सफेद घर में आपका स्वागत है।

Sunday, January 31, 2010

अमां मुर्गों की लडाई देख रिया था, लो खां तुम भी देखो, वो मुटल्ले को देखो कैसे फडक रिया है ...


         अबे पकड ना उसको, साला देखता नहीं क्या रकत आ रेला है। जा ले जा के मालिश कर। थोडा पानी जास्ती मार।

           ये वह शब्द थे जो मैंने कुछ मुर्गे लडाने वालों के मुंह से सुने थे जो कि बजरंगबली के मंदिर के पास एक सूनसान जगह पर जमा थे। उन सबके पास बहुत ही तगडे मुर्गे थे और सब जैसे कुछ ठान कर आए थे। मुर्गों के पैरों में एक कपडे का फीता कस कर लपेटा गया था। पूछने पर पता चला कि यह लडते वक्त उनके नाखुनों को आपस में फंसने से बचाने के लिये लपेटा गया है।

      एक मुर्गे लडाने वाले से मैंने थोडा पता किया किया कि यह आज किस खुशी में मुर्गे लडाये जा रहे हैं। तो वह बोला -

   - आज तो खाली फडक है। मुर्गा लोग को आज फडक करवा के जोडा बनाने का है। एकवीस दिन के बाद ये लोग में से तपास के एक मस्त जोडी निकालने का अउर बाद में वो लोग का मेन फाईट होने वाला है।

        मै थोडा हैरान हुआ, क्योंकि मुर्गे लडाना मैंने सुना है कि गैरकानूनी है।  उस शख्स से बातचीत चलती रही। बीच बीच में उन लोगों के मुर्गों को लडते देख रहा था। मुर्गों के कई जगह से छिल जाने के भी निशान दिख रहे थे। जो मुर्गे लड लेते उनको पानी भरी बाल्टी के पास ले जाकर पानी से तर किया जाता और उनकी मालिश की जाती। मालिश करने वाले को देख रहा था तो वह अपना पानी लगा गीला हाथ मुर्गे की पीठ पर से सहलाते हुए उसकी गर्दन की ओर ले जाता और कलगी को एकाएक उपर की ओर उठा मुंह से टॉ की आवाज निकालता। इधर मुर्गा भी शायद इस टॉ की आवाज का मतलब समझता था और उतनी ही जोर से बांग देता। पंख फडफडाता। लेकिन रहता मालिक के कब्जे में ही।

         मैं सोच रहा हूं कि भाषा और प्रांत के नाम पर लोगों को लडा रहे नेताओं और इन मुर्गा लडाने वालों में कितनी साम्यता है। मुर्गे लडाना भी गैरकानूनी है औऱ लोगों को आपस में लडाना भी गैरकानूनी। फिर जब मुर्गे थक जाते हैं लडते लडते तो उन्हें बाकायदा टिटकारी देते हुए मालिश भी की जाती है। आम जनता के साथ भी यही सब हो रहा है। टिटकारी दे दे कर आपस में तैयार किया जा रहा है। फडक करवाया जा रहा है। कलगी को सहलाया जा रहा है।  औऱ जनता है कि इन मुर्गों की तरह कूकडाने भी लगती है। क्या किया जाय।

     बजरंगबली जी भी चुप हैं। उन्हीं के प्रांगण में यह खेल खेला जा रहा है। बाकायदा इक्कीस दिनों बाद तैयारी करके फैसला होगा। ये 21, 51,101,111......वाले अंक किसी भी गलत सलत काम को सही ठहराने का ठप्पा लिये क्यों रहते हैं ?  
  
       अभी तो आप यहां खींचे गए कुछ चित्रों को देखिये। मेरा कादरखान कैमरा अब दिन में भी कम ही देख पाता है। जी हां मेरे कैमरे का नाम मैंने कादरखान रखा है। एक फिल्म में, रोज शाम को छह बजे के बाद कादरखान को दिखना बंद हो जाता है। वही हाल मेरे कैमरे का भी है, इसलिये उसे मैं कादरखान कहता हूं। आजकल वह दिन में भी कादरखान होने लगा है :)




पानी भरी बाल्टी और टिटकारी वाला जोश............ 


मैं तेरा खून पी जाउंगा.........





जियो मेरे लाल, जंग जीतने पर एक झप्पी तो बनती है.......



  आज टनकपुर और हरीपुर के बीच फैसला होकर रहेगा......



  तमाशबीन............


Tuesday, January 26, 2010

देश की तिकोनी चौकोनी कटी दरारों के बीच की बरफी पर गदहे घूम रहे हैं, बकरीयां उछल-कूद कर रही हैं। कौए सीपियों में खाना ढूँढ रहे हैं।

        अब वे दिन सपने हुए हैं कि जब सुबह पहर दिन चढे तक किनारे पर बैठ निश्चिंत भाव से घरों की औरतें मोटी मोटी दातून करती और गाँव भर की बातें करती। उनसे कभी कभी हूं-टूं होते होते गरजा गरजी, गोत्रोच्चार और फिर उघटा-पुरान होने लगता। नदी तीर की राजनीति, गाँव की राजनीति। लडकियां घर के सारे बर्तन-भांडे कपार पर लादकर लातीं और रच-रचकर माँजती। उनका तेलउंस करिखा पानी में तैरता रहता। काम से अधिक कचहरी । छन भर का काम, पहर-भर में। कैसा मयगर मंगई नदी का यह छोटा तट है, जो आता है, वो इस तट से सट जाता है। 

    ये लाईनें हैं श्री विवेकी राय जी के एक लेख की जो उन्होंने एक नदी मंगई के बारे में लिखी हैं।  इसे पढते हुए गाँव घाट की जीवंत तस्वीर नजर आ जाती है। ये अनुभव उन्होंने तब लिया था जब देश अभी हाल ही में आजाद हुआ था। गुलामी की जंजीरों से मुक्त हुआ था और चारों ओर मन हिलोर जीवन था। मंगई तब एक भरी पूरी नदी थी।  विवेकी राय जी मंगई नदी को गांव की मां कहते हैं और लिखते हैं कि -

      हम थके मांदे बाहर से आते, यह निर्मल नीर लिये राह-घाट छेंक सदा हाजिर, घुटने तक, कभी जांघ तक पैर धो देती, शीतल आँचल से पोंछ देती, तरो ताजा कर देती। हम खिल जाते। मुंह धोते, कुल्ला करते, हडबड-हडबड हेलते, उंगली से धार काटते और कुटकुर किनारे पर पनही गोड में डालकर भींगे पैरों की सनसनाहट के साथ धोती हाथ से टांगे अरार पर चढते तो एक अनकही-अबूझी आनंदानुभूति होती थी ….

      गरमी के दिन में लडके छपक छपक कर नहा रहे हैं। सेवार और काई के फुटके छत्ते धार के साथ बह रहे हैं। लडके उन्हें उठा-उठाकर एक दूसरे पर उछाल रहे हैं। झांव- झांव झाबर।   एक दूसरे पर हाथो –हांथ पानी उबिछ रहे हैं, हंस रहे हैं, किलकारी भर रहे हैं। हाथ पैर पटक कर अगिनबोट बन तैर रहे हैं। हाडुक-बाडुक। नहाते नहाते ठुड्डी और मूंछ वाले स्थान पर हलकी काई जम गयी। कोई बुडुआ बनकर दूसरे का पैर खींच रहा है। कोई पानी में आँखें खोलकर तैरता है। अच्छा देखें कौन देर तक पानी में सांस रोककर डूबता है। खेल शुरू। एक पट्ठा रिगानी (चालाकी)  कर जाता है। सिर काढ कर साँस ले रहा है और तब तक उपर उठने के लिये कोई सिर मुलकाता है, तब तक डम्भ। साँस ले रहा लडका पानी में घुस जाता है। दिन भर नहान। न जाने किस पुण्य प्रताप से यह नियामत मिली। आज कल के लडके तो अभागे निकले। चुल्लू भर पानी के लिये छिछियाते फिरें। कुएं पर खडे खडे लोटे से देह खंघार लें बस।

        उधर दादा दोनों हाथों से मार-मार फच्च फच्च धोती फींच रहे हैं। कहते हैं कि उनके कपडे कभी धोबी के घर नहीं जाते। परंतु क्या मजाल कि कोई कहीं धब्बा मैल या चित्ती देख ले। एक जिंदा दृश्य। मानों यह मंगई का तट ही गाँव के लिये सिनेमा, थियेटर, मनोरंजन पार्क, क्लब, क्रीडागार स्थान है।

      लेकिन अब वो बात नहीं रही। स्वतंत्रता के समय जो मंगई नदी कल कल बहती थी, अब सूख गई है। गाँव में घुसने से पहले उसी का महाभकसावन सूखा, गहरा, लेटा हुआ कंकाल लांघना पडता है। मिजाज सन्न हो जाता है। बंसवारि खडी है, पेड खडे हैं। घर खडे हैं। मगर वह रौनक कहां है। अखर गया है।

     एक वह भी समय था जब चैत रामनौमी के दिन अछत कलश भरने का काम शुरू होता। किसी कलश को घी से टीककर, तो किसी कलश को घी से ही राम-नाम लिखकर अंवासा गया है। माता मईया की गज्जी कचारने, सिरजना और पीढा धोने का काम रात भर चलता है।
 
      मंगई के तट पर नहान उतरा है। जिनको माता मईया की पूजा करनी है, जिन्हें कडाही पर बैठना है, वे नहा रही हैं। पहले दौर में सोझारू औरतों ने और लडकियों ने स्नान किया। जब रात भीन गयी और राह-घाट सूनी हो गयी, तब लजारू बहुरीया लोग निकलीं।

     अब वह बात कहां रही। नहान की बेला में अबकी बार सियार फेंकरते रहे। फटे दरारों की शतरंजी पर भूत-प्रेत बैठकर सत्यानाशी खेल खेलते रहे। मनुष्य का स्वभाव माहुर हो गया है, देवता उन्हें दंड दें, लेकिन उसके लिये जीव जंतुओं और मवेशियों को क्यों दंड दिया जाय। अब भैंसे कहां घंटों पानी में बैठकर बोह लेंगी। अब दंवरी से खुलकर आये बैल कहां पानी पियेंगे। कहां उनकी गरमाई हुई अददी खुरों को जुडवाने के लिये पाक में हेलाया जाएगा। खेह से भठी हुई उनकी देह कहां धोयी जाएगी। दिन में चरने वाले जानवर और रात-बिरात दूर-दूर से टोह लगाते आये सियार-हिरन आदि अब कहां पानी पियेंगे। कुछ समझ नहीं आ रहा।

     जेठ-बैसाख में जिनकी शादी होगी, उनका कक्कन कहां छूटेगा । मौर कहां पर सिरवाया जाएगा। कहां पर
खडी होकर औरतें गाएंगी -

अंगने में बहे दरिअइया
हमारे जान नौंसे नहा लो
कोठे उपर दुल्हा मौरी संवारे,
सेहरा संवारे ओकर मईया
हमारे जान नौंसे नहा लो…….

      अब हालत यह है कि खेतों के लिये दौडो, पंपिंग सेट जुटाओ,ट्यूबवेल धंसाओ….मगर मंगई के लिये क्या करोगे। ऐसे लुरगिर कमासुत लोग जनमें कि आपस में वैर, विद्वेष, रगरा-झगरा से फुरसत नहीं । बरमाग्नि उठी कि आकाश धधक उठा। दुख दाह से नदी का करेजा दरक गया है।

     मंगई का करेजा तो देर से फटा है, क्या गांव का करेजा बहुत पहले नहीं फट गया। चुनाव आया एक गांव के कई गांव हो गये। सुख शांति में आग लग गई है। गोल-गिरोह और पार्टीयां बन गई हैं। राजनीतिक पार्टीयों ने वह सत्यानाशी बीज बोया कि गाँव गाँव दरकते चले गये। जूझ गये एक दूसरे से लोग, खून के प्यासे, स्वार्थी-लोलुप और एक विचित्र किस्म के कामकाजी हो गये। उनका सारा ध्यान सरकार पर और अँखमुद्दी लूट पर लग गया। यह लूट उसी प्रकार सत्य रही जिस प्रकार सूरज। मंगई का पानी इसी में सूख गया। कितना सहे। नदी सत्त से बहती है। आसमान सत्त से बरसता है। आदमी का सत्त चला गया। जो किसी युग में नहीं हुआ वह इस युग में हो गया।

      मंगई का पानी था तो आधा पेट खाकर भी गांव में तरी थी। वह तरी पुरानी थी, परंपरागत और सांसकृतिक थी। सो इस कनपटी पर विद्रोही काल ने ऐस थप्पड मारा है कि चटक गयी है। अब इसका खाली पेट जनता के खाली पेट का प्रतीक हो गया है। चहल  पहल माटी हो गयी है। माटी दरार हो गई और इस तिकोनी चौकोनी कटी दरारों के बीच की बरफी पर गदहे घूम रहे हैं, बकरीयां उछल-कूद कर रही हैं। दरारों में मुंह चिआरकर सीपियां पडी हैं, जिनमें से अपना खाना ढूँढते कौए आतुर हैं।

      लोग जूता फटकारते आ-जा रहे हैं। बैलगाडियां बे रोकटोक पार हो जा रही हैं। अरार पर से उतरने वाले संस्कारवश एक बार घूरकर देखते हैं कि कहीं जूता तो नहीं उतारना है। लेकिन अब जूता क्यों उतारा जाय, मंगई तो सूख गई है।

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      आजादी के समय जो मंगई कल कल बह रही थी, विवेकी राय जी के अनुसार उनके जीवन काल में ही वह नदी सूख गई है। इससे बडा अचंभा क्या होगा। आज देश गणतंत्र दिवस भले ही मना रहा हो, लेकिन लगता है मंगई नदी और देश की हालत एक सी है। दादा अब भी फच्च फच्च धोती फटकारते हैं लेकिन उनकी धोती अब लॉड्री में धोकर आती है। उस पर दाग ही दाग हैं। कहीं नारायण दत्त तिवारी नुमा तो कहीं कोडा के फोडे का मवाद लगा है। कहीं पर प्रांत और भाषा के नाम पर कौए अपना खाद्य पदार्थ सीपियों में ढूँढ रहे हैं तो कहीं राज्यों के विभाजन के नाम देश की सूख चुकी माटी की फटी दरारों वाली बरफी पर देश के गदहे और बकरीयां उछल कूद मचाये हुए हैं। बंसवारी को काट कर टॉवर और कॉम्पलेक्स बनाये तो बनाये गये हैं लेकिन मंगई का वह आनंद कहीं बिला गया है, गुम हो गया है। देश और मगई एक ही अवस्था से गुजर रहे हैं। लोग मंगई के लिये जूता तो अब भी उतारते हैं पर उसे पार करने के लिये नहीं, बल्कि मंगई के प्रति श्रद्धा जताने में कौन पीछे रह गया है उस पर जूता फेंकने के लिये, आपसी सिर फुटौवल के लिये। न जाने यह जूता उतरौवल कब तक चलेगा। देश और मंगई की हालत एक सी हो गई है।

      विवेकी राय जी से अभी हाल ही में फोन पर बात हुई है। सन् 1924 मे जन्में,   छियासी के करीब उम्र को छूते विवेकी राय जी से बात करने पर एक अलग ही अनुभव होता है। प्रेमचंद, रेणू जैसे लेखकों से मैं कभी नहीं मिल पाया, उनसे बात न कर पाया…..लेकिन उसी पीढी के विवेकी राय जी से बात करते हुए एक विशेष प्रकार की पुलक को महसूस करता हूँ। किताब के पीछे लिखे उनके संम्पर्क पते को पढता हूँ तो वहां लिखा है – विवेकी राय मार्ग, बडी बाग, गाजीपुर।

    लेखक के जीते जी उनके नाम पर किसी मार्ग का पता देखना एक अलग तरह का सुकून देता है।

 (विवेकी राय जी से 05482-221618 पर संपर्क किया जा सकता है )


- सतीश पंचम

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Thursday, January 14, 2010

डुबकी लगाना भी एक कला है। थोडा पाप, थोडा पुण्य और ढेरों अहमक बातें....

      कुंभ के समय डुबकी लगाना भी एक कला है। यकीं न हो तो एक बार आप भी हो आओ कुंभ। समझ जाएंगे कि आखिर यह कला क्यों हैं।  कोई  कुलांचे मारते हुए डुबकी लगाता है, तो कोई खडे खडे तो कभी उ हू हू कर ठंड में सिकुडते हुए। ऐसे में पानी की धार अपना अलग गुल खिलाती है।  लिजिये मेरी डुबकीयों का विवरण पेश है।

पहली डुबकी – शरद पवार के लिये। चाहता हूँ कि कुछ समय क्रिकेट विभाग के अलावा कृषि विभाग को भी देंगे और देश का उद्धार करेंगे।

दूसरी डुबकी  – अमर-मुलायम के लिये, ताकि दोनों के रोज रोज वाले रियेलिटी शोज बंद हों और टीवी पर कुछ और खबरें दिखें।

तीसरी डुबकी – राठौरवा के लिये (उसका मुस्कराना नेहरू से प्रेरित न होकर  क्विक गन मुरूगन से प्रेरित हो, माईंड इट)

चौथी डुबकी – हॉकी इंडिया के लिये (ताकि उसे हाकी की सहायता के नाम पर आगे आने की बयानबाजी कर अपना प्रचार करने वालों से सचमुच की धन सहायता मिल सके, केवल लफ्फाजी नहीं )

पाँचवी डुबकी – और नहीं, अब सर्दी लग जाएगी :)

छठी डुबकी – आप लोग लगाईये, मैं तो चला किनारे की ओर।

- अरे, मेरे कपडे कहां गये, यहीं घाट के किनारे ही तो रखे थे।

- भाई साहब आपने मेरे कपडे देखे क्या…..भाई साहब आपने….आपने…..जी आपने ……किसी ने नहीं…..फिर कपडे गये तो कहां गये….

 - अरे वो तो कुछ कुछ मेरे कपडों सा लग रहा है, इतना फट कैसे गया, कुछ गंदला भी हो गया है। जरूर लोगों के पैरों तले आ गया होगा। कैसे कैसे लोग हैं, कपडे देख कर भी नहीं चलते।

- क्या कहा,  मेरे कपडे आपको चाहिये। आप ही ने इसे लोगों के पैरों तले कुचलवाया है। क्यों भई, मेरे से तुम्हारी कोई दुश्मनी है क्या जो मेरे कपडे यथास्थान से उठाकर राहगीरों के पैरों तले कुचलने के लिये फेंक
दिया।

-  अरे यार फैशन इंडस्ट्री से हो तो क्या किसी के भी कपडे यूँ ही उठाकर उसी से फैशन चलवाओगे क्या……अजीब अहमक हो यार तुम भी। और मेरे कपडों में ऐसा कौन सा लुक है जो फैशनेबल लग रहा है।

  - ‘कुंभा टच’, ये क्या है। फैशन टर्म। समझा नहीं।

- अरे मैंने ‘गन शॉट’…… ‘बुलेट शॉट जीन्स’ के बारे में ही अब तक सुना था यार जिसमें जीन्स को बुलेट से छेदवाकर मार्केट में दुगुने तीगुने दाम पर बेचा जाता है, लेकिन ये क्या कुंभ के मेले में भीड भाड से गंदला हो चुका - ‘कुंभा टच कलेक्शन’।

- अरे यार, कुंभ के नाम पर तुम लोग सिर्फ अपना बाजार फैला रहे हो, किसी के कपडे में फूल पत्तियों की रगड दिखा कर ‘फ्लोरा इंडियाना’ नाम दे देते हो तो कभी किसी के कपडों में मिट्टी की छुअन के नाम पर ‘मड्डी टच कलेक्शन’ निकलवा देते हो। अब ये कुंभा टच का अलग नाटक शुरू कर रहे हो। तुम लोगों को क्रियेटिवीटी के नाम पर और कोई काम है कि नहीं।

- अरे फ्लोरा इंडियाना ही चाहीये तो माली से ले लो न, उसकी तो फूल पत्तों में ही रहबर है, उससे ज्यादा तो फ्लोरा टच कपडे किसी और में नहीं होंगे। और मड्डी टच चाहिये तो किसान  से ले लो, उसका जीवन ही मड्डी हो चला है। तुम फैशन इंडस्ट्री वालों को तो बस बेचने का बहाना चाहिये।

- और मेरे कपडे लोगों से कुचलवा कर तुम्हें ये कुंभा टच से तुम्हें क्या लाभ।

- क्या कहा, इसके खरीददार इसका दाम लाखों देंगे। कुंभ में आए नहीं लेकिन वहां के टच वाले कपडे को अपने कलेक्शन में दिखाएंगे।

- एक मिनट, मैं जरा एक और डुबकी लगा आता हूँ। तुम फैशन इंडस्ट्री वाले तो बस……..

- अरे ये क्या, अब तो डुबकी के लिये लाइसेंस लेने की जरूरत है। डुबकी की राशनिंग शुरू हो गई है। प्रत्येक भक्त को सिर्फ तीन डुबकी लगाने की इजाजत है ताकि भीड काबू में रहे। चलिये मैं तो चला म्यूनिसपैलिटी के नल की ओर। रोज रोज हमारा उद्धार तो वही करता है। गंगा जी, आप तो सालों में एक ही बार उद्धार करती हैं , महान वह म्युनिस्पैलिटी का नल है या आप, खुद ही समझ लिजिये।


- अरे यार, मेरा तौलिया तो दो, उसे कौन सा टच देने जा रहे हो।

- क्या, करीना टच…….ले जाओ लो जाओ।   वैसे भी फिल्म  इंडस्ट्री में चर्चा चल रही है कि ,   थ्री इडियट्स और भी ज्यादा सुपर डूपर हिट होती अगर करीना फिल्म में कहती – जहाँपनाह, तुस्सी ग्रेट हो….तोहफा कुबूल करो :)


(फैशन इंडस्ट्री में एक चलन है कि किसी भी चीज को कुछ भी नाम देकर कलेक्शन दिखा दो, मार्केट पकडने  में देर न लगेगी। यह व्यंग्य उसी को लेकर लिखा है। तमाम  टच जो यहां लिखे हैं, सब काल्पनिक हैं।  )

- सतीश पंचम

Sunday, January 10, 2010

लोकभारती द्वारा प्रकाशित - 'साबुन' कहानी अपने आप में बेजोड और बहुत ही दिलचस्प है।

        कुछ कहानीयां अपने आप में बेजोड होती हैं। बहुत ही दिलचस्प।  ऐसी ही एक कहानी है ‘साबुन’।  यह उस दौर की कहानी है जब कि साबुन का इस्तेमाल करना एक तरह से लक्जरी ही माना जाता था, खास करके लोअर मिडिल क्लास के लिये जो अभी अभी कुछ खुलने की तैयारी कर रहा था। कहानी में एक देवर सुखदेव है जो कि अपना साबुन किसी को छूने नहीं देता। उसकी भाभी श्यामा है चोरी छिपे देवर के साबुन का इस्तेमाल कर लेती है। भतीजों से सुखदेव को बेहद लगाव है। सुखदेव अपने बडे भाई का लिहाज करता है। सामने पडने से बचता है। ऐसे ही एक दिन की घटना से कहानी की शुरूवात होती है।
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सुखदेव ने जोर से चिल्लाकर पूछा – मेरा साबुन कहां है ?

श्यामा जो दूसरे कमरे में थी, साबुनदानी हाथ में लिये लपकी हुई आई और देवर से हौले से बोली – यह लो।

सुखदेव ने एक बार अंगुली से साबुन को छूकर देखा, और भँवे चढाकर पूछा – तूमने लगाया था, क्यों ?

श्यामा हौले से बोली – जरा मुंह पर लगाया था।

क्यों तुमने मेरा साबुन लिया। तुमसे हजार बार मना कर चुका हूँ लेकिन तुम तो बेहया हो न।

गाली मत दो। समझे।

श्यामा ने डिब्बी वहीं जमीन पर पटकी और चल दी…….अँगीठी पर तरकारी पक रही थी। श्यामा भुन-भुन करती, ढक्कन हटाकर करछुल से उसे लौट पौट करने लगी, तो देखा तरकारी आधी से ज्यादा जल गई है। उसने कढाई उतार कर नीचे जमीन पर पटक दी।
“खाक हो गई नासपीटी” तरकारी को निहारती, नाराज होकर बोली। तभी उधर ठन्न से लोटा गिरने की आवाज हुई श्यामा ने चौंक कर देखा, बडा लडका बाल्टी खींचकर बाहर लिये जा रहा था।

कहां लिये जा रहा है, अभागे।

नहायेंगे। लडका शांत भाव से जमीन पर बाल्टी घसीटता बोला – चाचाजी ने कहा है।

चाचाजी के बच्चे। गू मूतों में डाल दी बाल्टी। उसने लडके के हाथ से बाल्टी छीन ली और पैरों से धमधम करती गुसलखाने के आगे तक आई।

सुखदेव छोटे भतीजे को सामने बिठाकर उसके सिर पर साबुन मल रहा था। भाभी को देखकर बोला – काला कर दिया साबुन । चेहरे का रंग लग गया इसमें काली माई के।

श्यामा ने चिल्लाकर पूछा – मैं काली हूँ।

सुखदेव न बोला। बच्चे के सिर पर साबुन मलता रहा।

श्यामा ने बाल्टी वहीं पटक दी और चढे स्वर में पूछा- मैं काली हूँ…..मैं काली माई हूँ।

सुखदेव ने घबरा कर कहा – धीरे बोलो। भाई साहब आ गये हैं।

श्यामा ने चौंक कर उधर देखा। कमरे में पति के जूते दिख रहे थे।
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   ब्रजलाल ने आसन पर बैठ कर भोजन पर एक नजर डाली और पूछा – आज तरकारी नहीं बनी।
नहीं।

यहां प्याली में क्या है।

कदुआ है। लल्ला के लिये रख दिया है।  दाल से खाओ।

पति ने आज्ञा मानकर एक ग्रास मुख में दिया और शांत-भाव से बोले – नमक लाओ।

क्या कम है।

बिल्कुल नहीं है।

क्यों झूठ बोलते हो। मैंने नमक डाला था। शर्त लगाती हूँ।

पति ने हंसकर कहा – यही सही। लेकिन अपनी कुशल चाहो तो पतीली में नमक पीसकर डाल दो। सुखदेव अभी खाने पर बैठेगा तो फिर आफत आ जाएगी तुम्हारी।

श्यामा ने स्वर चढाकर कहा – क्या आफत आयेगी । फाँसी दे देंगे मुझे। मैं दासी हूँ न सबकी।

ब्रजलाल ने हंसकर कहा – तुम राजरानी हो, लाओ, रोटी तो दो।

वे कपडे पहन आफिस जाने को हुए तो श्यामा ने कहा -  मुझे साबुन चाहिये।

साबुन। पति ने अचरज से कहा- कैसा साबुन। सुखदेव से कहो। छाता लाओ। वह फाईल उठाना।

तभी रसोईघर से एक पुकार आई – भाभी, खाना परोसो।

फिर दो पतली आवाजें एक साथ आई – भाभी, खाना परोसो।

 बडा लडका अलग थाली में खाता है। छोटा अपने चाचाजी के हाथ से खाता है। तीनों पास पास बैठे खा रहे थे।
बडे लडके ने कहा – दाल में इतना नमक है कि पूछो मत।

श्यामा ने डरते डरते देवर की ओर देखा । पर सुखदेव ने नमक के बारे में कुछ शिकायत न की, उल्टे भतीजे को
डाँट कर बोला – खाओ चुपचाप। फिर भाभी के आगे प्याली सरका कर बोला – तरकारी और देना भाभी।

भाभी ने हंसकर कहा – तरकारी अब नहीं है।

सब खतम।

यह देखो, कढाई आगे खींचकर, हंसकर कहा – जल गई सब। यही बची थी, सो तुम्हारे लिए छाँटकर निकाल ली थी।

देखें, जली हुई का स्वाद देखें।

श्यामा ने कढाई को पीछे को करके कहा – यह तुम्हारे खाने के काबिल नहीं है। लो, दाल और ले लो।

बडे लडके ने कहा – मैं भी दाल और लूँगा।

श्यामा ने उसके आगे सरकाकर कहा – ले, दाल ले।

लडका पतीली में झाँक कर बोला – कहां है इसमें दाल।

दाल नहीं है। अब तू मेरा सिर खा ले, पेटू……

छोटे भतीजे के जूठे हाथ धोकर, सुखदेव कालेज के कपडे पहनने लगा तो कमीज में एक ही बटन पाया।
सुई डोरा और बटन हाथ में लिये भाभी के आगे आ खडा हुआ। श्यामा थाली परोस कर खाना शुरू ही कर रही थी । सुखदेव ने कमीज उसकी गोदी में रखकर कहा – जल्दी, भाभी जल्दी।

भाभी जल्दी जल्दी बटन टाँकने लगी। और तब सुखदेव की नजर भाभी के परोसे हुए भोजन पर गई । तरकारी, जो जलकर काली हो गई थी, अकेली अकेली थाली में सजी थी।

तभी भाभी ने कमीज देकर कहा – लो, थामो। अब मुझे भी पेट में कुछ डाल लेने दो।

बडा भतीजा बाहर दरवाजे पर खडा था। उसके स्कूल की आज छुट्टी थी। कॉलेज जाने लगा तो सुखदेव उसका हाथ पकड कर खींचता हुआ ले गया जल्दी जल्दी बडी दूर तक।

चार मिनट बाद लडके ने दही का कुल्हड माँ के आगे ला धरा। श्यामा उसी जली तरकारी से रोटी खाये जा रही थी। दही देखकर अचरज से पूछा – कहाँ से आया रे ?

लडका बाहर को भागता भागता बोला – चाचाजी ने दिया है।

…………………कहानी आगे बढती है। इस बीच सुखदेव और श्यामा के बीच इसलिये बहस होती है क्योंकि सुखदेव ने अपने कपडे जहां सिलवाये वहीं बच्चों के भी कपडे सिलवाए। कपडे तो अच्छे सिले पर सिलाई का पैसा ज्यादा लग गया… कुछ दिनों बाद छोटे    हुए सो अलग।

  इधर श्यामा ने अपने पास के कतर ब्योंत कर बचे एक रूपये से साबुन मंगाने की ठान ली थी। देवर वैसे ही उसे साबुन छूने न देता।   लेकिन साबुन लाने वाला कोई न मिल रहा था। बडे लडके को पैसे देकर भेजा। सोचने लगी कि सुबह अपनी नई टिक्की से जब नहाउंगी तो देखूंगी। रोज लगाउंगी साबुन।

इधर बडे लडके ने दो पैसे का कपडे धोने वाला साबुन ले आया और चौदह पैसे हाथ में रख भाग गया। श्याम खिझती रह गई। गुस्से में वह दो पैसे का साबुन उठाकर एक ओर फेंक दिया और कोसती हुई रसोई बनाने में जुट गई। इस बीच कहानी आगे बढी। सुखदेव की शादी की बात करने एक शख्स आता है। लेकिन सुखदेव किसी और से लगाव रखता है। एक दिन सुखदेव के जेब से कपडे धोते समय एक प्रेंमपत्र पकड में आ जाता है। श्यामा उसे दिखाकर सुखदेव को चिढाने लगती है और मजाक ही मजाक में कह देती है कि वह ब्रजलाल  को यह बात बता देगी। सुखदेव भाई का बहुत सम्मान करता है और नहीं चाहता कि कोई ऐसी वैसी बात भईया को पता चले। सो उसी दिन से सुखदेव श्यामा का नर्म सचिव बन जाता है। दोनों के बीच साबुन को लेकर अभी भी रस्सा कशी चलती रहती है।

खूब ठंड पड रही थी।  इधर सुखदेव ने अपना पुराना स्वेटर एक चाय वाले के नौकर को देने की बात की थी। घर में आकर स्वेटर ढूँढा लेकिन नहीं मिला।

  श्यामा रसोईघर मे बैठी दाल बीन रही थी। सुखदेव ने आकर पूछा – मेरा स्वेटर था एक पुराना।

मैंने ले लिया।

तुमने कैसे ले लिया। सुखदेव ने माथे पर बल डालकर कहा। तुमने क्यों मेरा बक्स खोला।क्यों ले लिया मेरा स्वेटर।

भाभी ने शान्त स्वर में कहा – बेकार पडा था, इसलिये निकाल लिया।

सुखदेव ने स्वर को तीव्र करते कहा – मुझसे बिना पूछे तुमने कैसे ले लिया। तुम मेरी चीज क्यों छूती हो ।

श्यामा चुप रही।

कहां है स्वेटर लाओ दो।

चलो अपने कमरे में। अभी लाये देती हूँ स्वेटर।

यहीं लाकर दो फौरन।

भाभी ने इधर को पीठ करके स्वेटर उतारा, फिर उधर को मुंह करके शान्त स्वर में कहा – यह लो। और नतमुख किये बोली – बाकी के कपडे भी उतरवा लो तन के।

 सुखदेव क्षण भर भौंचक्का सा खडा रहा। स्वेटर वह सामने पडा था, और भाभी सिर झुकाए फिर दाल बीनने लगी। सुखदेव वह स्वेटर उठाने लगा तो एक बार भाभी के झुके मुख की ओर देखा। आँखों से आँसू टपक रहे थे भाभी के…..

  इधर श्यामा ने ब्रजलाल से कहा कि उसके लिये स्वेटर चाहिये। ब्रजलाल ने थोडी बहुत बातचीत के बाद दस का नोट निकाल कर दे दिया। उधर देवर को एक दूसरी ही मुसीबत ने आ घेरा था। जहां पढने जाता था वहां के प्रोफेसर की एक किताब सुखदेव से गुम हो गई थी। उसी के लिये सुखदेव ने एक पत्र पर साढे दस रूपयों की जरूरत लिख भतीजे के हाथ भाभी के पास वह पत्र भिजवाया था। भईया से यह बात बताने को मना भी किया था सुखदेव ने।   भाभी ने उस कागज की पीठ पर लिख कर बताया कि मेरे पास दस रूपये हैं। आठ आने का इंतजाम कहीं से कर लो।

   सुखदेव मान गया। उसे दस रूपये मिल गये।   इधर जब शाम को सुखदेव घर लौटा तो घर में कुहराम मचा था। छोटा वाला लडका  चाचाजी…चाचाजी कह कर रो रहा था और श्यामा उसके हाथ रस्सी से बाँध रही थी। यह दृश्य देख श्यामा को उसने धकियाते हुए बच्चे से अलग किया और गुस्से से पूछा कि क्यों मारा बच्चे को। तब श्यामा ने गरजते हुए कहा – जाओ देखो अपने कमरे में । एक किताब पर पूरी दवात उलट दी इसने। एक रूपये का नुकसान कर दिया। बच्चे को पीटा जाता देख सुखदेव पहले से ही आहत था, सिर्फ इस बात के लिये बच्चे को पीटा जाना औऱ गुस्सा दिला गया। जल्दी जल्दी बच्चे के हाथ खोल उसे कलेजे से लगा लिया। बच्चा चाचा से लिपट सुबकने लगा।

   रूंधे स्वर, आँखो में भर आए आंसू के बीच सुखदेव ने भाभी से  कहा – आज माफ करता हूँ। आइन्दा जो तुमने बच्चे पर हाथ चलाया तो मैं खाना छोड दूँगा समझी।

भाभी न बोली।

सुखदेव ने बाहर जाते जाते कहा – हत्यारिन ने जरा सी दवात के लिये अधमरा कर दिया मेरे लडके को।
  उधर सुखदेव के रिश्ते की बात चलाने एक शख्स आया था। ब्रजलाल से उसकी बातचीत चल रही थी। इधर श्यामा सुखदेव के प्रेम प्रसंग को जानती थी कि उसका मन प्रियंवदा नाम की लडकी पर आया है। सुखदेव की मन की जान श्यामा ने ब्रजलाल  से अकेले में बात चलाई कि सुखदेव की शादी उस शख्स के  वहां नहीं करने देगी। जहां वह चाहेगी, सुखदेव का ब्याह वहीं होगा।

 बृजलाल हतप्रभ। थोडी ना नुकुर और मान मनौवल के बाद बृजलाल सुखदेव की शादी प्रियंवदा से करने को मान जाते हैं।

  इधर प्रियंवदा के यहां से भोजन का बुलावा आता है। श्यामा ने प्रियंवदा के बारे में पहले ही जान लिया था कि काफी खूबसूरत है और उसकी और सुखदेव की जोडी खूब जमेगी।  प्रियंवदा के यहां जाने का समय हो रहा था। दोनों भाई रविवार होने के कारण बाहर गये हुए थे। उसने जल्दी जल्दी रसोई बनाई, फिर सब सँभाल-सुधारकर वहां जाने को तैयार हुई। शीशे के सामने जाने पर देखा चेहरे पर कहीं कुछ कालिख सी लगी थी। हाथ से छुडाने लगी तो वह और फैल गई। श्यामा ने घबरा कर चारों तरफ देखा कि कोई देख तो नहीं रहा है।  फिर जल्दी से साबुनदानी उठाकर गुसलखाने की ओर भागी गई।

   मुख धोया साबुन से, हाथ धोये साबुन से। फिर पैरों पर नजर गई तो  पैर भी बहुत गंदे दिखे। पैरों पर भी साबुन मलने लगी। सहसा बायीं ओर किसी की परछाईं देखकर श्यामा ने साबुन मलते मलते उधर को मुंह किया तो हाथ जहाँ के तहां रूक गये और आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा।
  सामने कन्धे पर धोती तौलिया डाले, नंगे बदन सुखदेव खडा था निश्चल, निर्वाक।
 
श्यामा से कुछ न बन रहा था। यों ही पैर पर साबुन लगाये बैठी रही। आखिर सुखदेव ने ही वह निस्तब्धता तोडी। मुस्कराकर मुँह खोलकर बोला- बैठी क्यों हो, मुँह धोकर हटो न।

 तब मानो श्यामा की चेतना लौटी। ओठों में तनिक मुस्कराई और जल्दी जल्दी पैर धोकर उठ आई वहाँ से। कमरे में आकर शीघ्रता से साबुन की टिक्की एक कपडे पर दबा-दबाकर सुखाई, फिर बडे जतन से उसे साबुनदानी में रखकर ले आई।

    सुखदेव पाईप खोलकर खडा था। और जाने क्या सोचता पानी की धार को देख रहा था। खट् से भाभी ने पैरों के  पास वह साबुनदानी रख दी और लौट चली लम्बे डग भरती।
 
सुखदेव क्षण भर साबुनदानी को निहारता रहा। फिर उसने नीचे झुक कर साबुन की टिक्की उठा ली और तडित वेग से दूर जाती भाभी की ओर वह साबुन फेंक दिया जोर से।

  साबुन जाकर एक उपर रहने वाले परिचित सेठ को को लग गया जो उसी वक्त घर में प्रवेश कर रहा था । साबून जोर से लगा था सो वह सेठ पट पकड कर बैठ गया।    श्यामा ने पीछे मुडकर देखा । सुखदेव घबडा गया। आनन फानन में बहाना बनाया कि एक बंदर अभी इधर उपर  से गुजरा है उसी ने साबुन गिराया होगा। सेठ ने साबुन को उलट पलट कर देखा और कहने लगा – नया साबुन है। बजरंगबली की कृपा से मिल गया। साबुन लेकर सेठ चलता बना।

 उसी वक्त प्रियंवदा का नौकर भोजन के लिये लिवाने आ गया। श्यामा ने दोनों लडकों को सजा धजा कर बाहर खडा किया। डरती डरती देवर के पास आकर बोली- जरा अपना रूमाल दोगे।
क्यों तुम्हारा रूमाल क्या हुआ।

मेरे पास कब था रूमाल।

तो यों ही जाओ।

 श्यामा ने अनुनय करते कहा – दे दो जरा देर के लिये।

सुखदेव चिल्लाकर बोला – नहीं दूंगा रूमाल, चली जाओ सामने से।

श्यामा ने मुंह पर हाथ रखकर कहा – अरे धीरे बोलो। बाहर नौकर खडा है।

सुखदेव ने और चिल्लाकर कहा – नौकर की ऐसी की तैसी।

श्यामा घबराकर बाहर निकल आई।

  उधर प्रियंवदा के यहां श्यामा और बच्चे ही पहुँचे  थे। बातचीत  करते श्यामा को लगा कि ये तो अपना ही घर है । प्रियंवदा के बारे में सुखदेव ने पहले ही बहुत कुछ बताया था।   मजाक और चुहल चलती रही। प्रियंवदा की श्यामा के बच्चों से खूब बन पडी। थोडी बहुत बातचीत के बाद बात शादी पर होने लगी। बातचीत के दौरान पता लगा कि प्रियंवदा के भाई रामाशंकर के पास कई दुकानें हैं।

 श्यामा ने पूछा – भैया, अपनी दुकान पर साबुन भी बिकता है न।

बहुतेरा साबुन है। साबुन की तो एजेन्सी तक है।

तब एक शर्त है।

सबका दिल घबडाने लगा कि न जाने ब्याह की कौन सी शर्त रखी जा रही है।

श्यामा बोली – भैया, तुम्हें हर महीने मुझे एक साबुन की टिक्की देनी होगी। बोलो, हामी भरते हो।

रामाशंकर ठहाका मारकर हंस पडा। रामाशंकर की अम्माजी भी हंस रही थीं।

पर श्यामा न हंसी। बल्कि स्वर में दुख भरकर बोली – तुम्हे क्या पता अम्मा, कि मैं साबुन के लिये कितनी परेशान रहती हूँ।

रामाशंकर ने गदगद स्वर में कहा – बहिन, आज ही तुम्हारे पास एक पेटी साबुन भिजवा दूँगा।

 नौकर पीछे से बोला – मैं दे आउंगा शाम को।

जाने किधर से बडे लडके ने सब सुन लिया। वह रामाशंकर के आगे जाकर बोला – मामाजी,  आज  जीजी से और चाचाजी से साबुन के पीछे खूब लडाई हुई थी।

श्यामा ने चिल्लाकर कहा – चुप रह चुगलखोर।

पर लडका न माना। उसी दृढ स्वर में बोला – सच मामाजी, इसने चाचाजी का साबुन ले लिया था सो चाचाजी ने……

श्यामा ने लपक कर उसका मुंह बंद कर दिया।

सारा घर हँस रहा था।
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  यहां मैं कहानी का कुछ अंश ही दे पा रहा हूँ।  पूरी कहानी एक तरह से निम्न मध्यमवर्ग के उस हिस्से को बयां करती है जो अपने रोज की छोटी मोटी बातों में हंसी – खुशी तलाशता रहता है। कहानी में एक ओर प्रेम है, लगाव है तो दूसरी ओर हास परिहास भी है जो कि रह रह कर कहानी में झलकता है। पूरी कहानी को पढने के बाद कुछ हिस्से मन में रह रह कर कौंधते हैं – जल चुकी तरकारी, दही, स्वेटर , साबुन , दवात….ये कहानी के ऐसे पात्र हैं जो कहानी को असलियत के करीब ले आते हैं।

   इससे पहले मैंने कभी  द्विजेन्द्रनाथ मिश्र ‘निर्गुण’ जी की कोई कहानी नहीं पढी थी। लेकिन अब उनकी लिखी कहांनियों को पढने का मन कर रहा है।  मैंने जहां यह कहानी पढी वह किताब थी – ‘23 हिन्दी कहानियाँ’,  साहित्य अकादमी  नई दिल्ली की ओर से लोकभारती द्वारा इलाहाबाद से प्रकाशित, मूल्य – 35 रूपये।
 
    जैनेन्द्र कुमार जी द्वारा पसंद की गई 23 श्रेष्ठ कहानियों का संग्रह है यह किताब।  और भी बहुत सी कहानियाँ हैं इस किताब मे। सचमुच जैनेन्द्र कुमार जी ने द्विजेन्द्रनाथ मिश्र जी की कहानी को इस  किताब  में संकलित कर उचित ही सम्मान दिया है।

  मुझे तो यह कहानी बहुत भाई।

- सतीश पंचम


 

Saturday, January 2, 2010

'अफसरी' पर लिखे एक लेख का बहुत ही 'रोचक अंश'


    हाल ही में एक बहुत ही रोचक लेख   डॉ विवेकी राय जी रचित एक ग्रामायण पढ रहा था। पढते हुए लगा कि इसे आप लोगों से बांटा जाय । बांटने का कारण यह भी है  कि अब भी भारत के गाँवों में इस तरह की परिस्थिति और इस तरह की ‘चुनमुनीया अफसरी’ देखने को जब तब मिल जाती है ।
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      गाँवों में विकास कैसे हो रहा है यह जानने के लिये एक बी डी ओ नामक साहब की चर्चा है। वह एक समारोह में सम्मिलित था। बहुत भीड थी। जो आता एक नजर उसे देख लेता। वह किसी और को नहीं देखता। सबके बीच रह कर सबसे अलग। गाँव में उपस्थित होकर भी अनुपस्थित। टेरेलिन का मोजा, मोजे पर शू ,  शू पर पालिश, फीता कसा, एक दरी बिछी बंसखट के सिरहाने नीचे पैर लटकाकर बैठा वह  ……… उसे पता नहीं कि यहां कुछ हो रहा है। कोई नमस्ते करता तो आँखे उठाकर कुछ गर्दन मोडकर हाकिमानी तर्ज का उत्तर दे फिर निरपेक्ष-निस्संग।


      बाजा बज रहा था। एक नर्तक कमाल कर रहा था। मगर वह एकदम अप्रभावित, सधे अंदाज की स्तरीय रियासत में डूबा…….गांव वाले भी कैसे मूर्ख हैं कि इस भोंडे नाच-बाजे को ला खडा किया। फिर उसने ऐसे मुंह बिचकाया जैसे वह यहां फंस गया है। मानों वह किसी ताल्लुकेदार का वंशज है और सब कुछ समाप्त हो जाने पर भी अगाध संपत्ति का स्वामी है और शहर में रहकर सुखमय जीवन व्यतीत कर रहा है।

       ……  हो न हो इसके कपडे लखनउ से धो कर आते हैं। और, बालों की कटाई ? अरे वाह, कृत्रिमता में भी कितना सौदर्य होता है। खास ढांचे में मोड दिलाये गये बाल, बालों में ऐसी लहरें, जो उठकर गिर नहीं जातीं, कई कई बल में मुड मुड जाती हैं। जैसे सावन के कजरारे मेघ सिर पर घुघुचाये शोभा बढा रहे हैं। उजड गाँव  में इस फूस की पलानी में गंवारों के बीच ऐसा सजीला सैलानी शायद तफरीहन आ गया। इसे यहां उदास लगता होगा। न टी, न टेबुल, सब गंवारपन। ऐसा कल्चर्ड आदमी इनमें मिक्स कैसे करे। जलपान के लिये लोगों ने आग्रह किया। बोला,  “ नहीं नहीं, आप लोग तकलीफ न करें, मैं नाश्ता करके आया हूँ। फिर इस प्रकार के नमकीन-मिठाई को मैं छूता भी नहीं।”

तब आपकी खातिर हम लोग क्या करें ? पान सिगरेट ?

     गाँव का पान तो मुंह काटता है। पक्का जगन्नाथी पान मैं बनारस से मंगाता हूँ। पान का डिब्बा चपरासी लिये होगा। …..हरिया औ हरिया…..नहीं, नहीं यह सिगरेट भी मैं नहीं पीता। मेरा सिगरेट मेरे पास है।

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        एक दिन अचानक हल्ला हुआ कि नये बी डी ओ साहब आये हैं। लोग देखने के लिये दौडे कि यह हवा गाडी पर फर्र फर्र उडने वाला साहब कैसा है। मगर जब तक लोग पहुंचे, कुल सैंतीस मिनट में कागज का पेट भरकर और ग्राम सभापति से कहकर कि गरीबी के कारम देश तरक्की नहीं कर रहा है, वे चले गये। क्यों इतनी जल्दी चले गये, आगंतुक लोग तरह तरह के अनुमान भिडाने लग गये।

“ मूर्ख गंवार की तरह रस पानी लाकर रख देने से अफसर रूकेगा ? गेट बनाओ, झंडी लगाओ, टेबुल सजाओ, प्लेट जुटाओ, नमकीन मिठाई के साथ चाय लाओ, स्वागत गान गवाओ, तब भोंपा पर साहब का भाषण कराओ…….”

अपना पेट तो पहाड है। कहां से खिलावें।

तब हवा कूटो। गजटेड अफसर है। खिलवाड नहीं है। …………पहले खिलाओ फिर काम कराओ।

  “ खायेगा पियेगा नहीं तो अफसरी कैसे रहेगी। अफसर के माने है कि जनता से कम बोले। बिल्कुल संपर्क न रखे। सदा रिकेब पर लात रहे। कोई देखे नहीं कि कहां रहता है, क्या खाता है।”

“…….. मगर सानी पानी की तरह दाल-भात पर और वह भी ऐरे गैरे के यहां चोंच नहीं मारते। गोट-मोट आसामी पकडते हैं और माल काटते हैं। कहा जाता है -

   सुखी मीन जहं नीर अगाधा
   अफसर खुश जहं पाडा बांधा !

  “तब इसलिये चले गये क्या ? हमारे सभापति के यहां दूध-दही का आजकल ठाला है।”

“वही अंग्रेजी जमाने का हाकिम अब भी है भईया। बी का अर्थ बिलायती, डी का अर्थ डिजाईन और ओ का माने अफसर। बिलायती डिजाईन का अफसर।

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  - पुस्तक अंश,  साभार विवेकी राय जी के - ‘जुलूस रूका है’ किताब  से
प्रकाशक-  नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली
मूल्य- 20 रूपये मात्र*

 * 1977 में प्रकाशित इस किताब का मूल्य- 20 रूपये था। फिलहाल इस किताब का क्या मूल्य चल रहा है, इसकी जानकारी मुझे नहीं है ।

       दोनों चित्र मेरे अनुज द्वारा  गाँव में ही खींचे गये हैं।  पहला चित्र जिसमें एक नाच हो रहा है, बगल के गाँव में ही किसी शादी ब्याह के दौरान  आज से चार-पांच साल पहले लिया गया था। दूसरा चित्र जिसमें बच्चा भैंस पर बैठ कर मस्ती कर रहा है, वह भी गांव के ही किसी बच्चे का है ।

- सतीश पंचम

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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