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Tuesday, November 30, 2010

सरपतों के बीच दस मिनट........सतीश पंचम

     न जाने क्यों हमारे देसी फिल्मकार विदेशी लोकेशन की ललक में बेहिसाब पैसे खर्च करते हुए मारे मारे फिरते हैं, विदेशी लोकेशनों को फिल्माने हेतु लालायित से रहते हैं। हजार तरह की तकलीफें, हिरो - हिरोइनों के नखरे उठाते हुए  कभी हांगकांग तो कभी होनोलुलु जाते रहते हैं। लेकिन कभी अपने आसपास भी देखें तो हमारे देश में ही न जाने कितनी ऐसी जगहें मिल जाएंगी  जो कि विदेशी लोकेशनों के टक्कर की हैं।

       अभी जब गाँव गया था तो  घर से करीब सौ डेढ़ सौ मीटर की दूरी पर स्थित एक सूनसान इलाके  की ओर कैमरा उठाये चल पड़ा। ठंडे ठंडे माहौल में, खूबसूरत इस इलाके में जहां तक देखो सरपत ही सरपत थे। सरपतों में लगी बालियां सूर्य की बनती बिगड़ती रोशनी में अपना रंग अदल बदल रही थीं। कभी एकदम सुनहरी हो जातीं तो कभी चाँदी के रंग की तो कभी एकदम से तांबे सरीखी। मैं कुछ समय तो उस माहौल को देखता ही रह गया फिर तुरत फुरत कैमरे से तस्वीरें खींच डाली। यहां लगी सभी तस्वीरें मात्र दस मिनट के भीतर ही भीतर खिंची गई हैं।  सरपतों के बदलते रंगों से शायद आप अंदाजा लगा सकें कि वहां माहौल कितना रूमानी था ।

 रंगरेज बहूत मूड़ में था शायद........



 आते हुए बादल .......।

चांदी वाली बालियां...........

ये नज़ारे.....ईश्वरीय हैं प्यारे..........

लहकती चाँदी.....बहकती हवाएं......

आसमान छूने की जिद्द...............


उचकती  हरियाली
   इन सरपतों के बीच रहते करीब दस मिनट हुए होंगे कि तभी मुझे बुलावा आ गया घर से कि कोई मेहमान आए हैं.............मैं ठहरा ऐसा हतभागी कि, ढंग से प्रकृति का रसपान भी नहीं कर पाया  :(

 - सतीश पंचम

स्थान - वही, जहां पर 'सरपत' फिल्म बनाने वाली शख्सियत रहती है :)

समय - वही, जब मैं कैमरा ऑन किये हुए, आस्तीनों को खोलते हुए, सरपतों की तेज धार से बचते बचाते गुजर रहा था कि तभी झाड़ियों की ओट से एक खरगोश निकला और तेजी से दूसरे सरपत की ओट में जाकर ओझल हो गया..........आस्तीनें अब भी अधखुली थीं।

( ग्राम्य सीरीज़ चालू आहे ) 





16 comments:

गिरिजेश राव said...

सबेरे सबेरे मस्त कर दिए। सारे फोटो एक से बढ़ कर एक।
कविता ड्यू हुई।
इतने कम समय में इतने रंग देख कर मुझे अपनी वे कविताएँ याद आ गई जिनमें सुबह, दुपहर, साँझ, रात के चित्र हैं। लगा कि छोटे समयांतराल पर तो लिखा ही नहीं!
डीह के सरपतों और नहर की जाने कितनीं स्मृतियाँ हैं...पिताजी के साथ खेतवाही करते हुए... धन्यवाद ।

केवल राम said...

बहुत सुंदर ...मस्त कर दिया इन सुंदर से चित्रों ने ...शुक्रिया
चलते -चलते पर आपका स्वागत है

Sunil Kumar said...

बहुत सुंदर , सुंदर चित्र

वाणी गीत said...

सुन्दर चित्र !

Rahul Singh said...

हतभागी तो वो मेहमान हैं, जो आपके घर पर अटक गए, सरपती समां देखने आप तक नहीं पहुंचे.

ajit gupta said...

यह सरपत क्‍या होते हैं? आपका प्रश्‍न एकदम जायज है। भारत में प्राकृतिक सुन्‍दरता इतनी ज्‍यादा है कि दुनिया का कोई देश इसके आगे टिक नहीं सकता। लेकिन फिल्‍म वाले विदेश इसलिए भागते हैं कि वहाँ जाकर एकाध महिने में पूरी फिल्‍म कर आते हैं यहाँ तो भीड़ से निबटे या हीरो-हिरोइन के नखरों से। यदि भारत सरकार पर्यटन की ओर ध्‍यान दें तो आज भारत विश्‍व का नम्‍बर एक देश बन सकता है। भारत में धार्मिक पर्यटन है और इसका आर्थिक लाभ उस क्षेत्र के विकास में नहीं हो रहा है।

डा० अमर कुमार said...

सरपतों की अच्छी याद दिलायी,
मैंनें अपना निवास शहर से लगभग 10 किलोमीटर दूर नहर के किनारे बना रखा है ।
सरपतों के दीदार रोज ही होते हैं, एक मलाल सालता है कि हमारे कृषि-वैज्ञानिक भूमि-क्षरण रोकने में इसकी उपयोगिता को ठीक तरह से नहीं आँक पायें हैं । एक कच्चे माल के रूप में सरपत गरीब-गुरबों को रोजगार के इतने अवसर देता है, कि इसका सही तरीके से व्यवस्थित इस्तेमाल स्वावलँबी कुटीर उपक्रम का बेहतर स्रोत बन सकता है । बरसात आने के पहले ग़रीबों को छप्पर देने का आसरा है, सरपत ! सोर्योदय और सूर्यास्त के निकट सरपत जी इतने फोटोजेनिक हो जाय्ते हैं, कि बरबस ही हाथ कैमरे को टटोलने लगते हैं । जैसलमेर क्षेत्र में इनकी छटा जीवन के होने का आश्वासन देती हुई सी प्रतीत होती है ।
तिवारी महाराज से सरपत फिलिम मँगवाने का जुगाड़ अब तक नहीं मिला ।

Arvind Mohan said...

nice blog...intelligent posts buddy
have a view of my blog when free.. http://www.arvrocks.blogspot.com .. do leave me some comment / guide if can.. if interested can follow my blog...

sanjay said...

AISI SOUNDHI CHATA TO APKE SAUJANYA SE HI SAMBHAW HAI...........

MAST SARPAT.....


PRANAM.

शोभना चौरे said...

हमेशा मुझे भी यही लगता है की हमारे देश में फिम वाले शूटिग क्यों नहीं करते ?
बहुत ही सुन्दर चित्र |
ऐसे ही हमारे इंदौर के पास नर्मदा नदी के तट पर मंडलेश्वर ,महेश्वर नगर बसे है \घाट तो बहुत ही सुन्दर है साथ ही माँ नर्मदा का सोंदर्य भी देखते ही बनता है |

प्रवीण पाण्डेय said...

ख्यातिप्राप्त छायाकार बनने में बस अब कुछ और चित्र बाकी हैं, इसी तरह के।

वन्दना said...

सुन्दर चित्र !

Arvind Mishra said...

बरबस ही अभय तिवारी की सरपत याद हो आयी ..सरपट पोस्ट !

rashmi ravija said...

कमाल की तस्वीरें हैं....आप तो दिन दूनी रात चौगुनी पता नहीं कौन कौन से पायदान तय करते जा रहें हैं...बधाई हो.
एकदम सुबह साकार हो गयी आँखों के सामने

gyanduttpandey said...

न जाने क्यों हमारे देसी फिल्मकार विदेशी लोकेशन की ललक में बेहिसाब पैसे खर्च करते हुए मारे मारे फिरते हैं, विदेशी लोकेशनों को फिल्माने हेतु लालायित से रहते हैं।

दुनियाँ घूम आये। पर अपने बगीचे के पौधे के पत्ते से टपकती ओस का आनन्द जो न जानता हो, वह आदमी कोई सौन्दर्यबोध नहीं रखता!

सतीश पंचम said...

@ अपने बगीचे के पौधे के पत्ते से टपकती ओस का आनन्द जो न जानता हो, वह आदमी कोई सौन्दर्यबोध नहीं रखता!

वाह...क्या बात कही ज्ञानजी, आपकी इस बात से तो पोस्ट को एक तरह की परिपूर्णता ही मिल गई है।

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