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Saturday, October 30, 2010

लहरदार डिप्लोमेसी के बीच टिटिहरी छर्रा............सतीश पंचम

     अरूंधति ने ये कहा...अरूंधति ने वो कहा.....अरूंधति पानी की समस्या को लेकर चिंतित ........अरूंधति ने नक्सलियों की स्थित शोचनीय बताई....... अरूंधति ने गिलानी के साथ मंच साझा किया......अरूंधति के जज्बे को सलाम.......

Create a big Wave..
Grab a board..
and start Surfing it....
         आजकल हर ओर यही चल रहा है ........यही रीत है...... शोबीज् चिंतित होते है ....खासकर तब....जब उसकी कोई नई किताब आने वाली हो.....याकि कोई फिल्म रिलीज होने वाली हो.....या कहीं शांति पुरस्कार पाने की हसरतें उछाल मार रही हों...... ऐसे लोग निश्चित ही चिंतित होते हैं। 

 ऐसे में बौद्धिक एय्याशीयों के बीच अपने आप को ही कुहनियाता सामान्य तबका यह भूल जाता है कि -  अरूंधती जैसी टिटिहिरी शख्सियतें ......बोल बोल कर ........चहकते हुए.....रिसियाते हुए....गरियाते हुए  अपने लिए एक सुविधाजनक लहर बना रही हैं....एक स्पेस बना रही हैं.....ताकि उन लहरों पर सवार हो उनका आनन्द उठा सकें.... मौज ले सकें....सर्फ कर सकें।

  लेकिन यह चलन कोई आज से नहीं है.....तकरीबन चालीस साल पहले लिखे अपने एक लेख में विवेकी राय ने शायद ऐसे ही लोगों के लिए ही कहा था - 

     धन्य हैं वे लोग जिन्हें दिन-भर बात करने के अतिरिक्त कोई काम नहीं है। और इन्हें देखकर भगवान की लीला का रहस्य खुलने लगता है। अथवा ये लोग साक्षात् भगवान या उसके पैगंबर हैं। विश्वशांति के लिए सदा बक-बक करते रहते हैं। इतनी ऊँचाई से बोलते हैं कि संसार के नामी नायक बौने-से लगने लगते हैं। ये सर्वव्यापी हैं और आश्चर्य नहीं कि हमारे जैसा संसारी आदमी भगवान के समान ही चाहकर भी इनसे दूर रहता है।


     वे बहुत अच्छे हैं, मगर दुर्भाग्यवश हमारे पास समय नहीं है। कामकाजी आदमी हूँ। उन्हें देखकर जलन होती है। मैं हूँ कि किसी घने पेड़ की छाया में घड़ी भर बैठने के लिए तरसता रहता हूँ। समय नहीं मिलता। शरीर बेकार बैठा रहता है तब भी मन की दौड़-धूप जारी रहती है। उधर एक वे हैं कि सदा पूर्ण अवकाश है। 
  नदी तट पर, कुएँ पर, बाग में, बैठकखाने में, अथवा दुकान पर गप्पों का गुलखि लाते रहते हैं। वास्तव में वे धन्य हैं। 

   -  डॉ. विवेकी राय   


     चालीस साल बाद आज भी अशरक्ष:  सत्य।

       और हम हैं कि उसी तरह के 'अरूंधात्मिक बौद्धिक तपिशों' से अपने बौद्धिक चूल्हे हेतु आग ले रहे हैं -  ताकि चूल्हा जले .....आँच मिले..... पानी खदबदाये ..... भोजन बने......कुछ मनसायन हो.....कुछ कहा सुना जाय।

क्योंकि....... आज बड़े दिन बाद आग परोसी गई है।

 - सतीश पंचम  

Image Courtesy : Mumbai paused
........................................................

17 comments:

amitesh said...

पंडित सोई जो गाल बजावा....

Udan Tashtari said...

वाकई आज बड़े दिन बाद आग परोसी गई है :)

गिरिजेश राव said...

कल ही सोच रहे थे कि इस मामले में दाल सबने पका दी है लेकिन तड़के की कमी सी है।
पँचफोरन तड़का अब लगा है।
@ Create a big Wave..
Grab a board..
and start Surfing it....

यह इस जमाने का सातवाँ कमांडमेंट है। बाकी भी लै आव ढूँढ़ के चौपट चौपाटी से।

sanjay said...

अरूंधती जैसी टिटिहिरी शख्सियतें ......बोल बोल कर ........चहकते हुए.....रिसियाते हुए....गरियाते हुए अपने लिए एक सुविधाजनक लहर बना रही हैं....एक स्पेस बना रही हैं.....ताकि उन लहरों पर सवार हो उनका आनन्द उठा सकें.... मौज ले सकें....सर्फ कर सकें।

itti si aag aur itni tapish.......

jara gulabiya ke saath 3 din narega
me mitti katbai do sari shantidoot
ki bhoot dil-dimag se utar jawega.

pranam.

DEEPAK BABA said...

"अरूंधात्मिक बौद्धिक तपिशों"


पंचम जी, प्रणाम आपके जज्बे को.

@अरूंधती जैसी टिटिहिरी शख्सियतें

धन्य मेरा भारत देश जहाँ ऐसी टिटिहिरी को टीटीराणे के लिए मंच मिल जाता है...

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

सही तडका मारा है आपने।

---------
सुनामी: प्रलय का दूसरा नाम।
चमत्‍कार दिखाऍं, एक लाख का इनाम पाऍं।

ashish said...

बाबूजी मानसिक जुगाली के लिए कुछ तो चाहिए ना . अब ये देखिये इतना सब लिखा ना गया होता मोहतरमा के बयान पर तो आप को विवेकी जी का कथन कैसे याद आता . वैसे टिटिहरी तो पांव आसमान में उठाकर सोती है ना कि गिरे आसमान और उठा ले .गुल खिलाते रहते है कर लीजिये .ये आग जलती रहे .

मनीषा पांडे said...

सतीश जी, ये तो बड़े रिएक्‍शन की भाषा है। मिट़टी ढ़ोवा दो, मजदूर बना दो, ये कर दो, वो कर दो। आप भले कोई एक्टिविस्‍ट न हों, लेकिन थोड़ी-बहुत न्‍याय-बराबरी की बात आप भी करते या सोचते होंगे लेकिन गुलबिया के साथ मिट्टी ढोनी पड़े तो आपका भी भूत उतर जाएगा, मेरा भी उतर जाएगा। बेशक मेरे घर काम करने वाली स्‍त्री के साथ मेरी सहानुभूति है, मैं उसके साथ अच्‍छा व्‍यवहार करती हूं, लेकिन ये सच है कि मैं उसकी तरह घर घर काम नहीं कर सकती।
ये कोई पैरामीटर थोड़े न है।
आप लोग मिलकर जिस अरुंधति को टिटहरी और जाने क्‍या-क्‍या कह रहे हैं, उसी के कद, अंतरात्‍मा और ईमानदारी का एक दूसरा छोर भी है।
अपनी पहली ही किताब पर बुकर उन्‍हें किस राजनीति के तहत मिला, पता नहीं, लेकिन कोई भी ईमानदार और साहित्‍य की समझ रखने वाला पाठक उसे दो कौड़ी की किताब कहकर दरकिनार नहीं कर सकता। वो स्‍त्री बहुत कमाल की भाषा लिख सकती है (मूल अंग्रेजी पढि़ए, अनुवाद नहीं)। एक किताब लिखी, नाम हुआ, बुकर मिला। किताब लिखकर एक ओर फेंक दी। दोबारा कभी कहानी, उपन्‍यास में सिर नहीं दिया। वैचारिक लेख लिखे, किताबें, पॉलिटिकल डिस्‍कोर्स। इराक युद्ध के समय अमरीका की नाक के नीचे, उसकी जमीन पर बैठकर उसकी बजाई। पूरी दुनिया की बौद्धिक बिरादरी चाहती थी कि तसलीमा को इस पर कुछ कहना चाहिए। इराक के पक्ष में, अमेरिकी साम्राज्‍यवाद के खिलाफ, लेकिन वो चुप्‍प। हिंदी के कितने लेखक हैं, (बड़े नाम, जिनके कहे का असर होगा, जो बात मीडिया की सुर्खियों में आएगी, सुनी जाएगी) जो ऐसे किसी बड़े राजनीतिक, सामाजिक मसले पर खुलकर बोलते हैं। सरकार के खिलाफ बोलते हैं। पुरस्‍कार में मिला सारा पैसा बिना सोचे सामाजिक संगठनों को दान कर देते हैं। (प्‍लीज नोट डाउन, ठीक है कि अरुं‍धति को आर्थिक तकलीफ नहीं होगी, लेकिन वो किसी मिलियनेअर की संतान भी नहीं हैं। और हिंदी के ऐसे दस लेखकों का नाम मैं गिना सकती हूं, जो आर्थिक रूप से अरुंधति से कम नहीं, फिर भी एक-एक नोट दांत से पकड़ते हैं। जो ऐसे असुरक्षित मध्‍यवर्गीय हैं कि किसी विवादास्‍पद जनहित के मुद्दे पर सही-सही पक्ष लेने और सड़कों पर उतरने में उनकी बजने लगती है।)
देखिए, उनकी बहुत सी कमियां होंगी, वो कहीं राजनीतिक अतिवाद या गलतियों का शिकार भी हो सकती हैं। लेकिन मुझे बिलकुल नहीं लगता कि वो आपकी ऐसी निर्मम आलोचनाओं और विशेषणों के लिए कतई डिजर्व करती हैं।

मनीषा पांडे said...
This comment has been removed by the author.
गिरिजेश राव said...

कमाल है यार! हमने आज कुत्ते की बात की और आप ने टिटिहरी की - एक को गाड़ी चलाने का भ्रम और दूसरी को आसमान को टाँग कर रखने का भ्रम। अरुन्धति एकदम डिजर्व करती है।

एक ठो कहावत है - हमके केहू न मारे त हम सबके मारि आईं। कई बार ऐसा होता है कि गाल बजता रहता है और कोई सुनता ही नहीं। फ्रीक़्वेंसी के बाहर की चीज हो जाती है। लेकिन एकाध बार तो ... बड़ी लहर वाले इसी में महारथ रखते हैं।
खैर, अब एक ठो लेख हिन्दी की अभिधा, लक्षणा और व्यंजना शब्द शक्तियों पर लिख ही दो टिपिकल पंचम सुर में। आचार्य जी लोगों से फंडा समझ भर लो बाकी लोकवादी इस्टाइल में परस दो। अंग्रेजी में भी ऐसा कुछ होता होगा तो मुझे नहीं पता।

गिरिजेश राव said...

अरुन्धति की भाषा के हम भी कायल हैं। एक ठो नमूना प्रस्तुत है। यकीन मानो ऐसा लिखने के लिए बड़ी मेनहत करनी पड़त है। ;)
Ammu, naked now, crouched over Velutha, her mouth on his. He drew her hair around them like a tent. Like her children did, when they wanted to exclude the outside world. She slid further down, introducing herself to the rest of him. His neck. His nipples. His chocolate stomach. She sipped the last of the river from the hollow of his navel. She pressed the heat of his erection against her eyelids. She tasted him. She felt his belly tighten under her, hard as a board. She felt her wetness slipping on his skin. He took her nipple in his mouth and cradled her other breast in his calloused palm. Velvet gloved in sand paper.

Once he was inside her, fear was derailed and biology took over. The cost of living climbed to an unaffordable heights; though Baby Kochamma would say it was a small price to pay.

She lay against him, their bodies slick with sweat. She felt his body drop away from her. Her breath became more regular. She saw his eyes clear. He stroked her hair, sensing that the knot that had eased in him was still tight and quivering in her. Gently, he turned her over on her back. He wiped the sweat and grit from her with his wet cloth. He lay over her, careful not to put his weight on her. Small stones pressed into the skin of his forearms. He kissed her eyes. Her ears. Her breasts. Her belly. Her seven silver stretch marks from her twins. The line of down that led from her navel to her dark triangle, that told him where she wanted him to go. The inside of her legs, where skin was softest. The carpenter's hands lifted her hips and an untouchable tongue touched the inner-most part of her. Drank long and deep from the bowl of her.

तोहें पूरी छूट है, चाहो तो मिटा देना।

Arvind Mishra said...

हम तो पहले ही ऐसे लोगों को पिपिहरी कह चुके हैं :)

सतीश पंचम said...

गिरिजेश जी,

खुद तो नागा कविता लिखते हो और हमें कहते हो कि अगर बोल्ड लगे तो हटा देना :)

बोल्डनेस कहां नहीं है आजकल। सुना है इसके सिवा तो बुकर भी नहीं मिलता :)

टिप्पणी वैसे ही रख रहा हूं। नहीं मिटाउंगा। क्योंकि ये तो छपी छपाई बात है, इसे क्यूं औऱ क्योंकर छिपाना...

लेकिन एक बात मन में जरूर आती है कि यदि हिंदी वाले सही में अपनी भाषा और ज्ञान का सही सही कद्र किए होते तो अब तक 'काशी का अस्सी' को नोबल मिल चुका होता।

विदेशी न सही देसी ही ।

लेकिन वही है कि तब बाकी की चिलगोजईयां कौन करेगा....मसलन मैं श्रेष्ठ....मैं महान...उसे क्यों मिला...क्या मैं कम अच्छा लिखता हूँ...वगैरह वगैरह :)

सतीश पंचम said...

मनीषा जी,

शायद अब भी आप मेरे कहने का आशय नहीं समझी हैं। मेरा विरोध अरूंधति के लेखन, उसके कामों या उसके क्रियाकलापों से नहीं है। लेकिन जिस किसी की शख्सियत लोगों पर असर डालती हो....जिसकी बात व्यवहार का असर देश के इमेज आदि पर पड़ता हो तो ऐसे शख्स को कुछ भी बोलने से पहले काफी सोच समझ कर बोलना चाहिए। यह नहीं कि मुंह खोला और भक्क से बोल दिया।
और यह कोई पहली बार नहीं है कि अरूंधती ने इस तरह की टिकटिम्मा वाली बातें की हो....इसके पहले भी गाहे बेगाहे कुछ न कुछ उगलती ही रही हैं मोहतरमा।

सो एक विशेष किस्म की मानसिकता को लेकर चलने पर उससे उपजे विरोध के स्वर आएंगे ही।

जहां तक टिटिहरी या जो कुछ भी मैंने कहा वो एक तरह से इज्जत से ही व्यंग्य कसा है न कि गाली गलौज देकर :)

@ गुलबिया के साथ मिट्टी ढोनी पड़े तो आपका भी भूत उतर जाएगा, मेरा भी उतर जाएगा।

जहां तक मिट्टी ढोने की बात है तो वह तो मैं करते रहता हूं....गाँव जाने पर खेत कियारी...सड़क-मेंड सब करना पड़ता है :)

ऐसे में काहे का भूत और काहे का भभूत....

जमीन से जुड़े रहने का एक लाभ यह भी है :)

मो सम कौन ? said...

@ गिरिजेश राव:
पहले ऐसा एकाध नमूना दिखा दिये होते तो काहे से इत्ती बड़ी लेखिका के खिलाफ़ लिखते हम?
हम तो फ़ैन हुये जा रहे हैं अरून्धति के,
"पढ़ेंगे तो बढ़ेंगे" शायद किसी सरकारी विज्ञापन की पंचलाईन भी है ऐसी।

सतीश जी, ये सब तो चलता रहेगा। एक पर्सनल रिक्वेस्ट है - ’बड़े बड़े विद्वान तुम्हारी....’ शायद काशी का अस्सी से ही संबंध रखती है, एक बार सुनी थी। मेल पर भेज सकेंगे क्या?

प्रवीण पाण्डेय said...

यही बकर बकर सुनकर तो देश के कान पक चुके हैं, अब तो बन्द करो भाई, कुछ तो सार्थक करो।

arunrajnath said...

Bhaiya Pandey ji
bakar bakar karke hi booker milta hai.

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