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Tuesday, November 16, 2010

छत वाली पोस्ट....... बजरिये घोंघा गति नेट कनेक्टिविटी ......सतीश पंचम


      इस वक्त अध- अंजोरिया रात में चांद की रोशनाई वाले माहौल में छत पर कुर्सी लगाये बैठा हूँ। अकेला। हल्की ठंड है, एक चादर जितनी। छत पर इसलिए आना पड़ा क्योंकि नीचे नेटवर्क नहीं सध रहा था। यहां छत पर आया तो नेटवर्क तो मिला लेकिन नेट की स्पीड किसी घोंघे की स्पीड से भी कम है। इस घोंघा-गति वाले नेट से कुछ ब्लॉग्स देखे। हर ब्लॉग खुलने में समय ले रहा है। इस घोंघा ब्रांड के चलते टिप्पणी करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया।

      वैसे कल से ही मैं कुछ रिश्तेदारियों में घूम रहा हूं, कभी आजमगढ़ तो कभी जौनपुर तो कभी कहां तो कभी कहां। अभी अगले कुछ दिन दौड़ धूप के हैं। एक ब्याह पड़ा है सो न्योतने के लिये हर नाते रिश्तेदारी मे जा रहा हूं और यह एक तरह से मेरे लिए अच्छा ही है वरना तो गाँव आकर केवल गाँव में ही रह जाता था, बहुत हुआ तो शहर का चक्कर मार आया।

इसी घुमक्कड़ी के बहाने पता चला कि किसी रिश्तेदार के यहां न्योता न पहुंचे तो वह कितना बुरा मान सकता है। किसी के यहां यदि पहले एक न्यौता जाता था तो अब दो दिया जाय क्योंकि दोनों भाई अलग हो गये है। इन न्योतहरीयों के देने लेने में एक विचार मन में जरूर आया कि आजकल के SMS और E-mail के युग में क्या जरूरी है कि हर किसी के यहां जाकर ही न्यौता दिया जाय। इन साधनों का प्रयोग करके भी तो न्यौता दिया जा सकता है।

लेकिन फिर तुरंत ही मन ने कहा कि नहीं, यह SMS E-MAIL अपनी जगह जरूर ठीक होगे लेकिन जहां रिश्तों की गरमाहट की बात है, आपसी मेल जोल की बात है, वो इन्ही पेपर वाले कार्डो और निमंत्रण पत्रों के जरिये ही कुछ हद तक जीवंत बनी रहती है। इसमें और sms वाले तकनीकी निमंत्रणों में बहुत फर्क है। हम लाख टेक्नीक में आगे बढ़ जांय, लाख दर्जे अच्छी गुणवत्ता के वॉलपेपर्स वाले निमंत्रण पत्र कम्प्यूटर से बना कर उन्हें ई-मेल कर दें, लेकिन उनमें वो सत्व नहीं आ पाता, वह बानगी नहीं आ पाती जो इन कागज के निमंत्रणों में हैं।

इस यात्रा के दौरान मैंने यह भी महसूस किया कि जब खुद इस तरह से हर रिश्तेदार के यहां जाना होता है तो एक प्रकार का टू वे कम्यूनिकेशन होता है, आपसी सौहार्द और रिश्तों की गरमाहट को ताजा करता है। बात ही बात में पता चलता है कि अभी इनके यहां लड़की ब्याहने लायक हो गई है, लड़का ब्याहने लायक हो गया है, गाय ली गई,  कोई खेत लिखाया गया या किसी का कहां एडमिशन हुआ किसी की नौकरी कहां लगी वगैरह वगैरह। बाकि तो कुछ बातें आपसी समझ बूझ पर भी आधारित होती हैं, आपसी पुन्ने बात ब्यहार पर भी होती हैं वरना तो निमंत्रण चाहे कागज के उपर दो या एस एम एस के जरिये, ठंड तो ठंड, उन रिश्तों को गरमाने में किसी भी तरह की बातें कामयाब न हो पाएंगी। कुछ समय का बदलाव कुछ जमाने की मिमिक्री :)

     इन तमाम बातो के अलावा एक बात यह भी नोटिस की मैने कि जब आप इस तरह के रिश्तेदारियों में जाते हैं तो कुछ विशेष खानपान का व्यवहार होता है जिन्हें आप खुद ब खुद पालन करना सीख लेते हैं। कुछ बातें तो इतनी मजेदार होती हैं कि उन पर सोच कर हंसी आती है।

मसलन, जब आप नानी-नाना के यहां जाते हैं तो खाते वक्त जी भर कर मांग सकते हैं, खत्म हो गया तो खुद ही बटलोई के पास थाली लिये पहुच गये और लेने। वहीं जब आप किसी ऐसी रिश्तेदारी में होते हैं जहां पर कि आप की नई नई रिश्तेदारी जुड़ी हो, नया नया कोई जुड़ाव हुआ हो तो आप थोड़ा लजाते हैं, सकुचाते हैं। जब सामने और रोटी आती है तो कहना पड़ता है कि नहीं बस...औऱ नहीं। मन में खाने की इच्छा हो तो भी।

इन्हीं में से एक रिश्तेदारी की बात याद आती जब हम कुछ समय पहले गये थे आजमगढ़। वहां पर भोजन एक थाली में परोस कर हम चार पांच लोगों के सामने आ गया। खाना खाते समय एक बार गृहस्वामी ने पूछा कि और कुछ लेंगे आप लोग तो एक तरह से सकुचाते हुए सभी ने नहिकार दिया कि नहीं और नहीं चाहिये, जबकि लंबी यात्रा से हम लोग वहां गये थे, भूख तो लगी थी लेकिन लिहाजन कह गये तो कह गये। उन महाशय ने दुबारा नहीं पूछा आकर कि और कुछ लेंगे या न ही कोई जबरी किये कि लो और लो।  हम लोग जो कुछ था थाली खा पीकर हटे।

बाद में पता चला कि उस इलाके की ओर यही रीत है कि एक बार यदि किसी ने भोजन के वक्त नहिकार दिया कि नहीं और नहीं लेंगे तो उससे दुबारा नहीं पूछा जाता। तबसे जब कभी उस ओर जाना होता है तो संभलकर ही जाते हैं :)

इसी तरह से एक जगह जाने की तैयारी कर रहा था जहां पर कि रात रूकनी थी, तो अपनी लुन्गी वगैरह रखने लगा। तब चचेरे भाई ने कहा कि पहले होता था कि लोग लुन्गी वगैरह लेकर चलते थे, वो जमाना और था, अब लोग जहां जाते हैं, वहां ज्यादातर खुद ही थ्री फोर्थ या लुन्गी ऑफर करते हैं, इस तरह से किसी के यहां लुन्गी ले जाकर क्या अपनी बेईज्जती कराओगे

तो, भई अब इतना ही, शेष फिर....अभी तो देख रहा हूं लैपटाप के स्क्रीन पर कुछ देशज कीड़े मंडरा रहे हैं, थोड़ा थोड़ा नेटवर्कवा का टावर भी ललछहूँ हो गया है.....इसी वक्त पोस्ट को दाग देता हूं, क्या पता अगले पल नेटवर्क खिसक न जाय कहीं :)
 रिश्तों की गर्माहट........ अलाव और आदमी....

-  सतीश पंचम

स्थान – गाँव-घर की छत

समय - यही कोई दस ओस बजे होंगे। 

( अलाव और आदमी........ यह एक चुनाव चिन्ह है जिसे कि एक प्रत्याक्षी को आबंटित किया गया था,  पहली बार जाना कि ऐसा भी कोई रोचक चुनाव चिन्ह भी होता है) 

9 comments:

VICHAAR SHOONYA said...

आपका नेट बेशक धीमी गति से चल रहा हो पर पोस्ट वही पुराने अंदाज में सरपट दौड़ रही है. चुनाव चिन्ह वास्तव में अनोखा है.

प्रवीण पाण्डेय said...

SMS व ईमेल, व्यक्ति भेंट को नहीं प्रतिस्थापित कर सकते हैं।

Arvind Mishra said...

इसलिए ही तो म्हारे ईहाँ लाख मना करने पर भी एक दू रोटी और डाल दी जाती है और ढकार का इंतज़ार किया जाता है ..बढियां है आपकी यह गव्हिंयाई!-

गिरिजेश राव said...

लंठई में इस लेख को नीचे के पैरा से ऊपर की तरफ पढ़ा - पैरा दर पैरा। मज़ा आया।

अवनीश सिंह चौहान said...

मान्यवर
नमस्कार
अच्छी रचना

मेरे बधाई स्वीकारें

साभार
अवनीश सिंह चौहान
पूर्वाभास http://poorvabhas.blogspot.com/

दीपक डुडेजा DEEPAK DUDEJA said...

गाँव पहुँच गए है ........
अपने को तैयार करना चाहिए - कुछ ठेठ गवइ पोस्ट पढ़ने के लिए....

देवेन्द्र पाण्डेय said...

मजेदार पोस्ट।
नेट का प्रभाव यह भी पड़ा कि दूर के पास हो गए पास के दूर हो गए।

Rahul Singh said...

'ई' की घोंघा गति, वाह. नेटवर्क और रिश्‍तेदारी, दोनों से बढि़या तालमेल की पोस्‍ट.

pramod gupta said...

आजमगढ़ gaye humare yahi chale aate main bhi आजमगढ़ ka hi hoon aapki ye post padhane ke baad gaon ki jada hi yaad aa rahi hai

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