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Tuesday, December 7, 2010

ब्लॉगजगत के पलटदास..... उर्फ...... नैतिकता ठेलक ब्लॉगरों की कारगुजारियां..........सतीश पंचम

       आज कल ब्लॉगजगत में एक किस्म की सुगबुगाहट देख रहा हूँ। आप ने भी महसूस किया होगा। लोग आते हैं, नैतिकता पालन करने का प्रवचन देते हैं, आपस में प्यार मोहब्बत से रहने का उपदेश देते हैं और थोड़ा बहुत इधर उधर टाईम पास कर चले जाते हैं।  और जाते भी कहां हैं, घूम फिर कर फिर वहीं किसी महिला के ब्लॉग पर या किसी हॉट टॉपिक पर टीपते नज़र आते हैं।  

      नैतिकता परिपालन कमेटी के संभवत: ये लोग सवैतनिक सदस्य हैं।  जब देखो तब कोई न कोई आकर ब्लॉगजगत में नैतिकता का पाठ पढ़ाने लगता है। यह नैतिक है, वह अनैतिक है। महिलाओं पर ऐसा मत लिखो, पुरूषों पर वैसा मत लिखो,  फलां लिखो,  टलां लिखो। इतनी ज्यादा प्रेंम-सद्भाव,  नैतिकता, समानता, विश्व बंधुत्व, भाईचारा ठेलने लगते हैं, कि लगता है जैसे किसी देवता के अवतारी पुरूष हैं। और नारीवादीता तो जैसे इनके हाथों में विष्णु भगवान की तरह सजने वाला फूल ही समझिये। जहां कहीं इन्हें लगता है कि कोई सुन नहीं रहा, तुरंत नैतिकता का शंख फूंकना शुरू कर देंगे।  इधर उन्होंने शंख फूंका नहीं कि उसकी आवाज सुनकर तमाम उपलब्ध गण शंख ध्वनि के बाद एक साथ जय बोल देंगे।  जय सुनते ही ऐसा प्रतीत होता है मानों सत्यनारायण कथा का एक अध्याय खत्म हुआ, अब चरणामृत की बेला नजदीक है।

       खैर, इस तरह के तमाम समझाइशों वाले कमेन्ट, सत्यनारायणी वचनावली आदि पढकर ब्लॉग जनता पहले ही काफी हद तक पक चुकी है, ऐसे लोगों के बारे में जानने समझने लगी है लेकिन शायद कहने में हिचकती है। वैसे भी धर्म आदि का मामला जरा नाजुक होता है, तिस पर सत्यनारायणी कथा......कौन सवाल जवाब करे। चलने दो जो चलता है।  कहा भी गया है यत्र नार्येस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:।  इसलिये शायद ऐसे देवता लोग अपने कर्तव्यों का पालन करते ही रहते हैं.....साथ ही साथ महिलाओं की कद्र करो वाला उपदेश  बांटते भी जाते हैं, मानों ये नहीं कहेंगे तो लोग महिलाओं की कद्र करना छोड़ देंगे। वही हैं जो अब तक सब संभाले हुए हैं वरना अब तक तो दुनिया उलट पलट जाती। बाकी  साधारण पुरूष क्या जानें महिलाओं का मान सम्मान। 

     खैर, अपनी अपनी सोच, अपना अपना छद्मालय। लेकिन  इस तरह के लोगों की तमाम छद्म प्रपंचों, छद्म नारीवादिता आदि को देखते हुए तीसरी कसम फिल्म का एक कैरेक्टर पलटदास याद आता है।  पलटदास काफी सीधा और धार्मिक स्वभाव वाला शख्स है। एक बार जब हीरामन (राजकपूर) अपनी बैलगाड़ी में नौटंकी में नाचने वाली हीराबाई (वहीदा रहमान ) को लेकर जा रहा होता है तो  रात ज्यादा हो जाने से हीराबाई उस बैलगाड़ी में ही सो जाती है,नींद में अस्त व्यस्त हीराबाई के पैर बैलगाड़ी के टप्पर से  पैर बाहर की ओर निकल आते हैं। 

    उधर हीरामन अपने बैलों को चारा आदि डालकर अपने साथी गाड़ीवानों के बीच जाकर बीड़ी वगैरह पीता है, चलत मुसाफिर जैसे गीत में साथ देता है ।  

       इधर बात ही बात में हीरामन के मित्र लालमोहर, पलटदास, धन्नु वगैरह फिक्र जताते हैं कि बैलगाड़ी में हीराबाई अकेली सोई है। जनाना जात है। इस तरह अकेले नहीं छोड़ना चाहिए। हीरामन को बात ठीक लगी। मौका पाकर लालमोहर ने कहा कि मैं जाता हूँ रखवाली करने हीराबाई की। लेकिन हीरामन लालमोहर के मिजाज को समझता था। इसलिए उसने मना कर दिया लालमोहर को। उधर धन्नुक भी कुछ लटपटीया किस्म का जान पड़ा। बच गया पलटदास। उसकी सीधाई और धार्मिक विचार वाले व्यक्ति की छवि काम आई और हीरामन ने पलटदास को भेज दिया बैलगाड़ी के पास कि जा रखवाली कर।

    जाते साथ पलटदास वहां बैलगाड़ी के पास गोबर में पैर धंसा बैठता है। किसी तरह कांछ कूछ कर रगड़ धगड़ कर गोबर छुड़ाता है और वहीं हाथ जोड़ कर बैलगाड़ी के पास अपनी रामनामी चालू रखता है जय सिया राम, राम राम.....लेकिन जैसे ही नजर हीराबाई के गोरे चिट्टे पैरों पर जाती है उसे एकाएक कंपकपी छूट जाती है । उसका मन करता है कि इन पैरों को वह छू कर देखे..... और इसी क्रम में वह राम ......सिया सुकुमारी आदि जपते हुए हीराबाई के पैरों को छू देता है। इधर हीराबाई की नींद खुल जाती है तो देखती क्या है कि पलटदास कंपकपाते हुए उसके पैरों को छू रहा है, संभाल नहीं पा रहा खुद को। हीराबाई ने गुस्से में उसे डांट कर भगा दिया।  बेचारा धार्मिक बातें करने वाला, नैतिकता का परम पालक पलटदास अपने आप को संभाल न पाया। 
पलटदास

    यही नहीं, अगले दिन जब नौटंकी देखने चारों दोस्त वहां पहुंचे तो सब लोग तो नौटंकी देख रहे थे लेकिन पलटदास अपनी धार्मिकता के चलते स्टेज पर लगे परदों में राम और सीता का वनगमन देख हाथ जोड़े भाव विभोर होता रहा। कि तभी स्टेज पर हीराबाई आती है नाचते हुए, गाते हुए कि पान खाये सईंया हमार। हीराबाई का आना था कि पलटदास सारी धार्मिकता और प्रवचनई भूल गये और लगे टुकुर टुकुर ताकने हीराबाई को। और न सिर्फ ताकते रहे बल्कि दोनों हाथ जोड़कर भक्तिभाव से नमन भी करने लगे हीराबाई को। 

     तो मित्रो, ये तो पलटदास का हाल था। उन्हीं पलटदास की तरह ही ढेर सारे पलटदास ब्लॉगधरा पर धार्मिकता और प्रेम आदि की बातें करते मिल जाते हैं। लेकिन जैसे ही मौका मिलता है महिला ब्लॉगरों की तस्वीरों को परख निरख वहां पहुंच ही जाते हैं हाथ जोडे हुए ....।  सड़ी से सड़ी कविता पर भी वाह वाही और तमाम लल्लो चप्पो के दौर के बाद नैतिक प्रचनावली भी ठेलते चले जाते हैं। दर्शाते ऐसा हैं मानों सबसे बड़े नैतिकता वाले होल सेल डीलर इसी गली है। 
तीसरी कसम के सेट पर राजकपूर और शैलेन्द्र

    खैर, जब बात चली है तो इसी पलटदास वाले सीन के बारे में कुछ बताता चलूं  कि अपने संस्मरण में फणीश्वरनाथ रेणु जी ने लिखा है कि वह जब पूर्णिया से बंबई आए अपनी कहानी पर बन रही फिल्म  तीसरी कसम के लिए तो यहां फिल्म स्टूडियो में वही सीन चल रहा था जिसमें कि हीराबाई बैलगाड़ी में सोई हैं और नीचे जमीन पर बैठकर पलटदास हीराबाई के पैर छूने की कोशिश कर रहा होता है। 

    यहां शूटिंग के दौरान एक तकनीकी समस्या यह आई कि हीराबाई तो बैलगाडी के अंदर सो रही होती हैं लेकिन पलटदास जमीन पर ही बैठा होता हैं। इससे कैमरे के फ्रेम में दोनों नहीं आ पा रहे थे। तब डायरेक्टर ने चिल्ला कर कहा कि पलटदास के पीछे छह इंची दो। सुनकर रेणु जी थोड़ा हैरान हुए कि ये छेह इंच पलटदास के पीछे देने की क्या बात हो रही है। तब तक पता चला कि पलटदास को बैठने के लिये एक छह इंच की उंचाई वाला लकड़ी का प्लेटफार्म दिया जा रहा है जिससे कि पलटदास कैमरे में फिट हो, नजर आएं। 

     मै जब ब्लॉगजगत में नजर दौड़ाता हूँ तो यहां इसी तरह के बौने पलटदासों को विचरण करते देखता हूँ। हर एक को फिक्र होती है कि कितना ज्यादा उंचा प्लेटफार्म लेकर बतियाये, नारीवादी बने कि ब्लॉगजगत के नैतिकतावादी कैमरे में खुद को फिट कर सके।  वो भूल जाते हैं कि ब्लॉगजगत के कैमरे का विव्यू फाईंडर सिर्फ सामने वाले दृश्य को ही नहीं बल्कि आसपास के फैलाये उसके रायते को भी देखता है कि कहां किसने कब क्या स्टैंड लिया था, कहां किसने क्या टीपा था। महज छद्म नारीवादी बन कर रह गये ऐसे पलटदासों को देख कभी कभी लगता है कि यदि फिर से तीसरी कसम बने तो हीरो के रूप में हीरामन नहीं बल्कि पलटदास को ही लिया जायगा क्योंकि एक वही है जिसे कि चलत मुसाफिर गाने के दौरान हारमोनियम बजाते हुए हीरामन ने कहा था - जियो पलटदास  जियो , आखिर ब्लॉगजगत में भी तो शांति, सद्भाव, पीस - हारमनी वाला हारमोनियाबाज  चाहिये कि नहीं :)

 - सतीश पंचम

स्थान - वही जहां पर जल संयंत्रो के जरिये इलाके में पानी ठेलने वाले पंम्पिंग स्टेशनों को उदंचन केन्द्र कहा जाता है।


समय - वही, जब पलटदास हीराबाई के पास जाकर कहता है, देवीजी, हमारे यहां सिलाई, बुनाई, कढ़ाई केन्द्र की तर्ज पर 'नैतिकता ठिलाई केन्द्र' खुल रहा है। क्या आप हमारे   'नैतिकता ठिलाई केन्द्र'  के संचालन का कार्यभार संभालना पसंद करेंगी....रहना खाना आदि के साथ साथ टिप्पणीयां फ्री में मिलेंगी.......अगर आप राजी हों तो मैं उपर वालों से बात करूं । 


 और तभी उपरी मंजिल  से आवाज आये........अबे ओ पलटादास के बच्चे ...... कहां मर गया.....आज टन्की में पानी नहीं चालू किया अभी तक...क्या रात को पी हुई अब तक उतरी नहीं..............चल जल्दी मोटर चालू कर.......  
  
 और पलटदास दौड़ पड़ा .....यह कहते हुए ....... आया मेमसाब :-)
(चित्र : गूगल दद्दा से साभार)

43 comments:

VICHAAR SHOONYA said...

ब्लॉगजगत के पलट दास ब्लागरों कि कथा सुन्दर है.

दीपक बाबा said...

सतीश जी, एक ठो डिस्क्लेमर लगाना चाहिए था.....

पोस्ट पढ़ने से पहले फिल्म देखिये 'तीसरी कसम' और उसमे भी 'हीराबाई' पर ध्यान केंद्रित करके 'पलटदास' को ही स्टडी किया जाए..

रचना said...

aap ki post achchi lagii

Majaal said...

औरों का तो पता नहीं साहब, हमारी टिपण्णी रुपी छह इंची प्रतिक्रियां सहायता हेतु ही होती है, पर अब अब चीज़ ही ऐसी है, की कोई गलह मतलब भी निकाल ले, तो उसे दोष नहीं दिया जा सकता. अतः, हे पार्थ, कर्म किये जा, फल की चिंता न कर, क्योकि उस पर तेरा अधिकार नहीं है.... आप अपनी तरफ से सौहार्द बनाने का प्रयास जारी रखे, बाकी प्रभु पर छोड़ दे ...

इंदु पुरी गोस्वामी said...

ये बाते ,ऐसी बाते कईयों से सुन चुकी हूँ.क्या सचमुच ऐसा है? जरूर होता होगा अन्यथा आप इस पर पूरा एक आर्टिकल नही लिखते.केवल एक औरत होने के कारन ही लोग उनके ब्लॉग पर जाते हैं और कमेंट्स देते हैं तो दे.महिला ब्लोगर्स को 'बेड एलिमेंट्स' को पहचानना और उन्हें 'किक आऊट' करना आना चाहिए.
क्यों हम ये सोचे कि ब्लॉग की दुनिया का हर शख्स हमे 'बहुत अच्छी लेडी' ही माने.ये अपने आपको 'बहुत अच्छा' बिताने के चक्कर मे ही महिला ब्लोगर्स उनका विरोध नही करती.
सतीश जी! मैं तो ऐसे लोगो की माँ बहन एक कर देती हूँ.
क्या करूं? ऐसिच हूँ मैं तो
और.....कमेंट्स की संख्याओं को अपनी लेखनी कीश्रेष्ठ्ता को साबित करने के एक 'स्टेम्प' भी नही मानती.कम आये पर सचमुच पढ़ने वाले आये यानि सिंसियर और सीरियस रीडर्स '
हा हा हा है ना?

सतीश पंचम said...

दीपक जी,

मैने कोशिश की है कि पलट दास गाथा को ठीकठाक नैरेट कर दूं ताकि फिल्म देखने की जरूरत ही न पड़े :)

वैसे यह फिल्म सभी को देखनी चाहिए.....एकदम क्लासिक और बेहतरीन फिल्म है तीसरी कसम।

रचना said...

क्यों हम ये सोचे कि ब्लॉग की दुनिया का हर शख्स हमे 'बहुत अच्छी लेडी' ही माने.ये अपने आपको 'बहुत अच्छा' बिताने के चक्कर मे ही महिला ब्लोगर्स उनका विरोध नही करती.
सतीश जी! मैं तो ऐसे लोगो की माँ बहन एक कर देती हूँ.
waah indu is kament kae liyae hazaro thanks

sanjay jha said...

jhhannnaaatedarrrrr.....

100% neat-clean-safin.....

panchamamrit.....

aap aiseich aaina dikhate rahe.....
hum apni chabi dekhne aate rahenge..

सतीश सक्सेना said...


"नैतिकता परिपालन कमेटी के संभवत: ये लोग सवैतनिक सदस्य हैं...."

बड़ा करारा व्यंग्य किया आपने ब्लाग जगत के तथाकथित रायटरों पर ! कथनी और करनी में फर्क साफ़ नज़र आ रहा है !
एक गुरु के डेरे पर दो चार बार मैं भी पालथी मार कर प्रवचन सुनता रहा था, ३ -४ हाजरी लगातार दी और अपनी आदत अनुसार तारीफ़ भी झाड़ आया !

कुछ दिन बाद वही गुरु एक जगह दंडवत प्रणाम करते हुए नज़र आये तो अपने को एक मोटी सी, पुरानी वाली गाली दी " बुड्ढा साला...सतीश ..."

उसके बाद तौबा करने के तरीके ढूँढता रहा ! आपको भी सर नवाने आया था मगर आपने लिफ्ट नहीं दी शायद मुझे वहां बैठे प्रवचन सुनते देख लिया होगा !

आज मेरी याद कैसे आई ?? गुरु चीज हो ...खैर
भूल न जाऊं इस लिए शिव शर्मा वाला प्रणाम स्वीकारो !

Shiv said...

तीसरी कसम मेरी भी पसंदीदा फिल्मों में से एक है. उधर बासु भट्टाचार्य ने गर्दा उड़ाया था और इधर आपने.

गर्दा उड़ा दिए हैं. पूरा.

बाकी, जब तक आस्था है, तब तक संस्कार चैनल चालू रहेगा:-)

rashmi ravija said...

क्या गज़ब लिखा है..आजकल आपके creative juice उफान पर है....एक से एक नायाब आलेख निकल कर आ रहें हैं...बस ये उर्वरता ऐसी ही बनी रहें...:)

Mired Mirage said...

यह तो हुई बात पलटदासों की,किन्तु मुझ जैसियों का क्या जो पुरुषों के ब्लॉग्स पर जाकर टिपियाती हैं? क्या हमें केवल स्त्रियों को पढना टिपियाना चाहिंए ? मैं तो हाल में ही एक दामाद विरोधी कविता का भी विरोध कर चुकी।
और हाँ,इन्दु जी, यदि स्त्रियाँ भी गाली देने की चेष्टा में माँ बहनों को ही निशाना बनाएँगी तो ऐसी गालियों व नारीवादिता का क्या लाभ? क्या पुरुष हमें गाली देने को कम हैं जो स्त्रियाँ भी हमें ही निशाना बनाएँ?
शायद बहुत दिनॊं से ब्लॉग्स न पढ़ पाने के कारण मैं सन्दर्भ नहीं समझ पा रही हूँ।
घुघूती बासूती

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

संदर्भ तो मैं भी नहीं समझ पाया लेकिन बात फिर भी बहुत जोरदार और समझ में आने वाली है। बेलौस और खरा लिखा है आपने।

आजकल ब्लॉग पर लिखना और पढ़ना दोनो कम होता जा रहा है। लेकिन देखता हूँ कि कहानी वही पुरानी चल रही है। :)

Sanjeet Tripathi said...

jabbardast. kya lapeta hai bandhu....

दीपक बाबा said...
This comment has been removed by the author.
पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

फूस की आग, मुल्लमे की चमक और स्प्रिट का रंग जैसे आया-गया होता है...वैसे ही ब्लागजगत के ये "ऊँच प्रवचन-नीच करतूती" वाले नैतिकता ठेलक भी कोई बहुत अधिक दिनों के मेहमान नहीं हुआ करते....

फ़िरदौस ख़ान said...

एक ज़बरदस्त पोस्ट...

सतीश पंचम said...

@ घुघूती जी,

मुझ जैसियों का क्या जो पुरुषों के ब्लॉग्स पर जाकर टिपियाती हैं? क्या हमें केवल स्त्रियों को पढना टिपियाना चाहिंए ?
-------------------

घुघूती जी,

यहां इस पोस्ट में बात केवल स्त्री ब्लॉगर या महिला ब्लॉगर के प्रति टिप्पणी आदि से संबंधित नहीं है, बल्कि उससे भी आगे की है.... लोगों की कथनी और करनी में उपजे विरोधाभासी प्रवृत्तियों की है।
ऐसे लोग तमाम तरह की नैतिकता परोसते चले जायेंगे लेकिन सही बात भी कहो तो कहेंगे कि महिलाओं के प्रति ऐसा नहीं कहना चाहिए, पुरूषों के प्रति ऐसा नहीं कहना चाहिए। यह ठीक है वह गलत है।

ब्लॉगिंग न हुई लोगों की चाह, अनचाह, धौंस, धाकड़ी का मैदान हो गई :)

ऐसे में ब्लॉगिंग के जरिये अभिव्यक्ति गई चूल्हे में... वाला हाल हो जाता है।

आप को याद होगा आप ही ने एक बहुत ही सटीक पोस्ट लिखी थी खाप पंचायत वाली। यह पोस्ट भी कुछ कुछ उसी जायके की है, बस फर्क यह है कि थोड़ा सा फिल्मी मुर्ग मुसल्लम डाल दिया है मैंने :)

गिरिजेश राव said...

भाई हम तो किसी के ऊपर धौंस नहीं जमाते हैं और लेडियों के ब्लॉग पर भी बहुत कम जाते हैं। इसलिए यह पोस्ट कम से कम मुझे टारगेट कर के तो नहीं लिखी गई है। बाकी दुनिया की दुनिया जाने।
'पाददर्शन प्रकरण' पढ़ा तो रेणु के मैला आँचल से कुछ देने का मन हो आया।
' धीरे धीरे पर्दे को हिलाने वाली फागुन की आवारा हवा ने बावन के दिल को भी हिलाना शुरू कर दिया ..... पलंग पर अलसाई सोई जवान औरत! बिखरे हुए घुँघराले बाल, छाती पर से सरकी हुई साड़ी, खद्दर की खुली हुई अंगिया...बावनके पैर थरथराने लगे हैं...वह इस औरत के कपड़े को फाड़ कर चिथ्थी चिथ्थी कर देना चाहता है। वह अपने तेज नाखूनों से उसके देह को चीर-फाड़ डालेगा। वह एक चीख सुनना चाहता है.....वह मार डालेगा इस जवान गोरी औरत को...ऐं सामने की खिड़की से कौन झाँकता है? गान्धी जी की तस्वीर ....बाबा छिमा! छिमा! दो घड़े पानी! दुहाई बापू! ...शीतल जल। ठंडक।"

हम सबके भीतर नराधम भी है और नरोत्तम भी। नराधम सिर उठाए तो शीतल जल डालने को नरोत्तम को आगे आना ही चाहिए। ...ऐं! ये तो मैं भी उपदेश देने लगा! अमाँ काहें फँसा देते हो?

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

जान में जान आई! हम पटलदास तो नहींयै हैं।
बस जी दामन बचा रहे इज्जत बची रहे। और क्या चाहिये? कि नहीं?

गिरिजेश राव said...

चचा की टिप्पणी देख कर परम संतोष हुआ।

ताऊ रामपुरिया said...

महज छद्म नारीवादी बन कर रह गये ऐसे पलटदासों को देख कभी कभी लगता है कि यदि फिर से तीसरी कसम बने तो हीरो के रूप में हीरामन नहीं बल्कि पलटदास को ही लिया जायगा

पंचम जी ये संदर्भ अपनी समझ नही आया और हम समझना भी नही चाह्ते क्युंकि हम जन्मजात महाराज धृतराष्ट्र हैं.

बस निवेदन सिर्फ़ इतना है कि आप जब भी ये फ़िल्म बनावो हम पलटदास का रोल करने को तैयार हूं बिल्कुल मुफ़्त में.:)

रामराम.

Rahul Singh said...

पिछली कुछ पोस्‍टों के बाद बढि़या पलटा खाया है इस पोस्‍ट ने, हम तो बस मारे गए गुलफाम, यह पढ़ कर.

प्रवीण पाण्डेय said...

बढ़िया विश्लेषण ठोंका है और ठोंका भी है। चलत मुसाफिर मोह लिओ रे...

mukti said...

पता नहीं ये किससे सम्बन्धित पोस्ट है. शायद मैं भी इस समय ब्लॉग जगत से दूर रहने के कारण सन्दर्भ सही नहीं समझ पा रही.
ये छद्म नारीवादी लोग कहाँ बसते हैं? मैं तो नारीवादी सिद्धांतों के विषय में लिखती हूँ, पर मुझे तो ऐसे छद्म नारीवादी नहीं दिखते. कृपा होगी जो आप मेल से मुझे स्पष्ट कर दें. जैसे आपको कविता नहीं समझ आती वैसे ही मुझे व्यंग्य समझने में थोड़ी मुश्किल होती है.
हाँ इतना तो मैं भी मानती हूँ कि आजकल नैतिकता पर भाषण देने वाली पोस्टों की बाढ़ आ गयी है.

Poorviya said...

likha kisi ko bhee ho post bilkul kasi huye hai.
ekdam bollywood style masala post.

दीपक बाबा said...

अरे बाप रे बाप, यहाँ तो बड़े बड़े टीप दाता अपना अपना स्पष्टीकरण देने आये हैं......

क्यों जी, पंचम जी, आज कोनों नया रजिस्टर खोले बैठे हैं का..

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी said...

पढ़ गया !
क्या कहें !
हम लौंडे - लफाड़ी भी कभी कभी लौंडियार्टिकी मोह में प्रोफाइली विक्षेप के शिकार हुए होंगे , बेशक , लेकिन यकीनन छद्म-नैतिकता की मांद में नहीं घुसे ! पर अनुभव-वृद्ध और पेशेवराना लोगों द्वारा ऐसा होना अफसोसनाक है !

का कुछ नया धमाका हुआ यहि बीचे ? और इस नाभिकीय ऊर्जा वाले पोखरण-परीक्षण में महिलायें भी पीछे कहाँ है :-)

शिवम् मिश्रा said...


बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है-पधारें

अभय तिवारी said...

मस्त आणि रोचक आहे!

देवेन्द्र पाण्डेय said...

संभावित फिल्म के लिए एक गीत लिखने का प्रयास कर रहा हूँ जो कुछ इस प्रकार होगा..

खुल्लम खुल्ला बोल रे पगले, खुल्लम खुल्ला बोल
मन की गाठें खोल रे पगले, मन की गाठें खेल

प्रवीण शाह said...

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"नैतिकता परिपालन कमेटी के संभवत: ये लोग सवैतनिक सदस्य हैं। जब देखो तब कोई न कोई आकर ब्लॉगजगत में नैतिकता का पाठ पढ़ाने लगता है। यह नैतिक है, वह अनैतिक है। महिलाओं पर ऐसा मत लिखो, पुरूषों पर वैसा मत लिखो, फलां लिखो, टलां लिखो। इतनी ज्यादा प्रेंम-सद्भाव, नैतिकता, समानता, विश्व बंधुत्व, भाईचारा ठेलने लगते हैं, कि लगता है जैसे किसी देवता के अवतारी पुरूष हैं। और नारीवादीता तो जैसे इनके हाथों में विष्णु भगवान की तरह सजने वाला फूल ही समझिये। जहां कहीं इन्हें लगता है कि कोई सुन नहीं रहा, तुरंत नैतिकता का शंख फूंकना शुरू कर देंगे। इधर उन्होंने शंख फूंका नहीं कि उसकी आवाज सुनकर तमाम उपलब्ध गण शंख ध्वनि के बाद एक साथ जय बोल देंगे। जय सुनते ही ऐसा प्रतीत होता है मानों सत्यनारायण कथा का एक अध्याय खत्म हुआ, अब चरणामृत की बेला नजदीक है।"

"मै जब ब्लॉगजगत में नजर दौड़ाता हूँ तो यहां इसी तरह के बौने पलटदासों को विचरण करते देखता हूँ। हर एक को फिक्र होती है कि कितना ज्यादा उंचा प्लेटफार्म लेकर बतियाये, नारीवादी बने कि ब्लॉगजगत के नैतिकतावादी कैमरे में खुद को फिट कर सके। वो भूल जाते हैं कि ब्लॉगजगत के कैमरे का विव्यू फाईंडर सिर्फ सामने वाले दृश्य को ही नहीं बल्कि आसपास के फैलाये उसके रायते को भी देखता है कि कहां किसने कब क्या स्टैंड लिया था, कहां किसने क्या टीपा था। महज छद्म नारीवादी बन कर रह गये ऐसे पलटदासों को देख कभी कभी लगता है कि यदि फिर से तीसरी कसम बने तो हीरो के रूप में हीरामन नहीं बल्कि पलटदास को ही लिया जायगा क्योंकि एक वही है जिसे कि चलत मुसाफिर गाने के दौरान हारमोनियम बजाते हुए हीरामन ने कहा था - जियो पलटदास जियो , आखिर ब्लॉगजगत में भी तो शांति, सद्भाव, पीस - हारमनी वाला हारमोनियाबाज चाहिये कि नहीं :)"


धन्य हो गुरूदेव, यह क्या लिख दिये हैं आप...

अब मुझ जैसा 'अनैतिक' पलटदास तो हो नहीं सकता...

और आप किसी भी एंगल से हीराबाई भी नहीं लगते...

फिर भी आपके चरण कहाँ हैं देव ?

.... ;)


...

बी एस पाबला said...

जहां कहीं इन्हें लगता है कि कोई सुन नहीं रहा, तुरंत नैतिकता का शंख फूंकना शुरू कर देंगे। इधर उन्होंने शंख फूंका नहीं कि उसकी आवाज सुनकर तमाम उपलब्ध गण शंख ध्वनि के बाद एक साथ जय बोल देंगे।

संदर्भ तो बखूबी समझ आ गया

छह इंचिया के बिना काम भी तो नहीं बनता इनका!
@#$%^&*

बी एस पाबला said...

इंदु 'नानी' को माँ-बहन एक करते नहीं, उठा कर पटकते भी देखा है मैंने :-)

उस बेचारे का विजय अभियान वहीं फुस्स हो गया था!!

ऐसिच्च है 'वो'

निर्मला कपिला said...

आज तो आप बहुत तल्ख से तेवर अपनाये हुये हैं\ मुझे तो आपकी बोध कथायें पडःाना अच्छा लगता है। इस सीरियस मेटर पर मै भला क्या कह सकती हूँ। बस शानदार पोस्ट है। शुभकामनायें।

सतीश पंचम said...

निर्मला जी,

बोधकथाएं ? सफ़ेद घर पर ?

कहीं और जगह वाली टिप्पणी शायद इस ब्लॉग पर मिस प्रिंट तो नहीं हो गई ?

:) :) :)

सतीश पंचम said...

पाबला जी,

मैं पोस्ट लिखते वक्त असमंजस में था कि इस छह इंच वाले प्रकरण को लिखूं या नहीं क्योंकि थोड़ा सा अश्लीलता का टच लिये हुए था यह प्रकरण।
बाद में सोचा कि इसके लिखे बिना पोस्ट अधूरी सी लगेगी :)

और जब रेणु जी ने अपने संस्मरण में यह जिक्र कर दिया है तो फिर कैसा संकोच। अत: लिख ही दिया :)

और अब आप ने भी एकदम मार्के की बात कही कि इसके बिना उन लोगों का काम भी नहीं बनता :)

MAYA said...

बहुत खरी खरी ...एव्म स्प्ष्टवादिता के साथ लिखा लेख...

राजेश उत्‍साही said...

कुछ कुछ संदर्भ समझ में आया है। बहुत जरूरी है इस तरह की पोस्‍ट। और समझाने के लिए आपने जो तीसरी कसम खिलाई है वह जबरदस्‍त है।

Arvind Mishra said...

थोडा देर से आया -मैं केवल इस प्रवृत्ति का मनोविज्ञान उकेरना चाहता हूँ -ऐसे पलट्दास दरअसल उसी भडुआ परम्परा के संवाहक हैं जो कोठेवालियों के साथ अपना पूरा जीवन गर्क कर डालते थे कि श्याद बाई जी कभी मेहरबान होकर उन्हें भी बैकुंठ्दान दे दें -मगर वे ईमानदार होते थे और बाई जी उनके परिवेश के लोगों में उनकी मंशा को लेकर कोई भ्रम किसी को नहीं होता था ....मगर ई ब्लागर पलटदासों पर अफ़सोस होता है कि वे दिखला कुछ रहे होते हैं -मतलब कामाफ्लेज -और मंशा कुछ और है ....अपनी नजदीकियां जता जता कर वे दुनिया वालों को यह सन्देश भी देते हैं कि भैया रे रास्ता देखिये मैं यहाँ का ज्यादा तलब्दार हूँ ,मेरा हक़ पहले है ......आपने भी क्या खूब कलाई उतारी है ब्लॉगर पलट दासों की ....टिप्पणियाँ भी क्या लहकदार आयी हैं -चाचा भतीजे के साथ ही कई और महा ब्लागीय विभूतियों की ..जिन्हें संदर्भ पता नहीं वे गैर जिम्मेदार लोग हैं ..या परले दर्जे के भोले ...या बेपरवाह ,नीरो टाईप के लोग ....मगर बिना बंसी के .....

बी एस पाबला said...

अरविन्द जी की टिप्पणी से शबाना आज़मी वाली 'मंडी' फिल्म का डुंगरूस याद आ गया। इस चरित्र को नसीरूद्दीन शाह जी ने जिया था।

क्या खूब बखान किया है अरविन्द जी ने भी :-)

DR. ANWER JAMAL said...

Nice post .
औरत की बदहाली और उसके तमाम कारणों को बयान करने के लिए एक टिप्पणी तो क्या, पूरा एक लेख भी नाकाफ़ी है। उसमें केवल सूक्ष्म संकेत ही आ पाते हैं। ये दोनों टिप्पणियां भी समस्या के दो अलग कोण पाठक के सामने रखती हैं।
मैं बहन रेखा जी की टिप्पणी से सहमत हूं और मुझे उम्मीद है वे भी मेरे लेख की भावना और सुझाव से सहमत होंगी और उनके जैसी मेरी दूसरी बहनें भी।
औरत सरापा मुहब्बत है। वह सबको मुहब्बत देती है और बदले में भी फ़क़त वही चाहती है जो कि वह देती है। क्या मर्द औरत को वह तक भी लौटाने में असमर्थ है जो कि वह औरत से हमेशा पाता आया है और भरपूर पाता आया है ?

Abhishek said...

क्वाचिद्न्यतोअपी पर पाबला जी के दिए लिंक से यहाँ तक पहुंचा. ब्लॉग जगत की एक प्रवृत्ति को बखूबी उकेरा है आपने.

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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