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Sunday, November 28, 2010

लाईव यात्रा पोस्ट ...... इति 'इंडियन रेल्वे शौचालय गाथा' ........सतीश पंचम

     लौटानी यात्रा के दौरान सेकंड क्लास के स्लीपर डब्बे में सबसे उपरी सीट पर बैठे बैठे यह पोस्ट जब लिख रहा हूँ तो सबसे पहले मेरे जेहन में जो चीज आ रही है है यहां स्लीपर कोच का शौचालय। अंदर जाते ही एक से एक चित्रकारी देखने को मिली है। कुछ तो एम एफ हुसैन से भी आगे के हैं। लगता है जैसे कि जुलोजी, बॉटनी के साथ ही साथ समाजशास्त्र भी उकेरा गया है। ज्यादातर साईंस के डायसेक्शनल अंदाज में।


   चित्र बना कर उसके विभिन्न भागों को एक तीर वाली लाईन के जरिये नामांकित भी किया गया है। फलां अंग....टलां अंग। मानो यदि नामांकित न किया जाता तो जनता को पता ही नहीं चलता कि शरीर के किस अंग को क्या कहा जाता है।

    अपनी बोगी के शौचालय के खाली न होने पर जब दूसरी बोगी के शौचालय में पहुंचा तो वहां खजुराहो गुलज़ार था। मानव रेखाचित्रों के जरिये एक विभिन्न कामसूत्रीय अंदाज में चित्र उकेरा गया था। उस पर भी किसी बंदे ने नामांकन कर रखा था।

   इन सब चीजों को देखकर मन में सवाल उठता है कि वह कौन लोग होते हैं जो इस तरह की भयंकर कलाकारी करते हैं। बिना टिकट वाले, टिकट वाले याकि कोई और। वैसे एक जगह मैने पढ़ा है कि मुगल बादशाह जहाँगीर ने कहा था कि वह एक ही चित्र में ढेर सारे चित्रकारों के द्वारा चलाई गई कूंचियो की रेखाओं याकि उनके बनाये चित्रों की भाव भंगिमा देखकर बता सकता था कि फलां अंग किस चित्रकार ने बनाया है और फलां अंग किस चित्रकार ने। मन में अब यही आ रहा है कि मुगल बादशाह जहाँगीर को भारतीय रेल्वे का सफर कराऊं और पूछूँ कि बताओ यह इतनी सारी कलाकृतियां जो भारतीय रेल्वे के शौचालयों में बिखरी पड़ी हैं वह किसकी है। कौन है वह चित्रकार जो अपना समय इस तरह के नग्न और चुलबुले टाइप के चित्रों को बनाने के बावजूद अपने आप को गुमनाम रखना चाहता है।

     वैसे मन में तो यह भी आ रहा है कि भारतीय रेल्वे को इन कलाकृतियों को शौचालय की दीवारों सहित उखाड़ कर एक जगह प्रदर्शित करना चाहिए। इससे न सिर्फ रेल्वे को मुनाफा होगा बल्कि देश विदेश के लोग जानने लगेंगे कि भारत को अभी तक मुगलों, हुणों, यवनों आदि ने पूरी तरह लूट कर खाली नहीं किया है बल्कि अब भी समूचे भारतवर्ष में यत्र तत्र एक से एक उम्दा कलाकार फैले हुए हैं जो अपनी मूक कला साधना में लीन हैं। उन्हें न किसी पुरस्कार की चाह है न किसी महल अटारीयों की ललक। वह केवल अपनी शौचालय, मुत्रालय टाइप की कलाकारी में जी जान से जुटे रहते हैं इतने कि वे भूल जात हैं कि वह शौचालय या मुत्रालय किस लिये आये थे। भला इस तरह से भूख प्यास और तमाम शारिरिक जरूरतों को भूलकर कलाकारी करने वाला शख़्स कैसे साधारण हो सकता है।

   मन में आ रहा है कि इन गुमनाम कलाकारों की कलाकारी को उनकी गुमनामियत वाले अंदाज में ही सम्मानित किया जाय। पुरस्कार के तौर पर उन्हीं के बनाये चित्रों के बगल में रेल्वे के सूचना पट्ट की तर्ज पर प्रशस्ति पत्र वाला पत्रा ठोंक ठाक कर जताया जाय कि भारत की जनता इन गुमनाम कलाकारों की कलाकारी का कितना सम्मान करती है :)

सतीश पंचम

स्थान –  ट्रेन की सबसे उपरी बर्थ।

समय – वही, जब एम एफ हुसैन भारतीय रेल के स्लीपर कोच के शौचालय में पहुँचें और वहां की कलाकारींया देख स्वत: ही बोल पड़ें - पच्चास लाख एक......पच्चास लाख दो......पच्चास लाख तीन...... एण्ड …... सोल्ड।  

( Train नासिक पहुंच चुकी है संभवत: दुपहरीया मुंबई दर्शन हो ही जाय :)

21 comments:

निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...

यही कारण है कि अब ट्रेन के टॉयलेट में भीतर लगाया जानेवाला सनमाइका प्लेन व्हाईट नहीं होता. उसमें बारीक रैंडम डिजाइंस या चैक्स बने होते हैं.

Poorviya said...

bahut baraki se sab kuch dekhete hai.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

मुझे तो इनकी गंदगी हमेशा से परेशान करती आई है.. साक्षात नरक...

अजय कुमार झा said...

हा हा हा हा हा आज आपने ...एक गुमनाम चित्रकार सह कलाकार की पूरी कौम को ..लैट्रीन( उहं , हम भी आपकी वाली बर्थ से लिख रहे हैं, ऊपर से ही ) से मैनस्ट्रीम तक का युगों लंबा सफ़र खत्म कर दिया और ये एक ऐसा सम्मान है उनके लिए कि अब वे ...सोच रहे होंगे ..जैसा कि निशांत भाई ने बताया कि ...फ़िर इन जैसे तकनीकी दुश्मनों से कला को कैसे आगे बचाया और बढाया जा सकेगा ।

निर्मला कपिला said...

भारतीय रेल्वे को इन कलाकृतियों को शौचालय की दीवारों सहित उखाड़ कर एक जगह प्रदर्शित करना चाहिए।
हा हा हा चलिये एक मुहिम चलाते हैं इसके लिये। शुभकामनायें।

प्रवीण पाण्डेय said...

कलाकृतियाँ
कला को किया हुआ गुप्त दान है,
क्या करें वे भी, नहीं बता पाते
कि वे भी महान हैं।

दीपक डुडेजा DEEPAK DUDEJA said...

एम एफ हुसैन जैसे "महान" कलाकार की शौचालय के 'बेनामी' से तुलना करके आपने ठीक नहीं किया...... अब तैयार रहना - गेट भी मज़बूत लगवा लेना सफ़ेदघर का .... लाल झंडे वाले आते ही होंगे.....

"महान कलाकारों का ये अपमान..
नहीं सहेगा.... हिन्दुस्तान."

अजय कुमार झा said...

सतीश भाई ,
ई दीपक बबा ..लाल कपडवा नहीं ..पूरा थान खोल के दिखा दिए हैं ..अब होसियार रहिएगा तनिक

ajit gupta said...

ऐसी कलाकृतियों को देखने का आजकल तो सौभाग्‍य नहीं मिला। शायद एसी कोच में ऐसे जागरूक यात्री नहीं होते हो?

Arvind Mishra said...

बीते दिनों यही सोच रहा था कि सतीश जी ने अपनी इस ग्राम्य यात्रा की क्या क्या तस्वेर्रें पेश की होंगीं ! फुर्सत मिली है थोड़ी पढता हूँ ...
एक बात बताईये ,जितने उच्च श्रेणी की और बढिए ये आदिम चित्रांकन कम होते जाते हैं -ऐ सी प्रथमं तक तो जीरो ,हवाई शौचालयों में भी जीरो .....
इसका मतलब क्या यह नहीं कि ये चित्राकृतियां अशिक्षित ,यौन अतृप्तियों से संतप्त लोगों की देंन हैं जो जरा सा सुरक्षित गुप्त स्थान पाते ही अपनी दमित भावनाओं को उड़ेलने लगते हैं ?
आपने ब्लॉग जगत में इस विषय पर पहल कर बाजी मार ली है ,मैंने कई बार सोचा मगर बात रह गयी ...
इस पर एक गंभीर चर्चा होनी चाहिए ...आपको कुछ उदाहरण भी देने चाहिए थे संशोधित करके ....

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

ये कलाकार नहीं मानसिक रूप से अस्वस्थ लोग हैं ...

सतीश पंचम said...

अरविंद जी,

जब कोई किसी किस्म की बाजी ही नहीं लगी तब पोस्ट लेखन मैं कैसी बाजी मारना :)

जो मन में आए लिखता हूँ...जो सूझ जाए उड़ेलता हूँ...इसलिए Nothing like बाजीगरी :)

और जहां तक इस तरह की बाथरूमात्मक या टॉयलेटिया छाप चित्रांकन की बात है तो उसके बारे में मुझे जरूर लगता है कि यह कुछ कुछ मानसिक रूप से ढीले लोगों की करामात होती है।

वैसे, ढीले लोग तो हाई क्लास में भी होते हैं मसलन एसी में या फ्लाईट में लेकिन वहां पर उनके मानसिक ढीलैती के निकास हेतु कुछ दूसरे साधन उपलब्ध हो जाते होंगे मसलन प्लेबॉय मैगजीन्स याकि नेट पर ढेण टेण ढेन सर्फिंग :)

ये आदिम चित्राकृतियों पर लिखा लेख केवल व्यंग्य के रूप में लिखा गया है, न कि सिरियस लेवल पर।

इस रोचक मुद्दे पर सिरियस अंदाज में अब आगे आप लिखें :)

देवेन्द्र पाण्डेय said...

समयः जब सतीश पचंम रेल के स्लीपर कोच के शौचालय में पहुँचें और वहां की कलाकारींया देख स्वत: ही लिखने के लिए बेताब हो गए...

बी एस पाबला said...

सेकंड क्लास के स्लीपर डब्बे में !?

यह कलाकारियाँ तो राजधानी और शताब्दी के एसी डब्बों में भी देखने को मिल जाती हैं :-)

अविनाश वाचस्पति said...

एक कला यह भी है
कला और कलाकारों की दुनिया
दुनिया फानी हो जाएगी
तब भी यह अनजानी ही रहेगी रहेगी
छिपकलियां छिनाल नहीं होतीं, छिपती नहीं हैं, छिड़ती नहीं हैं छिपकलियां

Arvind Mishra said...

देखिये पाबला जी ने एक रहस्योद्घाटन कर दिया -अब वे यह बताएं की वे किस रूट की बात कर रहे हैं जिस पर एक नृ शास्त्रीय अध्ययन करा लिया जाय ...
कोई अवचेतन दर जरूर है जो आप इतनी गंभीर बात को हंसी मजाक में लपेट रहे हैं ....मगर हाँ आपका हास्य व्यंगात्मक लहजा /शैली पसंद आयी ...
एक गंभीर चर्चा यहीं कर ली जाय ...उवादा का काम ठीक नहीं होता ...... :)

honesty project democracy said...

शौचालय, मुत्रालय टाइप की कलाकारी.......

वाह क्या नाम दिया है आपने सतीश जी.....

Rahul Singh said...

दिमागी गुहांधकार का ओरांग-ओटांग.

रूप said...

what a keen observation...kudos..keep going !

abhi said...

कुछ नहीं बस वो लोग ये कलाकारी करते हैं जो मानसिक रूप से अस्वस्थ हैं.

Udan Tashtari said...

भला इस तरह से भूख प्यास और तमाम शारिरिक जरूरतों को भूलकर कलाकारी करने वाला शख़्स कैसे साधारण हो सकता है।


-क्या कहें ऐसे असाधारण लोगों की मानसिकता का. :)

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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