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Saturday, December 25, 2010

वेटर से डॉक्टर बनने का सफर.............सतीश पंचम

    हाल ही में बी.बी.सी के नेट संस्करण पर तफ़रीह कर रहा था कि अचानक एक खबर पर नज़र टिक गई। यह ख़बर मेरे जिले जौनपुर से थी। स्वाभाविक था कि मेरा वहां ध्यान जाता।
  खबर के अनुसार वहां पर एक होटल में वेटर का काम करने वाले एक शख्स रमेश थापा ने अपनी वेटर की नौकरी करने के साथ ही साथ अपनी पढ़ाई भी जारी रखी और एक दिन वह आया कि उसके हाथ में थी पी.एच.डी. की डिग्री। अब रमेश थापा वहां पर वेटर का काम तो कर ही रहे है, साथ ही साथ एक जगह अंशकालिक प्रवक्ता के तौर पर भी अपना योगदान दे रहे है। इस तरह से दो जगहों की नौकरी के पीछे का किस्सा भी अपने आप में रोचक लगा।
  इस खबर को पढ़ कर मुझे थोड़ा अच्छा लगा कि चलो, इस तरह की कोई तो पॉ़जिटिव खबरें अब भी छप रही हैं, वरना तो अखबारों ने इस तरह की खबरें छापना न जाने कब से बंद कर दिया है। जहां देखो वहीं मार-काट, हंगामें, चिल्ल पों वाली खबरें हैं। कहीं पर फिल्मी हिरोइनों की खबर को प्रमुखता दी जा रही है तो कहीं पर किसी के दावतनामे को लेकर कसीदे पढ़े जा रहे हैं।  
   लिजिये आप भी पढ़िये वह पूरी खबर जिसे मैंने बी.बी.सी. हिंदी की वेबसाइट पर मुकुल श्रीवास्तव के कॉलम में पढ़ा है और वहीं से साभार इसे यहां पेश कर रहा हूँ 
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      डॉक्टर रमेश थापा उत्तर प्रदेश के जौनपुर ज़िले के एक होटल में वेटर हैं पर उनके पास पीएचडी डिग्री है.
दिन में वह जौनपुर के एक महाविद्यालय में अंश कालिक प्रवक्ता के रूप में काम करते हैं और शाम को फिर वेटर बन जाते हैं.
पढ़ने का जज्बा 
पाँच भाई और एक बहन के भरे-पूरे परिवार में रमेश का जन्म नेपाल के जनकपुर ज़ोन के सिन्दुली ज़िले में हुआ.पिता भक्त बहादुर निरक्षर किसान थे लेकिन अपने बेटे को हमेशा पढ़ने के लिए प्रेरित करते थे.
गरीबी पढाई में बाधा तो बनी पर रमेश के जज़्बे के आगे कोई मुश्किल टिक नहीं पाई.
पढाई में तेज़ होने के कारण उन्हें बचपन से ही तत्कालीन नेपाल सरकार की रत्न बाल कोष छात्रवृति मिलने लगी जिससे पढाई जारी रही.
इसी बीच एक लंबी बीमारी के बाद रमेश के पिता का निधन हो गया और नेपाल की राजनीतिक परिस्थितयाँ भी बिगड़ने लगीं और नेपाल सरकार से मिलनेवाली छात्रवृत्ति बंद हो गई.
रमेश अपनी पढाई जारी रखना चाहते थे पर आर्थिक परिस्थितियों से विवश होकर उन्होंने नौकरी करने का फ़ैसला किया.
नेपाल में कोई ठीक रोज़गार नहीं मिल पाया तो रोज़गार की तलाश में वो वाराणसी आ गए .
संघर्ष
फिर शुरू हुआ संघर्ष. एक नए दौर में, नए परिवेश में, घर- परिवार से दूर और अपनी बचत घर भेजने की मजबूरी के बीच रमेश ने सबके बीच सामंजस्य बिठाया.रमेश जब भारत आए तो वह सिर्फ़ दसवीं पास थे. अपने बड़े भाई राजू की मदद से वे जौनपुर के एक होटल में वेटर हो गए.
वो जब भी अकेला होता तो उसे अपने पिता की बहुत याद आती जो उसे हमेशा पढ़ने के लिए प्रेरित किया करते थे.
वो याद करते हुए बताता है कि ये शायद उनका ही आशीर्वाद था जो वो इतनी विपरीत परिस्तिथियों के बावजूद यहाँ तक पहुँच गया.

जौनपुर में काम करने के साथ उसने व्यक्तिगत परीक्षार्थी के रूप में बारहवीं की परीक्षा पास की.
फिर तो उसके हौसलों को पंख लग गए. दिन में जब काम का दबाव कम होता तो वो पढता और शाम को पेट की आग बुझाने के लिए वेटर की वर्दी पहन लेता.
उसकी लगन को देख कर होटल के मैनेजर जितेंद्र यादव ने भी उसका हौसला बढ़ाया.
बीए और एमए करने के बाद उसने शोध छात्र के रूप में जौनपुर के ही वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय के टी डी महाविद्यालय में ग्राम्य सामाजिक विकास में उद्योगों की भूमिका विषय पर शोध छात्र के रूप में दाखिला ले लिया.
सपना
वेटर और शिक्षक के रूप मे दोहरे दायित्वों को निभाने के बारे में रमेश का नजरिया एकदम स्पष्ट है.
रमेश पिछले दो साल से अंश कालिक प्रवक्ता के रूप में काम कर रहें हैं जहाँ उन्हें तीन हज़ार रुपए मिलते हैं.
पर जब कोई छात्र होटल में खाना खाने आता है तो वह उसका सम्मान एक ग्राहक की तरह से ही करते हैं.

हाँ यह बात अलग है कि उनके छात्र होटल में भी उन्हें सम्मान देते हैं.
भविष्य की योजनाओं के बारे में रमेश बताते हैं वे जल्दी ही माँ का आशीर्वाद लेने नेपाल चले जायेंगे और फिर शिक्षण में अपना भविष्य तलाशेंगे.
रमेश के शोध निर्देशक डॉ आर एन त्रिपाठी बताते हैं कि रमेश को अपने निर्देशन में शोध कराने का एक मात्र कारण उनका पढाई के प्रति लगाव और शिक्षक बनने की चाह थी.

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  डॉक्टर रमेश थापा के इस जज़्बे और हौसले को देख कर मुझे 

गुलज़ार की लिखी एक त्रिवेणी याद आती है जिसमें वह कहते हैं कि - 



बे लगाम उड़ती हैं कुछ ख़्वाहिशें ऐसे दिल में

'मेक्सीकन' फिल्मों में कुछ दौड़ते घोड़े जैसे


थान पर बाँधी नहीं जातीं सभी ख्वाहिशें मुझसे



  उम्मीद है डॉक्टर रमेश थापा अपनी ख्वाहिशों को आगे इसी तरह से     
पूरा करेंगे । उनके उज्जवल भविष्य की कामना करता हूँ। 
 

- सतीश पंचम



    20 comments:

    VICHAAR SHOONYA said...

    रमेश थापा के होसले और जज्बे को सलाम.

    ajit gupta said...

    ऐसी लगन ही व्‍यक्ति का महान बनाती है। रमेश थापा को हमारी शुभकामनाएं।

    गिरिजेश राव said...

    रोना, हाथ मलते किनारे पड़े रहना सभी कर लेते हैं
    कुछ हैं जिनके हाथों की खुजली मलने से नहीं जाती।

    जय थापा! जय हिन्द!!

    मो सम कौन ? said...

    सनसनीखेज खबरों के बीच एकाध ऐसी खबर भी छाप देती हैं अखबारें, और आप जैसे हैं कि ढूंढ भी लाते हैं। रमेश थापा जी को शुभकामनायें और और और आपकी पारखी नजर को सलाम।
    गुरू अब तो एकाध पुरस्कार, उरस्कार हमें भी दिलवा दो, इतनी तारीफ़ कर दी है:)

    सोमेश सक्सेना said...

    प्रेरणादायी प्रसंग है। इनके जीवन से काफी कुछ सीखा जा सकता है।

    abhi said...

    वाह..बहुत अच्छा लगा पढ़ के...:)

    निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...

    a very positive post. thanx.

    रचना said...

    मेश थापा के होसले और जज्बे को सलाम.

    सुशील बाकलीवाल said...

    रमेश थापा के होसले और जज्बे को सलाम. उम्मीद है शीघ्र ही वे अपने जीवन का मनपसन्द मुकाम पावें ।

    प्रवीण पाण्डेय said...

    क्या कहें, थापाजी का विश्वास स्वयं पर है, स्तुत्य उदाहरण।

    अनूप शुक्ल said...

    डा. रमेश थापा की कहानी पढ़कर यही याद आता है:
    जो सुमन बीहड़ों में, वन में खिलते हैं
    वे माली के मोहताज नहीं होते,
    जो दीप उम्र भर जलते है
    वे दीवाली के मोहताज नहीं होते।

    उनके जज्बे, हौसले, मेहनत को सलाम।

    आपका शुक्रिया इस पोस्ट को पढ़वाने के लिये।

    Arvind Mishra said...

    मुकुल ने अच्छी सुनायी है -बढियां है !

    देवेन्द्र पाण्डेय said...

    डा0 रमेश थापा के जज्बे को सलाम साथ ही उनको नमन जिन्होने उनका उत्साह वर्धन किया।

    मनोज कुमार said...

    बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
    एक आत्‍मचेतना कलाकार

    Rahul Singh said...

    ऐसे लोग तो अब भी हैं, लेकिन सचमुच दुर्लभ हो गई हैं ऐसी खबरें.

    Kajal Kumar said...

    डॉक्टर रमेश थापा को सलाम.
    ऐसा ही कहानी एक और व्यक्ति की है जिसने कभी दिल्ली के मद्रास होटल (कनाट प्लेस) में रसोइये का काम करते हुए पढ़ाई पूरी की फिर "नार्थ ईस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी" से प्रोफेसर (linguistics) हो कर लौटे. बिटिया को पी.एच.डी. कराया, बेटे को सिविल सर्विस...
    पर हां, हमारे मीडिया के लिए ये समाचार नहीं हैं.

    खबरों की दुनियाँ said...

    प्रेरक प्रसंग - अच्छी पोस्ट , शुभकामनाएं । "खबरों की दुनियाँ"

    उपेन्द्र ' उपेन ' said...

    सतीश जी बहुत ही प्रेरणा प्रद प्रस्तुति . थापा जी की कहानी उन लोंगों के लिए एक आदर्श और प्रेरणा है जो गरीबी का रोना रोकर अपनी पढाई बीच में छोड़ देते है. एक अच्छी और सीख देती हुई थापा जी कहानी को शेयर करने के लिए आपका आभार.डॉ. रमेश थापा को सलाम......
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    डॉ. मनोज मिश्र said...

    सतीश भाई, यह साल के महीनों की चर्चित खबर रही हमारे विश्वविद्यालय के लिए.थापा से तो हम सब की अक्सर मुलाकातें होती रहती हैं,निश्चित रूप से यह उनकी मेहनत का फल है.
    बाकी इस खबर का एक पहलू और भी है जिसे आपसे जौनपुर आने पर थापा के साथ मिल बैठ कर बात करने पर ही जाना जा सकता है.
    अब मौन टूट गया है,पोस्ट पर टिप्पणी मिलती रहेगी.

    Mukul Srivastava said...

    सतीश जी आज आपका ब्लॉग देखा मेरी रिपोर्ट को लोगों तक पहुंचाने के शुक्रिया

    फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

    फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'
    A Photo from - Thoughts of a Lens

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