीदा अदाकारा शर्मिला टैगोर को यूं सामने पा लेने सा सुख। मैं रह रह कर शर्मिला जी के बालों में लगे फूलों को देख मुग्ध हो रहा था। कितनी खूबसूरती से सजाया गया था उन फूलों को। और कान में पहने हुए नीले रंग के झूमते बल खाते सुंदर बूंदों की लडी सा पहनावा….वाह…….।
  
     बगल में बैठी श्रीमती जी मेरी ओर देख थोडा मुस्करायीं तो समझ गया कि ये क्या देख कर मुस्करा रही हैं। साडी । बेहद खूबसूरत साडी में लिपटी शर्मिला  जी की साडी को देख कोई भी भारतीय परिधानों को पसंद करने वाली महिला शायद उसी तरह मुस्कराये जिस तरह मेरी श्रीमती जी मुस्करा रही थीं। हां ये अलग बात है कि उस तरह की साडी का नाप, जेब की नाप से बहुत बडा होता है।

    यह नॉस्टॉलिजिया पूरी फिल्म तक चलता रहा। एक के बाद एक मोहक गाने, एक के बाद एक सुंदर दृश्य। पूरी फिल्म जिंदगी की एक कैनवास सी लगी जिसे सुनहरे फ्रेम में मढ दिया गया हो। खूब छक कर इस फिल्म का मजा लिया। खूब रच कर फिल्म को महसूस किया, उसे अपनी यादों की कंदराओं में ढंक सा लिया।  संक्षेप में जनाब  अहमद वसी के इन शब्दों में कहूँ तो   -

पानी की तरह बह गयीं सदियां कभी -  कभी
अक्सर हुआ है यूँ भी कि लम्हा ठहर गया।
 
   आराधना देखते हुए यही एहसास हुआ। रेडियो मिर्ची और उनकी टीम को इस सार्थक कदम के  लिये मेरी ओर से बहुत बहुत धन्यवाद देना चाहूंगा और उम्मीद करूंगा कि इस तरह के प्रयास और भी जारी रहेंगे।

 - सतीश पंचम

Sunday, February 14, 2010

जैसे हमारे बरम बाबा, हरसूबाबा, डीह बाबा हैं , वैसे ही अंगरेज लोगन के बलटिहान बाबा ।कालेज के छोकरा-छोकरान तक उन्हें मानते हैं।

     आज सदरू भगत वैलेंटाईन डे मना रहे हैं। एक नई नीली रंग की पट्टेदार चढ्ढी, उस पर सेन्चुरी मिल वाली परमसुख छाप धोती, सफेद रंग का कुर्ता, एक नया अँगोछा कंधे पर रख यूँ चले, मानों समधियाने जा रहे हैं। धोती में नील इतना ज्यादा लगवा लिये थे कि लगता था बसपा का बैनर ही कहीं से झटक लाये हैं और वही पहन-ओढ कर निकले हैं। इधर रमदेई भी आज पूरे फॉर्म में थी। नई-नई साडी को बिना एक बार भी पहने धो-कचार कर धूप में सूखा रही थी, जानती थी नई साडी एक-दो बार धोने से कपडे का बल टूटता है और पहनने में नरमाहट बनी रहती है।

        बगल वाली जलेबी फुआ ने टोक भी दिया था, काहे नया लूगा को धो रही हो, पहन लो एसे ही....लगेगा बियाह वाली साडी है। चलोगी तो लूगा खसर-खसर बोलेगा सो अलग। तो जानते हैं रमदेई ने क्या कहा - अरे नई साडी खसर-खसर बोलती है इसिलिये तो धो-कचार कर धोती का खसरपन कम कर रही हूँ। मैं तो नहीं पहनती लेकिन मेरे बुढउ मानें तब न। बोल रहे थे हम लोग बलटिहान बाबा को मनायेंगे।

बलटिहान बाबा ? वो कहाँ के बाबा है ? जलेबी फुआ ने अचरज से पूछा।

अरे जैसे हमारे बरम बाबा, हरसूबाबा, डीह बाबा हैं न, वैसे ही अंगरेज लोगन के बलटिहान बाबा ।

अच्छा, तो उनके लिये ही पूडी- कढाई चढाने की तैयारी हो रही है ।

हाँ, वह सब तो करना ही पडेगा। कढाही चढेगी, परसाद बंटेगा। बाकी सब भी काज-करम होगा। अब तो देखो बलटिहान बाबा कहाँ तक पार लगाते हैं।

सब पार हो जायेगा बहिनियाराम, सब पार हो जायेगा। बस बलटिहान बाबा पर भरोसा रखो।
   
           रमदेई और जलेबी फुआ की बातें चल ही रही थीं कि सदरू भगत टहकते-लहकते आँगन में आ पहुँचे। देखा जलेबी फुआ पहले ही से बैठी हैं। रमदेई अलग कपडों को उपर-नीचे अलट-पलट कर सुखा रही है, ताकि कपडे जल्दी सूख जायें। एक गठरी में सिधा-पिसान बाँधा जा रहा है ताकि पूडी-उडी का इंतजाम हो, कढाई चढे। थोडे पुआल भी लिये जा रहे हैं ताकि आग जलाकर कढाई देने में आसानी हो। थोडी देर के लिये सदरू भगत को लगा कि औरतें न हों तो तर-त्यौहार का पता ही न चले। वो तो चार औरतें मिल बैठ कर बोल-बतिया लेती हैं, थोडी लेनी-देनी कर लेती हैं तो पता चलता है कि कोई त्यौहार है। एसे समय बच्चों की कचर-पचर अलग चल रही होती है। किसी का पाजामे का नाडा नहीं खुल रहा तो किसी की सियन खुल गई है। इन्हीं सब बातों में सदरू भगत मगन थे कि बाहर पंडित केवडा प्रसाद की आवाज सुनाई पडी।

अरे भगत......अंदर ही हो क्या ?

   अरे पंडितजी। आइये- आइये। कहिये , कैसे आना हुआ। सदरू भगत आँगन से बाहर आते हुए बोले। आना क्या, बस जब से ये सुना कि तुम बलटिहान बाबा को कढाई चढाने जा रहे हो, हम तो दौडे चले आये। पानी भी नहीं पिया, पैर देख लो अभी भी धूल से अंटे पडे हैं।

       हाँ, कढाई चढा तो रहा हूँ। सुना है बहुत पहुँचे हुए बाबा हैं। बहुत पढे लिखे कालेज के छोकरा-छोकरान तक उन्हें मानते हैं।
 
   कालेज के छोकरा-छोकरान बाबा लोग को मानते हैं ? विसवास नहीं होता भगत। देखा नहीं था हरकिरत का लडका जो शहर में पढ रहा था, गाँव आया तो हम लोगों को पिछडा कह रहा था। कहता था कि क्यों पाथर को पूजते हो। कहीं पाथर पूजने से दुख दुर होते हैं। ये बाबा ओबा लोग कुछ नहीं होते बस बेकार के लोग होते हैं। और आज देखो, सब पढुआ-ठेलुआ लोग बलटिहान बाबा को एकदम मान ही नहीं रहे बल्कि उनके लिये मार भी खा रहे हैं। बदनामी झेल रहे हैं। हर जुलुम हँस कर झेल रहे हैं ।

सच कहते हो पंडितजी। मैं तो समझता हूँ कि जितना हम लोगों के देसी बाबा लोगन में शक्ति है, उससे कहीं ज्यादा विदेसी बाबा में शक्ति है। देखा नहीं, क्या बडे, क्या बूढे सब के सब बलटिहान बाबा को मान रहे हैं। सुना है वह एसे बाबा हैं कि उनके लिये गुलाबी रंग की चड्ढी का चढौवा लगता है।

अच्छा।

हां और क्या ? एसे वैसे बाबा थोडे न है।

लेकिन आज तक तो हम लोग अपने यहां चढावे में कोपीन अ लंगोट छोड कुछ चढाये ही नहीं हैं। लंगोट चढाते थे तो एक सिरा एक ओर बाँध देते थे और दूसरा दूसरी ओर। अब इ गुलाबी चड्ढी का चढावा कैसे चढेगा बाबा को।
बस वही मैं भी नहीं समझ पा रहा हूँ कि बलटिहान बाबा का चढौवा गुलाबी चड्ढी कैसे अर्पित किया जाता है, कैसे चढाया जाता है।

अभी यह चर्चा चल ही रही थी कि कुछ लोग भजन गाते हुए बगल से निकले -

बलटिहान बाबा, तेरो अजब है हाल
रे बाबा, तेरो अजब है हाल
मांगे न मोती, नाहीं हीरा
नाही मांगे गहना-गुरिया ,
मांगे चड्ढी-पुआल रे बाबा
तेरो अजब है हाल
रे बाबा......

- सतीश पंचम




 नोट:  सेंट वैलेंटाईन के लिये बलटिहान बाबा नाम ज्ञानदत्त जी द्वारा दिया हुआ है।  विशु्द्ध देशज नाम है। आशा है वैलेंटाईन के विरोधक इस बलटिहान बाबा नामकरण से तमाखू के साथ पिपरमिंट का स्वाद पाएंगे    :)

Saturday, February 13, 2010

मोर बाबू पढे अंगरेजी, तिलक काहे थोडा चढाया......विवेकी राय रचित एक विवाह प्रसंग पर हास्य फुहार लिये शानदार लेख.....सतीश पंचम

  

          छछलोल राय गाँव के एकमात्र दिखाउ वर थे। उनके पैर इतने बडे बडे कि दुकानों में उनके नाप के जूते नहीं मिलते। और सिर इतना बडा कि सिली सिलाई टोपी नहीं मिलती। बहुत दिनों तक उनके छोटे भाई की शादी इसलिये रोक कर रखी गई थी कि बडे की शादी हो जाने पर खटकने वाली बात पैदा हो जायगी। लेकिन छोटे की शादी के लिये इतना जोर पडा कि लोगों को लगा कि दोनों भाई अब साथ ही चौक पर बैठेंगे (विवाह करेंगे)।
 
     एक बहुत ही आतुर तिलकहरू सज्जन छछलोल राय को देखने आए। साक्षात्कार में संक्षिप्त प्रश्नोत्तर हुआ।
बबुआ, कुछ पढे लिखे हो ?

हाँ, कई दर्जा पास हैं।

तो जो बोलता हूं उसे लिखो तो।

मगर, पहले लिखवाई का नेग हाथ पर रख दो।

बिना लिखवाई लिये नहीं लिखोगे ?

नहीं।

     इसके बाद लिख लौढा, पढ पत्थर कह वह तिलकहरू हंस दिया। इस पर छछलोल राय पैजामें से बाहर हो गये। नाराज ओराज हुए। तिलकहरू चले गये तो छछलोल राय पर खूब मार पडी। महीनों भाग कर अपनी नानी के यहां रहे।

       इधर छछलोल राय के बालों को न  जाने क्या हो गया कि बेतहाशा सनकुट होने लगे। खिजाब वगैरह फेल होने लगा तो उसे छिपाने के लिये अब वे पहलवान हो गये। हर तीसरे दिन सिर मुँडवा देते हैं। अखाडे की धूल मिट्टी समस्त शरीर के साथ सिर की भी शोभा बढाती है। एक  काला धागा गले में बाँध लिये हैं। किसी दूसरे के यहाँ भी तिलकहरू आते हैं तो दौड-दौड कर चिलम भरते हैं और हुक्के में पानी बराबर बदलते रहते हैं।
  
     इस बार फिर से छछलोल राय की तिलक की तैयारी हुई। छछलोल राय चौके पर बैठे।बैंगनी रंग  का छींट वाला मुरैठा उनके सिर पर बाँध दिया गया। सिल्क का कुरता खूब जम रहा था। बहुत लजाते लजाते छछलोल राय ने अपने छोटे भाई विमल से शाम को ही धूप वाला चश्मा मांग लिया  था। मगर, उन्हें आँखों पर लगाने का  मौका नहीं मिला। उन्हें डर था कि तिलकहरू लोगों के चौके पर आकर बैठने से पूर्व यदि वे उसे लगायेंगे तो संभव है लोग डांट कर उतरवा दें। इसीलिये अभी तक वह पाकिट में पडा था। आज वह बहुत गंभीर बने थे। ओठों को बढा बढा कर बराबर दांतो को छिपा रहे थे।

          मण्डप में तिलकहरू लोग आ गये। मंगलम भगवान विष्णु गरूडध्वज: आदि मंत्र गूँज उठे। स्त्रियों ने मंगल  गीत गाना शुरू किया।  इस बीच छछलोल राय की आँखों पर कब काला चश्मा चढ गया, यह किसी ने नहीं देखा। शरीर के काले रंग को चश्मे की कालिमा ने और चोखा कर दिया।  अब उनकी आँखों का उल्लास तो ढक गया परन्तु दांतो का विज्ञापन सा होने लगा।

          जिस समय तिलक चढाने की क्रिया सम्पादित होने की बात आई उस समय सब लोग बहुत उत्सुक थे।  स्वंय छछलोल राय बहुत आल्हादित नजर आने लगे। उनके बडे बडे हाथ की बडी बडी उंगलियों ने कमाल किया। उनकी खुली अँजली ऐसी लग रही थी जैसे मोटे मोटे काले बेंत से बुनी हुई खाँची है। सो अब इस खाँची में भरा जाने लगा चावल, चन्दन, पान, सुपारी, गुड, फल, आदि- आदि। बर्तन और वस्त्र की बारी आई तो एक कांड हो गया।
  
      जहां पर मंगल कलश रखा था उसके उधर से एक चींटा गुड की गंध पाकर टहलता घूमता चला। जब वह गोबर के बने गौरी-गनेश तक आया तो छछलोल राय की आँखों से उसकी भिडन्त हुई। वह चींटा गौरी-गनेश के शिखर पर चढ गया और वहां से उतर कर इस ओर चला मानो कोई चीनी सैनिक उधर से आकर हिमालय पार कर इस ओर बढा आ रहा हो। इधर छछलोल राय की अँजलि में मंगल दृव्य भरा जा रहा था और उधर छछलोल राय की निगाह बराबर चींटे पर बनी हुई थी। चींटा आगे बढा और ठीक छछलोल राय के पैर के अँगूठे को निशान बना कर आगे बढा। वह इधर उधर भी   मुडता था लेकिन फिर अँगूठे की तरफ  ही आता रहा।
    
        छछलोल राय का सारा ध्यान चींटे पर केंन्द्रित हो गया। इधर मंगल गान, उधर मंत्रोच्चारण, उधर दृव्यदान और सैंकडो दर्शक। अगर यह चींटा काट लेगा तो क्या होगा। छछलोल राय की तो जान सांसत में पड गई। चींटा एकदम सरकता हुआ मस्ती में चुपचाप पैर के पास आ गया। छछलोल राय हडबडा कर खडे हो गये। खडे ही नहीं हो गये, दो कदम पीछे भी हट गये।
 
      भारी हडबडी मच गई। क्या है ? क्या है ?  गान बंद, मंत्र उच्चारण बन्द,    सब लोग हैरान हो गये। इधर घबराये छछलोल राय ने बडी कठिनाई से हाथ के ईशारे से बताया तो सब ने जाना कि इस नाचीज चींटे के कारण इतनी गडबडी हुई।
 
  जब सब शांत हो गया और फिर से तिलक की क्रिया आरंभ हुई  । ………… बर्तन भण्डा चढ गया तो स्त्रियों ने एक और गीत रस्मी तौर पर उठाया जिसमें इस बात की शिकायत जाहीर की गई कि सब बर्तन छोटे – छोटे चढा दिये गये। समधी को वादा न पूरा करने वाली रस्मी गाली दी गई। गीत सुनकर छछलोल राय के कान खडे हो गये। क्या सचमुच बर्तन छोटे छोटे चढा दिये गये हैं। तमाम गाँव भर की स्त्रियां यही गा रही हैं। उसे लगा कि उसकी बडी बेईज्जती हो रही है।

  तभी औरतों ने और एक नया गीत गाया  -

  ई मति जनिहो समधी
आंगन ई छोट बाडे
आंगन का मालिक बाबू दयाल राम,
तीलक लीहें नव लाख जी।
 
     उस समय रूपया चढाने की बात हो रही थी। छछलोल राय औरतों  का गीत सुनकर बहुत खुश हुए। सोचा कि अच्छे मौके पर औरतों ने चेता दिया है लडकीवालो को। कहीं कम न चढा दें।
 
   लडकी वालों की ओर से नोटों का एक बंडल निकाला गया। तिलक विलक जो चढा सो चढा, असल में अब तक छछलोल राय का विवाह नहीं हो पा रहा था सो कम चढे या ज्यादा..उठनी बाजार का सौदा था।   कुछ तू भी समझ कुछ मै भी वाला हिसाब था।  फिर छछलोल राय पार लग रहे थे, यही क्या कम था। सो रूपये कितने चढे इस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया।
 
    वह बंडल सामने बैठे लडकी के भाई ने हाथ में लेकर मंगलकलश और गौरी जी को छुलाने के बाद छछलोल राय जी के हाथ पर रख दिया। इधर महिला मंडली की ओर से इस अवसर पर गाया जाने वाला विख्यात गीत शुरू हो गया।

मोर बाबू पढे अंगरेजी,
तिलक काहे थोर जी।

   अर्थात, हमारा लडका अंगरेजी पढता है। इसका तिलक कम क्यों चढाया गया।

        इतना सुनना था कि छछलोल राय भडक उठे। तिलक चढाने की चोट कम परन्तु  अंगरेजी की पढाई की बात उन्हें बहुत खटकी। औरतें झूठ मूठ उनका नाम बढा रही हैं कि वे अंगरेजी पढते हैं, परन्तु , क्या जरूरी है कि जो अंग्रेजी पढेगा उसी को ज्यादा तिलक मिलेगा। अंग्रेजी में ही सुर्खाब का पर लगा है। मैं अंग्रेजी नहीं पढता हूँ तो क्या कोई मेरी ईज्जत बोर (डुबो) देगा। अंग्रेजी में पढाई नहीं है तो क्या हमारे पास खेत, बारी, बैल बछिया और गाय-भैंस नहीं हैं ?  अंग्रेजी वालों से किस बात में कम हैं हम। गिटपिट बोलने नहीं आता है इसलिये हमारा तिलक कम हो जायगा। यह हर्गिज नहीं हो सकेगा।
  
          एक बार फिर रूपया फेंकते हुए छछलोल राय भडक कर खडे हो गये। फिर हडबडी मच गयी। पीछे ही खडे थे छछलोल राय के बाप दयाल । दाँत पीस कर टूट पडे। थप्पडों घूसों की बौछार के बीच लोगों के घेरते-घेरते भी यह कहते छछलोल राय भाग निकले कि बाप रे बाप, यह नहीं जानता था कि तिलक पर आखिर में लात-मूका भी चढता है।

 - विवेकी राय



(   हाल ही में खबर  आई कि एक दूल्हे का विवाह इसलिये रूक गया क्योंकि वह भी बारातियों के साथ नाचने लगा था। यह खबर सुन मुझे विवेकी राय जी के लेख छछलोल राय का तिलकोत्सव की याद हो आई। इसलिये यह लेख विवेकी राय जी की किताब नई कोयल से साभार प्रस्तुत कर  रहा हूँ जिसमें कि दूल्हे पर जमकर कटाक्ष किया गया है जो कि अक्सर अपने को श्रेष्ट और लडकी वालों को हीन समझने की पिनक में रहते हैं।
- सतीश पंचम)

Saturday, February 6, 2010

ज्यादा धूप सेंकने से काम जीवन खुशहाल होता है वाली नई रीसर्च पर जनसंख्या और पर्यावरण मंत्रालय में जब ठन जाय :)

    जब से वैज्ञानिकों ने एक रीसर्च कर बताया है कि वाईग्रा से ज्यादा  सिर्फ धूप सेंकने से मनुष्य का काम जीवन खुशहाल रहता है तब से सडक पर तंबू गाड कर शिलाजीत बेचने वाले धुन्नी राम के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आई है। सोच रहे हैं कि इस धंधे में रहूँ या धंदा बदल लूं। धुन्नी राम को अब तक सिर्फ वाईग्रा से ही कंपीट करना पड रहा था। अब धूप नाम से एक और कंपीटीटर आ गया है। 

     उधर जनसंख्या मंत्रालय में अफसर अलग परेशान थे। धूप को जनसंख्या बढाने का कारण बतायें तो पर्यावरण मंत्रालय नाराज हो जायगा। खाद्य और कृषि मंत्री की स्थिति और बुरी थी। वह समझ नहीं पा रहे थे कि धूप को गलत बतायें या सही, क्योंकि धूप सेंकने से यदि जनसंख्या बढती है तो उसी धूप से फसलें भी उगती हैं। इन्हीं सब बातों को लेकर बनी ‘धूप सेंक कमेटी’ के अफसर काफी उहापोह में थे।

      बगल के बोर्ड रूम में प्रधानमंत्री जी सचमुच के परेशान थे। एक ओर तो मीडिया में अपने नेताओं के रोज रोज के फालतू बयानों जैसे बाटला के फर्जी होने, दूध के दाम बढने वगैरह वाले बयानों से पहले से परेशान थे, उपर से एक एक कर प्रकृति के नये नये आयाम पता नहीं कहां से खुल रहे थे। कभी ग्लेशियरों के पिघलने को लोकर ‘पचौरी चाट भण्डार’ में बमचक मची है तो कभी धूप सेंकने को लेकर पर्यावरण और जनसंख्या मंत्रालय के बीच ठनी है। विभिन्न बयानबाजीयों को लेकर कृषि मंत्री तो कृषकाय हो चले हैं।
  
      मंत्रीयों से मीडिया के आगे मुंह न खोलने की ताकीद पहले ही प्रधानमंत्री कर चुके हैं। एहतियात के तौर पर दही भेजी जा चुकी है  कि मुंह में दही जमाये रखना है। मामला ठंडा होने के बाद मुंह में जमी दही की दरकन नापी जाएगी। जिसकी दही अच्छे से जमी होगी, बिना दरक के होगी,  उसके रिपोर्ट कार्ड में पद और गोपनीयता की शपथ का शत प्रतिशत पालन करने के लिये नंबर दिये जाएंगे।

     उधर टीवी पर धूप सेंक कर काम जीवन खुशहाल होने की बात को लेकर टॉक शो चल रहा था। माथे पर बडी बडी बिंदी लगाये एक महिला कह रही थीं कि लालू जी से इस बारे में श्वेत पत्र मांगा जाना चाहिये कि कहीं जनसंख्या बढाने के मामले में उनकी धूप सेंकन विधि का हाथ तो नहीं है।  एक चश्मा लगाये सफारी सूट पहने शख्स कह रहे थे कि लादेन के इतने सारे बच्चे होने की वजह अनजाने में ही ज्यादा धूप सेंक लेना है क्योंकि लादेन को अक्सर अफगानिस्तान के रेतीले, उजाड बंजर जमीन पर ही टीले टब्बरों के बीच घूमते देखा गया है।

     हद तो तब हो गई जब एक ऐड एजंसी वाले ने कहा कि किसानों के बीच सन बाथ लोशन बांटा जाय ताकि जब वह धूप में हल चलायें तो धूप का असर ज्यादा न हो। वरना किसानों द्वारा धूप सेंक ज्यादा होने से जनसंख्या बढने की संभावना है। किसानों के लिये खास सन बाथ लोशन के लिये उसने जिंगल भी तैयार किये हैं -

हरीया हल चलाता है
छाँव लोशन लगाता है

         जनसंख्या को लेकर बनी कमेटी के चेयरमैन ने सरकार को लिखा कि जगह जगह कंडोम वेंडिंग मशीन की बजाय, ‘छाँव लोशन’ बाँटने वाली मशीने लगा दी जांय। गरीबों के घरों में जहां छत न हो वहां छत का इंतजाम किया जाय नहीं तो धूप घर के अंदर आने से जनसंख्या बढने का खतरा है। नई कालोनियों में टेरेस फ्लैट का सिस्टम खतम किया जाय औऱ ऐसी कालोनीयो को मान्यता न दी जाय जो धूप सेंकने लायक स्थान उपलब्ध करवाती हैं।

        इधर पशुओं में भी इस रीसर्च को लेकर काफी बमचक मची थी। एक कुत्ता दूसरी कुतिया से कह रहा था,  तू अब समझी मैं क्यू  अक्सर छांव मे जाकर पडा रहता था। मुझे अपनी नहीं इस देश की फिक्र थी, जनसंख्या की फिक्र थी और तू है कि मुझे हमेशा गलत समझती रही कि मैं तूझसे प्यार नहीं करता, तुझसे दूर दूर रहता हूँ।
 
      इधर टीवी पर ब्रेकिंग न्यूज आ रही है कि ‘चल छैंया छैंया’ गीत को पद्मश्री से नवाजा जा रहा है :)

- सतीश पंचम

(चित्र - साभार इंटरनेट से)

Thursday, February 4, 2010

सोचते रहना भी एक कला है....... प्याज, अमर सिंह, राहुल गांधी, ईब्नबतूता, शरद पवार, बीटी बैंगन.....और मैं:)

       यह सोच भी बडी अजीब चीज है।  आप बाल संवारते वक्त भी सोचते रहते है, शर्ट पहनते वक्त,  चश्मा पहनते वक्त, चप्पल पहनते वक्त यानि हर वक्त सोचते रहते हैं। सोच…..सोच……..और सोच।  

        चाय पीते वक्त प्लेट में चाय उडेल कर ठंडा करते हैं, उससे निकलती भाप को देख उसमें विचार वाष्प खोजने लगते हैं। इधर चाय के कप में सतह पर एक परत बनने लगती है और आप की बुद्धि पर सोचवाई की परत जमने लगती है। पत्नी आवाज देती है कि आते वक्त आधा किलो भिंडी लेते आना। सुनकर लगता है, कप में बन रही परत, एकाएक दरक गई है । खीझ होती है कि मैं एक ओर तो अपनी सोच को छील रहा हूं और ये है कि भिन्डी में ही मुझे उलझाये रखे है।
 
      अखबार खोलता हूं, तो एक खबर दिखती है कि बीटी बैंगन पर बवाल मचा है। उसे खाने से ये हो जायगा, उसे खाने से वो हो जायगा। याद आया कि गांवों में अब भी फोता वृद्धि (अंडवृद्धि) का  कारण ज्यादा बैंगन खाने  को माना जाता हैं।  किसी को हाईड्रोसील हुआ नही कि कमेंट मिलना शुरू हो जायगा – जियादे बैंगन मत खाईयेगा………न फोता बढ जाएगा। साला फोता न हुआ महंगाई हो गई। सोचते सोचते एकाएक झपकी सी आ गई। अचानक ही झपकी में एक सपने की माईक्रो रील चलने लगी।  
  
     देखा कि राहुल गांधी विवाह रचाने जा रहे हैं। शादी की पोषाक धारण किये है। उनके  शादी की तैयारी धूमधाम से चल रही है। खाने पीने का अच्छा प्रबंध चल रहा है। बीटी बैंगन का ढेर लगा है। जयराम रमेश हर बैंगन को उलट पलट कर देख रहे हैं। खाद्य मंत्रालय से कई अफसरान इस मौके पर आये हैं। मूंज वाली खटिया पर आलथी पालथी मार कर बैठे शरद पवार शक्कर तौलवा रहे हैं। अमर सिंह और दिग्विजय सिंह आपस में टाईम पास कर रहे हैं। एक कहता कि आओगे क्या मेरे गोल में तो दूसरा कहता बुलाओगे क्या अपने गोल में। बेमतलब, बेहिसाब टाईम पास। उधर अमर सिंह बीच बीच में ब्लॉग भी लिख रहे हैं। टिप्पणीयां भी आ रही हैं दनादन। एक टिप्पणीकर्ता  ने लिखा -

  मेरे हिसाब से समाजवादी पार्टी एक प्याज की तरह है।


      पहले वह प्याज जब हरे हरे समाजवाद की फुनगी लिये किसानों की बात करता था, गंवई स्तर पर अपनी बात करता था तब उसे किसानों और जमीन से जुडे लोगों का समर्थन मिला।   वहीं ब्राहमण तबका इस समय भी लहसुन प्याज से परहेज करता था। सो वह काहे इस प्याज से जुडता। अलग रहा।
  
       बाद में वही प्याज यह जान की ब्राहमण तो उसकी कद्र करने से रहे, सो मुसलमानों का समर्थन लेने के लिये मटन भरी देग में चला गया, स्वाद तो बढना ही था, आखिर बिना प्याज कौन सा मटन अच्छा लगता।
फिर उस प्याज ने चमकदार ग्लैमर का वरक ओढ लिया। सोचा कि इससे गंवई किसान, जमीन से जुडे लोग और प्रभावित होंगे,मान करेंगे । लेकिन चमकदार वर्क से किसान को क्या करना था, उसे तो अपना पेट भरने से मतलब। वर्क लग जाने से अब किसान उस प्याज को छूते हुए भी डरता था कि कहीं मैले न हो जांय। ग्लैमर वाला प्याज जो ठहरा।
       

         इधर मुसलमान अलग शंका में पडा कि ग्लैमर के वर्क लगे प्याजों को मटन वाली देग में डालने से कहीं मटन का स्वाद बिगड न जाय। लोगों ने मिठाई पर वर्क लगाना तो सुना था, पर वर्क लगा प्याज पहली बार देखा वह भी समाजवादी प्याज।  किसान ने वर्क लगे प्याज को खरीदने से इनकार कर दिया। नतीजा, समाजवादी प्याज की सरकार नहीं बनी। सो, प्याज बिचारे को कोल्ड स्टोरेज में रखवाना पडा। अब वर्क लगा प्याज भला अंधेरे कोल्ड स्टोरेज में कैसे रहता। उसे तो ग्लैमरस दिखना था। चमकता हुआ लोगों के बीच दिखना था। काफी उहापोह की स्थिति थी। इसी बीच कोल्ड स्टोरेज को लंबे समय तक ठंडा रखने वाली बिजली मायावती ने काट दी। अब सडांध तो होनी ही थी।
      

          सो एक एक कर वर्क वाले प्याज बाहर आते गये।   जो कोल्ड स्टोरेज में रह गये अभी वह न जाने कितने दिन और वहां रहें। इस बीच बिजली वापस आई तो ठीक, वरना तो …….
   
            फिलहाल आपकी पोस्ट को पढ मुझे वह बात याद आ रही है कि प्याज को छीलने से छिलके ही छिलके निकलेंगे। वही बात यहां हो रही है। एक प्रकरण पर बात हुई, दुसरे पर बात हुई, तीसरे पर….और छिलके जमा होते गये।

            - सतीश पंचम  


   दिग्विजय सिंह इस टिप्पणी को देख बोले – अरे अमर भाई, इस  टिप्पणी के बारे में कुछ कहो यार। अमर सिंह तपाक से बोले – अरे इसमें गलत क्या है। आजकल मैं खुद अपने हाथों से आ रही प्याज वाली गंध छुडा रहा हूं। कभी मायावती का दुख समझने लगता हूं तो कभी सपा का नाम भी जुबान से न लेने की ठान लेता हूँ। आजकल इसी में टाईम पास चल रहा है।  
 
        उधर मनमोहन सिंह अलग ही हलकान थे। अभी तक कद्दू वाली गाडी नहीं आई थी। शरद पवार की ओर बार बार इस आशा में देखते कि वह कुछ कहेंगे…लेकिन वो तो शक्कर औऱ दूध को मिलाकर एक नये किस्म की शिकंजी बना रहे थे। इधर मनमोहन जी के माथे पर शिकन बढती जा रही थी। कद्दू न आया तो क्या होगा। बहुत छीछालेदर होगी। गुस्से में कुछ बोल भी नहीं पा रहे हैं। ज्यादा बोलेंगे तो उनकी सौम्य इमेज बिगडने का डर है। न बोलेंगे तो कद्दू न आने का डर है। क्या करें।

     उधर देखा तो ईब्नबतूता जी जूता उतार कर लहसुन छील रहे है।  नाखुन जल्दी ही कटे थे सो लहसुन छीलने में परेशानी हो रही थी।  तभी अचानक पत्नी की आवाज सुनाई दी।

    - अरे सोना हो तो ठीक से जूते उतार कर सो जाओ, ये क्या कि कुर्सी पर बैठे बैठे उंघ रहे हो और ईब्न बतूता, जूता, शक्कर, पवार बडबडाए जा रहे हो।

     सोचता हूं, कि यह सोच भी कितनी घातक चीज है। कम्बख्त सपने में भी अपनी परछाईं को मानस पटल पर टहलने भेज देती है :)
 

- सतीश पंचम

स्थान – वही, जिसे कभी अंग्रेजों ने दहेज में दे दिया था।

समय – वही, जब देश विभाजन  के कगार पर खडा था और माउंटबेटन अपनी कलम  को ऱफ कागज पर चला, एक तरह से तस्दीक कर रहे थे कि कहीं हस्ताक्षर के वक्त कलम दगा न दे जाय।

(यह प्याज वाली टिप्पणी मैंने ही अमर सिंह जी के ब्लॉग पर लिखी थी। सोचा कि इस सोच को  आप लोगों से बांटता चलूं.......देखिये  फिर वही सोच :)
 
 THINKER का चित्र इंटरनेट से साभार.....

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