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Sunday, November 7, 2010

बर्तन माँजना भी एक कला है.....द ब्लैक आर्ट ऑफ..........सतीश पंचम

     बर्तन माँजना भी एक कला है.... अब यह बखूबी जानने लगा हूँ , क्योंकि आजकल घर के बर्तन मुझे खुद जो माँजने पड़ रहे हैं।

        पहले होता था कि खा लिया, सरका दिया। बहुत हुआ तो जूठे बर्तन उठा कर सिंक में रख आया। बाकी काम श्रीमती जी के पल्ले। लेकिन अब, जबकि घर के ज्यादातर लोग बाहर हैं, ऐसे में सारे काम मुझे खुद करने पड़ रहे हैं, तो हर काम में मुझे एक तरह की कला दिखाई पड़ रही है। एक तरह की क्रिएटिविटी नज़र आ रही है। 

     अब इसे ही देखिए कि जब मैं बर्तन धोने बैठता हूँ तो एक ओर कड़ाही दिख रही है जो किसी पाषाण काल के हेलमेट का प्रतिरूप दिखती है तो दूजी ओर अलसाया सा एक पतीला है, जिसे मानों अपने धोये जाने की कोई  जल्दी नहीं है। शायद कहना चाहता है कि जब तुम्हारा मन करे तो धो देना नहीं तो ऐसे ही रखोगे तो भी चलेगा। कहां मुझे गोरा होना है।  बाकी के चम्मच, कटोरी तो खैर है ही। थाली, लोटा कलसी.....और वो कलछुल। कम्बख्त हर वक्त कम्युनिस्टों सा कटकटाया-कर्राया रहता है, मानों कह रहा हो कि यदि मैं न होता तो तुम भूखे रह जाओ। 

      वैसे भी जब अपने पर पड़ती है तो बर्तनों का कैसे कम से कम उपयोग किया जाय यह कला खुद ब खुद आ जाती है। पहले तो ऐसी डिश ही नहीं बनाता जिसमें कि ज्यादा बर्तन 'चहँटियाये' याकि ज्यादा बर्तन फंसे।  तेल वाले पदार्थ यथासंभव कम से कम बनाता हूँ ताकि तेलियान बर्तन माँजने में कम मशक्कत करनी पड़े और साथ ही साथ हृदय को भी आराम रहे....'रक्त-फ्लो बिन सफोला जिन्दाबाद' । 

    एक और शार्टकट ये सीखा कि खाने के बाद बर्तन तुरत फुरत धो देने से वह जल्दी साफ हो जाते हैं और पानी भी कम लगता है। बर्तन बिना ओसकन लगाये ही केवल खंगाल पर देने भर से फरचा हो जाते हैं, नये से हो जाते हैं। अगर बाद में धोने के लिये रख दिये या देर कर दिये तो कटकटा जाते हैं, कर्रा जाते हैं। ऐसे में बाद में उन्हें खूब रगड़ना पड़ता है। 

   वहीं, बर्तन माँजते समय एकाध बर्तन जले हुए भी रहते हैं। ऐसा होना लाज़िमी भी है। मैं अक्सर दूध रख कर टीवी देखने लगता हूँ.....कहीं पर मनमोहन सिंह  गंभीर विचार विमर्श कर रहे होते हैं तो कहीं पर मुन्नी बदनाम हो रही होती है, तो कहीं पर गीत चल रहा होता है - ताकते रहते  तुमको... साँझ सवेरे।  इस ताकाताकी में गैस पर दूध रखा था ये भूल जाता हूँ।  उसका असर ये होता है कि गर्म हो रहा दूध धीरे धीरे पतीला पकड़ लेता है और समय बीतने के साथ पेश करता है एक अलग किस्म का आर्ट - 'द ब्लैक आर्ट ऑफ दूधिज्म'

     और उस 'ब्लैक आर्ट ऑफ दूधिज्म' का ही कमाल होता है कि जल कर काला पड़े बर्तन को थोड़ी देर के लिए अलग रखना पड़ता है ताकि पहले साधारण बर्तनों को साफ कर लिया जाय, बाद में इस जले बर्तन को धोया जाय।  उधर जला बर्तन खुद को कश्मीर की तरह उपेक्षित सा महसूस करने लगता है। उसे लगता है कि उस पर जान बूझकर तवज्जो नहीं दी जा रही। और जब उस जले बर्तन को चम्मचों से छुड़ाया जाने लगता है तो किर्र कुर्र की आवाजें आने लगती हैं, ऐसे में डर लगा रहता है कि कोई अरूंधती न आ जाय जो कि बर्तनों को हो रही पीड़ा को मुद्दा बना ले और कहे कि यह बर्तन तो आपके हैं ही नहीं। शुरू से आपने इसे अलग रखा है। अब उन्हें कौन समझाये कि बात यहां बेध्यानी की ही है। चाहे कश्मीर हो या बर्तन, यदि समय रहते ध्यान देकर आँच से हटा लिया गया होता तो ये जलते नहीं। अब जब जल ही गये हैं तो उन्हें साफ करने के लिए रगड़मपट्टी जरूरी है और इस प्रक्रिया में चूँ...चाँ...किर्र...कुर्र....आवाजें आएंगी ही। उन्हें आप बर्तनों की पीड़ा समझें तो यह आपकी प्रॉब्लम है।   

         खैर, जैसे तैसे बर्तनों को धोता हूँ.......भले ही मांजते वक्त छोटे बर्तनों से शुरूवात करूं  लेकिन धोते समय पहले बड़े बर्तन...फिर उससे कम  बड़े बर्तन....औऱ फिर सबसे कम बड़े बर्तन। अर्थात मैं एकदम सरकार की तरह काम करता हूँ, पहले बड़े इंडस्ट्रीज पर तवज्जो देता हूँ फिर मध्यम आकार के उद्योगों पर और अंत में लघु उद्योगों पर। इस तरह से पहले ही चौड़े बर्तनों के धोने का एक लाभ ये होता है कि उनमें बाद में धोये जाने वाले छोटे बर्तनों को रखने में आसानी रहती है जिसके चलते बर्तन धोवन कार्यक्रम निपटने पर उन्हें एक साथ उठाकर यथोचित स्थान पर रखा जा सकता है। वरना तो यदि पहले छोटे बर्तन अर्थात लघु उद्योंगों पर ध्यान देता तो उन्हें समाहित करने के लिए आसपास जगह ढूँढनी पड़ती और आप तो जानते हैं कि बात चाहे छोटे बर्तन धोकर रखने वाली जगह की हो याकि देश में लघु उद्योग वाली जगह की, समस्या बनी ही रहती है। जगह की शॉर्टेज तो है ही।  फिर बड़े बर्तनों अर्थात बड़े उद्योंगो के लिए सिंगूर, दादरी जैसा विवाद हो जाय तो आश्चर्य कैसा। छोटू बर्तन मांजने के क्रम में संभव है कि बार बार उठकर  बर्तनालय तक दौड़ लगानी पड़े। इसमें समय और उर्जा की बरबादी है। 
   
        ऐसे में मेरे घर के लघु उद्योग यानि कि छोटे बर्तन कटोरी, चम्मच, गिलास तक मेरी इस फितरत को समझने लगे हैं। एक तरह से उन्होंने अपने आप को भाग्य के भरोसे छोड़ रखा है कि जब बड़े बर्तन यानि कि बृहद उद्योग साफ सुथरी अवस्था में बर्तनालय की ओर प्रस्थान करेंगे तो उनके भीतर समाहित ये छोटे बर्तन एक तरह से शैडो इंडस्ट्री के तौर पर खुद ब खुद समाहित हो जाएंगे। ऐसे में क्या जल्दीयाना। जो होगा देखा जायगा।



     लघु उद्योगों पर सरकार क्यों इतना तवज्जो नहीं दे रही यह मुझे बर्तन धोने की प्रक्रिया से ही पता चल सका है। फिलहाल तो देख रहा हूँ सरकारें अलग अलग बैठकर बर्तन मांज रही है, राज्य सरकार..... केन्द्र सरकार...... मिलीजुली सरकार.....अच्छी सरकार......बुरी सरकार ...... टिकटिम्मा सरकार। सभी लोगों के अलग अलग बर्तन हैं........अलग अलग मांजनालय हैं, लेकिन सबके बर्तन मांजने का तरीका एक ही है.......शुरआत में मांजने कि लिए भले ही लघु बर्तन लिये जायें पर धोते समय, चमकाते समय.......पहले बड़े बर्तन......फिर छोटे बर्तन.... फिर....फिर  :)

     


 - सतीश पंचम

स्थान - वही, जहां पर गाँधी जी से संबंधित एक एतिहासिक स्थल मणिभवन के आसपास के नारियल के पेड़ो से नारियल इस आशंका में काट कर गिरा दिये गये कि कहीं ओबामा के वहां विजिट के दौरान कोई नारियल उपर से गिर न जाय और किसी को घायल नही कर दे। 

समय - वही, जब ओबामा गाँधी जी से जुड़े किसी एतिहासिक स्थल को जाकर भेंट दे रहे हों और उसी वक्त टीवी पर मुन्नाभाई की गाँधीगीरी वाली फिल्म चल रही हो, जिसके लाइब्रेरी वाले दृश्य में चायवाला बच्चा कहे -  "सब येड़े आते हैं इधर" :) 

( 'थिंकर' और लाइब्रेरी का  चित्र - नेट से साभार )

34 comments:

Majaal said...

एक सफल आदमी के पीछे एक औरत होने का तो मालूम नहीं, पर एक सफल लेखक के पीछे एक औरत के न होने का आभास हमें इनदिनों जरूर होने लगा है ....

लिखते रहिये ...

गिरिजेश राव said...

सोच की रेंज देख रहा हूँ और धार देख रहा हूँ। दूधिज्म, कश्मीर, इंडस्ट्री...सब एक से बढ़ कर एक!
एक ठो विचार आया है - अरुन्धति देवी बरतन कैसे माँजेंगी? या माँजती होंगी?

you r simply the best! चने की झाड़ वगैरह नहीं चलेगा कुछ और चाहिए।
भाभी जी को गाँव कुछ दिन और रहने को बोल देते हैं।

प्रवीण पाण्डेय said...

अब आया है ऊँट पहाड़ के नीचे। अच्छे से कार्य करें, हर विरह मन की शक्ति बढ़ाता है।

केवल राम said...

घर मैं तो आदमी अपने आप को पता नहीं क्या समझता है , जिन्दगी की सच्चाईया तो घर से बहार पता चलती हैं ....आप भी महसूस करना और मुझे घर से बहार दस साल हो गए मम्मी के हाथ से बना खाना तो अब कल्पना हो गया ...खेर खुद को खुश रखें ...और बर्तन मांजने का आनंद लीजिये !

विवेक सिंह said...

पोस्ट अच्छी बन पड़ी है ।
"मनमोहन सिंह गंभीर विचार विमर्श कर रहे होते हैं"
इस पंक्ति में अतिशयोक्ति अलंकार का प्रयोग हुआ है ।

anitakumar said...

हा हा! हमने कभी बर्तन मांजते इतना सोचा ही नहीं कि ये भी कला है।सच है पत्नि वियोग ही आदमी की सफ़लता का राज है। ये भी देख रही हूँ कि एक आदमी और नारी की सोच में कितना फ़र्क है, मैं पहले छोटे बरतन धोती हूँ फ़िर मध्यम आकार के और सब से आखीर में बड़े बरतन

rashmi ravija said...

हम्म ये बर्तन मांजते-मांजते इतने विचार दिमाग में इसलिए घुड़दौड़ करते रहें क्यूंकि कोई आवाजें नहीं लगा रहा होता, ना..."अरे जरा एक कप चाय दे जाना " या..'मेरी पेन्सिल नहीं मिल रही'...'भैया ने मेरी नोटबुक फाड़ दी :)'

jokes apart...बहुत ही बढ़िया पोस्ट आपके अपने अंदाज़ में.

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

आपने तो बर्तन माँजत-माँजते जबर्दस्त मंथन कर डाला। जैसे कोई कुशल दर्जी गोटेदार लहंगा सिल रहा हो। एक से एक चुन्नट डाली है आपने इस घरेलू काम की ईमानदार पोस्ट में। सैल्यूट करने का मन करता है।

Udan Tashtari said...

हा हा!! अब समझ में आया..यहाँ की सोचो..बीबी सामने है तब भी हम ही मांज रहे हैं. :)

मो सम कौन ? said...

लगे रहो पंचम भाई.....। शुरू के दो कमेंट्स को हमारा भी समर्थन(कलछुल आई मीन वामपंथियों की तरह बाहर से)।

अनूप शुक्ल said...

ये दोनों चित्र देखकर ऐसा लग रहा है जैसे कि बर्तन धोने के पहले और बर्तन धोने के बाद के सीन हों। :)

जिस गति से यहां देश की समस्यायों के समाधान निकले उससे लग रहा है कि राजनीतिक पार्टियों को अपन चिंतन शिवरों की शुरुआत बर्तन मंजाई से करनी चाहिये।

Tarkeshwar Giri said...

Lage raho................. Pancham Bhai.............................

Tarkeshwar Giri said...

Lage raho................. Pancham Bhai.............................

वाणी गीत said...

पता लग गया ना ... बर्तन धोते- मांजते भी दिमाग के कीड़े कुलबुलाते रहते हैं ...
अब सोचिये जो लोग हमेशा ये काम करते हैं , वे कितने बड़े सर्जक हो सकते हैं , लोग कर आयें तो उनकी सृजनधर्मिता को भी प्रोत्साहित कर दीजियेगा ...!

ajit gupta said...

आज तो सुबह सुबह आनन्‍द आ गया। बर्तन मांजना भी वाकयी में कला है, जब काम करने वाली नहीं आती है तो बेचारे बर्तन हमारे हत्‍थे चढ़कर कभी चिकने से बने रहते हैं तो कभी फीके से। सफेदी की चमकार दिखायी ही नहीं देती। दूध से जली भगोनी तो आज तक छत पर पड़ी है, उस पर आप अपने हाथों को आजमा रहे हैं तो आप महान हैं। भाई हम भी ज्‍यादा कुछ नहीं लिख रहे हैं कहीं अरूंधति आकर बर्तनों से हमारा बहिष्‍कार ही ना करा दे। बहुत अच्‍छी पोस्‍ट। आज तो पूरे 10 नम्‍बर मिलते हैं।

sanjay said...

rapchikatmak........


pranam.

Poorviya said...

pak kala ke baad yeh kala bhee mahatavpurn hai aaj pata chala .

बी एस पाबला said...

ब्लैक आर्ट और अरूंधति!

बड़ा लम्बा पैमाना है :-)

Arvind Mishra said...

जब ऊँट पहाड़ के नीचे आता है तब ऐसे कई नट - करतब दिखता है .-
आप को अब यह भलीभांति समझ आ जाना चाहिए कि भारत में अल्केमिया शास्त्र के विकास में एकल -पुरुष रसोईं और रसोईयों का कितना भारी योगदान रहा होगा .!
हम भी ऐसे गुल गुलगुले खिला /उड़ा चुके हैं .....बाद में सब छोड़ दिए --ऐसा छोड़ा कि एक बार तो दो माह बाद जब सिंक साफ़ करने की नौबत (श्रीमती जी ) आयीं तो उसमें से कई बोनसाई उग चुके थे जिसे उन्हें एक पानीपत सरीखे युद्ध के बाद गमले में प्रत्यारोपित करना पड़ा ..
घबराईये नहीं भाभी जी के आने की देर है ..हम यही से त्रिशूल वगैरह भी सामानों में रखवा दे रहे हैं !

डा० अमर कुमार said...


मेरी टिप्पणी लम्बित समझी जाये,
पोस्ट को अभी ठीक से घोंटा जायेगा, फिर..

आदरणीय लेखक यह स्पष्ट करें कि उन्होंने ऎसा क्या बनाया था कि, इतने सारे बरतन इक्कट्ठे हो गये ।
दूसरे कि वह गँदे बरतन छोड़ कर यह पोस्ट बिसूर रहे हैं, महज़ अपनी पत्नीश्री को दिखलाने वास्ते यह पोस्ट चेंप रहे हैं ।
तीसरे यह कि यदि वह अपने किसी मित्र को थोड़ी चतुराई से खाने पर निमँत्रित कर लिया करें, फिर बाद में थके होने का हवाला देते हुये पात्र-पक्षालन प्रक्रिया में मित्र को हाथ बँटाने का पर्याप्त सुअवसर देते हुये विश्राम किया करें ।

ध्यान रहे कि मेरी टिप्पणी लेखक द्वारा स्पष्टीकरण की अपेक्षा में अभी लम्बित है !

Raviratlami said...

केएफसी, पिज्जाहट काहे खुले हैं? उनकी सेवाएँ 24X7 हैं. नहीं तो टॉप रमन का कप्पानूडल भी है. और अपने इधर तो डिस्पोजेबल का बड़ा बोलबाला रहता है 'ऐसे दिनों'.
बाकी आपकी व्यंग्यात्मक नजर कमाल की है, बटलोही भर :)

Shiv said...

वर्तनी चेक करने वाले गिरिजेश जी बर्तन देखकर खुश हैं. और खुश होने का कारण भी है. पोस्ट बहुत मस्त है. ऐसी-ऐसी बातों का जिक्र कि जो बर्तन न मांज सके वह लिख ही नहीं पाए. एकदम पक्की झकास पोस्ट.

सतीश पंचम said...

अमर जी,

चूंकि आपकी टिप्पणी प्रलम्बित है, अत: उसको और लम्बित न करते हुए पेश है मेरा स्पष्टीकरण। इसी से आप अंदाजा लगा लिजिए कि कितने बर्तन जुटते होंगे धोते बखत :-)


प्रथमत: ऐसा कुछ विशेष नहीं बनाया था कि इतने सारे बर्तन लगें, लेकिन

सुबह - मैगी बनाया - एक पतीला + एक चम्मच।

दोपहर - दाल चावल - एक कुकर + एक थाली + एक ताजा पतीला ( ध्यान रहे कि मैगी वाला पतीला अब भी सिंक में है)

शाम- कांदा-पोहा- एक कड़ाही + एक थाली+ दूसरा चम्मच (मैगी वाला चम्मच अब भी सिंक में :-)

अत्यधिक शाम - दूध गरम किया गया - एक पतीला (जो कि मुन्नी बदनाम देखने के चक्कर में जल गया :-)

फिलहाल ये जो बर्तन गिनाया हूँ सब उल्लेखनीय किस्म के हैं। बिना उल्लेख वाले बर्तन अब भी फ्रिज में हैं...किसी में कल की दाल है,किसी में परसों का चावल तो किसी में पड़ोस से आई खीर।

इन्हें मैं बच जाने पर फ्रिज में हमेशा यह सोच कर रखता हूँ कि बाद में खा लूंगा लेकिन अगले दिन फिर से ताजा दाल चावल बनाता हूँ (इंडियन मेंटेलिटी :-)

उम्मीद है आपकी टिप्पणी प्रलम्बिता अब लागूता में बदल जायेगी :-)

वन्दना said...

सिर्फ़ बर्तन माँजना ही नही बल्कि लेख को समाजिक दृष्टि देना भी एक कला है और उसमे आप निपुण हैं ही……………बेहद रोचक पोस्ट्।

गिरिजेश राव said...

Point noted - पड़ोस से आई खीर

अल्पना वर्मा said...

यह एक कला है बेशक!
आप लेकिन बड़ी ही जल्दी सीख गए .उम्मीद है आप की दी गयी टिप्स सभी[नौसिखियों] के काम आएँगी.

Shah Nawaz said...

:-)

Rahul Singh said...

परिस्थितियां बनती रहें, सिद्धांतों का प्रतिपादन होता रहेगा, हम स्‍वागत को तैयार रहेंगे.

डा० अमर कुमार said...

टिप्पणी अब क्या देवेंगा जी ?
गिरिजेश भाऊ ने खीर का कटोरा पहले ही थाम लिया !
इधर को पब्लिक का सिम्पैथी मिला तो बरोबर,
उधर अपुन का भाई पड़ोस की खीर उड़ायेला है ।
भाई पईलेइच बोलने का था न, पड़ोसी का कटोरी माँजने पिच्छू अक्खी दुनिया की फिलासफ़ी मगज़ में चढ़ेली ए ।
मैन इधर पब्लिक का सिम्पैथी मँगता, उधर पड़ोसी को माई पिलेज़र बोलता, तुमकू टिप्पणी अब क्या देवेंगा जी ?

Lalit said...

पंचम सर, अब हमके बुझाइल ऊ कहवतावा के माने " जब पेटवा भरल रहता है तब दूरे की सूझती है".
आ गिरिजेश भाई त पड़ोसिये के खीर को ले के ऐसे चल दिए जैसे की समुन्द्र मंथन के बाद विष्णु जी लक्ष्मी जी को ले के चल दिए....
अरे हमहूँ लाईने में हैं.

हर दृष्टिकोण से झंझोरने वाली रचना, और हर स्तर से प्रशंसनीय. अइया हमारी ठीके कहती थीं कि "जहां ना पहुंचे रवि तहां पहुंचे कवि"

ज्ञानचंद मर्मज्ञ said...

बर्तन मांजते मांजते आपने यथार्थ का बोध करा दिया!
-ज्ञानचंद मर्मज्ञ

हरीश प्रकाश गुप्त said...

आपकी पोस्ट दर्शाती है कि जिन्दगी की महत्वहीन सी गतिविधियों के माध्यम से कैसे व्यंजना की जा सकती है।

साधुवाद।

Sadhana Vaid said...

बेहद रोचक और आनंदवर्धक आलेख ! ईश्वर से प्रार्थना है इस मुश्किल घड़ी से वह आपको फ़ौरन मुक्ति दिलाएं !

Mahendra Arya said...

बहुत खूब ! आपके व्यंग्य ने स्वर्गीय शरद जोशी जी की याद दिला दी . कुछ नहीं में से बहुत कुछ खोज निकलने की कला - बहुत कम व्यंगकारों में होती हैं . आप तो बर्तन मांजने में एक पूरा दर्शन लिख सकते हैं . बहुत साधुवाद - एक उत्कृष्ट रचना के लिए !

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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