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Saturday, November 13, 2010

लाइव यात्रा पोस्ट...........सतीश पंचम

        रात के साढ़े बारह बज रहे हैं......गाड़ी चल चुकी है......लेकिन चलने के पहले का जो आगाज है वह कुछ ऐसा है कि मेरे सामने की दो सीटों( अप्पर बर्थ और मिडिल बर्थ ) पर कुल मिलाकर सात लोग जा रहे हैं। अभी नीचे की बर्थ वाला आना बाकी है, शायद आगे के किसी स्टेशन में चढ़े।

   
    दो सीटों पर सात लोगों का अनुपात जब बैठेगा बैठेगा, अभी तो उनके सामानों को देख कर सोच रहा हूं कि ये लोग सोयेंगे कैसे, पूरा उपरी बर्थ तो सामान से पटा है, सीट के नीचे भी बोरा वगैरह रखा है। पूछने पर कि आप लोग बम्मई से बोरा ले जा रहे हो - इन्हीं में से एक ने बताया कि सब गांव वालन क हौ। जब दे रहे हैं लेई जाके घरे देये खातिर त मना कैसे करें.....भाई हमहूं के न जरूरत पड़थ। केहू के एक गठरी, केहू क दूई गठरी। अब पेटी बाकस तो हौ नाही....एही बदे बोरा में लेहल जाता।

सामान गजे गज्ज, सोयेंगे कहां :)
बातचीत में किसी 'सेवा बो' का नाम लिया जा रहा है। अरे बड़ी चाप्टर औरत हइन सेवा बो। ओनकर मनई रेलवे में रहलें, टीटी आय के टिकस मंगलेस त सोये सोये कहिन कि टिकस नहीं पास है, पास। टिकस्स का होता है।

बतावss

अभी सेवा बो के बारे में सोच ही रहा हूं कि उन्हीं में से एक ने बताया कि ई त गनीमत है। एक बार हम एक टिकस पे नौ लोग गये रहेंन।

सुनकर ही आश्चर्य हुआ....कैसे गये होंगे। बंदे ने बताय़ा कि - चालू टिकट लेई लेई के कुछ लोग उहीं 'बोगदवा' में चल गइलें त कुछ लोग भूईं (जमीन) हो गइलें।

बोगदवा के बारे में पता चला कि पहले जो बाथरूम के पास खाने बने होते थे सामान रखने के लिए, उन्हें रेल्वे ने जब हटाया तो वहां कुछ समय तक खाली स्थान रहा था।

वही था बोगदा।

फिलहाल एक किन्नर और एक यात्री में कहासुनी भी हो चुकी है। किन्नर जी कह रहे हैं कि दस दो, जबकि बंदा अड़ा है कि नहीं पांच लो। मेरा पांच..... ये बाजू वाले का पांच ….हम लोग एक ही है।

तू झूठ बोलेन्गा तो तेरे को आमरा जइसा अउलाद होंगा...... ये सोच के ले।

अरे क्या सोच के ले, मेरा सब आपरेसन फापरेसन हो गया है, बच्चा कच्चा जो होना था सब हो गया...अबी तुम्हारा स्राप ब्रीप नई लगने वाला। लेने का है तो लो, नहीं तो जाओ।
किन्नर ने वो पैसे पकड़े, जाते जाते हाथ से यौनिक इशारा करते कहा - वो ग्रांट रोड में जाता ना ** ने को.....उदर इच आमरा बात तेरे को लगेंन्गा.....भड़वा :)


 लो,  पोस्ट खतम होते होते कल्याण आ गया और वो लोवर बर्थ वाला आदमी भी , मय बोरा सहित। 

  यानि की तीन बर्थ पर आठ आदमी : )
 फिलहाल तो मुझे चिंता है, मेरी बर्थ न कब्जिया जाय.....अरे गांव देश के मनई हो.....तनिक सरका हो :)

 सतीश पंचम

(गाँव जाते हुए चलती ट्रेन से पता नहीं ये पोस्ट सही सलामत पहुंचेगी कि नहीं,....... नेट कनेक्टिविटी ......अर्र..र्र.....   :)

11 comments:

PADMSINGH said...

चलती फिरती पोस्ट तो गजब ढा रही है सतीश जी ... और उसपर आपका अंदाज़े बयाँ के कहने ही क्या ... उत्तम !

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

बहुत प्रवाह में लिखा है..... यह लाइव पोस्ट.... बेहतरीन प्रस्तुति.....

गिरिजेश राव said...

अल्लसुबह बाथरूम को लेकर होने वाले ढिकचिक पर रपट की प्रतीक्षा रहेगी।
जिस तकनीक से यह पोस्ट की गई है, उसका खुलासा हो तफसील से तो आम जनता को भी लाभ हो।
मोबाइल कौन सा? वगैरा वगैरा

देवेन्द्र पाण्डेय said...

..शुक्र है फोटो खींचने दिया, पोस्ट करने की मशक्कत के बारे में भी लिखें ।

सतीश पंचम said...

गिरिजेश जी,

इस पोस्ट को लिखने में कोई विशेष टेक्निक का इस्तेमाल नहीं किया हूं। MTS का डेटा कार्ड है जिसके रोमिंग सॉफ्टवेयर को इंस्टाल किया हूं और नेटबुक से कनेक्ट कर पोस्ट कर दिया।

तस्वीरें मोबाइल से लेकर ब्लूटूथ से नेटबुक में ले लिया और वहीं से चेंपा है :)

रही बात बाथरूम गाथा की तो पेश है अपडेट
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चारों ओर दिख रही भीड़ से अंदाजा लगा सकता हूं कि शादी का मौसम जोरान है, लगन तेज है और लोग विवाह आदि हेतु लौट रहे हैं। अमूमन हर सीट पर दो दो तीन तीन लोग extra हैं, वेटिंग संख्या 584 चल रही है इसी से अंदाजा लग सकता है कि एक ट्रेन में तीन ट्रेन चल रही है...... चालू और अचालू टिकट कितने होंगे पता नहीं :)

रात के समय पूरा रास्ता सोये हुए यात्रियों से अंटा पड़ा था। लघुशंका हेतु जाते हुए शंका होती थी कि पहुंच भी पाउंगा या नहीं। बहुत कस के भीड है, इतनी की सरसों छींट दो तो नीचे न गिरेगी और किसी न किसी के केशालय, कुरते, बैग या बोरे पर ही अटक जाय :)

अमूमन बिना ब्रश किये मैं चाय वगैरह नहीं पीता लेकिन यह भीड़ का ही कमाल था कि ब्रश करने का इरादा कैंसल करते हुए सीधे बेड टी ली.....देशज से अपग्रेड होकर सीधे पाश्चात्य होने का सुख इसी देसी ट्रेन में मिल सकता है....आखिर इतने धोती, गमछा वालों के लिए दो सोचालय (हां सोचालय ही कहना ठीक होगा) में से एक पाश्चात्य रखने के पीछे यही सोच होगी .....धोती वाले देवरिया दद्दा उसी पाश्चात्य वाले में कान पर जनेउ लपेटे गये हैं.....अब वो उस पर कैसे बैठे होंगे अंदाजा लगाया जा सकता है :)

भुसावल में भूसे जैसा वड़ा पाव दिखा....दो लिया था...उसकी भुसावट की वजह से खाया न जा सका.....एक खुद भकोसा... एक भिखारन को दे दिया :)

आगे किसी जगह जब तक बैटरी साथ रहेगी, लिखता रहूंगा। फिलहाल तो ट्रेन भुसावल में ज्यादा देर रूक गई तो बगल के फूलपूर दद्दा बोल रहे हैं- अरे तो भुसावल ओथुआ न हौ....

अब ओथुआ का अंदाजा आप लोग लगाइये :)

Rahul Singh said...

यात्रा जारी रखें, किश्‍तें आती रहें, टेक्‍नालॉजी जो साथ है. बढि़या प्रयोग.

Shiv said...

बहुत गज़ब पोस्ट है.
वाह!

तीन सीट पर आठ लोग! बहुत देखा है ई नज़ारा. भरा-भरा गठियावा बोरा...मिसिर घरे जात रहें ता ओनही के साथे भेजि दिहे रहे..टाइप.

साढ़े छ साल बाद हमहू घरे जाब..मंगलवार कै. पता नाही तोहरी की नाही लिखी पाऊब कि ना, लेकिन सोच~ थई कि एक बार ट्राई करइ में का हर्ज़ बा?:-)

Arvind Mishra said...

रेल टिप्पणियाँ चालू रखें ...

DEEPAK BABA said...

का रेल टिपण्णी चालू रखे..... इहाँ तो टिप्पणी में भी पोस्ट दकेलना चालू कर रखा है सतीश जी ने........


बहुत बदिया........ बोले तो बिंदास

प्रवीण पाण्डेय said...

तीन की सीट में आठ घर जा पा रहे हैं, पता नहीं पुण्य है कि पाप है?

गिरीश बिल्लोरे said...

सतीष भैया कमाल है. चलती गाड़ी में इतनी सधी पोस्ट वाह क्या बात है

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'
A Photo from - Thoughts of a Lens

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