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Saturday, December 18, 2010

संभल कर बबुआ.....ये कटार नहीं.... देशज दराँती है......सतीश पंचम

     आज सदरू भगत बहुत मुसकिल में हैं। सुबहिये से रमदेई अपनी कुभखीया बंदूक दना दन दाग रही है, फैर करे जा रही है। देवता पितर, पुरखा-पुरनीया किसी को नहीं छोड़ रही है। कभी कहती है तुम मर जाओ, खपि जाओ कहीं घूरे में जाकर, जहन्नुम हो जाओ तो कभी कहती है कि तुम क्यों मरो, मैं  ही मर जाती हूँ .....जान तो छूटेगी बुढ़ऊ।  तुम्हारे पीछे मैं सती हो गई, जिनगी भर तुम्हारी गुलामी की तिसपर यही मुझे उपकारा मिला है। यही है तुम्हारा निसाफ.....यही तुम्हारी मरदई। अरे मर क्यों नहीं जाते....उमिर तो होय गई है बुढ़ऊ !! 

  उधर पतोहू अलग नराज है। न ठीक से खाना देती है न पानी। रूखी सूखी जो थाली में आ जाती उसी से काम चला रहे थे। क्या करें। चलाना पड़ रहा था। उस दिन अपने घर के बइठका में चउकी पर बैठे खाना खा रहे थे। खा क्या रहे थे बस यूं समझो कि मुँह जुठार रहे थे। भोजन के दौरान पीने के लिये एक गिलास पानी तक न रखा गया था बगल में, फिर भोजन का तो कहना ही क्या।  न दाल ढंग की बनी थी न चावल ढंग से पका था। और रोटियां तो ऐसी दिख रही थीं मानों बहुत देर तक खुले में रखे होने के बाद ही परोसी गई हो।  और सब्जी ?  उसका तो रंग ही अलग था। लग रहा था जैसे आँच पर रखकर उतार ली गई हों जस की तस। हल्दी नहीं पड़ने की वजह से फूलगोभी के टुकड़े ऐसे लग रहे थे जैसे आँखें फाड़ फाड़ कर थाली के बाहर देख रहे हों। 

   बहुत देर बाद जब आधे से ज्यादा भोजन हो चुका तब जाकर पतोहू ने आठ साल के बेटे के हाथ से पानी भिजवाया और वह भी एक लोटे में। लेकिन हाय रे नसीब। वह लोटा भी आते आते उसके हाथ से रास्ते में ही छूट गया। कच्चे जमीन पर पानी फैल जाने से सौंधापन महसूस तो हुआ लेकिन सदरू भगत को उससे क्या ? वह तो सोच में डूबे थे । अपने भाग्य को कोस रहे थे जब घर में नया मोबाइल खरीद कर लाये थे।  लेते बखत दुकान वाले ने सदरू भगत को कहा भी था कि दद्दा यह महंगा मोबाइल कालेज फालेज वाले इसकूलिहा लड़के लड़कियों के लिये ही ठीक है। आप सस्ता वाला ले लो। क्या करोगे महंगा लेकर। 

 और दुकानदार ने बात ही बात में एक सादा मोबाइल निकालकर देते हुए कहा - यह ठीक रहेगा दद्दा  आपके लिये, इसमें टार्च भी है। आप को अलग से टार्च रखने की जरूरत नहीं। यही लिया जाय, बुढ़वन इसे ही जियादा पसंद करते हैं। 

बस....बात लग गई सदरू भगत को। मुझे बुढ़वा कैसे समझ लिया इस घामड़ दुकानदार ने। मैं क्या इतना गया गुजरा हूँ ? 

 बिफरते हुए बोले - अच्छा तो तनिक यह मेरे हाथ का गट्टा हिला दो तो जानूं कितने जवान हो तुम। छुड़ा दो अपनी इस दुकान का यह पटरा। आये हो बड़ा बुढ़वा कहने वाले। 

 दुकानदार सकते में। जाने क्या कह गया । सदरू भगत को कोई बूढ़ा कहे तो अच्छा नहीं लगता उन्हें। खैर, अब तो गलती हो ही गई। किसी तरह दुकानदार ने हाथ जोडा और सदरू भगत को वही नये माडल का चोकिया मोबाइल दिया जिसमें कि फोटू ओटू भी खिच सकते थे, गाना बजाना भी होता था और वो तमाम किसम की सुविधायें थी जो कि अमूमन हर स्मार्ट फोन की होती हैं। 

 सदरू भगत ने वह मोबाइल ले तो लिया लेकिन चलाना नहीं जानते थे। जब कभी फोन आता तो टुकुर टुकूर उसके स्क्रीन को ताकते और मन ही मन घबराते कि अब इसका क्या करूं...कहां ले जाउं....इसे कैसे निपटाउं और जैसे ही कॉल आने की घंटी बंद होती, इनके जी को शांति मिलती कि चलो बंद हुआ। कुछ दिन यही चला और धीरे धीरे पोते ने उन्हें किसी तरह फोन रिसिव करने की ट्रेनिंग देकर कॉल आने पर होने वाली कंपकपी से मुक्ति दिलाई। 

 लेकिन हाय रे किस्मत। कभी कभी किसी चीज का आधा ज्ञान होना भी खतरनाक होता है औऱ वही हुआ। उस दिन घर में रमदेई और पतोहू के बीच जमकर खटपट हुई थी। बर्तन और्तन उठा पठा कर फेंकउल तक की नौबत आ गई थी। रमदेई अपनी बात पर डटी है और पतोहू अपनी बात पर। बोला चाली बंद। इधर सदरू भगत बोलें भी तो किस ओर से। रमदेई की कहें तो बेटा नाराज हो जाय, हो सकता है बाहर भेजे जाने वाले मनीआर्डर में कमी कर दे कि गाली गुर्रा सुनने के लिये नहीं रख छोड़ा हूँ अपनी परम पियारी पतनी को।  इधर ज्यादा इस्स बिस्स बोले नहीं कि क्या पता पतोहू को कल ही शहर बुलवा ले। फिर भोजन पानी और तमाम घरहीया संभालने का बोझ रमदेई पर ही तो टूटेगा। 

 और यदि पतोहू की ओर से बोलें सदरू भगत तो रमदेईया नाराज हो जाय। अभी भी नाराज ही है। पता नहीं किसका मुँह देखकर उठे थे  ?  अपना ही या किसी और का ? उस दिन घर में चल रही  किचाहिन झगड़े के बारे में पड़ोस की अमरतीया काकी से जिकर कर बैठे। बात ही बात में कह दिया कि अरे पतोहू की बात और है, वह तो अभी नई है, थोड़ा बहुत खर काम करे, उलट पलट काम करे तो भी चल जायगा, छिमा किया जा सकता है लेकिन रमदेई ? उसे तो समझना चाहिये था.....वह तो आज की नहीं है। सब दिन घर को वही देखती आई है, सब दिन वही सिंचती पूरती आई है। अगर वह भी पतोहू के तरह उलटा पलटा बोलना शुरू कर दे, तिंग तड़ांग बोले,  बतकटौवल वगैरह में वह भी सामिल हो जाय तो यह ठीक बात नहीं है। 
   
  आगे बोलते बोलते यह भी कह बैठे कि पतोहू का तबर्रा बोलना एक बार सहा जा सकता है लेकिन रमदेई का उसके जवाब में बोलना बहुत अखरता है। इससे घर में और भी जियादे असांती रहने की असंका है और यह स्थिति जियादे खतरनाक है। 

 अब सदरू भगत यह सब बोल गये तो बोल गये लेकिन उन्हें क्या पता था कि नये वाले मोबाईल का कौनो बटन सटन दब गया है। जो कुछ बोले जा रहे थे सब रिकार्ड हो रहा था। और जो एक बार रिकार्ड हो गया तो हो गया। कभी न कभी तो सामने आना ही था। तो आ गया सामने। कल शाम को ही पोता उस मोबाइल को लेकर कुछ न कुछ बटन सटन टीपे जा रहा था, मना करने पर भी नहीं मान रहा था और उसी दौरान कुछ बटन सटन दब गया और वही रिकार्डिंग बजना सुरू।  

 रमदेई बाहर आंगन में झाडू लगा रही थी और पतोहू रसोई में खाना बना रही थी। इधर मोबाइल बोले जा रहा था सदरू वाणी। पतोहू तिंग तड़ांग बोले तो, तबर्रा बोले तो चलता है....रमदेई बोले तो नहीं चलता....

 बस फिर क्या था। पतोहू तो पतोहू, रमदेई तक एकदम जल भुन गईं। यही सब बोलने बतियाने जाते हो अड़ोस पड़ोस में। घर की बात बाहरे करते हो थुकौनूं....बूढ़ हो गये हो लेकिन अकिल नहीं आई। 

 और एक वह दिन है और आज का दिन कि बिचारे सदरू भगत समझ नहीं पा रहे कि कहें तो क्या कहें। ससुर नई तकनीक जो न कराये। जहां तहां की बातें लीक कर देती है। 

  विकीलीकवा से सुना है कि राहुल गाँधी भी कुछ ऐसा ही कह गये हैं। आतंकवादीयों की उठापटक और तबर्रेबाजी तो कुछ हद तक झेल भी लेंय, लेकिन स्थित तब ज्यादा खतरनाक होगी यदि हिंदु संगठन अपनी उग्रता दिखायें। 

   आखिर अब तक हिंदुए लोग ही तो थामे हुए थे सहिष्णुता, सत्यवादिता और करूणाई की गठरी। अब काहें उस गठरी को उतार रहे हैं। 

  उधर पता नहीं रमदेई कब तक सदरू भगत की ये हालत देख पाएगी। आखिर दया, सहनशीलता और तीमारदारी की एक वही तो मिसाल है, सब दिन तो इसी बुढ़ऊ के साथ बिता दिया, अब क्या इस बुढ़ौती में यही दिन दिखाने के लिये रह गया है। 

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       यदि पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर 125 साल बूढ़ी पार्टी के वक्तव्यों पर ध्यान दिया जाय तो बात में दम है कि  बहुसंख्यकों का इस तरह आपे से बाहर होना देश को एक खतरनाक स्थिति पर ले जा सकता है। मेरे हिसाब से संभवत: जितना नुकसान ढेर सारे आतंकवादी मिलकर भी नहीं कर सकते हैं, उससे कहीं ज्यादा नुकसान होगा देश को गृहयुद्ध में झोंक देने पर .....जरूरत है इस तरह के किसी भी उकसावे की स्ट्रेटेजी से दूर रहकर ऐसी आतंकवादी ताकतों को जवाब दिया जाय, उनकी हालत पतली की जाय ..... न कि दिग्विजय जैसे बददिमाग नेताओं की बातों में खुद को बहकाये रखा जाय...... जो कि हेमंत करकरे जी की शहादत पर भी अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने से बाज नहीं आ रहे हैं। 
  
  जाने वक्त की नज़ाकत कब समझेंगे ऐसे नेता ? 

   कहीं भी कुछ भी बोल देना नेताई नहीं होती.....एक किस्म की चिलगोजई होती है, और तब तो और....जब देश की सुरक्षा की बात हो। वरना इस खुद को निकलते जा रहे सांप और हम में कोई फ़र्क न रहेगा। बाहर वाले तो निगलने की ताक में हैं ही। 

- सतीश पंचम  

12 comments:

गिरिजेश राव said...

'निसाफ' पढ़ कर नानी की याद आ गई। यह तो फिर भी इंसाफ से बना है। जाने कितने ही खालिस भोजपुरी शब्द उनके साथ ही चले गए।
वीकीलिकवा का अच्छा रिश्ता जोड़ा मोबैल से। लेकिन वीकीलिकवा में गलती से नहीं समझ बूझ कर बटन दबाया जाता रहा। हाँ, ग़लत बटन दब गया कि सब जान गए। ...ये बताइए आप के दिमाग में ऐसे आइटम आते कैसे हैं? उम्दा जी, उम्दा!!
भाई घर में घुस आये आक्रमणकारी को बस मारते हैं और उसमें अल्प बहु नहीं देखते। सेकुलरी घुट्टी ने हमारे दिमाग को ऐसा दही कर दिया है कि हर बात में अल्प, बहु, गंगा जमुनी ब्ला ब्ला दिखता है।
- दाल में नमक कम है - चुप रहो, दंगे भड़क जाएँगे।
- मुन्ने ने बिस्तर पर पेशाब कर दिया - चुप रहो, गंगा जमुनी संस्कृति संकट में पड़ जाएगी।
- टायर पंक्चर हो गया - चुप! अल्पसंख्यक नाराज़ हो जाएँगे। ...माइ फुट!
..अमाँ पहले ये तो तय करो कि अल्पसंख्यक है कौन? 25 करोड़ की आबादी को अल्पसंख्यक इसी घामड़ देश में कहा जा सकता है..चुपा रहा हूँ। जाने क्या क्या पेले जा रहा हूँ, फालतू में।

दीपक बाबा said...

इ सुसरा नयी टेक्नोलोजी को बेन कर देना चाहिए....
बूढ़े बूढ़े लोगों को परेशान करती है...........

सतीश पंचम said...

घर में घुस आए को मारना ही चाहिए...चाहे जैसे हो। लेकिन इस चक्कर में ऐसा न हो जाय कि घर के लोगों को ही चपेट में ले लिया जाय।

एक तो ससुरे वैसे ही नाक में दम किये हैं और उसी दौरान धुंआँधार फायरिंग में पता ही न लगे कि कौन अपना है और कौन पराया तो बाद में धुआँ छंटने पर हालात का अंदाजा लगाया जा सकता है।

और हां... पच्चीस करोड कम नहीं होते मानता हूँ। लेकिन इसी बिना पर दो लोगों को आमने सामने खड़े कर ललकार दिया जाय वो भी तो ठीक नहीं है।

ससुरे जो करेंगे सो करेंगे, नाहक उसमें बाकी आम लोग पिस-पिसा जायेंगे, वो भी सोचना पड़ेगा। (वैसे अभी भी कौन सा खलिहर हैं, पिसे तो अब भी जा रहे हैं )

Arvind Mishra said...

विकिलिक्वा ने राहुल और सदरू सबको लपेटना शुरू कर दिया है ...सासू पतोहू कौनो साथ न देहियें !

mukti said...

सच्ची में पता नहीं कहाँ से ऐसे-ऐसे आइडिये आपके दिमाग में आते हैं. सबसे मज़ेदार तो हमको ये उपमा लगी, " हल्दी नहीं पड़ने की वजह से फूलगोभी के टुकड़े ऐसे लग रहे थे जैसे आँखें फाड़ फाड़ कर थाली के बाहर देख रहे हों।"
मैं आपकी बात से सौ प्रतिशत सहमत हूँ कि नेता लोगों के बहकावे में आकर हम आम जन अगर लड़ेंगे तो नुक्सान हमारा होगा, हमेशा आम जनता का ही होता है, नेता लोग तो अपने जेड श्रेणी की सुरक्षा लेकर घर में बैठे रहते हैं. दंगे हों या युद्ध, मरता हमेशा गरीब ही है, अब चाहे वो अल्पसंख्यक हो या बहुसंख्यक.

सोमेश सक्सेना said...

बहुत खूब! क्या Connection जोड़ा है। आपके विचारों से सहमत हूँ।

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

उतना ही मजा आया सदरू टेप काण्ड में जितना राडिया टेप में था!!!

जितेन्द्र ‘जौहर’ Jitendra Jauhar said...

आज जबकि हर ओर ‘काले-घर’ वालों की भरमार-सी हो चली है, ऐसे में आप सरीखे सुजन द्वारा ‘सफ़ेद घर’ बनाना सुखद है...आपके इस घर पर दस्तक देता रहूँगा...यक़ीनन बहुत अच्छा लगा आपकी चिंतन-धरा पर कुछ पल खड़ा होना!

rashmi ravija said...

सदरू भगत और रामदेई की कथा पढ़ते हुए लग रहा था...इनके झगडे के बीच कुछ तो आप गहरा कहने वाले हैं.....और बड़ी कुशलता से इतनी बड़ी बात को उनकी बातों में गूंथ दिया...

बस सबको सन्मति दे भगवान ,पिसता तो आम इंसान ही है...और नेताओं द्वारा उनकी भावनाओं का खूब फायदा उठाया जाता है...लोंग समझते भी नहीं और उनके हाथों का खिलौना बने रहते हैं..वरना आम ज़िन्दगी में कोई बता दे कि किसी सम्प्रदाय वाले से दुश्मनी हो...पर जब एक भीड़ बन जाती है..तो बात अलग.

निर्मला कपिला said...

मेरे हिसाब से संभवत: जितना नुकसान ढेर सारे आतंकवादी मिलकर भी नहीं कर सकते हैं, उससे कहीं ज्यादा नुकसान होगा देश को गृहयुद्ध में झोंक देने पर -----. आपकी इस बात से शत प्रतिशत सहमत हूँ काश ये सन्देश हर किसी के पास पहुँचे। शुभकामनायें

प्रवीण पाण्डेय said...

अब तो सहिष्णुता भी सन्देह के घेरे में है, अब क्या उसे बचाने के लिये असहिष्णु हो जायें?

Lalit said...

" ...मेरे हिसाब से संभवत: जितना नुकसान ढेर सारे आतंकवादी मिलकर भी नहीं कर सकते हैं, उससे कहीं ज्यादा नुकसान होगा देश को गृहयुद्ध में झोंक देने पर .....जरूरत है इस तरह के किसी भी उकसावे की स्ट्रेटेजी से दूर रहकर ऐसी आतंकवादी ताकतों को जवाब दिया जाय, उनकी हालत पतली की जाय ..... न कि दिग्विजय जैसे बददिमाग नेताओं की बातों में खुद को बहकाये रखा जाय...... जो कि हेमंत करकरे जी की शहादत पर भी अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने से बाज नहीं आ रहे हैं। जाने वक्त की नज़ाकत कब समझेंगे ऐसे नेता ? "

संभवतः आपकी बात सत्य है पंचम जी, लेकिन यहाँ, मेरी समझ में, सवाल राजनैतिक इच्छाशक्ति का है. कहीं मैंने पढ़ा था कि जब अमेरिका गृहयुद्ध में झुलसने वाला था, गुलामी प्रथा के उन्मूलन को ले कर और हर तरफ से लिंकन साब पर दबाव पड़ रहे थे, यह उनकी इच्छाशक्ति हीं थी जिसके कारण गुलामी प्रथा का अंत हुआ और उसकी कीमत??? ६५ मिलियन अमेरिकिओं में से १३ मिलियन अमेरिकिओं की बलि ( The Army of Potomac, book name is, if my memory is not failing me). और यह कीमत देश की राजनैतिक और भौगोलिक सीमाओं को intact रखने के लिए चुकाई गयी थी. बहुत सारी समस्याएं हैं आज देश में, और मेरी मत में इनका समाधान सिर्फ और सिर्फ राजनैतिक इच्छाशक्ति से हीं संभव है, पार्टी चाहें जो भी हो. व्यक्तिगत तौर पर मेरी निष्ठा देश के प्रति है ना कि किसी व्यक्ति या पार्टी विशेष के प्रति.

नेता लोग वक़्त की नज़ाकत समझें या ना समझें, जनता या प्रजा को जरूर समझनी चाहिए और यह संभव होगा साक्षरता और जागृति से ही और उसके लिए हम सभी देशवासियों का सम्मिलित प्रयास अत्यावश्यक है.

आपका व्यंग विधा में कोई सानी नहीं है पंचम जी, अपना सान-पानी ऐसे ही चढ़ाए रखिये हमेशा.

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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