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Tuesday, October 12, 2010

गुमसुम छेद वाली जुराब.....छइलाता बछड़ा......उटन्ग कपड़े..........सतीश पंचम

गर्म जलेबी और दूध के मिली जुली स्वाद वाली कुछ दुपहरिया  त्रिवेणीयाँ...........लिजिए झेलिए : )

(1)

जूते के घुप्प अंधेरे में गुमसुम   छेद वाली जुराब
शर्ट से बाहर झलकता पुन्नी बनियान वाला

पहली नौकरी का पहला दिन तो नहीं ?      


(2)

ठुँसी हुई बस में, कपड़ों की रगड़ भी अज़ब शै है    
उटन्ग से हुए तुम्हारे नायलोनी दुपट्टे की कसम।    

कपड़ो की स्टेटिक एनर्जी, जो न कराए !!


(3)

तुम्हारे मिज़ाज की पढ़ाई तो बहुत ही मुश्किल है    
कभी हां से तो कभी ना से ककहरे खुलते है

लगता है सभी मास्टर जान-पहचान कर रखे गये थे।


(4)

आज गईया ने फिर   से  दूध कम दिया
बछड़ा भी खेल- कूद कर छइलाया है        

शायद बछड़े ने ममता पी है........ चुप्पे से ।  

---*---------*---------*---
     - सतीश पंचम

(चित्र : साभार नेट से)

17 comments:

DEEPAK BABA said...

पंचम जी, लगता है गलत जगह फंस गए हो........

अमां बहार आयो यार इस मुई त्रिवेणी से.......

कोई गांव की - दिहाती गपशप लिखो..

सतीश पंचम said...

गिरिजेश जी की ई-मेल से प्राप्त टिप्पणी -

अजब मिजाज की ग़जब कविताएँ।
जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे कवि।
सरल, सुलझे मानस की कविता
बारीक निगहबयानी की कविता।

@ तुम्हारे मिज़ाज की पढ़ाई तो बहुत ही मुश्किल है
कभी ‘हां’ से तो कभी ‘ना’ से ककहरे खुलते है
लगता है सभी मास्टर जान-पहचान कर रखे गये थे।

झूठ बोलते हो जब कहते हो कि शादी के पहले इश्क़ नहीं किए!

@
ठुँसी हुई बस में, कपड़ों की रगड़ भी अज़ब शै है
‘उटन्ग से’ हुए तुम्हारे नायलोनी दुपट्टे की कसम।
कपड़ो की स्टेटिक एनर्जी, जो न कराए !!

डायनमिक कर देती है, और क्या?
ढूढ़ कर, इंतजार कर, उसी टैम,
उसी बस को पकड़ते हो और
धक्कमपेल करते, गाली सुनते
वहीं जा खड़े होते हो।
अफसोस! वहाँ दुपट्टा नहीं,
जीन्स टॉप मिलता है।
इसे ही LMKD (लहकते मिज़ाज का धोखा) कहते हैं।

Tarkeshwar Giri said...

Kuch bhi ho, Aap likhte badhiya hain

राज भाटिय़ा said...

मस्त लगी जी आप की रचना, जुराब तो हमारी भी कभी कभी फ़टी होती हे, ओर मुस्कुराहटे तब बहुत आती हे, जब जुते उतार कर कभी फ़र्श पर बेठना पडता हे ओर सब की निगाहे हमारी जुराब के छेद पर टिक जाती हे:)

शोभना चौरे said...

ye andaj jyda achha hai

प्रवीण पाण्डेय said...

आत्म से साक्षात्कार या जमाने को दुत्कार।

सतीश पंचम said...

@ प्रवीण जी's comment

आत्म से साक्षात्कार या जमाने को दुत्कार


---------------

कॉकटेल ही समझिए :)

Arvind Mishra said...

:) बढियां तिरवेनी ...

Udan Tashtari said...

शायद बछड़े ने ममता पी है........ चुप्पे से ।


-हाय!!

यार भाई...बहुते मूड में बहे हो..बहते रहो..मौका और मूड दोनों हैं..उतार डालो एक किताब भर मटेरियल...शुभकामनाएँ.

राम त्यागी said...

gayiya wali badi sahi rahi ...cocktail is tasty :)

rashmi ravija said...

तुम्हारे मिज़ाज की पढ़ाई तो बहुत ही मुश्किल है
कभी ‘हां’ से तो कभी ‘ना’ से ककहरे खुलते है

लगता है सभी मास्टर जान-पहचान कर रखे गये थे।

कमाल की त्रिवेणियाँ लिख रहें हैं आप..

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी said...
This comment has been removed by the author.
अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी said...

आज गईया ने फिर से दूध कम दिया
बछड़ा भी खेल- कूद कर छइलाया है

शायद बछड़े ने ममता पी है........ चुप्पे से ।
--- हम तो यहीं लिट पोट हो गए ! छइलाया - शब्द सुने बहुत दिन हो गए थे |

@ गिरिजेश जी , का कोई चिल्लाता है , भोंपू बजाता है ? 'भोंपू है बिधि हाथ' :)

honesty project democracy said...

सतीश जी
मैं आपने जमीनी सोच की कद्र करता हूँ ..आप व्यावहारिक बातों की भावनाओं पर लिखते हैं और मेरी नजर में यह भी सार्थक ब्लोगिंग का महत्वपूर्ण अंग है ....शानदार ब्लोगिंग के लिए आभार...

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

इस त्रिवेणी को शाजिया मैडम तक ले जाएँ।

इल्म छलकता रहा दुनिया दीवानी होती रही
फिर दनादन हारकर क्यों सेकुलरी रोती रही

आज अब aap को छोड़ने का इरादा तो नहीं?

सतीश पंचम said...

सिद्धार्थ जी, Like बटन ढूंढ रहा हूं :-)

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

बटन मिला क्या?
कोई बात नहीं मैं यूँ ही समझ गया।
:)

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