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Sunday, December 5, 2010

आम का पेड़..... बदला सा क्षितिज.....और हवा की काट........सतीश पंचम

        इस बार जब गाँव गया था तब अचानक ही घर के उत्तर दिशा की स्काय लाईन बदली बदली सी लगी । क्षितिज कुछ अलग सा लग रहा था। छत पर जाकर हाथेलियों की ओट से नज़र दौड़ाई तो पता चला कि बड़का आम का पेड़ कट कर जमीन पर गिरा है। उसे काट दिया गया है।
  
     मन में एक टीस सी उठी। यह वही पेड़ था जिस पर मैंने बचपन में जमकर चेका (पत्थर) चलाया था, जमकर अरहर और बेहया के बने सोटों को आजमाया था। ज्यों ही अरहर की लकड़ी या बेहया के तने वाले सोटों को आम के गुच्छों पर घुमाकर चलाता, हवा के काटे जाने की एक 'वफ्फ' वाली ध्वनि होती और सोंटा सीधे आम के झोंपे पर जा लगता। 

 नतीजा.....

   ढेर सारे आमों का जमीन पर भद् भद् की ध्वनि के साथ गिर पड़ना। 

    लेकिन यह जरूरी नहीं कि हर बार निशाना लगे ही। कभी कभी फेंकी गई लकड़ी जाकर टहनीयों में फंस भी जाती। ऐसे में एक दो क्षण इंतजार करता कि तनिक हवा चले और उसके चलने से टहनीयों में फंसी लकड़ी नीचे आ जाय। लेकिन फिर भी जब लकड़ी नीचे न आती तो अपने मुँह से ही खुट्ट की आवाज निकालता,.... मानों मैं खुट्ट कहूंगा और आम का पेड़ मेरे फेंके गये डंडे को गिरा ही देगा। लेकिन फिर भी लकड़ी को न गिरते देख फिर वहां आसपास पड़े छोटे छोटे पत्थर, ढेले या खपड़ैलों के केसरीया टुकड़ों को उस फंसी हुई लकड़ी की ओर उछालता। किंतु,  नतीजा सिफर। 

  थक हार कर जब मैं आम के इस पेड़ को पीठ दिखा अपने घर की ओर वापस जाने को होता कि  अचानक ही पत्तों के बीच से सरसराने की आवाज आती और मुड़ कर देखते साथ ही टहनीयों में फंसी लकड़ी जमीन पर आ गिरती.....भद् ।  ऐसा लगता जैसे कि आम का पेड़ मुझे परेशान करने की नीयत से ही मेरी फेंकी गई लकड़ी को अपने कब्जे में लिये हुए था। हवा भी शायद आम के पेड़ की इस शरारत में शामिल रहती ।    

गन्ने के खेतों की ओट... समृतियों में शेष वह 'आम का पेड़'     
       पूछताछ करने पर घर के लोगों से पता चला कि उस पेड़ के कई मालिक थे। जिस किसी ने वह पेड़ लगाया था वह रहा नहीं, लेकिन उसके परिवार की संख्या पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ती चली गई। घरेलू झगड़ों और तमाम बांट बखरा के बाद अब वो लोग इस आम के पेड़ को कटवा रहे हैं कि जो कुछ मिले बांट लो, जमीन जोत लो। 

 खिन्न मना मैं मन ही मन प्रश्न कर बैठा - आम का पेड़ कटवाना जरूरी था क्या ? 

 अगली सुबह जब कैमरा लिये आसपास फोटो शूट कर रहा था तब गन्ने के खेतों की ओट से वह कटा हुआ आम का पेड़ और कुछ लोग दिखे। एक शख्स पेड़ के तने के उपर खड़ा था। उस ओर जाने का मन नहीं हो रहा था। मन में तनिक भकसावन सा प्रतीत हुआ। तभी कुछ बच्चे खेतों से गन्ने तोड़ते दिखे और मैं उनकी तस्वीरें लेने लगा। 

खेतों से गन्ना तोड़ते बच्चे
 बात ही बात में बच्चे उस कटे पेड़ की ओर चल पड़े और मैं अनमने ढंग से उस ओर बढ़ चला। पास जाकर देखने पर अजीब सा दृश्य दिखा। ऐसा लगा जैसे कोई हाथी के अंगों को यत्र तत्र छिनगाये हुए है। आम की पत्तीयां सूख कर आसपास गंजी हुई हैं।  उन आम्र पल्लवों के सूखेपन से अंदाजा लगाया कि कई दिनों से यह आम का पेड़ काटा जा रहा होगा। एक शख्स से पूछा तो उसने हाथ के इशारे से बताया कि आज पंद्रह दिन हो गया है काटते छिनगाते। अब जाकर कुछ सपरा है। वरना अभी तक तो सिर्फ गिराकर टहनीयां ही छिनगा रहे थे। 
आम के पेड़ का शेष बचा हुआ तन

 मन ही मन अंदाजा लगाया कि कितना तो विशाल हो गया होगा यह मेरा बाल्य काल का स्मृति वृक्ष ..... कि उसे काटने में ही पंद्रह दिन लग गये। सूखी पत्तीयां, सूखी टहनीयां, और आसपास का भकसावन माहौल मुझे वहां और रूकने नहीं दे रहा था। 

    तभी मैंने प्रश्न किया एक शख्स से कि यार इसको कटने में पंद्रह दिन लग गये.....तब तो बहुत मजबूत होगा ये तो।  अभी तो कटने लायक नहीं था यह पेड। 

     तब उस शख्स ने तुरंत तने के भीतर की ओर इशारा करते बताया कि अंदर देवका (दीमक) लग गया था। खोखला हो गया था। पिछले कुछ समय से बेहद कम फल दे रहा था तो मालिक लोग ने कटवाना ही उचित समझा।
ट्रॉली लगाकर लकड़ीयां बटोरी गईं थीं

       बात आगे चली तो वहीं पर मौजूद एक शख्स ने बताया कि देवका (दीमक) लगना स्वाभाविक है।   जमीन के भीतर अब उतनी नमी और पानी नहीं रह गया है जितना कि पहले था। आसपास देखिये, नजर दौड़ाइये तो तमाम पंम्पिंग सेट लग गये हैं पिछले तीस-पैंतीस सालों में। जमीन का पानी खींच खांचकर खत्म कर दिया गया है। ऐसे में पेड़ों में देवका लगना लाजिमी है।  नये पेड़ जो लगे हैं वो भी पहले की तरह मोटाते नहीं हैं। उनकी बढ़त सिर्फ नीचे जड़ की तरफ होती है जो कि पानी की तलाश में भीतर और भीतर फैलते चले जाते हैं। 
धराशायी हाथी जैसे अंग प्रत्यंग 

 मैने उस शख्स की तरफ ध्यान से देखा। वह लकड़ी का व्यापारी काफी अनुभवी जान पड़ा।  पास ही जमीन पर बने एक विशेष आकार के गड्ढों को देखा तो उस लकड़ी के व्यापारी ने बताया कि यहां ट्राली लगने के लिये गढ़ा किया गया है ताकि लकड़ीयां लादने में आसानी हो। आखिर एक ही ट्रॉली तो नहीं ले जाना था.....कई चक्कर लगे इस पेड़ को हटवाने में।

   कुछ पल और वहां रूक कर, इधर उधर  देखते ताकते मैं घर की ओर वापस चल पड़ा। 

 पर अफसोस......

 अबकी  पत्तीयों की सरसराहट के साथ किसी टहनी में फंसी लकड़ी के जमीन पर गिरने की आवाज नहीं आई।


  शायद पेड़ के साथ ही वहां बहने वाली हवा भी कट चुकी थी......। 

 - सतीश पंचम

स्थान -  मुंबई

समय -  आठ.... तिरपन   

( ग्राम्य सीरीज़ चालू आहे )

19 comments:

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

यह तो पर्यावरणीय महायुद्ध है और आम का तना यूं लग रहा है जैसे धराशाई हुआ हो कोई महा-योद्धा! :(

Arvind Mishra said...

दारुण कथा ,ऐसे ही जब करीब २५ साल पहले मैं यूनिवर्सिटी इलाहाबाद से एक दिन घर चला तो लगा की रास्ता भटक गया हूँ ,एक पूरी की पूरी बड़ी बाग़ ही गायब थी ......आप सोच सकते हैं मेरे ऊपर क्या गुज़री होगी .वह बाग़ दलालों और व्यापारियों की साठ गाँठ,और फल कम होने, दीमक लगे होने जैसे समान अफवाहों और पैसों की लालच में बेंच दी गयी थी .....आज तक वहां उजाड़ है ,जबकि उस स्थान पर नयी बाग़ लगाने का प्रस्ताव था ....दुःख है यही सब अज भी चल रहा है ..लकड़ी बेहद महंगी होती जा रही है ..उस पेड़ का ही ५० से ६० हजार की डील रही होगी ,वन विभाग ,पोलोस विभाग का परसेंटेज अलग ,दलाली के पांच दस हजार भी -ढोने धुलाने का खर्चा अलग -यह एक कुचक्र है !

प्रवीण पाण्डेय said...

पता नहीं कितने वृहद आमों में दिमक लग रही है यो लगायी जा रही है। दीमक तो समाज को भी लग चुकी है, कब काटा जायेगा यह।
दुख बढ़ गया, रविवार का।

दीपक बाबा said...

ऐसे महावृक्ष के गिरने पर शोक गीत गाने के लिए अब पन्छी भी नहीं आते ...... दूसरे पेड़ में ठिकाना ढूंढते है.

गिरिजेश राव said...

अमाँ सोटा नहीं झड़हा या झटहा कहते हैं। एक टाइप के इंसान भी होते हैं जिन्हें झटहा कहते हैं।

@ थक हार कर जब मैं आम के इस पेड़ को पीठ दिखा अपने घर की ओर वापस जाने को होता कि अचानक ही पत्तों के बीच से सरसराने की आवाज आती और मुड़ कर देखते साथ ही टहनीयों में फंसी लकड़ी जमीन पर आ गिरती.....भद् । ऐसा लगता जैसे कि आम का पेड़ मुझे परेशान करने की नीयत से ही मेरी फेंकी गई लकड़ी को अपने कब्जे में लिये हुए था। हवा भी शायद आम के पेड़ की इस शरारत में शामिल रहती ।

- छा गए गुरु!
भकसावन - शब्द रत्न की व्याख्या अपेक्षित है।
पत्तीयों - पत्तियों

@ अबकी पत्तीयों की सरसराहट के साथ किसी टहनी में फंसी लकड़ी के जमीन पर गिरने की आवाज नहीं आई।
शायद पेड़ के साथ ही वहां बहने वाली हवा भी कट चुकी थी......।

निर्वेद काव्य सा। के पी सक्सेना के एक व्यंग्य का अन्तिम वाक्य याद आ गया।
"...फिर यह सोच कर तेल की शीशी किनारे टरका दी कि डूबता हुआ सूरज एक लम्बी परछाई के सिवा दे ही क्या सकता है?"

'अन्हरी बारी', ऐसा बागीचा जिसमें हरदम अन्धेरा रहता हो, की जाने कितनी स्मृतियाँ हैं बीड़ू! सोचता हूँ तो आँखें नम हो जाती हैं...कभी लिखूँगा। जाने क्या क्या याद दिला गए।
झड़हे का 'वफ्फ' - उफ्फ!
बचपन कहाँ चला गया दोस्त?

ajit gupta said...

पेड़ बेजुबान हैं इसलिए मनुष्‍य अपनी मर्जी से जब चाहे लगा ले और जब चाहे काट दे। बहुत मार्मिक पोस्‍ट है आपकी।

Lalit said...

हमरो गाँव में हाई स्कूलिया भीरी बड़का गो आम के बगईचा रहे. बाबा त कहत रहीं कि शाहाबाद जिला में सबसे बड़ फील्ड रहे कुदरा के फिर ब्लाक बनल त हई बनल त हऊ बनल. तब्बो 95-97 तक अमवा के बगईचवा बांचल रहे, बाकिर ..... आज त उंहवा एगो बड़का गो मोहल्ला बस गईल बा. कुल्ह पेड़ काट काट के हमनी के अइसन अति कर देले बानी जा कि एकर कौनो अन्ते नइखे बुझात. हमरो आम के पेड़ बंटवारे में कटा गईल. बाबा के लगावल पेड़, बाबे के जिनगी में कटा गईल आ अइया ओह दिन खूब रोवले रही. का जाने ई पेड़वा खातिर कोई रोवल होई कि ना. बड़ा ही दुखद स्थिति हो गईल बा. का जाने एकरा से कब निजात मिली. हई त स्थिति बा बिहार के:-
Total area of land - 94.16lakh hectare
Useful land : Hectare %
Agriculture 7946435 84.9
Forest 616446 6.58
Waste land 436503 4.66
(Source:http://www.scribd.com/doc/32975989/PPT-on-Marketing-Environment-in-Bihar)
जहवाँ फोरेस्ट लैंड 20-22% होखे के चाही उंहवा ई साढ़े छः प्रतिशत बा. भगवाने मालिक बाडन.....

rashmi ravija said...

गिरिजेश जी ने आपकी मुश्किल आसान कर दी ना..'इसे सोंटा नहीं..झटहा' कहते हैं....उन्ही से पूछना था ना..सही शब्द.
आम के पेड़ की ये दुर्गति देख तो सच मन भर आया....यही स्थिति होती जा रही है....कोई ना कोई बहाना बना..पेड़ कटते जा रहें हैं.

मैने बिहार में नीम के पेड़ का कटना और मेरी सहेली ने केरल में कटहल के पेड़ का कटना देख(सुन )बिलकुल आप जैसा ही महसूस किया था...संवेदनाएं तो समान ही होती हैं.

सतीश पंचम said...

@ बाबा के लगावल पेड़, बाबे के जिनगी में कटा गईल आ अइया ओह दिन खूब रोवले रही. का जाने ई पेड़वा खातिर कोई रोवल होई कि ना.

ललित जी,

मैं लिखना तो नहीं चाहता था लेकिन आप ने लिखने पर मजबूर कर दिया। दरअसल इस आम के पेड़ के साथ एक और आम का पेड़ था जिसे कुछ साल पहले काटा गया था। ठीक इसी झगड़े और बांट बखरा के चलते।

उस पहले वाले पेड़ को काटने के दौरान ही उस परिवार के एक सदस्य की दुर्घटना में मौत हो गई थी और लोगों ने आम के पेड़ पर कुल्हाडी चलाना असगुन माना था। पंडित जी का कहना था कि जिस आम के पल्लव को पूजा पाठ के कलश में इस्तेमाल करते हैं होम करते बखत घी के इस्तेमाल हेतु आम के पत्तों का इस्तेमाल करते हैं उसी आम के पेड़ पर कुल्हाडी चलाना घातक है, पाप है।

लेकिन विडंबना देखिये कि उस पहले वाले आम के पेड के कटने के कुछ साल बाद इस आम के पेड़ को भी काटा गया।

और विश्वास करेंगे....एक और सदस्य की मौत बिमारी के चलते हो गई। मैं तब गाँव में ही था पिछले महीने। पंडित जी जब कह रहे थे तब मन ही मन ढेर सारे विचार दौड़ रहे थे।

इस बात को पोस्ट में लिखने से मैं बच रहा था क्योंकि एक तरह का अंधविश्वास या कहें कि बचकानी सी बात प्रतीत हो रही थी। लेकिन दोनो आम के पेड़ो के कटने औऱ उस परिवार के दो सदस्यों की मौत से मैं कुछ कुछ असमंजस वाली मानसिकता में जा पहुंचा हूँ कि विश्वास सच है या विज्ञान ?

Lalit said...

@ भकसावन - शब्द रत्न की व्याख्या अपेक्षित है।

भकसावन माने उजाड़, उदास मैदान जहां जाने में भूतहा डर लगता हो. मनसायन का विलोमार्थक शब्द, बाकी अगर कुछ छूट गया हो तो पंचम जी तो हइये हैं. :)

सतीश पंचम said...

और हां ललित जी,

जिस तरह से आपने बताया कि आपके यहां भी कोई रोया था तो मुझे लग रहा है कि जरूर उस घर का सदस्य भी उस वक्त रोया होगा।

प्रवीण शाह said...

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बहुत दुखी कर गई आपकी यह पोस्ट, और सोचने को मजबूर भी... आपकी कलम को सलाम...



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GirishMukul said...

बहुत उम्दा विवरण

Lalit said...

क्या कहें पंचम जी,

बाबा का पेड़ लगाने का प्रमुख कारण था कि शास्त्रानुसार एक वृक्ष लगाना १० पुत्र उत्पन्न करने के बराबर होता है और चूँकि मेरे पिताजी एकलौते थे और साथ ही, बड़का बाबा, जिनके की ३ पुत्र थे, कहा करते थे कि 'एक आँख के आँख ना कहे के आ एक बेटा के बेटा ना कहे के'. जब तक वह वृक्ष रहा, बाबा-अइया हमेशा मानते थे कि हमारे ११ बेटे हैं. जहां तक मैं समझता हूँ, अइया का रोना महज एक वृक्ष के लिए नहीं था वरन अपने १० बेटों के लिए था.... जिन्हें कभी उन्होंने देखा तक नहीं था कारण कि हमारे घर की स्त्रियाँ खेत-खरिहान नहीं जातीं है, आज तक. कहाँ चले गए वे संस्कार....... हमने भी वृक्ष लगवाएं हैं....लेकिन हिसाब लगा कर कि २० साल में एक टीक का पेड़ तैयार हो जाता है और इतने दाम में बिकता है तो अगर हम १० कट्ठा खेत में टीक लगवाते हैं तो २० साल में हमें इतना मिलेगा वगैरह वगैरह. प्रकृति से आत्मीयता नहीं रही आज किसी को. मेरा गाँव एक declaired wildlife sanctuary के अन्दर आता है यह मुझे गाँव को देखने या गाँव में रहने से नहीं पता चला बल्कि पता चला map देखने के बाद. (kaimoor wildlife sanctuary ). २०-२२ साल पहले जब मैं १०-१२ साल का था.....क्या मज़ा आता था घूमने में और आज.... वैसे तो गाँव गए ज़माना हो जाता है ..... छोडिये... अपनी ही मातृभूमि है... क्या कहें.... कुछ ideas और plans हैं मन में... माँ का आशीर्वाद रहा तो कर के ही दिखाऊंगा.

पंचम जी, धार्मिकता और विश्वास में अन्योंयाश्र्य सम्बन्ध है. यह ना तो अंधविश्वास है और ना ही बचकानी सी बात. वृक्षों की महत्ता को इससे बढ़ के और कैसे इंगित किया जा सकता है कि उनकी तुलना पुत्रों से की गयी है?

मुझे पूर्ण विश्वास है कि कोई ना कोई जरूर रोया होगा उस परिवार में, हम अभी उतने पत्थर-दिल तो नहीं ही हुए हैं और यही विश्वास मुझे एक आशा देती है कि ' ALL IS NOT LOST '.

और एक बात और है, पता नहीं कितने लोग मेरी बात से सहमत होंगे, हर किसी के हाथ का लगाया पेड़ जीता भी नहीं है. हमारे बड़का बाबु जी, जो कि निर्वंश मरे और जिनकी प्रमुख भूमिका थी उस आम के पेड़ को कटवाने में, बहुत कोशिश किये घर के आँगन में और खरिहान में पेड़ लगाने की, नीम, आम, नीम्बू से ले कर पीपल तक.... कोई नहीं जिया और वहीँ उल्टे हाँथ, पगलवा बाबा(सुरेन्द्र बाबा) द्वारा लगाया हुआ इमली का पेड़ बिना किसी सेवा सुश्रुषा के आज भी खड़ा है.....

बहुत सारी बातें याद दिला दिया आपने पंचम जी आज तो, और गाँव जाने की कोई सूरत भी नहीं दिख रही है कि मन माने बाकिर ई मनवा के त मनावहिं के ना पड़ी....

धन्यवाद

सतीश पंचम said...

ललित जी,

अपने इतने सारे आत्मीय अनुभव बांटने के लिये धन्यवाद।

वैसे मेरे गांव में भी अब लोग सागौन के वृक्ष मेंड़, आदि पर व्यापारिक लाभ हेतु लगाना शुरू कर दिये हैं। इस तरह के व्यापार में प्रथम दृश्टया कोई बुराई नहीं दिखती, लेकिन इससे खेत खलिहान वाले इलाके में धरती पर लंबे तौर पर पड़ने वाला असर थोड़ी चिंता का विषय जरूर है। अभी धरती के भीतर के जलीय क्षमता के बारे में ज्यादा कुछ नहीं पता लग पा रहा है संभवत कुछ दशकों बाद इसका असर दिखे और हम लोग भी उस व्यापारी की तरह अपने पेड़ पौधों को देखकर कहें कि- क्या बताउं, देवका लग गया था ।

Rahul Singh said...

मन भी तो इन्‍हीं पेड़-पंछियों से हरियाता है, उड़ान भरता है. ऐसे उपजे सूनेपन से अपनी पहचान ही कटे पेड़ सी भटकने लगती है.

देवेन्द्र पाण्डेय said...

मार्मिक कथा शैली और पर्यावरण के प्रति सजग चिंतन के कारण यह संस्मरण संग्रहणीय बन पड़ा है। रश्मि जी की पसंद लाज़वाब है।

अनुपमा पाठक said...

'शायद पेड़ के साथ ही वहां बहने वाली हवा भी कट चुकी थी......।'
मार्मिक!

Shekhar Suman said...

आपकी ये पोस्ट आज के ब्लॉग बुलेटिन में शामिल की गयी है.... धन्यवाद.... एक गणित के खिलाड़ी के साथ आज की बुलेटिन....

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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