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Sunday, December 26, 2010

कोटर वाले जीव..........सतीश पंचम

         परसों टीवी पर खबरों में बताया जा रहा था कि मुंबई में कुछ आतंकवादी घुस गये हैं। लगातार टीवी पर ब्रेकिंग न्यूज वाली पट्टी फ्लैश हो रही थी। टीवी पर एक आतंकवादी का स्केच भी बनाकर दिखाया जाने लगा था। रात तक एक दूसरे से फोन पर बतिया कर सभी लोग कुशल क्षेम तो पूछ ही रहे थे लेकिन आपस में एक दूसरे को प्रश्नवाचक निगाहों से देखे भी जा रहे थे। और देखते भी क्यों नहीं, आखिर नये साल का जश्न मनाने वाला दिन पास ही है और ऐसे में यदि आतंकवादी फातंकवादी कहीं गड़बड़ा दिये तो और मुसीबत। 

     इसी उहोपोह के बीच अभी कल शाम दादर जाना पड़ गया। बिटिया के लिये आईडल बुक डेपो पर किताब लेने। साथ में बिटिया भी थी। तभी नज़र अमूल के एक विज्ञापन वाली होर्डिंग पर पड़ी । अमूल के विज्ञापन वैसे भी अपने चुटीलेपन के कारण जाने जाते हैं। इस विज्ञापन में भी प्याज की बढ़ी कीमतों को मुद्दा बनाया गया था। अभी सुबह ही कांदा-पोहा (प्याज-च्यूड़ा) बनाने के दौरान श्रीमती जी के प्रवचन सुन चुका था कि प्याज महंगे हैं ऐसे में कांदा-पोहा बनाने का क्या तुक ? दो चार दिन बाद खाओगे तो नहीं चलेगा क्या जो कांदा-पोहा खाने के लिये अभी ही खन बहाये हो। अमूल के इस विज्ञापन देखते ही वही बात याद आ गई जिस पर लिखा था कि हम भूख मिटा सकते हैं, प्याज नहीं। उसे देखकर बिटिया भी मुस्कराने लगी और मैं भी। 

        वहां दादर पहुंचने पर देखा कि काफी पुलिस लगी है। रास्ते अमूमन खाली हैं। ज्यादा भीड़ भाड़ नहीं है। मन में आया कि कहीं वह दुकान भी बंद न हो गई हो जहां पर कि जाना है। लेकिन शुक्र था दुकान खुली थी। किताबें ली गईं। लेकिन इतना तो है कि अब हम मुंबई वाले भी अक्सर इस तरह की सुरक्षा व्यवस्था और चाक चौबंद मानसिकता में जीने के आदि हो चुके हैं। 
     एक जगह फूलों को देख मन में आया कि यहां की तस्वीर कैमरे में कैद करनी चाहिये लेकिन फिर वही बात की कहीं पुलिस कुछ और ही न समझ ले। क्योंकि अब हम मुंबई वाले चौपट मानसिकता के घेरे में आ गये हैं। जी हाँ, चौपट मानसिकता..... जहां पर कि यदि कोई प्रकृति की ओर खिंच कर उसकी तस्वीर भी उतारना चाहे तो नहीं उतार सकता, क्योंकि पुलसिया पूछताछ झेलनी पड़ सकती है कि किस लिये खिंची जा रही हैं तस्वीरे ? क्या इस्तेमाल किया जायगा इनका ?  कोई प्रूफ ?  आईडेटिटी ? अब इन सब सवालों के कौन जवाब देता फिरे। इसलिये बेहतर है, प्रकृति तो मन ही मन निहार लिया जाय और उसे अपनी नज़रों में ही कैद करा जाय। तात्पर्य,  आतंकवाद रोजाना के रहन सहन के हमारे ढर्रे पर ही असर नहीं डाल रहा, बल्कि कभी कभी कला का गला भी घोंट देता है, प्रकृति प्रेम की सहजता पर भी बंदिशें डालने पर मज़बूर करता है। आतंकवाद के इस पहलू से भी रूबरू होने का अहसास पहली बार कल शाम हुआ। साँझ ढलने लगी थी सो बिटिया और मैं, हम दोनो जने लौट चले। 

       रास्ते में फिर एक कत्थई रंग की नाटी सी पुलिसिया गाड़ी दिखी जिसके आस पास पुलिस का काफी जमावड़ा था। मन ही मन मैं सोचने लगा कि इस तरह से खुशियां मनाने में भी क्या मजा रहा अब। कि पुलिस व्यवस्था हो तो हम खुशिया मनायें वरना अपने अपने घर में एक कोटर में चुपचाप पड़े रहें। हाँ, कोटर ही कहना होगा मुंबईया घरों को। एक तो छोटे छोटे घर होते हैं, तिस पर रात दिन की भागा-दौड़ी। 

    सुबह निकलते ही प्लेटफार्म पर पहले  मुंह से ग्यारह चालीस की लोकल, आठ- दस की लोकल जैसे शब्दों की जुगाली होती है और फिर लोटती बेला नौ पन्द्रह, दस-पचास जैसे शब्दों की घुटाली। क्योंकि यहां मिनट-मिनट के हिसाब से बातें जो चलती है। लोकल ट्रेन का नाम तो पुकारा जाता ही है,साथ में उनके छूटने के समय को भी उसके साथ नत्थी किया जाता है। बेलापुर की आठ दस वाली, गोरेगाँव की सात पचास वाली। ट्रेन न हुई किसी कि बहुरिया हो गई वो फाफामऊ वाली मंझली बहू, वो सीतापुर वाली बड़की, वो बांदीपुर वाली छुटकी :) 

     खैर, जो लोग पहली बार गाँव से मुंबई आते होंगे, तो उन्हें सबसे पहली बात जो अखरती होगी वह होगी यहां के छोटे छोटे घरों की साइज। और यह अखरना स्वाभाविक भी है। गँवईं खुलेपन और शहरी कोटरपन में जो बड़ा भेद होता है वह इन्हीं घरों के आकार के कारण होता है। उसी में रहना, उसी में खाना, और जब प्रकृति प्रेम कुछ ज्यादा ही छलकने लगे तो वहीं गैलरी में एकाध गमले रख कर उसमें समूचे बगीचे को पा लेने जैसा सुख। 

    वहीं, एक चीज जो मुझे बड़ी मजइत लगती है वह यह कि गाँव वालों की अपेक्षा शहर के लोग सोचते तो खुलेपन से हैं लेकिन रहते अपने उसी तंग कोटरे में हैं जबकि गँवई आदमी ठीक इसका उल्टा करता है। वह सोचता तो तंग मानसिकता से है लेकिन रहता अपने गाँव में खुलेपन से है।  है न अजीब विडंबना।

    बहरहाल फोटोग्राफी वाली बात से याद आया कि  इस बार गाँव जाने पर मै कुछ तस्वीरें ले रहा था। फूल पत्तियों की, कीड़े मकौड़ों की, बादल, बंसवारी की। तभी मेरी नज़र नीम के एक पेड़ पर पड़ी। उस पेड़ के तने में एक कोटर था जिसमें कि एक नन्हा सा पीपल का पौधा पनप रहा था। मुझे उत्सुकता हुई। ये तो बहुत सुंदर दृश्य है। एक नीम का पेड़ अपने गर्भ में पीपल को पाल रहा है। करीब जाकर तस्वीर लेने वाला था कि तभी उस नन्हे पीपल के पौधे के पीछे एकाएक कुछ हलचल सी हुई। लगा कि कुछ था वहां पर। पेड़ के पास ही गड़े एक खुंटे पर पैर रखकर उचक कर देखा तो दो खाकी रंग वाले मेंढ़क दिखाई दिये। मेरी खुशी का ठिकाना न रहा। ऐसा दृश्य पहली बार देखा था मैंने जिसमें कि एक नीम का पेड़ हो, उसके गर्भ (कोटर) में एक पीपल का पौधा पल रहा हो और वहीं पर दो मेढ़क भी रह रहे हों। 

दोनों मेंढकों के सिर की हल्की सी झलक
    कैमरे को एडजस्ट कर, तस्वीरें लेने की तैयारी कर ही रहा था कि मेरी उपस्थिति से वे मेंढ़क अपने उसी कोटर में गहरे जा घुसे। मैं थोड़ा निराश हुआ कि यार अच्छा सीन कैप्चर कर रहा था ये कम्बख्त अंदर क्यों चले गये। एक छोटा सा कंकड़ उछाला उस कोटर की ओर लेकिन नतीजा सिफ़र। दोनों मेढक और अंदर की ओर हो लिये। उस दिन शाम हो चली थी सो वापस हो गया । 

    अब अगले दिन सुबहिये मैं फिर वहीं पहुँचा, कैमरा कुमरा लेकर। लेकिन उन दोनों मेढ़को का सिर्फ हल्का सा सिर ही दिखाई दे रहा था। और करीब जाने का मतलब था कि उन्हें फिर कल की तरह कोटर में भीतर की तरफ जाने का मौका देना। थोड़ी देर रूक कर इंतजार किया। इधर उधर और तस्वीरें खींचा लेकिन ये मेंढ़क न तब बाहर निकले न अब। मजबूरन जैसे तैसे एक दो तस्वीरें जूम करके कैप्चर किया। उसमें भी सही ढंग से नहीं आये कम्बख्त। 

      शाम के वक्त फिर से वहां पहुंचा लेकिन शायद अब उन्हें मेरे वहां आने का भान हो गया था पहले ही। वो पीपल की ओट से उपर ही नहीं दिखते थे कभी। वैसे भी मैं कौन सा वाईल्ड लाईफ फोटोग्राफर था जो ऐसे चित्र लेने के लिये तमाम नाईट विजन कैमरा, स्टैंड आदि लेकर गया था कि कैमरा सेट करके रख देता, निकलते जब निकलते। 

नेट से उपलब्ध ब्राउन ट्री फ्रॉग का चित्र 
      यदि ले गया होता तो संभवत: खाकी वर्दी ओ ओ..ओ......खाकी रंग वाला मेढ़कों का सरदार मुझसे पुलिसिया अंदाज में जरूर पूछता....क्या फोटो ले रहे हो ....किसके लिये ले रहे हो.......इन लोगों में क्या खास बात है जो फोटो ले रहे हो......ये लोग भी तो तुम शहर वालों की तरह कोटर जीवी हैं ...कोटर में रहते हैं.....देखो उनके यहां एक गैलरी भी है, बगीचा भी है पीपल वाला...... ठीक तुम लोगों की तरह ही तो रहते हैं...........फिर क्यों खीच रहे हो फोटो........कुछ  गड़बड़ तो नईं है ना...... मालूम नहीं क्या...... कि आतंकवादी लोगों की वजह से इलाका हाई अलर्ट पर है.......चलो लाईसेंस दिखाओ :)

-  जी लाइसेंस तो नहीं है। 

तो निकालो पचास ....कम से कम आज का प्याज का खर्च तो निकलेगा   :)

 -  सतीश पंचम


स्थान -  वही, जहाँ पर मेरा कोटर है।


समय - वही, जब कोटर से निकल कर एक नर मेंढ़क बाहर की ओर देखे और दूसरे से कहे, लगता है चला गया वह फोटो वाला, और तू सजती ही रह गई ।

21 comments:

गिरिजेश राव said...

शुरू में क़ोट कर के टिप्पणी लिखना चाहा लेकिन देखा कि बहुत बड़ी हो जाएगी, सो ऐसे ही झेलो।
पहला तो यह कि आप कहाँ से कहाँ पहुँचा देते हैं और पाठक बेचारा आखिर में इतना मुग्ध हो जाता है कि कंफ्यूज हो जाता है - कहाँ कितना मुग्ध हुए! कहाँ सबसे अधिक?
दूसरा ये कि मेढकों से पूछे कि नहीं - अमाँ गमले में पीपल कैसे लगाया जाता है?
पौधों के ऊपर पलते पौधों के कई चित्र मेरे मोबाइल में पड़े हैं - कभी मैं भी...

Arvind Mishra said...

कोटरे वाला प्राणी दुसरे कोटरे के प्राणी से डर गया हा हा!

ललित शर्मा said...

@एक नर मेंढ़क बाहर की ओर देखे और दूसरे से कहे, लगता है चला गया वह फोटो वाला, और तू सजती ही रह गई ।

गजब कह दिया भई।

आभार

मो सम कौन ? said...

ये खाकी रंग कब मुझे छोड़ेगा?
- पचास का नोट लेकर छोड़े देगा भिड़ु, काये कू प्रकृति प्रेम का गला घोंटना:)

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

सतीश जी!परिचय तो काफी पुराना हुआ.. पर पहली बार ही आना हुआ... हमारे आँगन में भी एक पीपल का पेड़ है, जिसपर नीम उगा है..कई जगह देखा है...
प्रकृति प्रेम, प्याज़,पेड़ में पलते मेढ़्क और पचास की पत्ती... पूरा कोलॉज दिल के कनवास पर जम गया.
मज़ा आया कुल मिलाकर!!

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

अरे, हमारे गाँव के तारा पर जो पुराना पीपल था, उसमें तो कुचकुचवा था।

अब देखते तो बहुत शहरी प्रतीत होता! :)

abhi said...

मुझे भी गाँव जाना है :( लेकिन मौका नहीं लग रहा..
वैसे एकदम सही बात...बैंगलोर में कितने ऐसे मौके आते हैं की हम सोचते हैं फोटो लेंगे लेकिन फिर ये सोच के की कहीं कोई टोक न दे फोटो नहीं ले पाते :(

मस्त पोस्ट..

डॉ. मनोज मिश्र said...

जिंदा रखिये यह लेखन, मुंबई में रह कर कोटर की याद-कमाल हैं आप भी-आपकी लेखनी भी-सलाम.

सोमेश सक्सेना said...

आज तो आपको गुरु मान गए भाई। आपके व्यंग्य पर तो मैं पहले ही फ़िदा था और आपके इस गध शैली पर तो मुग्ध ही हो गया। गिरिजेश जी ने जैसे मुझे ही ध्यान में रखकर अपनी टिप्पणी की है। और आप तो फोटुवा भी अच्छा खींच लेते हैं।
जय हो गुरुदेव...!

प्रवीण पाण्डेय said...

सच है, भूख मिट जायेगी, प्याज नहीं मिटेगी।

Rahul Singh said...

गम और खून के बाद अब लीजिए आपके लिए लाए हैं 'प्‍याज के आसूं.'

सुज्ञ said...

सार्थक व्यंग्य कोटर कथा।
और फोटो प्रयास वृतांत।
मुंबईया जिन्दगी का सच अभिव्यक्त हुआ!!

ravishndtv said...

achhaa lagaa parh kar.

sanjay jha said...

jai ho apke material selection ko....
kya..kya na nikale hain 'is kotar' se

nihayat hi bachpan me le gaye ......


pranam.

ajit gupta said...

कोटर बड़ा अच्‍छा लगा। मुम्‍बई के घरों की तुलना कोटर से करना भी मजेदार ही लगा।

मनोज पाण्डेय said...
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anitakumar said...

नीम के पेड़ में कोटर हो सकता है मेरे लिए तो पहले यही आश्चर्यजनक बात है और उसमें भी पीपल का पेड़, प्रकृति भी कमाल करती है, लगता है धरती के दाम प्रकृति के लिए महंगे हो गये हैं और उसे अपना काम कोटर से चलाना पड़ रहा है।

rashmi ravija said...

कभी कोटर में उतर कर देखा है,....पूरा एक जग बसा होता है...:)

यह व्यथा तो है ही मुंबई वालों की..पर फिर भी इनके जीने का उत्साह अब तक बना हुआ है.

जे.जे आर्ट्स कॉलेज के छात्रों को एक दिन में 'चालीस स्केचेज़' बनाने होते हैं....वे स्टेशन..समुद्र तट,मल्टी स्टोरी बिल्डिंग्स के सामने ....कहीं भी बैठ, उस जगह की स्केच बनाया करते हैं..कई बार बेचारों को पुलिस की पूछ-ताछ का सामना करना पड़ता है.

अनूप शुक्ल said...

जय हो!

दीपक बाबा said...

दिमाग तो विस्तृत हैं....... गाँव की तरह और दिल कोटर जैसे छोटे छोटे.......... मानसकिता का एक खेल ये भी.......

मेढ़क मैडम तो सजने गयी थी........ पर ऐसा लंठई कैमरामन था...... कि उका सजने का मौका भी नहीं देता........ बिना फोटू खीचे आ गया........

हो सकता है....... सुसरा कहीं दूर बैठा हुक्का पी रहा होगा..... और मैडम जी कैसे बाहर आती..........

खुशदीप सहगल said...

सुदूर खूबसूरत लालिमा ने आकाशगंगा को ढक लिया है,
यह हमारी आकाशगंगा है,
सारे सितारे हैरत से पूछ रहे हैं,
कहां से आ रही है आखिर यह खूबसूरत रोशनी,
आकाशगंगा में हर कोई पूछ रहा है,
किसने बिखरी ये रोशनी, कौन है वह,
मेरे मित्रो, मैं जानता हूं उसे,
आकाशगंगा के मेरे मित्रो, मैं सूर्य हूं,
मेरी परिधि में आठ ग्रह लगा रहे हैं चक्कर,
उनमें से एक है पृथ्वी,
जिसमें रहते हैं छह अरब मनुष्य सैकड़ों देशों में,
इन्हीं में एक है महान सभ्यता,
भारत 2020 की ओर बढ़ते हुए,
मना रहा है एक महान राष्ट्र के उदय का उत्सव,
भारत से आकाशगंगा तक पहुंच रहा है रोशनी का उत्सव,
एक ऐसा राष्ट्र, जिसमें नहीं होगा प्रदूषण,
नहीं होगी गरीबी, होगा समृद्धि का विस्तार,
शांति होगी, नहीं होगा युद्ध का कोई भय,
यही वह जगह है, जहां बरसेंगी खुशियां...
-डॉ एपीजे अब्दुल कलाम

नववर्ष आपको बहुत बहुत शुभ हो...

जय हिंद...

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