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Tuesday, October 26, 2010

एक शर्मिन्दगी ऐसी भी...............सतीश पंचम

   आज अल् सुबह फिल्म 'सारा आकाश' देख रहा था। राजेन्द्र यादव के लिखे उपन्यास पर आधारित इस फिल्म के एक दृश्य को देखकर मुझे मेरे कालेजीय जीवन की एक घटना याद आ गई। 

 हुआ यूँ कि,  मेरे एक मित्र का विवाह उनके स्कूली छात्र जीवन में ही हो गया था। जब हम कॉलेज में पढते थे तो उसने बताया  था कि उसका विवाह तो हो गया है लेकिन गौना अभी बाकी है। विदाई नहीं हुई है। 

   एक दिन कॉलेज का कुछ फंक्शन था और उस फंक्शन के बाद हम चार मित्रों ने प्लान बनाया कि मुंबई के कल्पना थियेटर में अमितभवा की  फिल्म देखी जाय। जाने पर पता चला कि हाउस फुल्ल है। बगल के ही कामरान वगैरह में फालतू फिल्मे लगी थीं। 

 सो लौटने की सोच ही रहे थे कि याद आया यहीं कहीं वह मित्र भी रहता है। चलो उसके घर चला जाय। 
दुपहर का समय था और हम लोग ढूँढते ढाँढते जा पहुँचे उसके घर। दस्तक देते ही एक नई उम्र की महिला ने किवाड़ खोला।

  पूछने पर उस महिला ने बताया कि, हां - सो रहे हैं। 

हम लोग अचक्के में .....कि यार ये बंदे का गौना तो नहीं हो गया ? उसकी पत्नी तो नहीं  ये ?   अभी सोच ही रहे थे कि भीतर से वह महाशय आँख मलते हुए बाहर निकले।  हम लोगों को इस तरह अचानक सामने देख खदबदा गये। 
सुहागरात के समय 'उज़बक की तरह बैठा' समर  :)
 थोड़ी देर में संभले और फिर अंदर घर में ले गये। इशारे से उस महिला को घर के भीतरी हिस्से में जाने को कहा। वह चली गईं। हम लोग एक दूसरे का मुँह देख रहे थे औऱ सोच रहे थे कि क्या बात की जाय। तभी हमारा एक साथी पूछ बैठा - कौन हैं ये ? 

 उसने तुरंत कहा - बहिन है। 

हम लोग चुप, बात ही खलास। लेकिन शुकुल महराज कुछ भाँप लिए थे। पानी वानी पीने के बाद जब चली चला कि बेला हुई तो उसके छोटे भाई को इशारे से बुलाकर कहा - जा तनि भउजी से कहा कि हम लोग जा रहे हैं। 

 जब तक मेरा मित्र उसे रोकता पकड़ता, वह लडका दौड़ता दौड़ता भीतर गया और ललकारते हुए बोला - भौजी ओ लोग जात हउएं।

बस, पोल खुल गई। मित्र महाशय एकदम शर्म से जमीन में जैसे गड़े जा रहे थे। उस समय हम लोग तो कुछ नहीं बोले, लेकिन अगले दिन बचवा की जमकर खबर ली गई। 

 ससुर....बहिनापा जोड़े हैं.....उहो अपने मेहरारू से.....अरे बता देता तो क्या बुरा हो जाता.....तू ....ये है वो है.....साथ ही साथ शुकुल महाराज को भी लपेटा गया कि  तेरे चलते इस बेचारे को शर्मिंदा होना पड़ा। तू अब अपनी लोहकारने वाली आदत से बाज आ। 

 दरअसल मेरे मित्र बताना नहीं चाहते थे कि कम उम्र में हुए विवाह के चलते अब पत्नी को साथ रखना पड़ रहा है। खर्चा आदि कहीं पार्ट टाइम जॉब से निकल तो रहा है, लेकिन फिर भी अभी तक पिताजी ही ज्यादातर खर्च पानी देख रहे हैं।
  
 कुछ अपनी कॉलेजयी जीवन और कुछ अपनी लड़कई उमर के चलते बंदे को अपनी पत्नी तक को बहन बताना पड़ गया।

     ठीक इसी तरह का सीन फिल्म राजेन्द्र यादव रचित  'सारा आकाश' फिल्म में भी था। उसमे भी एक आदर्शवादी, और समाज को बदलने के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर करने की कसमें खाने वाले एक लडके समर की शादी परिवार के दबाव के चलते जल्दी ही हो जाती है। मन मसोस कर वह विवाह करता है लेकिन फिर उसे अपने दोस्तों के बीच जाने में शर्म आने लगती है कि ये ताना मारेंगे आये थे बड़े आदर्शवादी बनने। इतनी दल्दी शादी कर ली..... अब पड़े रहो अपनी जोरू के आँचल में। 

  घर वालों के काफी दबाव देने पर एक बार फिल्म देखने के लिए जाते वक्त समर आगे आगे चलता चला जाता है और उससे काफी पीछे लगभग बीस पचीस फुट की दूरी पर उसकी नई नवेली पत्नी चलती है। रास्ते में एक मित्र मिलता है उसे और हाल चाल पूछ ही रहा होता है कि पत्नी आकर उसके बगल में खडी हो जाती है। समर कुछ समझे इससे पहले ही मित्र पूछता है कि क्या यहीं हैं आपकी श्रीमती जी ?

 समर के मुंह से निकलता है - नहीं.....नहीं। 

 मित्र पूछता है - तो क्या बहन हैं ?

समर कहता है -  हाँ.....और  इधर- उधर देखकर यकायक आगे बढ़ जाता है।

 पीछे पीछे पत्नी भी चल पड़ती है। 

-----------------

 मैं सोचता हूं कि आज यदि मैं अपने मित्र से मिलूं तो लाज के चलते पत्नी को अपनी बहन बताने वाला वह मित्र न जाने किस अंदाज में मुझसे मिले ? 

 संभवत: पहुंचते ही पुकारेगा-   सुषमा की मम्मी,...... ए सुषमा के मम्मी..... तनिक देखा..... के आयल हौ ?
  
 और तभी मित्र की बिटिया सुषमा दौड़ती हुई आएगी और कहेगी............मामा आ गये......मामा आ गये :)
  
- सतीश पंचम

 स्थान - वही, जहां की  मुंबईया बोलचाल में किसी को 'मामा बनाने' का अर्थ है  - मूर्ख बनाना होता है :)

समय - वही, जब मित्र की श्रीमती जी मेरे सामने घूँघट काढ़े हुए आए और अचानक घूँघट उठा कर कहे, -  का हो.......का हाल बा ??? 

20 comments:

Tarkeshwar Giri said...

Accha laga

प्रवीण पाण्डेय said...

पहले तो करनी नहीं चाहिये और यदि कर डाली तो छिपानी नहीं चाहिये। सत्य के अनुसार ढाल लें समर स्वयं को।

DEEPAK BABA said...

दिल्ली में शादी के बाद माशूक जब अपने आशिक को सामने देखती है तो बच्चो को कहती है "बेटा, मामा को नमस्ते करो"

बढिया .

rashmi ravija said...

'सारा आकाश'...मेरी बहुत ही पसंदीदा पुस्तकों में से एक. ना जाने कितनी बार पढ़ी है. पर फिल्म नहीं देखी :(
सी.डी. पूछने पर आप साकी नाका का रास्ता बता देंगे...जहाँ जाना मुमकिन नहीं :(

पर जब नायक ने नोवेल में एक साल तक बात ही नहीं की थी (और असल ज़िन्दगी में नौ साल )...तो क्या कह कर परिचय कराता, अपनी पत्नी का.??...आज की पीढ़ी इस कहानी को सिरे से खारिज कर देगी...कि ऐसा हो ही नहीं सकता.

Poorviya said...

sunder lekhan.

Anu Singh Choudhary said...

बहुत बहुत मज़ेदार। हालांकि अब इस पीढ़ी में तो ऐसा नहीं ही होता होगा। ये तो spouses के सामने धड़ल्ले से ex की बात करनेवाली पीढ़ी है। फिर मामा-वामा क्या?

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

रोचक, मजेदार और एक कालखंड को दिखाता सच्चा वृतांत। आज की नयी पीढ़ी ऐसी शर्मिंदगी से बहुत आगे निकल चुकी है। लिव-इन का जमाना गया है।

Arvind Mishra said...

"साथ ही साथ शुकुल महाराज को भी लपेटा गया कि तेरे चलते इस बेचारे को शर्मिंदा होना पड़ा। तू अब अपनी लोहकारने वाली आदत से बाज आ। "
छिः छिः यी शुकुल महराज की तभी से यी गंदी आदत है का पंचम जी :)

मो सम कौन ? said...

"संभवत: पहुंचते ही पुकारेगा- सुषमा की मम्मी,...... ए सुषमा के मम्मी..... तनिक देखा..... के आयल हौ ?

और तभी मित्र की बिटिया सुषमा दौड़ती हुई आएगी और कहेगी............मामा आ गये......मामा आ गये :)

- सतीश पंचम

स्थान - वही, जहां की मुंबईया बोलचाल में किसी को 'मामा बनाने' का अर्थ है - मूर्ख बनाना होता है :)

समय - वही, जब मित्र की श्रीमती जी मेरे सामने घूँघट काढ़े हुए आए और अचानक घूँघट उठा कर कहे, - का हो.......का हाल बा ?"

हा हा हा। आज खाने के बाद पान बहुत मजेदार लगा।

गिरिजेश राव said...

@ 25 फीट की दूरी :)
ये वह जमाना था जब लोग अपनी ब्याहता के पास भी रात में चोरी छिपे चप्पल/पनही हाथ में लेकर जाते थे।

आज के जमाने में तो स्कूटी/बाइक पर बैठे बैठे ही... विवाहित होना ज़रूरी नहीं।

का का दिन देखने को अभी मिलेंगे? हे राम!

सतीश पंचम said...

रश्मि जी,

आपने सच कहा कि आज कोई यह मानेगा ही नहीं कि साथ साथ रहते हुए भी आपस में कभी पति पत्नी के बीच नौ साल तक बातचीत बंद थी। केवल एक दूसरे के प्रति पनपे अहम के कारण। जबकि यह उपन्यास सच्ची कहानी पर आधारित है।

वह एक अलग जमाना था....अहम की भी अपनी एक ठसक थी।

सतीश पंचम said...

अरविंद जी,

आप 'शुकुल' पढ़ते ही मौज लेने से नहीं चूके :)

दरअसल ये शुकुल महाराज हमारे बैच के सबसे अनोखे बंदे थे, इन्ही की कहानी थी वो घाटकोपर स्टेशन वाली जहां पर कि अपनी बिन गौने वाली पत्नी को मिलने जाते थे और पाकेट मार उठा था।

चोर ने पैसे तो ले लिए लेकिन घर पर शुकुल जी की श्रीमती जी की तस्वीर( उनका गौना नहीं हुआ था तब तक)के साथ खाली पर्स कुरियर से भेज दिया था :)

इन पर पहले भी पोस्ट लिख चुका हूँ...ये रहा लिंक :)

http://safedghar.blogspot.com/2010/06/blog-post.html

बी एस पाबला said...

सही है
...आज की पीढ़ी इस कहानी को सिरे से खारिज कर देगी...

डा० अमर कुमार said...


हाँय.. सच्ची,
ऎसा भी होता था क्या ?
मेरी गर्लफ़्रेन्ड की कसम खाओ, पहले !
आई कॉन्ट बॅलीव इट मैन, रीयली इनक्रेडिबिल यार !

Arvind Mishra said...

हाँ हाँ याद आ गया .शुक्रिया !

देवेन्द्र पाण्डेय said...

...गिरिजेश जी,

..का का दिन देखने को अभी मिलेंगे? हे राम!
..देखने को मिले न मिले पढ़ने को तो मिल ही जाएगा।
..उम्दा पोस्ट।

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi said...

समय - वही, जब मित्र की श्रीमती जी मेरे सामने घूँघट काढ़े हुए आए और अचानक घूँघट उठा कर कहे, - का हो.......का हाल बा ?"



हा हा हा हा हा....

क्‍या हाल बा पंचम दा...

Er. Shilpa Mehta : शिल्पा मेहता said...

padh liya hai - haaziri laga rahe hain :) aapki poston par tippani karna mushkil ho jaata hai - samajh hi nahi aata ki yah :) smiley lagaayein yaha yah :( ...

मुकेश पाण्डेय चन्दन said...

पुरानी यादें !

मुकेश पाण्डेय चन्दन said...

पुरानी यादें !

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