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Friday, November 26, 2010

ब्लॉगिंग में एक कन्फेशनल टच भी है प्यारे............सतीश पंचम

     अमूमन कुछ बातें, केवल कहने और सुनने में अच्छी लगती है लेकिन जब उनके अमल में लाने की बात आती है तो हम बगले झांकने लगते हैं, अवायडात्मक होने लगते हैं। कुछ इसी तरह के अनुभवों से मुझे दो चार होना पड़ा जब गाँव में एक विवाह कार्यक्रम के चलते ढेर सारी थर्माकोल की बनीं प्लेटें और प्लास्टिक के बने गिलास यहां वहां खेतों में बिखरे मिले।

      वैसे भी आजकल किसी भी पब्लिक फंक्शन में जहां बड़े पैमाने पर भोजन आदि का कार्यक्रम होता है, तो इन थर्माकोल की बनीं प्लेटों और प्लास्टिक के गिलासों का ही ज्यादा चलन है, वर्ना तो अब तक मिट्टी के बने कुल्हड़ और पेड़ के पत्तों से बने पत्तल ही मुख्यतया प्रयोग में लाये जाते थे। मुझे भी थर्माकोल की बजाय मिट्टी के कुल्हड़ों और पत्तलों पर भोजन करना अच्छा लगता है, एक तरह का सोंधापन महसूस होता है, लेकिन एक तो जमाने के चलन ने और दूजे पेड़ के पत्तों की अनुपल्बधता ने दोना-पत्तल जैसे कुटीर-उद्योग पर नकारात्मक असर डाला है। अब बाजार में जो दोने पत्तल वगैरह मिलते हैं वो सुखाये हुए और मशीनी प्रेशर से बने खांचे आदि के जरिये ही मिलते हैं जिनमें वो खास सोंधापन जो हरे पत्तों पर भोजन करने से मिलता है, वह नहीं मिल पाता।

     जहां तक कि बात उपयोगिता, व्यवहारिकता आदि की है तो विभिन्न आकार प्रकार के थर्माकोल के बनी प्लेंटें, रखने, उपयोग करने, बरतने में आसान हैं तो दूजी ओर उनकी शेल्फ लाइफ भी दोना पत्तलों के मुकाबले ज्यादा है। रखे रहो थर्माकोल वाले उत्पादों को सालों-साल, खराब होने का सवाल ही नहीं। न सड़ने का डर न फफूंद, कीड़े आदि लगने का डर। यदि इस एक कार्यक्रम होने के बाद बच गये तो दूसरे किसी कार्यक्रम में उपयोग में आ जायेंगे। लेकिन इनकी यही खूबी उनका सबसे बड़ा नेगेटिव प्वॉइंट है, सबसे बड़ी कमी है। मसलन, ये थर्माकोल की प्लेटें और प्लास्टिक के गिलास अपने न सड़ने की खूबियों के चलते जहां एक ओर खेतों में, उपजाउ जमीन मे पड़ जाने पर उनकी उत्पादकता पर असर डालते हैं तो दूजी ओर पशु आदि के आहार में यदि गलती से चले जांय तो उनके स्वास्थ्य पर असर डालते हैं। प्लास्टिक की पन्नियों की बात तो जगजाहिर है। कम्बख्त, सड़ने का नाम ही नहीं लेते।

       ऐसे में सरकार भी कई बार रेडियो टीवी आदि के जरिये प्रचार करती है कि प्लास्टिक का कम उपयोग करो, कचरा सुरक्षित ढंग से डिस्पोस करो, ये करो वो करो। अभी रेडियो पर सुन रहा था कि दो जानकार लोग बतिया रहे थे पर्यावरण को लेकर। अच्छी अच्छी बातें कह रहे थे। उनका कहना था कि गाँवों में या शहरों में जो कउड़ा बारते हैं, आग जलाते हैं ठंड से बचने के लिये, तो उसमें कभी भी प्लास्टिक से बनी चीजें आदि मत डालें उससे हमारे पर्यावरण को तो नुकसान होता ही है, हमारा स्वास्थ्य भी प्रभावित होता है। बात तो ठीक कह रहे थे बंधु। लोग अक्सर गाँव में अलाव आदि जलाकर जो सेंकते हैं, घेरा बनाकर जो बैठते हैं तो उसमें अक्सर लकड़ी, पुआल के साथ साथ आस पास पड़ी प्लास्टिक की चीजें भी डालते जाते हैं जो कि उचित नहीं है। आगे दोनों जानकार बंधुजनों ने कहा कि ऐसे प्लास्टिक के कचरों को जलाने से हवा प्रदूषित होती है, अच्छा है कि ऐसे प्लास्टिक के कचरे को जमीन में गाड़ दो, न कि जलाओ। सुनकर मैं सोच में पड़ गया कि यार इतने सारे प्लास्टिक जो रोज ही यहां वहां दिखते हैं, जमा होते जाते हैं उन्हें जमीन में दबाने के लिये इतनी सारी जमीनें कहां से आएंगी। वैसे भी वह प्लास्टिक सड़ेगा तो नहीं केवल जमीन में दबा ही रहेगा फॉर द टाइम बिंग.. यहां तो इंसानों के लिये घर तक बनाने के लिये जमीने नहीं मिल पा रहीं, तो कचरे को दबाने के लिये कहां से जमीन का जुगाड़ किया जाय ? कमलेश्वर के लिखे 'कितने पाकिस्तान' की तर्ज पर यदि कहूं तो हम 'कितने प्लास्टिकतान' बना सकने में सक्षम हैं ? कितनी जमीनें इस कार्य हेतु देने में उत्साहित हैं ? यानि कि सब बकबकई, सारा ज्ञान केवल स्टूडियो तक ही। बाहर तो वही घी वाला हाल कि 'खाओ गगन रहो मगन'

      और वैसे भी जब कभी पर्यावरण आदि को लेकर जो विचार गोष्ठी आदि होती है तो उस दौरान बिसलेरी की पानी वाली प्लास्टिक बोतलें और थर्माकोल की नमकीन वाली प्लेटें ही ज्यादातर यत्र तत्र दिखाई देते हैं। लोग उन्हीं प्लास्टिक और थर्माकोल की बनी प्लेटों से निकाल निकाल कर नमकीन आदि टूंघते रहेंगे और थर्माकोल के बने कपों में चाय पीते रहेंगे और साथ ही साथ जमकर पर्यावरण को लेकर चिंता भी जताएंगे। ऐसे में अगर किसी ने उस वक्त उन प्लास्टिक की बोतलों और कपों को लेकर चिंता जताई तो समझ लो कि उससे बड़ा दुश्मन आसपास के लोगों का कोई नहीं होगा। सब एक ओर से उसे इस तरह ताकेंगे मानों कोई अहमक इंसान, कोई बकलंठ हमारे बीच आ बैठा है और चाय और नमकीन का स्वाद बिगाड़ रहा है। हां माइक से जताई जा रही चिंता में अवश्य एक दो पल के लिये व्यवधान आ सकता है लेकिन फिर वही एक दो इंची मुस्कराहटों के साथ पर्यावरण चिंतन जारी हो जाता है। नमकीन और चाय का रसास्वादन जारी रहता है। जीभ के टेस्ट बड्स अपने अपने काम में लगे रहते है। आगे के अंग अवयव भी अपनी-अपनी क्षमता कुक्षमता के हिसाब से काम करते रहते हैं। रूमाल से मुँह पोंछने और हाथ साफ करने की क्रिया रह रह कर होती रहती है। किसी को उसी वक्त बाथरूम जाना होता है तो किसी को टिश्यू पेपर की जरूरत पड़ जाती है। और सबसे अंत में कागज की बनी स्मारिका और पम्फलेट्स वगैरह दे दिये जाते हैं ताकि कन्फर्म हो जाय कि हां, हमने पर्यावरण चिंतन जमकर किया था। केवल नमकीन और चाय तक ही सीमित नहीं रह गये थे।

        उधर खबर आ रही है कि करोड़ों की लागत से बने अंबानी के घर की बिजली का बिल सत्तर लाख रूपये आया है। न जाने कितने टन नेचुरल गैसों याकि कोयलों को इस घर के उजाले आदि के लिये खत्म हो जाना पड़ा होगा, कितनी वायवीय प्रदूषणों में पाव किलो और सौ ग्राम कि अभिवृद्धि हुई होगी। लेकिन इस तरह से बिजली के उपयोग करने की कीमत भी तो दी जा रही है कोई फोकट में तो नहीं न ले रहे हैं बिजली। पर्यावरण और सोशल लायेबिलिटी गई चूल्हे में।
तेरा तुझको अर्पण.....क्या लागत है मोल

     हां तो आउं अपनी बात पर, कि जब मेरे यहां खेतों में ढेर सारे थर्माकोल और प्लास्टिक के अवशेष जमा हो गये तो मैंने भी उन्हें ठिकाने लगाने से पहले एक दो पल के लिये सोचा कि इन्हें जलाना ठीक होगा क्या, याकि गाड़ना। लेकिन गाड़ने के लिये जमीन की गुंजाइश न देख, प्रैक्टिकलगंज का रास्ता पकड़ते हुए माचिस दिखा ही दिया। पर्यावरण की चिंता गई तेल लेने। रही सही चिंता ब्लॉग पोस्ट के हवाले कर दिया कि इसी बहाने मैं भी थोड़ा सा चिंतित हो लूंगा वरना तो वायु देवता को कष्ट देने का 'थिंकनभाव' सालता रहेगा।

    


     वैसे भी मैंने ब्लॉगिंग को एक तरह का कन्फेशन बाक्स ही माना है। गलती करते जाओ और उस पर कहते जाओ......आप की आंतरिक पीड़ा आपकी अभिव्यक्ति का टचटोन लिये हुए हुए आप को राहत ही पहुंचाएगी :)

    साथ ही साथ आप अपनी ब्लॉग पोस्टों के कन्फेशन बॉक्स के जरिये तमाम छोटे बड़े हरिश्चंद्रों को मात करते नज़र आएंगे, चाहे वो सत्यवादी राजा वाले हरिश्चंद्र हो या हिंदी सेवा करने वाले पुरोधा भारतेन्दु वाले हरिश्चंद्र :) 

     दोनों ही से आगे आप माने जाएंगे। वरना तो आज के जमाने में कौन भला इस तरह कन्फेस्स करता है कि उसने किसी को माचिस दिखाया है। 


    ब्लॉगिंग के उबलते, पिघलते, खदबदाते, टिटियाते ढेरों नये आयामों में से एक आयाम यह भी सही :)

-  सतीश पंचम

स्थान – वही, जहां की गायें मेरी गौसेवा से प्रसन्न हैं बजरिये 'प्लॉस्टिक मुक्तांगन'

समय – वही, जब पर्यावरण पर जताई जा रही चिंतन गोष्ठी में अध्यक्ष महोदय जी को पर्यावरण की सेवा एंव चिंतन आदि हेतु मोमेंटो दिया जा रहा हो और सभागार से बाहर खड़ा बरगद का पेड़ मन ही मन हंसते हुए कह रहा हो, ...मोमेंटो की दीवारें प्लास्टिक की हैं बच्चा।     

17 comments:

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

बहुत शानदार कन्फ़ेशन। सच्चा तो है ही।

तात्कालिक सुविधा जब-तब दूरदर्शिता पर हावी हो ही जाती है। वैसे भी प्लास्टिक ने दैनिक क्रिया कलाप को जितना सुविधाजनक बना दिया है उसका मोह छोड़कर पुरानी थकाऊ व्यवस्था पर लौटना बहुत ही कहिन है।

ऑफ़िस से लौटते हुए सब्जी लाना है तो सुबह-सुबह घर से निकलते हुए झोला लेकर चलना अक्सर भूल जाता है। सब्जी वाला हर साइज की पॉलीथिन लेकर बैठा ही होता है इसलिए अब झोला का झंझट याद रखने का टेम्शन भी कम ही लोग पालते हैं।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

वर्तनी सुधार:

कहिन = कठिन
टेम्शन = टेंशन
:)

Udan Tashtari said...

हरीशचन्द्र से आगे निकल जाने के लिए हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ.

बहुत चिन्तित व्यक्तित्व हो गया है-यह ब्लॉगिंग के पहले से था या अभी अभी हुआ? :)

वाणी गीत said...

बहुत सारे प्लास्टिक को माचिस की तीली दिखा चुके हम भी क्योंकि और कोई विकल्प नहीं था ...आभार आपका कि आपने कन्फेशन करने का अवसर प्रदान किया ...:)
उपदेश देना अलग बात है और उसपर अमल करना बहुत मुश्किल है ...
सार्थक चिंतन !

ajit gupta said...

प्‍लास्टिक को एकत्र करके रिसाइकिल करना ही एकमात्र विकल्‍प है। हम इसके प्रयोग पर कितनी ही पाबंदी लगा दें या बंद होने वाला नहीं, इसलिए आवश्‍यकता है समुचित प्रकार के निस्‍तारण की। अमेरिका में प्‍लास्टिक का उपयोग प्रचुरता से होता है लेकिन कहीं भी एक चिन्‍दी भी नहीं मिलेगी। वे समुचित निस्‍तारण करते हैं। यही बात हमें सीखनी होगी।

रूप said...

आपके क्न्फ़ेशन को साधुवाद, बड़ी उम्दा सोच है आपकी और कई जीवों को परेशानी से बचने की कवायद भी.

दीपक डुडेजा DEEPAK DUDEJA said...

छठ पूजा से १०-१२ दिन पहले हमारे गाँव की झील का जो हाल था ......... उस पर एक पोस्ट लिखना चाहता था पर मन मन सोच कर रह गयी......
वो आज आपने पूरी लिख दी.......
पूरी की पूरी पोस्ट की भावना मेरी भी मानी जाए.......
स्थान : वही झील के किनारे खड़े होकर अब में बहुत आत्मीयता से बिहारी भाइयों को पानी में गन्दगी साफ करते देख रहा हूँ.....
समय: वही , जब कुबेर की पुडिया से तम्बाकू निकाल कर उसी तालाब में फैंक रहा हूँ..... और जब अपनी दोहरी मानसिकता पर कुडन हो रही है. घिन्न अ रही है.

एस.एम.मासूम said...

बड़ी उम्दा सोच है

Poorviya said...

jai ho baba banarsi.bahut sunder chintan hai .kuch log aap kipost padh kar sudharane ki koshish kar rahe hai.

anoop joshi said...

acha hai sir ye baatein sab kahte hai. aur kai baar mene pada bhi hai. lekin is tarah se kahne or chinta jatane ka hunar ka koi saani nahi.

Tarkeshwar Giri said...

Hamne to Ustad man hi liya hai apko

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

चिन्तयाना तो देश की खूबी है...
चिन्तयाने में क्या जाता है...
जो असल मुद्दा है, उस पर कोई ध्यान ही नहीं देता, जो हर साल एक आस्ट्रेलिया बसा रहे हैं, वह जड़ है इस सारी बाही-तबाही की...
जड़ को पानी दो और दो चार पत्ते छांटते रहो..
न भी छांटो तो छांटने का दिखावा करो..
और वो भी न कर सको तो छांटने की बात करते रहो..

गिरिजेश राव said...

हम चिंतित हो रहे हैं - आप के लिए

चिंतन कर रहे हैं - पर्यावरण के लिए
एक महात्मा थे( चिढ़ने की आवश्यकता नहीं, आगे पढ़िए)
साधना में एक ऐसा दौर आया कि दातून करना, नहाना सब छोड़ दिए। उन्हें लगा कि इनसे जीवहत्या होती है :( जब पायरिया और खजुहट हो गए तो लगा कि दातून और नहाना छोड़ने से भी एक जीव को कष्ट हो रहा है, शायद मृत्यु भी हो जाय।
खजुहट से कुत्ते मरते भी देखे थे और मुँह से आती दुर्गन्ध से भक्त जनों के कष्ट भी।
ज्ञान अनुसन्धान की आगे की यात्रा उन्हों ने दातून और स्नान के बाद प्रारम्भ की लेकिन जीवन भर खजुआते रहे और बात करते गन्धाते रहे...
अब यहाँ क्यों कहे यह कथा? आप सोचो, हम इसे पोस्ट करने जा रहे हैं।

Rahul Singh said...

कितना कठिन है मनसा, वाचा(लेखा) और कर्मणा में तालमेल.

प्रवीण पाण्डेय said...

जीवन की पैकेजिंग इतनी अधिक कर डाली है कि रैपरों का खर्चा अधिक हो गया है।

निर्मला कपिला said...

अभी अभीभिशेक ओझा के ब्लाग पर पढ कर आयी हूँ---
सैद्धांतिक ज्ञान और व्यवहारिकता में बहुत फर्क है.

हम ग्यान बाँटने मे माहिर हैं मगर व्यवहार मे अपने तक सीमित रह जाते हैं। खरी खरी कही कन्फेशनल टच के माध्यम से\ धन्यवाद।

Arvind Mishra said...

ग्राम्य प्लास्टिक प्रदूषण की विभीषिका की और आपने ध्यानाकर्षण किया है ..आभार ! आपका ही हल ठीक है ...

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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