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Tuesday, November 2, 2010

थोड़ा सा मैगियॉटिक हो जाये..........सतीश पंचम

      आज कल मेरे यहां बच्चों के स्कूल की छुट्टियों के चलते श्रीमती जी गाँव गई हुई हैं। ऐसे में रोजाना के घरेलू काम मुझे खुद ही करने पड़ रहे हैं। सुबह उठ कर बर्तन भांडे घिसो, कपड़े वपड़े धोओ। दूध वाले को थोड़ा टोका टाकी करो। कल दूध में पानी था.....आज दूध में शहद है .........वगैरह वगैरह।



      इन्हीं सब चिलगोजईयों के बीच होम मिनिस्टरी के बाहर होने पर साल में कुछ दिन ऐसे ही होते है जब मुझे अटरम पटरम खा कर गुजारा करना पड़ता है। हाँ इसे गुजारा ही कहूंगा। चावल दाल बना लेता हूं….थोड़ा बहुत रोटी वगैरह भी सेंक-सांक लेता हूं.....लेकिन मुझसे रोटी ऐसी बनती है, कि लगता है जैसे हिन्दुस्तान-पाकिस्तान-चीन का कोई नक्शा हो।

       कभी कभी तो कविता सी फूटती है उन्हें देख कर....छंद और लय के पैकेज के साथ.........और कहीं कहीं तो रोटी का कोई किनारा पाकिस्तान बार्डर सा दिखता है तो दूसरा चीन की सीमा से सटा हुआ लग रहा होता है.....कभी-कभार अरूणाचल प्रदेश की भी झलक दिख जाती है। ऐसे में अपनी बनाई रोटियों को देख मुझे तो पूरा विश्वास है कि यदि भारत सरकार को पता चल जाय कि मैं ऐसी रोटियां बनाता हूँ जिसमें भारत के कुछ हिस्से को पड़ोसी मुल्क कब्जाये हुए हैं तो संभव है वह मुझे नक्शे से छेड़छाड़ करने के आरोप में गिरफ्तार तक कर ले। अगर गिरफ्तार न भी करेगी तो कम से कम मुझे चेतावनी तो दे ही सकती है कि आइंदा इस तरह की रोटियां मत बनाया करो। और यही वजह है कि मैं रोटी बनाने से दूर भागता हूँ और उतने दिन जब तक की श्रीमति जी बच्चों के स्कूल खुलने तक वापस नहीं आ जातीं, किसी तरह अटर पटर खा कर गुजारता हूँ।
छलका ये जाम.....

     और अटर पटर भी क्या......ब्रेड, बटर, जाम, बाजार से लाई हुई तमाम बिस्कुट वगैरह तो होते ही हैं, लेकिन सबसे ज्यादा पसंद आती है मैगी।

      वही मैगी, जो चंद सेकण्डों में ही बन जाती है। ज्यादा नहीं कुल मिलाकर यही कोई एक सौ बीस सेकण्ड का समय लगता है, थोड़ा बहुत इधर या उधर प्लस माइनस पकड़ लो, इससे ज्यादा क्या लगेगा बनाने में।   और बनाना भी क्या है.... पानी डालो, उबालो, मैगी डालो, थोड़ा बना बनान मिरिच मसाला छोड़ो और तुरंत ही तइयार.... न आँटा गूँथने की झंझट न रोटी बनाने की कवायद।

     शायद यही वजह है कि होस्टल आदि में पढ़ रहे लड़के भी इसी पर भरोसा करते हैं। तभी तो रात-बिरात कहीं किसी को भूख लगी तो चढ़ गई देग मुहाने पर। आँच देने की देर है, फिर तो पानी का उबलना कब हुआ, कब मसाला पड़ा, कब मैगीयाना हुआ पता ही नहीं चलता। और खाने में भी तो स्वादिष्ट ही है।

    समय की बचत अलग होती है। जिसका भरपूर उपयोग बच्चे अपने पढ़ने में करते हैं....(जो नहीं करते वो कुछ और करते हैं)। यदि समय की बचत वाला हिसाब ही अगर जोड़ने जाड़ने लगा जाय तो पता चले कि इस मैगी ने  न जाने कितना अतिरिक्त समय देश को मुहैया कराया है। उसी अतिरिक्त समय का असर है कि न जाने कितने बच्चे आई ए एस, पीसीएस कर लिए हैं, कितने तो डॉक्टर बन गये और कितने अभी लइनियाए हुए हैं।

   खैर,  मैं तो कहता हूँ कि मैगी कंपनी को पद्म पुरस्कारों से नवाजा जाना चाहिए,  न कि बाबा रामदेव सरीखा विरोध करना। बाबा रामदेव का क्या है...वो क्या जानें मैगी का आनंद। कभी रोटी बनानी पड़े तो पता चले कि कितना टिकटिम्मा है उसमें। कभी पानी ज्यादा हो जाता है आँटा गूँथने में तो कभी कम। उसे एडजस्ट करते करते पता लगता है बनाने जा रहे थे पांच रोटी, बन गई आठ रोटी। हो गया न वेस्टेज। समय का समय लगा और उपर से इंधन, अनाज सब की बरबादी। आदमी झख मार के बाकी की ज्यादा बनी तीन रोटियां खा जायेगा। न भी खाये तो भोजन बासी हो ही जायगा। न किसी को देते बनेगा न लेते।

      उधर मैगी को देखिए...पानी ज्यादा हो गया तो कोई परवाह नहीं, सब सड़प-सुडूप के सफाचट्ट। बचा हुआ पानी पी लो। अंग ही लगेगा।

रोटी भला इतनी सारी छूट देती है कभी ?

   इन तमाम फ़ायदों, आयदों को देखकर कभी-कभी तो मुझे लगता है कि मैगी को ‘नेशनल व्यंजन’ के तौर पर मान्यता दे ही देना चाहिए। मसलन, दक्षिण में रोटी ज्यादा नहीं खाते और उत्तर में चावल, पूरूब में मछली ज्यादा खाते हैं तो पच्छिम में दाल में भी शक्कर झोंक दी जाती है। सबका अलग-अलग व्यंजन है। लेकिन एक मैगी ही है जिसे सब खाते हैं। चाहे उत्तर का हो या दक्षिण, पूरब का हो या पच्छिम का। नो भेदभाव।

   और  जहां तक फिक्र है लोगों की,  तो कुछ लोग तो यूँ ही पकर पकर करते रहते हैं..... उनकी आदत होती है मीन-मेख निकालने की.....।  कुछ कहते हैं कि मैगी के रेशे कीड़े की तरह लगते हैं, तो कुछ को केंचुए की तरह लगते हैं। कोई कहता है, उसमें मैदा होता है, जंक फूड है.... ये है वो है। तो मेरा मानना है कि ऐसा ज्यादातर, वही लोग कहते हैं जिन्होंने कभी मैगी नहीं चखी हो।

      ठीक वैसे ही, जैसे कि शराब की बुराई करने वाले लोग। शराब की ज्यादातर बुराई भी वही लोग   करते हैं जो शराब नहीं पीते। एक बार उन्हें शराब पिला दो तो मजाल है जो उनके मुँह से शराब के खिलाफ कोई बात निकले। खिलाफ की कौन कहे, पीछे पड़ जाएंगे कि ... और दो, इतने से काम नहीं चलेगा.....और चाहिए।

    तो मित्रो, आप लोग भी मैगी खाओ.....बच्चों को खिलाओ....समय बचाओ....। बचे हुए समय से पोस्टें लगाओ .....मैगीयॉटिक पोस्टें......जॉमियॉटिक पोस्टें.....ब्रेडियॉटिक पोस्टें। 

     वैसे भी,  जब तक श्रीमती जी नहीं आ जातीं, इसी तरह मैगीयॉटिक बने  रहूंगा, गुणगान करते रहूंगा मैगी के। वरना,  यह तो मैं भी जानता हूँ कि बिना रोटी, मुझे भी नहीं चलता  :)


- सतीश पंचम

स्थान –  वही, जहां पर  ‘ससुराल गुलज़ार है...... बजरिए मुख्यमंत्री’

समय – वही, जब ससुराल पक्ष के कई लोगों के नाम फ्लैट आबंटन करवाने का खुलासा होने के बाद दमाद जी अपने घर में घुस रहे हों और बगल के कमरे से मां की नज़रें कुछ खो जाने का एहसास पाल रही हों।

(चित्र : साभार, नेट से )

13 comments:

DEEPAK BABA said...

2 minutes..............



..बाद में मैगीयॉटिक कॉमेंट्स ............

rashmi ravija said...

बढ़िया रही ये मैगियाना पोस्ट....घर में बच्चों की मैगी की जिद....सहेलियों से कथा....मैगी की.... कि बच्चों को मैगी बना कर दे दो...वे खुश..टी.वी. खोलो मैगी का ही विज्ञापन...
और अब ,ब्लॉग पर भी मैगी महिमा..
बचाओ..!!!!

मो सम कौन ? said...

तो पैरोल पर चल रहे हैं जनाब:)

जब पहली बार मैगी खरीदकर लाये थे(अपनी पाकेटमनी से पैसे बचाकर) तो जबरन खत्म करनी पड़ी थी कि कहीं घर में मजाक न उड़ाया जाये। आज मैगी आलटाईम हिट ऐंड फ़िट फ़ास्टफ़ूड है। टेस्टबड्स भी समय के साथ बदल जाते हैं शायद।

मस्त मैजिक मसाला पोस्ट।

Vivek Rastogi said...

मैगी की जय हो, ब्रेड जैम और ब्रेड टोस्ट की जय हो, यही तो कुंवारो और फ़ोर्स्ड कुंवारों का सहारा है।

आओ मैगियाटिक हो जायें... पंच लाईन है मैगी को बेच देते हैं, शायद मैगी कंपनी जिंदगी भर फ़्री में मैगी सप्लाई करने को तैयार हो जाये।

Lalit said...

तो अब पंचम जी भी MBA (Married but Bachelor Again) हो गए. बढ़िया है अब कुछ दिन पंचम जी का सप्तम नहीं, पंचम स्वर ही सुनने को मिलेगा.

मैगी महिमा अच्छी लगी.

Arvind Mishra said...

हूँ तो इन दिनों अमेरिकन वे आफ लिविंग से गुजारा भत्ता चल रहा है -कल्पनाशीलता ठाठें मार रही है!
पीने पिलाने की बात तो इधर भी है !

प्रवीण पाण्डेय said...

बिन रोटी सब सून,

भूख मिटा दे,
पर न बढ़ावत,
देही मा कुछ खून,

बिन रोटी सब सून,
रे साधो
बिन रोटी सब सून

anitakumar said...

मैगी रानी जिंदाबाद,

Suresh Chiplunkar said...

मैगी के बारे में तो पता नहीं, लेकिन शराब के बारे में आपने अपने सारे अनुभव ग्लास में दो पैग बराबर उड़ेलकर रख दिये… :)

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

जिसकी खाओ - उसकी गाओ... बढ़िया है।
बीबी बाहर - मैगी अंदर... बढ़िया है।
रोज की रोटी - हो गयी खोटी... बढ़िया है।
समय बचाकर - बन जा ब्लॉगर... बढ़िया है।

sanjay said...

chator post....chatakhdar tippaniya..


pranam

VICHAAR SHOONYA said...

आज की मेरी टिप्पणी सिर्फ आपको व आपके परिवार को दीपावली की शुभकामनायें देने के लिए है. मेरी तरफ से ये दिवाली आपको मंगलमय हो.

वन्दना अवस्थी दुबे said...

दीपावली की असीम-अनन्त शुभकामनायें.

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