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Friday, December 17, 2010

किर्रू लेवल ऑफ सियावर बाबू.......एक रॉडियॉटिक मजमा........सतीश पंचम

    हाल ही में   मनोहर श्याम जोशी जी की व्यंग्य रचना नेताजी कहिन पढ़ रहा था। उसमें एक  जगह आकर ध्यान अटक गया। लिखा था -  बिहार के एक मन्त्री सियावर बाबू के बारे में,  जिनका कि मानना था कि -  हमरा नेचुड़वा  (नेचर) ऐसा है कि जौन भी काम एनट्रस्ट किया जाता है हमें, जे हे ने से, अपना टोटल अटेंसन और फुल डिवोसन देते हैं। 

     पढ़ने पर थोड़ा सा खटका लेकिन सियावर बाबू की इस भाखा पर मुग्ध हुए बिना न रह सका। लेकिन असली मजा आया एक प्रसंग में जहां पर कि कुछ महिलाओं के भी इस विवाह यात्रा में शामिल होने का वर्णन किया गया है । बता दूं कि विवाह जयपुर में होना था और दिल्ली से यह पलटन चली थी।

    सियावर बाबू के काफिले के साथ  जोशी जी अपनी श्रीमती जी और एक नेता भतीजे  (व्यंग्य पात्र) के साथ जयपुर जा रहे थे।   किसी बात को लेकर आपस में बहस चल ही रही थी कि तभी दो आधुनिकाएँ - एक अधेड़, एक युवती - हाई कहती हुई हमारे नेताजी (भतीजे) की ओर बढ़ी।

नेताजी ने कहा - "हाय ! हाय ! हाउ आर यू मयडम्स" !

"फाइन, थैक्यू" । अधेड़ महिला बोली। "एण्ड हाउ डू यू डू" ? युवती चहकी।

 "अपना तो वहीयै हय,  नेताजी ने कहा , अयवरी डे, आई डू द सेम वे - न सावन सूखे, न भादों हरे। आलवेज हिप हिप हुर्रे" ।

 नेताजी ने ठहाका बलन्द किया और दोनों देवियों के पृष्ठभाग पर धौल जमाया। 

युवती ने कहा - "डोण्ट बी फ्रेश"।

नेताजी बोले - "सबेरे कायदे से अस्नान नहिंन करि पाये जल्दी में। बाकी अपनी फ्रयसनस में कउनो कमी नहीं",

युवती बोली - "वही हम कह रहे हैं आप बहुत फ्रैश हैं"।

नेताजी ने कहा, "अच्छा मजाक हय ससुर, अरे हम फ्रयस हैं तो आपको सिकायत क्यों हैं" ?

अधेड़ बोली - "आप अंग्रेजी नहीं जानते ? डाण्ट बी फ्रेश का मतलब है कि लाइन मत मारो, चालू मत होओ, हिमाकत मत करो"।

"इतना सारा मतलब दद्दा रे दद्दा । अउर उस दिन आप हमसे पास-फेल जइसा कुछ कही थीं, उसका का मतलब रहा" ? 

"हमने कहा था - आर यू मेकिंग ए पास - क्या आप हम पर चालू हो रहे हैं" ? 

नेताजी ने दोनों हाथ जोड़े और कहा , हम समझि गये, देर से पर दुरूस्त नोट किया जाय मयडम्स आपके बारे में हम अस्टेलहि रहिहैं, फेलहि रहिहैं। फिर नेताजी ने दोनों देवियों का परिचय अपने रस्पक्टफुल अंकलजी अडिटर साहब और रस्पेक्टफुल आण्टीजी लक्चरार साहिबा से करवाया । अधेड़ थी पिंकी और युवती थी पप्पी। नाम के अतिरिक्त कोई जानकारी देना भतीजाजी ने जरूरी नहीं समझा। 

इतने में शकुन्तला जी, जो कोठी के भीतर चली गईं थीं, बाहर हम लोगों की ओर आती दिखाई दीं। पिंकीजी ने अंग्रेजी में कहा कि - "मैं इस औरत की सूरत देखना बरदाश्त नहीं कर पाती और पप्पी डारलिंग को लेकर लान की ओर चली गयी"। 

 शकुन्तलाजी ने हमारे पास पहुँचकर विजयोल्लास से कहा -" भाग गी ने चुड़ेलो दोनो मैंने देखताइ। मैं इनकी सारी इंगलिस गिटपिट की ऐसी-तैसी कर देती"।

" ऊ आप जरूर कर दें कबहुँ फुरसत से ! अभी ई बताया जाय कि मन्त्रीजी की का खबर हाय"।

"मन्त्री जी तो आरे थे मेरे साथ, पन वो महेन्द्र जी घासिलेट चिपक गया बीच से। कुछ न्यूज की बातां करनी हे के"। 
......
"मयडम आप जाइए मन्त्रीजी अउर महेन्द्र जी को बाहर लाइये, आपहि का हुकुम टाल नहीं सकते वे"। 

हमने लायक भतीजा जी से पूछा कि "ये कौन देवियां हैं जो हम लोगों के साथ जयपुर जा रही हैं".

नेताजी ने कहा - "रम्भा मेनकाण्ड कम्पनी हय समझे कक्का। अप्सराएं है आपकी दया से अस्थानिक इन्दर सभा की"।

"ये तुम्हारी शकुन्तला देवी अप्सरा हैं" ? काकी ने मुँह बनाया। 

"अप्सरा हर मेल की रखी जाती हय इन्दर-सभा में अउर सकुन्तला , जे हे ने से मेलहि अप्सरा हय - इंगरेजीवाला मेल" ! नेताजी हुचहुचाये।

"ये क्या  सचमुच डांस वांस करती हैं । बुकिंग की बात कर रही थीं" ।

"ई लोग डांस-वास नहीं करती हैं। डांस करवा सकती है बीआयपीज को। इसीलिए सउदा कराने और कमीसन पाने के धन्धे में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती हय"।

   उधर सभी लोगों के जयपुर में विवाह स्थल के पास पहुंचने पर मामला गर्म हो गया।  दरअसल हुआ यह कि विवाह के स्वागत समिति के प्रवक्ता का अभिवादन और गुलदस्ता स्वीकार करने के बाद सियावर बाबू ने गाड़ी आगे बढ़वा दी क्योंकि वह कहाँ ठहरेंगे ये दिल्ली से ही तय हो गया था। गिट-पिट अंग्रेजी बोलने वाली बालाएं उनकी ही गाड़ी में शुरू से बैठी थीं, इसलिए वे भी साथ चली गयीं। रह गईं दूसरी गाड़ी में बैठी हुई गुड्डी और शकुंतला जी। 

 कौन कहाँ ठहराया जायगा इसका ब्यौरा स्वागत समिति के प्रवक्ता ने जब शकुंतला जी को बताया तो वह आपे से बाहर हो गईं। 

" मेरे को कोन आलतू फालतू समझ राख्या है आपने जो उस होटल में ठहरा रहे हो जिसमें मूरख पत्रकार लोग ठहराये जा रहे हैं। मैं तो साफ नट गेइ थी जब आपने जयपुर चालने की बात कही थी। वो तो मन्त्री जी ने जोर दिया तो चली आई। जिब मैं मन्त्री जी के केने से आई हूँ को मन्त्री जी के साथ ठेरूंगी"। 

"वहां जगह नहीं है मयडम" ।

"अरे जाग्या कोई नईं तो वा चूड़ैलां जो साथ में भेज दीं आपने मन्त्री जी के साथ वां बाथरूम में सोवेगी के"

"मयडम वहाँ दो रूम बुक थे। एक में मन्त्री जी हैं, दूसरे में पिंकी-पप्पी मयडम्स। वो मन्त्री जी के साथ ही आईं थी साथ ही रेस्ट हाउस चली गईं तो हम क्या करें"। 

       " मैं आपका साथ आई क्या ? मैं भी मन्त्री जी का खातिर आई। नईं तो मैने चार राज्यां के सी एम और तीन सेन्ट्रल कैबिनेट के मंन्त्रीयों को बुला राख्या था। पिन्की-पप्पी कैसे चली गी मन्त्री जी का साथ में।  रिजर-वेसन थी के।  फेर...इंग्लिस बोलती है इससे बड़ी होगी के ?  आप लोग खुद हिन्दीवाला होके हिन्दीवाला को घासलेट समझे हो के ?  पिन्की-पप्पी ज्यादा बूटीवाली लागे है के आपने" ? 

"अब क्या बताया जाये मयडम्स, वो दोनों मयडम्स तो चली ही गईं साथ" ।

   "तो ऐ मैडम भी चली। मैने एक गाड़ी दे दो। मैं अबी हाल लौट रही हूँ दिल्ली। कल मेरी बड़कल की बुकिंग है। मेरा तो बहुत मजा रेगा वहाँ।  मेरे को क्या पड़ी जो यहां रऊँ आलतू-फालतू अखबार वालों के साथ में। टाइम खोटी करूँ, धन्धो खोटी करूँ। कल बड़कल में डील करा दूँगी तो कमीसन का बीस तीस मेरा भी हो जायगा। तुम और तुम्हारा मन्त्रीजी अचार बना के खा लो पिंकी-पप्पी का"।   

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  तो मित्रों, यह थीं शकुन्तला देवी जी.........। मनोहर श्याम  जोशी जी की इस पच्चीस साल से भी ज्यादा पहले की लिखी इस व्यंग्य रचना को पढ़ते हुए बरबस ही हालिया घपलों , घपलेवालीयों, सियारामों और भतीजों  की यादें कुनमुनाने लगती हैं। IPL, टीम मालकिन, क्रिकेट, कैबिनेट, राजा,फाजा सब ससुरे पकड़ में आ जाते हैं स्मृति के डिस्स एंटिनवा पर :)

 आप भी पढ़िये, नेताजी कहिन......अभी तो हम उचार रहे हैं इस शानदार कृति को। जब पूरी तरह उचर जायेगा तब तक हो सकता है एकाध शकुन्तला बाई का आगमन और न हो गया हो......जे हे ने से कि किर्रू लेवल ऑफ इंडियन पॉलिटी :)  


 - सतीश पंचम

नेताजी कहिन - राजकमल प्रकाशन,

छपित मूल्य 40/- मात्र..... असल मूल्य... 400 रू.   + +  :)

18 comments:

Arvind Mishra said...

जब साप्ताहिक हिन्दुस्तान पत्रिका जलवा फरोश हुआ करती थी तभी मनोहर जी की यह कालजयी कृति उसमें धारावाहिक छपती थी ....मैंने उस वक्त पढ़ा था -सचमुच रचनाएं भविष्य द्रष्टा और कालजयी हुआ करती हैं -प्रत्यक्षम किम प्रमाणं !
यह प्रसंग आपने जोरदार उद्धृत किया ! आभार !

हिंदीब्लॉगजगत said...

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ajit gupta said...

भाई दुनिया मे कुछ नहीं बदला है, बस बदला है तो हजार से लाख और लाख से करोड। करोड के बाद ना जाने कितनी बिन्दियां हैं जो हमारे समझ में आती नहीं।

दीपक बाबा said...

थोडा बहुत याद आया रहा है........ शायद इस पर दूरदर्शन पर सीरियल भी आया था..........

कक्का जी कहीन

क्या मैं सही हूं....

सतीश पंचम said...

दीपक जी,

ये वही किताब है जिस पर कक्का जी कहिन सिरियल बना था।

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

अरे वाह! किर्रू और किर्रू लयवल तो हमारी रोजमर्रा की शब्दावली का पार्ट है।
यहां पढ़ने पर लग रहा है जैसे वह आर्कियॉलॉजी का आइटम हो गया हो।
लगता है हमहीं आर्काइव बनते जा रहे हैं। :(

rashmi ravija said...

इस भूली हुई भाषा में कुछ पढना बहुत ही भाया...रचना तो कालजयी है ही..तभी आज भी उतनी ही प्रासंगिक.

आशा है आप किताब पढ़ते जायेंगे और उसके रोचक अंश से हमें भी रु-ब-रु करवाते जायेंगे

Akshita (Pakhi) said...

अले वाह, इस बुक का नाम कित्ता अच्छा है.

'पाखी की दुनिया' में भी आपका स्वागत है.

mukti said...

मुझे लगता था कि मनोहर जी बहुत कठिन लिखते होंगे, पर इस कृति के अंश पढ़कर लग रहा है कि मैं भी पढकर समझ सकती हूँ. मैंने आपको पहले भी बताया था कि व्यंग्य समझने में मुझे ज़रा कठिनाई होती है.
किर्रू माने क्या होता है, मुझे कृपया मेल करके बता दें. अपनी जनरल नालेज थोड़ी कमज़ोर है इस मामले में :-)

गिरिजेश राव said...

दो बातें दिमाग में आई हैं, ऐंवे :)
(1) अगर मनोहर श्याम जोशी और नेता जी कहिन नाम हटा कर प्रस्तुत किए होते तो कितनी स्वीकार्यता होती?

(2) सूरन - ओल। बहुत अच्छी सब्जी बनती है, भर्ता भी बनता है पर काटता है थोड़ा थोड़ा। सावधानी न बरतो तो मुँह बहुत खजुआता है, कट सा जाता है। लेकिन मुआँ पसन्द बहुत किया जाता है। सियावर बाबू, पिंकी, पप्पी से सूरन की और उसे खाने, पसन्द करने वालों की संगति बैठती है।
बिहारीलाल भी एक दोहा लिख गए हैं सूरन का सन्दर्भ दे कर। याद नहीं आ रहा। पर उनके यहाँ नायक कच्चा है। कच्चा सूरन काटता है, पका हुआ यम यम!

Poorviya said...

अप्सरा हर मेल की रखी जाती हय इन्दर-सभा में अउर सकुन्तला , जे हे ने से मेलहि अप्सरा हय - इंगरेजीवाला मेल" ! नेताजी हुचहुचाये।

Rahul Singh said...

मनोहर श्‍याम जोशी जी से ही उद्धृत है यह टिप्‍पणी - ''कितना त्रासद है यह हास्‍य और कितना हास्‍यास्‍पद है यह त्रास.

सतीश पंचम said...

मुक्ति जी,

पेश है 'नेताजी कहिन' की तर्ज पर सरकारी आँच से सेंकी गई पुस्तक 'कक्का जी कहिन' का वह अंश जिसमें कि किर्रू का मतलब एक पात्र के जरिए कहलाया गया है।

और हाँ, सरकारी आँच से तात्पर्य उन बंदिशों से है जिसके चलते कक्काजी कहिन की तेरह कड़ियों के बाद तेरहवीं कर दी गई थी क्योंकि इसके कारण नेताओं की बदनामी होती थी :)

.... किर्रू, मतलब किरानी क्लर्क। किर्रू उस जंतु विसेस को कहते हैं जो पहली तारीख को तनख्वाह और बीस तारीख को उधार लेने के लिए है, समझे ना, और पहली से तीस-इकतीस तारीख तक रोजाना किसी-न-किसी कतार में लगने के लिए पइदा हुआ हो।

प्रवीण पाण्डेय said...

सब कुछ भविष्यवाणी की तरह साफ साफ बोल दिया है।

sanjay jha said...

pasand aaaya ye bhi....

pranam.

सोमेश सक्सेना said...

ये किताब मुझे भी काफी पसंद है अक्सर पढ़ता हूँ। और मनोहर श्याम जोशी जी तो मेरे प्रिय लेखकों मे शामिल हैं। उनकी औपन्यासिक कृतियाँ जैसे कुरु कुरु स्वाहा, क्याप, कसप, ट-टा प्रोफेसर, हरिया हर्क्युलिज़ की हैरानी आदि तो कमाल की हैं।

हमलोग और बुनियाद जैसे सुपरहिट धारावाहिक भी उन्ही की कलम से जन्मे थे।

सोमेश सक्सेना said...

आज पहली बार आपके ब्लॉग में आया। कमाल का ब्लॉग है। भा गया मुझे। बधाई।

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

मनोहर श्‍याम जोशी जी का जवाब नहीं।

इस शानदार व्‍यंग्‍य को पढवाने हेतु आभार।

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छुई-मुई सी नाज़ुक...
कुँवर बच्‍चों के बचपन को बचालो।

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