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Monday, October 18, 2010

व्यंगात्मक लहजों से सनी चाशनी.......सोना लईजा रे.......सतीश पंचम

   सुप्रीम कोर्ट ने अभी हाल ही में एक फैसले के दौरान व्यंगात्मक लहज़े में कहा कि भ्रष्टाचार को आधिकारिक तौर पर सरकारों को मान्य कर देना चाहिए क्योंकि कोई भी सरकारी काम आजकल बिना भ्रष्ट गतिविधियां अपनाए नहीं हो पाता।

  बात भी सच है। भ्रष्टाचार का बोलबाला इस कदर है कि फ़र्क करना मुश्किल हो गया है कि किस कदम को इमानदार की संज्ञा दी जाय और किसे भ्रष्टाचार की। मसलन, बड़े बड़े मंदिरों में ही देखिए कि एक ओर कई कई घंटे आम भक्त लोग खड़े रहते हैं और तब जाकर उन्हें दर्शन मिल पाता है जबकि उसी मंदिर में  आधिकारिक तौर अलग से ज्यादा पैसा देकर रसीद सहित एक वी आई पी पास के जरिए तुरंत दर्शन मिल जाता है। अब इसे आप एक किस्म का भ्रष्टाचार मानें या न मानें यह आपके उपर है।

   दूसरी ओर रेल्वे में भी देखिए - एक तरह से तत्काल टिकट वाली व्यव्सथा भी कुछ इसी तरह की है। लोग तीन महीना पहले रिजर्वेशन करवाते हैं लेकिन फिर भी सही सही टिकट नहीं मिल पाता, कहीं वेटिंग है तो कही आर एसी तो कहीं NOT Available। जबकि यहीं रेल्वे खुद से ही अधिक पैसे लेकर उन्ही टिकटों को  तत्काल टिकट के रूप में देने को तैयार बैठी है। यह अलग बात है कि तत्काल के लेवैय्या भी अब बहुत  हैं और उसकी भी हालत सामान्य टिकट सी हो गई है।

     तो कहने का अर्थ यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने भले ही यह बात व्यंगात्मक लहज़े में अब जाकर कही हो, लेकिन सरकार और लोग उसे खुद ब खुद लागू करने को तत्पर हैं।

        इस मुद्दे को जब मैं लिख रहा हूँ तब मेरे जेहन में अचानक यह बात आई कि यार ये भ्रष्टाचारी होना भी कहीं एक तरह से मानव स्वभाव का हिस्सा तो नहीं है। कहीं यह भ्रष्टाचार का गुणसूत्र गहरे तो नहीं असर कर गया है ?

     इतिहास में झांकने पर  पाता हूँ कि तमाम राजे महाराजों के किस्से लूटमार और छिनैती से भरे पड़े हैं। विदेशियों ने भी भारत पर जब जब आक्रमण किये तो उन्होंने में लूट पाट और तमाम हथकंडे अपनाए इनमें चाहे हूण, कुषाण या अरब या जो भी रहे हों। सभी का मकसद लगभग एक ही था - लूटना और केवल लूटना।

        अभी कल शाम दशहरे में देखा कि रावण जलने के बाद कई लोग अधजली लकड़ियों को लूटने के लिए आपस में गुत्मगुत्था हो रहे थे। कोई चाहता था कि रावण के सिर के पास वाली लकड़ी मिले तो कोई चाहता था कि रावण के नाभि के पास वाली लकड़ी मिले।

     अपने स्कूल के मैदान में जलाये जाने वाले रावण के पुतले के अधजले हिस्से को मैंने भी बचपन में एक बार लूटा है। मेरी उम्र करीब दस-बारह साल की रही होगी।  उस समय किसी ने बताया था कि रावण की अधजली लकड़ियां घर में रखना अच्छा होता है। सो मैंने भी एक लकड़ी चुप्पे से निकाल ली। गरमा-गरम। घर पर ले गया तो डांट भी पड़ी - मरे मनई की हड्डी ले के क्यों आया ?

 नहाना पड़ा सो अलग :)

अश्मंतक
     इधर  देखता हूँ कि कई जगह रावण जलने के बाद लोग अश्मंतक के पत्ते आपस में एक दूसरे को बांटते हैं, यह कहते हुए कि-  सोना लो...सोना। जिसे दिया जाता है वह भी अपने पास से एक दो पत्ते अश्मंतक के तोड़ कर उसे देता है और गले मिलता है।  उम्र के हिसाब से आशीर्वाद भी लिया दिया जाता है।

   इस सोना बंटाई के बारे में थोड़ा बहुत जो मैंने पढ़ा है उसके अनुसार श्री राम के पूर्वज अयोध्या के रघु ने एक बार विश्वजीत यज्ञ किया। यज्ञ के बाद अपनी पूरी संपत्ति को दान कर वह एक पर्णकुटी  (पत्तो द्वारा निर्मित कुटिया) में रहने लगे। तभी वहां कौत्स आये। श्री कौत्स ने गुरुदक्षिणा हेतु १४ करोड सुवर्णमुद्राओंकी मांग की। तब रघु  ने कौत्स को 14 करोड़ स्वर्ण मुद्राएं देने हेतु  कुबेर पर आक्रमण करने की  ठानी।

   इस आसन्न युद्ध से घबराकर या कि आशंका से कुबेर जी ने  अश्मंतक  व शमी (श्वेत कीकर) के वृक्षोंपर सुवर्ण का वर्षाव किया। इतनी ढेर सारे स्वर्ण की वर्षा होने पर भी कौत्स ने केवल १४ करोड सुवर्णमुद्राएं ही लीं। शेष बते खुचे सुवर्ण को प्रजाजनों ने लूट लिया ।


  अब मेरे मन में यह प्रश्न आया कि यार श्री कौत्स ने ढेर सारी 14 करोड़ स्वर्ण मुद्राएं किस लिए मांगी। उन मुद्राओं का आखिर किया क्या होगा ?  और मान लो रघु को यदि यह 14 करोड़ स्वर्ण मुद्राएं देनी ही थी तो अपने पल्ले से दिए होते, उसके लिए उन्होंने कुबेर पर आक्रमण करने की क्यों ठानी ? दूसरे का माल लेकर दान देने में कौन बड़कई :)

   यही सब सवालों से जूझ रहा था कि तभी ध्यान जनता द्वारा की गई लूट पर गया। आखिर क्या सोच कर जनता ने उन स्वर्ण मुद्राओं को लूट लिया ? आखिर वह स्वर्ण मुद्राएं  गिराई तो कौत्स के लिए ही थीं,

फिर ?

  यानि जब सबने लूट ही लिया है तो आओ आपस में बांट कर उस लूट को वैलिडेट कर दें.....एक तरह से मान्य कर लें :)

     तो मित्रों, सुप्रीम कोर्ट का व्यंगात्मक फरमान जब लागू  होगा तब होगा.....अभी तो हम शांति से भ्रष्टाचार की देगची में पानी खौलाने को स्वतंत्र हैं, जब सरकारी रेट तय हो जायगा कि इस काम के इतने, उस काम के इतने तो देगची में मसाला डाल देंगे।

 अभी तो खौलाए जाओ.....खौलाए जाओ.....खून या पानी.........ये आप पर निर्भर  है  :)

- सतीश पंचम


( अश्मंतक का चित्र - साभार नेट से)

15 comments:

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

सतीश जी, मुझे लगता है कि भ्रष्टाचार एक आनुवांशिक समस्या है और यह मनुष्यों के गुणसूत्रों में समा गयी है।

honesty project democracy said...

भ्रष्टाचार के विरुद्ध उठे आवाज को जब देश का प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति भी ताकत देने में असमर्थ हो ,लोगों को जीने के लिए भ्रष्टाचार के शरण में जाने के लिए सरकारी व्यवस्था ही मजबूर करे भ्रष्टाचार पोषणयुक्त नीतियाँ बनाकर,लोगों के थाली से रोटी भी छीनने की व्यवस्था सरकार द्वारा विकाश के नाम पर किया जाय ,शिक्षा व्यवस्था पर भ्रष्टाचारियों का लगभग कब्ज़ा हो गया हो ,IAS-IPS जैसे सामाजिक सेवा वाली नौकरियां पैसों के बल मिलने लगे,न्यायालय का दीवार भी न्याय के लिए रिश्वत मांगे ,न्याय पालिका में न्यायप्रिय जजों को भ्रष्ट मंत्रियों के साजिश के तहत प्रतारित किया जाय..ऐसे में भ्रष्टाचार को नियंत्रण करने के लिए इस देश के राष्ट्रपति,प्रधानमंत्री तथा गृह मंत्री का चमत्कारिक रूप से ह्रदय परिवर्तन होना बहुत जरूरी है जिससे बड़े भ्रष्टाचारियों को सरे आम फांसी देने की प्रक्रिया को तुरंत लागू किया जा सके ..तबतक भ्रष्टाचार को अपने दम पर दबाने का प्रयास करते रहिये

ajit gupta said...

देश के कानून ही सभी को भ्रष्‍ट बना रहे हैं। आज सबसे अधिक भ्रष्‍टाचार न्‍याय व्‍यवस्‍था में ही है। जज साहब पहले अपने यहाँ ही ठीक कर लें तो बहुत कुछ ठीक हो जाएगा।

rashmi ravija said...

सुप्रीम कोर्ट ने क्या गलत कहा...अब यह वैध जैसा ही हो गया है...आलेख भी आपने बहुत बढ़िया लिखा..पर मुझे इस आलेख में एक बहुत अच्छी जानकारी मिली...जिसके लिए मैं प्रयत्नरत थी.
वह विजयादशमी के दिन ,सोना (अश्मंतक के पत्ते) बांटने का रिवाज़. मैने तो मुंबई में ही यह देखा. महाराष्ट्रियन बच्चे एक थैले में कुछ पत्ते लेकर आते हैं और घर घर से उन्हें पत्तों के बदले चॉकलेट और पैसे दिए जाते हैं. इसके पीछे की कहानी आज पता चली...शुक्रिया

VICHAAR SHOONYA said...

जो समर्थ है वो ही कुछ प्राप्त करेगा वाले सिद्धांत से ही हमारी उत्पत्ति हुई है. एक ही से उत्पन्न हुए एक जैसे करोड़ो शुक्राणुओं में से कोई एक ही अंडाणु के साथ निषेचन क्रिया कर शरीर ग्रहण करता है. क्या इसे भ्रष्टाचार कि शुरुवात कहें :-)

देवेन्द्र पाण्डेय said...

सरलतम शब्दों में कठोरतम कटाक्ष करती, मनमोहक व देशज परंपरा का ज्ञान कराती, नायाब पोस्ट।

प्रवीण पाण्डेय said...

भ्रष्टाचार व्यवस्था का अंग बन चुका है, बर्तन खुरचने से काम नहीं चलेगा।

विवेक सिंह said...

आप भी ना ! जहाँ से चले थे घूमफिरकर फिर से वहीं आ गए .

Shiv said...

जीवन का अंग बन गया है ये भ्रष्टाचार. पिछले कई दिनों से हॉस्पिटल में देख रहा हूँ. लोग सिक्यूरिटी गार्ड को झांसा देने पर उतारू रहते हैं. नियम का पालन करने को तत्पर गार्ड को अपना काम नहीं करने देते.

वो स्टील ऑथोरिटी का विज्ञापन है न कि; "देयर इज लिटिल बीत ऑफ़ सेल इन एवरी-वन" वाला हिसाब हो गया है यह भ्रष्टाचार का भी.

अनूप शुक्ल said...

भ्रष्टाचार जहां तक मुझे लगता है कि न्यूटन के जड़त्व के नियम के हिसाब से चल रहा है। जो वस्तु जैसी है वैसी बनी रहना चाहती है जब तक उस पर बाह्य बल न लगाया जाये। आराम का जीवन और सुरक्षित जीवन जीने का(सात पीढियों तक) जीने की सहज इच्छा की परिणति है भ्रष्टाचार। कम ज्यादा हो सकता है लेकिन बना हमेशा रहता है। :)

गिरिजेश राव said...

कहीं अश्मंतक बैगनी फूलों वाली अपराजिता तो नहीं?
'काशी का अस्सी' के बाद अब आख्यान अध्ययन?
बढ़िया है!

भ्रष्टाचार शाश्वत है भंते!
अर्थशास्त्र में चाणक्य ने हड्डी के साथ मांस बेचने वालों पर निगरानी/दण्ड के लिए अधिकारियों की व्यवस्था की है। मौर्यकाल में भी अधिकारियों द्वारा उत्कोच (घूस) लेने के वर्णन हैं। भ्रष्टाचार स्वाभाविक है। ईश्वर की अवधारणा को परे कर के सोचें तो सृष्टि में शुभ और अशुभ दोनों हैं। यह आप के ऊपर है कि आप कैसा समाज परिवेश चाहते हैं और किस पाले में खड़े होते हैं!

महेन्द्र मिश्र said...

भ्रष्टाचार देव सर्वत्र व्याप्त है और लोगों के नग नग में बिराज रहे हैं ... रिश्वत देने वाले और रिश्वत को दोनों हाथों से बटारने वाले भी खड़े हैं (एक तरफ गुरु और एक तरफ गोविन्द ) ... किसको क्या कहें ... जब तक लोग बाग़ स्वयं अपनी मानसिकता नहीं बदलते हैं तब तक इसे रोक पाना असंभव है ... भ्रष्टाचार देव सुरसा के समान है

anshumala said...

तो ठीक ही तो कहा है कोर्ट ने कुछ लोग घुस लेने में भी बेईमानी करते है जो एक अधिकारी एक काम ५०० में कर देता है दूसरा उसके लिए ८०० मागता है है ना अंधेरगर्दी ये तो लुट में लुट हो गया ना | रेट फिक्स रहेगा तो कोई नहीं लुटा जायेगा समय समय पर महगाई के साथ रेट को बढ़ाते रहे चाहे तो रेट फिक्स करने के लिए एक आयोग बैठा ले और एक वाजिब दाम तय कर दे किसी सरकारी काम को करने के लिए | मै तो कहती हु की सरकार को भी वेतन देना छोड़ कर हर काम कमीशन पर कर देना चाहिए की जितना काम करोगे उतना कमीशन जनता से ले लेना | फिर देखिये क्या धडा धड फाईले आगे बढ़ती है | भाई काम जनता का होगा तो पैसे भी उसे ही देने होंगे ना | आप की बेकार में इस अच्छी व्यवस्था की बुराई किये जा रहे है |

anitakumar said...

इतने सारे सवाल पूछ लिए पोस्ट में? आप ने तो दिमाग का दही बना दिया…।:) जब जवाब मिलेगें तब बतायेगें कि राम ने कुबेर के धन से क्युं दान करने की सोची और जनता क्युं लूटती है (कि लुटती है या अपनी लुटिया डुबोती है?)बाकी भ्रष्टाचार तो हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में यूं ही समाया है जैसे धमनियों में दौड़ता खून्।उसे लताड़ना फ़ैशन हो सकता है लेकिन कई बिगड़े काम भी उस से बनते हैं, है न?

prkant said...

" राम दुआरे तुम रखवारे ,
हो़त न आज्ञा बिनु 'पैसा'रे " -- तुलसी बाबा भी कह गए हैं!!!!!

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