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Tuesday, December 21, 2010

राष्ट्रीय ब्लॉगर पुरस्कार अनुसंधान संस्थान...........सतीश पंचम

        'राष्ट्रीय ब्लॉगर पुरस्कार अनुसंधान संस्थान' .....एक ऐसा संस्थान ..... जिसके बारे में जितना कुछ कहा जाय, कम है। बता दूं कि ब्लॉगरों की हिंदी सेवा के लिये पुरस्कार, उनकी भावना, उनकी सद्भावना, उनके प्रति आभार आदि प्रकट करने हेतु इसकी स्थापना हुई है। यही एक एकमेव संस्थान है जिसके द्वारा जताये आभारों का भार ही इतना ज्यादा है कि संभाले नहीं संभल रहा। जैसे ही यह संस्थान अपनी ओर से किसी के प्रति आभार प्रकट करते हुए किसी का सम्मान करता है, तुरंत ही पृथ्वी करीब सवा इंच दब जाती है। इधर पृथ्वी दबी नहीं कि वैज्ञानिकों के सिस्मोग्राफ थरथराने लगते हैं। रिक्टर स्केल में रीडिंग की नाप जोख होने लगती है।

     यहां तक कि वैज्ञानिकों ने चिंता जताई है कि इस तरह के आभार प्रकटीकरण और पुरस्कार वितरण सम्मान आदि से यदि धरती दबती गई तो हो सकता है पृथ्वी, सूर्य के चारों ओर घूमने की अपनी कक्षा से ही हट जाय और बहुत संभव है उसका घूर्णन काल ही समाप्त हो जाय।

          लेकिन मानना पड़ेगा इस संस्थान के प्रबंधक श्री पुरस्कारी लाल जी 'अजोर' के हौसले को। इतना सब होने पर भी अपने पुरस्कार वितरण कार्यक्रम से जरा भी पीछे नहीं हटते। रात दिन पुरस्कारों के बारे में सोचते रहते हैं, किसको किस नाम से पुरस्कार दिया जाय यही सोच उन्हें खाये जाती हैं। और यदि कुछ नहीं भी कर रहे हों तब भी नहीं सोचने का काम तो कर ही रहे होते हैं। लेकिन ऐसा दिन कम ही आता है कि जब उन्हें खाली बैठना पड़े। अमूमन रोज ही किसी न किसी ब्लॉगर को पकड़ कर इनकी ओर से सम्मानित कर दिया जाता है। जो नहीं भी लेना चाहते उनको भी दौड़ा दौड़ा कर दिया जाता है कि ले लो यार, दे ही तो रहे हैं। कुछ तुमसे मांग तो नहीं रहे। और सामने वाला बिचारा संकोच से धन्यवाद कह कर रख लेता है। मन ही मन कहता भी है कि कम्बख्तो पुरस्कार बांट रहे हो कि आलू टमाटर। वैसे आलू टमाटर की भी कीमत तुम्हारे इन पुरस्कारों से ज्यादा है। कुछ तो शर्म करो। लेकिन पुरस्कार अनुसंधान संस्थान के कर्ता धर्ता मानें तब न। करेंगे अपने मन की ही।

     उधर  पुरस्कारों के वितरण को लेकर इतने ज्यादा बिज्जी रहते हैं श्री पुरस्कारी लाल जी 'अजोर' कि दोपहर में केवल कुछ समय के लिये ही बिचारे पॉवर नैप लेते हैं औऱ उसी दौरान उनकी हजामत भी बनाई जाती है। सुना तो यह भी है कि जो नाई उनकी हजामत बनाता है उसे भी वर्ष का सर्वश्रेष्ठ हजामतिया ब्लॉगर पुरस्कार बांट चुके हैं।

     आज इसी ' राष्ट्रीय पुरस्कार अनुसंधान संस्थान' के Annual day के मौके पर श्री बटुर चाम- लिंगम जी भाषण दे रहे हैं। बता दूँ कि श्री बटुर चाम-लिंगम जी 'राष्ट्रीय पुरस्कार अनुसंधान संस्थान' के सबसे अच्छे स्टूडेंट के रूप में जाने जाते हैं और श्री पुरस्कारी लाल जी 'अजोर' के प्रिय शिष्य भी हैं। सभी लोग उनकी बौद्धिकता का लोहा- लक्कड़ मानते हैं। यह अलग बात है कि श्री बटुर चाम-लिंगम जी की सारी बौद्धिकता उनके नाम को सार्थक करते हुए दैहिक चमड़ी और लैंगिक अनुसंधान तक ही बटुर कर रह गई है।

      तो लिजिये, आप भी पढ़िये श्री बटुर चाम-लिंगम जी का वह भाषण जिसे उन्होंने दिया था.....

     आदरणीय सभापती महोदय...अतिथि विशेष ब्लॉगर मंत्री श्री तुम तुम तारा रारा जी.....माननीया पोस्टकार और मेरे पियारे टिप्पणीपतियो.......आज अगर राष्ट्रीय पुरस्कार अनुसंधान संस्थान का नाम बुलंदियों को छू रहा है तो उसका श्रेय सिर्फ और सिर्फ एक इंसान को जाता है श्री पुरस्कारी लाल जी 'अजोर' को ....गिव हिम ए बिग हैंड......

       पिछले कुछ महिनों से इन्होंने निरंतर इस संस्थान से पुरस्कार पे पुरस्कार बांटे हैं.......अपनी विद्वता के लिये जाने जाने वाले वर्ष के सर्वश्रेष्ठ वृषभ ब्लॉगर , अपनी विनम्रता के लिये जाने वाले वर्ष के सर्वश्रेष्ठ गाय ब्लॉगर, अपनी चिलगोजई के लिये जाने जाने वाले वर्ष के सर्वश्रेष्ठ छछूंदर ब्लॉगर, कोयल , कंगारू, तीतर, बटेर ....ऑल दिस काइंड ऑफ ब्लॉगर पुरस्कार्स........ उम्मीद है आगे भी ये ऐसे ही बांटते रहेंगे.......हमें तो आश्चर्य होता है कि एक इंसान अपने जीवन काल में इतने पुरस्कार कैसे बांट सकता है।

      इन्होने कड़ी तपस्या से अपने आपको इस काबिल बनाया है .......सुबह उठते ही सबसे पहले यही सोचते हैं कि आज कौन सा पुरस्कार किसका नाम देते हुए किसको दिया जाय। वक्त का सही उपयोग....घंटे का पूरा इस्तेमाल कोई इनसे सीखे.....सीखिये इनसे सिखिये....

       आज हम छात्र यहां हैं.....कल देश विदेश मे फैल जाएंगे......वादा है आपसे जिस देश में रहेंगे वहां पुरस्कार बांटेंगे......इस संस्थान का नाम रोशन करेंगे.....दिखा देंगे सबको.....पुरस्कार प्रदान करने की क्षमता जो यहां के छात्रौं में है वो संसार के किसी छात्रों में नहीं है.....नो अदर छात्रा ....नो अदर छात्रा.....

      आदरणीय टिप्पणी मंत्री जी, नमस्कार....आपने इस संस्थान को वो चीज दी जिसकी हमें सख्त जरूरत थी.....टिप्पणी.....

     टिप्पणी होती सभी के पास है.....सब छुपा के रखते हैं.....देता कोई नहीं......आपने अपनी टिप्पणी इस पुरस्कारी पुरूष के हाथ में दिया है....अब देखिये येह कैसा इसका उपयोग करते हैं.....

 फिलहाल तो इस अवसर के लिये तैयार किये गये लाईब्रेरीयन दुबे जी का यह शेर सुनिये......
उत्तमम् ब्लॉगम.......No one पूछतम्
निकृष्टम ब्लॉगम....टुचुक टुचुक....
कनिष्ठम ....थुडथुड़ीत पाखंडम....
छद्म ब्लॉगरी....प्राण गटकम् :)

  - इति पुरस्कारी लाल जी 'अजोर' कथा :-)
-------------------------------------------------------

       यह पोस्ट अमरेन्द्र प्रकरण पर आधारित है। अमरेन्द्र के द्वारा उठाये गये एक वाजिब मुद्दे पर जिस तरह से पुरस्कार बांटते, और तमाम चिलगोजइयां करते हुए, टिप्पणीयाँ हटाईं और खुद अपनी भद्द पिटवाई है, उसी के आलोक में यह पोस्ट लिखी गई है।


     सुधीजनों से आशा है कि पूरा प्रकरण जानते होंगे। यदि न जानते हों तो उस पोस्ट को पढ़ लें। जिसमें कि बताया गया है कि कैसे कैसे मुखौटा लगाये हुए लोग ब्लॉगिंग की ऐसी तैसी करने में लगे हुए हैं। कैसे सम्मान देने और एक दुसरे की पीठ खुजाने के पुनीत कर्म में लगे हुए हैं।

     मैं यह पोस्ट लिखना नहीं चाहता था क्योंकि इस तरह बार बार ब्लॉगिंग को लेकर लिखी पोस्टें मुझे एक तरह की बोरियत और टैम खोटी करने का माध्यम सी लगती हैं। लेकिन जब मन में आ गया कि पुरस्कार बांटू बंदे की मौज लेनी चाहिए तो फिर तो की बोर्ड खड़खड़ाने लग गये।

  इस  पूरे प्रकरण से इतना जरूर अच्छा हुआ है कि एक और मुखौटा उतर गया है। हिंदी सेवा के नाम पर सम्मान देने, और लेने का खेल कैसे होता था यह सब लोग अमरेन्द्र के द्वारा उठाये गये एक सवाल से जान गये।

       वैसे, सब लोग तो समझ ही रहे थे लेकिन कह शायद इसलिये नहीं रहे थे कि कौन फिजूल में अपना मगज खराब करे। और यही मानसिकता मेरी भी थी। लेकिन फिर जब लगा कि थोड़ा सा  मौजायन हो जाय......तो ठेल दिया  :-)

 आशा है, अब तक मेरी इस फालतू सी पोस्ट पढ़ने की वजह से आप भी अपना अच्छा खासा टैम खोटी कर चुके होंगे   .......... हांय.....ये धरती क्यों दब गई है......मैं क्या इतना बोझ हो गया हूं ?

 ओह....लगता है एक और पुरस्कार घोषित हो गया है :-)

Speech courtecy :  3 इडियट्स ।

(चूंकि इस मुद्दे पर काफी बहस मुबाहिसा हो चुका है लिहाजा नाहक ही बातों को और लंबा खिंचने से बचाने के लिये कमेंट ऑप्शन बंद किया जा रहा है। )

61 comments:

दीपक बाबा said...

भई वाह ........

उत्तमम् ब्लॉगम.......No one पूछतम्
निकृष्टम ब्लॉगम....टुचुक टुचुक....
कनिष्ठम ....थुडथुड़ीत पाखंडम....
छद्म ब्लॉगरी....प्राण गटकम् :)

ब्लॉगपीठधिषम नममोःम



कुछ ऐसे ही व्यंग की उम्मीद थी......... और आपने पूरी की.

महेन्द्र मिश्र said...

लिखने में आप भी अपना अच्छा खासा टैम खोटी कर चुके होंगे ...... हा हा हा हा

rashmi ravija said...

क्या खरी-खरी लिख डाली है , भई
आपके ही वश का था यह....
बड़ी पैनी नज़र है आपकी....:)

abhi said...

हा हा हा एकदम मस्त...
ये क्लास मस्त लगी सतीश जी :)

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी said...

दोषों की सत्ता भी अपार-व्यापी होती है . बड़े तंत्र से लेकर छोटे तंत्र तक . पुरस्कार वितरण की राजनीति बड़ी संस्थाओं में दिखती ही है , वही इस स्थूल ब्लॉग माध्यम में भी देखी जा सकती है ! जो होना है वह तो चलता ही रहेगा . 'अंजोर' जी की जगह कोई 'छिटोर' जी आ जायेंगे ! और अधिसंख्य लोग सम्मान लिप्सु होते ही हैं , इसलिए उन्हें ( सम्मान वितरकों को ) फलने-फूलने के हसीन अवसर रहते हैं फिर वही होता है :

सम्मान की आड़ में |
गुणवत्ता गई भाड़ में ||

सारे लिखने वाले नहीं कह सकते ' संतन को कहाँ सीकरी सो काम' . सो पुरस्कार का लेमनचूस चूसने अधिक संख्या में लोग पहुँच जाते हैं , वाहवाही करते हैं फिर 'प्रश्न-वाचकता' का ध्यान किसमें रहता है . तुलसी से सबने कहाँ सीखा - 'कीन्हें प्राकृत जन गुण गाना / सर धुनि गिरा लागि पछिताना' . सब इन पुरस्कार छीटू जीव का गुणगान करते रहते हैं . ठीक वैसे ही जैसे दो कौड़ी के लेखन पर सस्ती सी 'सुन्दर/मार्मिक/बेहतरीन' की उक्ति . कबीर का साहस सबमें कहाँ दिखेगा ! { इसका मतलब यह नहीं कि मैं कह रहा हूँ तो कुम्भन या तुलसी जैसा हूँ , बल्कि उस फक्कड़ गुणग्राही प्रवृत्ति पर भी ध्यानस्थ होना चाहिए , सीखने की बात करनी चाहिए , इसलिए कह रहा हूँ }

पर सबसे दुखद होता है 'प्रश्नचिन्हों' का मिटाने की राजनीति . परिवेश में किसी की बोलती बंद करने/कराने की राजनीति . इस तरह का एकतरफा डिलीतीकरण ब्लॉग-स्पेस के भाषायी लोकतंत्र (?) में पनपे/पसरे/फूले/फले निरंकुश्वाद का उग्र प्रमाण है ! इत्यलम् !

sanjay jha said...

SATIK......KYA......NISHANA


PRANAM

अविनाश said...

पंचम जी की चमचमाहट
चम्‍मच से टकराहट
अनुसंधान में से संधान
संधान में से धान
फिर सब धान बाईस पसेरी
सब जगह बंटता है
लेने वाला डटता है
वैसे अब न पसेरी है
न सबको
धान की सभी क्‍वालिटी
पसंद आती हैं
इसलिए तो ब्‍लॉगिंग में
अनुसंधान के अणुओं की
धान के जुगाडुओं की
चलानी पड़ती गाड़ी है।
ब्लॉगिंग, सामाजिक सरोकार, छत्तीसगढ़ भवन बैठक...खुशदीप

गिरीश बिल्‍लौरे और अविनाश वाचस्‍पति की वीडियो बातचीत

रचना said...

good post i liked it

प्रवीण पाण्डेय said...

पता नहीं मेरे गूगल रीडर में कौन सा फिल्टर लगा है कि झगड़ा बढ़ाने वाली कई पोस्टें आने ही नहीं देता है, जय हो गूगल देवता।

वैसे आप अच्छी फिलिम स्टोरी लिख सकते हैं।

Shiv said...

मस्त पोस्ट!

कुछ टिप्पणियों को डी-कोड करने के लिए एक ठो अखिल भारतीय ब्लॉग टिप्पणी डी-कोडिंग संस्थान भी खुलवाया जाय!

वैसे हलकान भाई ने ब्लागिंग के धूल सिद्धांत नामक पुस्तक में लिखा है कि; पुरस्कार वितरण ही असली ब्लागिंग है.

सतीश सक्सेना said...

जिस प्रकार अमरेन्द्र जैसी प्रतिभा पर, निर्मम मार की जा रही है वह ब्लॉगजगत के लोगों की जिद्दी और बदला लेने की मानसिकता बताती है जिस प्रकार इस घटिया रंजिश को लोग, आग लगा कर वाह वाही और चाटुकारिता दिखा रहे हैं वह वाकई दर्शनीय है !
अच्छा है कि आँखों से पर्दा तो हटा !

अल्पना वर्मा said...

हिंदी ब्लॉगजगत में अपने 'वास्तविक प्रोफाईल आई डी' के साथ 'सीधा साफ़/बेबाक सच बोलने वालों' के लिए आराधना जी की टिप्पणी ke कुछ अंश सीख के रूप में अपनाने चाहिए.
[यह टिप्पणी अमरेन्द्र जी की पोस्ट पर आई थी ]
जो कुछ इस प्रकार हैं-
1. जब आपकी आलोचना को कोई आलोचना ना मानकर आक्षेप माने, आपके द्वारा आलोचना करने से कोई अपने को सुधारे ना, तो वहाँ अपनी ऊर्जा व्यर्थ करने का क्या फायदा?
2. अपनी ऊर्जा को सही जगह पर लगाओ. यहाँ तुम्हारी आवाज़ कोई नहीं सुनने वाला और ना ही समझने वाला.
3. इन तमाम विसंगतियों के बावजूद कुछ लोग हैं, जो इन सब से दूर रहकर अपने लेखन कार्य में व्यस्त हैं. तो सकारात्मक चीज़ों को देखो, नकारात्मक बातों में खुद को उलझाने का कोई फायदा नहीं.
...........
और रविन्द्र नाथ टेगोर जी का बंगला गीत याद करीए -
जोदी तोरू डाक शुने कोई न आशे तोबे एकला चोलो रे...[अर्थ-सुन के तेरी पुकार संग चलने को तेरे कोई हो न हो तैयार ..अकेला चल चला चल..]

मो सम कौन ? said...

इस प्रकरण का पता अनायास ही चला था, और यकीन मानिये कोई दुख नहीं हुआ, कोई झटका नहीं लगा। यहाँ के माहौल को कुछ तो समझ ही गये हैं। एक बार तो मन में आया था कि कुछ हल्के-फ़ुल्के अंदाज में लिखा जाये, लेकिन एक आशा थी कि आप जरूर इस मुद्दे पर कुछ लिखेंगे और आईडिया सही निकला।
वी-ईडियट्स स्टाईल मजेदार लगा।

गिरिजेश राव said...

मैं रोज देखता हूँ कि व्यवस्था की मशीन का
एक पुर्जा़ गरम होकर
अलग छिटक गया है और
ठण्डा होते ही
फिर कुर्सी से चिपक गया है
उसमें न हया है
न दया है
नहीं-अपना कोई हमदर्द
यहाँ नहीं है। मैंने एक-एक को
परख लिया है।
मैंने हरेक को आवाज़ दी है
हरेक का दरवाजा खटखटाया है
मगर बेकार…मैंने जिसकी पूँछ
उठायी है उसको मादा
पाया है।
वे सब के सब तिजोरियों के
दुभाषिये हैं।
वे वकील हैं। वैज्ञानिक हैं।
अध्यापक हैं। नेता हैं। दार्शनिक
हैं । लेखक हैं। कवि हैं। कलाकार हैं।
यानी कि-
कानून की भाषा बोलता हुआ
अपराधियों का एक संयुक्त परिवार है।

साभार: सुदामा प्रसाद पाण्डेय
लोग उन्हें 'धूमिल' नाम से भी जानते हैं।

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

बटुर चाम-लिंगम की स्पीच में तो पुरस्कार के बदले बलात्कार कट-पेस्ट हुआ था। यह स्पीच शायद ठीक से प्रस्तुत नहीं की गई।

गिरिजेश राव said...

हाँ यह सही है कि इन दिनों -चीजों के
भाव कुछ चढ़ गये हैं।अखबारों के
शीर्षक दिलचस्प हैं,नये हैं।
मन्दी की मार से
पट पड़ी हुई चीज़ें ,बाज़ार में
सहसा उछल गयीं हैं
हाँ यह सही है कि कुर्सियाँ वही हैं
सिर्फ टोपियाँ बदल गयी हैं और-
सच्चे मतभेद के अभाव में
लोग उछल-उछलकर
अपनी जगहें बदल रहे हैं
चढ़ी हुई नदी में
भरी हुई नाव में
हर तरफ ,विरोधी विचारों का
दलदल है
सतहों पर हलचल है
नये-नये नारे हैं
भाषण में जोश है
पानी ही पानी है
पर
की

ड़
खामोश है|

साभार: सुदामा प्रसाद पाण्डेय
लोग उन्हें 'धूमिल' नाम से भी जानते हैं।

Arvind Mishra said...

यह टिप्पणी आपके दिए लिंक पर अमरेद्र के लिए है वहां भी यहाँ भी ताकि सनद रहे -
अमरेन्द्र ,आपकी यह पोस्ट एक बार फिर म्लानता ,नैराश्यपूर्ण अवसाद की ही प्रतीति/प्रलाप भर है और आपकी प्रतिभा के निरंतर अधोपतन की ही यह एक दुर्भाग्यपूर्ण परिणत है ....जिन तुलसी को आप उद्धृत करते नहीं अघाते वे एक महान समन्वय वादी रहे ...सकल राम मय सब जग जानी -विनम्रता ही विद्वता का निकष है ....मैं खुद आत्मान्वेषण में पाता हूँ कि मुझमें वे तमाम कमियाँ बरक़रार हैं जिन्होंने मुझे मेरी भवितव्यता से मिलने से रोक रखा है -एतदर्थ -


मैं आपसे बड़ा हूँ ,उम्र में भी और वर्षों के अनुभव में भी ....हाँ बौद्धिक कुशाग्रता ,भाषा की समझ आदि में आपसे काफी कमतर हूँ और इस बात का मुझे हर्ष ही है क्योकि आप मेरे अनुज सरीखे हैं ..मगर आपसे अंतिम बार कह रहा हूँ सकारात्मक लोगों से संवाद रखिये ,पाजिटिव सोचिये ..मैं क्या देख रहा हूँ कि आपके इर्द गिर्द ,नैराश्यपूर्ण ,नकारात्मक लोगों की भीड़ जुट रही है जो कई तरह के मुखौटे लगाए हुए /हुयी हैं ...और वे निरंतर आपमें हताशा ,नैराश्य जनित आक्रामकता का ही संचार करेगें /करेगीं ..मैं स्वयं भुक्तभोगी रहा हूँ और इसलिए अपना प्रिय जानकर आपसे यह निवेदन कर रहा हूँ ..... आप अभी एक साधक भर है ,साध्य को साधिये ..व्यर्थ के साधनों में ही सारी ऊर्जा का अपव्यय मत कर डालिए ....अपनी प्रतिभा को फोकस कीजिये और लक्ष्य पर केन्द्रित होईये ..बस! मैं जानता हूँ आप चमत्कार कर सकते हैं ..अभी हाल की कविता ने मेरे मन मस्तिष्क पर आपकी प्रतिभा का एक अमिट छाप छोड़ा है! अपने को पहचानिए और आगे बढिए !

Arvind Mishra said...

आपकी इस पोस्ट ने ,खराब और स्लो कनेक्शन और दिए लिंक ने आज मेरा बहुत समय कबाड़ा किया है -दो टूक बातें करनी हैं -
१-अमरेन्द्र की इमेज एक यंग्री तुर्क की इमेज बन गयी है और लोग कब्र से भी निकल निकल कर उसे हवा दे रहे हैं ...
२-जिन्हें कोई ब्लॉग पुरस्कार नहीं मिला है वही ट्रम्पेट बजाये फिर रहे हैं
३-जहाँ भी कुछ अच्छा हो उसे प्रोत्साहन मिलना चाहिए ...
४-सिनिसिज्म की भी एक सीमा हो तो अच्छी बात है
५-यहाँ भी गिरिजेश जी बता नहीं क्या बतिया रहे हैं -यह उनकी ख़ास स्टाईल है -जहाँ मुद्दे पर सीधी बात करनी होती है भाई साहब पगडंडी पकड़ लेते हैं जिसे प्राणी व्यवहार में डिस्प्लेसमेंट बिहैवियर कहते हैं -
६-आपकी यह पोस्ट जमी नहीं ,क्योके इसमें अच्छे कामों के प्रति प्रशंसा भाव की कमी है ...
7-याहं कोई नोबेल पुरस्कार नहीं पाने वाला अतः छोटे पुरस्कारों के प्रति एक सम्मान भाव रखें
८-पुरस्कार ऐसे ही मिलते हैं अब ..याद करिये आप ने हाईस्कूल में कितने प्रतिशत अंक पाए थे और अब कितने मिलते हैं ..समय के साथ चलिए सतीश जी ..
९-ब्लागजगत में जब भी जिसे पुरस्कार जिसके द्वारा भी दिया गया मेरी निगाह में उभय पक्ष प्रशंसा के पात्र रहे हैं
१०-एक उदासीनों ,निराशियों का गुट मत बनाईये ...अमरेद्र की पोस्ट पर कब्र से निकल निकल कर लोग आ रहे हैं उन्हें सामुदायिक भलमनसाहत से क्या लेना देना है स्पष्ट है .
११-रवीन्द्र प्रभात को लोग याद रखेगें बाकी यहाँ वहां टिप्पणियाँ करने वाले बियाबान में खो जायेगें -नोट कर लीजिये
कुल मिलकर एक बैड टेस्ट की पोस्ट और मेरा बड़ा समय भी जाया हुआ ..आपसे ऐसी उम्मीद कतई न थी :) :( हा हा हा

सोमेश सक्सेना said...

बड़ा करारा प्रहार किया है। बहुत लोगो को मिर्ची लगेगी।
आप को ब्लॉग जगत का परसाई कहा जाए तो गलत नहीं होगा।

सतीश सक्सेना said...


@ अमरेन्द्र,

डॉ अरविन्द मिश्र के कथन को देख

"मैं क्या देख रहा हूँ कि आपके इर्द गिर्द ,नैराश्यपूर्ण ,नकारात्मक लोगों की भीड़ जुट रही है जो कई तरह के मुखौटे लगाए हुए /हुयी हैं ...और वे निरंतर आपमें हताशा ,नैराश्य जनित आक्रामकता का ही संचार करेगें /करेगीं ..मैं स्वयं भुक्तभोगी रहा हूँ और इसलिए अपना प्रिय जानकर आपसे यह निवेदन कर रहा हूँ "

उनकी इज्ज़त कम से कम मेरी निगाह में बढ़ी है ! आप दोनों के बीच मनमुटाव ( जैसा की मैंने महसूस किया ) रहा है , उम्र अनुभव में बड़े होने के बावजूद वे तुम्हे सम्मान दे रहे हैं ! यह मामूली बात नहीं !

मेरा भी अनुरोध है कि आप अपने अध्ययन की तरफ ध्यान दें और ब्लॉग जगत में रचनात्मक प्रयास देते रहें ! जहाँ तक पुरानी दबी हुई बातों को, अगर कोई उभारता है तो भी आप संयम रखें जो ऐसा कार्य करेगा देर सबेर वह अपनी भूल महसूस जरूर करेगा !

ब्लॉग जगत में एक से एक बेहतरीन लोग मौजूद हैं, अन्याय पर अवश्य बोला जाएगा !

गिरिजेश राव said...

खेतों के सारे चकरोड
टोली की पगडण्डियाँ
कमरे की धूप डण्डी
रिक्शे और मनचलों के पैरों तले रौंदा जाता खड़ंजा
...ये सब दिल्ली के राजपथ से जुड़ते हैं।
राजपथ जहाँ राजपाठ वाले महलों में बसते हैं।
ये रास्ते सबको राजपथ की ओर चलाते हैं
इन पर चलते इंसान बसाते हैं
(देवगण गन्धाते हैं।)
कहीं भी कोई दीवार नहीं
कोई द्वार नहीं
राजपथ सबके लिए खुला है
लेकिन
बहुत बड़ा घपला है
पगडण्डी के किनारे झोंपड़ी भी है
और राजपथ के किनारे बंगला भी
झोंपड़ी में चेंचरा ही सही – लगा है।
बंगले में लोहे का गेट और खिड़कियाँ लगी हैं
ये सब दीवारों की रखवाली करती हैं
इनमें जनता और विधाता रहते हैं ।
कमाल है कि बाहर आकर भी
इन्हें दीवारें याद रहती हैं
न चन्नुल कभी राजपथ पर फटक पाता है
न देवगण पगडण्डी पर।
बँटवारा सुव्यवस्थित है
सभी रास्ते यथावत
चन्नुल यथावत
सिक्रेटरी मिस्टर चढ्ढा यथावत।
कानून व्यवस्था यथावत।
राजपथ यथावत
पगडण्डी यथावत
खड़न्जा यथावत।
........................
------------------------
उग रहा है दरो दीवार पे सब्जा ग़ालिब
हम बयाबाँ में हैं औ' घर में बहार आई है।

बयाबाँ - बियावान

सतीश पंचम said...

अरविंद जी,

मैं कहना तो नहीं चाहता था लेकिन अब आपने मुँह खोलने पर मजबूर कर दिया है।

@ जिन्हें कोई ब्लॉग पुरस्कार नहीं मिला है वही ट्रम्पेट बजाये फिर रहे हैं

अरविंद जी, ट्रम्पेट उसके लिये बजाया जाता है जिस चीज की लायकी हो। इस तरह के पुरस्कारों की मेरी नजर मे कोई लायकी नहीं है।

इस तरह से बदल बदल कर नामकरण, करते हुए, नये नये नाम देते हुए पुरस्कारों को भूसे की तरह बांटना पुरस्कार के नाम पर एक घटिया मजाक है। यदि सही बंदा होगा तो इस तरह से पुरस्कारों में नाम आने भर से ही बिदक जायगा भले ही शिष्टाचार के नाते कुछ न कहे।

@ जहाँ भी कुछ अच्छा हो उसे प्रोत्साहन मिलना चाहिए ...

जरूर मिलना चाहिये...लेकिन जिस किस्म की चिलगोजई महाशय लोगों ने की थी यदि उसे अच्छा कहा जाय तो बताइये बुरा किसे कहा जायगा। तब तो बुरे को भी अच्छे की श्रेणी में ही मान लिया जाना चाहिये। ये भी अच्छा...वो भी अच्छा।


@ सिनिसिज्म की भी एक सीमा हो तो अच्छी बात है

यहां सिनिसिज्म की तो बात ही नहीं है, एक गलत परिपाटी चलाई जा रही थी उसी को लेकर सवाल उठाया गया था। उस पर भी महान लोगों को
चिरकुटई सूझ गई और दनादन ढेर सारी टिप्पणीयां हटा दी गईं।

यदि सिर्फ खुशामद या गुडी गुडी टिप्पणियां सुनने की ही ख्वाहिश है तो फिर स्वस्थ बहस या आलोचना का ढिढोरा क्यों पीटा जाता है। बहस करना है तो बहस के लिये मैदान में आओ....इस मंच का इस्तेमाल करो...लेकिन यह तो उचित नहीं है कि बहस में जरा भी आपके विचारों से मेल न खाती टिप्पणी आये तो तुरंत हटा दो। जो टिप्पणीयां हटाईं गयीं थी उनमें कहीं भी गाली गलौज या कोई अपशब्द नहीं कहा गया था फिर उन्हें हटाने का क्या तुक बनता है ?

@ यहाँ भी गिरिजेश जी बता नहीं क्या बतिया रहे हैं -यह उनकी ख़ास स्टाईल है -जहाँ मुद्दे पर सीधी बात करनी होती है भाई साहब पगडंडी पकड़ लेते हैं जिसे प्राणी व्यवहार में डिस्प्लेसमेंट बिहैवियर कहते हैं -

गिरिजेश ने जो लिखा है उसे ध्यान से पढ़ियेगा. धूमिल की कविता है जिसमें कहा गया है कि जिस किसी की पूंछ उठाई वह मादा निकला।


@ आपकी यह पोस्ट जमी नहीं ,क्योके इसमें अच्छे कामों के प्रति प्रशंसा भाव की कमी है ...

अच्छे कामों का मैं भी प्रशंसक हूँ। लेकिन जब सामने ही चिरकुटई दिख गई, अपनी आँखों से देखा टिप्पणीयां डिलिट होते हुए तो किस मुँह से अच्छा कहूँ।

मैं तो इन बातों को घटिया ही कहूँगा। प्रशंसा गई तेल लेने।

@ याहं कोई नोबेल पुरस्कार नहीं पाने वाला अतः छोटे पुरस्कारों के प्रति एक सम्मान भाव रखें

बात यहां छोटे पुरस्कार और बड़े पुरस्कार की नहीं है। और यहां किसी को नोबल पुरस्कारों की तलब भी नहीं है। नोबल लेना होता तो क्या यही मंच मिला था ?

बात को समझिये कि क्यों यह पोस्ट मैं लिखा हूँ।

@ पुरस्कार ऐसे ही मिलते हैं अब ..याद करिये आप ने हाईस्कूल में कितने प्रतिशत अंक पाए थे और अब कितने मिलते हैं ..समय के साथ चलिए सतीश जी ..

समय के साथ ही चल रहा हूँ। जब से ब्लॉगिंग को जानने समझने लगा हूँ तब से अपनी चमड़ी जरा मोटी कर लिया हूँ। मौज लेना भी एक कला है। थोड़ा उसका भी तो आनंद लेने देंगे कि हर वक्त सिरियस पोस्ट ही लिखूं (वैसे भी कौन सा सिरियस लिखता हूँ :)

@ एक उदासीनों ,निराशियों का गुट मत बनाईये

गुट ????

इतना किसको टाइम है जो गुट बनाता फिरे। ऑफिस से आते ही लैपटाप खोलने तक का तो मन नहीं होता और आप कह रहे हैं गुट बना रहा हूँ....इतना टैम अपने पास नहीं है :)


@ रवीन्द्र प्रभात को लोग याद रखेगें बाकी यहाँ वहां टिप्पणियाँ करने वाले बियाबान में खो जायेगें -नोट कर लीजिये

जरूर याद करेंगे। ऐसे महान (?) कर्म करने वालों को तो लोग याद करेंगे ही। इसमें कौन सी दो राय है।

@ कुल मिलकर एक बैड टेस्ट की पोस्ट और मेरा बड़ा समय भी जाया हुआ ..आपसे ऐसी उम्मीद कतई न थी

इस हिमाकत के लिये क्षमा चाहूंगा, लेकिन मुझे तो ऐसे ही कहने की आदत है। चाहे पलटदास हों या पुरस्कारी लाल 'अजोर'....सबको इसी तरह से अपने राडार पर कैच करना अच्छा लगता है :-)

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी said...

@ सतीश पंचम जी ,
बटुर चाम - लिंगम के वक्तव्य में वर्ष २०१० के ब्लॉग शान्ति दूत सम्मान की घोषणा भी सम्मिलित थी , जो भौमवासरे , ...इति तिथौ , ... इति नाम्ने , महामूसलाधार ...........(फलाने) को दिया गया | नौटंकी की बाई की आवाज आई - '' जिन बाबू ने इन्हें नवाजा उन्हें शुक्रिया अदा करती हूँ हूँ हूँ ! ............. दगाबाज पिया न मानो रे तोरी बतिया SSSSSSSSS !!!!!!! '' हा हा हा !!

@ गिरिजेश जी ,
एक सज्जन का फोन आया कि गिरिजेश जी लिखे तो ढेर हैं लेकिन का कहना चाहे नहीं बुझाया !
तो
भाई , हम तो आपके अर्थ-निहितार्थ समझ लेते हैं पर आप पाठकों के लिए कठिन बन चुके उस कुल में शामिल हो रहे हैं -
जिनमें अविनाश वाचस्पति जी अपनी कविता-प्रतिभा के कारण अ-स्पस्ट रह जाते हैं !
जिसमें अमर कुमार जी भाषात्मक वैविध्य के कारण पल्ले नहीं पड़ते !
और ...
आप कविता पेलन/ठेलन की महीन बुनावट के कारण काफी दुरूह होते जा रहे हैं !

प्रभु , यह ट्रेंड चेंज करें , नहीं तो मजबूरी में आप की टीपों का भाष्य मुझे देना पड़ रहा है ! हे दुर्दव दैव , यह पिशाच ब्लागरी मुझसे क्या क्या करायेगी !

सतीश पंचम said...

@ सोमेश सक्सेना जी

आप को ब्लॉग जगत का परसाई कहा जाए तो गलत नहीं होगा

---------

अब इतना भी चने के पेड़ पर मत चढ़ाइये :)

सतीश पंचम said...

अविनाश वाचस्पति जी,

मैं धूमिल की कविता को तो समझ लेता हूँ लेकिन आप के कवित्त को नहीं समझ पाता। और माना जाता है कि जिसकी बात समझ न आये समझो वह महान लेखक है।

अत: संभवत आप धूमिल को भी पीछे न छोड़ दिये हों...कौन जाने :)

कृपया मुझे साधारण गद्य में ही लिखकर अपनी बातें टिप्पणियों में समझांये। इस नाचीज पर दया करें महराज।

प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI said...

स्थान - वही ------------------


समय - वही -------------------



ट्रेडमार्क विहीन !
इसके तो हम आदी हो चुके थे ......बकिया तो ज्ञानी के आगे हम कहें ?

देवेन्द्र पाण्डेय said...

यहाँ से वहाँ गया
वहाँ से वहाँ गया
जाने कहाँ गया
नेटवा दगाबाज
एक खुला दूसरा खुलने ही नहीं दिया
अंत में कहा...
कहाँ फंसायो राम !
सुई 12 से ऊपर गई
अभी तो थी शाम।
फिर यहाँ आया तो याद आया कि यह वही मैदान है जहाँ एक पहलवान ने,धोबिया पाट दांव से, कुश्ती में दूसरे गफलती पहलवान को चारे खाने चित्त किया था।
टिप्पणी पढ़कर याद आया..
संसद में हाथापाई हो रही थी उधर सड़क में एक आदमी मंगल भवन अमंगल हारी जोर-जोर से गा रहा था। हल्ला जितना बढ़ता वह उतने जोर-जोर से गाता जाता।
अधिक का लिखें बस इतना ही कहेंगे कि यह विशिष्ठ प्रकार का व्यंग्य है जिसमें हमारे जैसे कम समझदारों के लिए संदर्भ की सुविधा भी है। ऐसी ही किसी अन्य विशेषता के लिए मैं सफेद घर को व्हाईट हाउस समझकर इसका फैन हुआ था।
..वाह रे हम, वाह।

अनूप शुक्ल said...

वैसे तो बम कई तरह के होते हैं। एक होता डिले एक्टिव डिवाइस वाला बम। यह कुछ समय के बाद फ़टता है। कुछ-कुछ वैसी ही लगी यह पोस्ट। जब इनाम-उकराम बट रहे थे तब आती तो और जमती।बहरहाल अब आयी तब भी और जमी।

पोस्ट से कम नहीं जमे आपके जबाब जो आपने अरविन्द मिश्र जी के लिये लिखे। अब ज्यादा कुछ कहेंगे तो मिश्र जी की गुस्से की सील टूट जायेगी और वे शुरू हो जायेंगे -संभल जाओ कहते हुये।

हम तो यह भी कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं कि मिसिरजी गुस्से में चौपाई गलत कर गये। सही अर्धाली है:
सीय राम मय सब जग जानी

mukti said...

बढ़िया व्यंग्य है. हमेशा की तरह. मेरा भी बड़ा समय खर्चा हो गया. कुछ तो आपकी पोस्ट पढ़कर, बकिया टिप्पणी और प्रतिटिप्पणी पढ़कर...:-)
पर अच्छी चीज़ों पर खर्च करना अच्छा लगता है.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

डिस्क्लेमर: म्हारा भी घणा टैम चला ग्या यो वांचन मैं। फेर जा के चेन की बाकी कडियाँ भी पढीं कि पिच्चर घणी किलीयर हो गयी षडयंत्र की (सौरी सर जी, पंचतंत्र की) तरह अंतर्कथायें निकल के सामने आने लगीं)

टिप्पणी: फिर कभी
स्थान: कहीं भी
समय: कहीं भी
वजह: अभी बताई तो कईयों का टैम खराब होने के चांसेज़ हैं। और अभी मैं उतने गुस्से में भी नहीं हूँ।
प्रिविलेज: हम कह सकता हूँ...

गिरिजेश राव said...

आदरणीये पंचम दा और आचारज जी,

यहाँ आये अविनाश जी वाचस्पति नहीं हैं। प्रोफाइल वगैरह देख दाख के टीप किया करो आदरणीये! वाचस्पति जी से एक अदद खेद प्रकाश तो बनता ही है।
वैसे इस अविनाश जी की कविता भी ओम्दा है। मुझे घणी किलियर हो गई है ;)

भाष्य़ करूँ? जाण दो, आप कहन लगोगे - कविता ही ठीक थी :)

वैसे इस टीप का भाष्य़ करने की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए। एकदम्मे डिस्प्लेसमेंट नहीं है। (चुप्प! अपने मुँह मियाँ मिठ्ठू!! आदरणीये को बताने तो दो।)

समय: वही जब कौवा सोच रहा हो कि रजाई से बाहर निकल कर काँव काँव करें या नहीं और रिकार्डेड अजान को बाहर निकालने में असफल मौलवी लाहौल विला कुव्वत बुदबुदाने के बाद बाग दे रहा हो।

स्थान: स्पष्ट है - नखलउवा पलंग।

गिरिजेश राव said...

दू ठो सवाल?

टैग में '3 इडियट्स' लिखना था या 'वी इडियट्स'? अगर तीन ही हैं तो कौन हैं?
काश! सवाल भी तीन हो पाते।

Arvind Mishra said...

@अनूप जी को शुक्रिया यहीं दे देते हैं ,वैसे इंगित अर्धाली को वे अन्यत्र भी ठीक कर चुके हैं,अनूप जी हिन्दी ब्लागिंग के नामवर है जिसे चाहें चढ़ा दें (झाड पर ) और जिसे चाहें उतार फेकें ...भाई लोग सावधान भी नहीं होते ...मेरी इमेज के बाद अब मेरी वर्तनी पर निगाह है ....यह गिरिजेश जी के डोमेन में सेंध है :)
@सतीश जी ,चूंकि आप मनई ठीक है इसलिए आपकी बात का सड़ाव मान है -आपकी पोस्ट पर मुझे एक स्पष्ट स्टैंड लेना था इसलिए वैसा कहा -
रही गिरिजेश जी की बात तो उनकी अपनी विशिष्टताएं हैं ,मगर छोटे हैं तो उनसे अपनत्व भरी लिबर्टी लेने का हक़ नहीं खोना चाहता -अगर वे एक परिपक्व मित्र न होते तब ऐसा न करता ..माग्र उन्हें अब भाष्यकार रखने होंगें -अमरेन्द्र स्वयं तैयार हैं और आपका नाम प्रपोज करता हूँ ,,मगर ये कैसे दुर्दिन आये न मुझ पर की गिरिजेश को किसी और के जरिये समझने की बन आयी है ...अली saa se भी poochhtaa हूँ in dino उनसे भी samvaadheentaa है न jane kyon >

Arvind Mishra said...

सदैव मान *मगर *

गिरिजेश राव said...

एक लाइनम गरिष्ठम सुभाषितम:

'गुट' और 'गुटनिरपेक्ष' अप्रासंगिक अवधारणायें हैं।
....................
@ बड़के भैया,
अपनत्त्व भरी लिबर्टी लीजिए न। सेंटी हो कर आप मुझे भी सेंटी कर दिए अल्लसुबह। :)
............................
रही बात कविताओं की तो नए जमाने की कविताएँ होती ही हैं जटिल जीवन की अभिव्यक्ति के लिए। ...मुए आधुनिक कवि इसी जटिलता के कारण जनता से कटते चले गए और आनन्द बख्शी जैसे लोग जनकवि होते चले गए। क्या कमाल की धुनें हैं उन जैसी रचनाओं की!
कविताई मोड में चल रहा हूँ तो अर्ज किया हूँ ['शंकर लखनवी;)' की पंक्तियाँ हैं]:

ना जैयो रे प्रेम पथ, धोखे में है भीर
गली किनारे बैठ कर, बाँचो अपनी पीर।

और एकदम ताजी ताजी शंकर लखनवी की ही।

चुप रहते जब कहते हो क्या खूब कहते हो
लब हिलते हैं आवाज सी रवायत नहीं होती।

ज़ुदा हुआ ही क्यों कमबख्त हमारा इश्क़
आह भरते हैं हम और शिकायत नहीं होती।

अब हम चले अपने कविता ब्लॉग पर... :)

सतीश सक्सेना said...
This comment has been removed by the author.
सतीश सक्सेना said...


@ डॉ अरविन्द मिश्र,
@क्योके इसमें अच्छे कामों के प्रति प्रशंसा भाव की कमी है ...
@रवीन्द्र प्रभात को लोग याद रखेगें ....

अमरेन्द्र के ऊपर लिखी पोस्ट पर, रविन्द्र प्रभात की पोस्ट ध्यान से पढ़िए, उन्होंने जिस प्रकार अमरेन्द्र पर हमला करती हुई, बेनामी सुनामियों को प्रकाशित करने में सहयोग किया है वह वाकई उनके काम को देखते हुए दुखद था !
कम से कम मुझे, उनसे बिना पक्षपात काम करने की कोई उम्मीद थी !

अपने अपनों को और मनपसंद को बढ़ावा देना यहाँ आम है और अगर उसमें रविन्द्र प्रभात जी भी शामिल हो जायेंगे ऐसा न सोचा था !

सतीश पंचम एक निडर आवाज है इनका सम्मान होना चाहिए ....

सादर

केवल राम said...

उत्तमम् ब्लॉगम.......No one पूछतम्
निकृष्टम ब्लॉगम....टुचुक टुचुक....
कनिष्ठम ....थुडथुड़ीत पाखंडम....
छद्म ब्लॉगरी....प्राण गटकम् :)
xxxxxxxxxxx
बहुत बढ़िया ...शुक्रिया

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी said...

इस समय मैं आदरणीय सतीश-द्वय की बातों से सहमत हूँ , परिवेश में यह सब होना शर्मनाक है , मुझ क्या किसी के भी साथ हुआ होता तो भी .. ! डिलीतीकरण का यह 'कार्य' अपने आप में अ-संवादी अप-संस्कृति का परिचायक है !

प्रवीण शाह said...

.
.
.
यही कहूँगा कि इस पोस्ट ने या इसी जैसी किसी और ब्लॉगर की पोस्ट ने आना ही था...आना जरूरी भी था... Equilibrium दुनिया की हर चीज के लिये जरूरी जो है।

आज आदरणीय अरविन्द मिश्र जी के स्टैंड को समझ नहीं पा रहा... He appears to be defending the indefensible... :( ऐसा क्यों देव ?


...

मनोज पाण्डेय said...

भाई साहब यानी सतीश पंचम जी,
बतकही तो खूब की आपने, किन्तु गलत ट्रैक पर जाकर ....हम तो नया ब्लोगर हैं मगर उम्र और अनुभव में आपसे कहीं ज्यादा सो यही कह सकते हैं कि यह ब्लॉगजगत में वर्चस्व की लड़ाई है और कुछो नाही, वैसे सभी टिप्पणीकारों में अरविन्द मिश्र मुझे एक मात्र सच्चा बन्दा दिखा, जो भी कहा उन्होंने सीधे बिना लाग लपेट के , बाकी अनूप शुकुल, गिरिजेश राव, अमरेन्द्र त्रिपाठी ने काफी घटिया टिप्पणी की है, अविनाश जी की कविता आप समझ ही नहीं पाए तो धूमिल की कविता क्या ख़ाक समझेंगे ? हम तो यही सुझाव देंगे कि आप अच्छा लिखते हैं तो व्यर्थ की बातों में अपनी ऊर्जा का अपब्यय न करें !

दीपक बाबा said...

२ बार पोस्ट पढ़ी........ ४ बार सर खुजाया और १ टीप दे दी........

आज सुबह से टीप पे टीप पढते जा रहे है - और सर खुजा रहे है.......
कुछ बाल अभी बचे है - खुजाने को.



महादेव आप यहाँ आइये.... नंदी धीरे चलते हैं - कृपया इनोवा हाइयर कर लेना..........

सतीश पंचम said...

@ मनोज पाण्डेय जी,

क्या महराज..... आप खुद को नया भी कहते हो और अनुभव और फलां फलां में सिद्धहस्त भी। कमाल है।

आपके सुझाव को मैं कहां रखूं....यहां आस पास कोई कुर्सी टेबल भी तो नहीं है। चलिये रख देता हूं यहीं पर ....ए भाई जरा उठो .....जगह खाली करो...एक ठो सुझाव आया है उसे रखना है.....लिजिये रख दिया....खुश्श।

और जो आप धूमिल और अविनाश की कविता को लेकर कहे हैं कि अविनाश की कविता तो समझ में ही नहीं आई तो धूमिल को क्या समझोगे तो बंधु इतना तो मैं भी कह चुका हूं अपनी टिप्पणी में कि हो सकता है उनका लेखन स्तर घूमिल से आगे का हो :)

धन्य हो बंधु ।

सतीश पंचम said...

@ सतीश सक्सेना जी,

सतीश पंचम एक निडर आवाज है इनका सम्मान होना चाहिए
-----

सम्मान ????

is it ???

सतीश सक्सेना जी, सम्मानों को लेकर अभी यह धत्कर्म चल ही रहा है तब तक फिर वही सम्मान ....फम्मान ....

का कहें....

अजब तोरी दुनिया ....गजब.. मेरी सुनिया :)

मनोज पाण्डेय said...

सतीश पंचम जी ,
आप मेरे लिए वैसे ही स्थान खाली करवा रहे हैं जैसे कोठे पर अचानक कोई मोटा आसामी आ गया हो या फिर गाँव में लौंडा का नाच देखने मुखिया जी पहुँच गए हों , मुझसे परेशान होने की जरूरत नाही है भाई, मैं कोई मठाधीश थोड़े न हूँ , आप log वर्चश्व की लड़ाई लड़ रहे हो लड़ो , हमने जो महसूस किया लिख दिया ! वैसे एक बात और पुरस्कार के लिए काहे परेशान हैं आपलोग ....अच्छा लिखते रहिये कोई न कोई तो दे ही देगा ...!

सतीश सक्सेना said...

@ सतीश पंचम,
ले लो महाराज ...यहाँ जो मिल रहा है और भी मिलेगा ...हा...हा...हा...हा....
विद्वानों के बीच काम करने का फल जरूर मिलेगा ;-)
मेरे कहने से कितना मिलेगा पता नहीं ...:-))
उसे ग्रहण तो करें ..
गिरिजेश भी करें
आज पहली बार देख रहा हूँ डॉ अरविन्द मिश्र के मजे ही मजे ...

सतीश पंचम said...

तो मित्रो,

टाईम अप।

वह वक्त आ गया कि मॉडरेशन लगाया जाय। उटपटांग टिप्पणियां आनी शुरू हो गई हैं। इंगित चेले चपाटे लोग काम में लग गये हैं।

लगता है जोर का धक्का जोर का ही लगा है और खूब लगा है। तभी इतना हड़कंप मच गया है :)

So, Happy Moderation :)

Enjoy the New Blogging era of Safed Ghar Blog :-)

- Satish Pancham

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

Doosron ke phate men haath wahi dalte hain, jinke paas apna karne ko kuchh bhi saarthak nahi hota.

Doosron ki lakeer ko dhundhlaane / mitane se achchha hai, swayam usse badee aur ujli lakeer kheench ke dikhayi jaaye.

Rahul Singh said...

इस खेल में शामिल तो हो ही नहीं पा रहे हैं, दर्शक बने रहना भी मुश्किल हो रहा है, इसलिए 'मे आइ कम इन', 'मे आइ गो आउट'

ajit gupta said...

मैं तो एक व्‍यंग्‍य देखकर आयी थी लेकिन यहाँ व्‍यंग्‍य से कुछ अधिक जान पड़ता है। इसलिए अपन तो सरक रहे हैं।

निर्मला कपिला said...

dukh huyaa ki itane buddhijeevee aapas me kaise aur kyon lad rahe hain. shaayad mujh jaise alpgya ko yahan se jaanaa hee chaahiye| kam se kam kisee ke acche kaam kee saraahanaa nahin karani to usaki aalochanaa to nahin karo| yahan to logon ne blogvani ko nahin choda. dhany ho sabhee samajhadaar aur mahan buddhijeevee.

गिरिजेश राव said...

@उसे ग्रहण तो करें ..
गिरिजेश भी करें
आज पहली बार देख रहा हूँ डॉ अरविन्द मिश्र के मजे ही मजे ...

जाने किस ग्रहण की बात की जा रही है?
और अरविन्द जी के किन मजों की बात है, यह भी पता नहीं।

वन के राव बड़े हो ज्ञानी
बड़ों की बात बड़ों ने जानी। :)

हम तो इतना जानते हैं कि ये जो 3 इडियट्स है, कच्चे हैं, बच्चे हैं लेकिन इनसे बहुत कुछ ग्रहण किया जा सकता है।

Suman said...

likha hai?

सतीश पंचम said...

निर्मला जी, अजीत जी, राहुल जी

आप लोगों के कमेंट देखा...शायद आप लोग मेरे ब्लॉग पर हो रही बमचक से खिन्न हैं।

आप लोगों को लग रहा होगा कि यह पोस्ट मैने किसी पुरस्कार के न मिलने वगैरह के चक्कर में लिखा होगा।

ऐसा नहीं है। ऐसे फालतू पुरस्कारों को मैं दूर से ही सलाम करता हूँ।

आप लोगों की जानकारी के लिये बता दूँ कि यह पोस्ट मैंने अपनी स्वभाविक पोस्टों से हटकर.... जान बूझकर लिखा है।

कभी-कभी इस तरह की पोस्टों का लिखना जरूरी हो जाता है। इस ब्लॉगीय मंच पर हंसी, कविता, व्यंग्य, कहानी, संस्मरण तो बहुत लिखा जाता है लेकिन उसी ब्लॉगजगत में कोई सड़ांध होने लगे तो उस ओर ईशारा करना भी जरूरी है।

और ऐसा भी नहीं कि मैंने इस तरह का इशारा करने का कोई बीड़ा उठाया है या ठेका लिया है, वरन इस तरह के पोस्टों से उस सड़ांध की तरफ इशारा करते हुए मैं थोड़ी बहुत मौज भी ले लेता हूँ।

ये जो पुरस्कार बांटे जा रहे थे भूसे की तरह वह एक तरह से भीड़ तंत्र को इकट्ठा कर उसका इस्तेमाल करने की एक स्ट्रेटजी थी और उसी के तहत एक तरह का Ghetto तैयार किया जा रहा था।
वैसे भी अभी हमारे संस्कार अभी इतने विगलित नहीं हुए हैं कि जो हमे पब्लिकली सम्मानित करे उसे हम किसी मुद्दे पर उसका विरोध करें। औऱ यही वीक प्वाइंट लेकर महाशय लोग अपना उल्लू सीधा कर रहे थे। साथी जन के शुभकामनाओं के दौरान दिये विचारों को, उनके मत को अपने फेवर में इस्तेमाल कर रहे थे।

रवीन्द्र प्रभात ने जो पोस्ट लिखी थी उसमें अमरेन्द्र की बात को लिखकर नीचे ही तमाम उन ब्लॉगरों की बातें लिखी जिनका कि कोई संबंध ही नहीं था अमरेन्द्र की बातों से।

पूरी पोस्ट पढ़ने पर ऐसा लगता था जैसे कि सभी लोग अमरेन्द्र के खिलाफ कहने के लिये यहां इकट्ठे हैं जबकि कइयों को पता ही नहीं था कि उनकी तस्वीरें उनके विचारों का इस तरह से एक पोस्ट में गलत भावना से इस्तेमाल किया जा रहा है.... ताकि किसी को नीचा दिखाया जा सके।

औऱ इसी ओर मेरा इशारा था कि कैसे एक सोची समझी रणनीति के तहत ऐसे लोग ब्लॉगरों का अपने फेवर दिखाने के लिये इस्तेमाल करते हैं और ब्लॉगर हैं कि शिष्टाचारवश कुछ कह भी नहीं पाते क्योंकि फिर वही बात कि जिसने हमें सम्मानित किया उसे कैसे अपमानित करें।

वैसे भी किसी को पुरस्कार देकर, सम्मान देकर उसका विश्वास हासिल करना बहुत आसान होता है। अपने इन कार्यों को चेरिटी का मुलम्मा चढ़ा देने पर तो और।

कल को कोई गलत सलत काम करते हुए कोई बात हुई तो शायद इन लोगों का मानना था कि और कोई साथ दे न दे पुरस्कृत व्यक्ति तो साथ देंगे ही और न भी दें तो क्या से....कम से कम चुप तो रहेंगे ही..... कि भले आदमी लोग हैं। निस्वार्थ भाव से पुरस्कार-सम्मान आदि देते हैं।

और यही हुआ। आप लोगों ने भी कहा कि जो अच्छा काम कर रहा है, निस्वार्थ भाव से कर रहा है तो उसे क्यूं टोका जा रहा है।

अफसोस....

उनकी सट्रैटजी अब भी काम कर रही है.... इनकी मानसिकता है कि ज्यादा से ज्यादा ब्लॉगरों को अपनी ओर बनाये रखो....कल को कोई बात हुई तो अधिसंख्य हमारी ओर से ही।

अब यही देखिये जिन्हें भले आदमी और निस्वार्थ कह कर सराहना की जा रही है जिस भले आदमी ने श्रेष्ठ शांति फांति वाला पुरस्कार भी बांटा है...सौहार्द की बात करता फिरता है वही अब अपनी पोल खुल जाने पर सामने न आकर अपने चमचों से घटिया कमेंट करवा रहा है।

भला आदमी...इतना भला है कि दनादन अपने पोस्ट पर कमेंट डिलिट किये क्योंकि उसे अपने से विरोधी विचारों का कमेंट पसंद नहीं था। अमरेन्द्र की पोस्ट में उसका पूरा कच्चा चिट्ठा मय स्क्रीन शॉट के है।

ऐसे भले आदमीयों की इसी तरह ठुकाई की जाती है। अब शायद जिंदगी भर इस ठुकाई को याद रखेंगे ऐसे चिरकुट।

सतीश पंचम said...

और यह भी बताना चाहूँगा कि इस तरह की पोस्ट मैंने डर्टी पॉलिटिक्स के लिये नहीं लिखा है कि ब्लॉगर किसके फेवर रहें या किसके नहीं।

यह पोस्ट सिर्फ ब्लॉगरों को आगाह करने के लिये हैं कि वह अपने आप को किसी के स्वार्थों के लिये इस्तेमाल न होने दें।

यहां सभी की अपनी सोच है, समझ है। सब अपने अपने मन की बातें लिखते हैं, अभिव्यक्त करते हैं। इस ब्लॉगर प्लेटफार्म के खुले मंच से वह हर बात कहते हैं जो उन्हें जंचता है, अच्छा लगता है, घर परिवार की बातें, शादी ब्याह की बातें...दोस्तों से हंसी ठट्ठा की बातें.... सब कुछ।

इस तरह के स्वतंत्र अभिव्यक्ति वाले माध्यम पर इस तरह के गंदे राजनीतिक या गुटीय स्वार्थों की वजह से असर पड़े तो यह बहुत दुखद होगा।

लोग क्या कहें, क्या नहीं इसके लिये उन पर अप्रत्यक्ष रूप से दबाव डालना या फेवर की चाहत रखना किसी भी एंगल से उचित नहीं है।

बाकी तो ब्लॉगर गण समझदार हैं ही।

आप लोगों को मेरी इस झगड़ही पोस्ट से जो मानसिक कष्ट पहुंचा है, उसे मैं समझ रहा हूँ और उसके लिये तहे दिल से क्षमा चाहता हूँ। उम्मीद है आगे ऐसी नौबत न आने पाएगी।

- सतीश पंचम

Sunil Kumar said...

व्यंग्य का सहारा लेकर अपनी बात रखना भी एक कला है , सुंदर रचना बधाई

हिंदीब्लॉगजगत said...
This comment has been removed by the author.
सतीश सक्सेना said...
This comment has been removed by the author.
सतीश सक्सेना said...


@ सतीश पंचम ,
अमरेन्द्र की वह टिप्पणी "अत्यल्प को छोड़कर पूरे ब्लॉगजगत का लेखन स्तरहीन है " पर रविन्द्र प्रभात की समझ थी कि अमरेन्द्र अपने आपको छोड़ कर बाकि लोगों को स्तरहीन लेखक बता रहे हैं !

अमरेन्द्र की टिप्पणी में वर्णित सत्य, ब्लाग जगत का सत्य नहीं तो और क्या है ??
अफ़सोस यह है कि यहाँ कोई भी, किसी को ध्यान से पढता ही नहीं है ! बेहतरीन लेखों के साथ शायद ही कोई न्याय कर पाता है ! इसी क्रम में मैंने भी रविन्द्र प्रभात के बारे में, उनकी कई बार तारीफ़ की थी कि वे एक नीरस और उबाऊ काम कर, हिंदी का भला कर रहे हैं !

सरसरी और सतही पठन के कारण हम जैसे भी, अच्छी टिप्पणियां नहीं दे पाते तो औरों की स्थिति समझना मेरे लिए अधिक मुश्किल नहीं, यह यहाँ की त्रासदी नहीं तो और क्या है ?
रविन्द्र प्रभात की अमरेन्द्र के बारे में उपरोक्त समझ भुलाई जा सकती थी मगर उसके बाद टपक गिरधारी ने वहां आकर जे एन यू में मेरी अनूप शुक्ल के साथ अमरेन्द्र की मुलाक़ात पर ही प्रश्न उठा दिया ... बहुत लम्बी इस टिप्पणी में कहा गया था कि मैं वहां अमरेन्द्र को टिप्पणियों के लालच में पटाने/ चमचा गिरी करने गया था ...और रविन्द्र प्रभात ने इस टिप्पणी को प्रमुखता से प्रकाशित ही नहीं किया अपितु उस के समर्थन में आयीं अन्य टिप्पणियों को भी महत्व दिया जो विषय से सम्बंधित ही नहीं थी !

बाद में मेरी शिकायत पर, अविनाश वाचस्पति के हस्तक्षेप के कारण वह वहां से हटाई जा सकी !

अमरेन्द्र, उम्र में मेरे बेटे से भी छोटा है और मेरे ब्लॉग पर शायद उसकी आमद न के बराबर है ! और दिल्ली में रहते हुए मैं उससे कभी नहीं मिला था...मगर इस प्रतिभाशाली लेखक से मैं यकीनन प्रभावित हूँ अतः उससे मिलने की इच्छा दिल में थी ! उस दिन अचानक अनूप शुक्ल के आगमन की सूचना मिलने पर "एक पंथ दो काज " के कारण मैं जे एन यू गया था जो कुछ थर्डग्रेड ब्लागर महोदय हज़म नहीं कर पाए और टपक गिरधारी बनकर वहां टिप्पणी पेल दी !

अफ़सोस यह था कि रविन्द्र प्रभात ने वह टिप्पणी प्रमुखता के साथ प्रकाशित की बिना यह सोंचे कि इससे सतीश सक्सेना आदि निरपराध लोग भी कष्ट महसूस करेंगे !

ख़राब टिप्पणी, जिसमें किसी के अपमान करने का प्रयत्न किया गया हो, छापनी ही नहीं चाहिए और अगर छपती है तो उसकी जिम्मेवारी ब्लॉग व्यवस्थापक की ही होनी चाहिए !

मुझे लगता है असल मकसद खेमों की लड़ाई का है , अनूप शुक्ल से मिलने का अर्थ उनके विरोधियों से दुश्मनी माना जाना है, यह मान्यता एक महा मूर्खता है इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं ...

औरों की तो नहीं जानता मगर मैंने अपनी पीठ पर किसी का नाम नहीं लिखने दिया है ब्लॉग जगत में मेरे परम मित्रों में डॉ अरविन्द मिश्र, समीर लाल, अनूप शुक्ल, पी सी रामपुरिया, अमरेन्द्र त्रिपाठी, अविनाश वाचस्पति शामिल हैं , और उम्मीद करता हूँ कि मैं इन सबकी शानदार अच्छाइयों और विद्वता का फायदा लेता रहूँगा, साथ ही कोशिश होगी भी कि बारबार विरोधी ध्रुवों को साथ बैठने में कामयाब रहूँ ताकि ब्लॉग जगत एक साथ, बिना खेमों में बँटे, इनका फायदा उठा सके !
रविन्द्र प्रभात जी से निवेदन है कि वे आलोचना को स्वस्थ द्रष्टि से ग्रहण करेंगे जिससे उनका योगदान ..वाकई अच्छा योगदान बने !

अंत में, आपकी स्पष्ट आवाज और अन्याय के खिलाफ विरोध करने की शक्ति को मेरा प्रणाम सतीश पंचम !

Suresh Chiplunkar said...

सतीश भाई,
व्यस्तता की वजह से इधर देर से आया, लेकिन आया तो यहीं का होकर रह गया…
इतना ही कहूंगा कि आपने सर्फ़-रिन-एरियल-निरमा सब एक साथ मिलाये हैं, और जो भी इस ब्लॉग-बाल्टी से निकला है एकदम साफ़-शफ़्फ़ाक होकर निकला है…

काश मैं भी ऐसा लिख पाता (पहले भी कह चुका हूं, दूसरी बार कह रहा हूं)…

"चिलगोज़ा" शब्द का उचित प्रयोग - पसन्द आया
:) :) :) इसमें 108 स्माइली और जोड़ियेगा जो कि पोस्ट पढ़ते समय आईं… आपको दिखाने के लिये फ़िर जोड़ रहा हूं… (:) X 108)

जय हो… जय हो… आपके चरण कहाँ हैं प्रभु…

शेफाली पाण्डे said...

बेमतलब पूं पां और चिल्ल पों मचाने वाली टिप्पणियां हटा दी जाएंगी। ...man to hamara bhi kuchh aisa hee tha...oar ise dekh kar ruk gae...:[

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'
A Photo from - Thoughts of a Lens

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