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Thursday, November 11, 2010

तौलिया लपेटे शब्दों के बीच रेलवई वाली मजलिस............. सतीश पंचम

  
     दो हफ़्ते के लिए गाँव की ओर रवाना होने से पहले पेश है यह रेलियही-रीठेल पोस्ट   

  Disclaimer  : कुछ शब्द तारांकित अवस्था में तौलिया लपेटे हैं, अत:  पाठकों से निवेदन है कि शब्दों को अपनी-अपनी कल्पना शक्ति के अनुरूप समझें-बूझें,  किसी गलतफहमी के उत्पन्न होने पर दोष आप का ही माना जायगा ........लेखक या लेखक का लैपटाप इसके लिए कत्तई जिम्मेदार नहीं है :)


 - Satish Pancham 

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        मुंबई.........रात के बारह बज कर पन्द्रह मिनट ………गाँव लौटने का समय…….. गाड़ी प्लेटफार्म पर आ रही है…… सरकती हुई………कहीं कहीं से रह रह कर……..खट……खुट…..खट…..खट की आवाजें देती….…….. ..बिना रिजर्वेशन यानि  चालू वालों की लाईन में अचानक अउन पउन होने लगा है……थोड़ी हलचल सी मच गई है…….एक पुलिस वाला लोहे के गाडर पर लाठी पटक कर खन्न् सी आवाजों की धमक से लोगों को परेशान कर रहा है…….चालू वाले…….बिना रिजर्वेशन…….पुलिस वाले…….रिजर्वेशन…….……मैं प्लेटफॉर्म और उसके आसपास की हलचल देख रहा हूँ....देख रहा हूँ.......पुलिस वाला लोहे का गार्डर ठनठना रहा है........और भीड़........वह तो भीड़ ही तो है.....एकाध लाठी खा ली तो कौन बड़ी बात............कमअक्ल पुलिसिया साला........

       बोगी में घुसता हूँ……बोगी…….अजीब शब्द है। अँधेरा है । थोडी देर में लाईट आ जाएगी……लोगों का सामान के साथ आना शुरू हो गया है.......…..सूटकेस…..बोरा……चटाई……क्या गाँव में नहीं मिलती जो लिए जा रहे हैं………हां भाई…….बम्मई से लाए हैं……चटाई और बोरा न हो तो पता कैसे चलेगा……….बोरे में पत्थर ओत्थर भरे हैं क्या……काफी कड़क है……पैर में जरा सा लगा था अंधेरे में ……….……मोबाईल के टार्च अब काम आ रहे हैं……नोकिया वाले मोबाईल मे टार्च नहीं सटाते …….सीटें ढूँढने में दिखते हैं ज्यादातर चाईना मोबाईल….लगता है नोकिया बैठ जाएगा...... नोकिया बैठे या उठे...... लेकिन पहले से ये कौन बैठा है मेरी सीट पर.....उठो यार.........चालू टिकट है भई तो मुझे तो मत हलकान करो.....


ममता दी.....ओ ममता दी....तनि देखा हो....
    आप का कितना है जी……..सत्तावन……हमारा अट्ठावन…..ओनसठ……एकहत्तर है………..एक सीट लम्मे दे दिया है……कहां लम्मे है…..इधरईए तो है…….अरे भाई रास्ता छोडो……सामान साईड में कर लो……आने जाने तो दो……..ए बिजई……….अरे  उहां कहां लटका हउआ……इंहां आवा आर………पच्चीस….छब्बीस इहां हउए………..एक तो लईटिए नहीं जलाए अबहिन मादरचो*….रेलवई वाले……..सामान तो हटाईए भाई साहब….रास्ता तो किलियर करिए……..ए पुसपा……..बिट्टी के ले के हिंया आव……….रजिंन्दर……..हे रजिन्दर…….अरे इहां हौ सीट आर….उहां कहां लां* चाटत हउआ……….अरे  ई एस सीक्स है भाई ………..आपका टिकट एस सेवन का है……..जाईए…..अरे तो सामान हटाएंगे तब नूं आगे बढेंगे……..ए बोरा उधर करो भाई…….सादी का सामान है….……….सूट उधर उपर देखों एक  खिल्ला……टांगों न उधरै……..नहीं खराब नहीं होगा…..लटका रहने दो……देखा इहै……सादी पड़ी है तो केतना खियाल रख रहा है लईका कि मुड़े मड़े नहीं………..ल्ल……लाईट आय गई…..जय बम्मा माई………पंखवा चला द हो………ए मर्दे वो लाईट का बटन है…..वो देखो पंखा का निसान ओहपे है……….

    
    बुढ़िया माई को उहां बईठा दो……माई…..ए माई…….चलत हईं………पैलागी…..जियत रहा बचवा………गाड़ी चल पड़ी है…….. .हम्म…….बुढ़िया माई के पैरों में महावर लगी है……पतोहू ने रचि रचि कर लगाया होगा…….पैरों पर आढ़ी टेढ़ी लकीरें डिजाईन बना कर लगी हैं…..जरूर पतली सींक से लकीर बनाई गई होगी……..लेकिन बुढ़िया माई के तर्जनी में लाल रंग लगा है…….तो क्या खुद से रंग लगाया होगा पैरों में……पतोहू कौनो काम की नहीं………ए भाई साहब आप सामान वहां रख दिजिए तो बैठने में आसानी होगी……..अरे आप भी कमाल करते हैं…..टिकट हमारा यहां का है…….अरे तो दो जन का है…….एक ही पर बनाया है…..आर ए सी वालों का यही होता है…….. एक पर दो लोग जा सकते हैं……..तब क्या अईसे ही रेलवई लाभ ले रहा  है………..


ममता दी.....ए ममता दी......तनिक सुनिए तो.............
  बगल में मोबाईल पर कोई गाना सुन रहा है.....नो हेडफोन......नो रोक टोक.......ओनली हेडेक.......और गाना......क्या कहा जाय.............

जातारा परदेस बलमूआ…….
छोड़ के आपन देस बलमुआ……
का देखईब पंडित जी से…..
खोल के पोथी पतरा………. .
एगो चुम्मा ले ल राजाजी….
बन जाई जतरा…..
जातारा परदेस बलमुआ……..

    हम्म तो पंडितों का पोथी पतरा देखना इसलिए कम हो गया क्योंकि चुम्मा आड़े आ गया………गाना भी तो खूब गाया है……चलिए टिकट बताईए……..आप का……आप का…….पैन कार्ड…….नहीं तो कुछ तो होगा……ड्राईविंग लाईसेंस……..नहीं तो केवल झेराक्स मान्य नहीं है….. आप कोई प्रूफ दो तब ही आपका टिकट मान्य होगा…..चलिए आप दिखाईए……..आप का…….अरे भई बोला न कुच्छो नहीं हो सकता………


ममता दी......ए ममता दी.........अरे तनिक .......सुनू रे.......
  मैं अपनी सीट पर इत्मीनान से बैठ जाता हूँ.......स्लीपर क्लास........पूरे रास्ते स्लीपर पर स्लीपते हुए जाना चाहता हूँ.......रफी की तरह गाते हुए......वफा कर रहा हूँ वफा चाहता हूँ..........पैसे भर चुका हूँ.....अब मजा चाहता हूँ.......लेकिन मजा.........स्लीपर क्लास में नींद का मजा..........क्या मजाक है :)

  का हो.....कौन गाँव.....जिल्ला...... आप कहाँ तक जाएंगे....... आप गए हैं वहाँ पर....... नहीं.....वहां कभी गए तो नहीं पर सुने जरूर हैं.......त  ...सुनिए...... गोसांई जी कहिन हैं कि....बड़े भाग मानस तन पावा............उफ् ये गर्मी...........और ये गोसांई जी.......लगता है पकाए बिना न रहेंगे...........पकाओ गुरू......बड़े भाग मानुस तन पावा..........

 नींद का झोंका आ रहा है......गोंसाईं जी जारी है...... त कहें हैं गोसाईं जी रमायन में ......।


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      उम्मीद करता हूं इस बार वह पकाऊ यात्री नहीं मिलेगा........वैसे भी..... बस उम्मीद ही कर सकता हूँ........क्योंकि मिलना न मिलना तो सीट नंबर  पर निर्भर है.....पता चले उससे भी ज्यादा पकाऊ मिल जाय और रमायन की जगह  फिल्मी महाभारत  पाठ करे -   सलमनवा बहुत मस्त डांस करता है......अभिसेकवा को कुच्छो नहीं आता है.....कटरीनवा बहुत भली लगती है......असवरिया तो अब बूढ़ाय गई है......औ अच्छे कुमार.......

  चुप्प साले.........

 इससे अच्छा तो वो गोंसाई जी वाला यात्री था....कम से कम पकाता तो विधि से था   :)


- सतीश पंचम

स्थान –  वहीं जहां पर कि 'पुराना दो नया लो' का 'चव्हाण एक्सचेंज ऑफर' चल रहा है।

समय   गाँव जाने से एक दिन पहले वाला अटपटीया टाइम.....न कुछ धरते बनता है न उसरते........ कपड़े प्रेस प्रूस करके रखना है....... .गमलों को पड़ोसी के हवाले करना है.......कुंजी ताला ढूँढ ढाँढ कर रखना है......और सबसे बढ़कर..... अभी बर्तन मांजना है  :)

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9 comments:

देवेन्द्र पाण्डेय said...

..बड़ी जल्दी खत्म कर दीए..! सो गए थे का ?

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

ईल्लेव, अमौसा बिताकर अब छऽठ पर घऽर जा रहे हैं। जाना ही था तो गाँव की दिवाली भी देख आते।

वैसे मैं तो बिल्कुल ही नहीं जा पाया।
ममता दीदी की रेल का अच्छा चित्र खींचा है। कवि आलोकधन्वा की एक कविता याद आ रही है-

हर भले आदमी की एक रेल होती है
जो माँ के घर की ओर जाती है


सीटी बजाती हुई
धुआँ उड़ाती हुई।



(1994)

Poorviya said...

वफा कर रहा हूँ वफा चाहता हूँ..........पैसे भर चुका हूँ.....अब मजा चाहता हूँ.......लेकिन मजा.........स्लीपर क्लास में नींद का मजा..........क्या मजाक है :)

केवल राम said...

क्या कहूँ ..ऐसे ही चलता है ...आगे से ध्यान रखियेगा ..शुक्रिया

sanjay said...

kahan chal dela ho pancham da .....
jaldiye laut ke abiha........

hum t' chandigarh me baithle .......
tiren se bihar apna gaon ho aili....


pranam.

निर्मला कपिला said...

सुना कुछ ममता दी ने?

rashmi ravija said...

जबरदस्त रही रीठेल....पहले भी पढ़ा था..पर दुबारा पढ़कर उतना ही मजा आया....हैरान-परेशान सी ममता दी और उन्हें पुकारने वाले का चेहरा कौंध गया...आँखों के सामने..

लौटने पर एक और ऐसे ही कोलाज़ की अपेक्षा है...कुछ और दृश्यों से साक्षात्कार होगा...
आपकी यात्रा,मंगलमय हो :)

PD said...

और टीटी को पैसा खिलाने वाला दृश्य हम लिखेंगे क्या?
जल्दी से वो भी ढूकाइये.. ऊ का कहते हैं, एडजस्स कीजिये कहीं पे..

प्रवीण पाण्डेय said...

रोचक, और कुछ नहीं कह सकेंगे।

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