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Sunday, December 12, 2010

'द मार्स कोड'.....अर्थात.......'फलफूलाईजेशन' ऑफ इंडियन 'दिल्स' :-) .......सतीश पंचम

      कल अख़बार में एक बहुत ही रोचक खबर दिख गई। खबर कुछ इस तरह की थी, कि कुछ अंतरिक्ष विज्ञानियों के अनुसार यदि मंगल ग्रह पर किसी को भेजा जाय तो उसे वापस नहीं बुलाना चाहिये बल्कि उसे वहीं पर सेटल होने देना चाहिये। इसके पीछे उन लोगों का तर्क है कि अरबों खरबों का प्रोजेक्ट खर्च सिर्फ रिटर्न जर्नी के चलते ही कई गुना बढ़ जाता है। इसमें खर्च का ज्यादातर हिस्सा सुरक्षा के नाम पर ही होता है क्योंकि अंतरिक्ष में जिन्हें भेजा जाता है उनकी सुरक्षित वापसी भी जरूरी मानी जाती है।  

       ऐसे में यदि वापसी का विकल्प ही न रखा जाय तो खरबों रूपये लग रहे प्रोजेक्ट में से लगभग अस्सी फीसदी खर्च बचाया जा सकता है। और उस अस्सी फीसदी बच गये खर्च से और भी ज्यादा लोग वहां वन वे जर्नी कर सकते हैं और धरती पर होने वाले अंतरिक्षीय अनुसंधान आदि में सहायता कर सकते हैं। 

       इस सोच के पीछे जो तकनीकी कारण हैं, सो तो हैं ही, साथ ही उन लोगों का यह भी मानना है कि चूंकि धरती और मंगल के वातावरण में बहुत हद तक समानता है, इसलिए वहां पर भेजे गये लोगों को संसाधन उपलब्ध करवाकर मंगल पर खेती के काम में लगाया जाना चाहिये और उनसे आशा की जानी चाहिये कि वह अपना एक नया संसार बसायेंगे। नये जीवन का वहां सूत्रपात करेंगे।  इसके लिये उन्हें उम्मीद है कि ढेर सारे वालंटियर्स भी जरूर मिलेंगे जिन्हें कि दो साल के जरूरी राशन पानी के साथ वहां पर भेजा  जा सकता है।  उम्मीद है कि भेजे जाने के दो साल के भीतर ही वे लोग अपने लिये वहां पर फसलें उगाना शुरू कर देंगे। और  एक नया ही संसार रचेंगे।  

      इसके अलावा उन लोगों का यह भी मानना है कि यदि धरती से भेजे गये लोगों के द्वारा मंगल पर जीवन-यापन शुरू हो जाय तो एक तरह से मंगल को धरतीवासी 'स्प्रिंग बोर्ड' के तौर पर इस्तेमाल कर सकते हैं, अर्थात,  यदि मंगल से आगे की दुनिया में जाना हो तो आसानी से मंगल को एक 'स्प्रिंग बोर्ड' / पड़ाव के रूप में इस्तेमाल करते हुए वहां से राकेट छोड़ते हुए आगे की ओर  अंतरिक्षिय छलांग लगाई जा सकती है  जिससे कि और भी ज्यादा वैज्ञानिक अनुसंधान आदि में सहायता मिलेगी। 

        पहली नजर में यह प्रोजेक्ट सुनने पर चकित करने के साथ साथ कुछ कुछ अजीब सा तो लगता है लेकिन इसमें संभावना जरूर है। इसके अलावा एक खतरा यह भी सुनने में आ रहा है कि पृथ्वी जैसे वातावरण होने के बावजूद वहां पर रेडियेशन की मात्रा कुछ ज्यादा है और हो सकता है इसके चलते कुछ जैविक समस्या खड़ी हो जाय।  इसके विकल्प के रूप में वैज्ञानिकों का मानना है कि वहां पर 50-60 वर्ष के आयु वाले लोगों को भेजा जाय जिनकी कि प्रजनन क्षमता लगभग खत्म हो चुकी होती है ताकि कोई जीन्स वाली या गुणसूत्रीय समस्या न खड़ी होने पाये।

    खैर, यह तो हुईं वैज्ञानिकों की बातें, उनके विचार, उनके तकनीकी आयाम। लेकिन मैं इन ढेर सारे वैज्ञानिक, आर्थिक, जैविक आयामों के बीच एक और किस्म के Socio-Political आयाम देख रहा हूँ। जी हाँ, Socio-Political आयाम।   मुझे लगता है कि  इस प्रोजेक्ट के लिये सबसे उपयुक्त वालंटियर्स भारत ही उपलब्ध करा सकता है।

       विश्वास नहीं होता न ? लेकिन यह सच है।  वालंटियर्स के रूप में भारत बड़े पैमाने पर अपने नेताओं को यहां से भेज सकता है और मेरी मानिए उन लोगों को तैयार करना भी कोई मुश्किल नहीं होगा। वैसे भी 50-60 की उम्र आने के बाद भी वही लोग हैं जो आम बूढ़ों से ज्यादा सक्रिय दिखते हैं। जहां सामान्य बूढ़ों का खाट पर उठना बैठना मुहाल होता है, वहीं पर ये भारत के बूढ़े नेता अपनी पकी उम्र में भी गजब की फुर्ती से हेलीकॉप्टर के पायदानों पर पैर रख, चढ़ और उतर लेते हैं।  चुनाव के वक्त तो इतनी बार हेलीकॉप्टरों में से चढ़ते उतरते हैं कि उनकी कुल यात्रा लेंग्थ जोड़ने पर किसी बाहरी ग्रह की यात्रा भी छोटी लगती है। अत: अपने कुल उड़ान काल और 50-60 की प्रजनन विहिन पकी उम्र के  हिसाब से भारतीय नेता इस तरह के प्रोजेक्ट हेतु सबसे सही उम्मीदवार होंगे। 

       यही सब सोच कर मैने सदन में रखे जाने वाले श्वेत पत्र, याकि 'White paper' आदि की तर्ज पर  'Carrot paper' तैयार किया है। वही carrot याकि गाजर जिसे दिखा- दिखाकर अड़ियल गधे से भी गाड़ी आगे की ओर सरकवाया गया था।

    इस 'Carrot paper'  को संसद के चालू सत्र में सदन के पटल पर रखने का विचार है, लेकिन मुश्किल यह है कि सदन को चलने ही नहीं दिया जा रहा। हर रोज भ्रष्टाचार के नाम पर हंगामा होते जा रहा है, काम कुछ नहीं हो रहा। विपक्ष जुटा है कि भ्रष्टाचारी केन्द्र सरकार को उखाड़ फेंकना है,  केन्द्र सरकार को चलने नहीं देना है, भले ही राज्य सरकारों में उसी विपक्षी पार्टी के मुख्यमंत्री भ्रष्टाचारी दलदल में आकंठ ही क्यों न डूबे हों।

 जब यह 'Carrot paper' सदन के पटल पर रखा जायगा तब की तब देखी जायगी, लेकिन फिलहाल तो आप उसी 'Carrot paper'  पर एक बार नज़र जरूर डाल सकते हैं जिसे कि भ्रष्टाचार के काले कारनामों पर रखे जाने वाले 'श्वेत पत्रों' के साथ नत्थी किया जाना है।   'Carrot paper' की मुख्य बातों के अनुसार - 

1 -  जो भी नेतागण वहां मंगल पर जायेंगे, वहां की सारी जमीने उनकी ही मानी जाएंगी। वहां पर वह चाहे जितने मंजिला आदर्श बिल्डिंगें बना सकते हैं, अनादर्श बिल्डिंगे बना सकते हैं। कोई NOC की जरूरत नहीं, कोई सरकारी टैक्स नहीं, कोई लाल फीताशाही नहीं। बल्कि जितना भी निर्माण कार्य मंगल पर ऐसे लोग करेंगे उसे नये संसार की स्थापनाक्रम में  समाज सेवा ही माना जायेगा और कोई भी उन नेताओं पर जमीनें कब्जाने जैसा घिनौना आरोप नहीं लगा पायेगा। 


  संभवत: ईश्वर जी ने भी इसी तरह के किसी सरकारी तंत्र के अभाव में ही सर्वप्रथम संसार की रचना की थी। यदि उस युग में भी सरकारी तंत्र होता, निर्माण आदि से पहले NOC आदि के झंझट होते तो बहुत संभव है कि इस सृष्टि का निर्माण ही नहीं हो पाता। वो तो गनीमत थी कि ईश्वर जी ने जहां तहां खाली प्लॉट देखा और बिना NOC लिये ही लग गये संसार के सृजन में। उम्मीद है हमारे नेतागण मंगल पर पहुंच कर ठीक ईश्वर की तरह व्यवहार करेंगे, प्लॉट कब्जाएंगे, नवसृजन करेंगे।  


2 -  चूँकि वहां जाने वाले नेतागण अपनी उम्र के 50-60 साल वाले पड़ाव में होगें और एक तरह से अपनी प्रजनन क्षमता खो चुके होंगे, ऐसे में यदि वो चाहें तो धरती से अपनी हो चुकी संतानों को भी वहां पर बुला सकते हैं।


    इससे एक हद तक धरती पर से कुछ बोझों के हट जाने जैसा सुख महसूस होगा वहीं मंगल पर पहुंचे नेताओं को अपनी संतानों, भाई-भतीजों के बीच रहने, उनके लिये सोचने करने के लिये भरपूर समय  और संसाधन मिल पायेगा। यहां धरती पर तो एक संपत्ति अर्जित की नहीं कि विपक्ष टेंटुआ दबाने को तैयार बैठा है। लगा देता है भाई भतीजावाद का आरोप। वहां मंगल पर इस तरह के कार्यों पर कोई भाई भतीजावाद का आरोप नहीं लगेगा, बल्कि इस क्रियाकलाप को 'नव-सत्कर्मों' की श्रेणी में रखा जायगा, और बहुत संभव है मंगल के धार्मिक जीवन में इसे समावेशित भी किया जाय। 

 3  -   इसके अलावा जैविक या वातावरण के प्रभाव से यदि 50-60 साल की उम्र में भी पुन: प्रजनन क्षमता जाग्रत हो जाय और मंगल पर ही कोई वैध-अवैध संतान आदि की प्राप्ति हो, तो वहां पर होने वाली संतानों का बर्थ सर्टिफिकेट आदि बनाने को लेकर मंगलवासी स्वतंत्र होंगे। उनके यहां के सरकारी कागजों की हैसियत ठीक वैसी ही होगी जैसी कि भारत में धारा 370 के आलोक में कश्मीरी कागजों की होती है। 


     यह तो सभी जानते हैं कि  कश्मीर के कागज-पत्तर धारा 370 के चलते अपने आप में अलग ही हैसियत रखते हैं। जिस तरह से बाहरी लोग कश्मीर में अपने नाम जमीन नहीं खरीद सकते ठीक उसी तरह की कोई विशेष धारा कुछ समय बाद मंगल पर भी लागू की जायगी। अत: नेतागण वहां ऐसी किसी धारा के लागू होने से पहले निश्चिंत होकर जा सकते हैं, रह सकते हैं, संपत्ति अर्जित कर सकते हैं, खुलकर भाई भतीजावाद कर सकते हैं। 

        इसके अलावा वैध-अवैध चाहे जितनी संतानें भी उत्पन्न करें, इस बारे में कोई उनसे पूछताछ नहीं कर सकेगा न ही कोई डीएनए टेस्ट आदि के लिये अपील ही कर सकेगा। बल्कि इस तरह से संतानोत्पत्ति को मंगल गृह के फलफूलीकरण के लिये जरूरी कदम माना जायगा। और जो कोई इस पुण्य कार्य में शामिल होना चाहेगा उसे  'गृह फलफूलीकरण योजना' के तहत अलग से प्लॉट भी  आबंटित किया जायगा, जिस पर कि कोई किसी किस्म की जांच नहीं बैठाई जा सकेगी। 

4 - नेताओं के अलावा भी यदि और कोई इंडस्ट्री आदि से जाना चाहे तो उसे भी छूट होगी। बशर्ते वह वापस आने की जिद न करे।


5- एक संभावना यह भी है कि फिल्म इंडस्ट्री के लोग भी वहां स्पेशल पास देकर भेजे जा सकते हैं। आखिर वहां पर रहने वालों के लिये मनोरंजन आदि की सुविधा भी तो जरूरी है। बहुत संभव है मंगल पर भी एक फिल्म इंडस्ट्री स्थापित हो। ऐसे में उन लोगों को अपने गानों में मुन्नी, शीला, छुटकी, फुटकी  जो चाहे नाम रखने की छूट होगी क्योंकि विरल जनसंख्या के कारण वहां किसी मुन्नी या शीला के होने के आसार फिलहाल तो नहीं के बराबर होंगे। अत: इससे पहले कि कोई मुन्नी शीला वहां पर भी हो, फिल्म इंडस्ट्री के लोग जल्दी से जल्दी इस अवसर का लाभ उठा सकते हैं। 

   इसके अलावा भी ढेर सारे प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष लाभ हैं जिनका कि खुलासा समय आने पर किया जायगा। 
   इस योजना के लाभ उठाने के लिये लालायित नेताओं को आगाह किया जाता है कि,  इससे पहले कि उनके पार्टी अध्यक्षों के मन में भी इस स्वर्णिम योजना से लाभ उठाने की भावना आए अपने अपने पार्टी आफिस में अपना त्यागपत्र आदि देने की प्रक्रिया शुरू कर दें। तमाम नाते रिश्तेदारों के लिये सीटें बुक करवा लें। 

  लोकसभा या राज्यसभा में जाने का टिकट मिले न मिले, इस मंगलमय यात्रा का टिकट जरूर मिलेगा :-)

- सतीश पंचम    



(चित्र : Google दद्दा से साभार )
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15 comments:

Rahul Singh said...

दस्‍तावेजी वैज्ञानिक ललित निबंध.

अजय कुमार झा said...

बाह बाह , भोरनिंग में ई आपका इ पोस्टिंग का आनंदमेंट उठाने का फ़ुल फ़्लैस प्राऊडनेस हमें ..डीप तक फ़ील हुआ है ...गाना गूंज रहा बैकग्राऊंड में ...चलो दिलदार चलो , चांद के पार चलो ...और अतंसमन से भी एक कोरस चल रहा है ....यार भेज दो इन सबको चांद के पास अब तो क्योंकि अब तो ..दाग अच्छे हैं ..कपडे के ही नहीं चांद के भी ...

ajit gupta said...

भाई कुछ ब्‍लागरों के नाम भी सुझा देते।

देवेन्द्र पाण्डेय said...

मंगल पर नेट चलेगा ?
बिन ब्लॉगिंग के तो कोई हिलने वाला नहीं...यहाँ तो केवल ब्लॉगर ही पढ़ेंगे। अखबार में छपे तो सबका भला हो।

Arvind Mishra said...

वाह क्या फंतासी है ....मंगल पर मंगल की तैयारी ...नेताओं की मारामारी ...हो गयी शुरू तैयारी ..चलिए कोई विज्ञान कथा लिखिए इसी तर्ज पर ! ग्रेट !

मो सम कौन ? said...

अजीत गुप्ता जी का सुझाव बेहद पसंद आया, कुछ ब्लॉगर्स का भी जुगाड़ किया जाये:)

सतीश पंचम said...

अजित जी, संजय जी,

ध्यान दिलाने के लिये शुक्रिया।

किंतु ब्लॉगरों के लिये अलग दुनिया का एक बहुत ही बढ़िया कॉन्सेप्ट रहरपुर में अभी चल ही रहा है, जहां पर कि तमाम किस्म किस्म के फ्लैटों के अलावा एडजस्टेबल रूफ वाले फ्लैटों का भी विकल्प है जिससे कि सिर निकालकर ब्लॉगर मंगल तक तो क्या उससे आगे भी पहुंच सकते हैं। वैसे भी ब्लॉगरों की कल्पन उड़ान काफी ज्यादा होती है :)

यह रहा 'रहरपुर' लिंक -

http://girijeshrao.blogspot.com/2010/12/blog-post_09.html

mukti said...

वाह ! क्या झन्नाटेदार विज्ञानकथात्मक पोस्ट लिखी है. अरविन्द जी सच कह रहे हैं. आपको तो विज्ञानकथा लेखन में हाथ आजमाना चाहिए. मुम्बई में हैं, तो हो सकता है कि एकाध फिल्म की स्क्रिप्ट भे लिखने को मिल जाए. क्या कहते हैं?

गिरिजेश राव said...

झन्नाटेदार व्यंग्य। पर्यवेक्षण, मौलिक सोच और उतनी ही जबरदस्त प्रस्तुति! ग़जब कर दिए ग़जब।

'अंतरिक्षीय' कर दीजिए।

@ संभवत: ईश्वर जी ने भी इसी तरह के किसी सरकारी तंत्र के अभाव में ही सर्वप्रथम संसार की रचना की थी। यदि उस युग में भी सरकारी तंत्र होता, निर्माण आदि से पहले NOC आदि के झंझट होते तो बहुत संभव है कि इस सृष्टि का निर्माण ही नहीं हो पाता। वो तो गनीमत थी कि ईश्वर जी ने जहां तहां खाली प्लॉट देखा और बिना NOC लिये ही लग गये संसार के सृजन में। उम्मीद है हमारे नेतागण मंगल पर पहुंच कर ठीक ईश्वर की तरह व्यवहार करेंगे, प्लॉट कब्जाएंगे, नवसृजन करेंगे।

सचमुच फंतासी में हाथ आजमाइए। इस विधा में सामग्री बहुत कम है, ठीक वैसे ही जैसे भविष्य के मंगल पर पप्पू, मुन्नी, शीला वगैरह ;)

मंगल पर जनसंख्या बढ़ाने में एक पेंच है:
उन्हीं की संतानें आपस में करेंगी तो जेनेटिक हिसाब से लोचा हो जाएगा। भ्रष्टाचार उनकी हॉबी है। उसके लिए वहाँ NOC, license, धर्म वगैरह सब आ जाएँगे और फेर बैतलवा वोहि डाढ़ी।
इसलिए कुछ सक्रिय ब्लॉगरों के नाम सुझाने ही चाहिए जो वहाँ बाबा बन कर सबको उपदेश देते रहेंगे और नैतिकता की दुकान भी चलाते रहेंगे (अपनी पिछ्ली पोस्ट न भूलें आर्य!) लगे हाथ फिल्म लाइन से बाबियाँ भी आने लगेंगी। क्या दिव्य नज़ारा होगा!

प्रवीण पाण्डेय said...

यह पोस्ट संग्रह कर के रख लें, भविष्य में बहुत बार इसकी आवश्यकता पड़ेगी। यह मामले बार बार उठेंगे, मंगल निर्वासन करना ही पड़ेगें।

ममता त्रिपाठी said...

अच्छा लिखा।

Kajal Kumar said...

धरती के बोझों के लिए सही विकल्प है :)

मो सम कौन ? said...

भाईजी, रहरपुर वाली पोस्ट पर तो हम पहले ही चरस बो आये थे, हां नतीजा देखने जाते हैं कि असर हुआ कि बीज भी सेंत मेंत में गया:)

sanjay jha said...

jitni achhi 'fatansi' ootni achhi....
phoolghari 'comment'..........

dekhte hain koi 'blog-baba' jane ko
tayar hain ke nahi......apne to apni
hisab se sambhavnaon ki 'bamchak'
macha rakhi hai.....

pranam.

rashmi ravija said...

कमाल का लिखा है...बढ़िया फैंटेसी है...

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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A Photo from - Thoughts of a Lens

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