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Saturday, November 13, 2010

लाइव यात्रा पोस्ट......कटनी हाल्टायन........सतीश पंचम

आज रास्ते भर आर के नाराणन की लिखी गाई़ड पढ़ता रहा, वही गाईड जिस पर देवानंद ने फिल्म बनाई थी। यह गाईड हिंदी में एक अनुदित किताब थी मूल पुस्तक की, स्वाभाविक रूप से इसमें कई खामियां दिखी। पहले कुछ समय तक तो अनुवादक ने इस किताब में राजू के मुंह से अपने पिता को बाप कह कर ही परिचय दिलाया है, कि मेरा बाप का दुकान था, मेरा बाप मुझे पढ़ने भेजा। इस तरह पढ़ने से आजिज आकर मैंने मन ही मन बाप की जगह पिता पढ़ना शुरू किया और अगले अध्याय तक अनुवादक ने जैसे अपनी गलती मान, अपनी जिद छोड़, बाप की जगह पिता शब्द का इस्तेमाल शुरू कर दिया।

     खैर, वैसे तो मैं गाइड फिल्म कई बार देख चुका हूं, लेकिन जब इस उपन्यास को पढ़ रहा था तो महसूस हुआ कि देवानंद ने बड़ी ही समझदारी से अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए मूल प्लॉट में तब्दीली करते हुए फिल्म का कथानक लिखा। यदि ऐसा नहीं करते तो फिल्म हिट होने की बजाय फ्ल़ॉप होने की संभावना ज्यादा थी, जिसकी एक एक बहुत बड़ी वजह भी है।

वजह यह कि उपन्यास में लिखा गया है कि राजू का मामा दक्षिण भारतीय प्रथा के अनुसार अपनी बेटी यानि कि राजू की ममेरी बहन का विवाह राजू से करना चाहता है । चूंकि यह फिल्म हिंदी में है और हिंदीपट्टी में इस तरह से ममेरी या चचेरी बहन से रिश्ता करना एक तरह से अपराध माना जाता है, देवानंद ने यहां तब्दीली करते हुए राजू की ममेरी बहन का जिक्र ही नही किया फिल्म में और मामा को इसलिए नाराज दिखाया क्योकि वह रोज़ी उर्फ नलिनी जैसी नाचने वाली के फेर में पड़ा है। यदि देवानंद ज्यों का त्यों इस कहानी को उठाकर ममेरी बहन और राजू के रिश्ते की बात कहकर फिल्म बनाते तो गाईड का फ्लॉप होना तय था। ऐसे ही वक्त यह महसूस होता है कि एक फिल्मकार का अपना नज़रिया होता है, अपनी समझ और सोच होती है और उसी के चलते उसे उपन्यास या किसी कहानी पर फिल्म बनाते समय एक हद तक छूट देनी चाहिए, न कि केवल यह जिद कि उपन्यास से क्यों छेड़छाड़ किया। देवानंद की इस समझदारी को देखकर अच्छा लगा।

अब थोड़ा सा सफर के बारे में बता दूं। कटनी पार कर चुका हूं, अभी तक अप्पर बर्थ से उतर कर नीचे की लोअर बर्थ पर जाकर बैठने की हिम्मत नहीं जुटा पाया हूँ। पहले ही नीचे गचड़ी है। लोग एक दूसरे से सटे फटे बैठे हैं। सोचा था ठंड होगी, लेकिन बकौल एक यात्री जहां गोरू (भैंस, पशू वगैरह ) और मनुख होते हैं वहां गर्मी लगती ही है। यह यात्री कुछ पुरनिया टाइप है, धोती पहनें सुरती खाते दिख रहे हैं। इनकी इस गोरूता  के क्या कहने । 

   एक दूसरे यात्री कह रहे हैं कि आर भोडाफोनवा का नेटवरकै नहीं है, कहां से फोनवा करे।

   इधर  बाथरूम जाते समय पता लगता है कि लोगों के रास्ते में बिछे होने पर उनसे पार पाना कितना मुश्किल होता है। राजू गाईड कैसे पार पाता होगा ऐसे लोगों से चरण छूने से बचने के वक्त। 

   फिलहाल बाथरूम वगैरह जाने के लिये जब अपनी अप्पर बर्थ से उतरता हूं तो वहां जाते समय लोगों से बचते बचाते पैर रखने के लिये जब लंबे लंबे डग ढूंढ कर रखने पड़ते हैं तो लगता है जैसे जमीन पर कि लैंड माइन बिछी हैं और मैं उनसे बचते हुए चल रहा हूं।

 नेटबुक की बैट्री खत्म होने को है। घर पहुंचने तक आगे न लिख पाउंगा यह लग रहा है।

फिलहाल इतना ही.... .  वो क्या कहते हैं........हां.......... शब्बा खैर :)

- सतीश पंचम

5 comments:

Majaal said...

ये भी सोचने वाली बात है, की जहाँ फिल्म तब्दीले के साथ हित हुई, वहीँ पर मूल उपन्यास बिना किसी तब्दीली के जस का तस क्लासिक मन जाता है, मतलब ये की फिल्म देखने वालों और उपन्यास पढने वालों की सोच में काफी फर्क रहता है, उसी तरह घर पर लिखी गयी पोस्ट और ट्रेन में लिखी गयी पोस्ट का फर्क भी महसूस किया जा सकता है....

लिखते रहिये ....

गिरिजेश राव said...

@ लैंड माइन :)

सदाबहार देवानन्द बाद में सठिया गए। ऐसा उनकी बहुत सी फिल्मों को देखकर और बाद में बिना देखे ही पता चलने लगा :)

जितेन्द़ भगत said...

रोचक वि‍वरण
देवानंद के बारे में भी....

प्रवीण पाण्डेय said...

ट्रेन की छत विचारज है, देखते रहिये, प्रवाह बहेगा। अनुभव पर कह रहा हूँ।

RAJ SINH said...

गाईड के अंगरेजी वर्जन को देखते तो सर धुनते .नारायण का गाईड उपवास कर मर जाता है .विजय आनंद का नहीं .अंगरेजी का डाईरेक्टर हालीवुड का था .उसने उपन्यास को फिल्म बना दिया था .

मेरे आकलन में हिंदी फिल्म क्लासिक थी ,उपन्यास नहीं .और उपन्यास पर बनी अंगरेजी फिल्म तो फ्लॉप भी थी बकवास भी .

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