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Saturday, December 4, 2010

मेरे घर के आसपास का देशज Flora and Fauna...........सतीश पंचम

 लिजिए पेश है देशज Flora and Fauna.... मेरे गाँव घर के खेत खलिहान, आँगन,  बैठका के आसपास वाले माहौल से रचा बसा.....बिल्कुल देशज अंदाज में :)


     मैंने इस गिरगिट की तस्वीर जानकर नहीं खिंची थी। मुझे पता नहीं था कि वहां झाड़ियों के बीच कोई गिरगिट है। कैमरा ऑन करते समय अचानक ही अचक्के में एक क्लिक कर बैठा। बाद में जब तस्वीरों को लैपटॉप में डालकर एक एक कर देखने लगा तो पता चला कि ये गिरगिट महाशय वहां पोज़ बनाये खड़े थे। अजीब सौभाग्य है।


 ये धतुरे के फूल के भीतर रेंगती चींटियां न जाने कौन सा सत् लेने वहां जाती हैं। कहीं  भोले भण्डारी के भक्त तो नहीं :)


 ये है मेरे आंगन में खिले पपीते का फूल....एकदम पपीतात्मक :)



ये छोटे सफेद फूल जो देख रहे हैं वह दरअसल एक किस्म की घास है जिसके बारे में कहा जाता है कि यह इतनी बेकार किस्म की होती है कि उसे पशु वगैरह भी नहीं खाते। चरते समय छोड़ कर हट जाते हैं या बचा कर अगल बगल में चरते हैं।

   लेकिन मैंने जब इसके सफेद फूलों की खूबसूरती देखा तो मन ही मन सोचा कि वो बहुत अच्छा करते हैं जो इसे नहीं चरते।


 कमतर होना भी जीवन जीने के लिये कभी कभी लाभदायक होता है।  



ये पपीते के पत्ते पर बैठा कोई कीड़ा है। ठंड के महीने में पपीते के पत्ते के उपर बैठा बैठा  धूप सेंक रहा है शायद।



  इस देशज चिड़िया को चरखी कहा जाता है, झुंड में होने पर बहुत शोर मचाती है, ठीक हम ब्लॉगरों की तरह :)

     जब कभी गाँव में बच्चे या कोई और एक ही समय पर ज्यादा संख्या में बोलते बतियाते रहते हैं तब उनकी आवाज से तंग हो कहा जाता है कि क्या चरखी की तरह 'चेल्लहर' मचाये हो ।

 - सतीश पंचम

17 comments:

अविनाश वाचस्पति said...

पंचम भाई
चित्र दिखलाए चमाचम
मन झूम उठा है झमाझम
आओ बंधु, गोरी के गांव चलें

और गिरगिट का चित्र दिखलाया है आपने
इसलिए छिपकली से भी मिल तो लें

छिपी हुई कलियों यानी छिपकलियों का कहना है कि बिन बोले अब मुझे, नहीं कहना है

Arvind Mishra said...

गिरगिट वाला चित्र तो कुछ ऐसा है कि उसमें कितने गिरगिट हैं की प्रतियोगिता आयोजित हो सकती है ,चरखी को सतबहिनी कहते हैं ..वे अक्सर ६ ७ की संख्या में रहती हैं ,आपने एक अकेली को कैद किया ...
सभी चित्र उम्दा हैं !

Rahul Singh said...

आपकी चरखी, हमारी सत बहिनिया है. माना जाता है कि ये 7 के झुंड में एक साथ रहती हैं, शायद इन्‍हें ही केरकेटा कहा जाता है, जो टोटॅम होता है.

देवेन्द्र पाण्डेय said...

सुंदर फोटोग्राफी।

प्रवीण पाण्डेय said...

मेरी भविष्यवाणी सच होकर रहेगी। विचारजगत में यह भाव उफान पर है।

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

जबरदस्त ब्लॉगिंग! ईर्ष्या से मुंह लाल हो रहा है - गिरगिटान की तरह! :)

sanjay jha said...

bachpan to innhi chijon ke katai-chatai-khelai me bita hai.......

pranam.

rashmi ravija said...

कमाल की तस्वीरें हैं......लेखक- फोटोग्राफर का सुन्दर समन्वय....बहुत खूब.

शोभना चौरे said...

बहुत सुन्दर चित्र और कुछ नै जानकारी भी मिली देशज प्राणियों के बारे में |
आभार

दीपक डुडेजा DEEPAK DUDEJA said...

@चरखी की तरह 'चेल्लहर' मचाये हो :)

गिरगिट खूब फोटू दिखाई... थोड़े देर और इन्तेज़ार कर के फिर से खींचे ...... दूसरा रंग भी देख लेते.....

सोभाग्यशाली है छोटा कीट... पते पर ही धुप के मज़े लूट रहा है..... महानगर की त्रासदी तो ऐसी है या जमीन ले लो या धुप के मज़े ? दोनों एक साथ मिलने से रहे.

केवल राम said...

दिल खिल उठा ...सुंदर चित्र देखकर

Kajal Kumar said...

कभी बहुत पहले एक फ़िल्म देखी थी Tripple Cross. नायक जब भी पकड़ा जाता है, जेल-कोठरी में कीड़े-मकौड़ों की दुनिया में रम जाता है.... बहुत अजब ग़जब होती है इनकी दुनिया भी, बस शायद हमें ही समय नहीं होता इस ओर देखने का

रूप said...

bhai ,wah .kya rang badla hai !

मो सम कौन ? said...

पपीतात्मक? हा हा हा।
मस्त तस्वीरें और उससे भी मस्त कैप्शंस, मजेदार।

Sanjeet Tripathi said...

jabardast hain, mann prasann ho gaya aapki photography dekh kar....

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

खूबसूरत चित्र, खासकर पपीतात्मक और धूपसेवी। सफेद फूल वाली घास का नाम क्या है?

सतीश पंचम said...

सफ़ेद फूल का नाम तो मुझे भी नहीं पता लेकिन गाँव में लैपटाप में चित्र देखते वक्त आसपास जो लोग उपस्थित थे उनकी बातों से पता चला कि इसे शायद देशज भाषा में 'गन्हउरिया घास' कहा जाता है क्योंकि इसे पशु भी नहीं पूछते और किसी अन्य काम में भी यह नहीं आ पाता।

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