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Saturday, October 16, 2010

मन की कुलाँच......गिलहरी सी फुदकन.....गजराज सी तरी.......लल्लन लंगोट.....और मैं.........सतीश पंचम

        घर से कुछ दूर स्थित  पहाड़ी वाला हनुमान जी का मंदिर…….  आलथी-पालथी मार कर हनुमान चालीसा पढ़ने की कोशिश कर रहा हूं…..संगमरमर की शीतलता मेरे टखने को सहला रही  है, मन ही मन कुछ चल रहा है..... थिरक रहा है......  ध्यान हनुमान चालीसा से उचटता जा रहा है ....…..आँख मूँद मन थिर करना चाहता हूँ लेकिन विचारों के थिर की बजाय   उनकी थिरकन बढ़ती जा रही है ....…  उंची पहाड़ी वाले मंदिर के इस शांत वातावरण में भी यदि मन थिर नहीं हो पा रहा तो जरूर कोई बात है.......उचट बयानी या कुछ और।

       आँखे खोल कर आस- पास ध्यान देता हूं……सामने एक भक्तों का जमघट है। तिलकधारी कथावाचक  रामायण बाँच रहे हैं….  ठेठऊ रामायण......ठेठ अंदाज में............रावणवा ने मंदोदरीया से कहा....सुन मंदोदरीया.....तैं हमसे ज्यादा चपड़ चूपड़ मत कहियो.....अबहीं हम अम्मर हैं.....राम के डर से सीता जी को लौटा दें तो हो गई लंकई।

  जियो कथावाचक जी...जियो।
 
     कथावाचक के आसपास बैठे लोग बहुत भक्ति भाव से कथा सुन रहे हैं। नो क्वेश्चन…..नो डाउटनेस्स…..सिर्फ सुनो.....'द  शून्यकाल ऑफ रिलिजियस पार्लियामेंट'........डिल्यूटेड विथ 'आस्थात्मक पिप्परमेंट'।

    मन फिर उचट रहा है।  मंदिर के शिल्प को निहारता हूं………कलात्मक स्तंभ…….. सुंदर आकर्षक शिल्पकारी…….. कहीं पेड़ पर बंदर उछल कूद रहे हैं……कहीं पर गिलहरी उचक कर जा चढ़ी है…..सूँढ़ में पानी भर गजराज जी जलीय फव्वारे से तरी ले रहे हैं तो वहीं बगल में  एक बंदरिया अपने बच्चे को पेट से सटाये हुए बैठी है.....रे मन..... यहां तो कोई उचट बयानी नहीं है, कुछ और....... ढूँढो पार्थ ढूँढो ।
  
  उद्विग्न मन: स्थिति में नज़र कंटीले तारों पर गई....... लाल लंगोट सूख रही है। किसकी है लंगोट...... जरूर यह लंगोट इन्हीं में से किसी की होगी। कथावाचक की….नहीं वो तो लंगोट के पक्के नहीं लगते……फिर किसकी.....उस छद्मी बाबा  के भक्त की……नहीं यार......गदहबेला का सोवइय्या लंगोट का पक्का हो सकता  है भला.......छोड़ो, जिसकी भी होगी, ले जायगा.... तुम क्यो लंगोट को ताक रहे हो..........वैसे भी इस मुन्नी बदनाम जमाने में भला इस  'लल्लन लंगोट' के बूते किन किनका ब्रहमचर्य सुरक्षित है......सूरमाओं की दबंगई तो बहुत पहले ही ढह गई है..... 'लल्लन लंगोट' तो 'आड़' है,  एक तिरपाल वाली घेरेबंदी..... ओट में जिसके  Work in  Progress चल रहा  हैं। 

 तभी नज़र पड़ी मंदिर के सूचना फलक पर …..ढेर सारे सुविचारों वाला बोर्ड…..….माता पिता की सेवा करना चाहिए…..….घर में तुलसी का पौधा रखना चाहिए……हर घर में एक गाय होनी चाहिए………..गाय….हर घर में……क्या ये संभव है…..उफ्...... कैसी तो लच्छेदार चिरौरी है …….हर घर में एक गाय होनी चाहिए, वो भी उस मुंबई जैसे  शहर में जहां के लोग TOPAZ ब्लेड सी धार लिए अपनी जिनगी को चाक करने के लिए अभिशप्त हैं….हुँह.....…..ये बातें.... ये सुविचार......पढ़ने के लिए ही है पार्थ......पढ़ लो.....खुश हो लो....संभव हो तो करो वरना आगे बढ़ो....... लेकिन चिन्ता नको।
  
        उधर एक और बोर्ड लगा है…….ढेर सारे निर्देशों के बीच लिखा है – यह मंदिर हनुमान जी का है, इसलिए महिलाओं से निवेदन है कि शारीरिक अशुद्धी की स्थिति में मंदिर न आएं।

  शारीरिक अशुद्धि......जेहन में एक पुराने कलीग मिस्टर शाह की यादें ताजा हो उठती है। मिस्टर शाह अपनी पत्नी के महीने के उन मुश्किल वाले दिनों में शारिरिक अशुद्धि के चलते खाना बनाने के लिए एक काम वाली बाई को बुलाते थे।  मिसेज शाह को शारीरिक अशुद्धियों के चलते  किचन से तब तक छुट्टी मिल जाती।

    स्ट्रिक्ट फॉलोअर ऑफ 'इज्म'.....द हिंदूइज्म.......।

  लेकिन इसकी क्या गारंटी कि जो महिला खाना बनाने के लिए आई है वह भी शारीरिक रूप से अशुद्ध नहीं है ?

महिला तो वो भी है।
  
  सुगन मन की टोह लेता शांत माहौल के बीच पक्षियों के कलरव को सुन रहा हूँ.....चिह चिह....चूँ ....चक्.... चिक्....चिह।  

     मन अब भी थिर नहीं हो रहा है..... अबकी मंदिर की उन्हीं दीवारों पर फिर से नज़र डालता हूँ.......ओह.....तो मेरा मन यहाँ  है....... कम्बख्त शिल्पकार ने मुझसे इजाजत तक नहीं ली , मन को मंदिर की इन दीवारों पर साकार ही तो कर दिया है उस चोरहे ने ......कभी गिलहरी जैसा उचक कर फुनगी पर जा बैठता है मन तो कभी बंदरों जैसा 'डालीबाज' हो उठता है......कभी योगी जैसा थिर, तो कभी हिरन जैसी कुलांच।

   क्या यही है मेरा मन.....। उछल कूद मचाता, भागता, कुलांचे भरता...गिरता पड़ता।  

उधर कथावाचक जी  कह  रहे हैं......रावनवा बहुत बलवान था... गियानी था.......लेकिन मन नहीं बान्ह पाया.....सीता खातिर बेकल हो उठा बाभन...... नहीं तो अब तक देवता उसे पूजते। 

रावण के मरते बखत राम जी लछिमन से बोले, जाओ लछिमन, रावण से गियान ले लो।

 लछिमन जी चक्कित.....भला इस रावणवा से कौन गियान लिया जा सकता है, जो सीता माता तक को हर लाया ?

 राम जी कहिन....अरे लछिमन,  रावण खातिर इतना मती सोचो.....वह बहुत गियानी है, प्रकाण्ड बिदबान है..... बस एक गलती कर बैठा .....अभिमानी होई गया.....मन को थिर नहीं कर पाया।

 जाओ जिनगी का गियान लो रावण से.....इसके पहले कि उसके प्राण पखेरू उड़ें।  

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................

  मैं  मंदिर की सीढ़ियाँ उतर रहा हूँ......बगल से पारिजात के फूलों ने हल्की सी सरग़ोशीयां  करते हुए कहा -  मन को थिर न करना पार्थ.....वरना 'जीते जी ही मृत' हो जाओगे... मन की थिरकन को यूं ही चलने दो.....लेने दो गजराज जैसी शीतल तरी.....उचकने दो फुनगीयों पर गिलहरी जैसे ..........होने दो हुड़दंगी वानर ....... भरने दो हिरनों जैसी कुलाँच......आखिर मन है..... कोई 'पाथर' तो नहीं।  

 - सतीश पंचम




(सभी चित्र मेरे घर से कुछ दूर एक पहाड़ पर बने हनुमान जी के मंदिर के हैं )

14 comments:

संजय भास्कर said...

वाह पहली बार पढ़ा आपको बहुत अच्छा लगा.

संजय भास्कर said...

बहुत ही खूबसूरती से लिखा है आपने।

ताऊ रामपुरिया said...

हम तो आपकी पोस्ट पढकर ही जिनगी का गियान लेलेते हैं.:) बहुत लाजावाब पोस्ट.

दुर्गा नवमी एवम दशहरा पर्व की हार्दिक बधाई एवम शुभकामनाएं.

रामराम.

देवेन्द्र पाण्डेय said...

लंगोट और अशुध्दि..सब विकार निकल जांय तो मंदिर अच्छी जगह है।

विवेक सिंह said...

हैं और भी दुनिया में ब्लॉगर बहुत अच्छे
कहते हैं कि सतीश पंचम का है अंदाजे बयाँ और

प्रवीण पाण्डेय said...

बड़े अनोखे ढंग से सुनाया सारा कथानक।

VICHAAR SHOONYA said...

मन को थिर न करना पार्थ.मन तो आखिर मन है. कोई 'पाथर' तो है नहीं।

Arvind Mishra said...

मिस्टर शाह अपनी पत्नी के महीने के उन मुश्किल वाले दिनों में शारिरिक अशुद्धि के चलते खाना बनाने के लिए एक काम वाली बाई को बुलाते थे।
मेरा मन बस यहीं थिर हुआ बड़े ज्ञानी पुरुष रहे शाह जी मनसायन का इतना सहज रास्ता -इस आजमुदे नुस्खे क० अपनाया जाना चाहिए !

चैतन्य शर्मा said...

आपने तो हनुमान जी के मंदिर के बारे में कितनी अच्छी बातें लिखी

विजयदशमी की शुभकामनायें

Siddhartha said...

गजब का Thinking Process दर्शाया है आपने मंदिर में......तय करना मुश्किल है की हनुमान जी का आशीर्वाद आपको मिला होगा या फिर कथावाचक और उनके श्रोताओं को !...

prkant said...

लंगोटा दरअसल भारतीय लोकतंत्र का प्रतीक है--दायें बाजू और बाएं बाजू की दो डोरियों के बीच में कांग्रेसी पछोटा बहुत कुछ संभाले/ बचाए रखता है. वक्त-बेवक्त विचारधारा से मुक्त होकर तांक-झाँक करने / विचरने की विशेष सुविधायुक्त अन्य कोई वस्त्र इतने लोकतान्त्रिक चरित्र का नहीं है.

वन्दना अवस्थी दुबे said...

विजयादशमी की अनन्त शुभकामनाएं.

Swaa, JANARDAN VISHNU PATIL said...
This comment has been removed by the author.
Swaa, JANARDAN VISHNU PATIL said...

बहुत बहुत शक्रिया...!

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