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Wednesday, December 15, 2010

थोड़ा सा फैंटेसियाना हो जाये............सतीश पंचम

     Men love to wonder, and that is the seed of science.- Ralph Waldo Emerson

 यह उक्ति शत प्रतिशत सच लगती है जब आप किसी विज्ञान कथा को पढ़ते हैं और उससे उपजे विचारों को आसपास की चीजों से जोड़ने लगते हैं। विज्ञान कथाओं को पढ़ते हुए एक बारगी यह जरूर महसूस होता है कि - ये जो तमाम वैज्ञानिक उपलब्धियां हैं, चमत्कार हैं, उनके सामने आने से पहले जरूर कुछ न कुछ फंतासी बुनी गई होगी, ढेरों कहाँनीया गढ़ी गई होंगी। 
  अब यही देखिये कि फंतासी के रूप में पहले उड़न खटोला, उड़ती हुई जादुई कालीनें / चटाईयां अथवा पुष्पक विमान जैसी बातों को गढ़ा गया और अब देखिये ..........किंगफिशर, एयर इंडिया, इंडिगो, फिंडिगो न जाने कितने उड़नखटोले, जादुई कालीनें हवा में उड़ते दिख रहे हैं। और समानता तो इतनी है कि उड़न खटोले में जो खटमल पाये जाते थे वे जस के तस इन उड़ते विमानों में भी पाये जाते हैं, ऐसा विद्वानों का दावा है। 

  कुछ इसी तरह पहले जादुगरों के पास उपलब्ध जादुई गोलों के बारे में भी कहाँनिया गढ़ी गई हैं। उन जादुई गोलों में देखकर वह किसी भी व्यक्ति की वर्तमान स्थिति को बता सकते थे कि फलां शख्स इस समय क्या कर रहा है या क्या कर रही है। राजकुमारी खिड़की पर खड़े हो अपने बालों में कंघी कर रही है या राजकुमार के सपनों में खोई है। सब कुछ उस जादुई गोले में दिखता था।

    पता नहीं, उस जमाने में वह कौन सा सर्च इंजिन होगा जिसके बल पर जादुई गोले में देखकर किसी व्यक्ति की वास्तविक स्थिति के बारे में पता लग जाता था, कि  हां ये राजकुमार फलां जंगल में इस वक्त इस पेड़ के नीचे बैठा है। उस वक्त तो राजकुमारों के पास फेसबुक और ट्वीटर भी नहीं होते थे जहां पर कि वो अपने स्टेटस को अपडेट कर सकें कि चीड़ के पेड़ के नीचे बैठा हूँ, बरगद के पेड़ के उपर बैठा हूँ, चाय पी रहा हूँ, समोसे खा रहा हूँ । राजकुमारीयों के पास भी कोई बज़ आदि की सुविधा नहीं थी कि अपने मन की बातें बज़ या ट्वीटर पर  लिखते हुए कहें कि आज किसी का ख्याल आ रहा है। फिर वह कौन सा डेटाबेस या सर्वर होगा जहां से डेटा फेच करते हुए जादुई गोला उन लोगों की हरकतों को दिखाता होगा ? 

  लेकिन इतना तो तय है कि उस वक्त का सर्च इंजिन सचमुच काफी जबर्दस्त होगा जिसकी सटीकता का ये हाल था कि जादुई गोले में देखकर ही जादुगर को पता चल जाता था कि राजकुमारी इस वक्त अंगड़ाई ले रही है। संभवत: किसी वेब कैम का भी इस्तेमाल होता हो, जोकि सीधे तस्वीरें जादुई गोले को भेज देता होगा। 

 खैर, यह तो हुई कुछ फैंटेसी वाली बातें। लेकिन अब आता हूँ मूल मुद्दे पर जिसको लिखते हुए मैं शायद फैटेसी के चक्कर में भटक गया लगता हूँ। 
     दरअसल मैं अरविन्द मिश्र जी द्वारा लिखे गये विज्ञान कथाओं पर आधारित पुस्तक 'एक और क्रौंच वध' की समीक्षा करने जा रहा था कि तभी नेट पर देखा कि इस पुस्तक की समीक्षा पहले ही बहुत सुन्दर ढंग से लिखी गई है। गिरिराज किशोर जी द्वारा प्रस्तुत में लिखे उनके विचारों और रामदेव शुक्ल जी द्वारा लिखी गई समीक्षा से उपजे भावों का ही असर था कि मैंने 'एक और क्रौंच वध' की समीक्षा करने का फैसला बदल दिया और पुस्तक के बारे में एक पाठक के तौर पर अपना मत प्रकट करना ही उचित समझा। 

    तो मित्रों, विज्ञान कथाओं से सजी इस बेहद ही सुन्दर रचना को पढ़ते हुए सबसे पहले मन में जो बात आती है, वो यही कि,आखिर क्यों इस तरह से विज्ञान कथाओं को लेकर बहुत कम लिखा गया है ? क्यों इतने ज्यादा पाठक इस तरह की रचनाओं को नहीं मिलते जितने कि प्रेम, समाज याकि अन्य विषयों से जुड़ी कथाओ को मिलते हैं। आखिर वह क्या कारण हैं कि हम लोगों में इस तरह के लीक से हटकर सोची गई अलग किस्म की कहाँनियों को पढ़ने में रूचि घटती जा रही है, जबकि  इस तरह के अलग धारा में बह रही विज्ञानकथाओं को तो लोगों द्वारा हाथोंहाथ उठा लेना चाहिए था।

  खैर, अपनी अपनी रूचि होती है। अपना अपना मन। लेकिन एक बात तय है कि पुस्तक को पढ़ते हुए कहानी दर कहानी विस्मय की पेंग छूती सी जान पड़ती है। यूं लगता है कि अभी सोच का झूला उपर की जाते हुए सीधे नीचे आ जायगा, अचानक ही और तभी पता चलता है कि वह सोच का झूला कहीं उपर की ओर जाकर किसी डाल में फंस गया है, उंचाई पर, पत्तों के बीच। 

      येति वाली कहानी में जिस तरह से अरविन्द जी ने वर्णन किया है कि एक शख्स विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद बर्फीली गुफाओं में रहने वाले येति परिवार के साथ मजबूरन रहने लगता है और धीरे धीरे उन येति परिवारों के बारे में जानकर बाहरी संसार से उसकी तुलना करते हुए भोज पत्र पर लिखता है वह संस्मरण बेहद ही रोचक है।

  इसी तरह के मानव संवेदना और व्यवहार से जुड़ी हुई कई और कहानीयों का सम्मिश्रण है एक और क्रौंच वध। इन्हीं में से एक कहानी में बताया गया है कि मैना प्रजाति के पक्षियों के बारे में नर और मादा को लेकर चल रहे रिसर्च के दौरान एक शोध छात्र द्वारा एक नर मैना को मार दिया जाता है ताकि उसके भीतरी अंगों आदि को लेकर स्लाईड बनाई जा सके और आगे भी शोध किया जा सके कि नर मैना की संख्या कम होने के पीछे क्या कारण है। 

   वहीं,  इस तरह से एक मैना परिवार को नुकसान पहुंचाने पर उस शोध छात्र के जीवन में, उसके आपसी रिश्तों में किस तरह का असर पड़ता है, उसे अरविन्द जी ने बखूबी बयां किया है। एक तरह से भारतीयता का पुट देते हुए, भारतवर्ष के इतिहास, उसकी सामाजिकता का असर दिखाते हुए ही कहानी को शीर्षक के तौर पर 'एक और क्रौंच वध' नाम दिया है जोकि उनके इस विज्ञान कथाओं के खालिस भारतीय परिवेश में लिखे होने के ज्वलंत उदाहरण हैं।  वरना तो अब तक जितने भी विज्ञान कथाओं को मैंने पढ़ा है या फिल्मों आदि मे देखा है, ज्यादातर पर विदेशी छाप ही नज़र आती है। किसी में जॉन है तो किसी में क्रिस्टी है। और हर एक का चेहरा मोहरा अपने आप में बनावटी होने की चुगली करता लगता है। लेकिन 'एक और क्रौंच वध' को पढ़ते हुए भारतीयता के सौंधेपन की झलक मिलती है जो कि  विज्ञान कथाओं में एक बड़ी बात है। 

 - सतीश पंचम

प्रोफेसर रामदेव शुक्लगोरखपुर विश्वविद्यालय (उ0प्र0) द्वारा की गई 'एक और क्रौंच वध' की पुस्तक समीक्षा का लिंक यह रहा

( एक और क्रौंचवध, प्रथम संस्करण, 1998, तृतीय नव-संस्करण, 2008, मूल्य रु0 125/- पृष्ठ 94, प्रकाशक : लोक साधना केन्द्र, वाराणसी) वितरक : विश्व हिन्दी पीठ, 3/16, आवास विकास कालोनी, कबीर नगर, वाराणसी-221005 )

13 comments:

ajit gupta said...

यह सत्‍य है कि पहले साहित्‍यकार के मन में कल्‍पना जन्‍म लेती है और उसी कल्‍पना से विज्ञान अपनी उडान भरता है। इसलिए मैं तो हमेशा कहती हूँ कि साहित्‍य और विज्ञान का चोली-दामन का रिश्‍ता है। जितना आवश्‍यकत हमारे जीवन में विज्ञान है उतना ही साहित्‍य भी है। लेकिन साहित्‍य में कल्‍पना की उडान होनी चाहिएं अरविन्‍द मिश्रा जी को भी पुस्‍तक की बधाई।

Arvind Mishra said...

यह भी विज्ञान कथाओं के भारतीय दुर्भाग्य की बात हो गयी कि आपकी इतनी सुन्दर पोस्ट और मेरे प्रमोशन का यह मौक़ा भी चिट्ठाजगत के बंद पड़े होने से ज्यादा लोगो तक पहुँच नहीं सकेगा ...
आपने शुरुआत बड़ी धाँसू की है ,दरअसल हमारे मिथकों ,लोक कथाओं ,तिलिस्म कहानियों में वह सब वर्णित है जिसे आज की प्रौद्योगिकी ने सच कर दिखाया है ...
-विज्ञान कथाओं की एक खासियत उनकी आश्चर्यमूलकता भी है -सेन्स आफ वांडरमेंट ..
मैं आपका बहुत आभारी हूँ कि आपने एक और क्रौंच वध को यहाँ चर्चा का विषय बनाया -किताब तो और लोगों को मैंने नजर की थी .सब नजर नजर का फर्क है सतीश भाई -हम तो आप के मुरीद पहले से हैं अब तो आप फैनटसिया ग्रुप के -विदेशिया की तरज पर मेंबर हो हो गए !

प्रवीण पाण्डेय said...

विज्ञान की कल्पनाशीलता, साहित्य की कल्पनाशीलता से कहीं अधिक सघन हैं। बिना साक्ष्य के क्या क्या मॉडल बना कर रख दिये हैं, प्रभाव को व्यक्त करने के लिये।

rashmi ravija said...

कल्पना की उड़ान को कैसे विज्ञान साकार कर देता है..इसका सबसे ताज़ा उदाहरण हाल में ही जानने को मिला. "हैरी पौटर " बुक सिरीज़ में पढ़ा था, जिसमे किसी अंग के घायल होने पर उसे नए सिरे से पुनः उगाने का वर्णन है...और हाल में ही अखबार में पढ़ा कि रिसर्च हो रहें हैं...A roll-your-own blood vessel, grown in the laboratory from a person's own cultured cells, works well in kidney dialysis patients, making it the first complex bioengineered tissue part built without synthetic components. The technique may someday be used to grow internal organs as well, researchers say.

विज्ञान कथाओं का अपना महत्त्व है....अरविन्द जी की कहानियाँ निस्संदेह अच्छी होंगी...आपके द्वारा दिए लिंक भी देख आई...उपलब्ध कराने का शुक्रिया

Rahul Singh said...

प्राथमिक अनुमान यही हो रहा है कि विज्ञान की निरपेक्षता और मानवीय संवेदनाओं से उपजी विसंगत स्थितियों का रोचक और प्रभावी बयान होगा यहां, पुस्‍तक परिचय और समीक्षा लिंक के लिए धन्‍यवाद.

गिरिजेश राव said...

मंगल यात्रा और क्रौंच वध दोनों मुझे उपहार में मिले थे। अब तक पिटने के डर से :) नहीं बताया कि जाने कैसे क्रौंच वध पुस्तक ग़ायब हो गई।
अब समीक्षायें पढ़ कर हाथ मल रहा हूँ। लगता है बनारस की एक और ट्रिप लगानी पड़ेगी।

sanjay jha said...

samiksha padh ke pustak padhne ko
dil karta hai.......

pranam.

Arvind Mishra said...

@गिरिजेश जी ,
मुझे तो याद ही नहीं है कि क्रौंच वध मैंने आपके दी थी .... बहरहाल आपको एक प्रति मिल ही जायेगी देर सबेर ....

Dr Varsha Singh said...

विचारोत्तेजक आलेख के लिए बधाईयाँ .पुस्‍तक समीक्षा लिंक और परिचय के लिए धन्‍यवाद.अरविन्‍द मिश्रा जी को भी पुस्‍तक की बधाई।

anitakumar said...

अरविंद जी को बधाई। बहुत जल्द इस किताब को ढूंढूगी और पढ़ुंगी

निर्मला कपिला said...

अपकी पुस्तक समीक्षा पढ कर पुस्तक की रोचकता का भान कोई सहज ही कर सकता है। विग्यानकथा लिखने के लिये प्रेरित करती हुयी पोस्ट।कल्पना की उडान कितनी विचित्र है जो नये नये अविश्कारों को जन्म देती है। अर्विन्द जी को इस पुस्तक के लिये बहुत बहुत बधाई।

अविनाश वाचस्पति said...

आज दिनांक 22 दिसम्‍बर 2010 के दैनिक जनसत्‍ता में संपादकीय पेज 6 पर समांतर स्‍तंभ में आपकी यह पोस्‍ट फंतासी के बाद  शीर्षक से प्रकाशित हुई है, बधाई। स्‍कैनबिम्‍ब देखने के लिए जनसत्‍ता  पर क्लिक कर सकते हैं। कोई कठिनाई आने पर मुझसे संपर्क कर लें। 
व्‍यंग्‍यकार के स्‍वर में सोपानस्‍टेप मासिक की एक व्‍यंग्‍य रचना सुनिए गोरी तेरा गांव बड़ा प्‍यारा ...

गिरीश बिल्‍लौरे और अविनाश वाचस्‍पति की वीडियो बातचीत
@ अरविन्‍द मिश्र जी
हम भी खड़े हैं राह में 'एक और क्रौंच वध की प्रति के लिए'।

अविनाश वाचस्पति said...

व्‍यंग्‍यकार के स्‍वर में सोपानस्‍टेप मासिक की एक व्‍यंग्‍य रचना सुनिए गोरी तेरा गांव बड़ा प्‍यारा ...

गिरीश बिल्‍लौरे और अविनाश वाचस्‍पति की वीडियो बातचीत

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