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Monday, November 15, 2010

गाँव की बिग बॉस 'झगड़ू बो' ..... चुनावी चिलगोंजई ऑफ इंडियन ढेमोकरेसी...........सतीश पंचम

लो जी,

       आ पहुँचा हूँ अपने गाँव। नवंबर की इस गुलाबी ठंड के बीच। खेतों में धान की कटाई हो जाने के बाद कहीं कहीं खेत हेन्गाये गये हैं, तो कहीं कहीं पर अब भी धान के जड़ीय गुच्छे अब भी निहुरे निहुरे ताक रहे हैं, मानों कह रहे हैं कि पुनुई सहित धान तो काट ले गये, हम लोगों को क्या सीत घाम बेराम हो जाने के लिये बिसेवा छोड़े हो ?

    उधर, सटक उठे धान के पुआल वाले गजहर जहां तहां खेतों में गंजे हैं।

     इधर ग्राम प्रधान के अभी अभी हुए इलेक्शन के निशान अब भी यहां वहां दिख जा रहे है। तमाम दिवारों पर, पेड़ो के तनों आदि पर अब भी कई पोस्टर चिपके हैं, कुछ फटे कुछ साबूत। गाँव में ही एक करीबी के ही घर की दीवार पर सात-आठ विभिन्न प्रत्याक्षियों के पोस्टर देख जिज्ञासा वश मैंने पूछा कि अरे यार मना क्यों नहीं किये पोस्टर लगाने से देख रहे हो गंदा हो गई है दीवार। तो कहने लगे कि किसको मना करते। एक ने लगा दिया प्रेम-ब्योहार वश तो उसकी देखादेखी और लोग भी पोस्टर चफनाने चले आये। अब एक को चफनाने दिया तो दूसरे को मना करना भी तो ठीक नहीं, भई गाँव देस की बात है। क्यों बेमतलब रार ठानना। मैं मन ही मन इस प्रेम-ब्योहरई पर मुग्ध हो रहा था कि तभी एक और बात पता चली।

      किसी ने बात ही बात में बताया कि 'फलाने बो' कह रहीं थी कि हम ओनके वोट कैसे दूँ उन्होंने तो हमको अपने बेटवा के बियाहे में तो न्योता ही नहीं दिया। मैं दंग। भला यह भी कोई बात हुई कि न्योता न मिला तो वोट न दिया जाय। आगे जाकर बात खुली कि हाल ही में इनके घर अलगौजी हुई हैं, बाँट- बखरा हुआ है। बाहर वालों की नज़र में ये अब भी एक परिवार की ईकाई के रूप में माने जाते हैं, अत: न्योता बांटने वाले नाऊ ने एक ही न्योता परिवार के सबसे बड़े भाई को दे दिया और नये नये मालिक - जालिक बने दूसरे भाई को नहीं दिया। बात वहीं फंस गई।

    बैठकी - चर्चा के दौरान उन्हें कोई मजाकिया ढंग से समझा रहा था कि अरे माना कि न्योता हंकारी ही गाँव के रिसते नाते का चीन्ह पहचान होता है लेकिन इसका क्या तुक कि न्योता नहीं मिला तो वोट ही नहीं दिया। भौजी, इसमें सरासर तुम्हारी ही गलती है। तुम्हें अलगौजी के बाद गाँव वालों को न्योतना चाहिये था कि अब हम अलगाय गये हैं आओ पूड़ी कचौड़ी खाओ। तब तो सब जानते, अब छूच्छे तो कोई किसी को नहीं पहचानता।

   भौजी मुस्कराती हुई बोलीं - अच्छा, आये हो बड़का पूड़ी कचउड़ी खाने, तोहरे बापौ आजा कभौं दिये रहे अलगौजी के दावत ?
   
      बंदे ने छूटते ही कहा - अरे क्या मेरे आजा पोरखा ने जो नहीं किया तो क्या जरूरी है कि हम लोग भी न करें। भौजी आप देखती रहो, मैं अलगौजी होते ही सबसे पहले आप ही को न्योतूंगा...... हां।

  बाकि अपनी ओर से पूड़ी कचौड़ी खिया दो तब ।

    इन्हीं हल्के फुलके क्षणों के बीच कुछ पोस्टरों पर नज़र दौड़ाया तो एक से एक मजेदार बातें पढ़ने को मिलीं। लोग अपने ऑफिशियल नाम लिखने के साथ साथ ब्रेकेट में प्रचलित नाम भी लिखते, मसलन रामअधार यादव ( बुल्लूर ), रमापति मौर्या ( नेता ) , अजोरी लाल ( नन्हे ) । महिला प्रत्याशियों के पोस्टर पर महिलाओं के तस्वीर के बगल में ही हाथ जोड़े उनके पति का भी चित्र था। एक पोस्टर को देख कर ऐसा लग रहा था मानों पतिदेव अपनी पत्नी को हाथ जोड़कर नमस्ते कर रहे हों याकि माफी ओफी मांग रहे हों।

     तभी एक ऐसे पोस्टर पर नज़र गई जिसमें केवल चुनाव चिन्ह था, चुनावी वायदे थे लेकिन प्रत्त्याक्षी का न नाम था न ही कोई पता। आसपास लगे पोस्टरों में महिलाएं ही थीं। अंदाजा लगाया कि ये कोई महिला सीट होगी। लेकिन ध्यान बार बार उस बिना नाम पते वाले पोस्टर की ओर जा रहा था। थोड़ा करीब जाकर देखा तो चुनाव निशान था चारपाई।

हैय......ई का।

     कहीं........मन ही मन कुछ सोच कर मुस्करा दिया। चचेरे समवय भाई की ओर देखा तो वह भी मुस्की मारने लगा। मन ही मन सोचा कि शायद कोई महिला प्रत्त्याक्षी होगी जिसे कि चुनाव चिन्ह के रूप में चारपाई मिली हो। लाजन उसने या उसके परिवार वालों ने उस पर नाम आदि न लिख कर केवल मुंहजबानी लोगों से मिल मिलकर बताया हो कि फलांने चुनाव चिन्ह चारपाई पर वोट दिजिएगा। अब गाँव में कोई महिला इस तरह चारपाई पर वोट मांगने की बात कहे तो जाहिर है चुहल शुरू हो जायगी।

     मर्दों की कौन कहे, महिलाएं ही आपस में घास करते हुए बहसिया जांय। मेरे गांव की बिग बॉस मानी जाने वाली झगड़ू बो तो इन सब मामलों में आगे हैं। उनके बारे में कहा जाता है कि जितना झमक के ये झगड़ा करती हैं, उतना ही बमक के ये चुहल भी करती हैं। गाँव भर की दुलहिनें इनकी बात का बुरा नहीं मानतीं।


     मैं कल्पना करने लगा कि यदि कोई चारपाई निशान वाली महिला प्रत्त्याक्षी उनसे वोट मांगने जाय और कहे कि चारपाई पर ही वोट दिजिएगा तो गाँव की बिग बॉस झगड़ू बो जरूर कहेंगी – अरे, क्या चारपाई पर ही लोगी तभी क्या ?

    अरे भौजाई जब सरकारे कहे है चारपाई पर लो.... तो हम का करें....आप जियादे मजाक नहीं करो अभी और लोगों से कहने जा रही हूं हां....

अरे तो क्या पूरे गाँव भर से लोगी ? वैसे भी ये भी कोई कहने की बात है चारपाई पर ही दो......तभी :)

खैर, मैं अभी इस फैटेसी पर सोच ही रहा था कि भाई ने बताया ये पोस्टर छपा छपान टाईप का है। मैंने पूछा कि छपा छपान का क्या मतलब ?

      बताया गया कि यदि कोई प्रत्त्याक्षी अपना नाम, मोबाईल नंबर फोटो वगैरह लगाकर कस्टमाईज्ड तरीके से पोस्टर छपवाता है तो उसे ज्यादा खर्च पड़ेगा। खर्च कम करने के लिये छापाखाने वालों ने इसका एक तोड़ यह निकाला कि हर चुनाव चिन्ह के साथ ढेर सारे पोस्टर एक साथ छाप दिये। उन चुनाव चिन्ह वाले पोस्टरों पर वादे भी एक जैसे ही रखे मसलन गाँव में बिजली, पानी, सड़क, रास्ते वगैरह ठीक करवाउंगा, ये करवाउंगा वो करवाउंगा। अब जिसे खर्च कम करते हुए पोस्टर बनवाना होता है वह अपने लिये चुनाव कार्यालय से आबंटित चुनाव चिन्ह वाला पोस्टर थोक के भाव खरीद लेता है और केवल अपना नाम और मोबाइल नंबर स्केच से लिखकर दरवाजे जरवाजें बांट आता है। इस तरह से उसका खर्च भी कम होता है और उसके पोस्टरों की संख्या भी बाकी प्रत्याक्षियों से ज्यादा होती है।

    यह बिना नाम गाम वाला यह चारपाई वाला पोस्टर भी उसी थोक खरीद का हिस्सा था। इसमें केवल वायदे थे और एक चुनाव चिन्ह। पूछने पर बताया गया कि पोस्टर लगे महीना हो गया है। जिसने पोस्टर लगाया था उसने पोस्टर पर अपना नाम, नंबर स्केच पेन से लिखा था लेकिन, धूप ठंड खाकर वह स्केच की लिखावट वाला हिस्सा हल्का पड़ते पड़ते उड़ गया और रह गया है केवल यह चुनाव चिन्ह और उस पर लिखे वायदे।

मैने झट् से उस चारपाई वाले 'वादाई पोस्टर' को अपने कैमरे में तस्वीर बद्ध कर लिया।

और करता भी क्यों न, आखिर यह पोस्टर हमारे आजादी के पैंसठ साला लोकतांत्रिक इतिहास का जीता जागता उदाहरण जो है। आखिर हम भी तो आदि हो चुके हैं, इसी तरह के तमाम रेडिमेड वायदों, घोषणाओं, चुनावी चिन्हावलीयों के और आदि हो चुके हैं गुम होते नेता नामावलियों के।

भारतीय लोकतंत्र के 'चिर- स्थायित्व' का जीता जागता उदाहरण है यह 'वादाई पोस्टर'

- सतीश पंचम

स्थान - वही जहाँ की दीवारें झगड़ू बो के आते ही सकपका जाती हैं क्योंकि सुना है झगड़ू बो दीवार से भी झगड़ा करती हैं।

समय - वही, जब सूरज की बांस बराबर उगवाई हो रही हो। 

7 comments:

Arvind Mishra said...

बा भैया गावौं पहुच गए -ईहाँ हम तो सुबह ५ बजे हडबडा के उठ जाते थे की कहीं सतीश भायी टेशनवान से फोन कर दें .....बहरहाल गाँव गिरावं में अबै तुरंतै परधानी निपटी है तईं सावधान रहिएगा ..और चारपाई वाली जीतिन की नाहीं ?बेचारौ केकर केकर लेतिन वोटवा !

रंजना said...

ओह ....हँसते हँसते पेट दुख गया !!!!

लाजवाब अवलोकन और प्रस्तुतीकरण है आपका...

गिरिजेश राव said...

भारतीय डेमोक्रेसी = धक्का+मुक्की+कुर्सी
आप ने उसमें चारपाई भी जोड़ दिया। बढ़िया है सतीश बाबू!
चचेरे भाई भी खराबे मनई लगते हैं आप के वर्णनानुसार। बताओ उहाँ पोस्टर का मामला प्योर ईकोनोमिक्स का था, घाम बतास और कच्ची स्याही का था और आप उसे मनगुगुला पकाते हुए परम आदरणीय दद्दा कोंड़के की परम्परा से जोड़ने लगे!
सही कहत हैं जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे कवि। 'कवि' पर ऑब्जेक्शन नहीं मंजूर होगा। आप अपनी काव्य प्रतिभा पहले प्रदर्शित कर चुके हैं।

Sanjeet Tripathi said...

ultimate, aapne gaaon kaha bas aur mai lapak ke chala aaya aapke gaon ka haal dekhne...

प्रवीण पाण्डेय said...

बिना नाम वाला चारपाई का पोस्टर थोक के भाव बहुत जगह के लिये खरीदा गया होगा। अपना नाम ठोंक के चिपका दिया जाये।

sanjay said...

jhagroo 'bo' ki prem-byohrai dekh
man mugdh hua ja raha hai........

भारतीय डेमोक्रेसी = धक्का+मुक्की+कुर्सी .......
gajjabbe paribhasha lekin samichin.


pranam.

DEEPAK BABA said...

भैया जी, ऐसे पोस्ट हमरी प्रेस पर भी छपा थे..
हमको भी बहुत ताज्जुब हुवा जब गोरखपुर का व्यापारी बोला की ऐसे इलेक्शन में रेडीमेड पोस्ट चलते हैं...

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