सफेद घर में आपका स्वागत है।

Sunday, October 24, 2010

डिस्कलेमर: वयस्क मानसिकता वाले लोगों के लिए.....only for 18+.......सतीश पंचम

Disclaimer - यह पोस्ट वयस्कों के लिये नहीं, बल्कि वयस्क मानसिकता वाले लोगों के लिए है। जो लोग वयस्क होने के बावजूद अवयस्कता की चादर ओढ़े रहते हैं, अन्जान बनने का दिखावा करते हैं, ऐसे लोगों से निवेदन है कि कृपया इस पोस्ट को न पढ़ें।


---------------------




 - सुन बे.....अमरीकवा ने पकिसतनवा को हज्जारन करोड़न रूपिया दिया है ......एतना कि सौ गाँव तक रूपिया फइलाय के सुखाओ  तब भी एकसौ एकवां गाँव की जरूरत पडेगी   ......मुदा है बड़ा चालू .......बहिनचो एक ओर पाकिसतान को चुसनी चुसा रहा है .......औ दूजी ओर ओबामा को  भारत पठाय रहा है......साला चूतिया समझे है पबलि को ।

 - अरे पबलि चूतिया नहीं है ....अपनी नेताई चूतियागंज वाली है........बहिनचो....साफे साफ नहीं बोल सकते कि पाकिसतनवा को काहे चुसनी चुसाया ..........उ साला सब पइसा आतंकवादी बनाने में खरच करता है.....एके फोट्टी सेवन लेने में लगा रहता है......  लेकिन केहू को कहने का हिम्मते नहीं है।

- और कहेगा भी क्यों......अमरीका वाला राजा आ रहा है आखिर...........कौनो धन्नू और गन्नू नहीं न आ रहा है....देखे नहीं थे जब **'लत्ता बीनवा' बिल किंटनवा आया था तो कैसे संसद में नेता लोग उससे हाथ मिलाने खातिर गिर पड़ रहे थे एक दूसरे पर......औ हाथ मिलाने के बाद बाहर आके ससुरे बोल भी रहे थे .....हम बिल किंटवा से हाथ मिलाया हूं.....उसको छूआ हूँ............अरे जिस **'लत्ता बीनवा' मनई ने रासपति भौन में रहते हुए मोनिका लेहिसकी को छूआ छाआ था तो उसे तुम छू लिये तो कौन बड़कई.......ससुरे रहेंगे गुलाम के गुलाम ।

- लेकिन एक बात है......बिल किंटनवा अपने आप में लत्ता बीनवा हो या कुछ अउर हो.......लेकिन मीडिया के सामने मान लिया पट्ठा कि हां हम रिसता बनाये थे मोनिकवा से रासपति भौन में। 

- अरे मानता कैसे नहीं......ससुरा सब कुछ तो पा गया था रासपति भौन में रहकर......अब उसको कौन खाहिस बची थी.......स्वीकार करके सतवादी बना सो अलग.... इस्टार रिपोट नहीं पढ़े हो का...... बहिनचो जिसने भी रपट बनाया ..... एकदम खरे खर्ररररर.......।

- लेकिन एक बात है...... औबामा बहुत कुछ अपने गाँव का लगता है........वही रंग.....वही ढंग....कोट पैंट उतार के लुंगी बनियाइन पहिना दो ओबामवा को तो  लगेगा एकदम अपने गाँव का रामबहोरना.........देखे नहीं थे रामबहोरना को......अरे वही जो  डाक् साब के इहां कंपौडरी करता है.......साला कंपौडंरी भी मिलिटरी इस्टाइल.......एक गोली सुबह चाँप लेना.....दो गोली रात को लील लेना............एतना कड़क आवाज में तो डाक् साहबो नहीं बोलते।

- अरे वही रीत है......चाय से जियादे गरम पतीला ........डाक् साहब तो सहर में खोले हैं दवाईखाना......और रामबहोरना को रख छोड़े हैं गाँव में कि.......ले बचवा दवाखाना संभाल.....। वइसे रामबहोरना और ओबामवा में  एक ही दो डिपरेंस है ......रामबहोरना की  महतारी चउबेगंज की है तो ओबामवा की महतारी अमरीका गंज की। बस् यही डिफरेंस है.....काम धाम में तो दोनो एक समान ही हैं।

- लेकिन कैसे......रामबहोरना करता है कंपौंडरी.....औ औबामा करता है रासट्रपतई....दोनों में कौन जोड़।

- अरे कौनो डिफरेंस नही है दोनो में। रामबहोरना कंपौडर  भी ससुरा दवाई अईसा देता है कि लगता है लेमन चूस वाली चुसनी दिया है.....उसका दवा का कुछ फरकै नहीं पड़ता बदन पर। वो तो गाँव में कोई और बैद हकीम  नहीं है तो लोग मन मसोसकर उही के पास जाते हैं, दे दो जो देना हो। भला इसी बहाने मन सांत रहे कि हां दवा लिया है। 

- ठीक,  ओबामा भी तो पाकिसतनवा को चुसनी ही देता है, ले लो एक गोली सुबह चाँप लेना, दो गोली रात को लील लेना।  बहिनचो.....गोली खिया खिया कर पाकिसतान को आदत डलवा दिया है, रोज सबेरे जोगईराम की तरह पहुंच जाता है पाकिसतनवा...... डेरे पर......साहेब....बड़ा तबियत उड़न्त है....जी धकर धकर कर रहा है.....कौनो गोली होय तो दो। 

- जी धकर धकर नहीं करेगा जोगईया का.....ससुर गोली के नाम पर  देसी बियागरा जो पकड़ाय देता है.........रात भर ससुर पहलवानी करेगा......एके फोट्टी सेवन झोंकेगा और सुबहिये कहेगा...... साहेब जूड़ी धर लिया है........ तबियत नासाज है.....कौनो गोली होय तो दो.....।   

  - और रामबहोरना कंपाउंडर..... हंसते हुए चार लेमन चूस पकडाय देगा .....लो ....एक गोली सुबह चाँप लेना....दो गोली रात को लील लेना......पाकिस्तान को लत्ता बीनवा बनाने  का इससे अच्छा उपाय कोई नहीं है ।  
  
 -  सतीश पंचम

स्थान - वही, जहाँ पर ओबामा के आने की तैयारी के चलते गमले चमकाये जा रहे हैं। 

समय - वही, जब ओबामा भारत आएं और उन्हें रामबहोरना हाथ मिलाते हुए उनसे कहे - सर, सेम बिजनेस....मी एन यू.....कैन वी मर्ज....मेक मी बिजनेस पाटनर सर.....आई बिल हेल्प यू लाईक मिस्टर जोगई।

-------------------------------------------------


**लत्ता बीनवा -  एक बहुत ही बुरी मन:स्थिति जिसमें एक पुरुष कामेच्छाओं से इतना अभिव्याप्त हो जाता है कि हमेशा स्त्रियों के अंतर्वस्त्रों और माहवारी के कपड़ों के बारे में सोचता है।

 **लत्ता बीनवा - A very bad mental condition of a person in which a person feels sexual desires to such an extent that even he is always in search of ladies undergarments and MC related clothes. 

 - शब्दकोश संदर्भ -   भदेस भाषा, पृ- 136, रहरिया प्रकाशन, दड़बागंज,  उत्तर प्रदेश

27 comments:

देवेन्द्र पाण्डेय said...

..अमरीकवा चुसनी चुसाई रहा है...पाकिस्तानवा के ही नाहीं भरतवा के भी..
..ई पढ़ के आपन एक कविता क याद आ गयल गुरू जौन लिख्ले रहली बिलक्लिंटनवा जब आयल रहल और ओकरे जाते फेंक देहनी रद्दी के टोकरी में...

जेहके देखा वही करत हौ बिलक्लिंटन क गान
ताकत औ पैसा के आगे सबकर बहिरा कान
................

जिनगी भर शिवलिंग पकड़ला का देहलन नाथ
ऊ तS राजा डॉलर भेजलस छुअते खाली हाथ .
जा के पैर पकड़ ला !
................

चरित्र हीन कS भी दुनियाँ में होला ई सम्मान
ऊ त राजा राम कS धरती में पउलस हौ मान
........
.....ढेर कS भुला गइली..देखा कत्तो मिली तS कब्बो छाप देब.

...झकझोरूआ पोस्ट बदे बधाई ले ला।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

भारतीय नेताओं के बारे में बिल्कुल सही लिखा है.

गिरिजेश राव said...

ग़जब धार! लेख की भाई, कोई और न समझ लेना ;)
गाँवों में जोगीड़ों और कबीरों की एक परम्परा है। भेजा फ्राई टाइप समस्याओं के कारणों की नोच चोथ कर सम्वेदनाएँ जीवित रखी जाती हैं। प्रतिरोध के स्वर भदेस भाषा का सहारा ले चुटीले और मारक हो जाते हैं। ऐसी रचनाएँ उस परम्परा से जुड़ती हैं।
जीय रजा जीय!
साहस को प्रणाम।

Vivek Rastogi said...

वयस्क मानसिकता, वह तो आजकल के बच्चों में भी पायी जाती है इसलिये ओनली फ़ोर १८ + की जरुरत नहीं थी :)

मो सम कौन ? said...

गुरू डिस्कलेमर देखकर ज्यादा लोग आयेंगे, हा हा हा।
कमेंट के लिये आज कापी पेस्ट चलेगा? देवेन्द्र पाण्डेय जी के कमेंट से आखिरी पंक्ति -
"..झकझोरूआ पोस्ट बदे बधाई ले ला"
और ऊ लत्ता बीनवा से हाथ मिलाने का क्रेज़ तो इसलिये और ज्यादा था कि उसने मोनिका लेविंस्की..।
हा हा हा।

DEEPAK BABA said...

जी धकर धकर नहीं करेगा जोगईया का.....ससुर गोली के नाम पर देसी बियागरा जो पकड़ाय देता है.........रात भर ससुर पहलवानी करेगा......एके फोट्टी सेवन झोंकेगा और सुबहिये कहेगा...... साहेब जूड़ी धर लिया है........ तबियत नासाज है.....कौनो गोली होय तो दो.....।



आपकी लेखनी को नमन और का कहत है :
...झकझोरूआ पोस्ट बदे बधाई ले ला

Suresh Chiplunkar said...

ई जो सब्दकोस बतावे किये हैं ना…
"शब्दकोश संदर्भ - भदेस भाषा, पृ- 136, रहरिया प्रकाशन, दड़बागंज, उत्तर प्रदेश"
एक ठो कांपी हमहूं का भेज दे बचवा…

उहै सब्दकोस से हमहूं ओबामा भेनचो की…………
=======
@ बिबेक रस्तोगी बाबू - ई सतीसवा 18+ की बार्निंग लगाकर एकदम्मै सही किया है, साला हिन्दी ब्लाग मे जादा करके तो (-)18 ही बिलागर है… :) :) :)

प्रवीण पाण्डेय said...

हृदय फोड़ती भाषा, चुसनी दिया है, चूसे चूसे जब जी कड़वा जायेगा तब समझ में आयेगा कि वहाँ चूसने को इतना महत्व काहे दिया जाता है।

ताऊ रामपुरिया said...

बेहद सटीक चित्रण, शुभकामनाएं.

रामराम.

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

पूरा हिलोर दिए जी...। इसको तो बोल-बोल के पढ़ने का मन कर रहा है। बच्चे किनारे हों तो दुबारा पढ़ता हूँ। :)

उस्ताद जी (असली पटियाला वाले) said...

इन नकली उस्ताद जी से पूछा जाये कि ये कौन बडा साहित्य लिखे बैठे हैं जो लोगों को नंबर बांटते फ़िर रहे हैं? अगर इतने ही बडे गुणी मास्टर हैं तो सामने आकर मूल्यांकन करें।

स्वयं इनके ब्लाग पर कैसा साहित्य लिखा है? यही इनके गुणी होने की पहचान है। अब यही लोग छदम आवरण ओढे हुये लोग हिंदी की सेवा करेंगे?

Arvind Mishra said...

भदेस भाषा, पृ- 136, रहरिया प्रकाशन, दड़बागंज,
हमें तो बस यिहई डिक्शनरिया चाहे ,चाहे जैसे :)

देवेन्द्र पाण्डेय said...

एक नम्बर का साहित्य है उस्ताद जी...! असली साहित्य तो यही है जिसे क्रीम कल्चर ने कूड़ा कहा..। आपकी समझ में क्यों नहीं आ रहा ? क्या आप कभी गांव के खैरा पीपन की चौपाल तले नहीं बैठे ? क्या कभी चाय की दुकान में जमने वाली अ़ड़ी की सदस्यता नहीं ली ..? साहित्य सिर्फ वह नहीं जो तथाकथित कुलीन वर्ग ही पढ़ता है..असली साहित्य तो वही है जो आम जन की भाषा में बात करता है।

...आपके कमेंट से दुःख पहुंचा है और चाहता हूँ कि कोई बात द्वेष में न लिखें।

देवेन्द्र पाण्डेय said...

पीपल

Shiv said...

बहुत बढ़िया लिखे हय~ इहइ असली भासा हउ अइसन लोगन के बारे में बतियाइ क~. बहुत मस्त पोस्ट बा.

बेनामी said...

89/99
One mark deducted because there should be 'man' instead of 'person' in the meaning of लत्ता बीनवा.

सतीश पंचम said...

वस्ताद जी, पटिया पकड वाले ....आपका प्रोफाइल देखा हाल फिलहाल अक्टूबर में बना है। और तुर्रा यह कि आप असली वाले हैं :)

कौन जाने आप क्या हैं, किसी को इसमें रूचि भी नही है कि आप असली है या नकली। या वो असली हैं कि नकली ....किसी को कोई रूचि नहीं है।

जहां तक मुझे लगता है कि आपकी कोई निजी खुन्नस होगी नंबर दे रहे वस्ताद जी से। आप अपनी निजी खुन्नस के लिए मेरे ब्लॉग का उपयोग न करें तो थोड़ा मुझे अच्छा लगेगा...जी जुड़ाएगा।

रही बात साहित्य और उन तमाम बातों की, तो साहित्य में वह सब कुछ आता है जो जीवन के साथ चलता-उतरता है।

जरूरी नहीं कि साहित्य केवल सिगार फूंकने वाले की बातें ही बताए। साहित्य सिगार वाले के साथ साथ बीड़ी पीते मनोहर, खैनी खाते चन्नर और पत्नी को पीटते जगपत की बात भी करता है।

फुलवरीया का प्रेम बताते हुए फिलमी हिरोइन की रासलीला भी बयां करता है साहित्य।

इसलिए साहित्य क्या कैसे इसके बारे में जनता अच्छी तरह जानती है। कृपया इसका ज्ञान न दें तो ही अच्छा। :)

सतीश पंचम said...

बेनामी जी,

वैसे तो मैंन अनानिमस कमेंट अपने ब्लॉग पर प्रतिबंधित कर रखा है, लेकिन फिर भी आप जैसे लोग प्रोफाइल बना बना कर पहुंच ही जाते हैं।

बलिहारी है जी :)

सतीश पंचम said...

देवेन्द्र जी,

जिनगी भर शिवलिंग पकड़ला का देहलन नाथ
ऊ तS राजा डॉलर भेजलस छुअते खाली हाथ .

बहुत मारक हैं ये पंक्तियां....एकदम कबीरा सारा रा रा टाइप :)

बिल क्लिंटन के आने पर लिखी कविता आपने फेंक दी, लेकिन अब ओबामा आय रहा है, होय जाय द एक जोगीरा.....एकदम झन्नाटेदार आवे दs :)

सतीश पंचम said...

अरविंद जी, सुरेश जी,

इस भदेस भाषा शब्दकोश की प्रूफरीडरी गिरिजेश जी ने की है।

हम तो लत्ता बीनवा का अर्थ सीधे सीधे अंगरेजी में लिखकर भाग निकलने की सोचे थे कि इस भयंकर शब्द लत्ता बीनवा का हिंदी अर्थ कौन बताये।

वो तो गिरिजेश ही थे जो कहे ठहरो , एक सार्थक अर्थ शुद्ध हिंदी में बता रहा हूं :)

तो इस लत्ता बीनवा के हिंदी अनुवाद को बजरिए गिरिजेश ही माना जाय।

साथ ही साथ, बेहतर होगा यदि रहर के खेतों से निकली, खेतों में हल चलाते, पशुओं को दाना पानी खिलाते हुए खेती-किसानी की उपज इस उत्तर प्रदेशीय भदेस भाषा के शब्द कोश को ब्लॉग जगत के जरिए ही समृद्ध किया जाय।

इस क्रम में 'पूँछउठावन' भी एक शब्द है जिसे की 'लत्ता बीनवा' के साथ ही साथ जगह दी गई है।

और मान लो कहीं कोई परेशानी हुई तो गिरिजेश जैसे मित्र तो हैं ही, दन्न से उसका अभिकल्प, अभिव्याप्त, अभिवर्तन आदि के जरिए तोड़ निकाल ही देंगे :)

Udan Tashtari said...

सन्नाट लेखन!!

गिरिजेश राव said...

@ भदेस भाषा शब्दकोश
लौण्डा बदनाम हुआ ;)

@ देवेन्द्र जी
अरे! मैं तो मिस कर गया

जिनगी भर शिवलिंग पकड़ला का देहलन नाथ?
ऊ तS राजा डॉलर भेजलस छुअते खाली हाथ .
जा के पैर पकड़ ला !
सर र र र

धुर सारे! अब्बे से फगुना गइले?

अभिषेक ओझा said...

एकदम झकाझक.

sanjay said...

b h a d e s h......yane ki soundhi
bhasa......fullam rapchikatamak...
istile.....majja aa gaeel.........
jiya ho bhaijee lakh-lakh baris...


pranam.

ALOK KUMAR SINHA said...

अद्भुत पंचम जी .................................

नियमित पाठक हूँ आपके ब्लॉग का क्योंकि इस ब्लॉग में अपनी खुशबू आती है i
आलोक, सिंगापू

Astrologer Sidharth said...

जै हो।

Astrologer Sidharth said...

जै हो।

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'
A Photo from - Thoughts of a Lens

ढूँढ ढाँढ (Search)

© इस ब्लॉग की सभी पोस्टें, कुछ छायाचित्र सतीश पंचम की सम्पत्ति है और बिना पूर्व स्वीकृति के उसका पुन: प्रयोग या कॉपी करना वर्जित है। फिर भी; उपयुक्त ब्लॉग/ब्लॉग पोस्ट को हापइर लिंक/लिंक देते हुये छोटे संदर्भ किये जा सकते हैं।




© All posts, some of the pictures, appearing on this blog is property of Satish Pancham and must not be reproduced or copied without his prior approval. Small references may however be made giving appropriate hyperlinks/links to the blog/blog post.